इस हाथ दे उस हाथ ले (बहती गंगा) : मूल पाठ, शब्दार्थ एवं सारांश
प्रस्तुत पाठ शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' काशिकेय द्वारा रचित उपन्यास 'बहती गंगा' की तेरहवीं तरंग है। यह कहानी मानवीय चरित्र के जटिल मनोवैज्ञानिक द्वंद्व, सामंती विलासिता और आदर्शवाद बनाम यथार्थवाद के टकराव को अत्यंत तीखे ढंग से प्रस्तुत करती है।
१. मूल पाठ (सम्पूर्ण पाठ)
[ १ ]
रायसाहब साधूराम के आलीशान मकान के नीचे की दुकान में किरायेदार मिठ्ठू कोयले वाले ने दुकान खोली और ऊपर खिड़की की ओर मुँह उठा ऊँचे स्वर में गा उठा—
“इलाही ख्वाब में शब को न जाने कौन आता है;
जलाने, चुटकियाँ लेने, रुलाने कौन आता है?”
पूस का सवेरा था और सात बजे का समय। रात-भर गहरी वर्षा होकर सुबह पानी थम-सा गया था। हवा में सरदी भी बढ़ गयी थी। जाड़े के डर से फटा-पुराना कम्बल ओढ़े रायसाहब के मकान में निचले खंड की एक कोठरी में सम्पादक शर्मा जी सिकुड़े पड़े थे। मिठ्ठू के दर्द-भरे गले की आवाज़ उनके कानों में आई। मिठ्ठू ने गजल का दूसरा शेर कहा—
“अगर तकदीर हो सीधी तो तुम हो जाओगे सीधे;
रहो खामोश देखो तो मनाने कौन आता है?”
शर्माजी मिठ्ठू की गजल का एक-एक शब्द जैसे अनुभव कर रहे थे। ऐसा जान पड़ता था जैसे मिठ्ठू नहीं, मिठ्ठू की आत्मा गा रही हो। उन्होंने सोचा कि मिठ्ठू की उम्र अभी कुल सोलह-सत्रह साल की होगी। यदि वह कोयला बेचना छोड़कर किसी गुनी से गान-विद्या का अभ्यास करे तो कौन कह सकता है कि एक दिन वह कुशल कलाकार न हो जाएगा। इसके हृदय में संगीत कला का बीज वर्तमान है; यदि अनुकूल परिस्थिति मिली तो वह प्रस्फुटित और पल्लवित हो सकता है, अन्यथा कोयले का धुँआ उसे जला ही डालेगा।
बाहर मिठ्ठू गा रहा था, भीतर शर्माजी उसके भविष्य के सम्बन्ध में विविध कल्पनाएँ कर रहे थे। इतने में ऊपर खिड़की खुली और मधुर स्वर में किसी ने कहा— “मिठ्ठू, गंगो आ रही है। इसे सेर-भर कोयला दे दो।” मिठ्ठू ने गाना बन्द करके जवाब दिया— “बहुत अच्छा बहूजी! कितना कोयला? सेर-भर न?” “हाँ!” जवाब मिला और खिड़की बन्द हो गयी। तत्पश्चात् तराजू-बटखरे की आवाज़ गंगो के पैर की चूड़ियों की झनकार और ‘इलाही ख्वाब में शब को न जाने’ की ध्वनि सुनाई पड़ी।
[ २ ]
रायसाहब साधूराम हर तरह से असाधारण व्यक्ति हैं। साधारण व्यक्ति खाने-भर को भी कठिनाई से कमा पाते हैं। रायसाहब की कमाई इतनी है कि खुद भी खाएँ, दूसरों को भी खिलाएँ और बैंक में भी मोटी रकम जमा कर लें। साधारण व्यक्ति के लिए एक भार्या का भरण-पोषण भी भले ही समस्या बन जाय, परन्तु रायसाहब दो विवाहिता पत्नियों को सचमुच रानी बनाकर रखते हैं और मुहल्ले भर की बहू-बेटियों को ही नहीं अपितु अपने कारखाने की मजदूरनियों तक को वही पद अस्थायी रूप से देने को तैयार रहते हैं।
रायसाहब की दोनों ही पत्नियाँ सुन्दर हैं। एक श्यामा है, दूसरी चंचला है, तीसरी परम गम्भीर। श्यामा अत्यन्त गम्भीर और निर्भीक है अर्थात् गृहप्रबन्धिका अपनी विधवा ननद चमेली से वह बिलकुल नहीं डरती। उसकी निर्भीकता उस सीमा तक पहुँच चुकी है जिसे बेहयाई कहते हैं। गौरी अत्यन्त लजीली है; उसे बोदी भी कह सकते हैं। श्यामा का नाम प्रेमवती, गौरी का नाम है सुधा।
प्रेमवती का स्वभाव सर्वथा रायसाहब के स्वभाव के अनुकूल है। जब रायसाहब अपने कारखाने और विभिन्न दुकानों का निरीक्षण करने निकलते हैं तो प्रेमवती भी पास-पड़ोस में फेरी लगाने निकल पड़ती है। रायसाहब सोलह आने उसी के वशीभूत हैं। प्रेमवती ने शहर में कई रिश्तेदारियाँ भी खोज निकाली हैं। ब्रह्मनाल में ताऊजी रहते हैं, तो अस्सी पर फूफा जी, जिनके यहाँ जाकर वह दो-दो चार-चार दिन मेहमान रहती है।
बरतन साफ करने से लेकर रसोई पकाने तक का काम सुधा के जिम्मे है। यह दूसरी बात है कि रायसाहब ने अपने कारखाने के सूरत नामक एक मजदूर की बालिका पत्नी गंगो को बरतन माँजने के काम में सुधा की सहायिका नियुक्त कर दिया है। सुधा अपनी सौत प्रेमवती से उतना ही डरती है जितना बाघिन से बकरी। पति के समीप उसका मूल्य क्रीतदासी से भी घटकर है। छोकरी दासी गंगो के मुँह से सुनकर शर्माजी सुधा के बारे में इतनी ही जानकारी प्राप्त कर सके थे।
दूसरे दिन रविवार था। बादल भी खुल गए थे और लोगों को हफ्ते-भर बाद सूर्य का दर्शन मिला। शर्माजी को दफ्तर जाना नहीं था। जब दोपहर को रायसाहब अपनी दुकान पर चले तो उन्होंने भी धूप खाने के लिए उनसे छत पर जाने की अनुमति माँगी। रायसाहब को ऐसे काम बहुत प्रिय थे, जिनमें गाँठ का पैसा खर्च किये बिना ही अहसान जताने का अवसर मिलता हो। उन्होंने अनुमति दे दी। शर्माजी छत पर जाकर धूप खाते हुए एक ऐतिहासिक उपन्यास पढ़ने लगे। उपन्यास में अलाउद्दीन खिलजी के नामर्द सेनापति मलिक काफूर की मर्दानगी का विशद वर्णन था। शर्माजी की आदत किसी भी पुस्तक को मन में नहीं, जोर से पढ़ने की है। उन्होंने पढ़ा कि रानी कमला काफूर से कह रही है— “तुम नामर्द हो, तुम नारी की मर्यादा क्या जानो? नामर्द अपनी भार्या तक को दूसरे के हाथ सौंप देता है, मैं तो फिर भी परनारी हूँ?”
इतने में आवाज़ आयी— “ठीक है, बहुत ठीक!” शर्माजी ने चौंककर सिर उठाया, देखा कि छत पर प्रेमवती खड़ी है और कह रही है— “ठीक है, बहुत ठीक!” इस नारी की वाचालता पर उन्हें कुछ क्रोध आया और अग्निमय नेत्रों से उसे देखते रह गए। इस पर वह मुस्कराकर बोली— “बाबू! क्या देखते हो? यह कौन-सी किताब है?”
शर्माजी को उसकी निर्लज्जता पर लज्जा आयी। उसने पुनः कहा— “कौन-सी किताब है बाबू, बताते क्यों नहीं?” “एक उपन्यास है,” उन्होंने उत्तर दिया। “उपन्यास तो अच्छा जान पड़ता है। एक दिन के लिए मुझे भी देना। दोगे न?” “आज ही तो लाया हूँ,” बात टालने के लिए उन्होंने कहा। “तो मैं अभी थोड़ी ही माँग रही हूँ? जब खतम कर लेना तब देना। कब तक खतम कर सकोगे?” “अभी तो पढ़ना प्रारम्भ किया है,” उन्होंने कहा। “घण्टे-भर से तो पढ़ रहे हो, कुल दो पन्ना पढ़ पाए? बहुत धीमा पढ़ते हो,” कहकर उसने अविश्वास से हँस दिया। शर्माजी भेंपे, परन्तु तुरन्त ही संभलकर बोले— “बस किताब-भर हाथ में थी। ख्याल दूसरी ओर था।” “ऐसी अच्छी किताब पढ़ने में भी? बाबू! बुरा न मानना। तुम्हारी हिन्दी में कुछ नहीं है। वही सीता, वही सावित्री? वही आदर्श का पचड़ा।” “आपको आदर्श अच्छा नहीं लगता क्या?” “अच्छा लगने की बात नहीं है। बात यह है कि आदर्श मर गया है, जिस तरह बन्दरिया अपने मरे हुए बच्चे को भी, जब तक वह सड़ न जाय, लिये-लिये फिरती है वैसे ही तुम हिन्दी वाले आदर्श का मुरदा लिए डोल रहे हो? अच्छा, आज यहीं तक।” वह नीचे चली गयी। शर्माजी उसकी विकृत प्रतिभा पर आश्चर्य करते रह गए।
[ ३ ]
उसी दिन शाम को प्रेमवती शर्माजी की कोठरी में आई। शर्माजी दूसरे दिन निकलने वाले अखबार के लिए अग्रलेख लिख रहे थे। शीर्षक रखा था— ‘आदर्श और यथार्थ’। आते ही प्रेमवती ने कहा, “बाबू! साड़ीवाला आया है। उसकी एक साड़ी मैंने पसन्द की है। रायसाहब घर पर हैं नहीं। आप पच्चीस रुपये मुझे दे दो। उनके आते ही लौटा दूँगी।”
उसकी माँग सुनकर शर्माजी बड़े असमंजस में पड़े। कुल अस्सी रुपये मासिक वेतन पाने वाला पच्चीस रुपये कर्ज कैसे दे दे? वह इनकार करने जा ही रहे थे कि उसने कहा, “अगर रुपये न हों तो रहने दीजिए, फिर कभी देखा जायगा। दुःख इतना ही है कि साड़ी बहुत अच्छी है और कम दाम में मिल रही है।” उसके चेहरे पर वेदना की रेखाएँ स्पष्ट उमड़ आयीं। शर्माजी ने अभिभूत होकर कह दिया “नहीं, नहीं मैं रुपये देता हूँ” और पेट काटकर संचित सौ रुपयों के अपने ‘स्थायी’ कोष से पच्चीस रुपये निकालकर उन्होंने उसके हाथ में रख दिए। उसने मुस्कराकर कहा, “धन्यवाद” और पलक मारते ही तूफान की तरह वह बाहर चली गयी।
इस प्रकार एक महीने के भीतर उसने शर्माजी से प्रायः पचासी रुपये ऐंठ लिये। फलतः उन्हें उसके चरित्र पर जो सन्देह हुआ था वह दिनोंदिन बढ़ता ही गया। वह मन-ही-मन परदे में कैद उसकी सकुचीली सौत सुधा के चरित्र और स्वभाव से इसके चरित्र और स्वभाव की तुलना करते और यह सोचकर दुःखी होते कि प्रेमवती किस प्रकार मौज उड़ा रही है और बेचारी सुधा कितने कष्ट में है।
छुट्टी के दिन वह अपनी कोठरी में बैठे इन्हीं बातों पर विचार कर रहे थे कि प्रेमवती पुनः उनके पास आई। उनके पास उसका आगमन केवल रुपया ही लेने के लिए होता था, अतः आज भी उसके आने का उद्देश्य वह समझ गए और उसके कुछ कहने के पहले ही जबरदस्ती हँसते हुए बोल उठे— “बड़ा अच्छा किया जो मेरे रुपये ले आयीं। इधर कई दिनों से मुझे रुपये की बड़ी आवश्यकता भी थी।”
“मैं रुपये देने नहीं और भी रुपये लेने आयी हूँ,” उसने अत्यन्त निर्लज्जतापूर्वक हँसते हुए कहा। “रायसाहब आपको जेब-खर्च कम देते हैं क्या?” उसने गम्भीर होकर पूछा। “मैं आपको किस राजा साहब से कम समझती हूँ?” उसके मुख पर वैसी ही निर्लज्ज मुसकान थी। “इसका मतलब?” शर्माजी ने कड़ाई से पूछा। “तुम इतने मूर्ख हो,” उसने कहा और दरवाज़े का रास्ता लिया। शर्माजी ने झपटकर उसकी राह रोक ली। वह कतराकर बगल से चली। उन्होंने डाँटकर उससे रुकने के लिए कहा। वह हाँफती हुई कुर्सी पर बैठ गयी और बोली— “ओफ!”
“ओफ-सोफ कुछ नहीं। बताइए आप मेरा रुपया देंगी कि मैं रायसाहब से कहूँ?” शर्माजी का कण्ठ स्वर अनावश्यक रूप से कठोर हो गया था। परन्तु उसने इसकी तनिक परवाह न की। वैसे ही बोली, “रायसाहब से क्या पाओगे? वह अलाउद्दीन हैं, तुम मलिक काफूर!” क्षण-भर वह मौन रही, परन्तु शर्माजी के बोलने के पहले ही कुर्सी से उठते हुए बोली, “अच्छा जाती हूँ। लेते बने तो रायसाहब से रुपये ले लेना।” वह चलने लगी। शर्माजी के मुँह से निकला— “यह त्रिया-चरित्र?” उसने सिर घुमाकर हँसते हुए जवाब दिया— “नारी त्रिया-चरित्र न करेगी तो क्या पुरुष-चरित्र करेगी?” और दूसरे ही क्षण वह उनके कमरे के बाहर चली गई।
[ ४ ]
दूसरे दिन चार घटनाएँ एक साथ हुईं। रायसाहब ने पिछली रात घर लौटने पर शर्माजी को सबेरा होते ही मकान खाली करने का नादिरशाही अथवा खिलजवी आदेश प्रदान किया। उक्त आदेशानुसार दूसरे दिन बड़े ही तड़के उठकर शर्माजी अपना अल्प असबाब समेटकर उसकी गठरी बाँध रहे थे कि ऊपर गृहप्रबन्धिका चमेलीदेवी का हाहाकार क्रंदन सुन पड़ा। वे रो-रोकर चिल्ला रही थीं— “सात पुश्त की नाक कट गई।” और रायसाहब उन्हें चुप रहने के लिए डाँट रहे थे। सुधा की दासी गंगो दौड़ी हुई शर्माजी की कोठरी में आयी। उन्होंने उससे पूछा— “क्या हुआ है रे! उसने बताया कि छोटी रानी जी का घर में कहीं पता नहीं है। मुवा के कष्टों का स्मरण कर शर्माजी को दुःख हुआ। उस घर में गंगो ने उनकी बड़ी सेवा की थी और शर्माजी उस घर से सदा के लिए जा रहे थे। इसलिए उन्होंने उसे एक रुपया पुरस्कार देते हुए उससे सस्नेह पूछा— “तुम्हारी मालकिन तो कहीं चली गई गंगो! अब तुम इस घर में किसके पास रहोगी?” गंगो ने बड़े ही भोले रूप में कहा, “अब मैं अपने ‘उनके’ साथ रहूँगी।”
शर्माजी की गठरी बँध चुकी थी। उसे एक कोने में रख वह स्नान के लिए नल की ओर चले। देखा, रायसाहब आज बड़े सबेरे ही बाहर चले जा रहे हैं। स्नान में उन्हें कुछ विलम्ब हुआ। छ: महीने इसी नल के नीचे नियमित स्नान के बाद आज यह सोचकर उनका चित्त भावुक हो रहा था कि कल से नहाने के लिए कोई दूसरा घाट मिलेगा। इसी समय आँगन में जोर से शोर हुआ। शर्माजी शीघ्रतापूर्वक बाहर निकल आए और उन्होंने देखा कि बीच आँगन में प्रेमवती रायसाहब के एक ममेरे भाई को भद्दा मजाक करने का पुरस्कार चप्पलों से दे रही है। हँसी दबाए हुए शर्माजी अपनी कोठरी में घुसे। आँगन में से ही प्रेमवती ने पूछा— “अभी गये नहीं?” उन्होंने उसकी बात का उत्तर दिये बिना ही कपड़े पहने, गठरी उठायी और गली का रास्ता लिया। बाहर निकलते ही देखा कि मिठ्ठू की दुकान के तख्ते के नीचे एक छोटा-सा लिफाफा पड़ा है। अविवेकपूर्ण ढंग से कौतूहलवश उन्होंने उसे उठा लिया और त्योंही देखा कि मिठ्ठू गली की मोड़ घूमकर दुकान पर आ रहा है। शर्माजी ने पैर बढ़ाया। मिठ्ठू दुकान पर पहुँचकर ताला खोलने और ऊपर खिड़की की ओर मुँह उठाकर गाने लगा—
“गरचे बेजार तो है, पर उसे कुछ प्यार भी है।
साथ इनकार के परदे में कुछ इकरार भी है।
दिल भला ऐसे को ऐ ‘दर्द’ न क्यों कर दीखे।
एक तो यार है ओ उसपै तरहदार भी है।”
उधर शर्माजी और भी आगे बढ़कर लिफाफा खोल पत्र पढ़ते हुए चले। पत्र में लिखा था—
“जनाब आली, जा रही हूँ। आपकी तीनों किताबें साथ लिये जा रही हूँ, इसलिए कि ज़िन्दगी का पहला पाप और आखिरी भी, हमेशा याद रहे। जैसा कि मेरा ख्याल है, अगर यह पाप ज़िन्दगी का पहला और आखिरी पाप हुआ तो यह इकलौता पाप कहा जाएगा। बेटा चाहे कपूत हो या सपूत प्यारा होता है। पर अगर कहीं वह इकलौता हुआ तो फिर क्या कहना? यह मेरा इकलौता पाप है, इसलिए मुझे बहुत प्यारा है।
मैंने पाप किया था आपको दिल देकर। जवानी, वासना और अभाव की विवशता ने मेरे दिल में बदले की आग सुलगा दी। बदले की आग जो न करा दे। इसी ने सोने की लंका जला दी थी। मैं समझती थी मेरा शौहर मेरी सौत को प्यार करता है। बस बदले की आग भड़क उठी। उसे बुझाने के लिए पानी की जरूरत थी—चाहे वह समुद्र का खारी पाना होता, चाहे वह गंगा का पवित्र पानी होता, चाहे वह नाली का गंदला पानी होता। इसी समय तुम मिल गए—नाली के गंदले पानी की तरह। मुझे प्यास बुझानी थी, स्वाद थोड़े ही लेना था? मैंने गन्दे पानी से ओंठ लगा दिया। अब प्यास बुझ जाने पर मतली आती है। इधर असलियत भी खुल गयी। मेरा शौहर दुनिया की किसी भी औरत को कभी प्यार नहीं कर सकता। वह तो खुद को—अपनी खुदी को—प्यार करता है, बस।”
पत्र पढ़कर जैसे शर्माजी के गाल पर तमाचा पड़ा। उसकी पीड़ा से चौंकते हुए उन्होंने सिर उठाया तो क्या देखा कि गली की मोड़ पर बेनी तमोली की दुकान पर बैठी गंगा तमोलिन से रायसाहब घुल-घुलकर बात कर रहे हैं। उन्होंने देखा कि रायसाहब की बात सुनकर गंगा घर के भीतर चली गई और रायसाहब उसे सुनाते हुए यह कहकर कि “अब भी मेरे कारखाने में तुम मजदूरनियों की ‘मेठ’ बन सकती हो”, अपनी दुकान की ओर बढ़े।
२. कठिन शब्दार्थ (Glossary)
३. पाठ का सारांश (Summary)
शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' द्वारा रचित 'बहती गंगा' की तेरहवीं तरंग 'इस हाथ दे उस हाथ ले' बनारस के एक सामंती परिवेश में स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलता और नैतिक खोखलेपन को उजागर करती है। कहानी का मुख्य पात्र रायसाहब साधूराम है, जो अपनी धन-शक्ति के मद में दो पत्नियों (प्रेमवती और सुधा) के साथ रहता है। रायसाहब का चरित्र वासना और अहंकार से निर्मित है, जहाँ वे अपनी छोटी पत्नी सुधा को दासी के समान समझते हैं और बड़ी पत्नी प्रेमवती के वशीभूत हैं। उनके घर में किराएदार के रूप में रहने वाले 'संपादक शर्मा जी' एक आदर्शवादी व्यक्ति हैं, जो कोयला बेचने वाले किशोर मिठ्ठू की गायकी में एक महान कलाकार की संभावना तलाशते हैं।
कहानी का मनोवैज्ञानिक मोड़ प्रेमवती और शर्मा जी के संवादों से आता है। प्रेमवती, जो चतुर और वाचाल है, शर्मा जी के 'हिंदी आदर्शवाद' का उपहास करती है और उसे 'मरे हुए बच्चे को ढोती बन्दरिया' के समान बताती है। वह चालाकी से शर्मा जी की सहानुभूति जीतती है और उनसे लगभग पचासी रुपये ऐंठ लेती है। प्रेमवती का चरित्र एक विद्रोही और प्रतिशोधी नारी का है, जो अपने पति रायसाहब के उपेक्षापूर्ण व्यवहार और उनकी अनैतिकता का उत्तर अपनी ही शर्तों पर देती है। शर्मा जी, जो सुधा की दीनता पर दुखी होते हैं, प्रेमवती के असली इरादों को समझ नहीं पाते।
कथा का अंत अत्यंत नाटकीय और हृदयविदारक है। प्रेमवती अचानक घर छोड़कर भाग जाती है, लेकिन जाने से पहले शर्मा जी के लिए एक पत्र छोड़ती है। उस पत्र में वह स्वीकार करती है कि उसका शर्मा जी के प्रति कोई प्रेम नहीं था, बल्कि वह अपनी 'बदले की आग' बुझाने के लिए उन्हें 'नाली के गंदले पानी' की तरह इस्तेमाल कर रही थी। वह बताती है कि रायसाहब वास्तव में किसी से प्यार नहीं करते, वे केवल अपने अहंकार (खुदी) से प्यार करते हैं। शर्मा जी को रायसाहब द्वारा घर खाली करने का आदेश मिलता है। कहानी के अंतिम दृश्य में, जब शर्मा जी घर छोड़ रहे होते हैं, वे रायसाहब को एक अन्य स्त्री (गंगा तमोलिन) को अपने जाल में फँसाते हुए देखते हैं। यह दृश्य स्पष्ट करता है कि रायसाहब जैसे लोगों के लिए स्त्रियाँ केवल उपभोग की वस्तु हैं। शीर्षक 'इस हाथ दे उस हाथ ले' जीवन के इसी कड़वे यथार्थ को दर्शाता है कि कर्मों का प्रतिफल और शोषण का चक्र किस प्रकार उसी समाज में वापस लौटता है।
