एहि पार गंगा ओहि पार जमुना (बहती गंगा तरंग-11) : मूल पाठ, शब्दार्थ एवं सारांश

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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प्रस्तुत पाठ में मूर्धन्य साहित्यकार शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' काशिकेय द्वारा रचित प्रसिद्ध औपन्यासिक कृति 'बहती गंगा' की ग्यारहवीं तरंग (कहानी-११) 'एहि पार गंगा ओहि पार जमुना' का सम्पूर्ण मूल पाठ, कठिन शब्दार्थ एवं गहन समीक्षात्मक सारांश प्रस्तुत है।

पुस्तक : बहती गंगा
रचनाकार : शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' काशिकेय
विधा : कहानी / उपन्यास (तरंग-शृंखला)
कहानी क्रम : तरंग ११ — एहि पार गंगा ओहि पार जमुना
मुख्य पात्र : गंगा (अहीर युवती), बेनी तमोली, गंगा की माँ, रायसाहब साधूराम, मुंशीजी, जमुना (गाय)
मूल चेतना : स्त्री-स्वाभिमान, सामाजिक शोषण का प्रतिरोध, एकाकीपन और आत्मिक त्याग

१. मूल पाठ (सम्पूर्ण पाठ)

॥ बहती गंगा : तरंग — ११ (एहि पार गंगा ओहि पार जमुना) ॥

[ १ ]

गंगा उस भोली छोकरी का नाम था जिसने मुहल्ले वालों की आहों पर मचलना और निगाहों पर चलना स्वीकार नहीं किया था, जिसकी एक उपेक्षित चितवन के भिखारी मुहल्ले के 'बादशाह' राय साहब साधूराम से लेकर मुहल्ले-भर के नौकर सिधुआ कहार तक प्रायः सभी लोग थे। यदि रायसाहब उसे अपने कारखाने की मज़दूरिनों का मेठ बनाने को तैयार थे तो सिधुआ भी उसे अपने हृदय की रानी बनाकर पूजना चाहता था। बूढ़े और जवान, जवानी की ओर पैर बढ़ाने वाले छोकरे और जवानी से विदा लेने को तैयार अधेड़, सभी 'गंगा-लाभ' करना चाहते थे। गंगा की आँखों में विलायती अंगूरी भी थी और देशी ठर्रा भी। यही कारण था कि प्याले वाले अपना प्याला और चुक्कड़ वाले अपना चुक्कड़ एक-एक बूंद बटोरकर भर लेना चाहते थे।

गंगा जब सबेरे-शाम काली धोती पहन और मिट्टी की कलसी कमर पर रखकर नल की ओर चलती तो शृंगारी कवियों और शायरों का भाग मानो जाग जाता। उनकी कविताओं की आवृत्ति आरम्भ हो जाती। गंगा बूढ़ों की जवानी पर हँस देती, जवानों के लड़कपन पर झुँझलाती और अपना रास्ता लेती। देखने वालों के कथनानुसार उसके झुँझलाने में भी एक खास रस था।

[ २ ]

गंगा अहीर की लड़की थी। बाप-भाई से विहीन और पति द्वारा त्यक्ता। घर में वह थी और उसकी माता। गंगा की माँ से गंगा ने सगाई कर लेने को कितनी ही बार कहा; किन्तु गंगा का एक क्षुद्र 'ना' उसकी माँ के अनुरोध और क्रोध पर भी 'हाँ' न हो सका। प्रायः 'सगाई' प्रकरण को लेकर माँ-बेटी में एक भड़प हो जाती। उस दिन तो इस अभिनय का आरम्भ सोकर उठते ही हुआ। गंगा आँगन में झाड़ू लगाने चली और उसकी माँ दही मथने। दोनों अपने-अपने काम में व्यस्त थीं, एकाएक गंगा की माँ ने पुकारा, "गंगा!" गंगा ने उत्तर न दिया। वह अपने मन के घने अन्धकार में प्रकाश का कण खोज रही थी। उसकी माँ ने पुनः पुकारा— "गंगा!" गंगा ने फिर भी अनसुनी कर दी। उसकी झाड़ू से उड़ती हुई धूल के साथ-साथ प्रकाश-कण भी उड़ा जा रहा था। इस बार गंगा की माँ का धैर्य छूट गया। उसने चिल्लाकर पुकारा, "गंगिया, बहिरी है क्या? सुनती काहे नहीं?"

मन की व्यथा को दबाती हुई गंगा ने चकित भाव से कहा, "क्या तुमने मुझे पुकारा है, अम्मा?"

"और नहीं तो कौन खसम तेरा यहाँ बैठा हुआ है, तुझे पुकारने वाला?"

गंगा ने करुणा से भरी हुई आँखें अपनी माँ की ओर उठायीं मानो उससे पूछ रही हो, क्या यही कहने के लिए पुकारा था?

गंगा की माँ ने झिड़कते हुए कहा, "टुकुर-टुकुर देखती क्या है? ले यह दूध और दही। दे आ रायसाहब के यहाँ, मेरी तबीयत आज ठीक नहीं।"

"मैं तो वहाँ न जा सकूँगी," क्षण-भर ठहरकर गंगा ने धीरे से उत्तर दिया।

"ठीक है, तू वहाँ कैसे जा सकती है? तू ठहरी रानी-महारानी! इतना छोटा काम भला कैसे करेगी? हाँ, मुहल्ले-भर से नज़ारा मारने को हो तो अभी तैयार!"

"क्या झूठ-मूठ बकती हो? जरा भगवान् से डरो!"

"भगवान् से डराती है रे हरामज़ादी? दूध देने जाएगी नहीं, कामकाज कुछ करेगी नहीं, फिर मेरे तन में भी तो अब पौरुष नहीं रहा। अब काम करने वाला और कौन है तेरा यहाँ? कहती हूँ सगाई कर ले। लेकिन सगाई का नाम लिया कि तुझे जूड़ी चढ़ी। अरे, तू कौन ठाकुर-बामन है कि सगाई करने से तेरी जात चली जाएगी!"

"कै बार तो तुमसे कह दिया अम्मा, अपना-अपना मन ही तो है!"

"तो तू ऐसी अपने मन की हो गयी है? मैं कहती हूँ तुझे अपनी सगाई करनी पड़ेगी। और नहीं तो रायसाहब के यहाँ नौकरी ही कर। एक तो वे राजा आदमी और न जाने कितनी बार मुँह खोलकर कह चुके हैं।"

"क्या सगाई-सगाई हल्ला करती हो! मैं न सगाई करूँगी, न रायसाहब के यहाँ नौकरी। हाँ किसी दूसरी जगह नौकरी लगा दो, कर लूँगी।"

"तेरे लिए नौकरी रखी है न कि ओर कहीं लगा दूँ! हुँ, अहीर की लड़की और सगाई नहीं करेगी!"

"तो तुम भी अहीर ही की लड़की हो, तुम्हीं ने क्यों नहीं..."

"क्या कहा रे कुतिया कलमुँही!" कहते-कहते गंगा की माँ ने मथानी फेंककर मारी। मथानी गंगा के सिर में लगी। आँख में आँसू और मस्तक पर रक्त-बिन्दु छलछला उठे। गंगा तड़पी और तूफानी विचार की तरह उठकर झपटी, किन्तु दूसरे ही क्षण उन आँखों की तरह बैठ गयी जिनकी ज्योति में घना अन्धकार लहराता है।

गंगा के घर के सामने बेनी का बरोठा था। सूरज की पहली किरण बेनी के मुँह पर पड़ी और उसने आँखें खोल दीं। उसने हाथों से आँखों को मला, फिर हथेलियों को चूमकर हल्की-सी अँगड़ाई ली और उठ बैठा। उठते ही उसकी निगाह गंगा के आँगन पर पड़ी। उसने गंगा और उसकी माँ की बातें सुनीं, गंगा की दीनता और उसकी माँ का क्रोध देखा और अन्त में देखा गंगा के माथे का रक्त और उसकी आँख का आँसू। दया, घृणा, क्रोध और शायद स्नेह की भी एक धारा उसके मानस-उपकूल के मध्य से होकर बह गयी। उसने सुना, बुढ़िया चिल्ला-चिल्लाकर कह रही है— "हुँ, समझाते-समझाते ज़बान टूट गयी। ऐसी भी कोई ज़िद है! बच्चा हो तो कोई समझाए भी! अरे मुझे अब क्या करना है; आज मरे कल दूसरा दिन। जो कहती हूँ तेरे भले के लिए। लेकिन कौन सुने, कौन समझे, करम में तो लगी हुई है आग। तेरे ही लिए मैंने रायसाहब से कहा, रो-धोकर हाथ जोड़-जोड़कर विनती की। भगवान् भला करे उसका, दूध-पूत से घर भरें, बेचारे ने तुरन्त कहा, गंगा की माँ—घबराती काहे है? जब जी में आये उसे मेरे यहाँ पहुँचा जा। घर में बाल-बच्चे हैं, नौकर-मज़दूरिन हैं, कायदे से रहेगी। उसकी भी ज़िन्दगी कट जाएगी।"

बेनी ने देखा कि गंगा ने कुछ जवाब नहीं दिया। वह थोड़ी देर चुपचाप रही। फिर उठी, मस्तक का घाव पानी से धो डाला और कलसी उठाकर आँखें पोंछती हुई घर से बाहर हो गयी। बेनी की आँखें गंगा का अनुसरण कर रही थीं।

गली के चबूतरे पर जंगलेदार कोठरी में पण्डितजी गीता-पाठ कर रहे थे— 'असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।' इतने में एक परिचित ध्वनि ने उनके दुर्निग्रह मन को ग्रहण कर लिया। उन्होंने देखा कत्थई साड़ी में गंगा को—उषा की छाया में तिरोहित होती हुई क्षणदा की छवि को। उनके मुख से निकला था, 'हे कौन्तेय' और वाक्य की पूर्ति हुई 'कुसुम्भारुणं चारु चलं वसाना' कहते हुए। गंगा आगे बढ़ गयी। गीता-पाठ उस दिन स्थगित रहा।

मुंशीजी—साठ बरस के मुंशीजी—कानों पर एक अदद कलम खोंसे और स्याही के धब्बों में भरा हुआ बस्ता बगल में दबाए घर से निकले। चौखट डाँकते ही उनकी निगाहों ने रूप की चट्टान से टकराकर ठोकर खाई। सामने से गंगा आ रही थी। मुंशीजी चमककर ठमक गए। गंगा और समीप आ गयी थी। मुंशीजी ने टोका, "कहो गंगा, क्या हाल-चाल है? कुछ और भी सुना? रायसाहब तुम्हारी सगाई की फिक्र में हैं। मगर हम तो तुम्हें अच्छी तरह जानते हैं। इसी से हमने भी साफ़-साफ़ कह दिया, 'रायसाहब! वह मुहल्ले की लड़की है, भली है, शादी नहीं करना चाहती तो आपसे मतलब?' मुहल्ले के आदमी अगर एक-एक टुकड़ा दे देंगे तो बेचारी की ज़िन्दगी कट जाएगी, और माई मैंने तो तुमसे कह ही रखा है कि मेरे न बाल हैं न बच्चे, आकर दो रोटियाँ तुम्हीं खिला दिया करो। मेरे बाद तो सब तुम्हीं लोगों का है, नहीं तो सरकार ले लेगी। क्यों?"

गंगा ने उत्तर न देकर प्रश्न ही किया, "बाबा! अभी तुमने अपने कफ़न का इंतज़ाम किया कि नहीं?"

मुंशीजी का चेहरा उतर गया, पर मुस्कराकर बोले, "शायद का कलाम है 'कफ़न बाँधे हुए सिर से...!'"

शायर का कलाम गंगा की समझ में न आया, वह और आगे बढ़ी। बेनी ने आँखों को दूरबीन बनाकर उक्त दृश्य देखा और कानों में मानो बेतार का तार लगाकर उसकी बातें सुनीं। बेनी की आँखें भीग गयीं, कर्ण-मूल लाल हो उठे। इसी समय आँगन से एक गुरु-गम्भीर ध्वनि ऊपर उठी, "माँ!" बेनी की चेतना लौट आयी। उसने उत्तर दिया, "जमुना अभी आया," और धड़धड़ाता हुआ नीचे उतर गया।

[ ३ ]

जमुना आदमी नहीं, जानवर थी—चार पैर, दो सींग, एक पूँछ वाला पशु, जिसे हिन्दू बड़े प्रेम से गऊ-माता पुकारता है। बेनी के परिवार में दो ही प्राणी थे—एक वह स्वयं और दूसरी जमुना। बेनी तमोली था और खाता-पीता खुशहाल। ऊपर रहता था और नीचे दुकान करता था। बेनी जब से पैदा हुआ तब से उसके घर में दो प्राणियों का निवास होता आया था। पहले इस घर में बेनी के माँ-बाप रहते थे। बेनी को जन्म देने के दो घण्टे बाद उसकी माँ ने परलोक का पथ पकड़ा। घर में बेनी और उसका बाप रहने लगे। बाप ने माँ का काम भी किया, बेनी को पाला-पोसा, बड़ा किया। बेनी की शादी देहात में ठीक हुई। बाप बड़े धूम-धाम से बारात ले गया। शादी हुई, बारात लौट आयी, पर रास्ते में बाप को साँप ने काट लिया। ज़हर के नशे में बेनी का बाप घर का रास्ता भूल परलोक के रास्ते पर चल पड़ा। घर में रहने लगे बेनी और उसकी पत्नी।

श्रावण का एक सोमवार था। बेनी और उसकी पत्नी गंगा नहाने गये। बरसाती गंगा का वेग बेनी की पत्नी को बहा ले चला। नावें छूटीं। छह-सात घण्टे निरन्तर परेशान होने के बाद भी बेनी को अपनी पत्नी का शव तक न मिल सका, मिली एक बहती हुई गाय। बेनी ने पत्नी खोकर गाय पायी। तभी से उस घर में बेनी और उसकी गाय जमुना दोनों एक साथ रहते थे। बेनी जमुना की सेवा प्राण-पण से करता था। उसे जमुना की सेवा करने में एक आनन्द, एक रस का अनुभव होता था। गर्मियों में रात को दुकान बढ़ाने के बाद बेनी गाय को गली में खोल लाता, स्वयं एक चबूतरे पर बैठ जाता और गाय को पंखा झलते-झलते एक करुण हृदय-विदारक स्वर में गा उठता, "मितवा मड़ैया सूनी कर गैला।" मुहल्ला-भर आराम से सोता, पर बेनी का यह गीत गंगा की नींद हराम कर देता। वह प्रयत्न करने पर भी सो न पाती। बेनी के गीत की प्रतिध्वनि गंगा के मुँह से गूँजती, "मितवा मड़ैया सूनी कर गैला।" इस प्रकार आधी रात बीत जाती। बेनी आँगन में गाय को बाँध स्वयं ऊपर सोने चला जाता। सुबह नल पर उसे नहलाकर तब स्वयं स्नान करता।

उस दिन भी जमुना की आवाज़ पर बेनी नीचे उतरा और उसे खोलकर नल पर ले चला। नल पर गंगा खड़ी थी। बेनी ने पूछा— "कहो गंगा, मजे में हो न?" "दिन कट रहे हैं और क्या?" "सो तो हुई है!" बेनी जमुना को मल-मलकर नहलाने लगा। गंगा ने कहा— "बेनी, तुम-जैसी सेवा जानवर की करते हो वैसी तो कोई आदमी की भी काहे को करता होगा?" "कौन सेवा करता हूँ, गंगा! आदमी को कुछ-न-कुछ करना ही पड़ता है। न करे तो जिये कैसे? सूनापन डस न ले!"

दोनों चुप रहे। गंगा ने अपनी कलसी भरी। जमुना और बेनी ने स्नान किया। तीनों लौटे। गंगा ने अपनी स्निग्ध दृष्टि जमुना पर फेंककर कहा, "बड़ी सुन्दर है तुम्हारी गैया! तभी तो इतना प्यार करते हो!"

"सुन्दर अपनी निगाह, गंगा! जिसको जो भा जाए उसको वही सुन्दर है।"

गंगा ने धीरे से कहा, "ठीक कहते हो।" दोनों का घर आ गया था। गंगा अपने घर चली गयी। सन्ध्या हो गयी थी। बेनी का दिन आज बड़ी अशान्ति और उलझन में कटा, उसके मन में वह रस्साकशी हो रही थी जिसे वह बहुत दिन से टालता आया था। एक ओर गंगा थी, दूसरी ओर जमुना। बेनी की दुकान आज भी बन्द ही रही। दिन-दिन धूमिल होने वाली स्मृतियाँ एक के बाद एक आने और जाने लगीं। जन्म से लेकर अब तक का जीवन उसे चलचित्र की तरह दिखाई पड़ा। उसकी आँखों में गंगा थी और उसका हाथ जमुना की पीठ पर था। उसके मुँह से निकला, "गंगा!"

गंगा ने किवाड़ खोलकर बेनी के घर में प्रवेश किया। उसने कहा, "क्या है? तुम कैसे जान गए कि मैं आ रही हूँ? क्यों गरीब का कोई धरम नहीं होता?"

"होता है गंगा, पर तन में नहीं मन में। गरीब का धरम मन में होता है।"

गंगा की आँखें चमक उठीं, बोली, "तब लोग हमारे शत्रु क्यों बने हैं? हमारा धरम क्यों छीनना चाहते हैं?" बेनी ने अपनी जिज्ञासु दृष्टि गंगा की ओर उठाई। गंगा ने कहा, "आज मैं रायसाहब के यहाँ दूध देने गयी थी। गयी क्या थी ज़बरदस्ती भेज दी गई थी। वह मुझसे कहने लगे, 'गंगा, अगर तुम दया न करोगी तो मैं साधु हो जाऊँगा, मेरा इतना बड़ा कारोबार नष्ट हो जाएगा, मेरे बाल-बच्चे भूखे मर जाएँगे और इनका सारा पाप तुम्हें पड़ेगा।' घर पर अम्मा भी कहती है, 'अगर तू रायसाहब के यहाँ नौकरी न करेगी तो मैं जान दे दूँगी।' उस मूरख को क्या पता कि रायसाहब कैसा आदमी है! अब तुम्हीं बताओ कि मैं क्या करूँ?"

"कुछ नहीं गंगा, न तो रायसाहब साधू होंगे और न तुम्हारी अम्मा मरेगी।"

"नहीं बेनी, आज रायसाहब कसम खाकर कह रहे थे।"

"झूठ है; वह कभी साधू नहीं हो सकते।"

"और अगर हो गए तो?"

"कुछ नहीं होगा! ऐसे लोग साधू-बैरागी नहीं होते।"

"तो कैसे होते हैं?"

"कैसे होते हैं! तो लो, आज से यह घरबार, रुपया-पैसा, बरतन-भाँड़ा, सब-कुछ तुम्हारा और मैं जमुना को लेकर चला। जिसे साधू होना होता है गंगा, वह तो हो ही जाता है। उसे कहने की क्या ज़रूरत!"

तन पर एक अंगोछा और हाथ में जमुना की पगहिया लिये हुए बेनी अपने मार्मिक स्वर में आलाप लेता हुआ घर के बाहर हो गया। गंगा ने आश्चर्यचकित होकर सुना—

“एहि पार गंगा ओहि पार जमुना बिचवा मड़ैया छवाये जै हो।”

गंगा के मुख से भी गीत की प्रथम पंक्ति निकल पड़ी, “कैसे दिन कटिहें, जतन बताये जै हो!”

२. कठिन शब्दार्थ (Glossary)

उपेक्षित = तिरस्कृत / जिसकी अवहेलना की गई हो, चितवन = दृष्टि / देखने का अंदाज़, मेठ = मजदूरों का नायक / निरीक्षक, ठर्रा = घटिया किस्म की देशी शराब, आवृत्ति = बार-बार दोहराना, पौरुष = शक्ति / सामर्थ्य, जूड़ी = मलेरिया या ठंड लगकर आने वाला बुखार, भड़प = तू-तू मैं-मैं / झगड़ा, मथानी = दही बिलोने का काष्ठ-उपकरण, बरोठा = घर के प्रवेश द्वार के पास का कमरा या बरामदा, मानस-उपकूल = मन का किनारा, तिरौहित = ओझल / अदृश्य / गायब, क्षणदा = रात्रि (बिजली की तरह क्षण भर रहने वाली), कुसुम्भारुण = केसरिया या लाल रंग (उगते सूर्य जैसा), बस्ता = कपड़े का झोला जिसमें कागज़ात रखे हों, तमोली = पान का व्यवसाय करने वाली जाति, बेतार का तार = वायरलेस (बिना तार की सूचना), गुरु-गम्भीर = भारी और प्रभावशाली, प्राण-पण = जी-जान से / पूरी शक्ति लगाकर, मितवा = मित्र / प्रिय, मड़ैया = फूस की कुटिया / झोपड़ी, प्रतिध्वनि = गूँज (Echo), रस्साकशी = मानसिक द्वंद्व / खींचतान, बरतन-भाँड़ा = घर की गृहस्थी का सामान, पगहिया = पशु के गले में बांधी जाने वाली रस्सी, जतन = यत्न / उपाय।

३. पाठ का सारांश (Summary)

शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' काशिकेय की कालजयी कृति 'बहती गंगा' की ग्यारहवीं तरंग 'एहि पार गंगा ओहि पार जमुना' काशी के घाटों और गलियों में रचे-बसे उन पात्रों की कहानी है, जो सामाजिक अवहेलना और अभावों के बीच भी अपने स्वाभिमान और संवेदनाओं को जीवित रखते हैं। कहानी का केंद्र गंगा नाम की एक अहीर युवती है, जो पितृहीन और पति-परित्यक्ता है। वह अत्यंत रूपवती है, जिसके कारण मुहल्ले के रईस रायसाहब साधूराम से लेकर छोटे कर्मचारी तक उस पर कुदृष्टि रखते हैं। गंगा की माँ गरीबी और अकेलेपन से तंग आकर उस पर 'सगाई' (पुनर्विवाह) करने या रायसाहब के यहाँ काम करने का दबाव डालती है। रायसाहब एक पाखंडी सामंत हैं, जो गंगा को जाल में फँसाने के लिए 'साधु' बनने तक की झूठी धमकी देते हैं। कहानी का दूसरा महत्वपूर्ण पात्र बेनी तमोली है, जिसने अपनी पत्नी को गंगा की लहरों में खो दिया था और जिसके पास अब प्रेम के नाम पर केवल 'जमुना' नाम की एक गाय है। बेनी और गंगा दोनों ही एकाकी जीवन जी रहे हैं और दोनों के बीच एक अनकही सहानुभूति है।

कहानी में मोड़ तब आता है जब गंगा की माँ गुस्से में उसे मथानी से मारकर लहूलुहान कर देती है, फिर भी गंगा अपने चरित्र की सुचिता और स्वाभिमान से समझौता नहीं करती। वह बेनी के पास जाकर अपनी व्यथा सुनाती है और रायसाहब के पाखंड के बारे में बताती है। बेनी, जो लंबे समय से अपने भीतर एक मानसिक रस्साकशी झेल रहा था, अंततः एक क्रांतिकारी निर्णय लेता है। वह रायसाहब जैसे छद्म साधुओं को चुनौती देते हुए स्वयं ही सब कुछ त्यागने का संकल्प लेता है। वह अपना घर-बार, धन-दौलत सब गंगा के नाम कर देता है और केवल अपनी गाय जमुना को लेकर निस्पृह भाव से निकल पड़ता है। चलते हुए उसका यह गीत—'एहि पार गंगा ओहि पार जमुना बिचवा मड़ैया छवाये जै हो'—सांसारिक मोह-माया से मुक्ति और आत्मिक शांति का उद्घोष बन जाता है। गंगा भी उस त्याग से अभिभूत होकर अपने अनिश्चित भविष्य की चिंता में गीत की अगली कड़ी गाती है। यह कहानी केवल एक विस्थापन की नहीं, बल्कि झूठे सामाजिक मूल्यों के विरुद्ध एक शांत विद्रोह और सच्चे वैराग्य की जीत की गाथा है।

बहती गंगा · तरंग ११ (एहि पार गंगा ओहि पार जमुना) · शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' काशिकेय

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