छन्द शास्त्र- समग्र छन्दों का उदाहरण सहित विस्तृत विवेचन

॥ श्री गणेशाय नमः • श्रीपिंगलाचार्येभ्यो नमः ॥
छन्द शास्त्र : समवर्णिक छन्द (समग्र विवेचन)
1 से 26+ वर्णों की समस्त जातियाँ • उक्ता से उत्कृति व दण्डक तक सम्पूर्ण लक्षण, सूत्र व उदाहरण

काव्यशास्त्र के आधारभूत स्तम्भ 'छन्द' का सम्पूर्ण शास्त्रीय विवेचन; 1 वर्ण/मात्रा से लेकर 26+ वर्णों वाले समस्त समवर्णिक छन्द, गण-व्यवस्था (यमाताराजभानसलगा), यति-नियम, पाणिनीय-पिंगल सूत्र एवं प्रामाणिक काव्य-उदाहरणों का सम्पूर्ण संकलन।

छन्द प्रणेतापिंगलाचार्य (छन्दःसूत्र)
मूल ग्रन्थवृत्तरत्नाकर / छन्दःशास्त्रम्
प्रमुख भेद2 (मात्रिक एवं वर्णिक)
गण संख्या8 गण (य, म, त, र, ज, भ, न, स)
समवर्णिक जातियाँ26 प्रमुख जातियाँ
26+ वर्ण छन्ददण्डक छन्द
चरण / पादप्रायः 4 चरण
लघु-गुरु चिह्न। (लघु-1), ऽ (गुरु-2)
यति नियमपदान्त एवं मध्य विराम
मूल परिभाषाछन्दांसि छादनात्
वेद का अंगछन्दः पादौ तु वेदस्य
लक्ष्य परीक्षाTGT, PGT, NET, Asst. Prof.

📜 समवर्णिक छन्द : स्वरूप, गण-व्यवस्था एवं शास्त्रीय महत्ता

संस्कृत एवं हिन्दी काव्यशास्त्र में "यक्षरपरिमाणं तच्छन्दः" (कात्यायन) अर्थात् निश्चित वर्णों, मात्राओं, यति और गति से युक्त पद्य-रचना को 'छन्द' कहते हैं। जिसमें चारों चरणों में वर्णों की संख्या और गण-क्रम एक समान होते हैं, उसे समवर्णिक छन्द (Samavarnik Chhand) कहा जाता है:

"छन्दः पादौ तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम् ।" — छन्द वेद-पुरुष के चरण हैं।

पिंगलाचार्य एवं केदारभट्ट (वृत्तरत्नाकर) के अनुसार 1 वर्ण से लेकर 26 वर्णों तक प्रत्येक चरण में होने पर 26 प्रकार की जातियाँ (उक्ता से उत्कृति तक) होती हैं तथा 26 से अधिक वर्ण होने पर वह 'दण्डक' कहलाता है।

1 से 5 वर्ण / मात्रा वाले प्रारम्भिक छन्द

उक्ता, अत्युक्ता, मध्या, प्रतिष्ठा एवं सुप्रतिष्ठा
1 से 5 वर्ण — प्रारम्भिक सामान्य जातियाँ
1 मात्रा/वर्ण वाले छन्द को उक्ता छन्द कहा जाता है।
2 मात्रा/वर्ण वाले छन्द को अत्युक्ता छन्द कहा जाता है।
3 मात्रा/वर्ण वाले छन्द को मध्या छन्द कहा जाता है।
4 मात्रा/वर्ण वाले छन्द को प्रतिष्ठा छन्द कहा जाता है।
5 मात्रा/वर्ण वाले छन्द को सुप्रतिष्ठा छन्द कहा जाता है।

समवर्णिक छन्द : 6 से 26+ वर्णों का सम्पूर्ण संग्रह

गायत्री से लेकर उत्कृति एवं दण्डक तक के वृत्तरत्नाकरोक्त लक्षण, सूत्र व उदाहरण
6 वर्ण — गायत्री छन्द
गायत्री छन्द के भेद, लक्षण एवं उदाहरण
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
तनुमध्या त्योस्तस्तनुमध्या (त, य) तेन प्रविभक्ता, कामं यस्य सा।
शशिवदना शशिवदना न्यौ (न, य) शशिवदनानां व्रज तरुणीनाम्।
विद्युल्लेखा विद्युल्लेखा मो मः (म, म) गोपस्त्रीणां मुख्या, विद्युल्लेखा रूपा।
वसुमती त्सो चेद्वसुमती (त, स) राजीवनेयना, नूनं वसुमती।
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7 वर्ण — उष्णिक छन्द
उष्णिक छन्द के भेद, लक्षण एवं उदाहरण
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
मधुमती म्नौ गः स्यान्मधुमती (म, न, गु.) पूर्णेयं मधुमती, कान्तेयं वरतनुः।
कुमारललिता ज्गौ गौ चेत् कुमारललिता (ज, स, गु.) उदितं तेजो, मित्रस्य सूर्यम्।
मदलेखा म्भौ गः स्यान्मदलेखा (म, भ, गु.) कान्ताया मदलेखा, नेत्रेषु प्रविभाति।
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8 वर्ण — अनुष्टुप छन्द
अनुष्टुप छन्द के प्रमुख भेद, लक्षण एवं उदाहरण
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
श्लोक / अनुष्टुप् श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्। द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥ वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥
चित्रपदा चित्रपदा यदि भौ गौ (भ, भ, गु, गु) यामुनसैकत देशे, चेतसि सज्जनता च।
विद्युन्माला मो मो गो गो विद्युन्माला (म, म, गु, गु) मौनं ध्यानं भूमौ शय्या, नित्यं शान्तिश्चित्ते यस्य।
माणवक माणवकं भात्तलगा (भ, त, ल, गु) माणवकक्रीडितकं, चारु विलोलाक्षियुतम्।
हंसरुत म्नौ गौ हंसरुतमेतत् (म, न, गु, गु) तीरे राजति नदीनां, रम्यं हंसरुतमेतत्।
समानिका र्जौ समानिका गलौ च (र, ज, गु, ल) यस्य कृष्णपादपद्मं, मस्ति हृत्तडागसद्म।
प्रमाणिका प्रमाणिका जरौ लगौ (ज, र, ल, गु) नमामि भक्तवत्सलं, कृपालुशीलकोमलम्।
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9 वर्ण — बृहती छन्द
बृहती छन्द के भेद, लक्षण एवं उदाहरण
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
हलमुखी रान्नसाविह हलमुखी (र, न, स) आयतं कलहनिरतां, तां स्त्रियं त्यज हलमुखीम्।
भुजगशिशुभृता भुजगशिशुभृता नौ मः (न, न, म) इयमधिकतरं रम्या, विकचकुवलयश्यामा।
महामालिका रुद्रैर्नभ्रैर्महामालिका (न, भ, र) शोभां दधाति नित्यं वने, वानीरपुष्पगन्धान्विता।
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10 वर्ण — पंक्ति छन्द
पंक्ति छन्द के भेद, लक्षण एवं उदाहरण
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
शुद्धविराट म्सा ज्गौ शुद्धविराडिदं मतम् (म, स, ज, गु) विश्वं तिष्ठति कुक्षिकोटरे, वक्त्रे यस्य सरस्वती सदा।
मयूरसारिणी जौं रगौ मयूरसारिणी स्यात् (र, ज, र, गु) या वनान्तराण्युपैति रन्तुं, या भुजङ्गभोगमुक्तिचिता।
पणव म्नौ ज्गौ चेति पणवनामकम् (म, न, ज, गु) भक्ताः ये शरणमुपागताः, तेषां नौ चिकुरमपि प्रभुः।
रुक्मवती भ्मौ सगयुक्तौ रुक्मवतीयम् (भ, म, स, गु) स्वप्नविलासा योगवियोगा, रुक्मवती हा कस्य कृते श्रीः।
मत्ता मत्ता ज्ञेया मभसगयुक्ता (म, भ, स, गु) पीत्वा मत्ता मधु मधुपाली, कालिन्दीये तटवनकुञ्जे।
मनोरमा नरजगैर्भवेन्मनोरमा (न, र, ज, गु) तरणिजातटे विहारिणी, व्रजविलासिनी विलासिता।
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11 वर्ण — त्रिष्टुप छन्द
इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उपजाति, दोधक, शालिनी आदि
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
इन्द्रवज्रा स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः (त, त, ज, गु, गु) अर्थो हि कन्या परकीय एव, तामद्य सम्प्रेष्य परिग्रहीतुः।
उपेन्द्रवज्रा उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ (ज, त, ज, गु, गु) त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
उपजाति अनन्तरोदीरितलक्ष्मभाजौ पादौ यदीयावुपजातयस्ताः अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा, हिमालयो नाम नगाधिराजः।
सुमुखी नजजलगैर्गदिता सुमुखी (न, ज, ज, ल, गु) [यति ५, ६] भवति हि यस्य मुखे हरिनाम, जयति सदा सुमुखी स विनीतम्।
दोधक दोधकवृत्तमिदं भभभाद्गौ (भ, भ, भ, गु, गु) दोधकवृत्तमिदं रचितं हि, सुन्दरकान्तपदैर्विलसद्भिः।
शालिनी शालिन्युक्ता म्तौ तगौ गोऽब्धिलोकैः (म, त, त, गु, गु) [यति ४, ७] यस्मिन् सूते संशयं कर्ण एव, प्राप्ते काले शालिनी सा विभाति।
वातोर्मी वातोर्मीयं कथिता म्भौ तगौ गः (म, भ, त, गु, गु) [यति ४, ७] वातोर्मीयं वदने कृष्णभक्तेः, प्रेमोद्रेकं कुरुते पापशान्त्यै।
श्री बाणरसैः स्याद्भतनगगैः श्रीः (भ, त, न, गु, गु) [यति ५, ६] श्रीरप्येतस्य गृहे नित्यवासा, यः शम्भोश्चरणौ पूजयन्तः।
भ्रमरविलसित म्भौ न्लो गः स्याद् भ्रमरविलसितम् (म, भ, न, ल, गु) [यति ४, ७] फुल्ले पद्मे भ्रमरविलसितं, कुर्वन्नास्ते मधुरमधुपानम्।
रथोद्धता रान्नराविह रथोद्धता लगौ (र, न, र, ल, गु) कस्य रूपमिदमुत्तमं भुवि, यद्रथोद्धतपदैः सुशोभितम्।
स्वागता स्वागतेति रनभाद् गुरुयुग्मम् (र, न, भ, गु, गु) स्वागता कुसुमरम्यवनेषु, भाति मञ्जुतरमञ्जुलकान्तिः।
वृन्ता ननरलगुरुरचिता वृन्ता (न, न, र, ल, गु) हरिपदमधुपशिरसि वृन्ता, नित्यमेव परमां गतिमागात्।
भद्रिका ननरमगुरुभिश्च भद्रिका (न, न, र, म, गु) चरणयुगलनमितभद्रिका, पावनी भवति सज्जनसङ्गात्।
श्येनिका श्येनिका रजौ रलौ गुरुर्यदा (र, ज, र, ल, गु) श्येनवद्भमति चेह विमुक्ता, मानसं परमशान्तिमुपैति।
मौक्तिकमाला मौक्तिकमाला यदि भतनाद्‌गौ (भ, त, न, गु, गु) मौक्तिकमालाविरचितकण्ठा, भाति वने व्रजसुन्दरनारी।
उपस्थित उपस्थितमिदं ज्सौ ताद्गकारौ (ज, स, त, गु, गु) [यति २, ९] उपस्थितमिदं भक्तिसुसारं, भावुकजनमनसि प्रतिसद्म।
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12 वर्ण — जगती छन्द
वंशस्थ, तोटक, द्रुतविलम्बित, भुजंगप्रयात आदि
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
चन्द्रवर्त्म चन्द्रवर्त्म निगदन्ति रनभसैः (र, न, भ, स) चन्द्रवर्त्मनि गता निशि सुतनुः, कान्तसङ्गममवेक्ष्य मुदिता।
वंशस्थ जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ (ज, त, ज, र) भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैर्-, नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः।
इन्द्रवंशा स्यादिन्द्रवंशा ततजैरसंयुतैः / ततजराः (त, त, ज, र) तत्राभिषेकाय जलं समाहरन्, राजर्षिवंशीयवरः प्रतापवान्।
टोटक इह तोटकमम्बुधिसैः प्रथितम् (स, स, स, स) विदिताखिलशास्त्रसुधाजलधे, महितोपनिषत्कथितार्थनिधे।
द्रुतविलम्बित द्रुतविलम्बितमाह नभौ भरौ (न, भ, भ, र) द्रुतविलम्बितचारुपदक्रमं, रघुपतेश्चरितं मुनिगीयते।
पुट मुनिशरविरतिर्नौ म्यौ पुटोऽयम् (न, न, म, य) [यति ७, ५] मुनिशरविदितः श्रीशस्य पुटो, जयति भुवि विभुः सर्वज्ञगुरुः।
प्रमुदितवदना प्रमुदितवदना भवेन्नौ च रौ (न, न, र, र) प्रमुदितवदना वने हरिणी, विचरति कुतुकाद्रम्ये विपुले।
कुसुमविचित्रा नयसहितौ न्यौ कुसुमविचित्रा (न, य, न, य) [यति ६, ६] कुसुमविचित्रा वनभुवि रम्या, सुरभिसमीरे भ्रमदलिगीता।
जलोद्धतगति रसैर्जसजसा जलोद्धतगतिः (ज, स, ज, स) [यति ६, ६] जलोद्धतगतिर्नदीषु वहन्ती, विसारिणि वने प्रभातमवेक्ष्य।
मौक्तिकदाम चतुर्जगणं वद मौक्तिकदाम (ज, ज, ज, ज) गले तव शोभितमौक्तिकदाम, मनोज्ञमवेक्ष्य मुदं कुरुते।
भुजंगप्रयात भुजङ्गप्रयातं भवेद्यैश्चतुर्भिः (य, य, य, य) नमामीशमीशान निर्वाणरूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपम्।
स्रग्विणी रैश्चतुर्भिर्युता स्रग्विणी सम्मता (र, र, र, र) वासुदेवं भजे नित्यमानन्ददं, दानवानां कुलं नाशयन्तं मुदा।
प्रियंवदा भुवि भवेन्नभजरैः प्रियंवदा (न, भ, ज, र) वदति या मधुरं सुप्रियंवदा, हृदि सदा कुरुते सतां मुदम्।
मणिमाला त्यौ त्यौ मणिमाला च्छिन्ना गुहवक्त्रैः (त, य, त, य) [यति ६, ६] कण्ठे मणिमाला दीप्ता शुभ्रभासा, नित्यं हरिमूर्तिर्हृद्या मुनिध्येया।
ललिता धीरैरभाणि ललिता तभौ जरौ (त, भ, ज, र) ध्यायन्ति नित्यं मुनयोऽत्र ललितां, मूर्तिं मुरारेः प्रणतातिहन्त्रीम्।
प्रमिताक्षरा प्रमिताक्षरा सजससैरुदिता (स, ज, स, स) प्रमिताक्षरा रचितपद्यविधी, विदुषां मनः सुखयतीह मुदा।
महितोज्जवला ननभरसहिता महितोज्ज्वला (न, न, भ, र) महितोज्ज्वला हरिपदार्चनकथा, भुवि पावनत्वमुपयाति सताम्।
वैश्वदेवी पञ्चाश्वैश्छिन्ना वैश्वदेवी ममौ यौ (म, म, य, य) [यति ५, ७] माता गङ्गा सा वैश्वदेवी प्रसन्ना, लोकानां पापौघं हरन्ती सदा नः।
जलधरमाला अब्ध्यष्टाभिर्जलधरमाला म्भौ स्मौ (म, भ, स, म) [यति ४, ८] गर्जन्ती सा जलधरमाला व्योम्नि, विद्युद्भासा शमयति तापं भूमेः।
नवमालिका इह नवमालिका नजभयैः स्यात् (न, ज, भ, य) [यति ८, ४] इह नवमालिका विकचपुष्पा, भ्रमरगणैर्वृता दिशति हर्षम्।
प्रभा स्वरशरविरतिर्ननौ रौ प्रभा (न, न, र, र) [यति ७, ५] उदितरवेः प्रभा विमलरूपा, नयति तमो दिशामतिविदूरे।
मालती भवति नजावथ मालती जरौ (न, ज, ज, र) सुरभितमालती तरुषु लग्ना, मधुकरमण्डलं हरति चेतः।
पंचचामर जरौ जरौ वदति पञ्चचामरम् (ज, र, ज, र) कृपाकटक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि, क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि।
अभिनवतामरस अभिनवतामरसं नजजाद्यः / नजजाद्यौ (न, ज, ज, य) विकचमवेक्ष्य नवीनमम्भोरुहम्, अभिनवतामरसं कुरुते मुदम्।
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13 वर्ण — अतिजगती छन्द
क्षमा, प्रहर्षिणी, अतिरुचिरा, मत्तमयूर, मञ्जुभाषिणी, चन्द्रिका
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
क्षमा क्षमा विदिता न्जौ ज्लौ गौ (न, ज, ज, ल, गु, गु) [यति ७, ६] क्षमा सतां भूषणमुत्तमं स्मृतं, तया विना नश्यति मानवावलिः।
प्रहर्षिणी म्नौ ज्रौ गस्त्रिदशयतिः प्रहर्षिणीयम् (म, न, ज, र, गु) [यति ३, १०] उत्फुल्लारविन्दवने विहृत्य कान्ता, सानन्दं दिशति मनः प्रहर्षिणीं नः।
अतिरुचिरा / रुचिरा जभौ सजौ गिति रुचिरा चतुर्ग्रहैः (ज, भ, स, ज, गु) [यति ४, ९] रवेरुदये विकचविकासिनी रुचिरा, वनेषु विभाति लता सुमनोहरा।
मत्तमयूर वेदैरन्ध्रैर्मत्तमयूरं म्तौ यसौ गः (म, त, य, स, गु) [यति ४, ९] मेघोन्मुक्ते वर्षति काले मत्तमयूरो, नृत्यन् रम्ये काननमध्ये केकिरवं वक्ति।
मञ्जुभाषिणी सजसा जगौ च मञ्जुभाषिणी (स, ज, स, ज, गु) वदतीह सा सखीसु मञ्जुभाषिणी, श्रवणप्रियाणि कोमलाक्षराणि वै।
चन्द्रिका चन्द्रिका भवेदिह ननौ तथौ गः (न, न, त, त, गु) [यति ७, ६] शीतला निशाकरकराञ्चिता चन्द्रिका, नाशयत्यहर्मुखजतापदोषं द्रुतम्।
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14 वर्ण — शक्वरी छन्द
वसन्ततिलका, अपराजिता, असम्बाधा आदि
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
असम्बाधा म्तौ नौ सौ गौ चेदसम्बाधा (म, त, न, स, गु, गु) [यति ५, ९] दैत्येन्द्रे क्षिप्ते धरणिः साऽसम्बाधा, धर्मस्य स्थित्यै प्रकटितानन्दैश्च।
अपराजिता ननरसलघुगुरुभिरपराजिता (न, न, र, स, ल, गु) [यति ७, ७] रणमुखविजयेऽभवदपराजिता, यदुकुलनयनेन युता चमूस्तदा।
प्रहरणकलिता ननभनलघुगुरुभिः प्रहरणकलिता (न, न, भ, न, ल, गु) [यति ७, ७] प्रहरणकलिता रिपुगणदलिनी, जयति रणशिरसि सुरवरसेना।
वसन्ततिलका उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः (त, भ, ज, ज, गु, गु) पापान्निवारयति योजयते हिताय, गुह्यं निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति।
उद्धर्षिणी वसन्ततिलकैव यतिभेदेन 'उद्धर्षिणी' मता (त, भ, ज, ज, गु, गु) ब्रह्मैव सर्वमिति वेदविदो वदन्ति, तस्मान्न मे सखि परापरभेदबुद्धिः।
इन्दुवदना भ्जौ सन्विति चेन्मतमिन्दुवदना (भ, ज, स, न, गु, गु) भाति भुवि मञ्जुतरमिन्दुवदना सा, कान्तचरणौ प्रणमति स्म विनीता।
अलोला म्सौ स्भौ गौ चेदलोला (म, स, स, भ, गु, गु) शान्ता धीरा सतामियं मतिरलोला, कृष्णं ध्यायन्त्यनारतं मुदिताङ्गी।
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15 वर्ण — अतिशक्वरी छन्द
मालिनी, शशिकला, प्रभद्रक आदि
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
शशिकला ननननसमिति चेच्छशिकला (न, न, न, न, स) विमलशशिकला गगनतले सा, हरति तमिस्रां भुवनतलेऽस्मिन्।
मणिगुणनिकर ननननसहिता चेन्मणिगुणनिकरः (न, न, न, न, स) [यति ८, ७] मणिरिव विमलो यस्य च हृदये, वसति स भगवान् साधुसमूहे।
मालिनी ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः (न, न, म, य, य) [यति ८, ७] सरसिजमनुविद्धं शैवलेनापि रम्यं, मलिनमपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मीं तनोति।
प्रभद्रक न्जौ भ्जौ गिति चेत् प्रभद्रकम् (न, ज, भ, ज, र) प्रभद्रकं मनोहरं वचः सतां, समाहितं शृणोति यः पुमान् सदा।
चन्द्रलेखा म्रौ भ्नौ गौ चेदिह चन्द्रलेखा (म, र, भ, न, य) [यति ७, ८] चन्द्रलेखेव लसति कान्ता, दिव्यशोभावृता सुप्रसन्ना।
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16 वर्ण — अष्टिः छन्द
ऋषभगजविलसित एवं वाणिनी
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
ऋषभगजविलसित भ्राद्गो भ्नैर्गौ ऋषभगजविलसितम् (भ, र, न, म, गु, गु) [यति ७, ९] मत्तद्विरदगतिरभिचरति वने, ऋषभगजविलसितपदमुदितः।
वाणिनी नजभजरलघुकगुरुभिर्वाणिनी स्यात् (न, ज, भ, ज, र, ल, गु) वाणिनी ललितमधुरवाचा रमेयं, सतां मनसि वितरति परमां मुदं वै।
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17 वर्ण — अत्यष्टिः छन्द
मन्दाक्रान्ता, शिखरिणी, पृथ्वी, हरिणी आदि
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
शिखरिणी रसै रुद्रैश्छिन्ना यमनसभला गः शिखरिणी (य, म, न, स, भ, ल, गु) [यति ६, ११] गुणानामेवायं प्रभवति नृणां कापि महिमा, यथा नो विद्वद्भिः क्वचिदपि तिरस्कारपदवी।
पृथ्वी जसौ जसयला वसुग्रहयतिश्च पृथ्वी गुरुः (ज, स, ज, स, य, ल, गु) [यति ८, ९] न चापि परुषं वदेत् क्वचिदपि प्रकृष्टो बुधः, प्रियोऽपि न मृषा वदेदिति सतां मतं शाश्वतम्।
वंशपत्रपतित दिग्भिर्मुनिभिश्च वंशपत्रपतितं भ्भौ न्भौ ल्गौ (भ, भ, न, भ, न, ल, गु) [यति १०, ७] वंशपत्रपतितेव चञ्चलतरा लक्ष्मीर्नृणां, ध्यायतात्र हरिमन्तकभयहरं नित्यं मुदा।
हरिणी रसयुगहयैर्न्सौ म्रौ स्लौ गौ यदा हरिणी तदा (न, स, म, र, स, ल, गु) [यति ६, ४, ७] सरसि बहुले पुंस्कोकिलः कलं विरुवन्मुदा, दिशति विदुषां चेतोवृत्तिं वने हरिणीसमम्।
मन्दाक्रान्ता मन्दाक्रान्ता जलधिषडगैर्म्भौ न्तौ ताद्गुरू चेत् (म, भ, न, त, त, गु, गु) [यति ४, ६, ७] कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात्प्रमत्ततः, शापेनास्तङ्गमितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः।
नर्कुटक नजभजजैश्च रचितं नर्कुटकम् (न, ज, भ, ज, ज, ल, गु) [यति ७, १०] नजभजजैर्नर्कुटकं चारुपदैर्ग्रथितं भुवि, कविहृदये भाति सदा माधुर्यपूर्णरसम्।
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18 वर्ण — धृतिः छन्द
कुसुमलतावेल्लिता छन्द
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
कुसुमलतावेल्लिता म्तौ नौ यौं यौ कुसुमलतावेल्लिता (म, त, न, य, य, य) [यति ५, ६, ७] फुल्ले वृक्षे कुसुमलतावेल्लिता चारुरूपा, भृङ्गैर्गीता सुखयति मनो माधवस्यातिमात्रम्।
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19 वर्ण — अतिधृतिः छन्द
शार्दूलविक्रीडितम् छन्द
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
शार्दूलविक्रीडितम् सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम् (म, स, ज, स, त, त, गु) [यति १२, ७] विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं, विद्या भोगकरी यशःसुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः।
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20 वर्ण — कृतिः छन्द
सुवदना एवं वृत्त छन्द
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
सुवदना ज्ञेया सुवदना म्भौ न्भौ भ्भौ लगिति (म, भ, न, भ, भ, भ, ल, गु) [यति ७, ७, ६] लोके पूज्या सुवदना सा भक्तिरसाढ्या, कृष्णं ध्यायन्ती नित्यं पावनशीला।
वृत्त / शोभा सगणैरष्टभिर्युता शोभा / वृत्तसंज्ञका (स × ६ + ल + गु) परमपवित्रेण पदेन विरचितं, जयति च वृत्तं सकलाघविनाशि।
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21 वर्ण — प्रकृतिः छन्द
स्रग्धरा छन्द
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
स्रग्धरा म्रभ्नैर्यानां त्रयेण त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितेयम् (म, र, भ, न, य, य, य) [यति ७, ७, ७] ग्रीवाभङ्गाभिरामं मुहुरनुपतति स्यन्दने दत्तदृष्टिः, पश्चार्धेनेष्टपूर्वः पतति मयि भयाद्भूयसा पूर्वकायम्।
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22 वर्ण — अथाकृतिः छन्द
भद्रक छन्द
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
भद्रक / हंसा नननररररैर्भद्रकम् (न, न, न, र, र, र, र, गु) [यति १०, १२] विमलपदनिवेशैर्भद्रकं चारुवृत्तं, सकलदुरितशान्त्यै गीयते सद्गुणैश्च।
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23 वर्ण — विकृतिः छन्द
अश्वललित एवं मत्ताक्रीडा
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
अश्वललित नजभजभजभला गः स्यादाश्वललितम् (न, ज, भ, ज, भ, ज, भ, ल, गु) [यति ११, १२] अश्वललितगतिर्भाति समरभुवि, रिपुबलदलने यस्य च भुजबलम्।
मत्ताक्रीडा मभौ नौ नौ नौ गः स्यान्मत्ताक्रीडा (म, भ, न, न, न, न, गु, गु) [यति ८, १५] मत्ताक्रीडा चारुतरवनेषु, विहरति हरिणा सार्धमवनिपतिः।
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24 वर्ण — सङ्कृती छन्द
तन्वी छन्द
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
तन्वी भ्तौ स्मौ भ्भौ स्मौ चेत् तन्वी (भ, त, स, म, भ, भ, स, म) [यति ५, ७, १२] तन्वी सा सुन्दरी कान्तसङ्गे विहारे, मञ्जीरक्वाणैर्मोहयन्ती जनानां मनांसि।
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25 वर्ण — अतिकृतिः छन्द
क्रौञ्चपदा छन्द
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
क्रौञ्चपदा भ्मैर्भ्मैः स्भौ नौ गावेव क्रौञ्चपदा (भ, म, भ, म, स, भ, न, न, गु) [यति ५, ५, ८, ७] क्रौञ्चपदेयं रचिता सुवृत्तैः, सरसि विहारेण युता समन्तात्, सुखयति चेतः सुजनस्य नित्यम्।
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26 वर्ण — उत्कृतिः छन्द
भुजंगविजृम्भित एवं अपवाह छन्द
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
भुजंगविजृम्भित म्मो म्मो स्तौ नौ नौ स्नौ गिति भुजङ्गविजृम्भितम् (म, म, म, म, स, त, न, न, स, न, गु, गु) [यति ८, १९] भुजङ्गविजृम्भितमेतत्प्रशस्तं, शिवस्य कण्ठे लसदद्भुतं भुवि पावनं स्यात्।
अपवाह सप्तभकारैः पश्चाल्लघुगुरुभ्याञ्चापवाहः (भ × ७ + ल + गु) अपवाहपदेन सुवृत्तमनोहरं, शम्भुपदार्चनतत्परमानवैर्नित्यमुपास्यम्।
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26 से अधिक वर्ण — दण्डक छन्द
चण्डवृष्टिप्रपात एवं अन्य दण्डक भेद (27 से अनंत वर्ण)
छन्द नाम लक्षण / सूत्र उदाहरण
चण्डवृष्टिप्रपात नौ रौ चेत् स्युः सप्त रकाराश्चण्डवृष्टिप्रपातः (न, न + ७ रगण = २७ वर्ण) प्रचण्डप्रचण्डारिदर्पोपहन्तं, कृपावारिराशिं सुरेशाभिवन्द्यं, भजेऽहं नृसिंहं नृसिंहावतारम्।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नोत्तर (FAQs)

छन्द शास्त्र, गण-व्यवस्था एवं यति सम्बन्धी महत्वपूर्ण तथ्य

समवर्णिक छन्द किसे कहते हैं?

जिस छन्द के चारों चरणों में वर्णों (अक्षरों) की संख्या, लघु-गुरु का क्रम और गण-व्यवस्था पूर्णतः एक समान होती है, उसे समवर्णिक छन्द (वृत्त) कहते हैं (जैसे — इन्द्रवज्रा, वंशस्थ, मालिनी आदि)।

छन्द शास्त्र में 8 गणों को याद रखने का सूत्र क्या है?

8 गणों को याद रखने का सर्वमान्य सूत्र "यमाताराजभानसलगा" है। इससे 8 गण बनते हैं:
1. यगण (।ऽऽ) 2. मगण (ऽऽऽ) 3. तगण (ऽऽ।) 4. रगण (ऽ।ऽ)
5. जगण (।ऽ।) 6. भगण (ऽ।।) 7. नगण (।।।) 8. सगण (।।ऽ)। (अन्त में 'ल' से लघु और 'गा' से गुरु होता है)।

'दण्डक छन्द' किसे कहते हैं?

जिस वर्णिक छन्द के प्रत्येक चरण में 26 से अधिक अक्षर (वर्ण) होते हैं, उसे दण्डक कहते हैं (जैसे — चण्डवृष्टिप्रपात आदि)।

छन्द में 'यति' का क्या अर्थ है?

पद्य का पाठ करते समय उच्चारण की सुगमता एवं लय बनाए रखने के लिए जहाँ जिह्वा को थोड़ा विश्राम (विराम) लेना पड़ता है, उसे यति कहते हैं।

मात्रिक और वर्णिक छन्द में क्या मूलभूत अंतर है?

मात्रिक छन्द: जिसमें केवल मात्राओं की संख्या गिनी जाती है, वर्णों का लघु-गुरु क्रम निश्चित नहीं होता (जैसे — दोहा, चौपाई, रोला)।
वर्णिक छन्द: जिसमें वर्णों की संख्या और गणों (लघु-गुरु) का क्रम सर्वथा निश्चित होता है (जैसे — मन्दाक्रान्ता, शिखरिणी, स्रग्धरा)।

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