भारत की सांस्कृतिक एकता-श्री रामधारी सिंह 'दिनकर'

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
0

भारत की सांस्कृतिक एकता : विस्तृत समीक्षा, सारांश एवं प्रश्नोत्तर

प्रस्तुत लेख में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा रचित प्रसिद्ध निबन्ध 'भारत की सांस्कृतिक एकता' का सम्पूर्ण विश्लेषण है। इसमें भारत की भौगोलिक और भाषायी विविधताओं के बीच प्रवाहित होने वाली अंतर्निहित एकता के सूत्रों को ऐतिहासिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट किया गया है।

निबन्ध : भारत की सांस्कृतिक एकता
निबन्धकार : रामधारी सिंह 'दिनकर'
युग : शुक्ल्योत्तर युग (आधुनिक काल)
विधा : विचारात्मक एवं सांस्कृतिक निबन्ध
मूल विषय : विविधताओं में एकता एवं राष्ट्रीय समन्वय
भाषा-शैली : प्रांजल, बोधगम्य, तर्कपूर्ण एवं गवेषणात्मक

१. निबन्धकार का परिचय

रामधारी सिंह 'दिनकर' (1908–1974 ई.) आधुनिक हिन्दी साहित्य के ओजस्वी कवि और श्रेष्ठ गद्यकार हैं। उन्हें 'राष्ट्रकवि' के रूप में ख्याति प्राप्त है। दिनकर जी का गद्य उनके काव्य के समान ही सशक्त, विचारोत्तेजक और सांस्कृतिक चेतना से ओत-प्रोत है। उनकी कालजयी रचना 'संस्कृति के चार अध्याय' भारतीय इतिहास और संस्कृति की गम्भीर व्याख्या प्रस्तुत करती है, जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दिनकर जी की दृष्टि समन्वयवादी थी; वे भारतीय गौरव को पुनर्जीवित करने के साथ-साथ आधुनिक प्रगतिशील मूल्यों के भी पक्षधर थे। उनके निबन्धों में तार्किकता और राष्ट्रीयता का अद्भुत संगम मिलता है। 'उर्वशी' के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाले दिनकर जी ने भारतीय संसद के सदस्य के रूप में भी देश की सेवा की। उनकी भाषा प्रांजल खड़ी बोली है, जो गम्भीर विषयों को भी अत्यंत सहज और प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने में सक्षम है।

२. मूल पाठ

अक्सर कहा जाता है कि भारतवर्ष की एकता उसकी विविधताओं में छिपी हुई है, और यह बात जरा भी गलत नहीं है, क्योंकि अपने देश की एकता जितनी प्रकट है, उसकी विविधताएँ भी उतनी ही प्रत्यक्ष हैं।

भारतवर्ष के नक्शे को ध्यान से देखने पर यह साफ दिखाई पड़ता है कि इस देश के तीन भाग प्राकृतिक दृष्टि से बिल्कुल स्पष्ट हैं। सबसे पहले तो भारत का उत्तरी भाग है, जो लगभग हिमालय के दक्षिण से लेकर विंध्याचल के उत्तर तक फैला हुआ है। उसके बाद विंध्य से लेकर कृष्णा नदी के उत्तर तक फैला हुआ है। जिसे हम दक्षिणी प्लेटो कहते हैं। इस प्लेटों के दक्षिण, कृष्णा नदी से लेकर कुमारी अंतरीप तक का जो भाग है, वह प्रायद्वीप जैसा है। अचरज की बात है कि प्रकृति ने भारत के जो ये तीन खंड किए हैं, वे ही खंड भारतवर्ष के इतिहास के भी तीन क्रीडास्थल रहे हैं। पुराने समय में उत्तर भारत में जो राज्य कायम किए गए, उनमें से अधिकांश विंध्य की उत्तरी सीमा तक ही फैलकर रह गये। विंध्य को लाँघकर उत्तर भारत को दक्षिण भारत से मिलाने की कोशिश तो बहुत की गई, मगर इस काम में कामयाबी किसी-किसी को ही मिली। कहते हैं, पहले-पहल अगस्त्य ऋषि ने विंध्याचल को पार करके दक्षिण के लोगों को अपना संदेश सुनाया था। फिर भगवान श्री रामचंद्र ने लंका पर चढ़ाई करने के सिलसिले में विंध्याचल को पार किया। महाभारत के जमाने में उत्तर और दक्षिणी भारत के अंश एक राज्य के अधीन थे या नहीं, इसका कोई पक्का सबूत नहीं मिलता, लेकिन, रामचंद्र जी ने उत्तरी और दक्षिणी भारत के बीच जो एकता स्थापित की, वह महाभारत काल में भी कायम थी और दोनों भागों के लोग आपस में मिलते जुलते रहते थे। महाराज युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ में दक्षिण के राजे भी आए थे और कुरुक्षेत्र के मैदान में जो महायुद्ध हुआ था, उसमें भी दक्षिण के वीरों ने हिस्सा लिया था। इसका प्रमाण महाभारत में ही मौजूद है। इसी तरह चंद्रगुप्त, अशोक, विक्रमादित्य और उसके बाद मुगलों ने भी इस बात के लिए बड़ी कोशिश की कि किसी तरह सारा देश एक शासन के अधीन लाया जा सके, और उन्हें इस कार्य में सफलता भी मिली। लेकिन भारत के इतिहास की एक शिक्षा यह भी है कि देश को एक रखने के काम में यहाँ के राजाओं को जो भी सफलता मिली, वह ज्यादा टिकाऊ नहीं हो सकी। इस देश के प्राकृतिक ढाँचे में ही कोई ऐसी बात थी, जो सारे देश को एक रहने देने के खिलाफ पड़ती थी। यही कारण था कि जब कोई भी बलवान और दूरदर्शी राजा इस काम में लगा, सफलता थोड़ी बहुत उसे जरूर मिली, लेकिन स्वार्थी, अदूरदर्शी और कमजोर राजाओं के आते ही देश की एकता टूट गई। और जो कठिनाई बिन्ध्य के उत्तर को विन्ध्य के दक्षिण में हुई, वही कठिनाई कृष्णा नदी से उत्तर के भाग को उसके दक्षिण के भाग से मिलाकर एक रखने में होती रही।

इस देश में वैर-फूट का भाव इतना प्रबल क्यों रहा, इसके भी कारण हैं। बड़ी-बड़ी नदियों और बड़े-बड़े पहाड़ों के गुण अनेक हैं। लेकिन उनमें एक अवगुण भी होता है कि वे जहाँ रहते हैं, वहाँ देश के भीतर अलग-अलग क्षेत्र बना देते हैं और इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के भीतर एक तरह की प्रांतीयता या क्षेत्रीय जोश पैदा हो जाता है। यह देश है बहुत विशाल। इसके उत्तरी छोर पर कश्मीर पड़ता है, जिसकी जलवायु लगभग मध्य एशिया की जलवायु के समान है। इसके विपरीत भारत के दक्षिण छोर पर कुमारी अंतरीप है, जहाँ के घरों की रचना और लोगों के रंग-रूप आदि में श्रीलंका या सीलोन का नमूना शुरू हो जाता है। चेरापूँजी भी इसी देश में है, जहाँ साल में पाँच सौ इंच से अधिक वर्षा होती है, और थार की मरुभूमि भी यहीं है, जहाँ वर्षा होती ही नहीं, अथवा नाममात्र को होती है।

जलवायु एवं क्षेत्रीय सुविधा के अनुसार ही लोगों के पहनावे-ओढ़ावे और खानपान में भी भेद हो जाता है। जो भेद भारत में बहुत ही प्रत्यक्ष है। असल में, इन भेदों को मिटाकर अगर हम कोई एक राष्ट्रीय ढंग चलाना चाहे तो उससे अनेक लोगों को बहुत ज्यादा तकलीफ हो जाएगी। उदाहरण के लिए अगर हम रोटी और उड़द की दाल अथवा रोटी और मांस को देश का राष्ट्रीय भोजन बना दें, तो पंजाबी लोग तो मजे मे रहेंगे लेकिन बिहारी और बंगाल के लोगों का हाल बुरा हो जाएगा। इसी तरह, अगर हम यह कानून बना दें कि हर हिंदुस्तानी को चप्पल पहनना ही होगा तो काश्मीर के लोग घबरा उठेंगे, क्योंकि पहाड़ पर चलने वालों के पाँवों में चप्पल ठीक-ठाक नहीं चल सकते। पहनावे-ओढ़ावे में भी जगह-जगह भिन्नता मिलाती है और पोशाकें भी जलवायु एवं क्षेत्रीय की सुविधा के अनुसार ही यहाँ तरह-तरह की फैली हुई है।

मगर, विविधता का सबसे बड़ा लक्षण यह है कि हमारे देश में अनेक प्रकार की भाषाएँ फैली हुई हैं और इनके कारण हम आपस में भी अजनबी के समान हो जाते हैं। उत्तर भारत में तो गुजरात से लेकर बंगाल तक की जनता के बीच संपर्क खूब हुआ है, इसलिए वहाँ भाषा-भेद की कठिनाई उतनी नहीं अखरती। लेकिन, अगर कोई उत्तर-भारतवासी दक्षिण चला जाए अथवा कोई दक्षिण-भारतीय उत्तर चला जाए और वह अपनी मातृभाषा के सिवा अन्य की भाषा नहीं जानता हो तो वह, सचमुच बड़ी मुश्किल में पड़ जाएगा। भाषा-भेद की यह समस्या हमारी राष्ट्रीय एकता की सबसे बड़ी बाधा है। राष्ट्रीय एकता में पहले यह बाधा थी कि पहाड़ों और नदियों को लाँघना आसान नहीं था। मगर, अब विज्ञान के अनेक सुगम साधनों के उपलब्ध हो जाने से वह बाधा दूर हो गई है। आज अगर देश के एक कोने में अकाल पड़ता है तो दूसरे कोने से अनाज यहाँ तुरंत पहुँचा दिया जाता है। इसी प्रकार पहले जब देश के एक कोने में विद्रोह होता था, तब दूसरे कोने में पड़ा हुआ राजा जल्दी से फौज भेजकर उसे दबा नहीं सकता था और विद्रोह की सफलता से देश की एकता टूट जाती थी। लेकिन आज तो देश के चाहे जिस कोने में भी विद्रोह हो, हम दिल्ली से फौज भेज उसे तुरंत दबा सकते हैं। प्राकृतिक बाधाएँ खत्म हो गई हैं यही कारण है कि आज हमारी एकता इतनी विशाल हो गई है जितनी विशाल रामायण, मौर्य और मुगल जमानों में भी कभी नहीं हुई थी। अब भी जो क्षेत्रीय जोश या प्रान्तीय मोह बाकी है, वह धीरे-धीरे कम हो जाएगा, क्योंकि इस जोश को पालनेवाली प्राकृतिक बाधाएँ अब शेष नहीं है। मगर, भाषा-भेद की समस्या जरा कठिन है और उसका हल तभी निकलेगा जब हिंदी-भाषा का अच्छा प्रचार हो जाए। सौभाग्य की बात है कि इस दिशा में काम शुरू हो गए हैं और कुछ समय बीतते-बीतते हम इस बाधा पर भी विजय प्राप्त कर लेंगे।

यह तो हुई भारत की विविधता की कहानी। अब जरा यह देखने की कोशिश करनी चाहिए कि इस विविधता के भीतर हमारी एकता कहाँ छिपी हुई है। सबसे विचित्र बात तो यह है कि यद्यपि हम अनेक भाषाएँ बोलते हैं (जिनमें चौदह भाषाएँ तो ऐसी हैं, जिन्हें भारत सरकार ने स्वीकृति दे रखी है। ये भाषाएँ है- हिंदी, उर्दू, बंगला, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलुगू, मलयालम, कन्नड़, उड़िया, पंजाबी, कश्मीरी और संस्कृत), किंतु भिन्न-भिन्न भाषाओं के भीतर बहने वाली हमारी भावनधारा एक है, तथा हम प्रायः एक ही तरह के विचारों और कथा-वस्तुओं को लेकर अपनी-अपनी बोली में साहित्य रचना करते हैं। रामायण और महाभारत को लेकर भारत की प्रायः सभी भाषाओं के बीच अद्भुत एकता मिलेगी, इसके सिवा, संस्कृत और प्राकृत में भारत का जो साहित्य लिखा गया था, उसका प्रभाव भी सभी भाषाओं की जड़ में काम कर रहा है। विचारों की एकता जाति की सबसे बड़ी एकता होती है। अतएव भारतीय जनता की एकता के असली आधार भारतीय दर्शन और साहित्य हैं, जो अनेक भाषाओं में लिखे जाने पर भी, अंत में जाकर एक ही साबित होते हैं। यह भी ध्यान देने की बात है कि फारसी लिपि को छोड़ दें तो भारत की अन्य सभी लिपियों की वर्णमाला एक ही है, यद्यपि वह अलग-अलग लिपियों में लिखी जाती हैं। जैसे हम हिंदी में क,ख,ग आदि अक्षर पढ़ते हैं, वैसे ही ये अक्षर भारत की अन्य लिपियों में भी पढ़े जाते हैं, यद्यपि उनके लिखने का ढंग और है।

हमारी एकता का दूसरा प्रमाण यह है कि उत्तर या दक्षिण चाहे जहाँ भी जाएँ, आपको जगह-जगह पर एक ही संस्कृति के मन्दिर दिखाई देंगे, एक तरह के आदमियों से मुलाकात होगी, जो चंदन लगाते हैं, पूजा करते हैं, तीर्थ-व्रत में विश्वास करते हैं और जो नई रोशनी को अपना लेने के कारण इन बातों को कुछ शंका की दृष्टि से देखते हैं। उत्तर भारत के लोगों का जो स्वभाव है, जीवन को देखने की जो उनकी दृष्टि है, वही स्वभाव और वहीं दृष्टि दक्षिण वालों की भी है। भाषा की दीवार के टूटते ही, उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय के बीच कोई भी भेद नहीं रह जाता और वे आपस में एक दूसरे के बहुत करीब आ जाते हैं। असल में, भाषा की दीवार के आर-पार बैठे हुए भी वे एक ही हैं। वे धर्म के अनुयायी और संस्कृति की एक विरासत के भागीदार हैं। उन्होंने देश के आजादी के लिए एक होकर लड़ाई लड़ी और आज उसकी पार्लियामेंट और शासन-विधान भी एक हैं।

और जो बात हिंदुओं के बारे में कही जा रही है, वही बहुत दूर तक मुसलमानों के बारे में भी कही जा सकती है। देश के सभी कोनों में बसने वाले मुसलमानों के भीतर जहाँ एक धर्म को लेकर एक तरह की आपसी एकता है, वहाँ वे संस्कृति की दृष्टि से हिंदुओं के भी बहुत करीब हैं, क्योंकि ज्यादा मुसलमान तो ऐसे ही हैं जिनके पूर्वज हिंदू थे और जो इस्लाम धर्म में जाने के समय अपनी हिंदू आदतें अपने साथ ले गये। इसके सिवा अनेक सदियों तक हिंदू-मुसलमान साथ रहते आए हैं। और इस लंबी संगति के फलस्वरूप उनके बीच संस्कृति और तहजीब की बहुत-सी समान बातें पैदा हो गई हैं, जो उन्हें दिनोंदिन आपस में नज़दीक लाती जा रही हैं।

संसार के हर एक देश पर अगर हम अलग-अलग विचार करें तो हमें पता चलेगा कि प्रत्येक देश की एक निजी सांस्कृतिक विशेषता होती है, जो उस देश के प्रत्येक निवासी की चाल-ढाल, बात-चीत, रहन-सहन, खान-पान, तौर-तरीके और आदतों से टपकती रहती है। चीन से आने वाला आदमी, विलायत से आने वालों के बीच नहीं छिप सकता और यद्यपि अफ्रीका के लोग भी काले ही होते हैं, मगर वे भारतवासियों के बीच नहीं खप सकते। भारतवर्ष में यूरोपीय पोशाकें खूब चली हैं, लेकिन योरोपीय लिबास में सजे हुए हिंदुस्तानियों के बीच एक अंग्रेज को खड़ा कर दिया जाय, तो आसानी से पहचान लिया जाए इस तरह भारत की हिंदू ही नहीं बल्कि हिंदुस्तानी क्रिस्तान पारसियों मुसलमान भारत से बाहर जाने पर वह आसानी से पहचान लिया जाएगा। इसी तरह भारत के हिन्दू ही नहीं,बल्कि हिन्दुस्तानी क्रिस्तान,पारसी और मुसलमान भी भारत से बाहर जाने पर आसानी से पहचान लिये जाते हैं कि वे हिंदुस्तानी हैं। और यह बात कुछ आज पैदा नहीं हुई है, बल्कि इतिहास के किसी काल से भारतवासी भारतवासी ही थे, यही वह सांस्कृतिक एकता या शक्ति है, जो भारत को एक रखे हुए हैं। यही वह विशेषता है, जो उन लोगों में पैदा होती है जो एक देश में रहते हैं, एक तरह की जिंदगी बसर करते हैं और एक तरह के दर्शन और एक तरह की आदतों का विकास करके एक राष्ट्र के सदस्य हो जाते हैं।

३. निबन्ध का प्रतिपाद्य एवं सारांश

'भारत की सांस्कृतिक एकता' निबन्ध का मूल प्रतिपाद्य यह सिद्ध करना है कि भारत की बाहरी विविधताएँ (भूगोल, भाषा, खान-पान) वास्तव में एक गहरी और अटूट सांस्कृतिक एकता की परिचायक हैं। लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' के अनुसार, भारत का प्राकृतिक ढांचा भले ही उसे तीन खंडों में बाँटता हो, किन्तु भगवान राम, कृष्ण और सम्राट अशोक जैसे दूरदर्शी महापुरुषों ने युगों पहले सांस्कृतिक सेतु का निर्माण कर दिया था। सारांशतः, निबन्ध यह स्पष्ट करता है कि विज्ञान के सुगम साधनों ने आज भौगोलिक बाधाओं को समाप्त कर दिया है, जिससे राष्ट्रीय एकता और भी सुदृढ़ हुई है। भाषा का भेद भले ही एक समस्या हो, किन्तु सभी भारतीय भाषाओं के भीतर बहने वाली भावधारा (रामायण, महाभारत, दर्शन) एक ही है। निबन्ध का मुख्य संदेश यह है कि भारत का प्रत्येक निवासी—चाहे वह किसी भी धर्म का हो—विदेश में अपनी विशिष्ट 'हिंदुस्तानी' आदतों और रहन-सहन से पहचाना जाता है। यही साझा इतिहास और जीवन-दर्शन हमारी वास्तविक शक्ति है।

४. निबन्ध तत्वों के आधार पर भारत की सांस्कृतिक एकता की समीक्षा

(क) विषय-वस्तु और वैचारिक औदात्य: दिनकर जी ने इस निबन्ध की विषय-वस्तु के केंद्र में भारत की 'मिश्रित संस्कृति' (Composite Culture) को रखा है। यह केवल एक भौगोलिक विवरण नहीं है, बल्कि भारत के 'प्राण-तत्व' की खोज है। लेखक ने विषय को तीन आयामों—प्राकृतिक, भाषायी और वैचारिक—में विभाजित कर गम्भीरता से परखा है। वे सिद्ध करते हैं कि उत्तर से दक्षिण तक धर्म, दर्शन और साहित्य की अंतःसलिला धारा एक ही है। विषय का प्रतिपादन अत्यंत तार्किक है, जहाँ इतिहास की विफलता (राजाओं द्वारा एकता न रख पाना) और संस्कृति की सफलता का शोधपरक विवेचन किया गया है।

(ख) व्यक्तित्व की व्यंजना और राष्ट्रीय गौरव: निबन्ध में दिनकर जी का व्यक्तित्व एक 'सांस्कृतिक राजदूत' और 'राष्ट्रकवि' के रूप में उभरता है। उनके विचारों में भारतीयता के प्रति अगाध प्रेम और गौरव का भाव सर्वत्र झलकता है। वे केवल हिंदुओं की ही नहीं, बल्कि ईसाई, पारसी और मुसलमानों की साझा विरासत की बात करते हैं, जो उनके उदार और राष्ट्रवादी व्यक्तित्व का परिचायक है। उनका व्यक्तित्व यहाँ एक ऐसे मार्गदर्शक का है जो भाषा-भेद और क्षेत्रीयता से ऊपर उठकर 'हिन्दुस्तानी' पहचान को सर्वोपरि मानता है।

(ग) भाषा और शैली का गहन निरीक्षण: निबन्ध की भाषा परिमार्जित खड़ी बोली है, जो प्रवाहपूर्ण और बोधगम्य है। दिनकर जी की शैली 'विचारात्मक' होने के साथ-साथ 'संवादात्मक' और 'उद्बोधक' भी है। उन्होंने 'क्रीड़ास्थल', 'नई रोशनी' और 'भाषा की दीवार' जैसे लाक्षणिक प्रयोगों से शैली को प्रभावशाली बनाया है। उदाहरणों की सटीकता—जैसे पंजाबी, बिहारी और बंगाली के खान-पान का अंतर या कश्मीर में चप्पल की लाचारी—विषय को अत्यंत सरल और सजीव बना देती है। उनकी शैली पाठक को सीधे संबोधित करती है और उसमें एक विशेष प्रकार का ओज और दृढ़ता है।

(घ) दार्शनिक आधार और समन्वयवादी दृष्टि: समीक्षा का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसकी 'सांस्कृतिक एकता' संबंधी दार्शनिक धारणा है। लेखक ने दिखाया है कि रामायण और महाभारत केवल ग्रंथ नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत की धड़कन हैं। वे हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक संगति पर जो विचार प्रस्तुत करते हैं, वह समाजशास्त्र और इतिहास का अनूठा संगम है। उनके अनुसार, एकता का आधार शासन-विधान से अधिक 'भावधारा की एकता' है।

(ङ) उद्देश्य और वर्तमान प्रासंगिकता: निबन्ध का मुख्य उद्देश्य भाषायी और क्षेत्रीय संकीर्णताओं को समाप्त कर राष्ट्रीय अखंडता को मजबूत करना है। आज के युग में, जहाँ अक्सर 'क्षेत्रीय जोश' राष्ट्रीय एकता पर हावी होने की कोशिश करता है, दिनकर जी की यह समीक्षा एक संजीवनी के समान है। "शौके दीदार अगर है, तो नजर पैदा कर" (भावार्थ में) जैसी दृष्टि प्रदान करना ही इस निबन्ध का ध्येय है। यह निबन्ध हमें याद दिलाता है कि हम बाहरी तौर पर कितने भी भिन्न हों, हमारी आत्मा और इतिहास एक ही राष्ट्र की मिट्टी से निर्मित हैं।

५. कठिन शब्दावली

प्रत्यक्ष = आँखों के सामने, कुमारी अंतरीप = कन्याकुमारी, क्रीड़ास्थल = खेल का मैदान (यहाँ कार्यक्षेत्र), राजसूय-यज्ञ = राजाओं द्वारा किया जाने वाला महान यज्ञ, टिकाऊ = स्थायी, अदूरदर्शी = जो दूर की न सोचे, प्रांतीयता = क्षेत्रवाद, क्षेत्रीय जोश = अपने क्षेत्र के प्रति लगाव, अजनबी = अपरिचित, अखरती = बुरी लगना, सुगम = सरल/आसान, भावनधारा = भावनाओं का प्रवाह, प्राकृत = प्राचीन जनभाषा, अनुयायी = मानने वाले, विरासत = धरोहर, तहजीब = संस्कृति/सभ्यता, बसर करना = जीवन बिताना, अकाल = सूखे की स्थिति, विद्रोह = बगावत, वर्णमाला = अक्षरों का समूह, पार्लियामेंट = संसद, शासन-विधान = संविधान, संगति = साथ, लिबास = पोशाक, मिश्रित = मिला-जुला, प्रांजल = शुद्ध/स्पष्ट, गवेषणात्मक = खोजपूर्ण, अखूठ = असीमित, अंतःसलिला = भीतर बहने वाली, साक्ष्य = प्रमाण, अबाध = बिना रुकावट,

६. परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्र. 1. लेखक ने भारत के किन तीन प्राकृतिक भागों की चर्चा की है?

उत्तर : लेखक ने भारत को तीन भागों में विभाजित किया है: 1. उत्तरी भाग (हिमालय से विंध्य तक), 2. मध्य भाग (दक्षिणी प्लेटो - विंध्य से कृष्णा नदी तक), और 3. दक्षिण का प्रायद्वीप (कृष्णा नदी से कन्याकुमारी तक)।

प्र. 2. विंध्याचल को पार कर दक्षिण को संदेश देने वाले पहले ऋषि कौन थे?

उत्तर : विंध्याचल को पार कर दक्षिण भारत के लोगों को अपना संदेश सुनाने वाले प्रथम व्यक्ति महर्षि अगस्त्य माने जाते हैं।

प्र. 3. "पहाड़ों और नदियों के गुण भी हैं और अवगुण भी"—लेखक का क्या आशय है?

उत्तर : पहाड़ों और नदियों के गुण यह हैं कि वे संसाधनों के स्रोत हैं, किन्तु अवगुण यह है कि वे देश के भीतर अलग-अलग क्षेत्र बनाकर लोगों में संकुचित 'प्रांतीयता' या क्षेत्रीय जोश पैदा कर देते हैं।

प्र. 4. राष्ट्रीय एकता की सबसे बड़ी बाधा लेखक ने किसे माना है और क्यों?

उत्तर : लेखक ने 'भाषा-भेद' को राष्ट्रीय एकता की सबसे बड़ी बाधा माना है, क्योंकि इसके कारण एक ही देश के निवासी आपस में अजनबियों की तरह व्यवहार करने लगते हैं।

प्र. 5. विज्ञान ने भारत की एकता को कैसे सुगम बनाया है?

उत्तर : विज्ञान ने यातायात और संचार के सुगम साधन उपलब्ध करा दिए हैं, जिससे अब ऊँचे पहाड़ और बड़ी नदियाँ राष्ट्रीय एकता में रुकावट नहीं रहीं। अब अकाल या विद्रोह की स्थिति में मदद तुरंत पहुँचाई जा सकती है।

प्र. 6. भारतीय भाषाओं की बाहरी विविधता के भीतर कौन सी एकता छिपी है?

उत्तर : सभी भारतीय भाषाओं की 'भावधारा' एक ही है। वे प्रायः रामायण, महाभारत और भारतीय दर्शन जैसे साझा विषयों पर आधारित साहित्य की रचना करती हैं।

प्र. 7. हिंदू और मुसलमान संस्कृति की दृष्टि से करीब क्यों हैं?

उत्तर : क्योंकि अधिकांश भारतीय मुसलमानों के पूर्वज हिंदू थे जो अपनी सांस्कृतिक आदतें साथ ले गए। साथ ही, सदियों की लंबी संगति के कारण दोनों के बीच 'तहजीब' की अनेक समान बातें पैदा हो गई हैं।

प्र. 8. विदेश जाने पर भारतवासी किस आधार पर आसानी से पहचान लिए जाते हैं?

उत्तर : भारतवासी अपनी विशिष्ट चाल-ढाल, बातचीत, रहन-सहन और 'हिंदुस्तानी' आदतों के कारण विदेशों में अलग से पहचान लिए जाते हैं, चाहे वे किसी भी धर्म के हों।

प्र. 9. निबन्ध के अनुसार भारतीय जनता की एकता के असली आधार क्या हैं?

उत्तर : भारतीय जनता की एकता के असली आधार 'भारतीय दर्शन' और 'साहित्य' हैं, जो विभिन्न भाषाओं में लिखे जाने के बावजूद एक ही सत्य का प्रतिपादन करते हैं।

प्र. 10. लेखक ने हिंदी भाषा के प्रचार पर क्यों जोर दिया है?

उत्तर : क्योंकि हिंदी भाषा का व्यापक प्रचार ही भाषा-भेद की समस्या का स्थायी समाधान है, जो उत्तर और दक्षिण की जनता को भावनात्मक रूप से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन सकती है।

साहित्य विश्लेषण श्रृंखला · 'भारत की सांस्कृतिक एकता' · सर्वाधिकार सुरक्षित

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)