राष्ट्रभाषा की समस्या : विस्तृत समीक्षा, सारांश एवं प्रश्नोत्तर
प्रस्तुत लेख में ललित निबन्धों के शिखर पुरुष डॉ. विद्यानिवास मिश्र द्वारा रचित निबन्ध 'राष्ट्रभाषा की समस्या' का गहन विश्लेषण है। इसमें हिन्दी की राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठा, ऐतिहासिक भूमिका और आधुनिक बुद्धिजीवियों के मूल्य-बोध के संकट पर गम्भीर विचार किया गया है।
१. निबन्धकार का परिचय
डॉ. विद्यानिवास मिश्र (1926–2005 ई.) आधुनिक हिन्दी साहित्य के अत्यंत प्रतिष्ठित निबन्धकार, व्याकरणविद् और सांस्कृतिक मनीषि थे। वे संस्कृत के प्रकाण्ड पंडित और भारतीय जीवन-मूल्यों के प्रखर व्याख्याता थे। मिश्र जी ने 'ललित निबन्ध' की धारा को 'भ्रमरानन्द' के नाम से नई ऊंचाइयां प्रदान कीं। उनके निबन्धों में लोक-परंपरा और शास्त्रीय गम्भीरता का अनूठा संगम मिलता है। 'चितवन की छाँह', 'तुम चन्दन हम पानी', 'आँगन का पंक्षी और वंजारा मन' उनकी कालजयी कृतियाँ हैं। वे 'नवभारत टाइम्स' के संपादक और राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे। उन्हें पद्म भूषण और साहित्य अकादमी जैसे सम्मानों से नवाजा गया। मिश्र जी का मानना था कि भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति का जीवंत स्पंदन है। उनका लेखन पाठकों को आधुनिक जड़ता से मुक्त कर अपनी जड़ों (roots) से जुड़ने की प्रेरणा देता है।
२. मूल पाठ
राष्ट्रभाषा और भाषा में मुख्य अंतर यह नहीं है कि एक व्यापक भौगोलिक विस्तार की क्षमता रखती है, दूसरी नहीं, यह भी नहीं है कि राष्ट्रभाषा के बोलनेवालों की संख्या अपेक्षाकृत बड़ी होती है। मुख्य अंतर यह है कि राष्ट्रभाषा की प्रतिष्ठा राष्ट्रीय मूल्य के रूप में होती है। अपनी भाषा के प्रति निष्ठा राष्ट्रभाषा के प्रति दी गई निष्ठा से उद्भूत होती है। दूसरे शब्दों में भाषा राष्ट्रभाषा बनती है, संख्या के बल पर नहीं, भाषा में निहित सांस्कृतिक सम्पदा के बल पर भी उतनी नहीं, वह राष्ट्रभाषा बनती है अपने बोलने वालों की निष्ठा के बल पर। जिस भाषा पर समस्त राष्ट्र गर्व करता है। जिस भाषा की प्रतिष्ठा को प्रत्येक राष्ट्रवासी राष्ट्र की प्रतिष्ठा का पर्याय मानता है, जिस भाषा के मूल्य को अपने मानवीय मूल्यों में सर्वप्रमुख स्थान देता है, वही भाषा राष्ट्रभाषा होती है।
भारतवर्ष में राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी की प्रतिष्ठा साधारण जन के उत्थान के लिए उठे संतों ने दी। नामदेव, कबीर, नानक, तुलसी, जायसी, सूर जैसे कवियों ने हिंदी को भक्ति की सूरसरि से अभिन्न माना, उस युग में छोटे-से-छोटे आदमी में भगवान को देखना ही सबसे बड़ा मानवीय मूल्य था। इस मूल्य का पर्याय बनी हिंदी। शास्त्रीय चिंतन की भाषा के रूप में संस्कृत बनी रही, पर शुष्क शास्त्रीय चिंतन जो जीवन से निरपेक्ष हो, मनुष्य की स्वाधीनता और मनुष्य की क्षमता का आवाहन न कर सकता हो, मध्य युग में द्वितीय श्रेणी का मूल्य था।
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से बीसवीं शती के पूर्वार्ध तक पूरा राष्ट्र जिस मूल्य की साधना करता रहा, वह था स्वातंत्र्य। स्वातंत्र्य की भी वाहिका बनी हिंदी। जब तक स्वाधीनता का बोध केवल कुछ थोड़े से बुद्धिजीवियों तक सीमित था तब तक ‘कण्टकेनैव कण्टकम्’ की नीति से अंग्रेजी के प्रभुत्व को अंग्रेजी के द्वारा हटाने का प्रयत्न होता रहा, पर ज्योंही प्रथम विश्व युद्ध के बाद महात्मा गाँधी ने स्वाधीनता के आग्रह को जनता के सत्य के आग्रह के रूप में देखना शुरू किया, त्योंही स्वदेशी और हिंदी स्वाधीनता के पर्याय बन गए।
हिंदी के माध्यम से ही राष्ट्रीय स्वाधीनता की पूर्णतम् अभिव्यक्ति हुई। हिंदी भाषी क्षेत्र में इसी से सबसे अधिक अदम्य विद्रोह बार-बार उमड़ता रहा, ‘पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं’ का बोध दहकता रहा। राष्ट्रीय स्तर पर स्वाधीन शिक्षा के प्रयोग के रूप में काशी विश्वविद्यालय, काशी विद्यापीठ, नागरी प्रचारिणी सभा, हिंदी साहित्य सम्मेलन, राष्ट्रभाषा प्रचार सभा जैसी संस्थाओं की स्थापना हुई।
हिंदी राष्ट्रभाषा किसी कानून से, किसी बहुमत से या किसी अनुचित दबाव से नहीं—स्वाधीनता के यज्ञ में आहुति देने वाले प्रत्येक यजमान की श्रद्धा से, उसके ऋत्विजों की श्रद्धा से और स्वाधीनता की आवश्यकता से बनी। हिंदी को राष्ट्रभाषा भूगोल ने नहीं, इतिहास ने बनाया। वह इतिहास हमसे काट दिया जाए तो हिंदुस्तान नहीं रहेगा।
हिंदी को राष्ट्रभाषा नेताओं ने नहीं, नेताओं की नेता बनाने वाली उस भारतीय जनता ने बनाया जो संतों के सत्य की भाँति दूब बनकर बिछी रही, जिसे कुचलकर भी कुचला न जा सका। जिसे कोई भी आततायी उन्मूलित न कर सका। उस खेतिहर जनता ने, अपढ़ पर भी संस्कृत जनता ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाया। उस जनता की आकांक्षा को व्यक्त करने के लिए, उसकी प्रतिष्ठा को सबसे बड़ी प्रतिष्ठा देने के लिए अहिंदी भाषी दूरदर्शी जननायकों ने हिंदी के आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन का अंग बनाया।
राजनीतिक स्वाधीनता मिलने के बाद इस देश में सबसे बड़ी चिंताजनक स्थिति आयी—बुद्धिवादी जन में मूल्य-बोध के अभाव की। अपने बचाव के नाम पर, अपनी सुविधा के नाम पर तथा सबसे सीधे रास्ते की खोज के नाम पर दो परस्पर विरोधी शक्तियों का गठबंधन हुआ। एक थी जनता से शक्ति ग्रहण करने वाली, दूसरी थी जनता के विदेशी शासन से शक्ति ग्रहण करने वाली। एक थी कंटकाकीर्ण पंथों की अभ्यस्त, दूसरी थी मखमली फर्शों पर चलने की आदी।
परिणाम यह हुआ कि ऐसी युगसंध्या उपस्थित हुई, जिससे हर मूल्य धुँधला हो गया। इस धुँधलके में जो दिनभर सूरज के साथ खटते रहे, वे सो गए, पर जो दिन में आराम की नींद सोते रहे, उनके नैशविहार मुखर होने लगे। कृत्रिम रोशनी में उनकी अधनींदी आँखें चमकने लगीं। दिवास्वप्नों में रहने वाले लोग यथार्थ की रचना में लगे, राष्ट्रसाधना पर पटाक्षेप हुआ, स्वाधीनता का उपभोग शुरू हुआ। परिणाम यह हुआ कि राष्ट्र की स्वाधीनता की विगत कहानी ही भूल गई, राष्ट्रभाषा की प्रतिष्ठा कैसे न भूलती?
मैं इसीलिए इस पर बल देता हूँ कि हमारे देश में आज जो एक कृत्रिम प्रकाश में हर चीज विलग दिखती है, आकाश सत्ताईस नक्षत्रों में विभक्त दिखता है, अपने कमरे का कोना भी अलग कमरा प्रतीत होता है, एक छोटी-सी कुर्सी की आड़ में पड़कर, इसका कारण है बुद्धिजीवी वर्ग की मूल्यबोध पर पर्दा पड़ गया है। इसका कारण है हममें से जो सुसंस्कृत होने का दावा करते हैं, वे भूल गए हैं कि भाषा का संस्कार भाषा के साथ जीने से आता है, भाषा के साथ खिलवाड़ करने से नहीं आता।
इसका कारण है हम भावनात्मक एकता की बात तो करते हैं, पर स्वयं भावना से अछूते हैं। देश को एक, अविभाज्य और समग्र देखने वाली आँख तो थी हिंदी, उसी में उँगली घुसेड़कर देश की एकता की रक्षा करने की बात की जा रही है। हम अपने बुद्धि-विलास-कक्ष से बाहर निकल कर एक क्षण भी आस-पास में अपने को घोलते तो हमें अपना अपराध साफ जाहिर हो जाता।
इसीलिए मेरी दृष्टि में राष्ट्रभाषा हिंदी की सबसे प्रमुख समस्या है राष्ट्रबोध की कमी, राष्ट्रभाषा के प्रतिष्ठाबोध की कमी और हिंदी के साथ अधिकतर बुद्धिजीवी जन के तादात्म्य की कमी। इस समस्या का समाधान तभी होगा, जब हम राष्ट्रभाषा के प्रश्न को दल-बद्ध राजनीति के चिंतन के स्तर से ऊपर ले जाकर राष्ट्रीय धरातल पर हल करने का संकल्प करेंगे।
एक भाषा को दूसरी भाषा से छोटी-बड़ी मानने से झगड़े होते हैं, पर जब हिंदी को राष्ट्रीय हित की संरक्षिका मान लेंगे, तो हिंदी किसी दूसरी भाषा से प्रतिस्पर्धा करने वाली नहीं रहेगी, वह भाषा की समृद्धि को और विस्तृत करने वाली उस भाषा की राष्ट्रीय प्रतिभा बन जाएगी।
इस भावना से काम करना शुरू हुआ था गुजरात, महाराष्ट्र, असम, उत्कल, आन्ध्र, बंगाल, केरल, तमिलनाडु और सिंध तक में, पर वह कार्य हमारी गफलत से यंत्रवत् होने लगा, भावनाशून्य होने लगा, इसलिए विघटन के स्वर फूटने लगे। आज यह कार्य नए सिरे से करना आसान नहीं है। इसके लिए घोर परिश्रम, धैर्य और नैतिक साहस की आवश्यकता है।
शब्दकोश, ज्ञान राशि के अनुवाद, पाठ्य-पुस्तकें, भाषा-शिक्षक, प्रशिक्षक, शिक्षकों के आदान-प्रदान जैसे कार्य तब तक निष्प्रभाव बने रहेंगे, जब तक साध्य का ध्यान हमारे चित्त में नहीं आता। इसलिए इन साधनों की कमी या अपर्याप्तता को मैं राष्ट्रभाषा हिंदी की समस्या जैसी समस्या नहीं मानता।
संकल्प की दृढ़ता के आगे ये कार्य समस्या नहीं रह जाते, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण मेरे सामने है। सन् 1949 में संविधान के मसविदे का एक अनुवाद एक बहुत ही कृत्रिम हिंदी में प्रस्तुत किया गया। श्रद्धेय टंडन जी ने उस अनुवाद को हिंदी के लिए एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया। प्रयाग आकर उन्होंने आदेश दिया कि क्या समवेद का एक ऐसी हिंदी में अनुवाद एक सप्ताह के भीतर करके रखा जा सकता है, जो हिंदी की सहजता और विचार की सूक्ष्मता दोनों का निर्वाह कर सके।
स्व० राहुल जी ने कहा—“हो सकता है” और राहुल जी और मैं दोनों आदमी बैठ गए। सात दिनों के भीतर ही अनुवाद लिखा गया, छपने को दिया गया और छापकर टंडन जी को अनुवाद की 500 प्रतियाँ समर्पित कर दी गई। आज भी अभाव की बाधाएँ निष्ठा की चुनौती पर झुक जाएँगी। प्रश्न है—निष्ठा हो।
निष्ठा बाहरी दबाव से आएगी नहीं, या विनाश की आशंका से आएगी या देश की संस्कृति से अपने को जोड़ने की भीतरी श्रद्धा से। भगवान न करें कि पहला विकल्प उपस्थित हो।
हिंदी के प्रति निष्ठा रखने वाले का कार्य इसीलिए बहुत ही कठिन है। उसे राष्ट्र का निर्वाह और राष्ट्रभाषा का निर्वाह एक साथ करना है, पर एक के लिए दूसरे की बलि देकर नहीं। विनय और सत्य के लिए आग्रह एक दूसरे के विरोधी नहीं, पूरक हैं, इस विश्वास के साथ हिंदी-निष्ठ साहित्यसेवियों, विचारकों, कार्यकर्ताओं और शिक्षकों को देश की प्रतिमा हिंदी के साँचे में ढालते रहना चाहिए। देश में राष्ट्रीय मूल्यों की प्रतिष्ठा एक दिन होकर रहेगी।
३. निबन्ध का प्रतिपाद्य एवं सारांश
'राष्ट्रभाषा की समस्या' निबन्ध का मूल प्रतिपाद्य यह स्पष्ट करना है कि हिंदी की समस्या संसाधनों या शब्दकोशों की कमी नहीं, बल्कि राष्ट्रबोध और निष्ठा का अभाव है। डॉ. विद्यानिवास मिश्र के अनुसार, हिंदी को राष्ट्रभाषा किसी कानून या बहुमत ने नहीं, बल्कि संतों की भक्ति और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास ने बनाया है। सारांशतः, निबन्ध यह रेखांकित करता है कि स्वाधीनता के बाद बुद्धिजीवी वर्ग ने राष्ट्रभाषा के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भुला दिया और इसे केवल 'बुद्धि-विलास' की वस्तु बना दिया। लेखक का मानना है कि हिंदी किसी दूसरी भारतीय भाषा की प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सबकी 'संरक्षिका' और राष्ट्रीय प्रतिभा है। समस्या का समाधान तकनीकी प्रयासों (अनुवाद, शिक्षक) में नहीं, बल्कि संकल्प की दृढ़ता और भावनात्मक तादात्म्य में है। अंततः, लेखक आह्वान करते हैं कि यदि हम हिंदी को राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का पर्याय मान लें, तो यह स्वतः अपने गरिमामयी आसन पर विराजमान हो जाएगी। निष्ठा ही वह कुंजी है जो हर बाधा को समाप्त कर सकती है।
४. निबन्ध तत्वों के आधार पर राष्ट्रभाषा की समस्या की समीक्षा
(क) विषय-वस्तु और ऐतिहासिक विमर्श: डॉ. विद्यानिवास मिश्र ने इस निबन्ध में 'राष्ट्रभाषा' के प्रश्न को केवल भाषायी विवाद से ऊपर उठाकर 'राष्ट्रीय मूल्य' के रूप में स्थापित किया है। विषय-वस्तु की गहराई इस सत्य में निहित है कि हिंदी का विकास इतिहास की उन परतों से हुआ है जहाँ कबीर, तुलसी और गाँधी ने इसे जन-जन की आकांक्षा का स्वर बनाया। लेखक ने बड़े ही शोधपरक ढंग से यह सिद्ध किया है कि हिंदी को 'भूगोल ने नहीं, इतिहास ने बनाया है'। विषय का प्रतिपादन राजनीतिक सत्ता बनाम जन-शक्ति के द्वंद्व को अत्यंत सूक्ष्मता से उकेरता है, जो इसे एक गम्भीर वैचारिक दस्तावेज बनाता है।
(ख) व्यक्तित्व की व्यंजना और सांस्कृतिक पीड़ा: निबन्ध में लेखक का एक सजग सांस्कृतिक योद्धा और हिन्दी प्रेमी व्यक्तित्व उभरता है। स्वाधीनता के बाद बुद्धिजीवियों के 'नैशविहार' और 'मूल्यबोध पर पर्दा' पड़ने की बात कहकर उन्होंने अपनी तीव्र पीड़ा व्यक्त की है। मिश्र जी का व्यक्तित्व यहाँ उस निष्ठावान सेनानी का है, जिसने राहुल सांकृत्यायन के साथ मिलकर मात्र सात दिनों में संविधान का सहज अनुवाद कर चुनौती स्वीकार की थी। उनका व्यक्तित्व कोरे पांडित्य का नहीं, बल्कि 'भाषा के साथ जीने' का पक्षधर है, जो उनके सांस्कृतिक उदारवाद का परिचयक है।
(ग) भाषा-शैली और प्रतीकात्मकता: निबन्ध की भाषा संस्कृतनिष्ठ, परिमार्जित और अत्यंत ओजस्वी है। शैली में 'विचारात्मकता' के साथ 'भावुकता' का अद्भुत समन्वय है। उन्होंने 'कण्टकाकीर्ण पंथ' और 'मखमली फर्श' जैसे प्रतीकों का प्रयोग कर क्रांतिकारी और सुविधाभोगी वर्गों के बीच के अंतर को स्पष्ट किया है। "आकाश सत्ताईस नक्षत्रों में विभक्त दिखता है" जैसे लाक्षणिक प्रयोगों से शैली में दार्शनिक गम्भीरता आई है। मिश्र जी की तार्किकता इस बात में दिखती है कि वे हिंदी को किसी भाषा की 'प्रतिस्पर्धी' नहीं बल्कि 'राष्ट्रीय प्रतिभा' मानते हैं, जो भाषायी सद्भाव का मार्ग प्रशस्त करती है।
(घ) वैचारिक स्पष्टता और तार्किक निष्कर्ष: समीक्षा का यह पक्ष अत्यंत महत्वपूर्ण है कि लेखक ने संसाधनों (शब्दकोश, अनुवाद) के अभाव को 'समस्या' मानने से इनकार कर दिया है। उनका तर्क है कि समस्या 'निष्ठा' (Loyalty) की है। वे 'भावनात्मक एकता' के नारों और 'बुद्धि-विलास' के खोखलेपन पर करारी चोट करते हैं। निबन्ध का संरचनात्मक ढांचा पाठक को इतिहास के स्वाभिमान से जोड़ते हुए वर्तमान की विडंबनाओं से टकराने के लिए तैयार करता है। उनका यह विचार कि 'विनाश की आशंका' या 'भीतरी श्रद्धा' ही निष्ठा ला सकती है, मानवीय मनोविज्ञान की गहरी समझ को दर्शाता है।
(ङ) उद्देश्य और राष्ट्रीय प्रासंगिकता: निबन्ध का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रभाषा के प्रश्न को दलीय राजनीति से निकालकर 'राष्ट्रबोध' के धरातल पर लाना है। आज के वैश्विक युग में, जहाँ हम अपनी भाषायी पहचान को लेकर संशय में हैं, मिश्र जी की यह समीक्षा एक दिशा-निर्देश की तरह है। यह निबन्ध यह संदेश देता है कि हिंदी की रक्षा वास्तव में राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा है। लेखक की यह चेतावनी कि 'इतिहास काट दिया जाए तो हिंदुस्तान नहीं रहेगा', आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी रचना के समय थी। यह निबन्ध हिन्दी के गौरव को पुनर्जीवित करने का एक सशक्त माध्यम है।
५. कठिन शब्दावली
६. परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
उत्तर : लेखक के अनुसार कोई भाषा संख्या बल या केवल सांस्कृतिक संपदा से राष्ट्रभाषा नहीं बनती, बल्कि वह अपने बोलने वालों की 'निष्ठा' के बल पर राष्ट्रभाषा बनती है, जब राष्ट्रवासी उसे अपनी प्रतिष्ठा का पर्याय मानते हैं।
उत्तर : मध्य युग में नामदेव, कबीर, नानक, तुलसी, जायसी और सूर जैसे संतों और कवियों ने हिंदी को भक्ति की धारा से जोड़कर साधारण जन के उत्थान की भाषा बनाया और इसे प्रतिष्ठित किया।
उत्तर : हिंदी राष्ट्रीय स्वाधीनता की मुख्य वाहिका बनी। महात्मा गाँधी के नेतृत्व में स्वदेशी और हिंदी स्वाधीनता के पर्याय बन गए और इसी के माध्यम से अदम्य विद्रोह की अभिव्यक्ति हुई।
उत्तर : इसका आशय है कि हिंदी केवल किसी क्षेत्र विशेष की भाषा होने के कारण नहीं, बल्कि स्वाधीनता संग्राम के गौरवशाली इतिहास और संतों की सांस्कृतिक चेतना के कारण राष्ट्रभाषा बनी है।
उत्तर : लेखक को दुख है कि स्वाधीनता के बाद बुद्धिजीवी वर्ग में 'मूल्य-बोध' का अभाव हो गया। वे भाषा के साथ जीने के बजाय केवल 'बुद्धि-विलास' और अपनी सुविधाओं में उलझ गए और राष्ट्रभाषा की प्रतिष्ठा को भूल गए।
उत्तर : लेखक के अनुसार सबसे प्रमुख समस्या राष्ट्रबोध की कमी, राष्ट्रभाषा के प्रति प्रतिष्ठाबोध का अभाव और बुद्धिजीवियों का हिंदी के साथ तादात्म्य (जुड़ाव) न होना है।
उत्तर : हिंदी किसी अन्य भाषा की प्रतिस्पर्धी नहीं है, बल्कि वह राष्ट्रीय हित की 'संरक्षिका' है। जब इसे राष्ट्रीय प्रतिभा मान लिया जाएगा, तो यह अन्य भाषाओं की समृद्धि को और अधिक विस्तृत करेगी।
उत्तर : यह घटना सिद्ध करती है कि 'संकल्प की दृढ़ता' और 'निष्ठा' के आगे कोई भी बाधा बड़ी नहीं है। राहुल सांकृत्यायन और लेखक ने मात्र सात दिनों में संविधान का सहज अनुवाद कर यह प्रमाणित कर दिया।
उत्तर : लेखक के अनुसार निष्ठा बाहरी दबाव से नहीं आती; यह या तो विनाश की आशंका से उत्पन्न होती है या अपनी संस्कृति से स्वयं को जोड़ने की भीतरी श्रद्धा से आती है।
उत्तर : उन्होंने संदेश दिया है कि राष्ट्र और राष्ट्रभाषा का निर्वाह एक साथ करें और विनय तथा सत्य के प्रति आग्रह रखते हुए देश की प्रतिमा को हिंदी के साँचे में ढालने का निरंतर प्रयास करें।
