14- दीया क्या जले जब जिया जल रहा

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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दिया क्या जले जब जिया जल रहा (बहती गंगा) : मूल पाठ, शब्दार्थ एवं सारांश

प्रस्तुत पाठ में मूर्धन्य साहित्यकार शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' काशिकेय द्वारा रचित प्रसिद्ध औपन्यासिक कृति 'बहती गंगा' की चतुर्दश तरंग (कहानी-१४) 'दिया क्या जले जब जिया जल रहा' का सम्पूर्ण मूल पाठ, कठिन शब्दार्थ एवं गहन समीक्षात्मक सारांश प्रस्तुत है।

पुस्तक : बहती गंगा
रचनाकार : शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' काशिकेय
विधा : कहानी / उपन्यास (तरंग-शृंखला)
कहानी क्रम : तरंग १४ — दिया क्या जले जब जिया जल रहा
मुख्य पात्र : गंगो (गर्भवती स्त्री), सूरत (गंगो का पति/मिल-मजदूर), चमेली बुआ (धनी पड़ोसिन), ललिता, रामू की माँ, लल्लन
मूल चेतना : मजदूर वर्ग का दारुण अभाव, गर्भवती नारी की दमित अभिलाषा (साध), दिवाली के आलोक में गरीबी का अंधकार, श्रम-शोषण एवं मानवीय विवशता

१. मूल पाठ (सम्पूर्ण पाठ)

॥ बहती गंगा : तरंग — १४ (दिया क्या जले जब जिया जल रहा) ॥

[ १ ]

गंगो नित्य की अपेक्षा आज कुछ जल्दी ही उठ गई थी। उठने के बाद से ही वह अनमनी थी। वह समझ नहीं पा रही थी, पर उसे सब-कुछ अधूरा-अधूरा दिखाई पड़ रहा था। चारों ओर अतृप्ति उसाँस-सी भरती जान पड़ती थी और अभाव मचल-मचल कर चिकोटी काटता-सा मालूम पड़ता था। उठते ही उसने अपनी पालतू बिल्ली को एक चैला खींचकर मारा; कारण, वह नित्य उसके निकलने के बाद कोठरी से बाहर निकला करती थी, पर आज वह उसके पहले ही बाहर निकल आई। उस दिन घर में उसने बुहारी नहीं लगाई, बल्कि झाड़ू उठाकर उसने सारा घर पीट डाला। उसका सारा आक्रोश अपने पति सूरत पर था जिसे वह अपने सारे अभावों का मूल कारण समझती थी। वह चाहती थी कि सूरत उससे कुछ कहे, उसे अपना अभाव, अभियोग उपस्थित करने का मौका मिले।

सूरत भी सवेरे से ही निगाह दबाए सब-कुछ भाँप रहा था। देख रहा था कि दिशाएँ निस्तब्ध हैं और गंगो का गात्र बादलों की तरह भारी है। वह डर रहा था कि अभी-अभी वह कहीं बरस न पड़े। उसने चुपचाप नित्य-क्रिया समाप्त की, बाल सँवारे, गुड़ का एक टुकड़ा मुँह में डाला, पानी पिया और फिर एक अधजली बीड़ी सुलगाकर वह दबे पाँव बाहर निकल जाने का प्रयत्न करने लगा। क़रीब-क़रीब वह सफल हो चुका था, अर्थात् एक पैर चौखट के उस पार कर चुका था, जूता भी पहन चुका था, दूसरा पैर भी उठ गया था; सहसा वज्रपात हुआ। उठा हुआ पैर जहाँ का तहाँ आ रहा। पैर रखने से बने हुए पहले निशान पर इस बार पैर वापस होकर इस प्रकार चारों खाने ठीक बैठा जैसे समान कोण और भुजावाले त्रिभुज एक-दूसरे पर सरोतर बैठ जाते हैं। सिर सहसा घूम गया, आँखें सभय हो गईं, मुँह खुल गया, जैसे कह रहा हो— 'भाई, तू भी तो खुल! यह बन्द-बन्द सा तो खल रहा है।' कानों में कम्पन हुआ। कम्पन से ध्वनि हुई—

“हाँ तो दिवारी कल है कि परसों?”

“कब है, हमें नहीं मालूम, मिल से छुट्टी होती तो मालूम होता।”

“तुम्हारे ऐसा निकम्मा आदमी तो त्रिलोक में न होगा। कब परब है, कब त्यौहार है, इसका भी तुम्हें पता नहीं।”

“पता लगे तो कैसे? सबेरा हुआ, दौड़ते मिल पहुँचा। दिनभर कोयला झोंककर दिया-जले हाथ और मुँह में कारिख पोते घर लौटता हूँ। दिनभर का थका-माँदा, लेटते ही नींद आ जाती है। हमको तो यह भी नहीं मालूम होता कि आज दिन कौन-सा है।”

“घर की परवाह हो तो मालूम हो।”

“आखिर तुम्हें दिवाली याद कैसे आई?”

“सालभर का त्यौहार है, और क्या?”

“अच्छा तो पता लगाकर बताऊँगा।”

“तुम क्या पता लगाओगे, मैं खुद पता लगा लूँगी। राम, राम! दुनिया में ऐसे भी आदमी हैं।”

सूरत मूरत बना हुआ सारी फटकार हजम कर रहा था। गंगो शेरनी की तरह बकारती हुई घर से बाहर निकली। सूरत अधजली बीड़ी से अधजला हृदय सुलगाता हुआ घर से बाहर निकल आया।

“रामू की माँ! रामू की माँ!” की आवाज़ से मुहल्ला गूंज उठा। गंगो अपनी पड़ोसिन रामू की माँ को बुला रही थी। रामू की माँ भी अपने दरवाज़े पर आई। गंगो ने पूछा, “क्यों बहन, दिवारी तो कल ही है न?”

“हमको क्या मालूम बहन, कि दिवारी कब है और भैया दूज कब?”

“ऐसा क्यों कहती हो? सालभर का त्यौहार है।”

“मेरे यहाँ तो इस साल कोई त्यौहार न मनाया जाएगा।”

“क्यों?”

“तुम्हें नहीं मालूम? आसाम में भूकम्प में हमारे जेठ मर गए। उसी गम में इस साल हम त्यौहार नहीं मनाएँगे।”

गंगो निराश होकर उधर से लौटी। दूसरी ओर जाकर उसने अपनी दूसरी पड़ोसिन को पुकारा— “ललता, अरे ओ ललता!”

“क्या है, गंगो!” ललिता ने आकर पूछा।

“यही पूछना है कि दिवारी इस साल परसों पड़ेगी कि नरसों?”

“दिवारी न परसों है, न नरसों, कल ही है।”

“कल ही है!” गंगो के मुख पर आश्चर्य के सभी लक्षण स्पष्ट हो उठे। उसने पूछा, “दिवारी के लिए तुमने क्या तैयारी की है?”

“हम गरीबों के यहाँ त्यौहार की तैयारी कैसी? यहाँ तो बारह महीने वही रूखी रोटी और वही सूखा साग। त्यौहार तो है अमीरों का, चमेली बुआ का, जो ललहीछठ तक धूमधाम से मनाती हैं।”

“ठीक ही है, भगवान ने चार पैसे दिए हैं, वह क्यों न धूमधाम करें!”

गंगो की आँखों में प्रकाश आ गया, जैसे घने अन्धकार में उसने आलोक-रेखा देख ली हो। उसने चमेली बुआ के घर की राह ली। चमेली बुआ नौकर को बाज़ार भेजने के लिए वस्तुओं की लम्बी सूची बना रही थीं। उन्होंने गंगो को देखकर भी न देखा, तथापि वह उन्हीं के पास जा बैठी।

गंगो अन्तःसत्वा थी। इधर उसकी तबीयत उर्द के बड़े पर आ गई थी। पर वह अपनी यह इच्छा किससे और कैसे प्रकट करे! लोकदृष्टि के समक्ष अपने मन का आवरण उठाने में वह लजाती थी, कारण आवरण उठाने में लज्जा लगती ही है चाहे वह दैहिक हो या मानसिक। यही कारण था कि अपने पति सूरत से भी खुलकर अपने मन की बात नहीं कह सकती थी। वह चाहती थी कि कोई स्वयं उसकी इच्छा भाँप जाए और उसे पूरी कर दे।

चमेली बुआ का काम समाप्त होने पर गंगो ने कहा, “क्यों बुआ! कुछ मेरे लायक काम है?”

“काम तो कुछ वैसा नहीं है, पर त्यौहार का दिन है, इसलिए काम की क्या कमी है? हो सके तो जरा तड़के चली आना, पीठी-वीठी पीसनी है।”

गंगो दिनभर चमेली बुआ के यहाँ जी-तोड़ परिश्रम करती रही। रात के आठ बजे घर लौटी। सूरत मिल से लौट आया था। गंगो के आते ही उसने कहा, “दिवारी कल ही है।”

“तुमसे पहले ही मुझे मालूम हो गया है। बकवाद मत करो। हमें तड़के ही उठना है।”

[ २ ]

अर्धनिशा की नीरवता को चीरता हुआ समीपवर्ती पुलिस-थाने का घंटा बजने लगा— एक! दो! तीन! चार! पाँच! छह! गंगो तड़पकर उठ बैठी। उसने सूरत का कन्धा झकझोरकर उसे उठा दिया और झल्लाती हुई बोली, “मैंने तुमको सहेज दिया था कि हमें जल्दी उठा देना, चार ही बजे जाना है। यह लो छह बज गया।”

सूरत ने लेटे-लेटे ही जवाब दिया, “तुम तो बड़ी पागल हो। न सोती हो, न सोने देती हो। अभी तो कुल बारह बजे हैं, बारह!”

थाने का घंटा अभी बजता ही जा रहा था। गंगो को अपनी भूल मालूम हुई और वह लज्जित हो गई। पुनः लेट तो गई, पर आँख फिर न लग सकी। उसने जागते हुए सुना घंटे-भर बाद दो, घंटे-भर के व्यवधान के बाद तीन बजा। गंगो के लिए पलभर भारी होने लगा। बड़ी देर हो गई, चार का घंटा नहीं बजा। गंगो ने समझा कि शायद तन्द्रा के कारण चार बजना वह नहीं सुन पाई। वह उठ पड़ी और सूरत को घर से होशियार रहने का आदेश देती हुई बाहर निकल पड़ी।

[ ३ ]

कुल्ला-दातुन तक किए बिना चमेली बुआ के यहाँ दस बजे तक अथक परिश्रम करके गंगो घर लौटी। सूरत बाज़ार गया था। उसने जल्दी-जल्दी स्नान आदि समाप्त किया और इस प्रतीक्षा में कि अब चमेली बुआ के यहाँ से उसे कोई भोजन के लिए बुलाने आएगा, वह दरवाज़े पर जा बैठी। ग्यारह बजा, बारह बजा। अब तक कोई नहीं आया। गंगो ने देखा कि रामू की माँ रामू को गोद में लिए और रामू रन्नो को उँगली पकड़ाए चमेली बुआ की ओर जा रही है।

गंगो ने पूछा, “कहाँ जा रही हो, बहन?”

“चमेली बुआ के यहाँ से बुलावा आया है, वहीं जा रही हूँ।”

“कब बुलावा आया?”

“कल ही शाम को।”

गंगो को धक्का लगा; रामू की माँ आगे बढ़ गई। थोड़ी ही देर बाद दो-चार दूसरी पड़ोसिनों के साथ ललिता भी चमेली बुआ के घर की ओर जाती दिखाई पड़ी। गंगो ने जानकर भी प्रश्न किया, “कहाँ जा रही हो?”

“चमेली बुआ के यहाँ से भोजन का बुलावा आया है न, वहीं।”

“अच्छा, यह बात है! मैंने भी सोचा कि कहाँ जा रही हो।”

“न्यौता नहीं मिला तुमको क्या?” ललिता ने पूछा।

“न्यौता मिले भी तो मैं नहीं माननेवाली। मैं क्या किसी के टुकड़े की मोहताज हूँ या तुम लोगों की तरह पेट धोंया है! तुम अमीर हो, अपने घर की हो।”

“अरे तो लड़ती क्यों हो?”

“मैं लड़ती हूँ कि तू? डाइन कहीं की!”

ललिता और उसकी साथिनें समझ न पाईं कि गंगो सहसा इतनी नाराज़ क्यों हो गई। वे अपने रास्ते बढ़ गईं। हताश होकर अपने गरीबों के भंडार-घर में जाकर यह जानती हुई भी कि उसकी अभिलषित वस्तु उसे नहीं मिलेगी, गंगो ने हाँड़ियाँ टटोलनी शुरू की, पर किसी भी हँडिया में उसे उर्द की दाल का एक दाना भी न मिला। वह अभाव के उस समुद्र-सी फैल गई जिसमें केवल चट्टानों से टकराकर बिखरने के ही लिए निराशा की लहरें उठा करती हैं।

इसी समय कन्ट्रोल की दुकान पर से विमर्दित सूरत राशन लिए हुए घर आया। उसे देखते ही गंगो उसकी ओर लपकी। राशन की गठरी उसके हाथ से छीनकर ज़मीन पर पटकती और आँचल पसारकर रोती हुई उसने पूछा—

“बोलो! मैंने तुमसे कब कहा था कि मैं उर्द का बड़ा खाऊँगी?”

इसी समय मकान-मालिक के पुत्र लल्लन ने कटोरे-भर उर्द की दाल उसके फैले हुए आँचल में उलट दी।

सूरत भौंचक हो रहा। सारा दृश्य उसके लिए पहेली था।

२. कठिन शब्दार्थ (Glossary)

अनमनी = उदास / खिन्न मन वाली, चैला = लकड़ी का मोटा टुकड़ा या फाँटा, बुहारी = झाड़ू लगाना / घर की सफाई, गात्र = शरीर या देह, सरोतर = पूरी तरह समरूप (Congruent) बैठ जाना, दिवारी = दीपावली / दीवाली का त्यौहार, परब = पर्व या उत्सव, कारिख = कालिख / कोयले का काला धब्बा, बकारती = गरजती हुई / कड़े स्वर में चिल्लाती हुई, ललहीछठ = भाद्रपद में संतान की दीर्घायु के लिए माताओं द्वारा किया जाने वाला हलषष्ठी व्रत, अन्तःसत्वा = गर्भवती स्त्री (जिसके गर्भ में शिशु हो), उर्द का बड़ा = उड़द की पिसी दाल से तेल में तला जाने वाला पारम्परिक व्यंजन (वड़ा), पीठी = सिलबट्टे पर महीन पिसी हुई गीली दाल, अर्धनिशा = आधी रात / मध्यरात्रि, नीरवता = सन्नाटा या निस्तब्धता, व्यवधान = समयान्तराल / बीच का फासला, तन्द्रा = हल्की नींद या ऊँघ की अवस्था, पेट धोंया = दूसरों के टुकड़ों पर आश्रित रहने वाला / पेटू, अभिलषित = मनचाही / चाही गई वस्तु, विमर्दित = भारी भीड़ में धक्का-मुक्की से कुचला व थका हुआ, कन्ट्रोल की दुकान = सरकारी राशन वितरण की दुकान (कोटा), दौहद = गर्भावस्था के समय होने वाली विशेष खान-पान की तीव्र लालसा या साध।

३. पाठ का सारांश (Summary)

शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' काशिकेय द्वारा रचित औपन्यासिक कृति 'बहती गंगा' की चतुर्दश तरंग 'दिया क्या जले जब जिया जल रहा' निम्न एवं सर्वहारा वर्ग की असह्य विपन्नता, गर्भवती नारी की दमित अभिलाषाओं (दौहद) तथा दीवाली जैसे प्रकाश-पर्व पर व्याप्त वर्ग-भेद का अत्यंत मर्मस्पर्शी व यथार्थवादी चित्रण है। कहानी की प्रमुख पात्रा गंगो गर्भवती (अन्तःसत्वा) है और अभावग्रस्त परिवेश में जीवन-यापन कर रही है। उसका पति सूरत दिन-रात कोयले की मिल में पसीना बहाकर शरीर पर कालिख पोते लौटता है, जिसे इतना भी होश नहीं रहता कि कौन-सा दिन या त्यौहार है। गंगो के मन में गर्भावस्था की स्वाभाविक शारीरिक व मानसिक स्थिति के कारण 'उड़द के बड़े' (दौहद/साध) खाने की तीव्र लालसा उत्पन्न होती है। आर्थिक तंगी और स्त्री-सुलभ लज्जा के कारण वह यह इच्छा सीधे अपने थके-माँदे पति से नहीं कह पाती। उसे लगता है कि कोई उसकी मनोदशा को स्वयं समझ ले।

दीपावली के अवसर पर जब पड़ोसिन ललिता बताती है कि केवल धनवान चमेली बुआ के यहाँ ही पकवानों की धूम मचेगी, तो गंगो के मन में आशा की किरण जागती है। वह इस मूक प्रत्याशा में कि त्यौहार पर चमेली बुआ उसे पकवान व भोजन अवश्य देंगी, तड़के ही भूखे-प्यासे उनके घर पहुँच जाती है और दाल की पीठी पीसने से लेकर सारा भारी काम दोपहर तक निस्वार्थ भाव से करती है। किंतु चमेली बुआ केवल उसके श्रम का शोषण करती हैं। दोपहर को जब गंगो घर लौटकर बुलाव की प्रतीक्षा करती है, तो वह देखती है कि अन्य सभी पड़ोसिनों को तो आदरपूर्वक भोजन का न्योता मिलता है, किंतु जिसने सारा काम किया, उसी अभागिन गंगो को पूरी तरह बिसरा दिया जाता है। इस अपमान और उपेक्षा से गंगो का स्वाभिमान तिलमिला उठता है और वह पड़ोसियों पर क्रोध उगलने लगती है।

अत्यंत हताश होकर जब गंगो अपनी सूनी रसोई में एक-एक हाँडी टटोलती है, तो उसे उड़द की दाल का एक दाना तक नहीं मिलता। इसी बीच उसका पति सूरत राशन की लाइन में धक्के खाकर और पिसकर घर लौटता है। गंगो का दबा हुआ आक्रोश और विवशता फूट पड़ती है; वह राशन की पोटली पटककर रोते हुए चीखती है—'बोलो! मैंने तुमसे कब कहा था कि मैं उर्द का बड़ा खाऊँगी?' ठीक उसी दारुण क्षण में मकान-मालिक का छोटा बालक लल्लन अनजाने में एक कटोरा कच्ची उड़द की दाल उसके फैले आँचल में उलट देता है। यह विडंबना हृदय को झकझोर कर रख देती है। दीवाली के दीये घर के बाहर तो जल उठते हैं, किंतु अभाव, भूख और उपेक्षा से झुलसते अंतर्मन का क्रंदन यही प्रमाणित करता है कि 'दिया क्या जले जब जिया जल रहा'—जब आत्मा ही जल रही हो तो दीपों का प्रकाश व्यर्थ प्रतीत होता है।

बहती गंगा · तरंग १४ (दिया क्या जले जब जिया जल रहा) · शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' काशिकेय

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