निन्दा रस- हरिशंकर परसाई ।

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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निन्दा रस : विस्तृत समीक्षा, सारांश एवं प्रश्नोत्तर

प्रस्तुत लेख में हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई द्वारा रचित प्रसिद्ध व्यंग्य 'निन्दा रस' का सम्पूर्ण विश्लेषण है। इसमें निंदा की मनोवैज्ञानिक जड़ों, सामाजिक विसंगतियों और मानवीय स्वभाव के खोखलेपन पर तीखा प्रहार किया गया है।

निबन्ध : निन्दा रस
निबन्धकार : हरिशंकर परसाई
युग : स्वतंत्र्योत्तर युग (व्यंग्य विधा)
विधा : व्यंग्य निबन्ध
मूल विषय : निंदा की मनोविज्ञान और सामाजिक ढोंग
भाषा-शैली : तीक्ष्ण व्यंग्यात्मक, बोलचाल की भाषा और तार्किक

१. निबन्धकार का परिचय

हरिशंकर परसाई (1924–1995 ई.) हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल के सर्वश्रेष्ठ और क्रांतिकारी व्यंग्यकार हैं। उन्होंने व्यंग्य को केवल उपहास का साधन न बनाकर उसे सामाजिक और राजनैतिक विसंगतियों के विरुद्ध एक प्रभावी शस्त्र के रूप में विकसित किया। परसाई जी का जन्म मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में हुआ था। उन्होंने 'वसुधा' नामक साहित्यिक पत्रिका का संपादन किया और जीवन भर अपनी लेखनी से भ्रष्टाचार, धार्मिक पाखंड और मध्यमवर्गीय पाखंड पर बेबाक प्रहार किए। उनके प्रमुख व्यंग्य संग्रहों में 'ठिठुरता हुआ गणतंत्र', 'भूत के पाँव पीछे', 'सदाचार का तावीज', 'शिकायत मुझे भी है' और 'पगडंडियों का जमाना' अत्यंत चर्चित हैं। उन्हें 'विकलांग श्रद्धा का दौर' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। परसाई जी की भाषा अत्यंत सरल, मारक और तार्किक है, जो पाठक को हंसते-हंसते समाज की कड़वी सच्चाइयों से रूबरू करा देती है। वे वास्तव में हिन्दी व्यंग्य विधा के युग-प्रवर्तक शिल्पी थे।

२. मूल पाठ

‘क' कई महीने बाद आए थे। सुबह चाय पीकर अखबार देख रहा था कि वे तूफान की तरह कमरे में घुसे, साइक्लोन जैसा मुझे भुजाओं में जकड़ लिया। मुझे धृतराष्ट्र की भुजाओं में जकड़े भीम के पुतले की याद गई। जब धृतराष्ट्र की पकड़ में भीम का पुतला गया तो उन्होंने प्राणघाती स्नेह से उसे जकड़कर चूर कर डाला। ‘क' से क्या मैं गले मिला? हरगिज नहीं। मैंने शरीर से मन को चुपचाप खिसका दिया। पुतला उसकी भुजाओं में सौंप दिया। मुझे मालूम था कि मैं धृतराष्ट्र से मिल रहा हूं। पिछली रात को एक मित्र ने बताया कि ‘क' अपनी ससुराल आया है और ‘ग' के साथ बैठकर शाम को दो-तीन घंटे तुम्हारी निंदा करता रहा। छल का धृतराष्ट्र जब आलिंगन करे, तो पुतला ही आगे बढ़ाना चाहिए।

पर वह मेरा दोस्त अभिनय में पूरा है। उसके आंसू-भर नहीं आए, बाकी मिलन के हर्षोल्लास के सब चिह्न प्रकट हो गए। वह गहरी आत्मीयता की जकड़, नयनों से छलकता वह असीम स्नेह और वह स्नेहसिक्त वाणी। बोला, ‘अभी सुबह गाड़ी से उतरा और एकदम तुमसे मिलने चला आया, जैसे आत्मा का एक खंड दूसरे खंड से मिलने को आतुर रहता है।' आते ही झूठ बोला। कल का आया है, यह मुझे मेरा मित्र बता गया था। कुछ लोग बड़े निर्दोश मिथ्यावादी होते हैं, वे आदतन, प्रकृति के वशीभूत झूठ बोलते हैं। उनके मुख से निष्प्रयास, निष्प्रायोजन झूठ ही निकलता है। मेरे एक रिश्तेदार ऐसे हैं। वे अगर बंबई जा रहे हैं और उनसे पूछें, तो वे कहेंगे, ‘कलकत्ता जा रहा हूं।' ठीक बात उनके मुंह से निकल नहीं सकती।

वह बैठा और ‘ग' की निंदा आरंभ कर दी। मनुष्य के लिए जो भी कर्म जघन्य है, वे सब ‘ग' पर आरोपित करके उसने ऐसे गाढ़े काले तारकोल से उसकी तस्वीर खींची कि मैं यह सोचकर कांप उठा कि ऐसी ही काली तस्वीर मेरी ‘ग' के सामने इसने कल शाम को खींची होगी। सुबह से बातचीत के एजेंडा में ‘ग' प्रमुख विषय था। अद्‌भुत है मेरा मित्र। उसके पास दोषों का ‘कैटलॉग' है। मैंने सोचा कि जब यह हर परिचित की निंदा कर रहा है, तो क्यों मैं लगे हाथ अपने विरोधियों की गत इसके हाथों करा लूं। मैं विरोधियों के नाम लेता गया और वह निंदा की तलवार से काटता चला गया। जैसे लकड़ी चीरने की आरा मशीन के नीचे मजदूर लकड़ी काटता है, वैसे ही।

मेरे मन में गत रात्रि उस निंदक मित्र के प्रति मैल नहीं रहा। दोनों एक हो गए। तीन चार घंटे बाद जब वह विदा हुआ तो मन में शांति और तुष्टि थी। निंदा की ऐसी ही महिमा है। निंदकों की सी एकाग्रता, परस्पर आत्मीयता, निमग्नता भक्तों में दुर्लभ है। इसलिए संतों ने निंदकों को ‘आंगन कुटी छवाय' पास रखने की सलाह दी है। निंदा कुछ लोगों के लिए टॉनिक होती है। हमारी एक पड़ोसन वृद्धा बीमार थी। उठा नहीं जाता था। सहसा किसी ने आकर कहा कि पड़ोसी डॉक्टर साहब की लड़की किसी के साथ भाग गई। बस चाची उठी और दो-चार पड़ोसियों को यह बात अपने व्यक्तिगत ‘कमेंट' के साथ सुना आई। उस दिन से उनकी हालत सुधरने लगी।

ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निंदा भी होती है। लेकिन इसमें वह मजा नहीं, जो मिशनरी भाव से निंदा करने में आता है। निंदकों को दंड देने की जरूरत नहीं, खुद ही दंडित है। आप चैन से सोइए और वह जलन के कारण सो नहीं पाता। निंदा का उद्‌गम हीनता और कमजोरी से होता है। निंदा करके उसके अहं को तुष्टि मिलती है। ज्यों कर्म क्षीण होता जाता है, त्यों निंदा की प्रवृत्ति में दिनोंदिन इजाफा होता चला जाता है। इंद्र को बड़ा ईर्ष्यालू माना जाता है, क्योंकि वह निठल्ला है। स्वर्ग में देवताओं को बिना उगाया अन्न, महल मिल जाते हैं। अकर्मण्यता में उन्हें अप्रतिष्ठित होने का भय बना रहता है, इसलिए कर्मी मनुष्य से उन्हें ईर्ष्या होने लगती है।

निंदा कुछ लोगों की पूंजी होती है। बड़ा लंबा-चौड़ा व्यापार फैलाते हैं वे इस पूंजी से। कई लोगों की ‘रिस्पेक्टेबिलिटी' (प्रतिष्ठा) ही दूसरों की कलंक-कथाओं के पारायण पर आधारित होती है। आप इनके पास बैठिए और सुन लीजिए, ‘बड़ा खराब जमाना गया। तुमने सुना? फलां...और अमुक...।' अपने चरित्र पर आंख डालकर देखने की इन्हें फुरसत नहीं होती। चेख़व की एक कहानी याद रही है। एक स्त्री किसी सहेली के पति की निंदा अपने पति से कर रही है। वह बड़ा उचक्का दगाबाज आदमी है। बेईमानी से पैसा कमाता है। कहती है कि मैं उस सहेली की जगह होती तो ऐसे पति को त्याग देती। तब उसका पति उसके सामने यह रहस्य खोलता है कि वह स्वयं बेईमानी से इतना पैसा लाता है। सुनकर स्त्री स्तब्ध रह जाती है। क्या उसने पति को त्याग दिया? जी हां, वह दूसरे कमरे में चली गई।

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम में जो करने की क्षमता नहीं है, वह यदि कोई करता है तो हमारे अहम् को धक्का लगता है, हम में हीनता और ग्लानि आती है। तब हम उसकी निंदा करके उससे अपने को अच्छा समझकर तुष्ट होते हैं। उस मित्र की मुलाकात के करीब दस-बारह घंटे बाद यह सब मन में रहा है। अब कुछ तटस्थ हो गया हूं। सुबह जब उसके साथ बैठा था तब मैं स्वयं निंदा के ‘काला सागर' में डूबता-उतरता था, कलोल कर रहा था। बड़ा रस है निंदा में। सूरदास ने इसे ‘निंदा सबद रसाल' कहा है।

३. निबन्ध का प्रतिपाद्य एवं सारांश

'निन्दा रस' निबन्ध का मूल प्रतिपाद्य निंदा के पीछे छिपे मनोविज्ञान और सामाजिक पाखंड को उजागर करना है। हरिशंकर परसाई ने बड़ी ही सूक्ष्मता से यह सिद्ध किया है कि निंदा केवल बुराई नहीं है, बल्कि यह एक प्रकार का 'रस' (Tonic) है जो ईर्ष्यालु और कर्महीन व्यक्तियों को मानसिक शांति प्रदान करता है। सारांशतः, निबन्ध की शुरुआत लेखक के एक मित्र 'क' के आगमन से होती है, जो आत्मीयता का ढोंग तो करता है, किन्तु लेखक की पीठ पीछे उसकी जमकर बुराई कर चुका है। लेखक उसे 'धृतराष्ट्र' की संज्ञा देते हैं। निबन्ध यह बताता है कि निंदा का जन्म वास्तव में हीनता की भावना और अकर्मण्यता से होता है। जो व्यक्ति स्वयं कुछ नहीं कर पाते, वे दूसरों के चरित्र पर 'तारकोल' पोतकर अपने अहं को तुष्ट करते हैं। परसाई जी ने स्वर्ग के देवताओं और निठल्ले इंद्र का उदाहरण देकर यह समझाया है कि व्यस्त व्यक्ति के पास निंदा के लिए समय नहीं होता। अंततः, यह निबन्ध समाज के उस कड़वे सच को सामने रखता है जहाँ लोगों की प्रतिष्ठा दूसरों की बुराई करने पर टिकी है।

४. निबन्ध तत्वों के आधार पर निन्दा रस की समीक्षा

(क) विषय-वस्तु और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: हरिशंकर परसाई ने इस निबन्ध में 'निंदा' को एक शास्त्रीय रस के रूप में प्रस्तुत कर मानवीय प्रवृत्तियों का गहरा विश्लेषण किया है। विषय-वस्तु केवल एक व्यक्तिगत घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सार्वभौमिक मानवीय कमजोरी पर शोधपरक दृष्टि डालती है। लेखक ने निंदा के विभिन्न रूपों की चर्चा की है—ईर्ष्या से प्रेरित निंदा, अकर्मण्यता से उत्पन्न निंदा और 'मिशनरी' भाव वाली निंदा। उन्होंने बड़ी ही तार्किकता से यह स्थापित किया है कि निंदा का मूल स्रोत 'हीनता' (Inferiority complex) है। जब मनुष्य दूसरे की योग्यता की बराबरी नहीं कर पाता, तब वह निंदा की तलवार से उसे काटकर स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करता है।

(ख) व्यक्तित्व की व्यंजना और तटस्थता: निबन्ध में लेखक का व्यक्तित्व एक सजग और तटस्थ (Objective) प्रेक्षक का है। वे स्वयं को भी इस 'निंदा रस' से अछूता नहीं बताते। जब वे अपने मित्र के साथ बैठकर विरोधियों की 'गत' बनाते हैं, तो वे स्वीकार करते हैं कि वे स्वयं उस समय 'निंदा के काला सागर' में कलोल कर रहे थे। यह स्वीकारोक्ति उनके व्यक्तित्व की ईमानदारी और व्यंग्य की गहराई को दर्शाती है। परसाई जी का व्यक्तित्व यहाँ उस आलोचक का है जो समाज को आईना दिखाते समय स्वयं भी उसके सामने खड़ा होता है।

(ग) भाषा-शैली और प्रतीकात्मकता: निबन्ध की भाषा अत्यंत तीक्ष्ण, चुटीली और मुहावरेदार है। शैली में 'संवादात्मकता' और 'चित्रात्मकता' का अद्भुत समन्वय है। 'धृतराष्ट्र की जकड़' और 'भीम का पुतला' का रूपक विश्वासघात और छद्म स्नेह को व्यक्त करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली है। "काले तारकोल से तस्वीर खींचना" और "दोषों का कैटलॉग" जैसे शब्दों का प्रयोग भाषा में आधुनिकता और मारक क्षमता भर देता है। लेखक ने हिन्दी के तत्सम शब्दों के साथ अंग्रेजी के शब्दों (एजेंडा, टॉनिक, कमेंट, मिशनरी) का ऐसा सहज प्रयोग किया है कि व्यंग्य अधिक प्रभावशाली बन पड़ा है।

(घ) संरचनात्मक तर्कशीलता और व्यंग्य का उद्देश्य: समीक्षा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष निबन्ध की तार्किक संरचना है। परसाई जी मित्र के मिलन से बात शुरू करते हैं और क्रमशः निंदा की जड़ों (हीनता, अकर्मण्यता) तक पहुँचते हैं। वे इंद्र और स्वर्ग के देवताओं का उदाहरण देकर पौराणिक मान्यताओं को सामाजिक यथार्थ से जोड़ते हैं। चेख़व की कहानी का सन्दर्भ निबन्ध के वैचारिक फलक को वैश्विक विस्तार देता है। निबन्ध का मुख्य उद्देश्य समाज में व्याप्त 'कलंक-कथाओं के पारायण' की प्रवृत्ति पर चोट करना और मनुष्य को आत्म-निरीक्षण के लिए विवश करना है।

(ङ) प्रासंगिकता और निष्कर्ष: आज के 'सोशल मीडिया' और सूचना-क्रांति के युग में, जहाँ चरित्र-हनन (Character assassination) एक आम बात हो गई है, परसाई जी की यह समीक्षा और भी सटीक बैठती है। यह निबन्ध यह संदेश देता है कि निंदा करने वाला व्यक्ति वास्तव में स्वयं अपनी आंतरिक कमजोरी का प्रदर्शन कर रहा होता है। सूरदास के "निंदा सबद रसाल" के उल्लेख के साथ निबन्ध का अंत इसे एक शास्त्रीय गरिमा प्रदान करता है। यह हिन्दी साहित्य का एक कालजयी व्यंग्य है।

५. कठिन शब्दावली

साइक्लोन = चक्रवात/तूफान, प्राणघाती = जान लेने वाला, स्नेहसिक्त = प्रेम से भीगी हुई, मिथ्यावादी = झूठ बोलने वाला, निष्प्रयोजन = बिना किसी उद्देश्य के, जघन्य = अत्यंत घिनौना, आरोपित = थोपा हुआ, तारकोल = डामर/काला पदार्थ, कैटलॉग = सूची/तालिका, तुष्टि = संतुष्टि, निमग्नता = पूरी तरह डूबा होना, टॉनिक = शक्तिवर्धक दवा, मिशनरी = धर्म प्रचारक जैसी लगन, उद्‌गम = स्रोत/निकलने का स्थान, इजाफा = बढ़ोतरी, अकर्मण्यता = आलस्य/निकम्मापन, पारायण = बार-बार पढ़ना या जपना, Character = चरित्र, उचक्का = उठाईगीर/ठग, स्तब्ध = हैरान, अहम् = अहंकार/घमंड, ग्लानि = पश्चाताप, कलोल = क्रीड़ा/मौज-मस्ती, रसाल = रसीला, तटस्थ = निष्पक्ष, आलिंगन = गले मिलना, आदुर = बेचैन, प्रकट = सामने आना, हर्षोल्लास = अत्यधिक ख़ुशी, भय = डर, गत = हालत/दशा,

६. परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्र. 1. लेखक ने मित्र 'क' के गले मिलने की तुलना धृतराष्ट्र और भीम के पुतले से क्यों की है?

उत्तर : क्योंकि धृतराष्ट्र ने भीम को मारने की इच्छा से जकड़ा था, वैसे ही लेखक का मित्र 'क' भी ऊपर से स्नेह दिखा रहा था, जबकि वह अंदर से लेखक के प्रति ईर्ष्या और निंदा का भाव रखता था।

प्र. 2. निबन्ध के अनुसार 'निष्ठावान निंदक' की क्या विशेषता होती है?

उत्तर : निष्ठावान निंदक बड़ी ही लगन और 'मिशनरी' भाव से दूसरों की बुराई करता है। उसे दोषों का 'कैटलॉग' याद रहता है और वह दूसरों के चरित्र पर कालिख पोतने में ही आनंद पाता है।

प्र. 3. लेखक ने निंदा को 'टॉनिक' क्यों कहा है?

उत्तर : लेखक ने बीमार पड़ोसन का उदाहरण देकर बताया है कि दूसरों की बुराई या कलंक की चर्चा सुनने से कुछ लोगों के भीतर नया उत्साह और ऊर्जा का संचार हो जाता है, जिससे उनकी सेहत सुधरने लगती है।

प्र. 4. निंदा की उत्पत्ति के मुख्य कारण लेखक ने क्या बताए हैं?

उत्तर : निंदा की उत्पत्ति का मुख्य कारण हीनता की भावना, कमजोरी और अकर्मण्यता (निकम्मापन) है। जब व्यक्ति खुद असफल होता है, तब वह दूसरों की निंदा कर अपने अहं को संतुष्ट करता है।

प्र. 5. इंद्र को ईर्ष्यालु और निंदक क्यों माना गया है?

उत्तर : क्योंकि इंद्र निठल्ला है। स्वर्ग में देवताओं को बिना मेहनत के सब कुछ मिल जाता है, इसलिए उनमें अकर्मण्यता के कारण असुरक्षा और कर्मठ मनुष्यों के प्रति ईर्ष्या पैदा होती है।

प्र. 6. "निंदा कुछ लोगों की पूंजी होती है"—इस कथन का क्या आशय है?

उत्तर : इसका अर्थ है कि कुछ लोगों का सामाजिक अस्तित्व और प्रतिष्ठा केवल दूसरों की बुराई करने पर टिकी होती है। वे इसी 'बुराई की पूंजी' से अपना सामाजिक व्यापार चलाते हैं।

प्र. 7. चेख़व की कहानी के माध्यम से लेखक क्या संदेश देना चाहता है?

उत्तर : चेख़व की कहानी के माध्यम से लेखक यह बताता है कि लोग दूसरों के चरित्र में तो बड़ी आसानी से दोष खोज लेते हैं, किन्तु स्वयं के चरित्र की बड़ी से बड़ी बुराइयों की भी अनदेखी कर देते हैं।

प्र. 8. संतों ने निंदकों को अपने पास ('आंगन कुटी छवाय') रखने की सलाह क्यों दी है?

उत्तर : क्योंकि निंदक बिना साबुन और पानी के (अर्थात बिना किसी लागत के) व्यक्ति की कमियों को बताकर उसके चरित्र को साफ और निर्मल करने में सहायक होते हैं।

प्र. 9. "निंदा सबद रसाल"—सूरदास की इस पंक्ति का निबन्ध के संदर्भ में क्या महत्व है?

उत्तर : यह पंक्ति निंदा में छिपे 'आनंद' या 'रस' को प्रमाणित करती है। लेखक के अनुसार निंदा में एक ऐसा रस है जिसमें डूबकर लोग सब कुछ भूल जाते हैं।

प्र. 10. इस निबन्ध का मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर : निबन्ध का उद्देश्य मानवीय स्वभाव की इस ओछी प्रवृत्ति (निंदा) पर करारा प्रहार करना और समाज को नैतिक गिरावट के प्रति सचेत करना है।

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