साहित्य की महत्ता-पं.महावीर प्रसाद द्विवेदी

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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साहित्य की महत्ता : विस्तृत समीक्षा, सारांश एवं प्रश्नोत्तर

प्रस्तुत लेख में 'द्विवेदी युग' के प्रणेता आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित ऐतिहासिक निबन्ध 'साहित्य की महत्ता' का विश्लेषण प्रस्तुत है। यह निबन्ध साहित्य को ज्ञान की संचित राशि मानकर समाज और राष्ट्र के उत्थान में उसकी अनिवार्य भूमिका को रेखांकित करता है।

निबन्ध : साहित्य की महत्ता
निबन्धकार : आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
युग : द्विवेदी युग (युग-प्रवर्तक)
विधा : विचारात्मक एवं प्रौढ़ निबन्ध
मूल विषय : साहित्य का सांस्कृतिक एवं सामाजिक महत्व
भाषा-शैली : परिमार्जित खड़ी बोली, तर्कपूर्ण एवं गम्भीर

१. निबन्धकार का परिचय

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी (1864–1938 ई.) हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल के 'द्विवेदी युग' के निर्माता और भाषा के महान संस्कारक हैं। उन्होंने सत्रह वर्षों (1903-1920 ई.) तक प्रतिष्ठित पत्रिका 'सरस्वती' का संपादन कर हिन्दी भाषा को व्याकरणसम्मत, व्यवस्थित और समृद्ध बनाया। द्विवेदी जी ने रीतिकालीन श्रृंगारिकता के स्थान पर साहित्य को नैतिकता, ज्ञान-विज्ञान और राष्ट्रप्रेम की ओर मोड़ा। उन्होंने न केवल स्वयं विपुल साहित्य रचा, बल्कि हिन्दी के अनेक महान लेखकों (जैसे मैथिलीशरण गुप्त, प्रेमचन्द) का मार्गदर्शन भी किया। उनके निबन्ध विचारात्मक, तर्कसंगत और ज्ञानवर्धक होते हैं। 'साहित्य की महत्ता', 'कवि और कविता', 'कवि-कर्तव्य' जैसे उनके निबन्ध हिन्दी आलोचना की आधारशिला हैं। उन्हें हिन्दी गद्य का 'अनुशास्ता' कहा जाता है, जिन्होंने बिखरी हुई हिन्दी को एक सशक्त राष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया।

२. मूल पाठ

ज्ञान-राशि के संचित कोष का ही नाम साहित्य है। सब तरह के भावों को प्रकट करने की योग्यता रखने वाली और निर्दोष होने पर भी यदि कोई भाषा अपना निज का साहित्य नहीं रखती, तो वह रूपवती भिखारिन की तरह कदापि आदरणीय नहीं हो सकती। उसकी शोभा, उसकी श्रीसम्पन्नता, उसकी मान-मर्यादा उसके साहित्य पर ही अवलंबित रहती है। जाति-विशेष के उत्कर्षापकर्ष का, उसके उच्च-नीच भावों का, उसके धार्मिक-विचारों और सामाजिक संगठन का, उसकी ऐतिहासिक घटनाओं और राजनीतिक स्थितियों का प्रतिबिंब देखने को यदि कहीं मिल सकता है तो उसके ग्रंथ-साहित्य में मिल सकता है। सामाजिक शक्ति या सजीवता, सामाजिक अशक्ति या निर्जीवता और सामाजिक सभ्यता तथा असभ्यता का निर्णायक एकमात्र साहित्य है। जिस जाति-विशेष में साहित्य का अभाव या उसकी न्यूनता आपको दीख पड़े, आप निःसंदेह निश्चित समझिए कि वह जाति असभ्य किं वा अपूर्ण सभ्य है। जिस जाति की सामाजिक अवस्था जैसी होती है, उसका साहित्य भी वैसा ही होता है। जातियों की क्षमता और सजीवता यदि कहीं प्रत्यक्ष देखने को मिल सकती है तो उनके साहित्य-रूपी आईने में मिल सकती है। इस आईने के सामने जाते ही हमें तत्काल मालूम हो जाता है कि अमुक जाति की जीवनी-शक्ति इस समय कितनी या कैसी है और भूतकाल में कितनी और कैसी थी। आप भोजन करना बंद कर दीजिए या कम कर दीजिए, आपका शरीर क्षीण हो जाएगा और अचिरात् नाशोन्मुख होने लगेगा। इस तरह आप साहित्य के रसास्वादन से अपने मस्तिष्क को वंचित कर दीजिए, वह निष्क्रिय होकर धीरे-धीरे किसी काम का न रह जाएगा।

बात यह है कि शरीर के जिस अंग का जो काम है, वह उससे यदि न लिया जाए तो उसकी वह काम करने की शक्ति नष्ट हुए बिना नहीं रहती। शरीर का खाद्य भोजनीय पदार्थ है और मस्तिष्क का खाद्य साहित्य। अतएव यदि हम अपने मस्तिष्क को निष्क्रिय और कालांतर में निर्जीव-सा नहीं कर डालना चाहते तो हमें साहित्य का सतत सेवन करना चाहिए और उसमें नवीनता तथा पौष्टिकता लाने के लिए उसका उत्पादन भी करते जाना चाहिए। पर, याद रखिए, विकृत भोजन से जैसे शरीर रुग्ण होकर बिगड़ जाता है, उसी तरह विकृत साहित्य से मस्तिष्क भी विकार-ग्रस्त होकर रोगी हो जाता है। मस्तिष्क का बलवान और शक्ति-संपन्न होना अच्छे साहित्य पर ही अवलंबित है। अतएव यह निर्भ्रांत है कि मस्तिष्क के यथेष्ट विकास का एकमात्र साधन अच्छा साहित्य है। यदि हमें जीवित रहना है और सभ्यता की दौड़ में अन्य जातियों की बराबरी करना है तो हमें श्रमपूर्वक, बड़े उत्साह से, सत्साहित्य का उत्पादन और प्राचीन साहित्य की रक्षा करनी चाहिए और यदि हम अपने मानसिक जीवन की हत्या करके अपनी वर्तमान दयनीय दशा में पड़ा रहना ही अच्छा समझते हों, तो आज ही साहित्य-निर्माण के आडम्बर का विसर्जन कर डालना चाहिए।

आँख उठाकर जरा और देशों और जातियों की ओर तो देखिए। आप यह देखेंगे कि साहित्य ने वहाँ की सामाजिक और राजकीय स्थितियों में कैसे-कैसे परिवर्तन कर डाले हैं। साहित्य ने वहाँ समाज की दशा कुछ की कुछ कर दी है। शासन-प्रबन्ध में बड़े-बड़े उथल-पुथल कर डाले हैं। यहाँ तक कि अनुदार और धार्मिक भावों को भी जड़ से उखाड़ फेंका है। साहित्य में जो शक्ति छिपी रहती है, वह तोप, तलवार और बम के गोलों में भी नहीं पायी जाती। यूरोप की हानिकारिणी धार्मिक रूढ़ियों का उत्पादन साहित्य ने ही किया है, जातीय स्वातन्त्र्य के बीज उसी ने बोए हैं। व्यक्तिगत स्वातन्त्र्य के भावों को भी उसी ने पाला, पोसा और बढ़ाया है, पतित देशों का पुनरुत्थान भी उसी ने किया है। पोप की प्रभुता को किसने कम किया है? फ्रांस में प्रजा की सत्ता का उत्पादन और उन्नयन किसने किया है? इटली का मस्तक किसने ऊँचा उठाया है? साहित्य ने, साहित्य ने, साहित्य ने। जिस साहित्य में इतनी शक्ति है, जो साहित्य मुर्दों को भी जिन्दा करने वाली संजीवनी औषधि का आधार है, जो साहित्य पतितों को उठाने वाला और उत्थितों के मस्तक को उन्नत करने वाला है, उसके उत्पादन और संवर्धन की चेष्टा जो जाति नहीं करती, वह अज्ञानांधकार के गर्त में पड़ी रहकर किसी दिन अपना अस्तित्व ही खो बैठती है। अतएव समर्थ होकर भी जो मनुष्य इतने महत्वशाली साहित्य की सेवा और अभिवृद्धि नहीं करता, अथवा उससे अनुराग नहीं रखता, वह समाजद्रोही है, वह देशद्रोही है, वह जातिद्रोही है, किंबहुना, वह आत्मद्रोही और आत्महंता भी है।

कभी-कभी कोई समृद्ध भाषा अपने ऐश्वर्य के बल पर दूसरी भाषाओं पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेती है, जैसे जर्मनी, रूस, इटली आदि देशों की भाषाओं पर फ्रेंच भाषा में बहुत समय तक कर लिया था। स्वयं अंग्रेजी भाषा भी फ्रेंच और लैटिन भाषाओं के दबाव से नहीं बच सकी। कभी-कभी यह दशा राजनैतिक प्रभुत्व के कारण भी उपस्थित हो जाती है और विजित देशों की भाषाओं को जेता जाति की भाषा दबा लेती है। तब उनके साहित्य का उत्पादन यदि बंद नहीं हो जाता तो उसकी वृद्धि की गति मंद पड़ जाती है। यह अस्वाभाविक दबाव सदा नहीं बना रहता है। इस प्रकार की दबी या अधःपतित भाषाएँ बोलने वाले जब होश में आते हैं, तब वे इस अनैसर्गिक आच्छादन को दूर फेंक देते हैं। जर्मनी, रूस, इटली और स्वयं इंग्लैंड चिरकाल तक फ्रेंच और लैटिन भाषाओं की मायाजाल में फँसे थे। पर बहुत समय हुआ, उस जाल को उन्होंने तोड़ डाला। अब वे अपनी भाषा के साहित्य की अभिवृद्धि करते हैं, कभी भूल कर भी विदेशी भाषाओं में ग्रंथ-रचना करने का विचार नहीं करते। बात यह है कि अपनी भाषा का साहित्य ही जाति और स्वदेश की उन्नति का साधन है। विदेशी भाषा का चूड़ान्त ज्ञान प्राप्त कर लेने और उसमें महत्वपूर्ण ग्रंथ रचना करने पर भी विशेष सफलता नहीं प्राप्त हो सकती और अपने देश को विशेष लाभ नहीं पहुँच सकता। अपनी माँ को निःसहाय, निरूपाय और निर्धन दशा में छोड़कर जो मनुष्य दूसरे की माँ की सेवा-शुश्रूषा में रत है, उस अधम की कृतघ्नता का क्या प्रायश्चित होना चाहिए, इसका निर्णय कोई मनु, याज्ञवल्क्य या आपस्तंब ही कर सकता है।

मेरा मतलब कदापि नहीं कि विदेशी भाषाएँ सीखनी ही न चाहिए। नहीं, आवश्यकता, अनुकूलता, अवसर और अवकाश होने पर हमें एक नहीं, अनेक भाषाएँ सीखकर ज्ञानार्जन करना चाहिए, ज्ञान कहीं भी मिलता हो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। परन्तु अपनी ही भाषा और उसी के साहित्य को प्रधानता देनी चाहिए, क्योंकि अपना, अपने देश का, अपनी जाति का उपकार और कल्याण अपनी ही भाषा के साहित्य की उन्नति से हो सकता है। ज्ञान, विज्ञान, धर्म और राजनीति की भाषा सदैव लोकभाषा ही होनी चाहिए। अतएव अपनी भाषा के साहित्य की सेवा और अभिवृद्धि करना, सभी दृष्टियों से, हमारा परम धर्म है।

३. निबन्ध का प्रतिपाद्य एवं सारांश

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी रचित निबन्ध 'साहित्य की महत्ता' का मूल प्रतिपाद्य साहित्य को 'ज्ञान की संचित राशि' के रूप में प्रतिष्ठित करना और उसे समाज की आत्मा सिद्ध करना है। लेखक के अनुसार, साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि वह किसी जाति के मानसिक और सांस्कृतिक वैभव का कोष है। सारांशतः, निबन्ध यह स्पष्ट करता है कि साहित्य के बिना कोई भी भाषा जीवित नहीं रह सकती और न ही कोई राष्ट्र अपनी पहचान सुरक्षित रख सकता है। द्विवेदी जी ने 'साहित्य समाज का दर्पण है' के सिद्धांत को पुष्ट करते हुए बताया है कि समाज की उन्नति और अवनति का साहित्य से सीधा संबंध है। वे साहित्य की शक्ति को शस्त्रों की शक्ति से अधिक प्रभावशाली मानते हैं। निबन्ध का मुख्य संदेश यह है कि साहित्य ही वह ज्ञान-सेतु है जो हमें अपने अतीत के गौरव से जोड़ता है और भविष्य की उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।

४. निबन्ध तत्वों के आधार पर साहित्य की महत्ता की समीक्षा

(क) विषय-वस्तु और वैचारिकता: आचार्य द्विवेदी ने इस निबन्ध में 'साहित्य' जैसे गम्भीर विषय को अत्यंत व्यापक फलक पर परखा है। विषय-वस्तु केवल साहित्यिक प्रशंसा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह साहित्य के ऐतिहासिक, सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व का शोधपरक विवेचन है। लेखक का यह विचार कि "ज्ञान-राशि के संचित कोष का नाम साहित्य है", साहित्य की अब तक की सबसे सटीक और वैज्ञानिक परिभाषाओं में से एक मानी जाती है। विषय का प्रतिपादन अत्यंत स्पष्ट और प्रेरणादायक है, जो पाठक को अपनी भाषा और साहित्य के प्रति गौरव का अनुभव कराता है।

(ख) व्यक्तित्व की व्यंजना और सुधारवादी दृष्टिकोण: निबन्ध में द्विवेदी जी का एक सजग, अनुशासित और राष्ट्र-प्रेमी व्यक्तित्व उभरता है। वे एक सुधारक (Reformer) के रूप में साहित्य की महत्ता बताते हैं। उनका व्यक्तित्व उस 'शिक्षक' का है जो समाज को यह चेतावनी दे रहा है कि साहित्य की उपेक्षा करना 'आत्म-हत्या' के समान है। उनके विचारों में गम्भीरता और दृढ़ता है, जो द्विवेदी युग की चारित्रिक विशेषता रही है। वे केवल कला के लिए कला के पक्षधर नहीं थे, बल्कि लोक-मंगलकारी साहित्य के प्रबल समर्थक थे।

(ग) भाषा और शैली का प्रौढ़ निरीक्षण: इस निबन्ध की भाषा परिमार्जित, शुद्ध और व्याकरणसम्मत खड़ी बोली है। द्विवेदी जी ने स्वयं भाषा-संस्कार का जो बीड़ा उठाया था, उसका श्रेष्ठ रूप यहाँ दिखाई देता है। शैली 'विचारात्मक' और 'प्रबोधक' है। उन्होंने छोटे-छोटे किन्तु अर्थपूर्ण वाक्यों का प्रयोग किया है जो सीधे हृदय पर प्रभाव डालते हैं। "साहित्य समाज का दर्पण है" जैसा सूत्रवाक्य उनकी सूत्रात्मक शैली का परिचायक है। भाषा में कहीं भी अनावश्यक अलंकारिकता नहीं है; विचारों की स्पष्टता ही इस निबन्ध का वास्तविक सौंदर्य है।

(घ) संरचनात्मक तर्कशीलता और ऐतिहासिक आधार: निबन्ध की संरचना अत्यंत सुगठित और तर्कपूर्ण है। लेखक ने अपनी बात को सिद्ध करने के लिए वाल्मीकि, तुलसी और कालिदास जैसे महाकवियों के साहित्य का ऐतिहासिक सन्दर्भ दिया है। वे तर्क देते हैं कि भौतिक साम्राज्य तो नष्ट हो सकते हैं, किन्तु साहित्यिक विरासत अक्षय होती है। यह संरचना पाठक को क्रमबद्ध ढंग से विषय की गहराई तक ले जाती है, जहाँ साहित्य केवल मनोरंजन की वस्तु न रहकर 'जीवन की अनिवार्यता' बन जाता है।

(ङ) उद्देश्य और प्रासंगिकता: निबन्ध का मुख्य उद्देश्य तत्कालीन समाज को अपनी भाषाई और साहित्यिक धरोहर के प्रति जागृत करना था। आज के डिजिटल युग में, जहाँ सूचनाओं का अंबार है किन्तु 'ज्ञान-राशि' का अभाव होता जा रहा है, द्विवेदी जी की यह समीक्षा और भी प्रासंगिक हो जाती है। यह निबन्ध हमें याद दिलाता है कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके शस्त्रों में नहीं, बल्कि उसके श्रेष्ठ साहित्य में निहित होती है। यह निबन्ध हिन्दी आलोचना जगत का एक प्रकाश-स्तंभ है।

५. कठिन शब्दावली

ज्ञान-राशि = ज्ञान का भंडार, संचित कोष = जमा किया हुआ खजाना, समृद्धि = संपन्नता/खुशहाली, प्रतिबिम्बित = दिखाई देना/छाप पड़ना, अग्रसर = आगे बढ़ना, अक्षय = जिसका नाश न हो, आन्दोलित = विचलित/जागृत करना, स्थिरता = टिकाऊपन, व्यापकता = विस्तार, कृत्यों = कार्यों, ओज = तेज/प्रभाव, संचार = बहाव/फैलाव, दर्पण = आईना, पतन = गिरावट, दोषपूर्ण = बुराइयों से भरा, असमर्थ = योग्य न होना, उपेक्षा = अनदेखी करना, अनुशास्ता = शासन करने वाला/नियमन करने वाला, परिमार्जित = शुद्ध की हुई, संस्कारक = सुधारने वाला, युग-प्रवर्तक = नए युग की शुरुआत करने वाला, आलोचना = गुण-दोष का विवेचन, चोली-दामन = अत्यंत गहरा संबंध, अग्रणी = सबसे आगे, निर्दोष = जिसमें कोई कमी न हो, व्यापक = बड़े स्तर पर, तर्कसंगत = बुद्धि पर आधारित, सूत्रात्मक = कम शब्दों में बड़ी बात कहना, ऐतिहासिक = इतिहास संबंधी, सांस्कृतिक = संस्कृति से जुड़ा,

६. परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्र. 1. आचार्य द्विवेदी के अनुसार साहित्य की क्या परिभाषा है?

उत्तर : आचार्य द्विवेदी के अनुसार, "ज्ञान-राशि के संचित कोष का नाम ही साहित्य है।"

प्र. 2. "साहित्य समाज का दर्पण है"—इस कथन का क्या आशय है?

उत्तर : इसका आशय है कि साहित्य में समाज की तत्कालीन सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का प्रतिबिंब स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

प्र. 3. किसी भाषा के जीवित रहने के लिए क्या अनिवार्य है?

उत्तर : किसी भी भाषा के जीवित रहने के लिए उसका अपना समृद्ध साहित्य होना अनिवार्य है, अन्यथा वह केवल बोलचाल की भाषा बनकर रह जाती है।

प्र. 4. लेखक ने साहित्य की उपेक्षा को 'आत्म-हत्या' क्यों कहा है?

उत्तर : क्योंकि जो जाति अपने साहित्य की उपेक्षा करती है, वह अपने पूर्वजों के ज्ञान और अपनी सांस्कृतिक पहचान को खो देती है, जिससे उसका पतन निश्चित हो जाता है।

प्र. 5. साहित्य की शक्ति और शस्त्र की शक्ति में लेखक किसे श्रेष्ठ मानता है?

उत्तर : लेखक साहित्य की शक्ति को श्रेष्ठ मानता है क्योंकि साम्राज्य और शस्त्र नष्ट हो सकते हैं, किन्तु साहित्य की शक्ति युगों-युगों तक मनुष्य के हृदय को प्रभावित करती रहती है।

प्र. 6. समाज के पतन का साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर : जब समाज का पतन होता है, तब साहित्य भी दूषित और विचारहीन हो जाता है, क्योंकि साहित्य समाज का ही प्रतिबिंब होता है।

प्र. 7. द्विवेदी जी ने किन महाकवियों के साहित्य को भारतीय संस्कृति का रक्षक बताया है?

उत्तर : वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, तुलसीदास और सूरदास जैसे महान साहित्यकारों के साहित्य ने ही भारतीय संस्कृति को जीवित रखा है।

प्र. 8. साहित्य के अभाव में जाति को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है?

उत्तर : साहित्य के बिना जाति अपने पूर्वजों के गौरवशाली कृत्यों को नहीं जान पाती और न ही अपनी भविष्य की उन्नति के मार्ग को समझ पाती है।

प्र. 9. 'साहित्य की महत्ता' निबन्ध की भाषा-शैली की प्रमुख विशेषता क्या है?

उत्तर : इसकी भाषा शुद्ध, परिमार्जित और व्याकरणसम्मत खड़ी बोली है, तथा शैली विचारात्मक एवं गम्भीर है।

प्र. 10. इस निबन्ध का मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर : निबन्ध का मुख्य उद्देश्य राष्ट्र निर्माण में साहित्य की अनिवार्य भूमिका को स्पष्ट करना और समाज को अपनी बौद्धिक सम्पदा के प्रति सजग बनाना है।

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