प्रस्तुत पाठ में मूर्धन्य साहित्यकार शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' काशिकेय द्वारा रचित प्रसिद्ध औपन्यासिक कृति 'बहती गंगा' की दशम तरंग (कहानी-१०) 'राम-काज छनभंग सरीरा' का सम्पूर्ण मूल पाठ, कठिन शब्दार्थ एवं गहन समीक्षात्मक सारांश प्रस्तुत है।
१. मूल पाठ (सम्पूर्ण पाठ)
[ १ ]
“श्री सीताराम का मन्दिर टूटा, महन्त सीताराम ने गोहार लगाई और बाबू सीताराम लुट गए।”
चूने में दही मिलाकर उसे छानने में व्यस्त बेनी तमोली के मस्तिष्क में खंडहर की भिखारिन के उक्त शब्द गूँजते रहे। गत रात पहली ही मुलाक़ात में उस भिखारिन ने बेनी के मन पर गहरा प्रभाव डाला था। उसकी बातों से बड़ी शान्ति मिली थी। वह बार-बार सोचता था कि भिखारिन की यह बात कितनी सच है कि मन की आग तिल-तिल जिगर जलाने से ठंडी होती है।
इधर चूना भी तैयार हो गया। कत्था, चूना और सुपारी के मृत्पात्रों को पान की दौरी में करीने से सजाकर और दौरी कमर पर रखे बेनी घर से बाहर निकला। नित्य की भाँति जब वह दुलारी के घर के सामनेवाले चबूतरे पर आया तो उसने देखा कि उसके स्थान पर आज पुलिस ने कब्ज़ा कर रखा है। उस सँकरी गली में जन-समुद्र उमड़ आया है। जनता के चेहरे पर कौतूहल और आतंक की छाया है और पुलिस-कर्मचारियों के मुखमंडल पर अवसरजनित महत्त्व से मंडित गुरुतापूर्ण गम्भीरता की माया।
बेनी एक ओर दीवार से सटकर खड़ा हो गया और आँखों से ही वे चिह्न टटोलने लगा जिनसे उस घटना पर प्रकाश पड़ सके, जिसके कारण गली में इतनी भीड़ हो गई। बेनी जानता था कि दुलारी की गणना बदनाम औरतों में है। साथ ही वह यह भी मानता था कि नामवर मर्द और बदनाम औरत को देखने का कुतूहल सभी को होता है। अतः दुलारी के घर पुरुषों की भीड़ लग जाना कोई असाधारण बात नहीं। अचरज की बात इतनी ही है कि पुलिस क्यों आई है।
जितने मुँह उतनी बातें। परन्तु सबका निष्कर्ष यही था कि छत की कड़ी में धोती बाँधकर दुलारी ने फाँसी लगा ली। लाश अब भी वैसी ही लटक रही है। घटना आत्महत्या की है, इसमें किसी को सन्देह न था। प्रश्न केवल एक था कि दुलारी ने आत्महत्या की क्यों? इस प्रश्न का उत्तर केवल बेनी के पास था, परन्तु घटना जान लेने के बाद बेनी बग़ल में पान की दौरी दबाए भीड़ में से निकला जा रहा था।
गली के मोड़ पर स्थित नल पर पानी भरने के लिए कुछ औरतें एकत्रित थीं। उन्हीं के बीच खड़ा दस-वर्षीय बालक झींगुर नेताओं की तरह भाषण कर रहा था और औरतें बड़ी तन्मयता से उसका वाग्विलास सुन रही थीं। झींगुर को यह महत्त्व प्राप्त होने का कारण केवल यह था कि वह भी उसी कोठरी के नीचेवाली कोठरी में अपनी माँ के साथ किराए पर रहता था जिसमें दुलारी ने आत्महत्या की थी। कन्धों पर विख्यात सिर रखनेवाले के पैरों की धूल भी माथे पर चढ़ाई जाती है। बालक झींगुर बड़े प्रौढ़ भाव से कह रहा था, “हमें सब मालूम हौ कि ई कसबीन काहे जान दे देलस। टुनुआँ के मामले में फेंकू से बिगड़ गइल। बस, अब बुढ़ौती में के पूछी, यही सोच में ऊ मर गइल।”
कच्चे मुँह पक्की बातें सुनने में औरतों को रस मिलता है, पुरुष चिढ़ जाते हैं। वही बात यहाँ पर भी हुई। बालक झींगुर की बात पर जवान औरतें मुँह में आँचल ठूँसकर हँसने लगीं, बूढ़ियों ने गम्भीरता से मुसकराने के प्रयत्न में अपना पोपला मुँह और भी विकृत बनाते हुए केवल इतना ही कहा, “ठीक कहते हो।” परन्तु आसपास खड़े मर्दों को झींगुर की छोटे मुँह बात नहीं सुहाई। दो-चार ने ताच्छील्यपूर्ण स्वर में कहा, “भाग, भाग, अपना काम देख!” बेनी ने भी झींगुर की बातें सुनीं और घृणा से मुँह फेर आगे बढ़ गया। उसके पैर राजघाट किले के खंडहरों की ओर बढ़े जा रहे थे।
मछोदरी पर राजघाटवाले रास्ते का मोड़ मिला। ठीक मोड़ पर बनी एक दुकान के चबूतरे की ओर बेनी ने देखा और उसका मन विषाद से भर उठा। कुल बारह घंटे पहले रात को आठ बजे किले के खंडहर से लौटते समय थककर दुलारी इस चबूतरे पर दस मिनट बैठी थी और अब इतनी दूर चली गई कि ख्याल भी उसके पास जाते थकता है। विषाद-विशीर्ण रहने पर भी बेनी मानव-मन और तन की सुकुमारता और नश्वरता पर मुसकराया और चबूतरे की ओर से आँखें मोड़ आगे बढ़ा। वह सोचता जा रहा था कि पिछली साँझ कितनी विचित्र थी! वह उस साँझ को गंगा के किनारे-किनारे लहरों से यह पूछने चल पड़ा था कि “बोलो, तुमने मेरी नवोढ़ा पत्नी को कहाँ छिपा लिया है?” उसने आदिकेशव के घाट पर पहुँचकर यह भी विचार किया था कि उसका पता लगाने के लिए मैं स्वयं गंगा में कूद पडूँ। वह मढ़ी पर से कूदने के लिए सीढ़ियाँ चढ़ ही रहा था कि उसने देखा कि दुलारी घाट की अन्तिम सीढ़ी पर बैठी अपनी ही धोती से अपने हाथ-पैर बाँध रही है। वह ऊपर रुककर देखने लगा कि दुलारी अपने हाथ-पैर लपेटने के बाद पानी में लुढ़क गई। बेनी ने भी छलाँग मारी और वह जब उतराया तो उसके हाथ में दुलारी की चोटी थी।
दुलारी को बन्धन-मुक्त कर सीढ़ी पर लिटा देने के बाद बेनी उससे ज़रा हटकर बैठा रहा। तत्काल पानी से निकाल ली जाने के कारण दुलारी भी शीघ्र ही स्वस्थ होकर उठ बैठी और बेनी से उसने तुरन्त प्रश्न किया—
“का हो बरई! तूँ हमें काहे निकसलऽ?”
“त कउनो गुनाह नाहीं कइली दुलारी, डूबै में बड़ा कस्ट होला। हमार मेहरुआ डूब के गायब हो गयल,” बेनी ने जवाब दिया।
“अच्छा नहीं कइलऽ! करेजे में बड़ी आग हौ, ठंडी हो जात,” दुलारी ने हसरत-भरे स्वर में कहा। बेनी भी जवाब में कुछ कहने जा ही रहा था कि किसी ने ऊपर से कहा, “यह आग पानी से नहीं, तिल-तिल जिगर जलाने से ठंडी होती है।”
दुलारी और बेनी दोनों ने एक साथ आँखें ऊपर उठाईं, देखा कि चार-पाँच सीढ़ी ऊपर बड़े ही मैले-कुचैले परिधान में एक प्रौढ़ा नारी खड़ी है। उसकी वयस तिरेपन-चौवन वर्ष थी; अब भी उसके रूप में तेज था। तन कृश होने पर भी चेहरे पर लकीरें बहुत कम थीं अर्थात् आग शायद जल्दी जली थी, इसलिए धुआँ कम उठा था। दोनों ही उस अपरिचित नारी की ओर एकटक देखते रह गए। उसने पुनः कहा, “अंगहन की साँझ है, भीगा रहना ठीक नहीं। मेरे साथ आओ।”
उसके स्वर में आदेश की गूँज थी। बेनी और दुलारी उसकी उपेक्षा न कर सके और उसके पीछे-पीछे चलकर खंडहर के जंगली भाग में एक भूँइँधरे के भीतर घुसे। भूँइँधरे भीतर से बहुत प्रशस्त था। कोने में एक क़ब्र बनी थी। क़ब्र थी तो कच्ची, पर उस पर चूना पूता हुआ था और फूल बिखरे थे। सिरहाने एक दीया भी टिमटिमा रहा था। बेनी और दुलारी दोनों चित्रवत खड़े रहे। खूँटी पर टँगे झोले में से एक धोती निकालकर दुलारी को देते हुए अपरिचित नारी ने कहा, “देखते क्या हो? यह उस बहादुर का मज़ार है जो मुहब्बत को खुदा समझता था और जिसने खुदा के नाम पर समर में अपनी जान दे दी।”
दुलारी और बेनी दोनों के सिर अपने-आप क़ब्र के सामने झुक गए।
[ २ ]
रास्ता चलते बेनी की आँखों के भूँइँधरे में रातवाला दृश्य घूम गया। उसने सोचा कि खंडहर की भिखारिन कितनी पढ़ी-लिखी है। बात-बात में 'सैर' (शेर) कहती थी। दुलारी के धोती बदल लेने के बाद उसने दोनों से जो प्रश्न किया था वह भी 'सैर' में ही। उसने पूछा था—
“ज़िन्दगी से इस क़दर बेज़ार क्यों हो?
डूब मरने के लिए तैयार क्यों हो?”
यदि बेनी भी शायर होता या उसकी वाणी भी शिक्षित होती तो उसने निश्चय ही उत्तर दिया होता कि—
“मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यों रात-भर नहीं आती?”
और यदि दुलारी का भी बौद्धिक स्तर काफ़ी ऊँचा होता और प्रश्न करनेवाली की भाँति वह भी शेरो-शायरी में माहिर होती तो सम्भवतः यही जवाब देती कि—
“बिन तुम्हारे मैं जी गई अब तक
तुमको क्या, खुद मुझे यक़ीन नहीं!”
परन्तु यह क्षमता न रहने से बेनी ने केवल इतना ही कहा था कि “मेरी फुलवारी गंगा की लहरों ने लूट ली।” और दुलारी केवल साँस भरकर मौन रह गई थी। इस पर भिखारिन ने फिर पूछा था कि “क्या तुम्हें अपने आशिक़ो-माशूक़ खोकर उनकी कोई ऐसी निशानी हाथ न लगी जिसे तुम अपने प्यारों की एवज़ प्यार कर सकते, उसे देखकर मरे के नाम पर जी सकते?” इस पर बेनी ने बताया था कि, “डूबी पत्नी की खोज करते मैं एक गाय पा गया,” और दुलारी ने कहा था कि “मेरा प्रेमी मरने के पहले खद्दर की एक धोती मुझे दे गया।”
यह सुनते ही वह वृद्धा नारी बड़ी कड़वाहट से बोल उठी थी, “तब तुम दोनों ही भारी बुज़दिल हो। ऐसी नायाब चीजें पास रहते भी ज़िन्दा नहीं रह सकते?” दुलारी ने दबी ज़बान से उसे जवाब दिया था कि “दुख में ज़िन्दगी बिताना बहुत ही मुश्किल है,” और प्रौढ़ा ने इस जवाब पर बिगड़कर कहा था, “ग़लत, बिल्कुल ग़लत! दुनिया में सबसे सहज काम है सुख में भी दुःख से मर जाना और सबसे मुश्किल काम है दुःख में भी सुख से ज़िन्दगी बिताना।” प्रौढ़ा की बात पर दुलारी को हँसी आ गई थी। उसने कहा था, “ये सब कहने की बातें हैं, दुनिया में कौन ऐसा है जिसने दुःख में भी सुख से ज़िन्दगी बिताई?”
दुलारी की इस बात पर प्रौढ़ा जल उठी थी और उसने जवाब दिया था, “दूर कहाँ देखने जाओगी? मुझे ही देखो! किले का इतना बड़ा खंडहर मेरे सिवा और किसका है? जब चाहती हूँ, कहीं भी घूमती हूँ, कोई रोकनेवाला नहीं। जब चाहे सोऊँ, जब चाहे जागूँ, कोई टोकनेवाला नहीं। सुबह मुँह पर नक़ाब डाल और हाथ में कासा लेकर भीख माँगने निकल पड़ती हूँ। जो भी मिल जाता है, खुशी-खुशी खा लेती हूँ। और उसी क़ब्र की बग़ल में बिस्तरा जमाकर अपने यार की याद में मज़े लेती हूँ। और जो मेरा दुःख देखना चाहो तो मेरी रामकहानी सुनो। सुनोगे?”
बेनी और दुलारी दोनों के सिर हिलाकर आग्रह प्रकट करने पर प्रौढ़ा ने यों कहना आरम्भ किया था—
“बयाँ ख़्वाब की तरह जो रहा हो
वह क़िस्सा है तब का आतिश जवाँ था।”
“श्री सीताराम का मन्दिर टूटा, महन्त सीताराम ने गुहार मचाई और बाबू सीताराम लुट गए। बनारस में दो दिन के लिए भूकम्प आ गया, कितने ही नौनिहाल मिट्टी में मिल गए। अड़तालीस घंटे ऐसी आग जली कि मेरे सुहाग का चमन जल गया, मेरे अरमानों के फूल राख हो गए। उस बवाल को, उस ज़वाल को, उस तवारीख़ी हादसे को बनारस में राम-हल्ला कहते हैं।”
बेनी और दुलारी 'राम-हल्ला' शब्द से परिचित थे, परन्तु वह घटना पूरी-पूरी नहीं जानते थे जो बनारसियों की पिछली पीढ़ी की स्मृति में एकदम ताज़ा थी। उनकी उत्सुकता बढ़ी और प्रौढ़ा कहती गई—
“मेरे बाप शाह अताउल्ला एक दरगाह में गद्दीनशीन थे। माँ हिन्दुआनी थी जो किसी वजह से अपनी जात से निकाली जाने पर मुसलमान हो गई थीं। बाप ने मेरा नाम रखा था आसमान तारा। माँ पुकारती थीं सितारा, लेकिन मैं होश सँभालने पर खुद अपने को ज़मीन का चाँद समझती थी। चैत के महीने में मैं पैदा हुई थी, चैत के महीने में ही मेरी शादी हुई और उसी चैत के महीने में मैं बेवा हो गई। अम्माजान कहा करती थीं कि इसी चैत के महीने में रामजी पैदा हुए थे।”
समय का आवरण जैसे भेदकर भूतकाल को प्रत्यक्ष-सा देखते हुए भिखारिन कहे गई थी, “हाँ, तो चैत के महीने में ही जबकि मेरी उम्र पूरी पन्द्रह साल थी, मेरी शादी हुई। मेरे शौहर शाह शहाबुद्दीन ऐसे कल्ले-ठल्ले के जवान थे कि जो उन्हें देखता, देखता ही रह जाता। कल मेरी शादी का पहला दिन था। कमरे में अपने सूरज शौहर के पास चाँद-सी दुल्हन बनी बैठी थी। सड़क पर किसी के चिल्लाने की आवाज़ आई। एक कुन्दन-बदन जवान हाथ-भर लम्बी शानदार दाढ़ी बढ़ाए दौड़ता जाता था और कहता था कि बनारस के हिन्दुओ और मुसलमानो सुनो, अस्सी पर पानीकल बिठाने के लिए श्री सीताराम का प्राचीन मन्दिर तोड़ा जा रहा है। आज मन्दिर टूट रहा है, कल मस्जिद टूटेगी, बचाओ, बचाओ, बचाओ!”
इतना कहने के बाद भिखारिन ने साँस ली थी और फिर कहना आरम्भ किया था—
“उस आदमी की, जिसका नाम मुझे बाद में मालूम हुआ था महन्त सीताराम था, दिलकश आवाज़ सुनकर हम सभी तड़प उठे। अम्माजान दौड़ी हुई आई, बोलीं, 'बेटा शहाब, देखो तो क्या बात है?' मेरे शौहर, जिन्हें मैंने प्यार से शाह शब कहना शुरू किया था, फ़ौरन ही बाहर चले गए। अम्माजान मुझसे कहने लगीं, 'बेटा सितारा, यह बात बहुत बुरी है। राम भी तो खुदा का ही नाम है। सच पूछो तो इश्क़-मुहब्बत को ही खुदा कहते हैं।' माँ की बात सुनकर मेरे बाप ने भी हँसते हुए उसकी ताईद की और कहा, 'अल्लाह मजनू को लैला नज़र आता है!' मेरे शाह शबाब भी गली से लौट चौखट पर खड़े ये बातें सुन रहे थे। उन्होंने सिर्फ़ इतना ही पूछा, 'अम्माजान, इजाज़त है न?' बाबा और अम्मा ने फ़ौरन कहा, 'हाँ, यह खुदा का काम है,' और दोनों कमरे से बाहर निकल गए। शबाब ने भीतर आकर मुझसे पूछा, 'तुम्हारी भी इजाज़त है न?' एक बार तो मैं उनका सवाल सुनकर सन्न हो गई और फिर हिम्मत बाँधकर इतना कहा, 'मेरा ठिकाना?' शौहर ने अपने गले में पड़ी गुलाब की माला मेरी गरदन में डाल दी और खुद चले गए।”
यह कहते-कहते भिखारिन की आँखों में आँसू भर आए थे। उसने ठंडी साँस ली थी और फिर कहा था—
“फिर क्या था! बनारस के हिन्दुओं और मुसलमानों ने अस्सी घाट पर रखी बड़ी-बड़ी मशीनें उठाकर गेंद की तरह गंगा में फेंक दीं। उसके बाद लूट होने लगी। लोगों ने समझा कि मन्दिर तुड़वाने में भदैनी के रईस बाबू सीताराम का हाथ है। भीड़ तो भेड़ होती ही है; लोग उनके मकान पर टूट पड़े। उस वक़्त मेरे शौहर ने कहा कि “भाई, लूट में हम शामिल नहीं” और सभी मुसलमानों को लेकर वह वहाँ से हटने ही वाले थे कि खुदा जाने किसने गोली चला दी। वह गोली मेरे शौहर को लगी। भीड़ भाग निकली, मगर वह किसी तरह गंगा-किनारे पहुंचे और वहीं गिर पड़े। उसी रात मैं उन्हें खोजने निकली—बिना माँ-बाप से पूछे। दरिया किनारे उन्हें बेहोश पड़ा पाया। किसी तरह उन्हें उठाकर एक नाव पर लाद दिया और उन्हें इस भूँइँधरे में ले आई। बहुत चाहा कि उन्हें बचा लूँ, लेकिन अफ़सोस उसी रात उन्होंने दम तोड़ दिया। वह रामनौमी की रात थी। सारी रात जागकर मैंने अपने हाथों उनकी क़ब्र बनाई। देखो!”
भिखारिन की बात सुनकर बेनी और दुलारी की निगाह क़ब्र की ओर उठ गई थी, जिस पर भिखारिन ने हँसकर कहा था, “वह नहीं, यह देखो!” और अपने गले में लटकते हुए डोर से बँधी एक डिबिया दिखाई। उसे खोला। उसमें फूलों का चूरा पड़ा था। भिखारिन ने उसमें से वह सूत निकाला जिसमें कभी वे फूल गूँथे गए थे। उसे दिखाते हुए उसने दुलारी से कहा था, “देखो, इस सूत के बल पर मैंने अपनी दुःखी ज़िन्दगी सुख से बिताई और तुम्हारे पास तो समूची धोती है!”
रास्ता चलते हुए बेनी ने मन-ही-मन कहा, “सचमुच दुलारी ने धोती का उपयोग फाँसी लगाने में खूब किया!”
२. कठिन शब्दार्थ (Glossary)
३. पाठ का सारांश (Summary)
शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' काशिकेय द्वारा रचित कालजयी औपन्यासिक कृति 'बहती गंगा' की दशम तरंग 'राम-काज छनभंग सरीरा' बनारस के ऐतिहासिक 'राम-हल्ला' विप्लव, साझी शहादत, प्रेम की अमर स्मृति और दुःख के समक्ष मानवीय जिजीविषा के द्वंद्व की एक अत्यंत मर्मस्पर्शी व दार्शनिक कहानी है। कहानी का आरंभ तमोली बेनी द्वारा पान सजाकर बेचने निकलने से होता है। दुलारी (तवायफ़) के मकान पर जुटी भारी भीड़ और पुलिस को देखकर उसे पता चलता है कि दुलारी ने छत की कड़ी से धोती बाँधकर फाँसी लगा ली है। गली के लोग और बालक झींगुर अपनी-अपनी तुच्छ समझ से उसके मरने की मनगढ़ंत वजहें निकाल रहे थे, किंतु बेनी जानता था कि दुलारी की आत्महत्या का वास्तविक रहस्य क्या था।
कहानी फ्लैशबैक में जाती है—पिछली ही साँझ जब पत्नी-वियोग में दुखी बेनी गंगा तट पर था, तब उसने दुलारी को हाथ-पैर बाँधकर गंगा में डूबते देखा और अपनी जान पर खेलकर उसे बचा लिया। घाट पर ही उन्हें राजघाट किले के खंडहर में रहने वाली एक रहस्यमयी, पढ़ी-लिखी वृद्धा भिखारिन (आसमान तारा उर्फ़ सितारा) मिली। वह दोनों को अपने तहखाने (भूँइँधरे) में ले गई जहाँ एक क़ब्र बनी थी। बातचीत में जब दुलारी ने कहा कि वह प्रेमी की विरह-वेदना व दुःख में नहीं जी सकती, तब वृद्धा ने उन्हें बनारस के ऐतिहासिक 'राम-हल्ला' (१८९०-९१ का आंदोलन) की हृदयविदारक कथा सुनाई। अस्सी पर पानीकल (वाटरवर्क्स) बनाने हेतु प्राचीन श्री सीताराम मंदिर तोड़े जाने पर जब महन्त सीताराम ने पुकार लगाई, तो सितारा के नवविवाहित पति शाह शहाबुद्दीन ने अपनी शादी की पहली ही रात मंदिर-रक्षा को 'खुदा का काम' मानकर भाग लिया था। जब भीड़ लूटपाट करने लगी तो शहाबुद्दीन ने उसका विरोध किया, किंतु अज्ञात गोली लगने से वे शहीद हो गए।
वृद्धा ने अपने गले के ताबीज़ में से पति की दी हुई वरमाला का सूखा धागा (सूत) दिखाते हुए दुलारी से कहा था कि वह पचास वर्षों से केवल उस धागे के संबल पर दुःख में भी मुस्कुराते हुए स्वाभिमान से जी रही है, जबकि दुलारी के पास तो प्रेमी की दी हुई पूरी खद्दर की धोती है। वृद्धा का यह जीवंत दर्शन था कि 'दुःख में भी सुख से ज़िंदगी बिताना ही सबसे बड़ा काम है।' किंतु कहानी के अंत में दारुण विडंबना यह उजागर होती है कि जिस धोती को दुलारी को जीवन जीने का संबल बनाना था, उसी धोती से उसने फाँसी का फंदा बनाकर अपनी जीवन-लीला समाप्त कर ली। यह अंत मनुष्य के नश्वर शरीर, कमजोर मनोबल और क्षणभंगुर संकल्प पर बेनी के व्यंग्य और मर्मभेदी यथार्थ ('राम-काज छनभंग सरीरा') को सिद्ध करता है।
