संस्कृत व्याकरण के समस्त 10 गणों (भ्वादिगण से लेकर चुरादिगण तक) की प्रमुख धातुओं के दसों लकारों (लट्, लोट्, लङ्, विधिलिङ्, लृट् आदि) में परस्मैपद, आत्मनेपद एवं उभयपद रूप, विकरण प्रत्यय तथा परीक्षा-उपयोगी अभ्यास प्रश्नोत्तरी।
📜 धातुरूप : स्वरूप, तिङ्-प्रत्यय एवं दशगण व्यवस्था
संस्कृत भाषा में क्रिया के मूल रूप को 'धातु' (Root) कहते हैं। महर्षि पाणिनि ने "भूवादयो धातवः" सूत्र द्वारा धातु संज्ञा की है। धातुओं से क्रियापद (तिङन्त) बनाने के लिए 18 'तिङ्' प्रत्यय (9 परस्मैपद के लिए: तिप्, तस्, झि... तथा 9 आत्मनेपद के लिए: त, आताम्, झ...) जोड़े जाते हैं। पाणिनीय धातुपाठ में लगभग 2000 धातुओं को उनके विकरण प्रत्ययों के आधार पर 10 गणों (दशगण) में विभाजित किया गया है:
संस्कृत में काल एवं भाव को व्यक्त करने के लिए 10 लकार होते हैं, जिनमें प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से 5 लकार (लट्, लोट्, लङ्, विधिलिङ् एवं लृट् लकार) विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
संस्कृत धातुरूप : सम्पूर्ण 10 गण (दशगण)
परस्मैपद, आत्मनेपद, उभयपद — भू (होना), पठ्, गम् (गच्छ्), पा (पिब्), स्था (तिष्ठ्), दृश् (पश्य्), लिख्, पच्, नी, सेव्, लभ्, वृत् आदि धातुओं के रूप।
परस्मैपद, आत्मनेपद, उभयपद — अद् (खाना), अस् (होना), हन् (मारना), इण् (जाना), ब्रू (बोलना), या, पा (रक्षा करना), विद्, द्विष्, दुह्, शीङ् आदि।
परस्मैपद, आत्मनेपद, उभयपद — हु (हवन करना - जुहोति), दा (देना - ददाति), धा (धारण करना - दधाति), भी (डरना - बिभेति), हा (त्यागना - जहाति) आदि।
परस्मैपद, आत्मनेपद, उभयपद — दिव् (क्रीड़ा/चमकना - दीव्यति), नृत् (नाचना), नश् (नष्ट होना), सिध्, जन् (उत्पन्न होना), मन् (मानना), युध् आदि।
परस्मैपद, आत्मनेपद, उभयपद — सु (रस निकालना - सुनोति), आप् (पाना - आप्नोति), शक् (सकना - शक्नोति), चि (चुनना), श्रु (सुनना - शृणोति) आदि।
परस्मैपद, आत्मनेपद, उभयपद — तुद् (कष्ट देना - तुदति), विश् (प्रवेश करना), मुच् (छोड़ना), इष् (इच्छा करना - इच्छति), प्रच्छ् (पूछना - पृच्छति), स्पृश् आदि।
परस्मैपद, आत्मनेपद, उभयपद — रुध् (रोकना - रुणद्धि), भिद् (तोड़ना - भिनत्ति), छिद् (काटना - छिनत्ति), भुज् (खाना/भोगना), युज् (जोड़ना), हिंस् आदि।
परस्मैपद, आत्मनेपद, उभयपद — तन् (फैलाना - तनोति), कृ (करना - करोति/कुरुते), मन् (विचारना), वन् (याचना करना), क्षण् आदि 10 धातुओं के रूप।
परस्मैपद, आत्मनेपद, उभयपद — क्री (खरीदना - क्रीणाति), ग्रह् (ग्रहण करना - गृह्णाति), ज्ञा (जानना - जानाति), बन्ध् (बाँधना), पू (पवित्र करना), अश् आदि।
उभयपद प्रधान — चुर् (चुराना - चोरयति/चोरयते), कथ् (कहना - कथयति), गण् (गिनना), चिन्त् (सोचना), भक्ष् (खाना), रच् (रचना करना) आदि।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नोत्तर (FAQs)
धातुरूप किसे कहते हैं और तिङ् प्रत्यय कितने होते हैं?
संस्कृत में क्रिया के मूल रूप (धातु) में काल, पुरुष और वचन का बोध कराने के लिए जो प्रत्यय जोड़े जाते हैं, उन्हें तिङ् प्रत्यय कहते हैं। इनकी कुल संख्या 18 होती है (9 परस्मैपद के लिए + 9 आत्मनेपद के लिए = 18 तिङ् प्रत्यय)।
पाणिनीय धातुपाठ में कुल कितने गण हैं और सबसे बड़ा गण कौन सा है?
पाणिनीय धातुपाठ में धातुओं को 10 गणों (दशगण) में बाँटा गया है। इनमें भ्वादिगण सबसे बड़ा गण है (जिसमें लगभग 1035 धातुएँ आती हैं) तथा तनादिगण सबसे छोटा गण है (जिसमें केवल 10 धातुएँ आती हैं)।
परस्मैपद, आत्मनेपद और उभयपद में क्या अंतर है?
परस्मैपद: जिन धातुओं के रूप 'तिप्, तस्, झि...' (जैसे — पठति, गच्छति) प्रत्ययों से बनते हैं।
आत्मनेपद: जिन धातुओं के रूप 'त, आताम्, झ...' (जैसे — लभते, सेवते) प्रत्ययों से बनते हैं।
उभयपद: जिन धातुओं के रूप परस्मैपद और आत्मनेपद दोनों में चलते हैं (जैसे — पच् ➔ पचति/पचते, कृ ➔ करोति/कुरुते)।
संस्कृत के 10 लकार कौन-कौन से हैं?
संस्कृत के 10 लकार हैं:
1. लट् लकार: वर्तमान काल
2. लिट् लकार: परोक्ष अनद्यतन भूतकाल (जो आँखों से न देखा हो)
3. लुट् लकार: अनद्यतन भविष्यत् काल (आज का न हो)
4. लृट् लकार: सामान्य भविष्यत् काल
5. लेट् लकार: केवल वेदों में प्रयुक्त (वैदिक लकार)
6. लोट् लकार: आज्ञा, अनुमति व प्रार्थना के अर्थ में
7. लङ् लकार: अनद्यतन भूतकाल
8. लिङ् लकार: दो प्रकार — (क) विधिलिङ् (चाहिए अर्थ में), (ख) आशीर्लिङ् (आशीर्वाद अर्थ में)
9. लुङ् लकार: सामान्य भूतकाल
10. लृङ् लकार: हेतुहेतुमद्भाव (कार्य-कारण शर्त वाला भूत/भविष्य)।
प्रतियोगी परीक्षाओं (UP TGT, PGT, UGC NET) में कौन से गणों की धातुएँ अधिक पूछी जाती हैं?
परीक्षाओं में विशेष रूप से अदादिगण (अस्, अद्, हन्, ब्रू, विद्, द्विष्), जुहोत्यादिगण (दा, धा, भी, हु), रुधादिगण (रुध्, छिद्, भिद्, भुज्) और तनादिगण (कृ, तन्) की धातुओं के लट्, लङ् एवं लोट् लकार के रूप सर्वाधिक पूछे जाते हैं क्योंकि इनमें विकरण के कारण रूप-रचना में विशिष्ट परिवर्तन होते हैं।