8. सिवनाथ-बहादुरसिंह वीर का खूब बना जोड़ा

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
0

सिवनाथ-बहादुरसिंह वीर का खूब बना जोड़ा (बहती गंगा) : मूल पाठ, शब्दार्थ एवं सारांश

प्रस्तुत पाठ में मूर्धन्य साहित्यकार शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' काशिकेय द्वारा रचित प्रसिद्ध औपन्यासिक कृति 'बहती गंगा' की अष्टम तरंग (कहानी-०८) 'सिवनाथ-बहादुरसिंह वीर का खूब बना जोड़ा' का सम्पूर्ण मूल पाठ, कठिन शब्दार्थ एवं ऐतिहासिक-लोकवार्तापरक सारांश प्रस्तुत है।

पुस्तक : बहती गंगा
रचनाकार : शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' काशिकेय
विधा : कहानी / उपन्यास (तरंग-शृंखला)
कहानी क्रम : तरंग ०८ — सिवनाथ-बहादुरसिंह वीर का खूब बना जोड़ा
मुख्य पात्र : ठाकुर सिवनाथसिंह, बाबू बहादुरसिंह, रूपचन्द, फेंकू पहलवान, मिर्ज़ा पाँचू कोतवाल
मूल विषय : बनारसी वीरता, अखाड़ा-संस्कृति, कबन्ध-युद्ध की लोकगाथा एवं बनारसी हास्य-व्यंग्य

१. मूल पाठ (सम्पूर्ण पाठ)

॥ बहती गंगा : तरंग — ०८ (खूब बना जोड़ा) ॥

ऊपर पीपल के विशाल वृक्ष पर कौए बोलने लगे।

नीचे प्रायः पाँच सौ व्यक्तियों का समूह गाने-बजाने में मस्त झूम रहा था। रात के दस बजे से लावनी की जो ललकार आरम्भ हुई वह अब तक जारी थी। झाँझयुक्त चंग की आवाज़ पर पाँच आदमी एक साथ गाते थे—

“सिवनाथ बहादुरसिंह वीर का खूब बना जोड़ा,
सम्मुख होकर लड़े निकलकर मुँह नाहीं मोड़ा।”

और तब एक आदमी अत्यन्त सुरीले स्वर से अकेले ही चहकता—

“दो कम्पनी पाँच सौ चढ़कर चपरासी आया,
गली-गली औ कूचे-कूचे नाका बँधवाया,
मिर्जा पाँचू ने कसम खाय के कुरान उट्ठाया...।”

इसी समय फेंकू ने बगल में बैठे रूपचन्द का हाथ दबाकर उससे धीरे से कहा, “अब चलना चाहिए।”

काशी में नीलकंठ महादेव मन्दिर के उत्तर की ओर जहाँ आजकल दरभंगा-नरेश का शिवाला है, सदा की भाँति होली के ठीक पाँच दिन पूर्व उक्त मजलिस आरम्भ हुई थी। सवेरा हो जाने पर भी गायन-वादन का क्रम टूटता न देख फेंकू का धीरज छूट गया। दो दिन पूर्व मीर-घाट पर लाठी लड़ने में उसका सिर फट गया था। उस पर अब भी पट्टी बँधी हुई थी। रात-भर के जागरण से उसके सिर में ही नहीं, सिर के घाव में भी दर्द हो रहा था। उधर रूपचन्द की आँखें भी उनींदी हो गई थीं। अतः रूपचन्द ने फेंकू का प्रस्ताव तत्काल स्वीकार कर लिया और घर चलने के लिए उठ खड़ा हुआ। दक्षिण की ओर चार कदम चलकर दोनों दाहिनी ओर मुड़े और रूपचन्द ने सामने स्थित चौरे की ओर उँगली उठाकर कहा, “देखो भाई, वही जगह है जहाँ रात मेरे हाथ से मलाई का पुरवा झटक लिया गया।”

रूपचन्द सोलह-सत्रह वर्ष की उम्र का बालक-मात्र था। अभी-अभी पंजाब से काशी आकर गढ़वासी टोले में आकर बस गया था। पड़ोस में जो गाने-बजाने का सार्वजनिक आयोजन सुना तो रात को दुकान से लौटकर नहीं गया, वरन आधा पाव मलाई लेकर सीधे नीलकंठ जाने के लिए ब्रह्मनाल की ओर से चौरी की ओर मुड़ा। चौरी के पास पहुँचते ही किसी ने झटककर पुरवा उड़ा लिया। चतुर्दिक निगाह दौड़ाने और रात चाँदनी रहने के बावजूद कोई नज़र न आया।

उक्त घटना स्मरण आते ही उसके रोएँ इस समय भी भरभरा उठे। उसके साथी बीस-वर्षीय तरुण पहलवान फेंकू ने विज्ञ की भाँति सिर हिलाया और कहा, “हूँ।” रहस्य का रंग और गाढ़ा हो गया।

सुबह का रंग भी और अधिक निखर आया था। शाक-भाजी ख़रीद और गंगा-स्नान कर लोग उस रास्ते लौटने लगे थे। कुछ बूढ़ी स्त्रियाँ चौरे पर अच्छत-फूल भी फेंक रही थीं। उन्होंने रूपचन्द की बात सुनी, उसकी विवर्ण विकृति देखी और कुछ स्मरण कर स्वयं भी काँप उठीं। बग़ल से गुज़रते हुए पुरुषों ने सुना; वे भी सिहर उठे।

फेंकू यह सब देख मुसकराने लगा। एक वृद्ध ने कहा, “बेटा, हँसने की बात नहीं है, यह बड़े वीर का चौरा है।”

“अरे ठाकुर सिवनाथसिंह का न? अपने राम को भी सब विदित है। इसी मुहल्ले में पैदा हुए और पले,” फेंकू ने गर्व से कहा।

रूपचन्द कभी उस वृद्ध और कभी अपने साथी की ओर देख रहा था। उसने पूछा, “क्यों, बात क्या है? आप लोग बताते क्यों नहीं?” फेंकू ने कहा, “चलो घर, वहीं बता देंगे।”

बालकों की तरह मचलते हुए रूपचन्द ने कहा, “नहीं-नहीं, पहले यह बताओ कि सिवनाथसिंह कौन थे और यह चौरा क्यों बना।”

“इतनी उतावली थी तो वहीं बैठकर पूरी लावनी ही क्यों न सुन ली?” फेंकू ने डाँटा।

“गाना-वाना मेरी समझ में नहीं आता। पंडितजी, आप कहिए, सिवनाथसिंह कौन थे?”

वृद्ध पंडित ने उत्तर दिया, “सिवनाथसिंह क्षत्रिय थे और थे नगर के विख्यात गुंडे। चौबीसों घंटे डंके की चोट सोलह परी का नाच कराते थे—छमाछम! छह और नौ की ध्वनि से उनका घर गूँजता रहता था। खुली कौड़ी पड़ता था। ‘अटी का लासा, सफा खेल खुलासा’ वाला मामला था। उनका नाम सुनकर लोगों का खून सरद होता था और वह खुद ऐसे तपते थे जैसा जेठ की दुपहरिया में सूरज तपता है। जैसे सूरज का जवाब चन्द्रमा है वैसे ही बाबू बहादुरसिंह सिंह के जोड़ीदार थे। उन्हीं की तरह बहादुर, उन्हीं की तरह शेर! कहावत है कि घोड़े की लात घोड़ा सह सकता है। सो सिवनाथसिंह का बल बहादुरसिंह और बहादुरसिंह की तेजी सिवनाथसिंह ही सह सकते थे। सागिरदों की ‘धड़क’ खोलने के लिए उन्हें दो दलों में बाँट दोनों फागुन-भर धर्म-युद्ध करते थे। वह धर्मयुद्ध ही था। पिता-पुत्र लड़ते थे और भाई पर भाई वार करता था। आजकल की तरह बुराई नहीं निकाली जाती थी, जिसमें ये सिर तुड़ाए बैठे हैं।”

वृद्ध ने जिस समय फेंकू की ओर उँगली उठाकर कहा उस समय फेंकू ने रूपचन्द का हाथ दबा रखा था और उसके ताकने पर कनखी से घर चलने का इशारा कर रहा था। वृद्ध ने यही देख उस पर व्यंग्य किया था।

उधर रूपचन्द वृद्ध की एक-एक बात सुन नहीं, पी रहा था। उसने फेंकू के इशारे की उपेक्षा कर दी। वृद्ध पुनः कहने लगा, “सौ बरस की बात है। बनारस में नया-नया अंग्रेजी राज हुआ था। तब पुलिस नहीं थी, बरकन्दाज़ थे। तब जनानापन नहीं चलता था, मरदानेपन की इज्जत थी। मुक़दमा बनाया नहीं जाता था, मूंछों की गुरेरबाज़ी के कारण स्वयं बनता था। अंग्रेज़ी राज्य में देशी ढंग से जुआ खेलने और देशी शराब पीने की रोक थी, आज भी है। परन्तु सिवनाथसिंह के घर के आँगन में दो फड़ों पर कौड़ी फेंकी जाती थीं और एक-एक फड़ के सामने सिवनाथसिंह और बहादुरसिंह एक हाथ में नंगी तलवार खींचे दूसरे हाथ से नाल की रकम उतारकर सामने रखी पेटी में डालते जाते थे। दरवाजा चौबीसों घंटे खुला रहता था, पर क्या मजाल थी कि पंछी पर मार सके।”

वृद्ध ने रुककर साँस ली। रूपचन्द आश्चर्य के समुद्र में उभ-चुभ हो रहा था। उसके ऊपर भय की भयावनी लहरें उठ-बैठ रही थीं। वृद्ध वक्ता मुसकराया और फिर कहने लगा, “उस समय मिर्जा पाँचू शहर-कोतवाल थे। वह अपने को दूसरा लाल खाँ समझते थे। बरकन्दाज़ों की पूरी पलटन लेकर गश्त के लिए निकलते थे। पाँच बार नमाज पढ़कर अपने ‘मजहबी’ होने का प्रचार किया था। सिवनाथसिंह के कारण उनकी बड़ी किरकिरी होती थी। मिर्जा पाँचू और उनके बरकन्दाज़ों ने सिवनाथ और बहादुर से टक्कर ली, लेकिन जैसे चट्टान से टकराकर लहर सौ टुकड़े होकर पीछे लौट जाती है, वे भी पहले तो प्रशस्त और मस्त लेकिन बाद में परास्त और त्रस्त होकर रह गए।”

“अन्त में सिवनाथ और बहादुर के विनाश के लिए मिर्जा पाँचू ने कुरान उठाकर कसम खाई और एक दो कम्पनी याने पाँच सौ सिपाही लेकर सिवनाथसिंह का घर घेर लिया। सिवनाथसिंह बाहर गए थे, बहादुरसिंह मौजूद थे। परन्तु उनके हाथ-पाँव फूल गए। जुआरियों की मंडली भी घबराई।”

“सर्वाधिक चपल, साथ ही सर्वाधिक चालाक एक जुआरी ने उछलकर द्वार बन्द कर लिया। बन्दूकों के कुन्दों से सिपाही फाटक पर चोट देने लगे। प्रहार दरवाजे पर नहीं, सिवनाथसिंह की शान पर हो रहा था। बहादुरसिंह ने उठने का प्रयत्न किया तो जुआरियों ने उन्हें बैठा दिया। इतने में बाहर भगदड़ मची। लोगों ने खिड़की के बाहर झाँककर देखा कि सिपाही हथियार फेंक-फेंककर भाग रहे हैं, दस-पाँच छटपटा रहे हैं और दो-चार ठंडे पड़े हैं। वहीं ठाकुर सिवनाथसिंह खड़े हैं—खून से लथपथ, क्रोध से होंठ चबाते और मानसिक चंचलता दबा न पाने के कारण तलवार नचाते।”

“खिड़की से यह दृश्य देख बहादुरसिंह बहुत लजाए, दरवाज़ा खुलवा दिया, परन्तु सिवनाथसिंह ने कहा कि जिसने दरवाज़ा बन्द कर मेरा अपमान कराया है उसका सिर काट लेने के बाद ही अब मैं घर में प्रवेश करूँगा। ठाकुर की बात सुनकर सब एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। अपराधी हाथ जोड़कर सामने आया। उसे देखते ही सिवनाथसिंह के मुँह से निकला—‘अरे पंडित, तुम!’”

“‘हाँ, धर्मावतार,’ सिर झुकाए हुए जुआरियों की चिलम भरनेवाले ब्राह्मण ने कहा। कुछ सोचकर ठाकुर ने कहा, “अच्छा, सामने से हट जाओ! अब कभी मुँह न दिखाना।”

“पंडित वैसे ही नतमस्तक वहाँ से हट गए। ठाकुर सिवनाथसिंह भी घर में गए। स्नान कर क्रोध की ज्वाला कुछ बुझाई और तब आँगन में आकर बैठ गए। सामने ही बहादुरसिंह भी बैठे थे। न वह इनकी ओर देखते थे और न यह उनकी ओर। इतने में वही ब्राह्मण पुनः दौड़ता हुआ आया और हाँफते हुए बोला, ‘सरकार, दो कम्पनी फौज आई है। उसमें फिरंगी भी हैं। मिर्जा पाँचू ने कुरान उठाकर कसम खाई है कि मरेंगे या मारेंगे।’”

“सिवनाथसिंह की भृकुटी में बल आ गया। वह उठे, दरवाजे की ओर चले, फिर कुछ सोचा और पंडित से कहा, ‘दरवाज़ा बन्द कर दो।’”

“पंडित ने मन-ही-मन मुसकराते हुए द्वार बन्द कर दिया। इतने में फौज आ पड़ी। मकान घेर लिया गया। गोरे गाली देने और गोली बरसाने लगे। कुछ देर यह क्रम चला। सहसा बहादुरसिंह तलवार लिए उठे और झपटकर खिड़की से नीचे कूद पड़े। अब सिवनाथसिंह भी बैठे न रह सके, वह भी कूदे।”

“फिर क्या कहना था। दोनों ने तलवार के वह हाथ दिखाए कि शत्रु मुँह के बल आ रहा। उसी समय किसी गोरे की किर्च बहादुरसिंह के कलेजे में पार हो गई। एक दूसरे गोरे की गोली ने भी उसी समय उनकी कपाल-क्रिया कर दी। अब तो सिवनाथसिंह को और रोष हो आया। वह जी तोड़कर लड़ने लगे। इतने में एक तिलंगे की तलवार का ऐसा सच्चा हाथ उनकी गरदन पर पड़ा कि सिर छटककर दूर जा गिरा। एक बार तो सिपाही प्रसन्न हो उठे, परन्तु दूसरे ही क्षण यह देखकर उनके छक्के छूट गए कि कबन्ध वैसे ही तलवार चलाए और उनका नाश किए जा रहा है।”

कहते-कहते ब्राह्मण रुककर और फिर तीव्र स्वर में रूपचन्द की ओर उँगली उठाकर बोला, “जहाँ आप खड़े हैं, वहाँ एक तमोली की दुकान थी। सिवनाथसिंह यहाँ प्रायः पान खाते थे। कबन्ध भी तलवार घुमाते वहाँ पहुँचा जहाँ चौरा है और अभ्यासवश खड़े होकर उसने एक हाथ तमोली की ओर पसारा। ‘अरे-बप्पा रे’ चिल्लाकर तमोली बेहोश हो गया। कबन्ध भी लड़खड़ाकर गिर पड़ा।”

रूपचन्द का चेहरा फीका पड़ गया। उसे बेहोशी आती जान पड़ी। फेंकू ने कहा, “तब से वहाँ रात-विरात खाने-पीने की चीज़ लेकर आनेवालों के हाथ से ठाकुर साहब छीन लेते हैं।”

रूपचन्द पूरा बेहोश हो गया। फेंकू को डकार आई और अधपकी मलाई की खट्टी-सी हलकी दुर्गन्ध वायु में व्याप्त हो गई। उधर गली के नुक्कड़ पर लावनी वाले गाए जा रहे थे—“सिवनाथ-बहादुरसिंह वीर का खूब बना जोड़ा!”

२. कठिन शब्दार्थ (Glossary)

लावनी = एक प्रसिद्ध पारम्परिक लोक-गायन शैली, चंग = डफली जैसा एक ताल-वाद्य, मजलिस = संगीत या महफिल का जमावड़ा, पुरवा = मिट्टी का छोटा कुल्हड़ या सकोरा, चौरी / चौरा = किसी वीर पुरुष अथवा लोक-देवता का पक्का चबूतरा, विवर्ण = चेहरे का रंग उड़ जाना / पीला पड़ जाना, आलम्बन = सहारा / उपहास का आधार, फड़ = जुआ खेलने का निश्चित अखाड़ा या स्थान, नाल = जुए के फड़ का कमीशन या कर, अटी का लासा = शिकार फँसाने का अचूक दाँव, सफा खेल खुलासा = छल-कपट रहित स्पष्ट व्यवहार, धड़क = मन का संकोच, डर या झिझक, शागिर्द = शिष्य / चेला, गुरेरबाज़ी = मूँछों पर ताव देकर शान दिखाना, बरकन्दाज = बंदूकधारी सिपाही / पहरेदार, गश्त = पहरा देने के लिए नगर-भ्रमण, परास्त = युद्ध में पराजित, त्रस्त = भयभीत / डरा हुआ, धर्मावतार = धर्म के साक्षात् स्वरूप (आदरसूचक सम्बोधन), भृकुटी में बल = क्रोध में भौंहें तन जाना, किर्च = बंदूक के आगे लगी धारदार संगीन (Bayonet), कपाल-क्रिया = सिर पर घातक प्रहार होना (अंतिम संस्कार का संकेत), तिलंगा = कंपनी की सेना का देशी पैदल सिपाही, कबन्ध = सिर कट जाने के बाद भी तलवार चलाने वाला धड़, तमोली = पान बेचने वाला / चौरसिया, अच्छत = पूजा हेतु अखंडित बिना टूटा चावल (अक्षत), नेमी = नियम का कड़ाई से पालन करने वाला, साँसत = भारी मुसीबत / संकट या कष्ट।

३. पाठ का सारांश (Summary)

शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' द्वारा रचित 'बहती गंगा' की आठवीं तरंग 'सिवनाथ-बहादुरसिंह वीर का खूब बना जोड़ा' अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी के काशी के मर्दाने बांकपन, अखाड़ा-संस्कृति, लोकगाथाओं और बनारसी रसियापन की एक अत्यंत सजीव व रोचक कथा है। कथा की शुरुआत नीलकंठ क्षेत्र में होली से पूर्व रात-भर चलने वाली लावनी गायकी के उल्लास से होती है, जहाँ गायक दल 'सिवनाथ बहादुरसिंह वीर का खूब बना जोड़ा' गाकर अतीत के दो विख्यात वीरों के शौर्य का यशोगान कर रहा है। संगीत सभा से लौटते समय नया-नया काशी आया पंजाबी युवक रूपचन्द अपने साथी पहलवान फेंकू को एक चबूतरा (चौरा) दिखाते हुए बताता है कि पिछली रात यहीं किसी अदृश्य शक्ति ने उसके हाथ से मलाई का पुरवा झटक लिया था। वहाँ उपस्थित एक वृद्ध पंडित रूपचन्द के भय का समाधान करते हुए उस चौरे का इतिहास सुनाते हैं। वे बताते हैं कि नए-नए अंग्रेजी राज के दौर में ठाकुर सिवनाथसिंह और बाबू बहादुरसिंह काशी के ऐसे अद्वितीय क्षत्रिय वीर थे जो चौबीसों घंटे घर में डंके की चोट पर जुए का फड़ चलाते थे और अंग्रेजी कानून की परवाह नहीं करते थे। शहर कोतवाल मिर्जा पाँचू ने जब पाँच सौ सिपाहियों के साथ उनके घर पर छापा मारा, तो दोनों वीरों ने तलवार के दम पर गोरी सेना और तिलंगों के छक्के छुड़ा दिए। भीषण युद्ध में बहादुरसिंह की छाती में संगीन उतर गई और एक सैनिक के वार से सिवनाथसिंह का सिर धड़ से अलग हो गया। किन्तु चमत्कारी रूप से सिवनाथसिंह का सिर-कटा धड़ (कबन्ध) वैसे ही तलवार भांजता हुआ शत्रुओं का संहार करता रहा। अंततः वह कबन्ध अपनी पुरानी आदत के अनुसार रास्ते के पानवाले की दुकान (वर्तमान चौरा) पर पान खाने के लिए हाथ फैलाकर गिरा। पंडितजी और फेंकू जब बताते हैं कि तब से ठाकुर साहब रात में यहाँ से गुजरने वालों का खान-पान छीन लेते हैं, तो रूपचन्द दहशत के मारे बेहोश हो जाता है। तभी फेंकू को खट्टी मलाई की डकार आती है, जिससे यह हास्यपूर्ण सत्य उद्घाटित होता है कि रूपचन्द की मलाई किसी भूत ने नहीं बल्कि उसी के दोस्त फेंकू ने उड़ाई थी। यह कथा जहाँ एक ओर विदेशी हुकूमत के विरुद्ध बनारस के विद्रोही वीरों के शौर्य को लोक-आख्यान बनाती है, वहीं दूसरी ओर बनारसी अल्हड़पन, व्यंग्य और लोक-मनोविज्ञान का अद्भुत ताना-बाना प्रस्तुत करती है।

बहती गंगा · तरंग ०८ सिवनाथ-बहादुरसिंह वीर का खूब बना जोड़ा · शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' काशिकेय

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)