भीष्म का शिखण्डी से सामना (प्रतिशोध-16)- संक्षेपीकरण/विशदीकरण

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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प्रस्तुत लेख में 'प्रतिशोध' पुस्तक के सोलहवें अध्याय 'भीष्म का शिखण्डी से सामना' का पूर्ण विश्लेषण है। इसमें भीष्म के पतन, अर्जुन के गाण्डीव से निकली पाताल-गंगा और भीष्म-कर्ण के मध्य हुए अंतिम संवाद का विस्तृत वर्णन चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल' द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

पुस्तक : प्रतिशोध
संपादक : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय
पाठ क्रम एवं नाम : 16-भीष्म का शिखण्डी से सामना
मूल विषय : भीष्म का शर-शय्या पर लेटना, अर्जुन का व्यामोह और कर्ण-भीष्म संवाद।
संक्षेपीकरण/विशदीकरण : चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'

१. मूल पाठ

आज महाभारत का दशवाँ दिन है। नित्य की भाँति महात्मा भीष्म ने सेना की व्यूह-रचना करके मुख्य मार्ग पर अपना मोर्चा सँभाल लिया। पाण्डव सेनापति ने भी जवाबी हमला करने के लिए अपने महारथियों को निर्देशित किया। सबने सेनापति के निर्देश का पालन करते हुए युद्ध प्रारम्भ कर दिया। आज कपिध्वज के नीचे रथ की ओर सभी लोगों की निगाह विशेष रूपेण आकर्षित थी। कारण कि आज दो महारथी एक ही रथ पर आरुढ़ होकर रणाङ्गण में जूझने जा रहे हैं। आज माधव के रथ पर अर्जुन के साथ शिखण्डी भी आरुढ़ होकर रणभूमि पर विचरण कर रहा है। इस दृश्य को देखकर सभी को कुतूहल हो रहा था।

व्यूह के मुख्य भाग पर भीम और भीष्म का भयानक युद्ध चल रहा था। कल की घटना से पितामह आज खिन्न थे। अनमनस्क होकर भीम का सामना कर रहे थे। माधव ने आज करीब प्रत्येक क्षेत्र में लड़ रहे सेनानायकों तथा महारथियों से दो-दो हाथ कराया। युद्ध करते हुए दोपहर बीत गया। अपने रण-कौशल का प्रदर्शन करते हुए दोनों ही महारथियों से अचानक भीष्म का सामना हो गया। एकाएक भीष्म की आँखों को जैसे विश्वास ही नहीं हो पा रहा था। प्रत्यय होने पर भीष्म ने अपना धनुष चलाना बन्द कर दिया।

भीष्म को लक्ष्य करके शिखण्डी एवं अर्जुन ने वाण-वर्षा प्रारम्भ कर दी। मत्त गजराज की तरह भीष्म बिना किसी प्रतिरोध के उनके वाणों को निस्पन्द झेलते रहे। अर्जुन ने सहस्रों वाण फेंकने के बाद अपनी ओर एक भी वाण न देखकर श्रीकृष्ण से कहा-माधव, यह क्या अनर्थ है? पितामह तो युद्ध से विरत हैं। यह तो धर्म नहीं है कि युद्ध न करने वाले पर इस तरह वाण-वर्षा की जाय। शिखण्डी पागल की भाँति पितामह को अपने बाणों से बींधता रहा। आज पितामह का मुख-मण्डल अपूर्व आभा से चमक रहा था। उन्होंने स्वगत कहा-अब मुझे वाणों से पीड़ा हो रही है। मुझे पीड़ित करने वाले ये विशिख शिखण्डी के नहीं थे, वरन् ये कराल-वाण तो मेरे प्रिय अर्जुन के ही थे। दूसरों के बाण मुझे कदापि पीड़ा देने वाले नहीं हो सकते। जैसे—केकड़ी अपने बच्चों के प्रजनन से ही निज मृत्यु को प्राप्त हो जाती है, वैसे ही अर्जुन के वाण ही मेरे मर्म-स्थलों को बींध रहे थे। इसका अनुभव मुझे तब हुआ जबकि अर्जुन ने वाण बरसाना बन्द कर दिया।

भीष्म अप्रतिम आभा विखेरते हुए श्रीकृष्ण से बोले-वासुदेव, अपने प्रिय सखा को यह निर्देश दें कि रण-भूमि में मुझे वीरोचित मरण देकर जग में सुयश ले। इस प्रकार का रणभूमि में व्यामोह उचित नहीं है। विजय किसी भी कीमत पर वीरों को अभीप्सित है। बिना किसी संकोच के अपने तीक्ष्ण वाणों से मेरा प्राणान्त कर दे। शिखण्डी के वाण मुझे कदापि नहीं धराशायी। कर सकेंगे। कहीं मत्त गजकेशरी को लाठी से वश में किया जा सकता है? भीष्म की बात पर ध्यान न देते हुए माधव ने कुटिल मुस्कान विखेरकर अर्जुन से कहा-पार्थ, किस सोच में डूबे हो ? पितामह पर प्रचण्ड वाण-वर्षा कर विजय-बाधा अविलम्ब दूर करो। इनसे मुक्ति के लिए दूसरा उपाय नहीं है। रणाङ्गण में इस प्रकार का व्यामोह तुम्हें शोभा नहीं दे रहा है। भीष्म परम् भागवत हैं। वे सब जानते हैं। इसका दोष वे तुम्हें कदापि नहीं देंगे। तुमने मुझे वचन दिया है कि जो कुछ मैं कहूँगा उसे बिना विचारे ही स्वीकार करोगे। न्याय, अन्याय, उचित-अनुचित, पाप-पुण्य का द्वन्द्व इस समय व्यर्थ है। अनासक्त मन से युद्ध करना ही वर्तमान में सर्वोत्तम है। सभी द्वन्द्व सम्प्रति मुझे समर्पित करके एकमात्र युद्ध करो–यही मेरा आदेश है।

भगवान से इस प्रकार उत्साहित किये जाने पर अर्जुन ने संकोच त्यागकर पुनः भीष्म पर वाणों की झड़ी लगा दी। शिखण्डी के वाणों से अनाहत भीष्म ने अब समझ लिया कि अर्जुन द्वारा व्यवहृत विषाक्त दिव्यास्त्रों से मेरा बचना सम्भव नहीं है। उन्होंने प्राणों का मोह त्यागकर भगवान वासुदेव की मन ही मन प्रशंसा करते हुए कोटि नमन किया।

दिन के तीसरे प्रहर में भीष्म का आभामय मुखमण्डल दर्शनीय बन गया था। कोटिशः सूर्य का प्रकाश उनके शरीर को देदीप्यमान कर रहा था। रक्त- रञ्जित तन को देखकर अस्ताचल की छटा लज्जित हो रही थी। सहसा उनके मुख से निकला-वासुदेव की जय और वे रथ से नीचे लुढ़क गये। शरीर पर असंख्य वाण इस रूप में बिंधे हुए थे कि पृथ्वी से ऊपर ही शर-सय्या लग चुकी थी। इस पर उनका विक्षत तन लेटा हुआ था। दोनों तरफ हाहाकार मच गया। युद्ध तत्काल बन्द हो गया। उभयतः प्रमुख लोग इकट्ठे हो गये। सबके बदन मलीन थे। लोगों के मुख पर अपराध-बोध झलक रहा था। सब ओर अजीब खामोशी छायी थी। भीष्म ने दर्द से कराह भर कर कहा-मेरा शिर नीचे लटक रहा है। इसे कोई सहारा दो। अपने-अपने शिविरों से रेशमी उपधान लिये लोग दौड़ पड़े। अपराधी मुद्रा में एक तरफ दुबके हुए अर्जुन को सम्बोधित कर भीष्म ने कहा-वत्स! मुझ वीरोचित तकिया तुम लगाओ। भीष्म की स्नेहिल वाणी सुनकर अर्जुन की आँखों से वारि-धारा बह निकली। उन्होंने अपने तरकस से तीन बाण निकालकर पितामह के शिर को सहारा था। उनका उन्नत भाल अब सबको देख रहा था। उन्होंने कहा आज से युद्ध बन्द कर दो। मेरी आहति से ही तुम सब यह सीख लो कि युद्ध का अन्त विनाश के अतिरिक्त कुछ नहीं है। चारो तरफ कोई भी हलचल नहीं हुई। भीष्म ने कहा अर्जुन, मुझे प्यास लगी है। पार्थ ने एक बाण मारा जिससे पाताल-गंगा प्रकट होकर स्वतः भीष्म के मुख में गिरकर उनकी पिपासा शान्त की।

भीष्म ने कहा विधाता की गति बड़ी ही कुटिल है। होनी को कौन टाल सकता है। अभी सूर्य उत्तरायण नहीं है। अतः मैं शरीर नहीं त्यागना चाहता। इसी कुरुक्षेत्र में शरशय्या समेत मुझे कहीं सुरक्षित रख दो। तुम सभी शाम को आकर युद्ध समाचार देते रहना। मैं भी तब तक अपना प्रायश्चित करता हुआ प्राण नहीं विसर्जित करूंगा। धीरे-धीरे अँधेरा बढ़ने लगा। लोगों ने अपने- अपने शिविर के लिए प्रस्थान किया।

सबके चले जाने के बाद कर्ण आया। उसने हाथ जोड़कर पितामह के पैर के पास खड़ा होकर कहा-हे गंगानंदन, मेरे पितामह ! मैंने जीवनभर आपका सम्मान किया और बदले में आपसे तिरस्कार ही पाया। आपकी तरह मैंने भी परशुराम से दिव्यास्त्रों की शिक्षा पाई है। अपने सेनापतित्व में मुझे लड़ने से वंचित कर आपने क्या पाया? कर्ण की बात सुनकर भीष्म का गला भर आया। वे बोले वत्स, तुम मुझे अर्जुन के समान ही प्रिय हो। मैं तुम्हें और अर्जुन दोनों को बचाना चाहता था। अब तुम और अर्जुन में से एक ही बच पायेगा। अब किसका बस है। हम सभी नियति के खिलौने हैं। तुम भी कुन्ती के ज्येष्ठ पुत्र होकर भी किस तरह काल-चक्र में फँस गये हो। तुम्हारे ऊपर दुर्योधन को हमसे अधिक भरोसा है। मैं उससे उभय पक्ष की हितकर बात करता हूँ जो उसे स्वीकार्य नहीं है। तुम उसके उपकारों से बाध्य होकर समर्पण की भावना से काम कर रहे हो। मैं आज भी अगर युधिष्ठिर से तुम्हारा परिचय करा दूँ तो युद्ध विराम हो सकता है। वह अपना राज्य बिना विचार किये तुम्हें सौंप देगा और तुम उसे दुर्योधन को अविलम्ब हस्तान्तरित करके प्रत्युपकार कर सकोगे। क्या यह उचित होगा। कहो मैं तुम्हारा अभिमत जानना चाहता हूँ। कर्ण अवरुद्ध गले से बोला-पितामह मैं आपकी भावना से अवगत हूँ। आप तो सभी के पितामह हैं। आप पर हम सभी का समान अधिकार है और आप भी उसी प्रकार सबको समान दृष्टि से देखते हैं। मैं भी देवोपम पाण्डवों का विरोधी नहीं हूँ। युधिष्ठिर को मैं भली-भाँति जानता हूँ। श्रीकृष्ण और माता कुन्ती भी मुझे इस रहस्य को बता चुके हैं। उन दोनों से मैंने यह वचन लिया है कि कृपया इस रहस्य को धर्मराज से न बतायें। इस प्रकार की अनेक बातें होने पर पितामह ने कर्ण से संप्रेम कहा-जाओ वत्स! अपने कर्तव्य का पालन करो।

२. कठिन शब्दार्थ

रणाङ्गण = युद्ध का मैदान, कपिध्वज = अर्जुन का रथ (जिस पर हनुमान जी विराजित हों), कुतूहल = उत्सुकता/आश्चर्य, खिन्न = दुखी/परेशान, अनमनस्क = जिसका मन कहीं और हो, प्रत्यय = विश्वास/निश्चय, विरत = युद्ध से हटा हुआ, विशिख = बाण/तीर, मर्म-स्थल = शरीर के अत्यंत कोमल और महत्वपूर्ण अंग, व्यामोह = मोह/भ्रम, अभीप्सित = वांछित/चाहा हुआ, परम् भागवत = ईश्वर का परम भक्त, देदीप्यमान = चमकता हुआ, शर-सय्या = बाणों की बिस्तर, विक्षत = घायल, उपधान = तकिया, वारि-धारा = आंसुओं की धारा, पिपासा = प्यास, उत्तरायण = सूर्य की उत्तर दिशा की गति, अवरुद्ध = रुका हुआ/भरा हुआ गला।

३. सारांश

पाठ 'भीष्म का शिखण्डी से सामना' महाभारत के दसवें दिन के उस युगांतकारी संघर्ष का विवरण देता है, जिसने युद्ध की दिशा बदल दी। श्रीकृष्ण की कूटनीति के अनुसार अर्जुन के रथ पर शिखण्डी को बैठाया गया था। भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार शिखण्डी को देखते ही शस्त्र त्याग दिए। शिखण्डी और अर्जुन ने निरंतर बाण-वर्षा की, जिसे भीष्म ने 'मत्त गजराज' की भाँति सहन किया। अर्जुन पहले तो गुरु-हंता बनने के विचार से मोहग्रस्त हुए, किंतु श्रीकृष्ण ने उन्हें अनासक्त भाव से युद्ध करने और अपने कर्तव्य का पालन करने हेतु प्रेरित किया।

भीष्म के शरीर पर अनगिनत बाणों के लगने से वे रथ से गिर पड़े, किंतु बाणों की प्रचुरता के कारण उनका शरीर भूमि को स्पर्श नहीं कर सका और वे 'शर-सय्या' पर लेट गए। युद्ध के इस हृदयविदारक दृश्य पर दोनों पक्षों के योद्धा शोक में डूब गए। भीष्म ने अर्जुन से वीरोचित तकिया और प्यास बुझाने के लिए गंगाजल की माँग की, जिसे अर्जुन ने अपने बाणों के कौशल से पूर्ण किया। भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने तक शरीर न त्यागने का संकल्प लिया। अध्याय के अंत में भीष्म और कर्ण के मध्य एक अत्यंत मार्मिक संवाद होता है। भीष्म कर्ण को कुंती का ज्येष्ठ पुत्र बताते हुए उसे युद्ध रोकने का सुझाव देते हैं, किंतु कर्ण अपने मित्र दुर्योधन के प्रति अपनी कृतज्ञता और कर्तव्य की दुहाई देकर युद्ध में डटे रहने का निश्चय करता है। यह पाठ त्याग, भक्ति, कर्तव्य और नियति के अटूट बंधनों का एक उत्कृष्ट संगम है।

४. महत्वपूर्ण अंशों का संक्षेपीकरण

१. संक्षेपीकरण संकेत : "आज कपिध्वज के नीचे रथ की ओर... शिखण्डी भी आरुढ़ होकर रणभूमि पर विचरण कर रहा है... सभी को कुतूहल हो रहा था।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'भीष्म का शिखण्डी से सामना' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : युद्ध के दसवें दिन अर्जुन के रथ पर शिखण्डी के बैठने से उत्पन्न विस्मय का वर्णन।
संक्षेपीकरण : दसवें दिन अर्जुन के रथ पर शिखण्डी का उपस्थित होना रणभूमि में चर्चा का विषय बन गया। यह दृश्य भीष्म के अजय दुर्ग को भेदने की श्रीकृष्ण की उस गुप्त रणनीति का हिस्सा था, जिसने योद्धाओं के बीच भारी कौतूहल पैदा कर दिया।

२. संक्षेपीकरण संकेत : "भीष्म को लक्ष्य करके शिखण्डी एवं अर्जुन ने वाण-वर्षा प्रारम्भ कर दी... अर्जुन के वाण ही मेरे मर्म-स्थलों को बींध रहे थे। इसका अनुभव मुझे तब हुआ जबकि अर्जुन ने वाण बरसाना बन्द कर दिया।"

संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय कृत 'प्रतिशोध' के सोलहवें अध्याय से।
प्रसंग : भीष्म द्वारा अर्जुन के बाणों की पीड़ा और शिखण्डी की अक्षमता का अनुभव।
संक्षेपीकरण : शिखण्डी और अर्जुन की बाण-वर्षा के बीच भीष्म ने अनुभव किया कि शिखण्डी के बाण निष्प्रभावी थे, जबकि अर्जुन के बाण उनके मर्म को बींध रहे थे। भीष्म ने इन बाणों की पीड़ा को ही अपने जीवन का अंत और मोक्ष का मार्ग समझा।

३. संक्षेपीकरण संकेत : "सहसा उनके मुख से निकला-वासुदेव की जय और वे रथ से नीचे लुढ़क गये... पृथ्वी से ऊपर ही शर-सय्या लग चुकी थी।"

संदर्भ : 'प्रतिशोध' पुस्तक के 'भीष्म का शिखण्डी से सामना' पाठ से।
प्रसंग : भीष्म के पतन और शर-शय्या पर लेटने का मार्मिक दृश्य।
संक्षेपीकरण : श्रीकृष्ण की जय बोलते हुए पितामह भीष्म बाणों से छलनी होकर रथ से गिर पड़े। बाणों की सघनता के कारण वे भूमि पर गिरने के बजाय बाणों की शय्या पर टिक गए, जिससे रणभूमि में चारों ओर हाहाकार मच गया।

४. संक्षेपीकरण संकेत : "कर्ण आया... तुम भी कुन्ती के ज्येष्ठ पुत्र होकर भी किस तरह काल-चक्र में फँस गये हो... जाओ वत्स! अपने कर्तव्य का पालन करो।"

संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय रचित 'प्रतिशोध' के सोलहवें पाठ से।
प्रसंग : भीष्म और कर्ण के मध्य एकांत संवाद और सत्य का प्रकटीकरण।
संक्षेपीकरण : भीष्म ने कर्ण को उसके जन्म का रहस्य बताते हुए पांडवों से संधि का प्रस्ताव दिया। किंतु कर्ण ने मित्र-धर्म को सर्वोपरि मानकर इसे अस्वीकार कर दिया। भीष्म ने दुखी हृदय से कर्ण को अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने की आज्ञा दी।

५. विस्तृत विशदीकरण (भाव-पल्लवन)

१. विशदीकरण संकेत : "भीष्म को लक्ष्य करके शिखण्डी एवं अर्जुन ने वाण-वर्षा प्रारम्भ कर दी... जैसे—केकड़ी अपने बच्चों के प्रजनन से ही निज मृत्यु को प्राप्त हो जाती है, वैसे ही अर्जुन के वाण ही मेरे मर्म-स्थलों को बींध रहे थे।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'भीष्म का शिखण्डी से सामना' नामक पाठ से लिया गया है इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : भीष्म पितामह द्वारा अर्जुन के प्रहारों को एक आध्यात्मिक और प्राकृतिक सत्य के रूप में स्वीकार करने का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने यहाँ भीष्म पितामह की मानसिक अवस्था और उनके अगाध प्रेम का अत्यंत सूक्ष्म चित्रण किया है। भीष्म जानते थे कि शिखण्डी केवल एक 'निमित्त' है, जबकि वास्तविक प्रहार अर्जुन का है। 'केकड़ी' का उदाहरण देकर लेखक ने जीवन और मृत्यु के चक्र को स्पष्ट किया है। जिस प्रकार एक माँ (केकड़ी) अपने बच्चों को जन्म देते समय स्वयं मृत्यु को प्राप्त होती है, भीष्म भी उसी प्रकार अपनी कुल-परंपरा और अपने प्रिय शिष्य (अर्जुन) के उत्कर्ष के लिए अपनी आहुति दे रहे थे। भीष्म के लिए अर्जुन का बाण केवल पीड़ा नहीं था, बल्कि वह उनके द्वारा दी गई शिक्षा की सार्थकता का प्रमाण था।

भीष्म का यह स्वीकार करना कि 'दूसरों के बाण मुझे पीड़ा नहीं दे सकते', उनके अपार तपोबल को दर्शाता है। वे केवल अपने प्रिय पात्र के हाथों ही हारना और मरना चाहते थे। शिखण्डी के बाणों को उन्होंने 'तिनकों' के समान माना, जो एक महामानव के स्वाभिमान की पुष्टि करता है। यहाँ भीष्म का 'मर्म-स्थल' बिंधना केवल शारीरिक घाव नहीं है, बल्कि वह उन संबंधों का टूटना है जिन्हें उन्होंने जन्म भर संजोया था। अर्जुन के बाणों की पीड़ा को उन्होंने एक यज्ञ की आहुति की तरह पवित्र माना। यह अंश यह संदेश देता है कि जब व्यक्ति का कर्तव्य पूरा हो जाता है, तो वह मृत्यु को भी एक उत्सव और स्नेहिल मिलन की तरह गले लगाता है। लेखक ने भीष्म के माध्यम से एक ऐसे योद्धा का चरित्र उकेरा है जो दर्द में भी अपने शिष्य की योग्यता पर गर्व करता है। यह दार्शनिक व्याख्या भीष्म के चरित्र को ईश्वरीय ऊंचाइयों तक ले जाती है, जहाँ पीड़ा और प्रेम एकरूप हो जाते हैं।

२. विशदीकरण संकेत : "भीष्म अप्रतिम आभा विखेरते हुए श्रीकृष्ण से बोले-वासुदेव, अपने प्रिय सखा को यह निर्देश दें कि रण-भूमि में मुझे वीरोचित मरण देकर जग में सुयश ले... रणाङ्गण में इस प्रकार का व्यामोह तुम्हें शोभा नहीं दे रहा है।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'भीष्म का शिखण्डी से सामना' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : भीष्म का मृत्यु-वरण के लिए आह्वान और श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को कर्मयोग की पुनः दीक्षा।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : यह अंश महाभारत के युद्ध का एक अत्यंत नाटकीय और नैतिक बिंदु है। भीष्म का स्वयं को 'वीरोचित मरण' हेतु प्रस्तुत करना उनके 'क्षय' होते हुए शरीर और 'अमर' होते हुए यश का संगम है। वे जानते थे कि युद्धभूमि में व्यामोह (Delusion) केवल पराजय लाता है। भीष्म ने अर्जुन को एक योद्धा की तरह व्यवहार करने की चुनौती दी। 'मत्त गजकेशरी को लाठी से वश में करना' संभव नहीं है—इस उदाहरण से भीष्म ने स्पष्ट किया कि शिखण्डी का प्रयास व्यर्थ है, केवल अर्जुन की वीरता ही उन्हें शांत कर सकती है।

श्रीकृष्ण का उत्तर यहाँ अर्जुन की दुविधा को समाप्त करने के लिए था। कृष्ण ने अर्जुन को याद दिलाया कि भीष्म 'परम भागवत' (ईश्वर के भक्त) हैं, और वे स्वयं इस अंत को चाहते हैं। 'अनासक्त मन से युद्ध करना' गीता का वही सार है जिसे कृष्ण ने प्रथम दिन समझाया था। न्याय-अन्याय और पाप-पुण्य के द्वंद्व से ऊपर उठना ही उस क्षण का 'सर्वोत्तम धर्म' था। कृष्ण की 'कुटिल मुस्कान' यहाँ नियति के उस कठोर सत्य को छिपाए हुए थी जिसे अर्जुन नहीं देख पा रहे थे। लेखक स्पष्ट करते हैं कि जब उद्देश्य धर्म की रक्षा हो, तो अपनों पर शस्त्र उठाना भी एक आध्यात्मिक साधना बन जाती है। भीष्म की इच्छा और कृष्ण का आदेश मिलकर अर्जुन के गाण्डीव को पुनः जाग्रत करते हैं। यह प्रसंग गुरु-शिष्य के संबंध और ईश्वर की योजना के बीच के उस जटिल जाल को बुनता है, जहाँ अंततः सत्य और कर्तव्य की ही विजय होती है। भीष्म का मरण केवल एक योद्धा का अंत नहीं, बल्कि अधर्म के पक्ष में खड़ी एक महान दीवार का हटना था।

३. विशदीकरण संकेत : "सहसा उनके मुख से निकला-वासुदेव की जय और वे रथ से नीचे लुढ़क गये... पार्थ ने एक बाण मारा जिससे पाताल-गंगा प्रकट होकर स्वतः भीष्म के मुख में गिरकर उनकी पिपासा शान्त की।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'भीष्म का शिखण्डी से सामना' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : भीष्म के पतन की दिव्यता, शर-शय्या का दृश्य और अर्जुन की अपूर्व सेवा का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने भीष्म के पतन को एक 'महाकाव्यात्मक त्रासदी' और 'दैवीय चमत्कार' के रूप में चित्रित किया है। भीष्म का 'वासुदेव की जय' कहना उनके भक्ति-भाव की पराकाष्ठा है। उनका शरीर असंख्य बाणों से बिंधकर भूमि से ऊपर टिका रहना 'शर-सय्या' के उस अलोकिक बिम्ब को साकार करता है, जो भारतीय साहित्य में अमर है। रणभूमि में व्याप्त 'हाहाकार' और फिर 'अजीब खामोशी' यह सिद्ध करती है कि भीष्म के गिरने से समय भी एक पल के लिए ठहर गया था।

अर्जुन का 'अपराध-बोध' और उनकी 'वारि-धारा' (आँसू) उनके भीतर के मनुष्य और शिष्य को जीवित रखते हैं। भीष्म ने जब 'वीरोचित तकिया' माँगा, तो उन्होंने उन सांसारिक सुखों को त्याग दिया था। अर्जुन द्वारा तीन बाणों से सिर को सहारा देना और बाण से 'पाताल-गंगा' को प्रकट करना, भीष्म की प्यास बुझाने के साथ-साथ उनके कुल (गंगा-पुत्र) की मर्यादा को भी अक्षुण्ण रखता है। यह दृश्य वीरता और सेवा का ऐसा उदाहरण है जो अन्यत्र दुर्लभ है। भीष्म का उत्तरायण तक रुकने का निर्णय उनकी संकल्प शक्ति और ज्योतिषीय नियमों के प्रति उनके सम्मान को दर्शाता है। वे शर-शय्या पर रहकर भी 'प्रायश्चित' करना चाहते थे, जो उनके चरित्र की निष्कलंकता और आत्म-मंथन की प्रवृत्ति को उजागर करता है। पाताल-गंगा का निकलना यह प्रमाणित करता है कि प्रकृति भी भीष्म जैसे महामानव की सेवा के लिए व्याकुल थी। यह अंश पाठक के मन में श्रद्धा, करुणा और विस्मय के भाव एक साथ जाग्रत करता है।

४. विशदीकरण संकेत : "सबके चले जाने के बाद कर्ण आया... तुम भी कुन्ती के ज्येष्ठ पुत्र होकर भी किस तरह काल-चक्र में फँस गये हो... कर्ण अवरुद्ध गले से बोला-पितामह मैं आपकी भावना से अवगत हूँ... जाओ वत्स! अपने कर्तव्य का पालन करो।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'भीष्म का शिखण्डी से सामना' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : भीष्म और कर्ण के मध्य हुआ एकांत वार्तालाप, जिसमें जन्म का रहस्य और कर्तव्य की विवशता का मार्मिक चित्रण है।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : पाठ का यह अंतिम भाग महाभारत के सबसे प्रभावशाली और गोपनीय संवादों में से एक है। कर्ण और भीष्म का संबंध हमेशा से तनावपूर्ण रहा था, किंतु मृत्यु के द्वार पर खड़ा योद्धा (भीष्म) सत्य की ज्योति से आलोकित है। कर्ण की शिकायत—'बदले में तिरस्कार पाया'—उसकी उस जीवन भर की पीड़ा को व्यक्त करती है जिसे उसने 'सूतपुत्र' होने के कारण सहा था। भीष्म का गला भर आना उनके पश्चाताप और कर्ण के प्रति उनके वास्तविक स्नेह का प्रतीक है। उन्होंने स्वीकार किया कि 'तुम मुझे अर्जुन के समान ही प्रिय हो'। भीष्म का यह कहना कि 'तुम कुंती के ज्येष्ठ पुत्र हो', कर्ण के लिए एक बड़ा आघात और गौरव दोनों था।

भीष्म ने कर्ण को 'काल-चक्र' से निकलने का अंतिम अवसर दिया—युधिष्ठिर से परिचय कराकर युद्ध रोकने का। भीष्म की यह कूटनीति शांति स्थापना का अंतिम प्रयास थी। किंतु कर्ण का उत्तर उसकी महानता और उसके दुर्भाग्य की चरम सीमा है। कर्ण जानता था कि वह अधर्म के पक्ष में है, किंतु दुर्योधन के 'प्रत्युपकार' और मित्रता के ऋण ने उसे जकड़ रखा था। कर्ण का यह कहना कि 'श्रीकृष्ण और कुंती भी मुझे यह रहस्य बता चुके हैं', यह सिद्ध करता है कि कर्ण जानबूझकर मृत्यु के पथ पर बढ़ रहा था।

भीष्म का कर्ण को 'वत्स' कहना और उसे 'कर्तव्य पालन' का आशीर्वाद देना, एक ऐसी त्रासदी का समापन है जहाँ दो महान लोग अपनी-अपनी प्रतिज्ञाओं और वचनों के कारण आपस में टकराने या एक-दूसरे को खोने के लिए अभिशप्त हैं। भीष्म ने कर्ण की ईमानदारी और उसके मित्र-धर्म को पहचाना और उसे स्वतंत्र कर दिया। यह संवाद स्पष्ट करता है कि महाभारत केवल सेनाओं का युद्ध नहीं था, बल्कि वह उन आत्माओं का संघर्ष था जो सत्य जानते हुए भी अपनी भूमिकाओं (Roles) से बंधी हुई थीं। कर्ण का जाना और भीष्म का शर-शय्या पर मौन होना एक युग के अंत की ओर संकेत है।

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