वापसी — ऊषा प्रियंबदा, कहानी तत्व, समीक्षा

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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वापसी - ऊषा प्रियंवदा

वापसी : विस्तृत समीक्षा, सारांश एवं व्याख्या

प्रस्तुत लेख में 'नई कहानी' आंदोलन की प्रखर लेखिका ऊषा प्रियंवदा द्वारा रचित कालजयी कहानी 'वापसी' का संपूर्ण विश्लेषण है। यह कहानी सेवा-निवृत्त व्यक्ति के अपने ही घर में 'अजनबी' हो जाने की मर्मस्पर्शी दास्तां है।

कहानी : वापसी
कहानीकार : ऊषा प्रियंवदा
युग : नई कहानी (साठोत्तरी दौर)
कहानी के पात्र : गजाधर बाबू, उनकी पत्नी, अमर, नरेंद्र, बसंती, बहू और गनेशी
मूल प्रतिपाद्य : पीढ़ीगत अंतराल और पारिवारिक अलगाव
भाषा-शैली : मनोवैज्ञानिक, सूक्ष्म और सांकेतिक

१. कहानीकार का परिचय

ऊषा प्रियंवदा (जन्म: 1930) आधुनिक हिंदी कहानी साहित्य की एक ऐसी सशक्त रचनाकार हैं, जिन्होंने शहरी जीवन की ऊब, अकेलेपन और मानवीय संबंधों के बीच आती दरारों को बहुत गहराई से महसूस किया और अभिव्यक्त किया है। उनका जन्म कानपुर में हुआ और उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। लंबे समय तक अमेरिका के विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय में अध्यापन करने के कारण उनके लेखन में भारतीय मूल्यों और पाश्चात्य आधुनिकता का द्वंद्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 'नई कहानी' आंदोलन के दौर में उन्होंने 'वापसी' जैसी रचना देकर समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया। प्रियंवदा जी की कहानियों में नारी मन की सूक्ष्म संवेदनाओं और बुजुर्गों की उपेक्षा के प्रश्न प्रमुखता से उभरते हैं। उनकी भाषा अत्यंत संयत, मुहावरेदार और पात्रों के अनुकूल होती है। 'पचपन खंभे लाल दीवारें' और 'रुकोगी नहीं राधिका' जैसे उपन्यासों ने उन्हें हिंदी साहित्य में स्थायी ख्याति दिलाई। उनके साहित्य में उदासी की एक महीन परत होती है, जो पाठक को पात्रों के साथ एकाकार कर देती है। उन्होंने यह दिखाया कि कैसे आर्थिक आत्मनिर्भरता के युग में पुराने मूल्य और भावनाएँ हाशिए पर चले गए हैं।

२. मूल कहानी (संपूर्ण पाठ)

गजाधर बाबू ने कमरे में जमा सामान पर एक नजर दौड़ाई - दो बक्‍स, डोलची, बालटी - 'यह डिब्‍बा कैसा है, गनेशी?' उन्‍होंने पूछा। गनेशी बिस्‍तर बाँधता हुआ, कुछ गर्व, कुछ दुख, कुछ लज्‍जा से बोला, 'घरवाली ने साथ को कुछ बेसन के लड्डू रख दिए हैं। कहा, बाबूजी को पसंद थे। अब कहाँ हम गरीब लोग, आपकी कुछ खातिर कर पाएँगे।' घर जाने की खुशी में भी गजाधर बाबू ने एक विषाद का अनुभव किया, जैसे एक परिचित, स्‍नेह, आदरमय, सहज संसार से उनका नाता टूट रहा हो।

'कभी-कभी हम लोगों की भी खबर लेते रहिएगा।' गनेशी बिस्‍तर में रस्‍सी बाँधता हुआ बोला।

'कभी कुछ जरूरत हो तो लिखना गनेशी। इस अगहन तक बिटिया की शादी कर दो।'

गनेशी ने अँगोछे के छोर से आँखें पोंछीं, 'अब आप लोग सहारा न देंगे, तो कौन देगा? आप यहाँ रहते तो शादी में कुछ हौसला रहता।'

गजाधर बाबू चलने को तैयार बैठे थे। रेलवे क्‍वार्टर का यह कमरा, जिसमें उन्‍होंने कितने वर्ष बिताए थे, उनका सामान हट जाने से कुरूप और नग्‍न लग रहा था। आँगन में रोपे पौधे भी जान-पहचान के लोग ले गए थे और जगह-जगह मिट्टी बिखरी हुई थी। पर पत्‍नी, बाल-बच्‍चों के साथ रहने की कल्‍पना में यह बिछोह एक दुर्बल लहर की तरह उठ कर वि‍लीन हो गया।

गजाधर बाबू खुश थे, बहुत खुश। पैंतीस साल की नौकरी के बाद वह रिटायर हो कर जा रहे थे। इन वर्षों में अधिकांश समय उन्‍होंने अकेले रह कर काटा था। उन अकेले क्षणों में उन्‍होंने इसी समय की कल्‍पना की थी, जब वह अपने परिवार के साथ रह सकेंगे। इसी आशा के सहारे वह अपने अभाव का बोझ ढो रहे थे। संसार की दृष्टि में उनका जीवन सफल कहा जा सकता था। उन्‍होंने शहर में एक मकान बनवा लिया था, बड़े लड़के अमर और लड़की कांति की शादियाँ कर दी थीं, दो बच्‍चे ऊँची कक्षाओं में पढ़ रहे थे। गजाधर बाबू नौकरी के कारण प्रायः छोटे स्‍टेशनों पर रहे और उनके बच्‍चे और पत्‍नी शहर में, जिससे पढ़ाई में बाधा न हो। गजाधर बाबू स्‍वभाव से बहुत स्‍नेही व्‍यक्ति थे और स्‍नेह के आकांक्षी भी। जब परिवार साथ था, ड्यूटी से लौट कर बच्‍चों से हँसते-बोलते, पत्‍नी से कुछ मनोविनोद करते, उन सबके चले जाने से उनके जीवन में गहन सूनापन भर उठा। खाली क्षणों में उनसे घर में टिका न जाता। कवि प्रकृति के न होने पर भी उन्‍हें पत्‍नी की स्‍नेहपूर्ण बातें याद आती रहतीं। दोपहर में गर्मी होने पर भी, दो बजे तक आग जलाए रहती और उनके स्‍टेशन से वापस आने पर गरम-गरम रोटियाँ सेंकती... उनके खा चुकने और मना करने पर भी थोड़ा-सा कुछ और थाली में परोस देती, और बड़े प्‍यार से आग्रह करती। जब वह थके-हारे बाहर से आते, तो उनकी आहट पा वह रसोई के द्वार पर निकल आती और उसकी सलज्‍ज आँखें मुस्‍करा उठतीं। गजाधर बाबू को तब हर छोटी बात भी याद आती और वह उदास हो उठते... अब कितने वर्षों बाद वह अवसर आया था, जब वह फिर उसी स्‍नेह और आदर के मध्‍य रहने जा रहे थे।

टोपी उतार कर गजाधर बाबू ने चारपाई पर रख दी, जूते खोल कर नीचे खिसका दिए, अंदर से रह-रह कर कहकहों की आवाज आ रही थी। इतवार का दिन था और उनके सब बच्‍चे इकठ्ठे हो कर नाश्‍ता कर रहे थे। गजाधर बाबू के सूखे चेहरे पर स्निग्‍ध मुस्‍कान आ गई, उसी तरह मुस्कराते हुए वह बिना खाँसे अंदर चले आए। उन्‍होंने देखा कि नरेंद्र कमर पर हाथ रखे शायद गत रात्रि की फिल्‍म में देखे गए किसी नृत्‍य की नकल कर रहा था और बसंती हँस-हँस कर दुहरी हो रही थी। अमर की बहू को अपने तन-बदन, आँचल या घूँघट का कोई होश न या और वह उन्‍मुक्‍त रूप से हँस रही थी। गजाधर बाबू को देखते ही नरेंद्र धप से बैठ गया और चाय का प्‍याला उठा कर मुँह से लगा लिया। बहू को होश आया और उसने झट से माथा ढक लिया, केवल बसंती का शरीर रह-रह कर हँसी दबाने के प्रयत्‍न में हिलता रहा।

गजाधर बाबू ने मुस्कराते हुए उन लोगों को देखा। फिर कहा, 'क्‍यों नरेंद्र, क्‍या नकल हो रही है?' 'कुछ नहीं बाबूजी।' नरेंद्र ने सिटपिटा कर कहा। गजाधर बाबू ने चाहा था कि वह भी इस मनोविनोद में भाग लेते, पर उनके आते ही जैसे सब कुंठित हो चुप हो गए। उससे उनके मन में थोड़ी-सी खिन्‍नता उपज आई। बैठते हुए बोले, 'बसंती, चाय मुझे भी देना। तुम्‍हारी अम्‍मा की पूजा अभी चल रही है क्‍या?'

बसंती ने माँ की कोठरी की ओर देखा, 'अभी आती ही होंगी', और प्‍याले में उनके लिए चाय छानने लगी। बहू चुपचाप पहले ही चली गई थी, अब नरेंद्र भी चाय का आखिरी घूँट पी कर उठ खड़ा हुआ, केवल बसंती, पिता के लिहाज में, चौके में बैठी माँ की राह देखने लगी। गजाधर बाबू ने एक घूँट चाय पी, फिर कहा, 'बिट्टी - चाय तो फीकी है।'

'लाइए चीनी और डाल दूँ।' बसंती बोली।

'रहने दो, तुम्‍हारी अम्‍मा जब आएगी, तभी पी लूँगा।'

थोड़ी देर में उनकी पत्‍नी हाथ में अर्ध्‍य का लोटा लिए निकली और अशु्द्ध स्‍तुति कहते हुए तुलसी में डाल दिया। उन्‍हें देखते ही बसंती भी उठ गई। पत्‍नी ने आ कर गजाधर बाबू को देखा और कहा, 'अरे, आप अकेले बैठे हैं - ये सब कहाँ गए?' गजाधर बाबू के मन में फाँस-सी करक उठी, 'अपने-अपने काम में लग गए है - आखिर बच्‍चे ही है।'

पत्‍नी आ कर चौके में बैठ गईं, उन्‍होंने नाक-भौं चढ़ा कर चारों ओर जूठे बर्तनों को देखा। फिर कहा, 'सारे में जूठे बर्तन पड़े हैं। इस घर में धरम-धरम कुछ नहीं। पूजा करके सीधे चौके में घुसो।' फिर उन्‍होंने नौकर को पुकारा, जब उत्‍तर न मिला तो एक बार और उच्‍च स्‍वर में, फिर पति की ओर देख कर बोलीं, 'बहू ने भेजा होगा बाजार।' और एक लंबी साँस ले कर चुप हो रही।

गजाधर बाबू बैठ कर चाय और नाश्‍ते का इंतजार करते रहे। उन्‍हें अचानक ही गनेशी की याद आ गई। रोज सुबह, पैसेंजर आने से पहले वह गरम-गरम पूरियाँ और जलेबी बनाता था। गजाधर बाबू जब तक उठ कर तैयार होते, उनके लिए जलेबियाँ और चाय ला कर रख देता था। चाय भी कितनी बढ़िया, काँच के गिलास में ऊपर तक भरी लबालब, पूरे ढाई चम्‍मच चीनी और गाढ़ी मलाई। पैसेंजर भले ही रानीपुर लेट पहुँचे, गनेशी ने चाय पहुँचाने मे कभी देर नहीं की। क्‍या मजाल कि कभी उससे कुछ कहना पड़े।

पत्‍नी का शिकायत-भरा स्‍वर सुन उनके विचारों में व्‍याघात पहुँचा। वह कह रही थीं, 'सारा दिन इसी खिच-खिच में निकल जाता है। इस गृहस्‍थी का धंधा पीटते-पीटते उमर बीत गई। कोई जरा हाथ भी नहीं बँटाता।'

'बहू क्‍या किया करती है?' गजाधर बाबू ने पूछा।

'पड़ी रहती है। बसंती को तो, फिर कहो कॉलेज जाना होता है।'

गजाधर बाबू ने प्‍यार से समझाया, 'तुम सुबह पढ़ लिया करो। तुम्‍हारी माँ बूढ़ी हुई, उनके शरीर में अब वह शक्ति नहीं बची हैं। तुम हो, तुम्‍हारी भाभी है, दोनों मिल कर काम में हाथ बँटाना चाहिए।'

बसंती चुप रह गई। उसके जाने के बाद उसकी माँ ने धीरे से कहा, 'पढ़ने का तो बहाना है। कभी जी ही नहीं लगता। लगे कैसे? शीला से ही फुरसत नहीं, बड़े-बड़े लड़के हैं उनके घर में, हर वक्‍त वहाँ घुसा रहना, मुझे नहीं सुहाता। मना करूँ तो सुनती नहीं।'

नाश्‍ता कर गजाधर बाबू बैठक में चले गए। घर छोटा था और ऐसी व्‍यवस्‍था हो चुकी थी कि उसमें गजाधर बाबू के रहने के लिए कोई स्‍थान न बचा था। जैसे किसी मेहमान के लिए कुछ अस्‍थायी प्रबंध कर दिया जाता है, उसी प्रकार बैठक में कुरसियों को दीवार से सटा कर बीच में गजाधर बाबू के लिए पतली-सी चारपाई डाल दी गई थी। गजाधर बाबू उस कमरे में पड़े-पड़े, कभी-कभी अनायास ही, इस अस्‍थायित्‍व का अनुभव करने लगते। उन्‍हें याद हो आती उन रेलगाड़ियों की, जो आतीं और थोड़ी देर रुक कर किसी और लक्ष्‍य की ओर चली जातीं।

घर छोटा होने के कारण बैठक में ही अब अपना प्रबंध किया था। उनकी पत्‍नी के पास अंदर एक छोटा कमरा अवश्‍य था, पर वह एक ओर के मर्तबान, दाल-चावल के कनस्‍तर और घी के डिब्‍बों से घिरा था; दूसरी ओर पुरानी रजाइयाँ दरियों में लिपटी और रस्‍सी से बँधी रखी थीं; उसके पास एक बड़े-से टीन के बक्‍स में घर भर के गरम कपड़े थे। बीच में एक अलगनी बँधी हुई थी, जिस पर प्रायः बसंती के कपड़े लापरवाही से पड़े रहते थे। वह भरसक उस कमरे में नहीं जाते थे। घर का दूसरा कमरा अमर और उसकी बहू के पास था, तीसरा कमरा, जो सामने की ओर था, बैठक था। गजाधर बाबू के आने से पहले उसमें अमर की ससुराल से आया बेंत की तीन कुरसियों का सेट पड़ा था, कुरसियों पर नीली गद्दियाँ और बहू के हाथों के कढ़े कुशन थे।

जब कभी उनकी पत्‍नी को काई लंबी शि‍कायत करनी होती, तो अपनी चटाई बैठक में डाल पड़ जाती थीं। वह एक दिन चटाई ले कर आ गईं। गजाधर बाबू ने घर-गृहस्‍थी की बातें छेड़ीं, वह घर का रवैया देख रहे थे। बहुत हल्‍के से उन्‍होंने कहा कि अब हाथ में पैसा कम रहेगा, कुछ खर्च कम होना चाहिए।

'सभी खर्च तो वाजिब-वाजिब हैं, किसका पेट काटूँ? यही जोड़-गाँठ करते-करते बूढ़ी हो गई, न मन का पहना, न ओढ़ा।'

गजाधर बाबू ने आहत, विस्मित दृष्टि से पत्‍नी को देखा। उनसे अपनी हैसियत छिपी न थी। उनकी पत्‍नी तंगी का अनुभव कर उसका उल्‍लेख करतीं। यह स्‍वाभाविक था, लेकिन उनमें सहानुभूति का पूर्ण अभाव गजाधर बाबू को बहुत खटका। उनसे यदि राय-बात की जाय कि प्रबंध कैसे हो, तो उन्‍हें चिंता कम, संतोष अधिक होता। लेकिन उनसे तो केवल शिकायत की जाती थी, जैसे परिवार की सब परेशानियों के लिए वही जिम्‍मेदार थे।

'तुम्‍हें किस बात की कमी है अमर की माँ - घर में बहू है, लड़के-बच्‍चे हैं, सिर्फ रुपए से ही आदमी अमीर नहीं होता।' गजाधर बाबू ने कहा और कहने के साथ ही अनुभव किया। यह उनकी आंतरिक अभिव्‍यक्ति थी - ऐसी कि उनकी पत्‍नी नहीं समझ सकती। 'हाँ, बड़ा सुख है न बहू से। आज रसोई करने गई है, देखो क्‍या होता है?'

कह कर पत्‍नी ने आँखें मूँदीं और सो गईं। गजाधर बाबू बैठे हुए पत्‍नी को देखते रह गए। यही थी क्‍या उनकी पत्‍नी, जिसके हाथों के कोमल स्‍पर्श, जिसकी मुस्‍कान की याद में उन्‍होंने संपूर्ण जीवन काट दिया था? उन्‍हें लगा कि लावण्‍यमयी युवती जीवन की राह में कहीं खो गई है और उसकी जगह आज जो स्‍त्री है, वह उनके मन और प्राणों के लिए नितांत अपरिचित है। गाढ़ी नींद में डूबी उनकी पत्‍नी का भारी-सा शरीर बहुत बेडौल और कुरूप लग रहा था, चेहरा श्रीहीन और रूखा था। गजाधर बाबू देर तक निस्‍संग दृष्टि से पत्‍नी को देखते रहे और फिर लेट कर छत की और ताकने लगे।

अंदर कुछ गिरा और उनकी पत्‍नी हड़बड़ा कर उठ बैठीं, 'लो बिल्‍ली ने कुछ गिरा दिया शायद', और वह अंदर भागीं। थोड़ी देर में लौट कर आईं तो उनका मुँह फूला हुआ था, 'देखा बहू को, चौका खुला छोड़ आई, बिल्‍ली ने दाल की पतीली गिरा दी। सभी तो खाने को हैं, अब क्‍या खिलाऊँगी?' वह साँस लेने को रुकीं और बोलीं, 'एक तरकारी और चार पराँठे बनाने में सारा डिब्‍बा घी उँड़ेल कर रख दिया। जरा-सा दर्द नहीं है, कमाने वाला हाड़ तोड़े और यहाँ चीजें लुटें। मुझे तो मालूम था कि यह सब काम किसी के बस का नहीं है।'

गजाधर बाबू को लगा कि पत्‍नी कुछ और बोलेगी तो उनके कान झनझना उठेंगे। ओंठ भींच, करवट ले कर उन्‍होंने पत्‍नी की ओर पीठ कर ली।

रात का भोजन बसंती ने जान-बूझ कर ऐसा बनाया था कि कौर तक निगला न जा सके। गजाधर बाबू चुपचाप खा कर उठ गए, पर नरेंद्र थाली सरका कर उठ खड़ा हुआ और बोला, 'मैं ऐसा खाना नहीं खा सकता।'

बसंती तुनक कर बोली, 'तो न खाओ, कौन तुम्‍हारी खुशामद करता है।'

'तुमसे खाना बनाने को कहा किसने था?' नरेंद्र चिल्‍लाया।

'बाबूजी ने।'

'बाबूजी को बैठे-बैठे यही सूझता है।'

बसंती को उठा कर माँ ने नरेंद्र को मनाया और अपने हाथ से कुछ बना कर खिलाया। गजाधर बाबू ने बाद में पत्‍नी से कहा, 'इतनी बड़ी लड़की हो गई और उसे खाना बनाने तक का शऊर नहीं आया।'

'अरे, आता तो सब कुछ है, करना नहीं चाहती।' पत्नी ने उत्तर दिया। अगली शाम माँ को रसोई में देख, कपड़े बदल कर बसंती बाहर आई, तो बैठक से गजाधर बाबू ने टोक दिया, 'कहाँ जा रही हो?'

'पड़ोस में शीला के घर।' बसंती ने कहा।

'कोई जरूरत नहीं है, अंदर जा कर पढ़ो।' गजाधर बाबू ने कड़े स्‍वर में कहा। कुछ देर अनिश्चित खड़े रह कर बसंती अंदर चली गई। गजाधर बाबू शाम को रोज टहलने चले जाते थे, लौट कर आए तो पत्‍नी ने कहा, 'क्‍या कह दिया बसंती से? शाम से मुँह लपेटे पड़ी है। खाना भी नहीं खाया।'

गजाधर बाबू खिन्‍न हो आए। पत्‍नी की बात का उन्‍होंने कुछ उत्तर नहीं दिया। उन्‍होंने मन में निश्‍चय कर लिया कि बसंती की शादी जल्‍दी ही कर देनी है। उस दिन के बाद बसंती पिता से बची-बची रहने लगी। जाना होता तो पिछवाड़े से जाती। गजाधर बाबू ने दो-एक बार पत्‍नी से पूछा तो उत्तर मिला, 'रूठी हुई है।' गजाधर बाबू को रोष हुआ। लड़की के इतने मिजाज, जाने को रोक दिया तो पिता से बोलेगी नहीं। फिर उनकी पत्‍नी ने ही सूचना दी कि अमर अलग रहने की सोच रहा है।

'क्‍यों?' गजाधर बाबू ने चकित हो कर पूछा।

पत्‍नी ने साफ-साफ उत्तर नहीं दिया। अमर और उसकी बहू की शिकायतें बहुत थीं। उनका कहना था कि गजाधर बाबू हमेशा बैठक में ही पड़े रहते हैं, कोई आने-जानेवाला हो तो कहीं बिठाने को जगह नहीं। अमर को अब भी वह छोटा-सा समझते थे और मौके-बेमौके टोक देते थे। बहू को काम करना पड़ता था और सास जब-तब फूहड़पन पर ताने देती रहती थीं। 'हमारे आने से पहले भी कभी ऐसी बात हुई थी?' गजाधर बाबू ने पूछा। पत्‍नी ने सिर हिला कर बताया कि नहीं। पहले अमर घर का मालिक बन कर रहता था, बहू को कोई रोक-टोक न थी, अमर के दोस्‍तों का प्रायः यहीं अड्डा जमा रहता था और अंदर से नाश्‍ता चाय तैयार हो कर जाता रहता था। बसंती को भी वही अच्‍छा लगता था।

गजाधर बाबू ने बहुत धीरे से कहा, 'अमर से कहो, जल्‍दबाजी की कोई जरूरत नहीं है।'

अगले दिन वह सुबह घूम कर लौट तो उन्‍होंने पाया कि बैठक में उनकी चारपाई नहीं है। अंदर जा कर पूछने ही वाले थे कि उनकी दृष्टि रसोई के अंदर बैठी पत्‍नी पर पड़ी। उन्‍होंने यह कहने को मुँह खोला कि बहू कहाँ है, पर कुछ याद कर चुप हो गए। पत्‍नी की कोठरी में झाँका तो अचार, रजाइयों और कनस्‍तरों के मध्‍य अपनी चारपाई लगी पाई। गजाधर बाबू ने कोट उतारा और कहीं टाँगने को दीवार पर नजर दौड़ाई। फिर उसे मोड़ कर अलगनी के कुछ कपड़े खिसका कर एक किनारे टाँग दिया। कुछ खाए बिना ही अपनी चारपाई पर लेट गए। कुछ भी हो, तन आखिरकार बूढ़ा ही था। सुबह-शाम कुछ दूर टहलने अवश्‍य चले जाते, पर आते-जाते थक उठते थे। गजाधर बाबू को अपना बड़ा-सा क्‍वार्टर याद आ गया। निश्चित जीवन, सुबह पैसेंजर ट्रेन आने पर स्‍टेशन की चहल-पहल, चिर-परिचित चेहरे और पटरी पर रेल के पहियों की खट-खट, जो उनके लिए मधुर संगीत की तरह थी। तूफान और डाक गाड़ी के इंजनों की चिंघाड़ उनकी अकेली रातों की साथी थी। सेठ रामजी मल की मिल के कुछ लोग कभी-कभी पास आ बैठते, वही उनका दायरा था, वही उनके साथी। वह जीवन अब उन्‍हें एक खोई निधि-सा प्रतीत हुआ। उन्‍हें लगा कि वह जिंदगी द्वारा ठगे गए हैं। उन्‍होंने जो कुछ चाहा, उसमें से उन्‍हें एक बूँद भी न मिली।

लेटे हुए वह घर के अंदर से आते विविध स्‍वरों को सुनते रहे। बहू और सास की छोटी-सी झड़प, बाल्टी पर खुले नल की आवाज, रसोई के बर्तनों की खटपट और उसी में दो गौरैयों का वार्तालाप और अचानक ही उन्‍होंने निश्‍चय कर लिया कि अब घर की किसी बात में दखल न देंगे। यदि गृहस्‍वामी के लिए पूरे घर में एक चारपाई की जगह नहीं है, तो यहीं पड़े रहेंगे। अगर कहीं और डाल दी गई तो वहाँ चले जाएँगे। यदि बच्‍चों के जीवन में उनके लिए कहीं स्‍थान नहीं, तो अपने ही घर में परदेसी की तरह पड़े रहेंगे... और उस दिन के बाद सचमुच गजाधर बाबू कुछ नहीं बोले। नरेंद्र रुपए माँगने आया तो बिना कारण पूछे उसे रुपए दे दिए। बसंती काफी अँधेरा हो जाने के बाद भी पड़ोस में रही तो भी उन्‍होंने कुछ नहीं कहा - पर उन्हें सबसे बड़ा गम यह था कि उनकी पत्‍नी ने भी उनमें कुछ परिवर्तन लक्ष्‍य नहीं किया। वह मन-ही-मन कितना भार ढो रहे हैं, इससे वह अनजान ही बनी रहीं। बल्कि उन्‍हें पति के घर के मामले में हस्‍तक्षेप न करने के कारण शांति ही थी। कभी-कभी कह भी उठतीं, 'ठीक ही है, आप बीच में न पड़ा कीजिए, बच्‍चे बड़े हो गए हैं, हमारा जो कर्तव्य था, कर रहे हैं। पढ़ा रहे हैं, शादी कर देंगे।'

गजाधर बाबू ने आह‍त दृष्टि से पत्‍नी को देखा। उन्‍होंने अनुभव किया कि वह पत्‍नी और बच्‍चों के लिए केवल धनोपार्जन के निमित्त मात्र हैं। जिस व्‍यक्ति के अस्तित्‍व से पत्‍नी माँग में सिंदूर डालने की अधिकारिणी है, समाज में उसकी प्रतिष्‍ठा है, उसके सामने वह दो वक्‍त भोजन की थाली रख देने से सारे कर्तव्‍यों से छुट्टी पा जाती है। वह घी और चीनी के डिब्‍बों में इतनी रमी हुई है कि अब वही उसकी संपूर्ण दुनिया बन गई है। गजाधर बाबू उनके जीवन के केंद्र नहीं हो सकते, उन्हें तो अब बेटी की शादी के लिए भी उत्‍साह बुझ गया। किसी बात में हस्‍तक्षेप न करने के निश्‍चय के बाद भी उनका अस्तित्‍व उस वातावरण का एक भाग न बन सका। उनकी उपस्थिति उस घर में ऐसी असंगत लगने लगी थी, जैसे सजी हुई बैठक में उनकी चारपाई थी। उनकी सारी खुशी एक गहरी उदासीनता में डूब गई।

इतने सब निश्‍चयों के बावजूद एक दिन बीच में दखल दे बैठे। पत्‍नी स्‍वभावानुसार नौकर की शिकायत कर रही थीं, 'कितना कामचोर है, बाजार की भी चीज में पैसा बनाता है, खाने बैठता है, तो खाता ही चला जाता है।' गजाधर बाबू को बराबर यह महसूस होता रहता था कि उनके घर का रहन-सहन और खर्च उनकी हैसियत से कहीं ज्‍यादा है। पत्‍नी की बात सुन कर कहते कि नौकर का खर्च बिलकुल बेकार है। छोटा-मोटा काम है, घर में तीन मर्द हैं, कोई न कोई कर ही देगा। उन्‍होंने उसी दिन नौकर का हिसाब कर दिया। अमर दफ्तर से आया तो नौकर को पुकारने लगा। अमर की बहू बोली, 'बाबूजी ने नौकर छुड़ा दिया है।'

'क्‍यों?'

'कहते हैं खर्च बहुत है।'

यह वार्तालाप बहुत सीधा सा था, पर जिस टोन में बहू बोली, गजाधर बाबू को खटक गया। उस दिन जी भारी होने के कारण गजाधर बाबू टहलने नहीं गए थे। आलस्‍य में उठ कर बत्ती भी नहीं जलाई थी - इस बात से बेखबर नरेंद्र माँ से कहने लगा, 'अम्‍माँ, तुम बाबूजी से कहती क्‍यों नहीं? बैठे-बिठाए कुछ नहीं तो नौकर ही छुड़ा दिया। अगर बाबूजी यह समझें कि मैं साइकिल पर गेहूँ रख आटा पिसाने जाऊँगा, तो मुझ से यह नहीं होगा।' 'हाँ अम्‍माँ,' बसंती का स्‍वर था, 'मैं कॉलेज भी जाऊँ और लौट कर घर में झाड़ू भी लगाऊँ, यह मेरे बस की बात नहीं है।'

'बूढ़े आदमी हैं,' अमर भुनभुनाया, 'चुपचाप पड़े रहें। हर चीज में दखल क्‍यों देते हैं?' पत्‍नी ने बड़े व्‍यंग्‍य से कहा, 'और कुछ नहीं सूझा, तो तुम्‍हारी बहू को ही चौके में भेज दिया। वह गई तो पंद्रह दिन का राशन पाँच दिन में बना कर रख दिया।' बहू कुछ कहे, इससे पहले वह चौके में घुस गईं। कुछ देर में अपनी कोठरी में आईं और बिजली जलाई तो गजाधर बाबू को लेटे देख बड़ी सिटपिटाईं। गजाधर बाबू की मुख-मुद्रा से वह उनमें भावों का अनुमान न लगा सकीं। वह चुप आँखें बंद किए लेटे रहे।

गजाधर बाबू चिट्ठी हाथ में लिए अंदर आए और पत्‍नी को पुकारा। वह भीगे हाथ निकलीं और आँचल से पोंछती हुई पास आ खड़ी हुईं। गजाधर ने बिना किसी भूमिका के कहा, 'मुझे सेठ रामजी मल की चीनी मिल में नौकरी मिल गई है। खाली बैठे रहने से तो चार पैसे घर में आएँ, वही अच्‍छा है। उन्‍होंने तो पहले ही कहा था, मैंने ही मना कर दिया था।' फिर कुछ रुक कर, जैसे बुझी हुई आग में चिनगारी चमक उठे, उन्‍होंने धीमे स्‍वर में कहा, 'मैंने सोचा था कि बरसों तुम सबसे अलग रहने के बाद, अवकाश पा कर परिवार के साथ रहूँगा। खैर, परसों जाना है। तुम भी चलोगी?' 'मैं?' पत्‍नी ने सकपका कर कहा, 'मैं चलूँगी तो यहाँ का क्‍या होगा? इतनी बड़ी गृहस्‍थी, फिर सियानी लड़की...'

बात बीच में काट गजाधर बाबू ने हताश स्‍वर में कहा, 'ठीक है, तुम यहीं रहो। मैंने तो ऐसे ही कहा था।' और गहरे मौन में डूब गए।

नरेंद्र ने बड़ी तत्‍परता से बिस्‍तर बाँधा और रिक्‍शा बुला लाया। गजाधर बाबू का टीन का बक्‍स और पतला-सा बिस्‍तर उस पर रख दिया गया। नाश्‍ते के लिए लड्डू और मठरी की डलिया हाथ में लिए गजाधर बाबू रिक्‍शे पर बैठ गए। दृष्टि उन्‍होंने अपने परिवार पर डाली। फिर दूसरी ओर देखने लगे और रिक्शा चल पड़ा।

उनके जाने के बाद सब अंदर लौट आए। बहू ने अमर से पूछा, 'सिनेमा ले चलिएगा न?' बसंती ने उछल कर कहा, 'भइया, हमें भी।'

गजाधर बाबू की पत्‍नी सीधे चौके में चली गईं। बची हुई मठरियों को कटोरदान में रख कर अपने कमरे में लाईं और कनस्‍तरों के पास रख दिया, फिर बाहर आ कर कहा, 'अरे नरेंद्र, बाबू की चारपाई कमरे से निकाल दे। उसमें चलने तक की जगह नहीं है।'

३. कठिन शब्दार्थ

विषाद = गहरा दुख, विलीन = गायब होना, सिटपिटाना = हक्का-बक्का रह जाना, व्याघात = बाधा, नितांत = बिल्कुल, अस्थायित्व = जो टिकने वाला न हो, निस्‍संग = अकेला या उदासीन, सकपक़ाना = घबरा जाना, धनोपार्जन = धन कमाना, असंगत = बेमेल, तन्मयता = लीन होना, प्रतिष्ठा = इज्जत, मर्तबान = चीनी मिट्टी का पात्र, लापरवाही = बेपरवाही, शऊर = सलीका, रोष = गुस्सा, निमित्त = कारण, खिन्‍न = दुखी, विस्मित = हैरान, वाजिब = उचित, फूहड़पन = सलीका न होना, आहत = जख्मी मन वाला, मौन = शांति, तल्लीन = डूबा हुआ, सत्यता = सच, हस्तक्षेप = दखल देना, आकांक्षा = इच्छा, रिक्तता = खालीपन, मनोविनोद = मनोरंजन, तिरस्कार = अपमान, अजनबी = अपरिचित, निर्णय = फैसला, विमुख = मुँह मोड़ना, पराकाष्ठा = चरम सीमा, संबल = सहारा, विस्थापित = अपनी जगह से हटा हुआ, वेदना = पीड़ा, सुलभ = आसानी से मिलने वाला, उपेक्षा = ध्यान न देना, अंतर्द्वंद्व = मन की लड़ाई।

४. कहानी का सारांश

'वापसी' कहानी सेवानिवृत्त गजाधर बाबू के जीवन की एक ऐसी यात्रा है, जो घर लौटने की खुशी से शुरू होती है और घर से पुनः बाहर निकलने की विवशता पर खत्म होती है। गजाधर बाबू रेलवे में 35 साल की नौकरी के बाद रिटायर होकर अपने परिवार के पास शहर लौटते हैं। उन्होंने पूरे जीवन अपने परिवार के सुख के लिए अकेलेपन का बोझ सहा। वे सोचते थे कि रिटायरमेंट के बाद वे अपनी पत्नी और बच्चों के बीच एक सम्मानजनक और स्नेहपूर्ण जीवन बिताएंगे। उनके मन में परिवार की एक ऐसी छवि थी जहाँ वे केंद्र में होंगे और सब उन्हें स्नेह देंगे।

किंतु, घर पहुँचते ही उनकी उम्मीदों का महल ढहने लगता है। वे पाते हैं कि उनके बिना उनके परिवार ने अपना एक ऐसा ढांचा तैयार कर लिया है जिसमें गजाधर बाबू के लिए कोई जगह नहीं है। उनकी पत्नी अब केवल गृहस्थी, डिब्बों और बच्चों की समस्याओं में रमी हुई है। उनके लिए गजाधर बाबू केवल एक 'कमाऊ साधन' मात्र रह गए हैं। उनके बच्चे—अमर, बसंती और नरेंद्र—उन्हें एक ऐसे बाहरी व्यक्ति के रूप में देखते हैं जो उनके निजी जीवन और स्वतंत्रता में बाधा डाल रहा है। जब वे घर की व्यवस्था सुधारने या फिजूलखर्ची रोकने का प्रयास करते हैं, तो उन्हें तिरस्कृत किया जाता है। यहाँ तक कि उनकी चारपाई को बैठक से हटाकर एक अंधेरी कोठरी में डाल दिया जाता है। अंततः, अपनी उपेक्षा और परिवार की संवेदनशून्यता को देखकर गजाधर बाबू फिर से एक मिल में नौकरी ढूँढ लेते हैं और घर छोड़कर चले जाते हैं। कहानी का सबसे मार्मिक क्षण वह है जब उनके जाते ही परिवार राहत महसूस करता है और उनकी चारपाई को कमरे से बाहर निकालने की बात करता है। यह कहानी आधुनिक युग में मध्यमवर्गीय परिवार के भीतर टूटते मूल्यों और बुजुर्गों के अकेलेपन का जीवंत दस्तावेज है।

५. कहानी तत्वों के आधार पर 'वापसी' की समीक्षा

(क) कथानक एवं उद्देश्य: 'वापसी' का कथानक अत्यंत सुगठित और मनोवैज्ञानिक है। यह केवल एक व्यक्ति की घर वापसी नहीं है, बल्कि उसके मोहभंग की कहानी है। लेखिका ने यह दिखाया है कि कैसे आर्थिक युग में मनुष्य की उपयोगिता खत्म होते ही परिवार उसे बोझ समझने लगता है। कहानी का मुख्य उद्देश्य पीढ़ीगत अंतराल (Generation Gap) और पारिवारिक संवेदनहीनता को उजागर करना है। उदाहरण के लिए, जब गजाधर बाबू कहते हैं—"संसार की दृष्टि में उनका जीवन सफल कहा जा सकता था... पर स्नेह के आकांक्षी गजाधर बाबू को अंत में सूनापन ही मिला।"

(ख) पात्र-चित्रण और संवाद: गजाधर बाबू एक भावुक और मर्यादित पिता हैं, जबकि बच्चे आधुनिक और आत्मकेंद्रित हैं। पत्नी का पात्र सबसे अधिक यथार्थवादी है, जो पति और बच्चों के बीच संतुलन बनाते-बनाते भावनाओं से रिक्त हो चुकी है। संवाद छोटे और तीखे हैं जो पात्रों के अंतर्द्वंद्व को स्पष्ट करते हैं। अमर का यह कहना—"बूढ़े आदमी हैं, चुपचाप पड़े रहें। हर चीज में दखल क्यों देते हैं?" बच्चों की नई मानसिकता का परिचायक है।

(ग) वातावरण और परिवेश: लेखिका ने घर के भीतर के घुटन भरे वातावरण को प्रभावी ढंग से चित्रित किया है। बैठक में उनकी चारपाई का होना और फिर उसे कोठरी में डाल दिया जाना, उनके विस्थापन का प्रतीक है। गजाधर बाबू को महसूस होता है—"उनकी उपस्थिति उस घर में ऐसी असंगत लगने लगी थी, जैसे सजी हुई बैठक में उनकी चारपाई थी।" यह वाक्य पूरी कहानी के वातावरण को स्पष्ट कर देता है।

(घ) भाषा और शैली: ऊषा प्रियंवदा की भाषा सरल हिंदी है, लेकिन उसमें सांकेतिकता बहुत गहरी है। 'वापसी' शीर्षक स्वयं में एक व्यंग्य है। उन्होंने सूक्ष्म प्रतीकों का प्रयोग किया है, जैसे—"रेल की पटरियों की खट-खट उनके लिए मधुर संगीत थी", जो यह दिखाता है कि वे घर की अपेक्षा बाहर अधिक सुकून में थे।

(ङ) युगीन प्रासंगिकता: यह कहानी आज के समय में और भी प्रासंगिक है। आज के उपभोक्तावादी समाज में जहाँ बुजुर्गों को 'ओल्ड एज होम' भेजा जा रहा है, 'वापसी' उस मानसिक पीड़ा को बयां करती है जो एक व्यक्ति अपने ही घर में रहकर झेलता है। अंत में उनका जाना यह सिद्ध करता है कि—"घर केवल चार दीवारों से नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और स्नेह से बनता है।"

६. महत्वपूर्ण गद्यांशों की विस्तृत व्याख्या

संकेत : "गजाधर बाबू खुश थे... फिर उसी स्नेह और आदर के मध्य रहने जा रहे थे।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'कथा सरिता' के 'वापसी' नामक पाठ से लिया गया है। इस कहानी की लेखिका 'ऊषा प्रियंवदा' जी हैं।
प्रसंग : इसमें रिटायरमेंट के समय गजाधर बाबू की भविष्य की सुनहरी कल्पनाओं और उनके स्नेहिल स्वभाव का चित्रण किया गया है।
व्याख्या : सेवानिवृत्ति के समय गजाधर बाबू के मन में उत्साह और उमंग का सागर हिलोरे मार रहा था। पैंतीस वर्षों तक रेलवे की एकाकी नौकरी करने के बाद, उन्होंने जिस सुखद भविष्य का सपना देखा था, वह अब उनके सामने था। वे उन दिनों को याद करते थे जब उनकी पत्नी उनके आने की आहट पाकर रसोई के दरवाजे पर खड़ी हो जाती थी और उनके लिए गरम-गरम रोटियाँ सेकती थी। उन्होंने अपनी सुख-सुविधाओं का त्याग केवल इसलिए किया ताकि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकें। उनके लिए रिटायरमेंट का अर्थ केवल काम से छुट्टी नहीं थी, बल्कि उस स्नेह और आदर को पुनः प्राप्त करना था जिसके वे हकदार थे। वे सोचते थे कि अब वे अपने बनाए घर के केंद्र होंगे और पूरा परिवार उनके अनुभवों का लाभ उठाएगा। यह गद्यांश एक पिता के निस्वार्थ प्रेम और उसकी उन उम्मीदों को दर्शाता है जो वह अपने परिवार से पाल लेता है। लेखिका ने यहाँ गजाधर बाबू के उस कोमल पक्ष को उभारा है जो केवल अपनों का साथ चाहता है।

संकेत : "यही थी क्या उनकी पत्नी... मन और प्राणों के लिए नितांत अपरिचित है।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'कथा सरिता' के 'वापसी' नामक पाठ से लिया गया है। इस कहानी की लेखिका 'ऊषा प्रियंवदा' जी हैं।
प्रसंग : गजाधर बाबू का अपनी पत्नी के बदले हुए और नीरस व्यवहार को देखकर होने वाले मानसिक दुख और मोहभंग का वर्णन है।
व्याख्या : घर लौटने के कुछ समय बाद ही गजाधर बाबू को यह कड़वा अहसास होता है कि समय ने उनकी पत्नी को पूरी तरह बदल दिया है। वह पत्नी, जिसकी स्मृति उन्हें अकेलेपन में संबल देती थी, अब केवल एक 'मैकेनिकल' गृहस्वामिनी बनकर रह गई है। उसे पति के भावनात्मक सान्निध्य की अपेक्षा घी, चीनी और राशन के डिब्बों की अधिक चिंता है। जब वह सोई हुई होती है, तो गजाधर बाबू उसे एक निस्पृह दृष्टि से देखते हैं और पाते हैं कि वह लावण्यमयी स्त्री कहीं खो गई है। अब वह उनके लिए एक ऐसी अपरिचित महिला की तरह है जिसके जीवन में उनके लिए कोई विशेष स्थान नहीं बचा है। यह गद्यांश दांपत्य संबंधों के उस अकेलेपन को रेखांकित करता है जहाँ दो लोग एक ही छत के नीचे रहकर भी एक-दूसरे से मीलों दूर हो जाते हैं। लेखिका ने यहाँ समय के साथ संबंधों में आने वाली जड़ता और संवेदनशून्यता को बड़ी ही बारीकी से उकेरा है। यह मोहभंग की वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति अपनी सबसे प्रिय वस्तु में भी अजनबीपन महसूस करने लगता है।

संकेत : "गजाधर बाबू ने आहत दृष्टि से... उनके जीवन के केंद्र नहीं हो सकते।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'कथा सरिता' के 'वापसी' नामक पाठ से लिया गया है। इस कहानी की लेखिका 'ऊषा प्रियंवदा' जी हैं।
प्रसंग : गजाधर बाबू को अपनी उपयोगिता का अहसास होने और परिवार में स्वयं को एक फालतू वस्तु समझने का मार्मिक चित्रण है।
व्याख्या : गजाधर बाबू जब अपनी पत्नी को केवल बच्चों के पक्ष में और अपनी उपेक्षा करते हुए देखते हैं, तो उनका मन अत्यंत दुखी हो जाता है। उन्हें अहसास होता है कि परिवार के लिए उनका महत्व केवल एक 'मनी-ऑर्डर मशीन' की तरह था। जब तक वे पैसे कमाकर भेजते रहे, वे आदरणीय थे, लेकिन अब जब वे साक्षात घर में उपस्थित हैं, तो वे सबको खटक रहे हैं। उनकी पत्नी के लिए भी वे अब जीवन के केंद्र नहीं रहे, बल्कि उसके लिए तो अब गृहस्थी के कनस्तर और बच्चों की खुशियाँ ही संपूर्ण दुनिया बन चुकी हैं। समाज में जिस सिंदूर और सम्मान की वह अधिकारिणी है, वह गजाधर बाबू की बदौलत ही है, फिर भी वह उन्हें दो वक्त की रोटी देने को ही अपना अंतिम कर्तव्य मानती है। यह व्याख्या मानवीय संबंधों के उस कड़वे सच को उजागर करती है जहाँ भावनाएँ आर्थिक उपयोगिता के सामने घुटने टेक देती हैं। गजाधर बाबू का यह अहसास कि वे अब केंद्र नहीं रहे, उनके व्यक्तित्व के बिखराव और उनकी अंतिम विदाई की भूमिका तैयार करता है।

संकेत : "अरे नरेंद्र, बाबू की चारपाई... चलने तक की जगह नहीं है।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'कथा सरिता' के 'वापसी' नामक पाठ से लिया गया है। इस कहानी की लेखिका 'ऊषा प्रियंवदा' जी हैं।
प्रसंग : कहानी का अंतिम और सर्वाधिक हृदयविदारक दृश्य, जहाँ गजाधर बाबू के घर से निकलते ही उनके वजूद को मिटाने का प्रयास किया जाता है।
व्याख्या : गजाधर बाबू के घर छोड़कर पुनः नौकरी पर चले जाने के बाद, उनके परिवार की प्रतिक्रिया उनके प्रति रही उपेक्षा का अंतिम प्रमाण है। उनके जाते ही पत्नी और बच्चों के मन में विछोह की वेदना नहीं, बल्कि एक 'राहत' का भाव आता है। पत्नी तुरंत अपने बेटे नरेंद्र को आदेश देती है कि वह गजाधर बाबू की चारपाई को कमरे से बाहर निकाल दे क्योंकि वह जगह घेर रही है। यह चारपाई केवल एक वस्तु नहीं थी, बल्कि वह गजाधर बाबू के उस घर में अस्तित्व और उनके अधिकार का अंतिम प्रतीक थी। उस चारपाई का घर से बाहर निकाला जाना वास्तव में गजाधर बाबू को हमेशा के लिए परिवार के दिल और घर से बाहर निकाल देने जैसा है। लेखिका ने यहाँ आधुनिक परिवार की संवेदनशून्यता को अपनी पराकाष्ठा पर दिखाया है। गजाधर बाबू के जाने के बाद घर का फिर से सिनेमा जाने की योजना बनाना और चारपाई का हटाया जाना यह सिद्ध करता है कि वे उस घर के लिए 'असंगत' थे। यह व्याख्या पाठक के मन में गहरा क्षोभ और करुणा उत्पन्न करती है।

साहित्य विश्लेषण श्रृंखला · 'वापसी' · सर्वाधिकार सुरक्षित

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