एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा! (बहती गंगा) : मूल पाठ, शब्दार्थ एवं सारांश
प्रस्तुत पाठ में मूर्धन्य साहित्यकार शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' काशिकेय द्वारा रचित प्रसिद्ध औपन्यासिक कृति 'बहती गंगा' की नवम तरंग (कहानी-०९) 'एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!' का सम्पूर्ण मूल पाठ, कठिन शब्दार्थ एवं गहन समीक्षात्मक सारांश प्रस्तुत है।
१. मूल पाठ (सम्पूर्ण पाठ)
[ १ ]
महाराष्ट्रीय महिलाओं की तरह धोती लपेट, कच्छ बाँधे और तंग चोली कसे दुलारी दनादन दंड लगाती जा रही थी। उसके शरीर से टपक-टपककर गिरी बूंदों से भूमि पर पसीने का पुतला बन गया था। कसरत समाप्त करके उसने चारखाने के अंगोछे से अपना बदन पोंछा, बँधा हुआ जूड़ा खोलकर सिर पर पसीना सुखाया और तत्पश्चात आदमकद आईने के सामने खड़ी होकर पहलवानों की तरह गर्व से अपने भुजदंडों पर मुग्ध दृष्टि फेरते हुए प्याज़ के टुकड़े और हरी मिर्च के साथ उसने कटोरी में भिगोए हुए चने चबाने आरम्भ किए।
उसका चणक-चर्वण-पर्व अभी समाप्त न हो पाया था कि किसी ने बाहर बन्द दरवाजे की कुंडी खटखटाई। दुलारी ने जल्दी-जल्दी कच्छ खोलकर बाकायदे धोती पहनी, केश समेटकर करीने से बाँध लिए और तब दरवाजे की खिड़की खोल दी।
बगल में बंडल-सी कोई चीज़ दबाए दरवाजे के बाहर टुन्नू खड़ा था। उसकी दृष्टि शरमीली थी और उसके पतले ओंठों पर झेंप-भरी फीकी मुसकराहट थी। विलोल बेहयापन से भरी अपनी आँखें टुन्नू की आँखों से मिलाती हुई दुलारी बोली, “तुम फिर यहाँ, टुन्नू? मैंने तुम्हें यहाँ आने के लिए मना किया था न?”
टुन्नू की मुसकराहट उसके होंठों में ही विलीन हो गई। उसने गिरे मन से उत्तर दिया, “साल-भर का त्यौहार था, इसीलिए मैंने सोचा कि...” कहते हुए उसने बगल से बंडल निकाला और उसे दुलारी के हाथों में दे दिया। दुलारी बंडल लेकर देखने लगी। उसमें खद्दर की एक साड़ी लपेटी हुई थी। टुन्नू ने कहा, “यह खास गांधी आश्रम की बनी है।”
“लेकिन इसे तुम मेरे पास क्यों लाए हो?” दुलारी ने कड़े स्वर से पूछा।
टुन्नू का शीर्ण वदन और भी सूख गया। उसने सूखे गले से कहा, “मैंने बताया न कि होली का त्यौहार था...।”
टुन्नू की बात काटते हुए दुलारी चिल्लाई, “होली का त्यौहार था तो तुम यहाँ क्यों आए? जलने के लिए क्या तुम्हें कहीं और चिता नहीं मिली जो मेरे पास दौड़े चले आए? तुम मेरे मालिक हो या बेटे हो या भाई हो? कौन हो? खैरियत चाहते हो तो अपना यह कफ़न लेकर यहाँ से सीधे चले जाओ!” और उसने उपेक्षापूर्वक धोती टुन्नू के पैरों के पास फेंक दी।
टुन्नू की काजल-लगी बड़ी-बड़ी आँखों में अपमान के कारण आँसू भर आए। उसने सिर झुकाए हुए आर्द्र कंठ से कहा, “मैं तुमसे कुछ माँगता तो हूँ नहीं। पत्थर की देवी तक अपने भक्तों की दी हुई भेंट स्वीकार कर लेती है। मन पर किसी का बस नहीं, वह रूप या उमर का कायल नहीं होता।” और कोठरी से बाहर निकल वह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरने लगा।
दुलारी खड़ी-खड़ी उसे देखती रही। उसकी भौं अब भी वक्र थी, परन्तु नेत्रों में कठोरता का स्थान करुणा की कोमलता ने ले लिया था। उसने भूमि पर पड़ी धोती उठाई, जिस पर टुन्नू के काजल-सने आँसुओं के धब्बे पड़ गए थे। दुलारी ने गली में जाते हुए टुन्नू को देखा और फिर स्वच्छ धोती पर पड़े उन आँसुओं के धब्बों को वह बार-बार चूमने लगी। उसने उस खद्दर की धोती को अपने कपड़ों के संदूक में सबसे नीचे सहेजकर रख दिया।
[ २ ]
दुलारी के जीवन में टुन्नू का प्रवेश हुए अभी कुल छह मास हुए थे। पिछली भादों में तीज के अवसर पर दुलारी खोजवाँ बाज़ार में कजली दंगल में गाने गई थी। दुक्कड़ पर गानेवालियों में दुलारी का बड़ा नाम था और पद्य में सवाल-जवाब करने में उसकी बराबरी करने वाला कोई न था। दूसरी ओर बजरडीहा वालों ने सोलह-सत्रह वर्ष के दुर्बल से दिखने वाले ब्राह्मण बालक टुन्नू को उतारा था। टुन्नू ने अपने मधुर कंठ से जब सवाल-जवाब शुरू किए और दुलारी के सौंदर्य व कला की प्रशंसा में गीत उठाए, तो दुलारी के तथाकथित संरक्षक और व्यसनी रईस फेंकू सरदार ने आव देखा न ताव, टुन्नू पर लाठी चला दी थी। उस समय दुलारी ने ही फेंकू सरदार का हाथ पकड़कर टुन्नू को बचाया था। उसी दिन से टुन्नू के मन में दुलारी के प्रति एक पवित्र और आत्मिक अनुराग उत्पन्न हो गया था।
टुन्नू के जाने के कुछ ही देर बाद फेंकू सरदार रेशमी और विदेशी मिलों की महीन साड़ियों का बंडल लेकर दुलारी की कोठरी में आ धमका। वह अपनी वासना और धन के घमंड में दुलारी पर अधिकार जताने लगा। दुलारी का मन पहले से ही उद्वेलित था।
उसी समय नीचे गली से विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार और होली जलाने वाले देशभक्तों का विशाल जुलूस निकला। जुलूस में नौजवान ‘भारत माता की जय’ और ‘महात्मा गांधी की जय’ के नारे लगाते हुए विदेशी कपड़े एकत्र कर रहे थे। फेंकू सरदार ने अकड़कर खिड़की से झाँकते हुए कहा, “ये सब सिरफिरे हैं।”
दुलारी ने आव देखा न ताव, फेंकू सरदार द्वारा लाई गई विदेशी साड़ियों का वह पूरा बंडल उठाया और खिड़की से सीधे नीचे जलती हुई विदेशी वस्त्रों की होली में झोंक दिया। फेंकू सरदार हक्का-बक्का रह गया। उसने क्रोध में दुलारी को अपमानित करने का प्रयास किया, किन्तु दुलारी ने झाड़ू उठाकर उसे अपनी कोठरी से बाहर खदेड़ दिया। अपमानित फेंकू सरदार दाँत पीसते हुए थाने की ओर भागा।
[ ३ ]
दोपहर ढलते-ढलते नगर में दमन का चक्र और तेज़ हो गया। टाउन हॉल के पास विदेशी वस्त्रों का जुलूस रोक दिया गया। फेंकू सरदार के इशारे पर कुख्यात पुलिस जमादार अली सगीर ने जुलूस के आगे चल रहे टुन्नू को पकड़ लिया। देशभक्ति के गीतों से जनता को उद्वेलित करने वाले नन्हे टुन्नू की छाती और पसलियों पर अली सगीर ने अपने भारी बूटों से निर्ममतापूर्वक प्राणघाती ठोकरें मारीं। टुन्नू वहीं तड़पकर ढेर हो गया। पुलिस ने अस्पताल ले जाने का ढोंग रचा और उसकी मृत देह को वरुणा नदी की धारा में प्रवाहित कर दिया।
पड़ोस के लड़के झिंगुर ने जब आकर दुलारी को यह दारुण समाचार सुनाया कि “टुन्नू मारा गया,” तो दुलारी के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। कठोर समझी जाने वाली गौनहारिन दहाड़ मारकर रो पड़ी। उसने तुरंत संदूक से वही टुन्नू के आँसुओं से भीगी खद्दर की धोती निकाली, उसे पहना और अपने शृंगार को त्यागकर शोक में डूब गई।
इतने में थाने का मुंशी और फेंकू सरदार पुलिस बल के साथ आ धमके। उन्होंने दुलारी को शाम को टाउन हॉल में ब्रिटिश हुकूमत के समर्थन में आयोजित ‘अमन सभा’ के जलसे में जबरन गाने का हुक्म सुनाया। इनकार करने पर सख्त कानूनी कार्रवाई की धमकी दी गई।
[ ४ ]
शाम को टाउन हॉल में सन्नाटा और भय पसरा था। मंच पर गोरे अफसर, जमादार अली सगीर और अंग्रेजों के चाटुकार रईस बैठे थे। दुलारी जब मंच पर पहुँची, तो उसके शरीर पर रेशम और गहनों की जगह खादी की वही सादी खद्दर धोती थी।
माहौल के विपरीत, जिस स्थान पर दोपहर को टुन्नू ने बूटों की ठोकर खाकर प्राण त्यागे थे, ठीक उसी रक्त-रंजित स्थल पर अपनी दृष्टि गड़ाए हुए दुलारी ने दुक्कड़ की थाप पर कजली का अत्यंत करुण और मर्मभेदी आलाप छेड़ा—
“एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा, कासों मैं पूछूँ?
सास से पूछूँ, ननदिया से पूछूँ, देवरा से पूछत लजानी हो रामा!”
गीत के शब्द ‘झुलनी हेरानी’ (सुहाग का खो जाना) केवल एक आभूषण का खोना नहीं था, अपितु वह उसके आत्मिक प्रेमी और देश के अमर शहीद टुन्नू के बलिदान का शोक-गीत बन गया था। ‘देवरा से पूछत लजानी’ कहते-कहते वह बिजली की तरह घूमी और हत्यारे जमादार अली सगीर की ओर देखकर व्यंग्य व लज्जा का ऐसा विकट अभिनय किया कि पूरी सभा सन्न रह गई।
दुलारी की आँखों से अश्रु-बिन्दु छलककर उसी प्रकार टपक पड़े मानो वरुणा की लहरों से छिटकी बूँदें उसकी पलकों पर आ बैठी हों। उस रूप में करुणा, क्रोध और विद्रोह का ऐसा अपूर्व संगम था जो पहले कभी न देखा गया था।
अगले दिन जब अखबार के दफ्तर में संवाददाता शर्मा जी ने इस संपूर्ण घटना की सजीव रिपोर्ट पढ़कर सुनाई, तो गंभीर मुद्रा में सिर हिलाते हुए संपादक ने एक ठंडी साँस भरकर कहा—
“सत्य है, परंतु छप नहीं सकता।”
२. कठिन शब्दार्थ (Glossary)
३. पाठ का सारांश (Summary)
शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' द्वारा रचित 'बहती गंगा' की नवम तरंग 'एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!' स्वाधीनता संग्राम, उपेक्षित वर्ग के मूक राष्ट्रप्रेम और निष्कलंक आत्मिक प्रणय की अमर व हृदयविदारक गाथा है। कथा की मुख्य पात्र दुलारी काशी की एक स्वाभिमानी, कसरती और मुंहफट कजली गायिका (गौनहारिन) है। छह महीने पूर्व कजली दंगल में उसकी भेंट सोलह-सत्रह वर्षीय किशोर गायक टुन्नू से हुई थी। टुन्नू दुलारी के प्रति शारीरिक वासना से परे एक पवित्र, कलात्मक और आत्मिक अनुराग रखता था। होली के अवसर पर जब टुन्नू खादी आश्रम की बुनी साड़ी दुलारी को भेंट करने आता है, तो दुलारी सामाजिक लोक-लाज के भय से उसे डाँटकर भगा देती है। किन्तु टुन्नू के जाते ही वह उसके आँसुओं से भीगी उस साड़ी को चूमकर अपने संदूक में सहेज लेती है। उसी समय अंग्रेजों का चाटुकार रईस फेंकू सरदार जब विदेशी रेशमी साड़ियों का बंडल लेकर आता है, तो बाहर निकल रहे विदेशी वस्त्र बहिष्कार के जुलूस की आग में दुलारी उन साड़ियों को फेंक देती है और फेंकू को झाड़ू मारकर निकाल देती है।
प्रतिशोध की आग में जलता फेंकू सरदार पुलिस जमादार अली सगीर से मिलकर जुलूस का नेतृत्व कर रहे निहत्थे टुन्नू की बूटों से कुचलवाकर हत्या करवा देता है और उसकी लाश वरुणा नदी में फिंकवा देता है। टुन्नू के बलिदान का समाचार मिलते ही दुलारी का कठोर हृदय हाहाकार कर उठता है। वह शृंगार त्यागकर टुन्नू की दी हुई खद्दर की धोती पहनती है और सरकारी 'अमन सभा' के जलसे में विवश होकर गाने पहुँचती है। टाउन हॉल के उसी रक्त-रंजित स्थल पर दृष्टि गड़ाए, जहाँ दोपहर को टुन्नू ने दम तोड़ा था, दुलारी कजली गाती है—'एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा, कासों मैं पूछूँ?' झुलनी के खोने का यह विरह-गीत टुन्नू की शहादत और उसके खोए हुए सुहाग का करुण विलाप बन जाता है। कातिल अली सगीर की आँखों में आँखें डालकर गाते हुए दुलारी की आँखों से आँसुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। यह कथा सिद्ध करती है कि स्वाधीनता आंदोलन में तथाकथित उपेक्षित वर्ग का योगदान किसी से कम न था, जिसके इस खूनी यथार्थ पर संपादक केवल इतना ही कह पाता है कि 'सत्य है, परंतु छप नहीं सकता।'
