रीति सिद्धान्त — परिभाषा, सिद्धान्त, विवेचन एवं उदाहरण
रीति सिद्धान्त — परिभाषा, स्वरूप, भेद, आचार्य वामन का मत, परवर्ती आचार्यों के विचार, महत्त्व एवं उदाहरण सहित सम्पूर्ण विवेचन।
रीति सिद्धान्त — परिभाषा एवं स्वरूप
रीति सिद्धान्त भारतीय काव्यशास्त्र का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है, जिसका सुव्यवस्थित प्रतिपादन आचार्य वामन ने किया। उनके अनुसार “रीतिरात्मा काव्यस्य” अर्थात् रीति काव्य की आत्मा है। रीति से आशय विशिष्ट पद-रचना से है, जिसमें काव्य के गुणों का समुचित संयोजन होता है।
'रीति' को काव्य के विशिष्ट तत्त्व के रूप में परिकल्पित कर निश्चित सिद्धान्तों के आधार पर प्रस्तुत करने वाला सिद्धान्त रीति-सिद्धान्त कहलाता है। आठवीं-नवीं शताब्दी के मध्य होने वाले कश्मीरी विद्वान् आचार्य वामन इस सिद्धान्त के प्रमुख प्रवर्तक माने जाते हैं।
वामन संस्कृत काव्य के उत्कर्ष की अन्तिम और अपकर्ष की प्रथम अवस्था की संधि पर स्थित हैं। उन्होंने अपने समय के दो प्रकार के कवियों का उल्लेख किया है—अरोचकी एवं सतृणाभ्यवहारी। उन्होंने अपने ग्रन्थ काव्यालंकारसूत्रवृत्ति में शब्द-शुद्धि, काव्य-दोष, गुण तथा अलंकार आदि का विस्तृत विवेचन किया।
रीति सिद्धान्त का मूल स्वरूप
रीति को काव्य के विशिष्ट तत्त्व के रूप में प्रतिपादित करते हुए वामन कहते हैं—
विशेषो गुणात्मा ।
रीतिरात्मा काव्यस्य ॥
अर्थात् रीति केवल पदों की सामान्य रचना नहीं, बल्कि विशिष्ट पद-रचना है। यह विशिष्टता काव्यगत गुणों के संयोजन से उत्पन्न होती है। इसीलिए वामन ने गुणों को रीति का मूल आधार माना और रीति को काव्य की आत्मा के रूप में प्रतिष्ठित किया।
रीति-सिद्धान्त में गुण और अलंकार के बीच स्पष्ट भेद स्थापित करने का विशेष महत्त्व है। वामन ने गुण को काव्य का नित्य धर्म और अलंकार को अनित्य धर्म माना। उनके अनुसार गुण शब्द और अर्थ दोनों से सम्बन्धित होते हैं, जबकि अलंकार काव्य के उत्कर्ष का साधन है।
वामन ने भरत एवं दण्डी की परम्परा से दस गुणों को स्वीकार करते हुए उन्हें शब्दगुण और अर्थगुण में विभाजित किया। इस प्रकार गुणों की संख्या बीस मानी गई। गुणों के न्यूनाधिक संयोजन से रीतियों में भिन्नता उत्पन्न होती है।
दण्डी ने जहाँ 'मार्ग' शब्द का प्रयोग किया था, वहीं वामन ने रीति को भौगोलिक बन्धन से मुक्त करके उसे काव्यगत गुणों के आधार पर प्रतिष्ठित किया। इस प्रकार रीति केवल किसी प्रदेश की लेखन-पद्धति न रहकर गुणों के विशिष्ट संयोजन से उत्पन्न काव्य-सौन्दर्य की अभिव्यक्ति बन गई।
रीति के भेद
वामन ने रीति के तीन प्रमुख भेद स्वीकार किए हैं—
- वैदर्भी रीति — समस्त गुणों से युक्त, कोमल, मधुर एवं मनोहारिणी रीति। वामन ने इसे सर्वश्रेष्ठ माना।
- गौड़ीया रीति — ओज और कान्ति आदि गुणों से युक्त प्रभावशाली तथा ऊर्जस्वी पद-रचना।
- पाञ्चाली रीति — माधुर्य और सौकुमार्य से युक्त कोमल एवं संतुलित पद-रचना।
वामन ने वैदर्भी रीति को सर्वश्रेष्ठ माना, क्योंकि इसमें समस्त काव्यगुणों का समुचित समावेश माना गया है।
आचार्य भरत के मत में रीति
रीति-सिद्धान्त की पृष्ठभूमि में आचार्य भरत का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने रीति के लिए मुख्यतः प्रवृत्ति शब्द का प्रयोग किया और उसे देश, वेश, भाषा तथा आचार-विचार से सम्बन्धित माना।
पृथिव्यां नानादेशवेषभावाचाराः वार्ताः स्थापयति इति वृत्तिः ।
भरत ने प्रवृत्ति को चार भागों में विभाजित किया—
- दाक्षिणात्य — महाराष्ट्र तथा विदर्भ प्रदेश।
- औद्री-मागधी — बंग, कलिंग, उड़ीसा, मिथिला तथा मगध।
- पाञ्चाली — पांचाल, शूरसेन, कश्मीर तथा मद्र।
- अवन्तिका — अवन्ती, मालव, सिन्धु तथा सौराष्ट्र।
इस प्रकार भरत ने सम्पूर्ण भारत के रहन-सहन, भाषा एवं आचरण के आधार पर विभिन्न प्रवृत्तियों का निरूपण किया।
काव्याबन्धास्तु निर्दिष्टा द्वादशाभिनयात्मकाः ॥
आचार्य दण्डी के मत में मार्ग
रीति के विकास में आचार्य दण्डी का महत्त्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने सर्वप्रथम मार्ग शब्द का प्रयोग किया। उनके समय में वैदर्भ और गौडीय मार्गों का भौगोलिक महत्त्व भी था।
वैदर्भ मार्ग सौन्दर्य एवं सुकुमारता का व्यंजक माना जाता था, जबकि गौडीय मार्ग औद्धत्य एवं उग्रता का। दण्डी ने गुणों का सम्बन्ध मार्ग से स्थापित किया और वैदर्भ मार्ग को विशेष महत्त्व प्रदान किया।
आचार्य वामन का रीति सिद्धान्त
वामन ने दण्डी के मार्ग सम्बन्धी विचारों को व्यवस्थित करके एक स्वतंत्र सिद्धान्त के रूप में प्रतिष्ठित किया। उनके अनुसार पद-विन्यास का वैशिष्ट्य गुणों के निश्चित संयोजन पर निर्भर करता है।
वामन ने रीति को तीन भागों—वैदर्भी, गौडीया और पाञ्चाली—में विभाजित किया। उन्होंने रीति को भौगोलिक बन्धन से मुक्त करके गुण-आधारित स्वरूप प्रदान किया। इस दृष्टि से वामन का रीति-सिद्धान्त दण्डी के मार्ग-सिद्धान्त का अधिक व्यवस्थित रूप है।
वामन ने रस को भी गुणों के अन्तर्गत स्थान दिया। उन्होंने कान्ति नामक अर्थगुण का लक्षण “दीप्ति रसत्वम्” बताया। इस प्रकार रस को काव्य-सौन्दर्य की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ।
अलंकार के विषय में वामन का मत था कि उसका काव्य के साथ संयोग सम्बन्ध है, जबकि गुण का समवाय सम्बन्ध है। उन्होंने अलंकार को काव्य के सौन्दर्य का उत्कर्षक माना।
ध्वनि के विषय में वामन ने आनन्दवर्धन की तरह स्वतंत्र ध्वनि-सिद्धान्त स्वीकार नहीं किया। वक्रोक्ति के सम्बन्ध में उन्होंने कहा—
परवर्ती विद्वानों ने इस मत को व्यापक रूप से स्वीकार नहीं किया।
रीति सिद्धान्त की आलोचना
रीति-सिद्धान्त ने काव्य के बाह्य सौन्दर्य, पद-विन्यास और गुणों के महत्त्व को स्पष्ट रूप से सामने रखा। इस दृष्टि से यह अलंकार-सिद्धान्त की अपेक्षा अधिक व्यवस्थित दिखाई देता है।
किन्तु परवर्ती आचार्यों ने रीति को काव्य की आत्मा मानने के मत को स्वीकार नहीं किया। आचार्य आनन्दवर्धन ने रीति के लिए संघटना शब्द का प्रयोग किया और उसे पदों की सम्यक् रचना माना। उनके अनुसार पद-संघटना गुणों के आश्रय से रस को व्यंजित करती है।
आचार्य कुन्तक ने रीति के लिए मार्ग शब्द का पुनः प्रयोग किया और सुकुमार, विचित्र तथा मध्यम मार्ग स्वीकार किए। उन्होंने रीति का सम्बन्ध कवि के स्वभाव तथा प्रतिभा से स्थापित किया।
आचार्य मम्मट ने रीति को वृत्ति कहा और इसे रस-विषयक व्यापार माना। उन्होंने उपनागरिका, परुषा तथा कोमला वृत्तियों का उल्लेख किया।
आचार्य विश्वनाथ ने रीति को पद-संघटना कहा तथा इसे रस, भाव आदि का उपकारक माना। इस प्रकार परवर्ती आचार्यों ने रीति को काव्य की आत्मा न मानकर काव्य के अन्य तत्त्वों का सहायक माना।
रीति के सम्बन्ध में परवर्ती आचार्यों के मत
आचार्य रुद्रट
आचार्य रुद्रट ने वैदर्भी, गौडीय और पाञ्चाली के अतिरिक्त लाटीया रीति को भी स्वीकार किया। इस प्रकार उनके मत में रीतियों की संख्या चार हो गई। उन्होंने समास की स्थिति तथा रसौचित्य के आधार पर रीति के चयन पर बल दिया।
भोजराज
भोजराज के समय तक अवन्तिका तथा मागधी नामक दो अन्य रीतियों की भी कल्पना की गई। इससे रीति के भेदों की संख्या में और विस्तार हुआ।
आनन्दवर्धन
आनन्दवर्धन ने रीति को संघटना नाम दिया। उन्होंने इसे समास के आधार पर असमासा, दीर्घसमासा और मध्यसमासा के रूप में विभाजित किया। उनके अनुसार पद-संघटना तब सार्थक होती है जब वह गुणों के आश्रय में रहकर रस को अभिव्यक्त करे।
कुन्तक
कुन्तक ने रीति को मार्ग कहा और सुकुमार, मध्यम तथा विचित्र तीन मार्ग स्वीकार किए। उन्होंने रीति का सम्बन्ध कवि-स्वभाव, शक्ति, व्युत्पत्ति और अभ्यास से स्थापित किया।
मम्मट एवं विश्वनाथ
मम्मट ने रीति को वृत्ति तथा विश्वनाथ ने पद-संघटना माना। दोनों ने रीति को रस एवं भाव आदि का उपकारक स्वीकार किया। इस प्रकार रीति का महत्त्व बना रहा, किन्तु उसे काव्य की आत्मा का स्थान प्राप्त नहीं रहा।
रीति सिद्धान्त का महत्त्व
रीति सिद्धान्त का महत्त्व इस बात में है कि उसने काव्य की भाषा, पद-विन्यास, गुण और शैलीगत सौन्दर्य को व्यवस्थित रूप से समझाने का प्रयास किया। वामन ने स्पष्ट किया कि काव्य केवल विचार या भाव का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि उसका कलात्मक विन्यास भी आवश्यक है।
इस दृष्टि से रीति सिद्धान्त ने काव्य को रचना-सौन्दर्य का एक महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान किया। बाद के आचार्यों ने इसके अनेक तत्त्वों को अपने-अपने सिद्धान्तों में नए रूप में स्वीकार किया।
रीति के उदाहरण
- वैदर्भी रीति — कालिदास की रघुवंश में भाषा की कोमलता, सरसता और माधुर्य को वैदर्भी रीति का उदाहरण माना जाता है।
- गौड़ी रीति — भवभूति के उत्तररामचरित में ओज एवं गाम्भीर्य का प्रभाव गौड़ी रीति की विशेषताओं से जोड़ा जा सकता है।
- मिश्रित स्वरूप — बाणभट्ट की कादम्बरी में विभिन्न काव्यगत गुणों का सामंजस्य दिखाई देता है।
रीति सिद्धान्त — निष्कर्ष
रीति-सिद्धान्त भारतीय काव्यशास्त्र की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। आचार्य वामन ने “रीतिरात्मा काव्यस्य” कहकर रीति को काव्य की आत्मा माना और उसे गुणों से युक्त विशिष्ट पद-रचना के रूप में परिभाषित किया।
1. वामन ने समस्त काव्य को वैदर्भी, गौडीया और पाञ्चाली तीन रीतियों में समाहित किया तथा वैदर्भी को सर्वश्रेष्ठ माना।
2. वामन ने रीति का सम्बन्ध केवल लेखन-शैली से न जोड़कर काव्यगत गुणों से स्थापित किया।
3. वामन ने रस को कान्ति नामक अर्थगुण के अन्तर्गत स्थान दिया—“दीप्ति रसत्वम्”।
4. वामन ने नाटक को काव्य की सर्वोत्तम विधाओं में स्थान दिया और रस के महत्त्व को स्वीकार किया।
5. वामन ने वक्रोक्ति को लक्षणा से सम्बन्धित माना—“सादृश्याल्लक्षणा वक्रोक्तिः”।
6. वामन के अनुसार अलंकार का काव्य के साथ संयोग सम्बन्ध तथा गुण का समवाय सम्बन्ध है।
निष्कर्षतः रीति-सिद्धान्त ने काव्य के बाह्य विन्यास, पद-रचना और गुणों के महत्त्व को अत्यन्त स्पष्टता से स्थापित किया। यद्यपि परवर्ती आचार्यों ने रीति को काव्य की आत्मा के रूप में स्वीकार नहीं किया, फिर भी काव्यशास्त्र के विकास में इसका स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

उत्तम लेखन ।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद अमित भाई
जवाब देंहटाएंरीति सिद्धांत की अत्यंत ही उत्कृष्ट वर्णन
जवाब देंहटाएंडॉ कल्पना थपलियाल जी बहुत-बहुत धन्यवाद।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद इस आर्टिकल के लिए।
जवाब देंहटाएंआपने बहुत अच्छी जानकारी दी । पढ़कर बहुत अच्छा लगा ।
जवाब देंहटाएंआपने Global health tricks
भरत मुनि कृत नाट्य शास्त्र में रीति विषयक निरूपण किस अध्याय में किया गया है कृपया मार्गदर्शन करें।
जवाब देंहटाएंरीति सिद्धान्त आचार्य वामन द्वारा प्रतिपादित है, भरत मुनि ने 14 वें अध्याय में पांचाली गौड़ी इत्यादि के बारे में चर्चा की है, पद-संरचना जो वामन का मत है की आंशिक व्याख्या 22वें अध्याय में भी मिल जाएगी परन्तु 14वें अध्याय में रीति का विवेचन मिलता है
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