बहती गंगा-शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र'

॥ श्रीसरस्वत्यै नमः • डिजिटल ग्रन्थालय ॥

बहती गंगा

लेखक: शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’ काशिकेय • सम्पूर्ण पाठ • विस्तृत व्याख्या

काशी के 200 वर्षों के इतिहास, संस्कृति, अखाड़ा-परम्परा एवं स्वाधीनता आन्दोलन को समेटने वाली कालजयी औपन्यासिक कृति के सभी 17 तरंगों (पाठों) का प्रामाणिक अध्ययन।

📚 विधा: ऐतिहासिक उपन्यास / कथा-श्रृंखला 📑 कुल पाठ: 17 तरंगें 🎯 लक्ष्य: BA, MA, TGT, PGT, NET प्रारूप: मूल पाठ + व्याख्या + प्रश्नोत्तर

📑 संकलित पाठों की अनुक्रमणिका

17 पाठ उपलब्ध
पाठ ०१ सांस्कृतिक तरंग
गाइए गणपति जगबन्दन
✍️ लेखक: शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’

काशी के पौराणिक-सांस्कृतिक वैभव, तुलसीदास युगीन पृष्ठभूमि एवं कृति के पारम्परिक मंगलाचरण का सजीव अंकन।

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पाठ ०२ ऐतिहासिक तरंग
घोड़े पै हौदा औ हाथी पै ज़ीन
✍️ लेखक: शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’

वारेन हेस्टिंग्स के विरुद्ध राजा चेतसिंह के ऐतिहासिक विद्रोह और काशी की निर्भीक जनता के शौर्य का चित्रण।

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पाठ ०३ ऐतिहासिक तरंग
नागर नैया जाला कालेपनियाँ रे हरी
✍️ लेखक: शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’

नवाब वज़ीर अली के विद्रोह, अंग्रेज़ों के दमन चक्र और कालापानी निर्वासन की कारुणिक व मर्मस्पर्शी कथा।

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पाठ ०४ सामाजिक तरंग
सूली ऊपर सेज पिया की
✍️ लेखक: शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’

काशी के अखाड़ों, मल्ल-विद्या, प्रेम-बलिदान और युगीन सामाजिक द्वन्द्वों का यथार्थवादी एवं मार्मिक आख्यान।

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पाठ ०५ सामाजिक तरंग
आए, आए, आए
✍️ लेखक: शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’

उन्नीसवीं सदी में ठगी प्रथा के उन्मूलन काल, काशी की जन-चर्चाओं और लोकजीवन के भय व कौतूहल का वर्णन।

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पाठ ०६ सांस्कृतिक तरंग
अल्ला तेरी मस्जिद अव्वल बनी
✍️ लेखक: शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’

साम्प्रदायिक सद्भाव, काशी की गंगा-जमुनी तहज़ीब और विभिन्न धर्मावलम्बियों के साझा सांस्कृतिक सह-अस्तित्व का चित्रण।

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पाठ ०७ शौर्य तरंग
रोम-रोम में वज्रबल
✍️ लेखक: शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’

सन् 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में काशी के वीरों, सन्तों एवं क्रान्तिकारियों के शौर्य और बलिदान की गाथा।

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पाठ ०८ लोक-शौर्य तरंग
सिवनाथ-बहादुरसिंह वीर का खूब बना जोड़ा
✍️ लेखक: शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’

काशी की लोकगाथाओं, अखाड़ेबाजी की परम्परा और शिवनाथ-बहादुरसिंह की अटूट मित्रता व वीरता का ओजस्वी वर्णन।

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पाठ ०९ सांस्कृतिक / संगीत तरंग
एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा
✍️ लेखक: शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’

काशी के संगीत घराने, कजली-गायन तथा दुलारी और टुन्नू के अमर प्रेम व देशप्रेम की मार्मिक एवं प्रसिद्ध कहानी।

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पाठ १० सांस्कृतिक तरंग
राम-काज क्षनभंगु सरीरा
✍️ लेखक: शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’

रामनगर की विश्वविख्यात रामलीला, लोक-भक्ति, काशी नरेश की परम्परा और जनसाधारण के श्रद्धा-भाव का सजीव चित्रण।

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पाठ ११ साहित्यिक तरंग
एहि पार गंगा ओहि पार जमुना
✍️ लेखक: शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’

भारतेन्दु-युगीन नवजागरण, साहित्यिक गोष्ठियों, नवचेतना और काशी के बौद्धिक विमर्शों का प्रामाणिक दस्तावेज़।

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पाठ १२ लोक-उत्सव तरंग
चैत की निंदिया जिया अलसाने
✍️ लेखक: शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’

चैती, होली, बुढ़वा मंगल के पर्वों तथा काशी के मस्तमौला, अल्हड़ और आनन्दमय लोकजीवन का रंगारंग चित्रण।

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पाठ १३ सामाजिक तरंग
इस हाथ दे उस हाथ ले
✍️ लेखक: शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’

काशी के महाजनी तंत्र, व्यापारिक लेन-देन, बदलते सामाजिक मूल्यों और मानवीय सम्बन्धों की यथार्थपरक कथा।

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पाठ १४ राष्ट्रीय चेतना तरंग
दिया क्या जले जब जिया जल रहा
✍️ लेखक: शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’

गांधीवादी असहयोग आन्दोलन, विदेशी वस्त्र बहिष्कार और काशी की जनता में फैली राष्ट्रीय चेतना की प्रखर ज्वाला।

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पाठ १५ सामाजिक / नारी चेतना
नारी तुम केवल श्रद्धा हो
✍️ लेखक: शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’

स्वाधीनता आन्दोलन में काशी की नारियों का अभूतपूर्व योगदान, त्याग, समर्पण एवं नैतिक शक्ति का गरिमामयी अंकन।

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पाठ १६ क्रान्तिकारी तरंग
मृषा न होइ देव-रिसि बानी
✍️ लेखक: शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’

सन् 1942 के 'भारत छोड़ो' आन्दोलन, काशी विद्यापीठ के छात्रों एवं क्रान्तिकारी वीरों के संघर्ष का ऐतिहासिक विवरण।

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पाठ १७ स्वाधीनता तरंग
सारी रंग डारी लाल-लाल
✍️ लेखक: शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’

15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति का राष्ट्रीय उल्लास और काशी की अविरल बहती सांस्कृतिक चेतना का पूर्ण विराम।

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प्र. 'बहती गंगा' के प्रत्येक पाठ में किस प्रकार की अध्ययन सामग्री उपलब्ध है?

उत्तर: प्रत्येक पाठ के लिंक पर क्लिक करके आप तरंग का मूल पाठ, प्रसंग-सहित विस्तृत व्याख्या, काशी की देशज शब्दावली के अर्थ, ऐतिहासिक सन्दर्भ तथा विश्वविद्यालयीय व प्रतियोगी परीक्षाओं के महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर प्राप्त कर सकते हैं।

बहती गंगा (शिवप्रसाद मिश्र ‘रूद्र’ काशिकेय) • सम्पूर्ण डिजिटल अध्ययन सामग्री ॥

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