निबन्ध-निकष
विश्वविद्यालयीय पाठ्यक्रम (शास्त्री द्वितीय वर्ष / B.A. / M.A.) एवं प्रतियोगी परीक्षाओं (UGC NET, TGT, PGT, Assistant Prof.) हेतु संकलित 12 प्रतिनिधि साहित्यिक एवं ललित निबन्धों का प्रामाणिक अध्ययन।
📑 संकलित निबन्धों की अनुक्रमणिका
12 पाठ उपलब्धहिन्दी निबन्ध का उद्भव, विकास-यात्रा, भारतेन्दु युग से शुक्लोत्तर युग तक के चरण तथा निबन्ध के प्रमुख भेदों का परिचय।
संसार की नश्वरता, परिवर्तनशीलता, समय की अविरल गति और मानवीय जीवन के व्यावहारिक व दार्शनिक पक्षों का चिन्तन।
भारतेन्दु-युगीन सहज, चुलबुली एवं व्यंग्यात्मक शैली में 'धोखा' की दार्शनिक, सामाजिक एवं व्यावहारिक अनिवार्यता का विश्लेषण।
'ज्ञानराशि के संचित कोष' के रूप में साहित्य की उपादेयता, भाषा-परिष्कार, राष्ट्रीय उत्थान एवं सामाजिक सुधार का विवेचन।
'चिन्तामणि' से; लोभ और प्रीति के सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक भेदों, आलम्बन, प्रेम के उदात्त रूप एवं सामाजिक प्रभावों की शास्त्रीय मीमांसा।
'श्रृंखला की कड़ियाँ' से; भारतीय समाज में नारी की स्थिति, रूढ़िगत बन्धन, नारी अस्मिता, स्वावलम्बन एवं अधिकारों का प्रखर विमर्श।
भारतीय वैदिक ऋचाओं का मर्म, समन्वयवादी जीवन-दृष्टि, प्रकृति-सद्भाव और वैदिक दर्शन के शाश्वत मानवीय मूल्यों का विश्लेषण।
'संस्कृति के चार अध्याय' से; विविध भाषाओं, जातियों और प्रान्तों के बाह्य भेदों के बीच भारत की अविभाज्य सांस्कृतिक एकता का गान।
भारतीय सामासिक संस्कृति (Composite Culture), विभिन्न धाराओं के मिलन और मानवतावादी समन्वय दृष्टि का ललित आख्यान।
यायावरी प्रवृत्ति, प्रकृति-सौन्दर्य, निरन्तर गतिशीलता और यात्राओं के माध्यम से जीवन को गहराई से अनुभूत करने का दर्शन।
हिन्दी के राष्ट्रभाषा स्वरूप, लोकभाषाओं के साथ उसके तादात्म्य, भाषाई राजनीति एवं सांस्कृतिक अस्मिता का गम्भीर विवेचन।
निन्दकों की ईर्ष्या, हीनभावना, सामाजिक दिखावे और निन्दा में मिलने वाले विकृत आनन्द पर परसाई जी का तीखा व कालजयी व्यंग्य।
प्र. 'निबन्ध-निकष' के पाठों में किस प्रकार की अध्ययन सामग्री उपलब्ध है?
उत्तर: प्रत्येक निबन्ध के लिंक पर क्लिक करके आप उसका मूल पाठ, सन्दर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या, लेखक परिचय, कठिन शब्दों के अर्थ, सारांश तथा विश्वविद्यालयीय व शास्त्री परीक्षाओं हेतु महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर प्राप्त कर सकते हैं।