1.गाइए गणपति जगवन्दन

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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गाइए गणपति जगबन्दन (बहती गंगा) : मूल पाठ, शब्दार्थ एवं सारांश

प्रस्तुत पाठ में मूर्धन्य साहित्यकार शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' काशिकेय द्वारा रचित प्रसिद्ध औपन्यासिक कृति 'बहती गंगा' की प्रथम तरंग (कहानी-०१) 'गाइए गणपति जगबन्दन' का सम्पूर्ण मूल पाठ, कठिन शब्दार्थ एवं लगभग २५० शब्दों का संक्षिप्त सारांश प्रस्तुत है।

पुस्तक : बहती गंगा
रचनाकार : शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' काशिकेय
विधा : कहानी / उपन्यास (तरंग-शृंखला)
कहानी क्रम : तरंग ०१ — गाइए गणपति जगबन्दन
मुख्य पात्र : राजा बलवंतसिंह, रानी पन्ना, बैजनाथसिंह, दासी लाली
मूल परिवेश : अठारहवीं शताब्दी का काशी राज्य (गंगापुर गढ़ी)

१. मूल पाठ (सम्पूर्ण पाठ)

॥ बहती गंगा : तरंग — ०१ (गाइए गणपति जगबन्दन) ॥

श्री गणेशाय नमः करते हुए ‘विनय-पत्रिका’ में जिस समय गोस्वामी तुलसीदास ने ‘गाइए गणपति जगबंदन’ लिखा उस समय उन्हें यह कल्पना तक न थी कि ‘गणपति की वन्दना किसी राजवंश के संस्थापक के यहाँ दांपत्य-कलह और चिर अभिशाप का कारण बन जाएगी।

[ १ ]

गढ़ गंगापुर के परकोटे पर अपने सखा और सेनापति पाण्डेय बैजनाथसिंह के साथ टहलते हुए राजा बलवंतसिंह ने थाली बजने और ढोलक पर थाप पड़ने की आवाज़ सुनी। गानेवालियों के मुँह से ‘गाइए गणपति जगबंदन’ का मंगलगान आरंभ होते सुना और अनुभव किया कि पुरुष-कंठों से उठे तुमुल कोलाहल में गीत का स्वर अधूरे में ही सहसा बंद हो गया है। उन्होंने समझ लिया कि रानी पन्ना ने पुत्र-प्रसव करके उन्हें निपूता कहलाने से बचा लिया।

और यह भी जान लिया कि मेरे ‘पट्टीदारों’ ने अनुचित हस्तक्षेप कर मंगलगान बंद करा दिया है। उन्हें यह भी प्रतीत हुआ कि उनका कोई चचेरा भाई काशी की गलियों में निर्द्वन्द्व बिचरने वाले साँड की तरह चिल्ला रहा है, “ढोल-ढमामा बंद करो। वर्ण-संकरों के पैदा होने पर बधाई नहीं बजाई जाती।” उन्होंनें घूमकर कहा, “सुनते हो सिंहा यह बेहूदापन!”

“बेहूदापन काहे का, राजा।” सिंह उपाधिधारी ब्राह्मण-तनय ने व्यंग्यपूर्ण स्वर में कहा, “इन्हीं बाबू साहब और आपके चाचा बाबू मायाराम का सिर काटकर रानी के पिता ने आपके पास भेजा था; बाबू साहब उसी का बदला ले रहे हैं।”

राजा ने बैजनाथ सिंह की ओर साश्चर्य देखकर कहा, “बदला? वह तो तुम्हारे पराक्रम से मैंने पूरा-पूरा चुका लिया अब स्त्रियों से कैसा बदला?”

“मैं क्या जानूँ, अन्नदाता! आपने जो रास्ता दिखाया है, आपके भाई उसी पर सरपट दौड़ रहे हैं,” बैजनाथ ने उस उपेक्षा के भाव से कहा जो उत्सुकता उत्पन्न करती है।

“कुछ सनक गए हो क्या, सिंहा? कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हो!” राजा ने डाँटने का अभिनय किया।

“बहकता नहीं हूँ, सरकार!” अनुनय-भरे स्वर में सिंहा बोला, “आप ही स्मरण कीजिए, जब डोभी के ठाकुर की गुर्ज से आपका खाँडा दो टूक हो गया था, तो मैंने धर्म-युद्ध के नियमों की परवाह न कर आपके और उसके द्वन्द्व-युद्ध में हस्तक्षेप किया, यों कहिए कि उसे मार डाला। छत्र-भंग होते ही ठाकुर के बचे-खुचे सिपाही भाग निकले। आपने पुरुषविहीन गढ़ी में निर्बाध प्रवेश किया था, सरकार!”

सिंहा की बोली में दर्प गूंजने लगा। राजा को चुप देखकर उसने पुनः कहा, “सामने ठाकुर की पुत्री, यही पन्ना, सिर के बाल बिखेरे, आँखों में आँसू भरे, हाथ में हँसुआ लिए आपका रास्ता रोके खड़ी थी।”

“तुम भी स्मरण करो सिंहा, मुझसे आँख मिलते ही उसके हाथ से हँसुआ छूट गिरा था,” राजा ने कहा। जवाब में सिंहा फिर तड़पा, “मुझे स्मरण है, सरकार! आपने उसे गिरफ्तार करने का हुक्म दिया था। मैंने आपको रोकते हुए कहा था कि राजा, यह नारी है, इसे छोड़ दीजिए। बाबू साहब ने राजा के बेटे को वर्ण-संकर कहकर ठाकुरों को यही स्मरण कराया है, सरकार!” हाथ जोड़ते हुए अपनी बात समाप्त कर बैजनाथसिंह ने मूंछों पर ताव दिया और फिर उत्तर के लिए विनोदपूर्ण दृष्टि से राजा के मुख की ओर देखने लगा। राजा ने उसकी बात का जवाब न दे एक ठंडी साँस ली और सिर झुका लिया। बैजनाथसिंह के अधर-प्रान्त पर वक्ररेखा-सी खिंच गई और वह पुनः धीरे से बोला, “पाप के वृक्ष में पाप का ही फल लगता है, राजा!”

“जानता हूँ। केवल यही नहीं जानता था कि विवाहिता पत्नी का पुत्र भी वर्ण-संकर कहला सकता है!”

“ईश्वर की दृष्टि में नहीं, समाज की दृष्टि में!”

“अब चेत हो गया सिंहा, मैंने भारी पाप किया।”

“तो जिसके पैदा होने से चेत हो गया उसका नाम चेतसिंह रखिएगा।”

“किन्तु यह जो उलझन पैदा हुई उसे क्या करूँ?”

“उसे तो समय ही सुलझाएगा, सरकार!”

“मैं भी प्रयत्न करूँगा,” राजा ने कहा और वह अठारहवीं शताब्दी की यह समस्या सुलझाते हुए अन्तःपुर की ओर चले।

[ २ ]

अन्तःपुर में पुरुषार्थी पुरुषों की परुष हुंकार से ढोल बन्द होते ही प्रसूति-पीड़ा से कातर रानी पन्ना के पीले मुख पर स्याही दौड़ गई। उसने विषादपूर्ण दृष्टि से दाई की गोद में आँखें बन्द किए पड़े सद्यःजात शिशु को देखा। उसके सूखे अधरों पर रुदनपूर्ण स्मिति क्षण-भर चमककर उसी प्रकार तिरोहित हो गई जैसे किसी पयःस्विनी की क्षीण धारा मरुभूमि की सिकताराशि का चुम्बन लेकर उसी में विलीन हो जाती है। उसने उठकर शिशु का रक्ताभ ललाट चूम लिया। उसके हृदय में स्नेह की नदी उमड़ पड़ी, मस्तक में भावनाओं का तूफान बह चला और आँखों से झरने की तरह वारि-धारा फूट पड़ी।

बुद्धिमती दासी चुप रही। तूफान का प्रथम वेग उसने निकल जाने दिया और तब सान्त्वना के स्वर में वह कहने लगी, “क्या करोगी रानी, मन को पीड़ा पहुँचाकर? सोने की लंका तो दहन होती ही है। सहन करो।”

जामुन-जैसी रस-भरी काली आँखें अपनी विश्वस्त दासी की आँखों से मिलाती हुई पन्ना बोली, “वैभव की आग में कब तक जलूँ, लाली? कभी-कभी तो घृणा के मारे मन में आता है कि बगल में सोए राजा की छाती में कटार उतार दूँ, परन्तु...।”

“परन्तु...रुक क्यों जाती हो?”

“मेरी दृष्टि के सामने वही मूर्ति आ जाती है जिसे देखकर मेरे हाथ का हँसुआ छूट गिरा था। मैं कटार रख देती हूँ। चुपचाप लेटकर आँख मूंद लेती हूँ जिससे वही मूर्ति दिखाई पड़ती रहे।” आँख बन्द करके कुछ देखती हुई-सी पन्ना ने कहा।

“तब तो तुम सुखी हो, रानी!”

“अपमान, उपेक्षा और उत्पीड़न में क्या कम सुख है, लाली! इन तीनों से हृदय में जो दारुण घृणा उत्पन्न होती है वह क्या परम सन्तोष की वस्तु नहीं?” रानी के स्वर में तीव्रता आ गई।

श्रम से हाँफते हुए भी उसने आवेश-भरे चढ़े गले से कहा, “भला सोचो तो! उस आदमी से मन-ही-मन घोर घृणा करने में कितना आनन्द आता है जो तुम्हें दबाकर, बेबस बनाकर समझता है कि उसके दबाव से तुम उसका बड़ा सम्मान करती हो, उस पर बड़ी श्रद्धा रखती हो।”

विष-जर्जर हँसी हँसती हुई पन्ना थककर चुप हो गई और शय्या पर उसने धीरे से अपनी शिथिल काया लुढ़का दी। रानी के मन में घृणा का यह विराट कालकूट अनुभव करके लाली भी पीली पड़ गई। पन्ना ने लेटे-लेटे फिर कहा, “इन लोगों ने आज मेरी प्रथम सन्तान के जन्म पर मंगलगान नहीं गाने दिया। गणेशजी की स्थापना होते ही उनकी मूर्ति उलट दी। मैं तुमसे कहे देती हूँ लाली, कि यदि मेरे बेटे को इन लोगों ने राजा न होने देकर मुझे मेरी आजीवन व्यथा-साधना के मूल्य से वंचित किया तो ये वंशाभिमानी तीन पीढ़ी भी लगातार राज न कर सकेंगे। हर दूसरी पीढ़ी इन्हें गोद लेकर वंश चलाना पड़ेगा और तीन गोद होते-होते राज्य समाप्त हो जाएगा।” अपलक नेत्रों से देखती हुई आविष्ट-सी होकर रानी ने अपना कथन समाप्त किया और तुरन्त ही राजा को सामने खड़ा देख वह सशब्द रो पड़ी।

सूतिकागार का परदा हटाकर राजा चौखट पर खड़े थे। उन्होंने सहानुभूति और अनुनय से सम्पुटित वाणी से कहा, “शाप मत दो रानी, मेरे बाद तुम्हारा ही लड़का राजा होगा। क्लेश मत करो।” राजा ने रानी के प्रसूतिपांडुर मुख पर स्निग्ध दृष्टि डाली। वह यह भूल गए कि व्रण के दाह को शीतल करनेवाला घृत आग में पड़कर उसे और भी दहका देता है। उन्होंने भ्रमवश समझ लिया था कि रानी उनके अत्याचारों की चोट से जर्जर है। इसीलिए वह उस पर मधुर वचनों का लेप लगाने आए थे। वह नहीं जानते थे कि रानी अपमान की आग में जल रही है। अतः उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि रानी की मुख-मुद्रा सहसा सघन गगन-सी गम्भीर हो गई, मुख लाल हो उठा, आँखों से चिनगारियाँ-सी छूटती प्रतीत हुईं। सहानुभूति के चाबुक का आघात रानी सह न सकी। उसने आवेश में कहा, “जले पर नमक न छिड़को, राजा! जिसके जीते उसके बेटे के जन्म पर गाया जानेवाला मंगलगान लोग रोक सकते हैं वे लोग बाप के मर जाने पर बेटे को राजा न जाने कैसे बनने देंगे! साहस हो तो अधूरी वन्दना पूरी कराओ, राजा!”

“कुटुम्बियों से ही मेरा सैनिक बल है, रानी! राजनैतिक कारणों से....”

“चुप रहो। देखूँ, कब तक तुम लोग राजनीति के नाम पर नारी के गौरव और हृदय की बलि चढ़ाते हो!”

“रानी!” राजा ने कुछ धमकी-भरे स्वर में कहा।

“मैं न डरूँगी, राजा!” रानी वैसे ही उद्धत स्वर में बोलती गई, “मैं न डरूँगी! तुम्हारी राजनीति रानी के गर्भ से राजकुमार के जन्म पर बधाई-वादन रोक सकती है, परन्तु माता को अपने पुत्र के जन्मोत्सव पर मंगलगान करने से न तुम रोक सकते हो, न तुम्हारे कुटुम्बी रोक सकते हैं और न तुम्हारी राजनीति ही रोक सकती है। समझे! मैं बधाई गाती हूँ। बुलाओ अपने भाइयों को, रोकें!”

कहते-कहते जैसे किसी स्वजन की मृत्यु पर लोग छाती पीटते हुए रोते हैं वैसे ही दोनों हाथों से अपनी छाती धड़ा-धड़ पीटती हुई रानी चिल्ला-चिल्लाकर विक्षिप्तों के समान गाने लगी—“गाइए गणपति जगबन्दन! गाइए गणपति जगबन्दन!!”

२. कठिन शब्दार्थ (Glossary)

परकोटा = किले या गढ़ी की सुरक्षात्मक चारदीवारी, दांपत्य-कलह = पति-पत्नी के बीच का पारिवारिक झगड़ा, निपूता = निःसंतान / पुत्रहीन, पट्टीदार = विरादरी के हिस्सेदार / गोतिया भाई, निर्द्वन्द्व = बिना किसी भय या रोक-टोक के, वर्ण-संकर = भिन्न जातियों के संसर्ग से उत्पन्न संतान, खाँडा = चौड़ी दोधारी तलवार, गुर्ज = गदा / भारी लोहे का अस्त्र, छत्र-भंग = पराजित होना / राजा का मारा जाना, दर्प = अहंकार / घमंड, वक्ररेखा = टेढ़ी लकीर (व्यंग्यात्मक मुस्कान), अन्तःपुर = रनिवास / महल का वह भीतरी भाग जहाँ रानियाँ रहती हैं, परुष = कठोर / कर्कश, प्रसूति-पीड़ा = प्रसव की वेदना / दर्द, सद्यःजात = तुरंत जन्मा हुआ नवजात शिशु, स्मिति = हल्की मन्द मुस्कान, तिरोहित = ओझल / विलीन हो जाना, पयःस्विनी = दूध देने वाली गाय अथवा अमृतमयी नदी, सिकताराशि = रेत अथवा बालू का विस्तार, कालकूट = भयंकर हलाहल विष / घातक जहर, सूतिकागार = प्रसव कक्ष / जच्चा-गृह, प्रसूतिपांडुर = प्रसव के कष्ट से पीला पड़ा हुआ मुख, व्रण = घाव / जख्म, वंशाभिमानी = कुल या वंश पर झूठा गर्व करने वाले, विक्षिप्त = पागलों की तरह / मानसिक रूप से असंतुलित।

३. पाठ का सारांश (Summary)

शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' द्वारा रचित 'बहती गंगा' की प्रथम तरंग 'गाइए गणपति जगबन्दन' काशी राज्य के संस्थापक राजा बलवंतसिंह और उनकी पटरानी पन्ना के अंतर्द्वंद्व, सामंती क्रूरता तथा ऐतिहासिक अभिशाप की अत्यंत मर्मभेदी कथा है। कथा का आरंभ गोस्वामी तुलसीदास की उस मंगलमयी गणेश-वंदना से होता है, जो विडंबनावश इस राजवंश में दांपत्य-कलह और विनाशकारी अभिशाप का माध्यम बन जाती है।

गंगापुर की गढ़ी में जब रानी पन्ना के गर्भ से प्रथम पुत्र (चेतसिंह) का जन्म होता है, तो राजमहल में 'गाइए गणपति जगबन्दन' का मंगलगान गूँज उठता है। किन्तु राजा के पट्टीदार (चचेरे भाई) नवजात को 'वर्ण-संकर' घोषित कर लाठी और हुंकार के बल पर मंगलगान को जबरन बंद करवा देते हैं। राजा बलवंतसिंह अपने सेनापति बैजनाथसिंह के साथ इस घिनौने कृत्य को देखते हुए भी राजनीतिक विवशताओं और पट्टीदारों के सैन्य-समर्थन पर निर्भर होने के कारण मूक दर्शक बने रहते हैं। वस्तुतः अतीत में बलवंतसिंह ने धर्म-युद्ध के नियमों को तोड़कर पन्ना के पिता (डोभी के ठाकुर) की हत्या करवाई थी और असहाय पन्ना का बलपूर्वक हरण कर विवाह किया था, जिसका अपराध-बोध और सामाजिक दंश राजा को कायर बना देता है।

उधर सूतिकागार में प्रसूति-पीड़ा से त्रस्त रानी पन्ना अपने नवजात शिशु के इस अपमान से तिलमिला उठती हैं। उनके मन में अपने पिता के हत्यारे पति के प्रति संचित दारुण घृणा और प्रतिशोध का भयंकर कालकूट उमड़ पड़ता है। वे अपनी दासी लाली के समक्ष हृदय-विदारक पीड़ा व्यक्त करते हुए काशी नरेश के कुल को यह ऐतिहासिक अभिशाप देती हैं कि यह वंशाभिमानी राजघराना कभी लगातार तीन पीढ़ियों तक राज नहीं कर सकेगा; हर दूसरी पीढ़ी में गोद लेकर ही वंश चलेगा और तीन गोद होते-होते यह राज्य ही समाप्त हो जाएगा।

जब राजा बलवंतसिंह सहानुभूति का लेप लगाने पहुँचते हैं, तो स्वाभिमानी रानी उनकी सत्ता-लोलुप कायरता को धिक्कार देती हैं। वे घोषणा करती हैं कि सामंती राजनीति एक माँ से उसके पुत्र का जन्मोत्सव मनाने का अधिकार नहीं छीन सकती। अंततः रानी पन्ना विक्षिप्त अवस्था में किसी आत्मीय की मृत्यु की भाँति छाती पीट-पीटकर स्वयं रुदन भरे स्वर में 'गाइए गणपति जगबन्दन' गाने लगती हैं। यह कथा सामंती सत्ता के अमानवीय पाखंड, नारी के मानसिक दलन और इतिहास के गर्भ में छिपे अभिशाप का अत्यंत सजीव व गहरा मनोवैज्ञानिक दस्तावेज है।

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