लाल पान की बेगम-फणीश्वरनाथ रेणु : विस्तृत समीक्षा, सारांश एवं व्याख्या

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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कहानी : 'लाल पान की बेगम'
कहानीकार : 'फणीश्वरनाथ ‘रेणु’'
युग : आधुनिक काल (आंचलिक कथा धारा)
कहानी के पात्र : बिरजू की माँ, बिरजू के बापा, चंपिया, बिरजू, जंगी की पुतोहू, मखनी फुआ
मूल प्रतिपाद्य : ग्रामीण जीवन का उल्लास, आत्म-सम्मान और स्त्री-मनोविज्ञान
भाषा-शैली : आंचलिक, सजीव, बिम्बात्मक और लोक-मुहावरेदार

१. कहानीकार का परिचय

फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ (1921-1977) हिंदी साहित्य में 'आंचलिकता' के जनक माने जाते हैं। उनका जन्म बिहार के पूर्णिया जिले के 'औराही हिंगना' गाँव में हुआ था। रेणु जी ने हिंदी कथा-साहित्य को एक नई दिशा दी, जहाँ उन्होंने शहर की चकाचौंध को छोड़ गाँव की पगडंडियों, धूल-धूप, लोक-गीतों और वहाँ के आम आदमी की व्यथा व उल्लास को अपना विषय बनाया। उनका उपन्यास 'मैला आँचल' हिंदी साहित्य की एक कालजयी कृति है, जिसने साहित्य जगत में तहलका मचा दिया था। रेणु जी की लेखनी में लोक-जीवन की ऐसी गंध है जो पाठक को सीधे गाँव की मिट्टी से जोड़ देती है। उनकी कहानियों में पात्रों की मनोदशा का सूक्ष्म चित्रण और भाषा में आंचलिक शब्दों का सहज प्रयोग उन्हें विशिष्ट बनाता है। 'तीसरी कसम' और 'लाल पान की बेगम' जैसी कहानियाँ स्त्री-मन के कोमल और स्वाभिमानी पक्षों को बड़ी प्रखरता से उजागर करती हैं। रेणु जी केवल लेखक नहीं, बल्कि लोक-संस्कृति के चितेरे थे। उन्होंने समाज के वंचित वर्ग के जीवन में छिपे सौंदर्य को पहचाना और उसे शब्दों में ढाला। उनके साहित्य में लोक-भाषा के मुहावरे और ग्रामीण परिवेश के सजीव चित्र एक अद्भुत संगीत की तरह गूँजते हैं।

२. मूल कहानी (संपूर्ण पाठ)

'क्यों बिरजू की माँ, नाच देखने नहीं जाएगी क्या?'

बिरजू की माँ शकरकंद उबाल कर बैठी मन-ही-मन कुढ़ रही थी अपने आँगन में। सात साल का लड़का बिरजू शकरकंद के बदले तमाचे खा कर आँगन में लोट-पोट कर सारी देह में मिट्टी मल रहा था। चंपिया के सिर भी चुड़ैल मँडरा रही है... आधे-आँगन धूप रहते जो गई है सहुआन की दुकान छोवा-गुड़ लाने, सो अभी तक नहीं लौटी, दीया-बाती की बेला हो गई। आए आज लौटके जरा! बागड़ बकरे की देह में कुकुरमाछी लगी थी, इसलिए बेचारा बागड़ रह-रह कर कूद-फाँद कर रहा था। बिरजू की माँ बागड़ पर मन का गुस्सा उतारने का बहाना ढूँढ़ कर निकाल चुकी थी। ...पिछवाड़े की मिर्च की फूली गाछ! बागड़ के सिवा और किसने कलेवा किया होगा! बागड़ को मारने के लिए वह मिट्टी का छोटा ढेला उठा चुकी थी, कि पड़ोसिन मखनी फुआ की पुकार सुनाई पड़ी - 'क्यों बिरजू की माँ, नाच देखने नहीं जाएगी क्या?'

'बिरजू की माँ के आगे नाथ और पीछे पगहिया न हो तब न, फुआ!'

गरम गुस्से में बुझी नुकीली बात फुआ की देह में धँस गई और बिरजू के माँ ने हाथ के ढेले को पास ही फेंक दिया - 'बेचारे बागड़ को कुकुरमाछी परेशान कर रही है। आ-हा, आय... आय! हर्र-र-र! आय-आय!'

बिरजू ने लेटे-ही-लेटे बागड़ को एक डंडा लगा दिया। बिरजू की माँ की इच्छा हुई कि जा कर उसी डंडे से बिरजू का भूत भगा दे, किंतु नीम के पास खड़ी पनभरनियों की खिलखिलाहट सुन कर रुक गई। बोली, 'ठहर, तेरे बप्पा ने बड़ा हथछुट्टा बना दिया है तुझे! बड़ा हाथ चलता है लोगों पर। ठहर!'

मखनी फुआ नीम के पास झुकी कमर से घड़ा उतार कर पानी भर कर लौटती पनभरनियों में बिरजू की माँ की बहकी हुई बात का इंसाफ करा रही थी - 'जरा देखो तो इस बिरजू की माँ को! चार मन पाट(जूट)का पैसा क्या हुआ है, धरती पर पाँव ही नहीं पड़ते! निसाफ करो! खुद अपने मुँह से आठ दिन पहले से ही गाँव की गली-गली में बोलती फिरी है, 'हाँ, इस बार बिरजू के बप्पा ने कहा है, बैलगाड़ी पर बिठा कर बलरामपुर का नाच दिखा लाऊँगा। बैल अब अपने घर है, तो हजार गाड़ी मँगनी मिल जाएँगी।' सो मैंने अभी टोक दिया, नाच देखनेवाली सब तो औन-पौन कर तैयार हो रही हैं, रसोई-पानी कर रहे हैं। मेरे मुँह में आग लगे, क्यों मैं टोकने गई! सुनती हो, क्या जवाब दिया बिरजू की माँ ने?'

मखनी फुआ ने अपने पोपले मुँह के होंठों को एक ओर मोड़ कर ऐठती हुई बोली निकाली - 'अर्-र्रे-हाँ-हाँ! बि-र-र-ज्जू की मै...या के आगे नाथ औ-र्र पीछे पगहिया ना हो, तब ना-आ-आ !'

जंगी की पुतोहू बिरजू की माँ से नही डरती। वह जरा गला खोल कर ही कहती है, 'फुआ-आ! सरबे सित्तलर्मिटी (सर्वे सेट्लमेंट) के हाकिम के बासा पर फूलछाप किनारीवाली साड़ी पहन के तू भी भटा की भेंटी चढ़ाती तो तुम्हारे नाम से भी दु-तीन बीघा धनहर जमीन का पर्चा कट जाता! फिर तुम्हारे घर भी आज दस मन सोनाबंग पाट होता, जोड़ा बैल खरीदता! फिर आगे नाथ और पीछे सैकड़ो पगहिया झूलती!'

जंगी की पुतोहू मुँहजोर है। रेलवे स्टेशन के पास की लड़की है। तीन ही महीने हुए, गौने की नई बहू हो कर आई है और सारे कुर्माटोली की सभी झगड़ालू सासों से एकाध मोरचा ले चुकी है। उसका ससुर जंगी दागी चोर है, सी-किलासी है। उसका खसम रंगी कुर्माटोली का नामी लठैत। इसीलिए हमेशा सींग खुजाती फिरती जंगी की पुतोहू!

बिरजू की माँ के आँगन में जंगी की पुतोहू की गला-खोल बोली गुलेल की गोलियों की तरह दनदनाती हुई आई थी। बिरजू के माँ ने एक तीखा जवाब खोज कर निकाला, लेकिन मन मसोस कर रह गई। ...गोबर की ढेरी में कौन ढेला फेंके!

जीभ के झाल को गले में उतार कर बिरजू की माँ ने अपनी बेटी चंपिया को आवाज दी - 'अरी चंपिया-या-या, आज लौटे तो तेरी मूड़ी मरोड़ कर चूल्हे में झोंकती हूँ! दिन-दिन बेचाल होती जाती है! ...गाँव में तो अब ठेठर-बैसकोप का गीत गानेवाली पतुरिया-पुतोहू सब आने लगी हैं। कहीं बैठके 'बाजे न मुरलिया' सीख रही होगी ह-र-जा-ई-ई! अरी चंपिया-या-या!'

जंगी की पुतोहू ने बिरजू की माँ की बोली का स्वाद ले कर कमर पर घड़े को सँभाला और मटक कर बोली, 'चल दिदिया, चल! इस मुहल्ले में लाल पान की बेगम बसती है! नहीं जानती, दोपहर-दिन और चौपहर-रात बिजली की बत्ती भक्-भक् कर जलती है!'

भक्-भक् बिजली-बत्ती की बात सुन कर न जाने क्यों सभी खिलखिला कर हँस पड़ी। फुआ की टूटी हुई दंत-पंक्तियों के बीच से एक मीठी गाली निकली - 'शैतान की नानी!'

बिरजू की माँ की आँखो पर मानो किसी ने तेज टार्च की रोशनी डाल कर चौंधिया दिया। ...भक्-भक् बिजली-बत्ती! तीन साल पहले सर्वे कैंप के बाद गाँव की जलनडाही औरतों ने एक कहानी गढ़ के फैलाई थी, चंपिया की माँ के आँगन में रात-भर बिजली-बत्ती भुकभुकाती थी! चंपिया की माँ के आँगन में नाकवाले जूते की छाप घोड़े की टाप की तरह। ...जलो, जलो! और जलो! चंपिया की माँ के आँगन में चाँदी-जैसे पाट सूखते देख कर जलनेवाली सब औरतें खलिहान पर सोनोली धान के बोझों को देख कर बैंगन का भुर्ता हो जाएँगी।

मिट्टी के बरतन से टपकते हुए छोवा-गुड़ को उँगलियों से चाटती हुई चंपिया आई और माँ के तमाचे खा कर चीख पड़ी - 'मुझे क्यों मारती है-ए-ए-ए! सहुआइन जल्दी से सौदा नहीं देती है-एँ-एँ-एँ-एँ!'

'सहुआइन जल्दी सौदा नहीं देती की नानी! एक सहुआइन की दुकान पर मोती झरते हैं, जो जड़ गाड़ कर बैठी हुई थी! बोल, गले पर लात दे कर कल्ला तोड़ दूँगी हरजाई, जो फिर कभी 'बाजे न मुरलिया' गाते सुना! चाल सीखने जाती है टीशन की छोकरियों से!'

बिरजू के माँ ने चुप हो कर अपनी आवाज अंदाजी कि उसकी बात जंगी के झोंपड़े तक साफ-साफ पहुँच गई होगी।

बिरजू बीती हुई बातों को भूल कर उठ खड़ा हुआ था और धूल झाड़ते हुए बरतन से टपकते गुड़ को ललचाई निगाह से देखने लगा था। ...दीदी के साथ वह भी दुकान जाता तो दीदी उसे भी गुड़ चटाती, जरुर! वह शकरकंद के लोभ में रहा और माँगने पर माँ ने शकरकंद के बदले...

'ए मैया, एक अँगुली गुड़ दे दे बिरजू ने तलहथी फैलाई - दे ना मैया, एक रत्ती भर!'

'एक रत्ती क्यों, उठाके बरतन को फेंक आती हूँ पिछवाड़े में, जाके चाटना! नहीं बनेगी मीठी रोटी! ...मीठी रोटी खाने का मुँह होता है बिरजू की माँ ने उबले शकरकंद का सूप रोती हुई चंपिया के सामने रखते हुए कहा, बैठके छिलके उतार, नहीं तो अभी...!'

दस साल की चंपिया जानती है, शकरकंद छीलते समय कम-से-कम बारह बार माँ उसे बाल पकड़ कर झकझोरेगी, छोटी-छोटी खोट निकाल कर गालियाँ देगी - 'पाँव फैलाके क्यों बैठी है उस तरह, बेलल्जी!' चंपिया माँ के गुस्से को जानती है।

बिरजू ने इस मौके पर थोड़ी-सी खुशामद करके देखा - 'मैया, मैं भी बैठ कर शकरकंद छीलूँ?'

'नहीं?' माँ ने झिड़की दी, 'एक शकरकंद छीलेगा और तीन पेट में! जाके सिद्धू की बहू से कहो, एक घंटे के लिए कड़ाही माँग कर ले गई तो फिर लौटाने का नाम नहीं। जा जल्दी!'

मुँह लटका कर आँगन से निकलते-निकलते बिरजू ने शकरकंद और गुड़ पर निगाहें दौड़ाई। चंपिया ने अपने झबरे केश की ओट से माँ की ओर देखा और नजर बचा कर चुपके से बिरजू की ओर एक शकरकंद फेंक दिया। ...बिरजू भागा।

'सूरज भगवान डूब गए। दीया-बत्ती की बेला हो गई। अभी तक गाड़ी...

'चंपिया बीच में ही बोल उठी - 'कोयरीटोले में किसी ने गाड़ी नहीं दी मैया! बप्पा बोले, माँ से कहना सब ठीक-ठाक करके तैयार रहें। मलदहियाटोली के मियाँजान की गाड़ी लाने जा रहा हूँ।'

सुनते ही बिरजू की माँ का चेहरा उतर गया। लगा, छाते की कमानी उतर गई घोड़े से अचानक। कोयरीटोले में किसी ने गाड़ी मँगनी नहीं दी! तब मिल चुकी गाड़ी! जब अपने गाँव के लोगों की आँख में पानी नहीं तो मलदहियाटोली के मियाँजान की गाड़ी का क्या भरोसा! न तीन में न तेरह में! क्या होगा शकरकंद छील कर! रख दे उठा के! ...यह मर्द नाच दिखाएगा। बैलगाड़ी पर चढ़ कर नाच दिखाने ले जाएगा! चढ़ चुकी बैलगाड़ी पर, देख चुकी जी-भर नाच... पैदल जानेवाली सब पहुँच कर पुरानी हो चुकी होंगी।

बिरजू छोटी कड़ाही सिर पर औंधा कर वापस आया - 'देख दिदिया, मलेटरी टोपी! इस पर दस लाठी मारने पर भी कुछ नहीं होता।'

चंपिया चुपचाप बैठी रही, कुछ बोली नहीं, जरा-सी मुस्कराई भी नहीं। बिरजू ने समझ लिया, मैया का गुस्सा अभी उतरा नहीं है पूरे तौर से।

मढ़ैया के अंदर से बागड़ को बाहर भगाती हुई बिरजू की माँ बड़बड़ाई - 'कल ही पँचकौड़ी कसाई के हवाले करती हूँ राकस तुझे! हर चीज में मुँह लगाएगा। चंपिया, बाँध दे बागड़ को। खोल दे गले की घंटी! हमेशा टुनुर-टुनुर! मुझे जरा नहीं सुहाता है!'

'टुनुर-टुनुर' सुनते ही बिरजू को सड़क से जाती हुई बैलगाड़ियों की याद हो आई - 'अभी बबुआनटोले की गाड़ियाँ नाच देखने जा रही थीं... झुनुर-झुनुर बैलों की झुमकी, तुमने सु...'

'बेसी बक-बक मत करो!' बागड़ के गले से झुमकी खोलती बोली चंपिया।

'चंपिया,डाल दे चूल्हे में पानी! बप्पा आवे तो कहना कि अपने उड़नजहाज पर चढ़ कर नाच देख आएँ! मुझे नाच देखने का सौख नहीं! ...मुझे जगैयो मत कोई! मेरा माथा दुख रहा है।'

मढ़ैया के ओसारे पर बिरजू ने फिसफिसा के पूछा, 'क्यों दिदिया, नाच में उड़नजहाज भी उड़ेगा?'

चटाई पर कथरी ओढ़ कर बैठती हुई चंपिया ने बिरजू को चुपचाप अपने पास बैठने का इशारा किया, मुफ्त में मार खाएगा बेचारा!

बिरजू ने बहन की कथरी में हिस्सा बाँटते हुए चुक्की-मुक्की लगाई। जाड़े के समय इस तरह घुटने पर ठुड्डी रख कर चुक्की-मिक्की लगाना सीख चुका है वह। उसने चंपिया के कान के पास मुँह ले जा कर कहा, 'हम लोग नाच देखने नहीं जाएँगे? ...गाँव में एक पंछी भी नहीं है। सब चले गए।'

चंपिया को तिल-भर भी भरोसा नहीं। संझा तारा डूब रहा है। बप्पा अभी तक गाड़ी ले कर नहीं लौटे। एक महीना पहले से ही मैया कहती थी, बलरामपुर के नाच के दिन मीठी रोटी बनेगी, चंपिया छींट की साड़ी पहनेगी, बिरजू पैंट पहनेगा, बैलगाड़ी पर चढ़ कर-

चंपिया की भीगी पलकों पर एक बूँद आँसू आ गया।

बिरजू का भी दिल भर आया। उसने मन-ही-मन में इमली पर रहनेवाले जिनबाबा को एक बैंगन कबूला, गाछ का सबसे पहला बैंगन, उसने खुद जिस पौधे को रोपा है! ...जल्दी से गाड़ी ले कर बप्पा को भेज दो, जिनबाबा!

मढ़ैया के अंदर बिरजू की माँ चटाई पर पड़ी करवटें ले रही थी। उँह, पहले से किसी बात का मनसूबा नहीं बाँधना चाहिए किसी को! भगवान ने मनसूबा तोड़ दिया। उसको सबसे पहले भगवान से पूछना है, यह किस चूक का फल दे रहे हो भोला बाबा! अपने जानते उसने किसी देवता-पित्तर की मान-मनौती बाकी नहीं रखी। सर्वे के समय जमीन के लिए जितनी मनौतियाँ की थीं... ठीक ही तो! महाबीर जी का रोट तो बाकी ही है। हाय रे दैव!... भूल-चूक माफ करो महाबीर बाबा! मनौती दूनी करके चढ़ाएगी बिरजू की माँ!...

बिरजू की माँ के मन में रह-रह कर जंगी की पुतोहू की बातें चुभती हैं, भक्-भक् बिजली-बत्ती!... चोरी-चमारी करनेवाली की बेटी-पुतोहू जलेगी नहीं! पाँच बीघा जमीन क्या हासिल की है बिरजू के बप्पा ने, गाँव की भाईखौकियों की आँखों में किरकिरी पड़ गई है। खेत में पाट लगा देख कर गाँव के लोगों की छाती फटने लगी, धरती फोड़ कर पाट लगा है, बैसाखी बादलों की तरह उमड़ते आ रहे हैं पाट के पौधे! तो अलान, तो फलान! इतनी आँखों की धार भला फसल सहे! जहाँ पंद्रह मन पाट होना चाहिए, सिर्फ दस मन पाट काँटा पर तौल के ओजन हुआ भगत के यहाँ।...

इसमें जलने की क्या बात है भला!... बिरजू के बप्पा ने तो पहले ही कुर्माटोली के एक-एक आदमी को समझा के कहा, 'जिंदगी-भर मजदूरी करते रह जाओगे। सर्वे का समय हो रहा है, लाठी कड़ी करो तो दो-चार बीघे जमीन हासिल कर सकते हो।' सो गाँव की किसी पुतखौकी का भतार सर्वे के समय बाबूसाहेब के खिलाफ खाँसा भी नहीं।... बिरजू के बप्पा को कम सहना पड़ा है! बाबूसाहेब गुस्से से सरकस नाच के बाघ की तरह हुमड़ते रह गए। उनका बड़ा बेटा घर में आग लगाने की धमकी देकर गया।... आखिर बाबूसाहेब ने अपने सबसे छोटे लड़के को भेजा। बिरजू की माँ को 'मौसी' कहके पुकारा - 'यह जमीन बाबू जी ने मेरे नाम से खरीदी थी। मेरी पढ़ाई-लिखाई उसी जमीन की उपज से चलती है।' ...और भी कितनी बातें। खूब मोहना जानता है उत्ता जरा-सा लड़का। जमींदार का बेटा है कि...

'चंपिया, बिरजू सो गया क्या? यहाँ आ जा बिरजू, अंदर। तू भी आ जा, चंपिया!... भला आदमी आए तो एक बार आज!'

बिरजू के साथ चंपिया अंदर चली गई ।

'ढिबरी बुझा दे।... बप्पा बुलाएँ तो जवाब मत देना। खपच्ची गिरा दे।'

भला आदमी रे, भला आदमी! मुँह देखो जरा इस मर्द का!... बिरजू की माँ दिन-रात मंझा न देती रहती तो ले चुके थे जमीन! रोज आ कर माथा पकड़ के बैठ जाएँ, 'मुझे जमीन नहीं लेनी है बिरजू की माँ, मजूरी ही अच्छी।'...जवाब देती थी बिरजू की माँ खूब सोच-समझके, 'छोड़ दो, जब तुम्हारा कलेजा ही स्थिर नहीं होता है तो क्या होगा? जोरु-जमीन जोर के, नहीं तो किसी और के!...

बिरजू के बाप पर बहुत तेजी से गुस्सा चढ़ता है। चढ़ता ही जाता है। ...बिरजू की माँ का भाग ही खराब है, जो ऐसा गोबरगणेश घरवाला उसे मिला। कौन-सा सौख-मौज दिया है उसके मर्द ने? कोल्हू के बैल की तरह खट कर सारी उम्र काट दी इसके यहाँ, कभी एक पैसे की जलेबी भी ला कर दी है उसके खसम ने! ...पाट का दाम भगत के यहाँ से ले कर बाहर-ही-बाहर बैल-हटटा चले गए। बिरजू की माँ को एक बार नमरी लोट देखने भी नहीं दिया आँख से। ...बैल खरीद लाए। उसी दिन से गाँव में ढिंढोरा पीटने लगे, बिरजू की माँ इस बार बैलगाड़ी पर चढ़ कर जाएगी नाच देखने! ...दूसरे की गाड़ी के भरोसे नाच दिखाएगा!...

अंत में उसे अपने-आप पर क्रोध हो आया। वह खुद भी कुछ कम नहीं! उसकी जीभ में आग लगे! बैलगाड़ी पर चढ़ कर नाच देखने की लालसा किसी कुसमय में उसके मुँह से निकली थी, भगवान जानें! फिर आज सुबह से दोपहर तक, किसी-न-किसी बहाने उसने अठारह बार बैलगाड़ी पर नाच देखने की चर्चा छेड़ी है। ...लो, खूब देखो नाच! कथरी के नीचे दुशाले का सपना! ...कल भोरे पानी भरने के लिए जब जाएगी, पतली जीभवाली पतुरिया सब हँसती आएँगी, हँसती जाएँगी। ...सभी जलते है उससे, हाँ भगवान, दाढ़ीजार भी! दो बच्चो की माँ हो कर भी वह जस-की-तस है। उसका घरवाला उसकी बात में रहता है। वह बालों में गरी का तेल डालती है। उसकी अपनी जमीन है। है किसी के पास एक घूर जमीन भी अपने इस गाँव में! जलेंगे नहीं, तीन बीघे में धान लगा हुआ है, अगहनी। लोगों की बिखदीठ से बचे, तब तो!

बाहर बैलों की घंटियाँ सुनाई पड़ीं। तीनों सतर्क हो गए। उत्कर्ण होकर सुनते रहे।

'अपने ही बैलों की घंटी है, क्यों री चंपिया?'

चंपिया और बिरजू ने प्राय: एक ही साथ कहा, 'हूँ-ऊँ-ऊँ!'

'चुप बिरजू की माँ ने फिसफिसा कर कहा, शायद गाड़ी भी है, घड़घड़ाती है न?'

'हूँ-ऊँ-ऊँ!' दोनों ने फिर हुँकारी भरी।

'चुप! गाड़ी नहीं है। तू चुपके से टट्टी में छेद करके देख तो आ चंपी! भागके आ, चुपके-चुपके।'

चंपिया बिल्ली की तरह हौले-हौले पाँव से टट्टी के छेद से झाँक आई - 'हाँ मैया, गाड़ी भी है!'

बिरजू हड़बड़ा कर उठ बैठा। उसकी माँ ने उसका हाथ पकड़ कर सुला दिया - 'बोले मत!'

चंपिया भी गुदड़ी के नीचे घुस गई।

बाहर बैलगाड़ी खोलने की आवाज हुई। बिरजू के बाप ने बैलों को जोर से डाँटा - 'हाँ-हाँ! आ गए घर! घर आने के लिए छाती फटी जाती थी!'

बिरजू की माँ ताड़ गई, जरुर मलदहियाटोली में गाँजे की चिलम चढ़ रही थी, आवाज तो बड़ी खनखनाती हुई निकल रही है।

'चंपिया-ह! बाहर से पुकार कर कहा उसके बाप ने, 'बैलों को घास दे दे, चंपिया-ह!'

अंदर से कोई जवाब नहीं आया। चंपिया के बाप ने आँगन में आ कर देखा तो न रोशनी, न चिराग, न चूल्हे में आग। ...बात क्या है! नाच देखने, उतावली हो कर, पैदल ही चली गई क्या...!

बिरजू के गले में खसखसाहट हुई और उसने रोकने की पूरी कोशिश भी की, लेकिन खाँसी जब शुरु हुई तो पूरे पाँच मिनट तक वह खाँसता रहा।

'बिरजू! बेटा बिरजमोहन!' बिरजू के बाप ने पुचकार कर बुलाया, मैया गुस्से के मारे सो गई क्या? ...अरे अभी तो लोग जा ही रहे हैं।'

बिरजू की माँ के मन में आया कि कस कर जवाब दे, नहीं देखना है नाच! लौटा दो गाड़ी!

'चंपिया-ह! उठती क्यों नहीं? ले, धान की पँचसीस रख दे। धान की बालियों का छोटा झब्बा झोंपड़े के ओसरे पर रख कर उसने कहा, 'दीया बालो!'

बिरजू की माँ उठ कर ओसारे पर आई - 'डेढ़ पहर रात को गाड़ी लाने की क्या जरुरत थी? नाच तो अब खत्म हो रहा होगा।'

ढिबरी की रोशनी में धान की बालियों का रंग देखते ही बिरजू की माँ के मन का सब मैल दूर हो गया। ...धानी रंग उसकी आँखों से उतर कर रोम-रोम में घुल गया।

'नाच अभी शुरु भी नहीं हुआ होगा। अभी-अभी बलमपुर के बाबू की संपनी गाड़ी मोहनपुर होटिल-बँगला से हाकिम साहब को लाने गई है। इस साल आखिरी नाच है।... पँचसीस टट्टी में खोंस दे, अपने खेत का है।'

'अपने खेत का? हुलसती हुई बिरजू की माँ ने पूछा, पक गये धान?'

'नहीं, दस दिन में अगहन चढ़ते-छढ़ते लाल हो कर झुक जाएँगी सारे खेत की बालियाँ! ...मलदहियाटोली पर जा रहा था, अपने खेत में धान देख कर आँखें जुड़ा गईं। सच कहता हूँ, पँचसीस तोड़ते समय उँगलियाँ काँप रही थीं मेरी!'

बिरजू ने धान की एक बाली से एक धान ले कर मुँह में डाल लिया और उसकी माँ ने एक हल्की डाँट दी - 'कैसा लुक्क्ड़ है तू रे! ...इन दुश्मनों के मारे कोई नेम-धरम बचे!'

'क्या हुआ, डाँटती क्यों है?'

'नवान्न के पहले ही नया धान जुठा दिया, देखते नहीं?'

'अरे,इन लोगों का सब कुछ माफ है। चिरई-चुरमुन हैं यह लोग! दोनों के मुँह में नवान्न के पहले नया अन्न न पड़े?'

इसके बाद चंपिया ने भी धान की बाली से दो धान लेकर दाँतों-तले दबाए - 'ओ मैया! इतना मीठा चावल!'

'और गमकता भी है न दिदिया?' बिरजू ने फिर मुँह में धान लिया।

'रोटी-पोटी तैयार कर चुकी क्या?' बिरजू के बाप ने मुस्कराकर पूछा।

'नहीं!' मान-भरे सुर में बोली बिरजू की माँ, 'जाने का ठीक-ठिकाना नहीं... और रोटी बनाती!'

'वाह! खूब हो तुम लोग!...जिसके पास बैल है, उसे गाड़ी मँगनी नहीं मिलेगी भला? गाड़ीवालो को भी कभी बैल की जरुरत होगी। ...पूछूँगा तब कोयरीटोलावालों से! ...ले, जल्दी से रोटी बना ले।'

'देर नहीं होगी!'

'अरे, टोकरी भर रोटी तो तू पलक मारते बना देती है, पाँच रोटियाँ बनाने में कितनी देर लगेगी!'

अब बिरजू की माँ के होंठों पर मुस्कराहट खुल कर खिलने लगी। उसने नजर बचा कर देखा, बिरजू का बप्पा उसकी ओर एकटक निहार रहा है। ...चंपिया और बिरजू न होते तो मन की बात हँस कर खोलने में देर न लगती। चंपिया और बिरजू ने एक-दूसरे को देखा और खुशी से उनके चेहरे जगमगा उठे - 'मैया बेकार गुस्सा हो रही थी न!'

'चंपी! जरा घैलसार में खड़ी हो कर मखनी फुआ को आवाज दे तो!'

'ऐ फू-आ-आ! सुनती हो फूआ-आ! मैया बुला रही है!'

फुआ ने कोई जवाब नहीं दिया, किंतु उसकी बड़बड़ाहट स्पष्ट सुनाई पड़ी - 'हाँ! अब फुआ को क्यों गुहारती है? सारे टोले में बस एक फुआ ही तो बिना नाथ-पगहियावाली है।'

'अरी फुआ!' बिरजू की माँ ने हँस कर जवाब दिया, 'उस समय बुरा मान गई थी क्या? नाथ-पगहियावाले को आ कर देखो, दोपहर रात में गाड़ी लेकर आया है! आ जाओ फुआ, मैं मीठी रोटी पकाना नहीं जानती।'

फुआ काँखती-खाँसती आई - 'इसी के घड़ी-पहर दिन रहते ही पूछ रही थी कि नाच देखने जाएगी क्या? कहती, तो मैं पहले से ही अपनी अँगीठी यहाँ सुलगा जाती।'

बिरजू की माँ ने फुआ को अँगीठी दिखला दी और कहा, 'घर में अनाज-दाना वगैरह तो कुछ है नहीं। एक बागड़ है और कुछ बरतन-बासन, सो रात-भर के लिए यहाँ तंबाकू रख जाती हूँ। अपना हुक्का ले आई हो न फुआ?'

फुआ को तंबाकू मिल जाए, तो रात-भर क्या, पाँच रात बैठ कर जाग सकती है। फुआ ने अँधेरे में टटोल कर तंबाकू का अंदाज किया... ओ-हो! हाथ खोल कर तंबाकू रखा है बिरजू की माँ ने! और एक वह है सहुआइन! राम कहो! उस रात को अफीम की गोली की तरह एक मटर-भर तंबाकू रख कर चली गई गुलाब-बाग मेले और कह गई कि डिब्बी-भर तंबाकू है।

बिरजू की माँ चूल्हा सुलगाने लगी। चंपिया ने शकरकंद को मसल कर गोले बनाए और बिरजू सिर पर कड़ाही औंधा कर अपने बाप को दिखलाने लगा - 'मलेटरी टोपी! इस पर दस लाठी मारने पर भी कुछ नहीं होता।'

सभी ठठा कर हँस पड़े। बिरजू की माँ हँस कर बोली, 'ताखे पर तीन-चार मोटे शकरकंद हैं, दे दे बिरजू को चंपिया, बेचारा शाम से ही...'

'बेचारा मत कहो मैया, खूब सचारा है' अब चंपिया चहकने लगी, 'तुम क्या जानो, कथरी के नीचे मुँह क्यों चल रहा था बाबू साहब का!'

'ही-ही-ही!'

बिरजू के टूटे दूध के दाँतो की फाँक से बोली निकली, 'बिलैक-मारटिन में पाँच शकरकंद खा लिया! हा-हा-हा!'

सभी फिर ठठा कर हँस पड़े। बिरजू की माँ ने फुआ का मन रखने के लिए पूछा, 'एक कनवाँ गुड़ है। आधा दूँ फुआ?'

फुआ ने गदगद हो कर कहा, 'अरी शकरकंद तो खुद मीठा होता है, उतना क्यों डालेगी?'

जब तक दोनों बैल दाना-घास खा कर एक-दूसरे की देह को जीभ से चाटें, बिरजू की माँ तैयार हो गई। चंपिया ने छींट की साड़ी पहनी और बिरजू बटन के अभाव में पैंट पर पटसन की डोरी बँधवाने लगा।

बिरजू के माँ ने आँगन से निकल गाँव की ओर कान लगा कर सुनने की चेष्टा की - 'उँहुँ, इतनी देर तक भला पैदल जानेवाले रुके रहेंगे?'

पूर्णिमा का चाँद सिर पर आ गया है। ...बिरजू की माँ ने असली रुपा का मँगटिक्का पहना है आज, पहली बार। बिरजू के बप्पा को हो क्या गया है, गाड़ी जोतता क्यों नहीं, मुँह की ओर एकटक देख रहा है, मानो नाच की लाल पान की...

गाड़ी पर बैठते ही बिरजू की माँ की देह में एक अजीब गुदगुदी लगने लगी। उसने बाँस की बल्ली को पकड़ कर कहा, 'गाड़ी पर अभी बहोत जगह है। ...जरा दाहिनी सड़क से गाड़ी हाँकना।'

बैल जब दौड़ने लगे और पहिया जब चूँ-चूँ करके घरघराने लगा तो बिरजू से नहीं रहा गया - 'उड़नजहाज की तरह उड़ाओ बप्पा!'

गाड़ी जंगी के पिछवाड़े पहुँची। बिरजू की माँ ने कहा, 'जरा जंगी से पूछो न, उसकी पुतोहू नाच देखने चली गई क्या?'

गाड़ी के रुकते ही जंगी के झोंपड़े से आती हुई रोने की आवाज स्पष्ट हो गई। बिरजू के बप्पा ने पूछा, 'अरे जंगी भाई, काहे कन्न-रोहट हो रहा है आँगन में?'

जंगी घूर ताप रहा था, बोला, 'क्या पूछते हो, रंगी बलरामपुर से लौटा नहीं, पुतोहिया नाच देखने कैसे जाए! आसरा देखते-देखते उधर गाँव की सभी औरतें चली गई।'

'अरी टीशनवाली, तो रोती है काहे!' बिरजू की माँ ने पुकार कर कहा, 'आ जा झट से कपड़ा पहन कर। सारी गाड़ी पड़ी हुई है! बेचारी! ...आ जा जल्दी!'

बगल के झोंपड़े से राधे की बेटी सुनरी ने कहा, 'काकी, गाड़ी में जगह है? मैं भी जाऊँगी।'

बाँस की झाड़ी के उस पार लरेना खवास का घर है। उसकी बहू भी नहीं गई है। गिलट का झुमकी-कड़ा पहन कर झमकती आ रही है।

'आ जा! जो बाकी रह गई हैं, सब आ जाएँ जल्दी!'

जंगी की पुतोहू, लरेना की बीवी और राधे की बेटी सुनरी, तीनों गाड़ी के पास आई। बैल ने पिछला पैर फेंका। बिरजू के बाप ने एक भद्दी गाली दी - 'साला! लताड़ मार कर लँगड़ी बनाएगा पुतोहू को!'

सभी ठठा कर हँस पड़े। बिरजू के बाप ने घूँघट में झुकी दोनों पुतोहूओं को देखा। उसे अपने खेत की झुकी हुई बालियों की याद आ गई।

जंगी की पुतोहू का गौना तीन ही मास पहले हुआ है। गौने की रंगीन साड़ी से कड़वे तेल और लठवा-सिंदूर की गंध आ रही है। बिरजू की माँ को अपने गौने की याद आई। उसने कपड़े की गठरी से तीन मीठी रोटियाँ निकाल कर कहा, 'खा ले एक-एक करके। सिमराह के सरकारी कूप में पानी पी लेना।'

गाड़ी गाँव से बाहर हो कर धान के खेतों के बगल से जाने लगी। चाँदनी, कातिक की! ...खेतों से धान के झरते फूलों की गंध आती है। बाँस की झाड़ी में कहीं दुद्धी की लता फूली है। जंगी की पुतोहू ने एक बीड़ी सुलगा कर बिरजू की माँ की ओर बढ़ाई। बिरजू की माँ को अचानक याद आई चंपिया, सुनरी, लरेना की बीवी और जंगी की पुतोहू, ये चारों ही गाँव में बैसकोप का गीत गाना जानती हैं। ...खूब!

गाड़ी की लीक धनखेतों के बीच हो कर गई। चारों ओर गौने की साड़ी की खसखसाहट-जैसी आवाज होती है। ...बिरजू की माँ के माथे के मँगटिक्के पर चाँदनी छिटकती है।

'अच्छा, अब एक बैसकोप का गीत गा तो चंपिया! ...डरती है काहे? जहाँ भूल जाओगी, बगल में मासटरनी बैठी ही है!'

दोनों पुतोहुओं ने तो नहीं, किंतु चंपिया और सुनरी ने खँखार कर गला साफ किया।

बिरजू के बाप ने बैलों को ललकारा - 'चल भैया! और जरा जोर से!... गा रे चंपिया, नहीं तो मैं बैलों को धीरे-धीरे चलने को कहूँगा।'

जंगी की पुतोहू ने चंपिया के कान के पास घूँघट ले जा कर कुछ कहा और चंपिया ने धीमे से शुरु किया - 'चंदा की चाँदनी...'

बिरजू को गोद में ले कर बैठी उसकी माँ की इच्छा हुई कि वह भी साथ-साथ गीत गाए। बिरजू की माँ ने जंगी की पुतोहू को देखा, धीरे-धीरे गुनगुना रही है वह भी। कितनी प्यारी पुतोहू है! गौने की साड़ी से एक खास किस्म की गंध निकलती है। ठीक ही तो कहा है उसने! बिरजू की माँ बेगम है, लाल पान की बेगम! यह तो कोई बुरी बात नहीं। हाँ, वह सचमुच लाल पान की बेगम है!

बिरजू की माँ ने अपनी नाक पर दोनों आँखों को केंद्रित करने की चेष्टा करके अपने रुप की झाँकी ली, लाला साड़ी की झिलमिल किनारी, मँगटिक्का पर चाँद। ...बिरजू की माँ के मन में अब और कोई लालसा नहीं। उसे नींद आ रही है।

३. कठिन शब्दार्थ

कुढ़ना = मन-ही-मन जलना, पगहिया = पशु को बाँधने वाली रस्सी, निसाफ = इंसाफ (न्याय), दागी चोर = पुराना अपराधी, हरजाई = बुरी स्त्री, मलेटरी = मिलिट्री (फौजी), कथरी = पुराने कपड़ों से बनी रजाई, मनसूबा = योजना, भाईखौकी = जलन रखने वाली, नमरी लोट = नोट (मुद्रा), उत्कर्ण = ध्यान से सुनना, पँचसीस = धान की बालियों का गुच्छा, नवान्न = नया अन्न, घैलसार = जहाँ पानी के घड़े रखे जाते हैं, काँखना = दर्द से कराहना, मँगटिक्का = माथे का आभूषण, बैसकोप = बायोस्कोप (सिनेमा), खवास = नौकर, अलान-फलान = फालतू की बातें, दंत-पंक्ति = दाँतों की कतार।

४. कहानी का सारांश

'लाल पान की बेगम' ग्रामीण जीवन के छोटे-छोटे सुखों, आपसी ईर्ष्या और अंततः मानवीय सद्भाव की एक बहुत ही सुंदर कहानी है। कहानी की नायिका 'बिरजू की माँ' एक स्वाभिमानी और थोड़ी तुनकमिज़ाज ग्रामीण स्त्री है। कहानी की शुरुआत में वह अत्यंत क्रोधित है क्योंकि उसके पति ने वादा किया था कि वे बैलगाड़ी पर बैठकर बलरामपुर का नाच देखने जाएँगे, लेकिन शाम हो गई और गाड़ी नहीं आई। इस गुस्से का शिकार उसके बच्चे, बिरजू और चंपिया होते हैं। साथ ही, गाँव की महिलाओं (विशेषकर मखनी फुआ और जंगी की पुतोहू) के साथ उसका वाक-युद्ध चलता है। बिरजू की माँ के पास अपनी ज़मीन है और अब बैल भी हैं, जिससे गाँव की अन्य महिलाएँ जलती हैं और उसे 'लाल पान की बेगम' कहकर चिढ़ाती हैं।

जैसे-जैसे रात बीतती है, बिरजू की माँ का नाच देखने का उत्साह निराशा और फिर क्रोध में बदल जाता है। वह चूल्हा बुझा देती है और सोने चली जाती है। तभी अचानक उसके पति 'बिरजू के बापा' अपनी नई बैलगाड़ी लेकर आते हैं। देर होने का कारण यह था कि वे अपनी गाड़ी और बैलों का इंतज़ाम पुख्ता कर रहे थे। गाड़ी के आते ही बिरजू की माँ का सारा क्रोध काफूर हो जाता है। वह झटपट मीठी रोटियाँ बनाती है, सजती-धजती है और पूरे उल्लास के साथ तैयार होती है। कहानी का सबसे सुंदर मोड़ तब आता है जब गाड़ी पर चढ़कर जाते समय बिरजू की माँ का दिल बड़ा हो जाता है। वह उन सभी महिलाओं को भी गाड़ी पर बिठा लेती है जिनके साथ उसका विवाद हुआ था, जिनमें जंगी की पुतोहू भी शामिल है। कहानी के अंत में वह स्वयं को सचमुच 'लाल पान की बेगम' महसूस करती है, लेकिन अब यह नाम उसे चिढ़ाने वाला नहीं, बल्कि उसके स्वाभिमान और बड़प्पन का प्रतीक लगता है। यह कहानी दिखाती है कि कैसे तुच्छ झगड़ों के पीछे भी ग्रामीणों के मन में एक-दूसरे के प्रति गहरी आत्मीयता छिपी होती है।

५. कहानी तत्वों के आधार पर समीक्षा

(क) कथानक एवं आंचलिकता: 'लाल पान की बेगम' का कथानक अत्यंत सरल और यथार्थवादी है। रेणु जी ने गाँव की मिट्टी, गंध और वहाँ के लोगों के स्वभाव को कहानी में पिरोया है। कहानी में बलरामपुर का 'नाच' देखना केवल एक मनोरंजन नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन की एक बड़ी घटना और आत्म-सम्मान का विषय है। पूरी कहानी में गाँव का परिवेश धड़कता हुआ महसूस होता है। फुआ की बातें, जंगी की पुतोहू का मुँहजोर होना और बिरजू की माँ का अपनी ज़मीन पर गर्व करना—ये सब आंचलिकता के जीवंत प्रमाण हैं। रेणु जी ने दिखाया है कि गाँव का जीवन केवल अभावों की कहानी नहीं है, बल्कि वहाँ भावनाओं का एक गहरा ज्वार भी है।

(ख) पात्र-चित्रण और मनोविज्ञान: बिरजू की माँ का चरित्र हिंदी कहानी के सबसे जीवंत चरित्रों में से एक है। वह एक ओर सख्त माँ है, तो दूसरी ओर एक ऐसी पत्नी जो अपने पति की उपेक्षा से आहत होती है। उसका मनोविज्ञान 'मर्यादा' और 'स्वाभिमान' के इर्द-गिर्द घूमता है। वह जंगी की पुतोहू की बातों से तिलमिला जाती है—"चल दिदिया, चल! इस मुहल्ले में लाल पान की बेगम बसती है!" लेकिन अंत में उसका उदार हृदय सबको जीत लेता है। बिरजू के बापा एक शांत और परिश्रमी किसान हैं, जो अपनी पत्नी की खुशी के लिए गाड़ी का इंतज़ाम करते हैं। बच्चों का मनोविज्ञान भी बहुत सहजता से उभरा है।

(ग) भाषा एवं लोक-संस्कृति: रेणु जी की भाषा इस कहानी की सबसे बड़ी शक्ति है। उन्होंने ग्रामीण शब्दों का ऐसा प्रयोग किया है जो भाषा को काव्यात्मक बना देते हैं। लोक-गीतों का प्रयोग (जैसे 'हरिया नी माए...') और मुहावरों का सहज प्रवाह कहानी को पठनीय बनाता है। जैसा कि कहानी में लिखा है—"चूँ-चूँ करके घरघराने लगा तो बिरजू से नहीं रहा गया - 'उड़नजहाज की तरह उड़ाओ बप्पा!'"—यह भाषा पात्रों की मानसिक स्थिति को स्पष्ट करती है।

(घ) द्वंद्व और चरमोत्कर्ष: कहानी का आंतरिक द्वंद्व बिरजू की माँ के मन में है। वह एक तरफ अपने आर्थिक उत्थान (ज़मीन और बैल) पर गर्व करती है, तो दूसरी तरफ गाँव के बहिष्कार से डरती भी है। कहानी का चरमोत्कर्ष (Climax) तब होता है जब गाड़ी आ जाती है और बिरजू की माँ अपने 'शत्रुओं' को भी अपनी खुशी में शामिल कर लेती है। यह द्वंद्व के अंत और मानवीय सद्भाव की जीत का क्षण है।

(ङ) उद्देश्य और संदेश: कहानी का मुख्य संदेश यह है कि आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ मन की उदारता ही व्यक्ति को वास्तविक 'बेगम' या 'राजा' बनाती है। बिरजू की माँ का 'लाल पान की बेगम' कहलाना उसकी सफलता का प्रतीक है, लेकिन उसका सबको गाड़ी में बिठाना उसकी मानवता का प्रतीक है। यह कहानी ग्रामीण ईर्ष्या-द्वेष के ऊपर प्रेम और सामूहिकता की विजय का संदेश देती है।

६. महत्वपूर्ण गद्यांशों की विस्तृत व्याख्या

संकेत : "बिरजू की माँ के आगे नाथ और पीछे पगहिया न हो तब न, फुआ! ... नुकीली बात फुआ की देह में धँस गई।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'कथा सरिता' की 'लाल पान की बेगम' नामक कहानी से लिया गया है। इस कहानी के लेखक 'फणीश्वरनाथ ‘रेणु’' जी हैं।
प्रसंग : जब मखनी फुआ नाच देखने जाने की बात पूछती हैं, तो बिरजू की माँ अपने गुस्से और मजबूरी को एक तंज (व्यंग्य) के रूप में व्यक्त करती है।
व्याख्या : बिरजू की माँ अत्यंत क्रोधित है क्योंकि गाड़ी समय पर नहीं आई है। जब फुआ उससे नाच के बारे में पूछती हैं, तो वह जवाब देती है कि उसके ऊपर किसी का अंकुश नहीं है, वह स्वतंत्र है। "आगे नाथ और पीछे पगहिया" एक ग्रामीण मुहावरा है जिसका अर्थ है पूरी तरह से बंधनमुक्त होना। बिरजू की माँ यहाँ फुआ पर कटाक्ष कर रही है कि फुआ तो अकेली है, उसका कोई आगे-पीछे नहीं है, जबकि बिरजू की माँ के ऊपर परिवार की जिम्मेदारी है। यह वाक्य उसकी चिड़चिड़ाहट और सामाजिक ईर्ष्या को भी दर्शाता है। लेखक ने यहाँ ग्रामीण स्त्रियों के बीच होने वाले वाक-युद्ध को बड़ी सूक्ष्मता से पकड़ा है, जहाँ शब्दों का प्रयोग किसी तीर की तरह किया जाता है।

संकेत : "ढिबरी की रोशनी में धान की बालियों का रंग देखते ही... धानी रंग उसकी आँखों से उतर कर रोम-रोम में घुल गया।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'कथा सरिता' की 'लाल पान की बेगम' नामक कहानी से लिया गया है। इस कहानी के लेखक 'फणीश्वरनाथ ‘रेणु’' जी हैं।
प्रसंग : जब बिरजू के बापा नई बैलगाड़ी के साथ अपने खेत की नई धान की बालियाँ (पँचसीस) लेकर आते हैं, तो बिरजू की माँ का गुस्सा शांत हो जाता है।
व्याख्या : यह अंश बिरजू की माँ के चरित्र के कोमल पक्ष को उजागर करता है। जैसे ही वह अपने पति के हाथ में अपने खेत की धान की बालियाँ देखती है, उसकी सारी नाराज़गी और थकान मिट जाती है। धान का 'धानी रंग' समृद्धि और सफलता का प्रतीक है। उसने अपने पति के साथ मिलकर जिस ज़मीन के लिए संघर्ष किया था, उसकी उपज देखकर उसे जो संतुष्टि मिलती है, वह नाच देखने की खुशी से भी बड़ी है। वह उस 'अन्न' के प्रति श्रद्धा से भर जाती है। यहाँ 'रोम-रोम में घुलना' एक सुंदर बिम्ब है जो यह दिखाता है कि एक किसान परिवार के लिए अपनी फसल का मूल्य किसी भी अन्य सुख से ऊपर होता है। यह गद्यांश श्रम की सार्थकता और ग्रामीण उल्लास का अद्भुत चित्रण है।

संकेत : "मगर माँ का वाक्य बीच में ही तोड़ते हुए... वह जरूर बना देंगी। आप उसे देख कर खुश होंगे।" (नोट: यह पिछले कहानी 'चीफ की दावत' का संकेत लग रहा है, 'लाल पान की बेगम' के लिए सही संकेत नीचे है)
सही संकेत : "अरी टीशनवाली, तो रोती है काहे! ...आ जा झट से कपड़ा पहन कर। सारी गाड़ी पड़ी हुई है!"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'कथा सरिता' की 'लाल पान की बेगम' नामक कहानी से लिया गया है। इस कहानी के लेखक 'फणीश्वरनाथ ‘रेणु’' जी हैं।
प्रसंग : नाच के लिए जाते समय बिरजू की माँ का हृदय परिवर्तन होता है और वह अपनी गाड़ी में उन महिलाओं को भी बिठा लेती है जिनके साथ उसका विवाद था।
व्याख्या : यह दृश्य कहानी का 'नैतिक उत्कर्ष' है। बिरजू की माँ को पता चलता है कि जंगी की पुतोहू (जो उसे चिढ़ाती थी) नाच देखने नहीं जा पाई क्योंकि उसका पति नहीं लौटा। वह पुरानी कड़वाहट भूलकर उसे "टीशनवाली" कहकर पुकारती है और उसे गाड़ी में बैठने का न्योता देती है। यहाँ "सारी गाड़ी पड़ी हुई है" कहना उसके बड़े दिल और आर्थिक संपन्नता के बड़प्पन को दर्शाता है। वह समझती है कि खुशी अकेले नहीं, बल्कि सबके साथ मिलकर मनाई जाती है। यह गद्यांश ग्रामीण सामूहिकता और स्त्रियों के बीच की एक गुप्त सहानुभूति को व्यक्त करता है, जो झगड़ों के ऊपर भी जीवित रहती है। बिरजू की माँ यहाँ एक सच्ची 'बेगम' के रूप में उभरती है।

संकेत : "बिरजू की माँ बेगम है, लाल पान की बेगम! ...वह सचमुच लाल पान की बेगम है!"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'कथा सरिता' की 'लाल पान की बेगम' नामक कहानी से लिया गया है। इस कहानी के लेखक 'फणीश्वरनाथ ‘रेणु’' जी हैं।
प्रसंग : कहानी के अंत में, गाड़ी पर बैठकर जाते समय बिरजू की माँ स्वयं को मिले 'लाल पान की बेगम' नाम को सार्थक महसूस करती है।
व्याख्या : कहानी के आरंभ में यह नाम उसे चिढ़ाने के लिए दिया गया था, लेकिन अंत तक आते-आते यह उसके व्यक्तित्व का गौरव बन जाता है। वह सज-धजकर गाड़ी पर बैठी है, उसके माथे पर चाँदी का मँगटिक्का चमक रहा है, उसके पास अपनी ज़मीन है, अपने बैल हैं और सबसे बढ़कर, उसके पास एक ऐसा हृदय है जो सबको साथ लेकर चलता है। उसे महसूस होता है कि वह सचमुच अपने संसार की रानी (बेगम) है। यह आत्म-साक्षात्कार उसके आत्मविश्वास की पराकाष्ठा है। रेणु जी ने यहाँ दिखाया है कि स्वाभिमान और सुख जब मिल जाते हैं, तो मनुष्य के मन की सारी लालसाएँ शांत हो जाती हैं। "उसे नींद आ रही है" का अर्थ है कि वह अब पूरी तरह संतुष्ट है। यह एक अत्यंत गरिमापूर्ण और शांत समापन है जो पाठक के मन में एक सुखद अनुभूति छोड़ जाता है।

साहित्य विश्लेषण श्रृंखला · 'लाल पान की बेगम' · सर्वाधिकार सुरक्षित

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