प्रस्तुत लेख में 'प्रतिशोध' पुस्तक के अंतिम अध्याय 'भीष्म का महाप्रस्थान' का पूर्ण विश्लेषण है। इसमें भीष्म द्वारा की गई श्रीकृष्ण की महान स्तुति, उनके देह त्याग और कुरु-वृद्धों के वन-गमन की ऐतिहासिक एवं दार्शनिक कथा का विस्तृत वर्णन चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल' द्वारा प्रस्तुत किया गया है।
१. मूल पाठ
महाप्रस्थान का समय आ ही गया। सभी ऋषि समुदाय के उपस्थित हो जाने पर महात्मा भीष्म ने भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति करना प्रारम्भ किया। उस परम ब्रह्म को देवता, महर्षि एवं विद्वान् गण भी नहीं जान सकते। उसको मात्र विधाता एवं नारायण हरि ही जानते हैं। उस परम् अविनाशी को नारायण, महर्षि, सिद्ध, देवता, नारद जैसे कुछ तत्त्वज्ञ ही जान सकते हैं। त्रिकालज्ञ शम्भू के अतिरिक्त शेष देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, गुह्यक, पन्नगादि स्वयं नहीं जानते कि ईश्वर कौन है?
जिसमें विश्व भर के जीव-जन्तु निवास करते हैं एवं मृत्यु के पश्चात् प्रवेश करते हैं। सभी एक सूत्र में गुँथे मणिमाला की भाँति चराचर स्वामी के किसी न किसी भाँति सम्पर्क में बने रहते हैं। इस परमात्मा के हजार शिर हैं, सहस्त्र पैर हैं, हजार नेत्र हैं, सहस्त्रबाहु हैं एवं हजारों मुख पर मुकुट देदीप्यमान हैं, जिनसे अद्भुत आभा विकीर्ण हो रही है। उसे नारायण कहा गया है। वह अणु-परमाणु सबमें व्याप्त है। वह परम् गरिष्ठ, परम् श्रेयष्कर है। वेद, उपनिषद् उसे इदमिथं नहीं जानते। वह त्रिगुणातीत हैं। जिनकी दिव्य देव अर्चना करते हैं।
गुह्य लोग परम् नाम का जप करते हैं। जिनकी प्राप्ति हेतु तपस्वी लोग तप करते हैं, जिनको तत्त्ववेत्ता सबकी आत्मा मानते हैं। वे ही स्वयं देवकी और वासुदेव के अंश से जन्म लिये हैं। अपने अति बुद्धि एवं उत्कण्ठ आत्मा वाले उसे ही प्रजापति के रूप में, पुराणों में परम् पुरुष, युगादि में ब्रह्म के नाम से जानते हैं। कर्म प्रधान भक्त अपनी समस्त कामनाओं की प्राप्ति हेतु यजन करते हैं। जिन्हें जगत् का कोश कहा गया है। जिसमें सभी लोग निवास करते हैं। जिसमें समस्त लोक तैरा करते हैं। जैसे जल में जलपक्षी तैरते हैं। वही एक अक्षर ब्रह्म है जो सत् एवं असत् से परे है।
सिद्ध ऋषि, महोरग, सुरासुर कोई भी उसके आदि-अन्त, मध्य को नहीं जानते। दैत्यों के नाश के लिए स्वर्णमय आभायुक्त अदिति के गर्भ से जिसने सूर्य के रूप में जन्म लिया उसे नमस्कार है। शुक्ल पक्ष में देवताओं को एवं कृष्ण पक्ष में पितरों को जो अमृत रूप से तृप्त करता है जो द्विजातियों का राजा है, उस सोम स्वरूप को नमस्कार है। परम् ज्ञाता विप्र समुदाय द्वारा जिसका स्तवन किया जाता है उस वेद स्वरूप को नमस्कार है। यज्ञ, होता, ऋत्विज, स्तोत्र में उसी का नमस्कार है।
जिसने वाराह रूप धारण कर पृथ्वी का उद्धार किया था, उसको नमस्कार है। जो योग-निद्रा में निमग्न शेषनागरूपी पर्यङ्क पर सोया करता है उस निद्रास्वरूप को नमन है। जो नाना धर्मों में पृथकजनों से पूजित है, उस धर्मस्वरूप को कोटिशः नमन है। जो अनंग रूप से प्राणियों में विद्यमान रहकर परस्पर आकर्षण का कारण बनता है, उस कामात्मन् को नमन है। सांख्य, योग, मोक्ष, माया, घोरादि अनेक रूपों में जिसको पूजा होती है उसको नमस्कार है। जो ब्रह्म मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, उदर से वैश्य एवं पैर से शूद्र की उत्पत्ति का कारण बना उस वर्णात्मक स्वरूप को नमन है। जो प्राण, इन्द्रिय, पाचन, ओज, मोह, ज्ञान, रुद्र, शान्तादि रूप में दृश्यमान है, उन सभी को नमस्कार है। आपके सनातन रूप को भी नमस्कार है। हृषीकेश परम् पुरुष अमित तेजस्वी भगवान आपको बारम्बार प्रणाम है। जो पीताम्बरधारी गोविन्द को प्रणाम करता है, उसे संसार में किसी तरह का भय नहीं रहता।
कृष्ण को एक बार प्रणाम करने मात्र से दस अश्वमेध यज्ञ के अवभृथ स्नान का फल प्राप्त होता है। दशाश्वमेध करने वालों का जन्म सम्भव है किन्तु कृष्ण को प्रणाम करने वाले का पुनर्जन्म असम्भव है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत करने वाले श्रीकृष्ण का स्मरण करके जो रात्रि में शयन एवं प्रातः उठकर कृष्ण का नमन करते हैं, वे कृष्ण में वैसे ही प्रवेश करते हैं जैसे अग्नि में घी आहुति के साथ मिल जाता है। नरक के सन्त्रास से डरे हुए के लिए रक्षामण्डल एवं संसार सागर में डूबने वाले को नौका स्वरूप विष्णु को नमस्कार है। ब्राह्मणों को देव स्वरूप मानने वाले, गो ब्राह्मण के हित की रक्षा एवं जगत् के हित करने वाले श्रीकृष्ण को नमस्कार है। नारायण ही परम् देवता है, वे ही परम् तप हैं, वे ही परम् ब्रह्म हैं। भीष्म की हार्दिक स्तुति सुनकर समस्त ऋषिगण परम् हर्षित होकर उनकी प्रशंसा करने लगे।
भीष्म के भक्ति योग को जानकर भगवान श्रीकृष्ण जी सात्यकि के साथ रथारूढ़ होकर श्री भीष्म के पास चल दिये। एक रथ पर धर्मराज एवं भीमसेन के साथ उनके युग्म अनुज एक रथ पर आसीन होकर पितामह का अन्तिम दर्शन करने चल पड़े। कृपाचार्य, युयुत्स, सूतजी एवं संजय जैसे परम तपस्वी लोग भी आ गये। उनके रथ के चक्र प्रबल वेग से नगर छोड़कर आते हुए मानो समग्र पृथ्वी को विकम्पित करते हुए उपस्थित हुए। वहाँ पहुँचकर श्रीकृष्ण ने महात्मा भीष्म को दिव्य-दर्शन देकर गंगानंदन को आप्तकाम किया।
भीष्म के पाञ्च-भौतिक शरीर के शान्त होने पर महाराज युधिष्ठिर ने उनका विधि विधान से और्ध्वदैहिक कर्म सम्पन्न कराया। उनकी स्मृति में राजदरबार में तीन सम्मानित आसन हमेशा रिक्त रखे जाते। इनमें पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य एवं अग्रज दानवीर कर्ण अमूर्त रूप से विराजमान रहते। युधिष्ठिर के पन्द्रह वर्ष शासन करने पर एक दिन महाराज धृतराष्ट्र ने वनगमन की आज्ञा माँगी। काफी प्रतिरोध करने के पश्चात् युधिष्ठिर ने संजय चारी की देखरेख में माता कुन्ती से गान्धारी की सेवा करने के आश्वासन पर महाराज धृतराष्ट्र को वन में तप करने का प्रबन्ध किया। शेष जीवन को इन लोगों ने तपस्या करते हुए वहीं व्यतीत किया। महर्षि वेदव्यास के सानिध्य में रहते हुए इन कुरु-वृद्धों ने परमार्थ का चिन्तन करके प्रायश्चितपूर्वक अपने शेष जीवन को धन्य किया। भारतीय संस्कृति में सभी को आत्मसात् करने की क्षमता है। आने वाली पीढ़ियाँ इनमें अपने आदर्श को सहज ग्रहण कर सकती हैं।
२. कठिन शब्दार्थ
३. सारांश
पाठ 'भीष्म का महाप्रस्थान' महाभारत के उस अंतिम अध्याय का वर्णन करता है जहाँ युग-पुरुष भीष्म पितामह अपने नश्वर शरीर का त्याग कर परमधाम की ओर प्रस्थान करते हैं। सूर्य के उत्तरायण होने पर भीष्म ने अपनी मृत्यु का समय निकट जानकर भगवान श्रीकृष्ण की अत्यंत भावपूर्ण और दार्शनिक स्तुति की। इस स्तुति में उन्होंने श्रीकृष्ण को साक्षात् नारायण, सृष्टि के सृजक और त्रिगुणातीत ब्रह्म के रूप में प्रतिष्ठित किया। भीष्म ने स्पष्ट किया कि कृष्ण की भक्ति और उन्हें किया गया एक प्रणाम दस अश्वमेध यज्ञों के फल से भी श्रेष्ठ है, क्योंकि यह पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान करता है।
भीष्म की भक्ति से अभिभूत होकर श्रीकृष्ण, पांडवों और अन्य कुरु-वृद्धों के साथ उनसे मिलने पहुँचे। भगवान के दिव्य दर्शन पाकर भीष्म आप्तकाम हुए और शांतिपूर्वक प्राण त्याग दिए। उनके देह त्याग के बाद युधिष्ठिर ने ससम्मान उनका अंतिम संस्कार किया। युधिष्ठिर के शासनकाल में भीष्म, द्रोण और कर्ण के सम्मान में राजदरबार में तीन आसन सदैव रिक्त रखे जाते थे, जो उनके प्रति सम्मान और स्मृतियों को जीवित रखने का प्रतीक थे। युधिष्ठिर के पन्द्रह वर्ष के न्यायपूर्ण शासन के बाद, महाराज धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती ने वन जाने का निश्चय किया। महर्षि वेदव्यास के सानिध्य में इन कुरु-वृद्धों ने अपने जीवन के शेष समय को तपस्या और परमार्थ के चिंतन में लगाया। यह अध्याय न केवल एक महान योद्धा की विदाई की गाथा है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की उस महानता को भी दर्शाता है जहाँ युद्ध के प्रतिशोध के बाद भी प्रायश्चित, सेवा और आध्यात्मिक शांति को सर्वोपरि स्थान दिया जाता है। अंततः, यह पाठ सिखाता है कि जीवन का वास्तविक लक्ष्य भौतिक विजय नहीं, बल्कि ईश्वर का सामीप्य और आत्मिक शुद्धि है।
४. महत्वपूर्ण अंशों का संक्षेपीकरण
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'भीष्म का महाप्रस्थान' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : शरशय्या पर लेटे भीष्म द्वारा श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप का गुणगान।
संक्षेपीकरण : भीष्म पितामह ने श्रीकृष्ण को वह अविनाशी ब्रह्म बताया जिसे देवता और ऋषि भी पूर्णतः नहीं जान सकते। वे ही नारायण हैं, जो सूक्ष्म से सूक्ष्म अणु और विराट से विराट ब्रह्मांड में व्याप्त हैं। उनकी अर्चना ही मोक्ष का एकमात्र मार्ग है।
संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय कृत 'प्रतिशोध' के इक्कीसवें अध्याय से।
प्रसंग : भीष्म द्वारा कृष्ण के नाम जप और प्रणाम के महात्म्य का वर्णन।
संक्षेपीकरण : श्रीकृष्ण को किया गया एक प्रणाम दस अश्वमेध यज्ञों के पुण्य से बढ़कर है, क्योंकि यज्ञ पुनर्जन्म दे सकते हैं, किंतु कृष्ण की शरण पुनर्जन्म से मुक्ति दिलाती है। ईश्वर की भक्ति अग्नि में घी की आहुति के समान भक्त को परमात्मा में विलीन कर देती है।
संदर्भ : 'प्रतिशोध' पुस्तक के 'भीष्म का महाप्रस्थान' पाठ से।
प्रसंग : भीष्म के अंतिम क्षणों और युधिष्ठिर द्वारा किए गए सम्मान का विवरण।
संक्षेपीकरण : श्रीकृष्ण के दिव्य दर्शन पाकर भीष्म ने प्राण त्यागे। युधिष्ठिर ने उनका अंतिम संस्कार किया और भीष्म, द्रोण तथा कर्ण की स्मृति में दरबार में तीन विशेष आसन रिक्त रखवाए, जो उनके महान योगदान के प्रति श्रद्धा का प्रतीक थे।
संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय रचित 'प्रतिशोध' के इक्कीसवें पाठ से।
प्रसंग : धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती के अंतिम जीवन का वर्णन।
संक्षेपीकरण : शासन के पंद्रह वर्षों बाद धृतराष्ट्र ने गान्धारी और कुन्ती के साथ वन में जाकर तपस्या करने का निर्णय लिया। व्यास जी के सानिध्य में उन्होंने परमार्थ का चिंतन करते हुए अपने जीवन को सार्थक बनाया।
५. विस्तृत विशदीकरण (भाव-पल्लवन)
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'भीष्म का महाप्रस्थान' नामक पाठ से लिया गया है इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : भीष्म पितामह द्वारा ईश्वर (श्रीकृष्ण) की अगाध महिमा और उनकी सर्वव्यापकता का दार्शनिक विवेचन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने यहाँ भीष्म पितामह के मुख से अद्वैत वेदांत के उस सार को व्यक्त कराया है, जहाँ ईश्वर को तर्क और बुद्धि की सीमाओं से परे माना गया है। भीष्म का यह कहना कि देवता और महर्षि भी उसे नहीं जान सकते, ईश्वर की उस 'अचिन्त्य' शक्ति को दर्शाता है जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है, परिभाषित नहीं। 'अणु-परमाणु सबमें व्याप्त' होना ईश्वर की सर्वव्यापकता (Omnipresence) का प्रमाण है। विज्ञान आज जिस ऊर्जा की खोज कण-कण में कर रहा है, भीष्म ने उसे हजारों वर्ष पूर्व 'नारायण' के रूप में पहचान लिया था।
'वेद और उपनिषद् उसे इदमिथं (यही है) नहीं जानते'—यह वाक्य अत्यंत गंभीर है। इसका अर्थ है कि समस्त धार्मिक ग्रंथ और ज्ञान के साधन ईश्वर की ओर संकेत तो करते हैं, किंतु उनका वर्णन करने में वे भी स्वयं को अधूरा पाते हैं। वह 'त्रिगुणातीत' है, अर्थात संसार के तीन गुणों (सत, रज, तम) से ऊपर है। भीष्म यहाँ श्रीकृष्ण को केवल एक राजा या मित्र के रूप में नहीं, बल्कि उस आदिशक्ति के रूप में देख रहे हैं जो समस्त सृजन का मूल है। यह स्तुति भीष्म के ज्ञान की पराकाष्ठा है, जहाँ एक योद्धा अपनी तलवार त्यागकर ज्ञान के प्रकाश में विलीन हो रहा है। वे स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर का ज्ञान ही 'परम श्रेयष्कर' है, जो मनुष्य को सांसारिक दुखों से मुक्ति दिलाकर परम शांति की ओर ले जाता है। यह अंश पाठकों को यह संदेश देता है कि भक्ति का अर्थ केवल मूर्ति पूजा नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करना है। भीष्म का यह दर्शन उन्हें एक सामान्य सेनापति से ऊपर उठाकर एक महान ऋषि की श्रेणी में खड़ा कर देता है, जिनकी वाणी आज भी सत्य की खोज करने वालों का मार्ग प्रशस्त करती है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'भीष्म का महाप्रस्थान' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : भक्ति की श्रेष्ठता और कर्मकांड की तुलना में शरणागति के महत्व का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक ने यहाँ 'भक्ति मार्ग' की सुगमता और उसकी असीम शक्ति को प्रतिपादित किया है। प्राचीन भारतीय धर्म में 'अश्वमेध यज्ञ' को पुण्य की पराकाष्ठा माना जाता था, किंतु भीष्म ने श्रीकृष्ण को किया गया एक साधारण प्रणाम उससे भी अधिक फलदायी बताया। यहाँ 'प्रणाम' केवल शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह अहंकार का पूर्ण विसर्जन है। जब मनुष्य ईश्वर के सामने नतमस्तक होता है, तो वह अपने 'स्व' को त्याग देता है। भीष्म का तर्क अत्यंत दार्शनिक है—यज्ञों के माध्यम से प्राप्त पुण्य मनुष्य को स्वर्ग तो दिला सकते हैं, किंतु वे उसे 'पुनर्जन्म' के चक्र से मुक्त नहीं कर सकते।
स्वर्ग की प्राप्ति अस्थायी है, पुण्य समाप्त होते ही आत्मा को पुनः पृथ्वी पर आना पड़ता है। किंतु कृष्ण की भक्ति या उन्हें किया गया पूर्ण समर्पण 'मोक्ष' का द्वार खोलता है, जहाँ से वापसी संभव नहीं है। 'अग्नि में घी की आहुति' का उदाहरण देकर लेखक ने भक्त और भगवान के एकाकार होने की स्थिति को स्पष्ट किया है। जैसे घी अग्नि में मिलकर अपना अलग अस्तित्व खो देता है और स्वयं अग्नि बन जाता है, वैसे ही सच्चा भक्त कृष्ण के चरणों में समर्पित होकर स्वयं ब्रह्मलीन हो जाता है। यह अंश संसार रूपी सागर में डूबने वालों के लिए 'नौका' के समान है। भीष्म यहाँ समझाना चाहते हैं कि कठिन तपस्या और जटिल कर्मकांडों की तुलना में प्रेमपूर्ण भक्ति अधिक शक्तिशाली है। श्रीकृष्ण को 'गो-ब्राह्मण' का रक्षक और जगत का हितैषी कहना उनके लोक-कल्याणकारी स्वरूप को पुष्ट करता है। यह व्याख्या सिद्ध करती है कि जीवन की सार्थकता उपलब्धियों के संचय में नहीं, बल्कि ईश्वर की निस्वार्थ शरण में जाने में है। भीष्म की यह वाणी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक आध्यात्मिक प्रकाश स्तंभ है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'भीष्म का महाप्रस्थान' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : युद्ध के बाद की शांति, सम्मान की परंपरा और महान योद्धाओं की अमिट स्मृति का चित्रण।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने यहाँ 'मृत्यु' और 'स्मृति' के संबंधों को बड़ी ही गरिमा के साथ उकेरा है। भीष्म का अंत केवल एक शरीर का अंत था, किंतु उनके आदर्श युधिष्ठिर के शासन का आधार बने। 'पंच-भौतिक' शरीर का त्याग यह याद दिलाता है कि मिट्टी का पुतला अंततः मिट्टी में ही मिल जाता है, किंतु व्यक्ति के कर्म उसे अमर बना देते हैं। युधिष्ठिर द्वारा भीष्म, द्रोण और कर्ण के लिए 'तीन रिक्त आसन' रखना भारतीय इतिहास की एक अत्यंत संवेदनशील और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण घटना है।
यह रिक्त आसन इस बात का प्रतीक थे कि राज्य केवल जीवित लोगों की सलाह से नहीं, बल्कि पूर्वजों के अनुभवों और उनके द्वारा दी गई शिक्षाओं से भी चलता है। भीष्म धर्म और प्रतिज्ञा के प्रतीक थे, द्रोणाचार्य ज्ञान और कौशल के, और कर्ण असीम त्याग और दानवीरता के। भले ही वे युद्ध में विपरीत दिशा में खड़े थे, किंतु युधिष्ठिर ने उनकी महानता को स्वीकार किया। यह 'अमूर्त रूप' में उनकी उपस्थिति यह संदेश देती है कि न्यायप्रिय शासक कभी भी योग्य शत्रुओं का अपमान नहीं करता। यह आसन पांडवों के उस पश्चाताप और सम्मान का मिश्रण थे, जिसने उन्हें 'विजेता' के अहंकार से बचाकर रखा।
यह कृत्य आने वाली पीढ़ियों को सिखाता है कि युद्ध के मैदान की शत्रुता को शांति के समय में 'कृतज्ञता' में बदलना ही वास्तविक मानवता है। उन तीन महापुरुषों की कमी हमेशा खटकती रही, किंतु उनकी स्मृतियों ने युधिष्ठिर को धर्म की राह से हटने नहीं दिया। लेखक यहाँ यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि भारतीय संस्कृति 'प्रतिशोध' से शुरू होकर 'प्रायश्चित' और 'सम्मान' पर समाप्त होती है। यह रिक्त आसन हस्तिनापुर के वैभव से अधिक उसके चारित्रिक गौरव को बढ़ाते थे। यह अंश महान चरित्रों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक अनुपम उदाहरण है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'भीष्म का महाप्रस्थान' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : कुरु-वृद्धों के अंतिम वैराग्य, वन-गमन और भारतीय संस्कृति की समावेशी शक्ति का उपसंहार।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : पाठ का यह अंतिम भाग जीवन के 'उपसंहार' की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या करता है। जब सब कुछ समाप्त हो गया—सत्ता मिल गई, साम्राज्य स्थिर हो गया—तब धृतराष्ट्र और गान्धारी जैसे पात्रों के लिए राजभवन केवल उनकी भूलों की याद दिलाने वाला स्थान रह गया था। धृतराष्ट्र का 'वन-गमन' उनके जीवन का सबसे कठिन किंतु अनिवार्य निर्णय था। यह उनकी मोह-माया के टूटने और पश्चाताप की अग्नि में तपने की प्रक्रिया थी। माता कुन्ती का गान्धारी की सेवा हेतु उनके साथ जाना, उनके विशाल हृदय और 'स्त्री-धर्म' की पराकाष्ठा को दर्शाता है। उन्होंने अपनी विजय का उपभोग करने के बजाय अपने दुखी जेठ और जेठानी की सेवा को चुना।
महर्षि वेदव्यास के सानिध्य में उनका रहना यह सिद्ध करता है कि अंतिम समय में गुरु और ज्ञान ही एकमात्र सहारा होते हैं। 'परमार्थ का चिंतन' ही जीवन का वह वास्तविक धन है जिसे मनुष्य मृत्यु के साथ ले जा सकता है। लेखक यहाँ भारतीय संस्कृति की एक अत्यंत महत्वपूर्ण विशेषता—'आत्मसात् करने की क्षमता'—पर प्रकाश डालते हैं। हमारी संस्कृति विनाश के बाद भी घृणा नहीं सिखाती, बल्कि सभी को साथ लेकर चलने और पापियों को भी प्रायश्चित के माध्यम से शुद्ध होने का अवसर देती है।
कुरु-वृद्धों का वन में तपस्या करना यह संदेश देता है कि जीवन की सार्थकता केवल अधिकारों के उपभोग में नहीं, बल्कि कर्तव्यों के पूर्ण होने के बाद ईश्वर की ओर मुड़ने में है। आने वाली पीढ़ियाँ इन चरित्रों से यह सीख सकती हैं कि कैसे बड़ी से बड़ी भूलों के बाद भी आत्म-चिंतन और साधना के माध्यम से आत्मा को धन्य किया जा सकता है। यह समापन पाठक के मन में शांति और संतोष का भाव छोड़ता है, जहाँ 'प्रतिशोध' की ज्वाला अंततः 'शांति' और 'परमार्थ' की शीतलता में बदल जाती है। यह संपूर्ण महाभारत और इस पुस्तक का दार्शनिक निष्कर्ष है—सत्य की विजय और अधर्म का आध्यात्मिक शोधन।
