📖 अन्तस्थ (य, र, ल, व) एवं ऊष्म (श, ष, स, ह) : पाणिनीय व्याकरणिक रहस्य एवं प्रमुख सूत्र
संस्कृत व्याकरण में अन्तस्थ (य्, र्, ल्, व्) और ऊष्म (श्, ष्, स्, ह्) व्यञ्जनों के अन्त वाले प्रातिपदिक एवं क्विबन्त धातुरूप (Root-Nouns) पद-साधना की दृष्टि से सर्वाधिक गूढ़, चमत्कारी और प्रतियोगी परीक्षाओं (UGC-NET, UPSC, Assistant Professor) के प्रिय विषय हैं।
१. य, र, ल, व (अन्तस्थ हलन्त) के विशिष्ट सूत्र
• रकारान्त इगन्त शब्दों (गिर्, पुर्, धुर्) में पदान्त रेफ परे रहते उपधा को दीर्घ होता है तथा 'हल्ङ्याब्भ्यो...' से सु-लोप और विसर्ग होकर गीः, पूः, धूः बनते हैं।
• सप्तमी बहुवचन में 'इण्कोः' से मूर्धन्य 'र्षु' होता है: गीर्षु, पूर्षु, धूर्षु।
• यकारान्त व लकारान्त: 'लोपो व्योर्वलि' (६.१.६६) तथा धातुपाठ की प्रकृति के कारण शुद्ध य्-कारान्त और ल्-कारान्त शब्द अत्यन्त विरल हैं।
• प्रथमा एकवचन: सुँ परे रहते दिव् के वकार को 'औ' आदेश होता है ➔ दि + औ + सुँ ➔ द्यौः!
• हलादि विभक्तियों में (भ्याम्, भिः, भ्यः, सु): 'दिव्' के इकार-वकार को 'उ' होकर द्युभ्याम्, द्युभिः, द्युभ्यः, द्युषु बनता है।
• अजादि में: वकार सुरक्षित रहता है ➔ दिवौ, दिवः, दिवा, दिवे, दिवि।
• चतुर् शब्द: नित्य बहुवचन। पुं. में चत्वारः, चतुरः, चतुर्भिः, चतुर्णाम्, चतुर्षु | स्त्री. में 'तिसृचतसृ' (७.२.९९) से चतस्रः, चतस्रः, चतसृभिः, चतसृणाम्, चतसृषु।
२. शकारान्त एवं षकारान्त (श्, ष्) के दोहरे सन्धि-नियम
• सामान्य नियम (ट्/ड् भाव): 'विश्', 'नश्' आदि में शकार को 'ष्' होकर पदान्त में 'ट् / ड्' होता है ➔ विश् ➔ विट् / विड्, हलादि में विड्भ्याम्, सप्तमी बहु. में विट्सु। षकारान्त (प्रावृष्, द्विष्) में भी यही होकर प्रावृट्/प्रावृड्, द्विट्/द्विड् बनता है।
• अपवाद नियम (क्/ग् भाव): 'दिशः कः' तथा क्विन्-प्रत्यय के कारण 'दिश्', 'दृश्', 'स्पृश्' आदि के शकार को 'क् / ग्' (कुत्व) होता है ➔ दिश् ➔ दिक् / दिग्, दृश् ➔ दृक् / दृग्, स्पृश् ➔ स्पृक् / स्पृग्। हलादि में दिग्भ्याम् तथा सप्तमी बहुवचन में दिक्षु, दृक्षु बनता है!
३. सकारान्त (स्) वर्ग के गूढ़ पाणिनीय भेद
• पुल्लिंग असन्त (वेधस्, चन्द्रमस्): प्रथमा १व. में उपधा दीर्घ व विसर्ग ➔ वेधाः, चन्द्रमाः | हलादि में 'ओ' ➔ वेधोभ्याम्, चन्द्रमोभ्याम्।
• विद्वस् (वस्वन्त): प्रथमा १व. विद्वान् (सम्बोधन: हे विद्वन्!)। भ-संज्ञा (द्वितीया बहु. से आगे) में 'व्' को सम्प्रसारण 'उ' होकर विदुषः, विदुषा, विदुषे, विदुषि बनता है! हलादि में 'द्' होकर विद्वद्भ्याम्, विद्वत्सु बनता है।
• पुंस् (पुरुष): प्रथमा १व. पुमान्, द्विवचन पुमांसौ, बहुवचन पुमांसः। द्वितीया बहुवचन पुंसः, हलादि में पुम्भ्याम्, पुम्भिः, पुंसु।
• नपुंसकलिंग (मनस्, पयस्, चक्षुस्, धनुस्, हविस्): प्रथमा/द्वितीया में मनः, मनसी, मनांसि | पयः, पयसी, पयांसि | चक्षुः, चक्षुषी, चक्षूंषि | धनुः, धनुषी, धनूंषि | हविः, हविषी, हवींषि।
४. हकारान्त (ह्) वर्ग : 'हो ढः' एवं 'दादेर्धातोर्घः' का सर्वोच्च रहस्य
१. "हो ढः" (८.२.३१) — सामान्य नियम: धातु के हकार को पदान्त में 'ढ' ➔ 'ड्' ➔ 'ट्' होता है: मधुलिह् ➔ मधुलिट् / मधुलिड्, हलादि: मधुलिड्भ्याम्, सप्तमी बहु.: मधुलिट्सु।
२. "दादेर्धातोर्घः" (८.२.३२) + "एकाचो बशो भष्..." (८.२.३७) — भष्-भाव: यदि धातु 'द्' से प्रारम्भ हो (दुह्, द्रुह्), तो हकार को 'घ्' (क्/ग्) तथा आदि दकार को 'ध' होता है:
• कामदुह् ➔ कामधुक् / कामधुग् | हलादि: कामधुग्भ्याम् | सप्तमी बहु.: कामधुक्षु।
• मित्रद्रुह् ➔ मित्रध्रुक् / मित्रध्रुग् (विकल्प से 'हो ढः' लगकर मित्रध्रुट् / मित्रध्रुड् भी बनता है)।
३. "अनडुहः सा" (७.१.९८) — अनडुह् (बैल): प्रथमा १व. अनड्वान्, द्विवचन अनड्वाहौ, बहुवचन अनड्वाहः। द्वितीया बहु. अनडुहः। हलादि में 'द्': अनडुद्भ्याम्, अनडुद्भिः, अनडुत्सु।
४. "उपानह्" (जूता): 'नहिवृति...' से हकार को 'त् / द्' होता है (ढकार नहीं होता!) ➔ उपानत् / उपानद्, हलादि: उपानद्भ्याम्, सप्तमी बहु.: उपानत्सु।
५. "वाह ऊठ्" (६.४.१३२): 'विश्ववाह्' में भ-संज्ञा में ऊठ् होकर वृद्धि से विश्वौहः, विश्वौहा बनते हैं।
१. यकारान्त पुल्लिंग - ध्येय् शब्द रूप
(👉 ध्यान करने वाला - दुर्लभ यकारान्त क्विबन्त)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | ध्येः | ध्येयौ | ध्येयः |
| द्वितीया | ध्येयम् | ध्येयौ | ध्येयः |
| तृतीया | ध्येया | ध्येयभ्याम् | ध्येयभिः |
| चतुर्थी | ध्येये | ध्येयभ्याम् | ध्येयभ्यः |
| पञ्चमी | ध्येयः | ध्येयभ्याम् | ध्येयभ्यः |
| षष्ठी | ध्येयः | ध्येयोः | ध्येयाम् |
| सप्तमी | ध्येयि | ध्येयोः | ध्येय्सु |
| सम्बोधन | हे ध्येः | हे ध्येयौ | हे ध्येयः |
२. लकारान्त पुल्लिंग - वल् शब्द रूप
(👉 संवरण करने वाला / गतिशील - क्विबन्त लकारान्त)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | वल् | वलौ | वलः |
| द्वितीया | वलम् | वलौ | वलः |
| तृतीया | वला | वल्भ्याम् | वल्भिः |
| चतुर्थी | वले | वल्भ्याम् | वल्भ्यः |
| पञ्चमी | वलः | वल्भ्याम् | वल्भ्यः |
| षष्ठी | वलः | वलोः | वलाम् |
| सप्तमी | वलि | वलोः | वल्सु |
| सम्बोधन | हे वल् | हे वलौ | हे वलः |
३. रकारान्त पुल्लिंग/अव्यय - स्वर् शब्द रूप
(👉 स्वर्गलोक / सूर्य / प्रकाश)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | स्वः / स्वर् | स्वरौ | स्वरः |
| द्वितीया | स्वरम् | स्वरौ | स्वरः |
| तृतीया | स्वरा | स्वर्भ्याम् | स्वर्भिः |
| चतुर्थी | स्वरे | स्वर्भ्याम् | स्वर्भ्यः |
| पञ्चमी | स्वरः | स्वर्भ्याम् | स्वर्भ्यः |
| षष्ठी | स्वरः | स्वरोः | स्वराम् |
| सप्तमी | स्वरि | स्वरोः | स्वर्षु |
| सम्बोधन | हे स्वः / हे स्वर् | हे स्वरौ | हे स्वरः |
४. रकारान्त पुल्लिंग - पुनर् शब्द रूप
(👉 पुनः-पुनः जन्म लेने वाला जीव)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | पुनः / पुनर् | पुनरौ | पुनरः |
| द्वितीया | पुनरम् | पुनरौ | पुनरः |
| तृतीया | पुनरा | पुनर्भ्याम् | पुनर्भिः |
| चतुर्थी | पुनरे | पुनर्भ्याम् | पुनर्भ्यः |
| पञ्चमी | पुनरः | पुनर्भ्याम् | पुनर्भ्यः |
| षष्ठी | पुनरः | पुनरोः | पुनराम् |
| सप्तमी | पुनरि | पुनरोः | पुनर्षु |
| सम्बोधन | हे पुनः / हे पुनर् | हे पुनरौ | हे पुनरः |
५. रकारान्त नपुंसकलिंग - वार् शब्द रूप
(👉 जल / पानी - मुख्य रकारान्त नपुंसक)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | वार् | वारी | वारि |
| द्वितीया | वार् | वारी | वारि |
| तृतीया | वारा | वार्भ्याम् | वार्भिः |
| चतुर्थी | वारे | वार्भ्याम् | वार्भ्यः |
| पञ्चमी | वारः | वार्भ्याम् | वार्भ्यः |
| षष्ठी | वारः | वारोः | वाराम् |
| सप्तमी | वारि | वारोः | वार्षु |
| सम्बोधन | हे वार् | हे वारी | हे वारि |
६. रकारान्त स्त्रीलिंग - गीर् शब्द रूप
(👉 वाणी / सरस्वती - 'र्वोर्भुपधाया...' से 'गीः')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | गीः | गिरौ | गिरः |
| द्वितीया | गिरम् | गिरौ | गिरः |
| तृतीया | गिरा | गीर्भ्याम् | गीर्भिः |
| चतुर्थी | गिरे | गीर्भ्याम् | गीर्भ्यः |
| पञ्चमी | गिरः | गीर्भ्याम् | गीर्भ्यः |
| षष्ठी | गिरः | गिरोः | गिराम् |
| सप्तमी | गिरि | गिरोः | गीर्षु |
| सम्बोधन | हे गीः | हे गिरौ | हे गिरः |
७. रकारान्त स्त्रीलिंग - पूर् शब्द रूप
(👉 नगरी / पुरी - १व. में उपधा दीर्घ से 'पूः')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | पूः | पुरौ | पुरः |
| द्वितीया | पुरम् | पुरौ | पुरः |
| तृतीया | पुरा | पूर्भ्याम् | पूर्भिः |
| चतुर्थी | पुरे | पूर्भ्याम् | पूर्भ्यः |
| पञ्चमी | पुरः | पूर्भ्याम् | पूर्भ्यः |
| षष्ठी | पुरः | पुरोः | पुराम् |
| सप्तमी | पुरि | पुरोः | पूर्षु |
| सम्बोधन | हे पूः | हे पुरौ | हे पुरः |
८. रकारान्त स्त्रीलिंग - धूर् शब्द रूप
(👉 जुआ / धुरी / भार - १व. में 'धूः')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | धूः | धुरौ | धुरः |
| द्वितीया | धुरम् | धुरौ | धुरः |
| तृतीया | धुरा | धूर्भ्याम् | धूर्भिः |
| चतुर्थी | धुरे | धूर्भ्याम् | धूर्भ्यः |
| पञ्चमी | धुरः | धूर्भ्याम् | धूर्भ्यः |
| षष्ठी | धुरः | धुरोः | धुराम् |
| सप्तमी | धुरि | धुरोः | धूर्षु |
| सम्बोधन | हे धूः | हे धुरौ | हे धुरः |
९. रकारान्त स्त्रीलिंग - द्वार् शब्द रूप
(👉 कपाट / दरवाजा / प्रवेश मार्ग)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | द्वाः | द्वारौ | द्वारः |
| द्वितीया | द्वारम् | द्वारौ | द्वारः |
| तृतीया | द्वारा | द्वार्भ्याम् | द्वार्भिः |
| चतुर्थी | द्वारे | द्वार्भ्याम् | द्वार्भ्यः |
| पञ्चमी | द्वारः | द्वार्भ्याम् | द्वार्भ्यः |
| षष्ठी | द्वारः | द्वारोः | द्वाराम् |
| सप्तमी | द्वारि | द्वारोः | द्वार्षु |
| सम्बोधन | हे द्वाः | हे द्वारौ | हे द्वारः |
१०. रकारान्त स्त्रीलिंग - दुर् शब्द रूप
(👉 द्वार / संकट निवारक)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | दूः | दुरौ | दुरः |
| द्वितीया | दुरम् | दुरौ | दुरः |
| तृतीया | दुरा | दूर्भ्याम् | दूर्भिः |
| चतुर्थी | दुरे | दूर्भ्याम् | दूर्भ्यः |
| पञ्चमी | दुरः | दूर्भ्याम् | दूर्भ्यः |
| षष्ठी | दुरः | दुरोः | दुराम् |
| सप्तमी | दुरि | दुरोः | दूर्षु |
| सम्बोधन | हे दूः | हे दुरौ | हे दुरः |
११. रकारान्त स्त्रीलिंग - तूर् शब्द रूप
(👉 वाद्ययन्त्र / तुरही)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | तूः | तुरौ | तुरः |
| द्वितीया | तुरम् | तुरौ | तुरः |
| तृतीया | तुरा | तूर्भ्याम् | तूर्भिः |
| चतुर्थी | तुरे | तूर्भ्याम् | तूर्भ्यः |
| पञ्चमी | तुरः | तूर्भ्याम् | तूर्भ्यः |
| षष्ठी | तुरः | तुरोः | तुराम् |
| सप्तमी | तुरि | तुरोः | तूर्षु |
| सम्बोधन | हे तूः | हे तुरौ | हे तुरः |
१२. रकारान्त पुल्लिंग - राजधूर् शब्द रूप
(👉 राज्य का भार वहन करने वाला मन्त्री)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | राजधूः | राजधुरौ | राजधुरः |
| द्वितीया | राजधुरम् | राजधुरौ | राजधुरः |
| तृतीया | राजधुरा | राजधूर्भ्याम् | राजधूर्भिः |
| चतुर्थी | राजधुरे | राजधूर्भ्याम् | राजधूर्भ्यः |
| पञ्चमी | राजधुरः | राजधूर्भ्याम् | राजधूर्भ्यः |
| षष्ठी | राजधुरः | राजधुरोः | राजधुराम् |
| सप्तमी | राजधुरि | राजधुरोः | राजधूर्षु |
| सम्बोधन | हे राजधूः | हे राजधुरौ | हे राजधुरः |
१३. वकारान्त पुं./स्त्री. - दिव् शब्द रूप
(👉 स्वर्ग / आकाश - 'दिव औत्' से 'द्यौः', हलादि में 'द्यु')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | द्यौः | दिवौ | दिवः |
| द्वितीया | दिवम् | दिवौ | दिवः |
| तृतीया | दिवा | द्युभ्याम् | द्युभिः |
| चतुर्थी | दिवे | द्युभ्याम् | द्युभ्यः |
| पञ्चमी | दिवः | द्युभ्याम् | द्युभ्यः |
| षष्ठी | दिवः | दिवोः | दिवाम् |
| सप्तमी | दिवि | दिवोः | द्युषु |
| सम्बोधन | हे द्यौः | हे दिवौ | हे दिवः |
१४. वकारान्त/रेफान्त पुल्लिंग - चतुर् शब्द रूप
(👉 चार संख्या - नित्य बहुवचनान्त)| विभक्ति | बहुवचन (केवल बहुवचन) |
|---|---|
| प्रथमा | चत्वारः |
| द्वितीया | चतुरः |
| तृतीया | चतुर्भिः |
| चतुर्थी | चतुर्भ्यः |
| पञ्चमी | चतुर्भ्यः |
| षष्ठी | चतुर्णाम् |
| सप्तमी | चतुर्षु |
| सम्बोधन | हे चत्वारः |
१५. रकारान्त स्त्रीलिंग - चतुर् शब्द रूप
(👉 चार संख्या - 'तिसृचतसृ' से 'चतस्रः')| विभक्ति | बहुवचन (स्त्रीलिंग) |
|---|---|
| प्रथमा | चतस्रः |
| द्वितीया | चतस्रः |
| तृतीया | चतसृभिः |
| चतुर्थी | चतसृभ्यः |
| पञ्चमी | चतसृभ्यः |
| षष्ठी | चतसृणाम् |
| सप्तमी | चतसृषु |
| सम्बोधन | हे चतस्रः |
१६. रकारान्त नपुंसकलिंग - चतुर् शब्द रूप
(👉 चार संख्या - नपुंसकलिंग)| विभक्ति | बहुवचन (नपुंसकलिंग) |
|---|---|
| प्रथमा | चत्वारि |
| द्वितीया | चत्वारि |
| तृतीया | चतुर्भिः |
| चतुर्थी | चतुर्भ्यः |
| पञ्चमी | चतुर्भ्यः |
| षष्ठी | चतुर्णाम् |
| सप्तमी | चतुर्षु |
| सम्बोधन | हे चत्वारि |
१७. शकारान्त पुल्लिंग - विश् शब्द रूप
(👉 प्रजा / वैश्य - 'व्रश्च...' से ष होकर 'विट्/विड्')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | विट् / विड् | विशौ | विशः |
| द्वितीया | विशम् | विशौ | विशः |
| तृतीया | विशा | विड्भ्याम् | विड्भिः |
| चतुर्थी | विशे | विड्भ्याम् | विड्भ्यः |
| पञ्चमी | विशः | विड्भ्याम् | विड्भ्यः |
| षष्ठी | विशः | विशोः | विशाम् |
| सप्तमी | विशि | विशोः | विट्सु |
| सम्बोधन | हे विट् / हे विड् | हे विशौ | हे विशः |
१८. शकारान्त स्त्रीलिंग - दिश् शब्द रूप
(👉 दिशा - 'दिशः कः' से 'दिक्/दिग्', सप्तमी में 'दिक्षु')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | दिक् / दिग् | दिशौ | दिशः |
| द्वितीया | दिशम् | दिशौ | दिशः |
| तृतीया | दिशा | दिग्भ्याम् | दिग्भिः |
| चतुर्थी | दिशे | दिग्भ्याम् | दिग्भ्यः |
| पञ्चमी | दिशः | दिग्भ्याम् | दिग्भ्यः |
| षष्ठी | दिशः | दिशोः | दिशाम् |
| सप्तमी | दिशि | दिशोः | दिक्षु |
| सम्बोधन | हे दिक् / हे दिग् | हे दिशौ | हे दिशः |
१९. शकारान्त स्त्री./पुं. - दृश् शब्द रूप
(👉 दृष्टि / नेत्र - कुत्व होकर 'दृक्/दृग्')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | दृक् / दृग् | दृशौ | दृशः |
| द्वितीया | दृशम् | दृशौ | दृशः |
| तृतीया | दृशा | दृग्भ्याम् | दृग्भिः |
| चतुर्थी | दृशे | दृग्भ्याम् | दृग्भ्यः |
| पञ्चमी | दृशः | दृग्भ्याम् | दृग्भ्यः |
| षष्ठी | दृशः | दृशोः | दृशाम् |
| सप्तमी | दृशि | दृशोः | दृक्षु |
| सम्बोधन | हे दृक् / हे दृग् | हे दृशौ | हे दृशः |
२०. शकारान्त पुल्लिंग - स्पृश् शब्द रूप
(👉 स्पर्श करने वाला - क्विन्-प्रत्ययान्त 'स्पृक्/स्पृग्')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | स्पृक् / स्पृग् | स्पृशौ | स्पृशः |
| द्वितीया | स्पृशम् | स्पृशौ | स्पृशः |
| तृतीया | स्पृशा | स्पृग्भ्याम् | स्पृग्भिः |
| चतुर्थी | स्पृशे | स्पृग्भ्याम् | स्पृग्भ्यः |
| पञ्चमी | स्पृशः | स्पृग्भ्याम् | स्पृग्भ्यः |
| षष्ठी | स्पृशः | स्पृशोः | स्पृशाम् |
| सप्तमी | स्पृशि | स्पृशोः | स्पृक्षु |
| सम्बोधन | हे स्पृक् / हे स्पृग् | हे स्पृशौ | हे स्पृशः |
२१. शकारान्त पुल्लिंग - ईदृश् शब्द रूप
(👉 इस प्रकार का / ऐसा पुरुष)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | ईदृक् / ईदृग् | ईदृशौ | ईदृशः |
| द्वितीया | ईदृशम् | ईदृशौ | ईदृशः |
| तृतीया | ईदृशा | ईदृग्भ्याम् | ईदृग्भिः |
| चतुर्थी | ईदृशे | ईदृग्भ्याम् | ईदृग्भ्यः |
| पञ्चमी | ईदृशः | ईदृग्भ्याम् | ईदृग्भ्यः |
| षष्ठी | ईदृशः | ईदृशोः | ईदृशाम् |
| सप्तमी | ईदृशि | ईदृशोः | ईदृक्षु |
| सम्बोधन | हे ईदृक् / हे ईदृग् | हे ईदृशौ | हे ईदृशः |
२२. शकारान्त पुल्लिंग - तादृश् शब्द रूप
(👉 उस प्रकार का / वैसा पुरुष)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | तादृक् / तादृग् | तादृशौ | तादृशः |
| द्वितीया | तादृशम् | तादृशौ | तादृशः |
| तृतीया | तादृशा | तादृग्भ्याम् | तादृग्भिः |
| चतुर्थी | तादृशे | तादृग्भ्याम् | तादृग्भ्यः |
| पञ्चमी | तादृशः | तादृग्भ्याम् | तादृग्भ्यः |
| षष्ठी | तादृशः | तादृशोः | तादृशाम् |
| सप्तमी | तादृशि | तादृशोः | तादृक्षु |
| सम्बोधन | हे तादृक् / हे तादृग् | हे तादृशौ | हे तादृशः |
२३. शकारान्त पुल्लिंग - कीदृश् शब्द रूप
(👉 किस प्रकार का / कैसा पुरुष)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | कीदृक् / कीदृग् | कीदृशौ | कीदृशः |
| द्वितीया | कीदृशम् | कीदृशौ | कीदृशः |
| तृतीया | कीदृशा | कीदृग्भ्याम् | कीदृग्भिः |
| चतुर्थी | कीदृशे | कीदृग्भ्याम् | कीदृग्भ्यः |
| पञ्चमी | कीदृशः | कीदृग्भ्याम् | कीदृग्भ्यः |
| षष्ठी | कीदृशः | कीदृशोः | कीदृशाम् |
| सप्तमी | कीदृशि | कीदृशोः | कीदृक्षु |
| सम्बोधन | हे कीदृक् / हे कीदृग् | हे कीदृशौ | हे कीदृशः |
२४. शकारान्त पुल्लिंग - नश् शब्द रूप
(👉 नष्ट करने वाला - 'नट्/नड्')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | नट् / नड् | नशौ | नशः |
| द्वितीया | नशम् | नशौ | नशः |
| तृतीया | नशा | नड्भ्याम् | नड्भिः |
| चतुर्थी | नशे | नड्भ्याम् | नड्भ्यः |
| पञ्चमी | नशः | नड्भ्याम् | नड्भ्यः |
| षष्ठी | नशः | नशोः | नशाम् |
| सप्तमी | नशि | नशोः | नट्सु |
| सम्बोधन | हे नट् / हे नड् | हे नशौ | हे नशः |
२५. शकारान्त पुल्लिंग - घृतस्पृश् शब्द रूप
(👉 घृत का स्पर्श करने वाली अग्नि)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | घृतस्पृक् / घृतस्पृग् | घृतस्पृशौ | घृतस्पृशः |
| द्वितीया | घृतस्पृशम् | घृतस्पृशौ | घृतस्पृशः |
| तृतीया | घृतस्पृशा | घृतस्पृग्भ्याम् | घृतस्पृग्भिः |
| चतुर्थी | घृतस्पृशे | घृतस्पृग्भ्याम् | घृतस्पृग्भ्यः |
| पञ्चमी | घृतस्पृशः | घृतस्पृग्भ्याम् | घृतस्पृग्भ्यः |
| षष्ठी | घृतस्पृशः | घृतस्पृशोः | घृतस्पृशाम् |
| सप्तमी | घृतस्पृशि | घृतस्पृशोः | घृतस्पृक्षु |
| सम्बोधन | हे घृतस्पृक् / हे घृतस्पृग् | हे घृतस्पृशौ | हे घृतस्पृशः |
२६. शकारान्त पुल्लिंग - मन्त्रदृश् शब्द रूप
(👉 मन्त्रद्रष्टा ऋषि)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | मन्त्रदृक् / मन्त्रदृग् | मन्त्रदृशौ | मन्त्रदृशः |
| द्वितीया | मन्त्रदृशम् | मन्त्रदृशौ | मन्त्रदृशः |
| तृतीया | मन्त्रदृशा | मन्त्रदृग्भ्याम् | मन्त्रदृग्भिः |
| चतुर्थी | मन्त्रदृशे | मन्त्रदृग्भ्याम् | मन्त्रदृग्भ्यः |
| पञ्चमी | मन्त्रदृशः | मन्त्रदृग्भ्याम् | मन्त्रदृग्भ्यः |
| षष्ठी | मन्त्रदृशः | मन्त्रदृशोः | मन्त्रदृशाम् |
| सप्तमी | मन्त्रदृशि | मन्त्रदृशोः | मन्त्रदृक्षु |
| सम्बोधन | हे मन्त्रदृक् / हे मन्त्रदृग् | हे मन्त्रदृशौ | हे मन्त्रदृशः |
२७. षकारान्त स्त्रीलिंग - प्रावृष् शब्द रूप
(👉 वर्षा ऋतु - १व. में 'प्रावृट्/प्रावृड्', हलादि में 'ड्')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | प्रावृट् / प्रावृड् | प्रावृषौ | प्रावृषः |
| द्वितीया | प्रावृषम् | प्रावृषौ | प्रावृषः |
| तृतीया | प्रावृषा | प्रावृड्भ्याम् | प्रावृड्भिः |
| चतुर्थी | प्रावृषे | प्रावृड्भ्याम् | प्रावृड्भ्यः |
| पञ्चमी | प्रावृषः | प्रावृड्भ्याम् | प्रावृड्भ्यः |
| षष्ठी | प्रावृषः | प्रावृषोः | प्रावृषाम् |
| सप्तमी | प्रावृषि | प्रावृषोः | प्रावृट्सु |
| सम्बोधन | हे प्रावृट् / हे प्रावृड् | हे प्रावृषौ | हे प्रावृषः |
२८. षकारान्त पुल्लिंग - द्विष् शब्द रूप
(👉 शत्रु / द्वेष करने वाला - 'द्विट्/द्विड्')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | द्विट् / द्विड् | द्विषौ | द्विषः |
| द्वितीया | द्विषम् | द्विषौ | द्विषः |
| तृतीया | द्विषा | द्विड्भ्याम् | द्विड्भिः |
| चतुर्थी | द्विषे | द्विड्भ्याम् | द्विड्भ्यः |
| पञ्चमी | द्विषः | द्विड्भ्याम् | द्विड्भ्यः |
| षष्ठी | द्विषः | द्विषोः | द्विषाम् |
| सप्तमी | द्विषि | द्विषोः | द्विट्सु |
| सम्बोधन | हे द्विट् / हे द्विड् | हे द्विषौ | हे द्विषः |
२९. षकारान्त स्त्रीलिंग - विप्रुष् शब्द रूप
(👉 जल की बूंद / कणिका)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | विप्रुट् / विप्रुड् | विप्रुषौ | विप्रुषः |
| द्वितीया | विप्रुषम् | विप्रुषौ | विप्रुषः |
| तृतीया | विप्रुषा | विप्रुड्भ्याम् | विप्रुड्भिः |
| चतुर्थी | विप्रुषे | विप्रुड्भ्याम् | विप्रुड्भ्यः |
| पञ्चमी | विप्रुषः | विप्रुड्भ्याम् | विप्रुड्भ्यः |
| षष्ठी | विप्रुषः | विप्रुषोः | विप्रुषाम् |
| सप्तमी | विप्रुषि | विप्रुषोः | विप्रुट्सु |
| सम्बोधन | हे विप्रुट् / हे विप्रुड् | हे विप्रुषौ | हे विप्रुषः |
३०. षकारान्त पुल्लिंग - जुष् शब्द रूप
(👉 प्रीतिपूर्वक सेवन करने वाला साधक)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | जुट् / जुड् | जुषौ | जुषः |
| द्वितीया | जुषम् | जुषौ | जुषः |
| तृतीया | जुषा | जुड्भ्याम् | जुड्भिः |
| चतुर्थी | जुषे | जुड्भ्याम् | जुड्भ्यः |
| पञ्चमी | जुषः | जुड्भ्याम् | जुड्भ्यः |
| षष्ठी | जुषः | जुषोः | जुषाम् |
| सप्तमी | जुषि | जुषोः | जुट्सु |
| सम्बोधन | हे जुट् / हे जुड् | हे जुषौ | हे जुषः |
३१. षकारान्त पुल्लिंग - तुष् शब्द रूप
(👉 सन्तुष्ट रहने वाला मुनि)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | तूट् / तूड् | तुषौ | तुषः |
| द्वितीया | तुषम् | तुषौ | तुषः |
| तृतीया | तुषा | तूड्भ्याम् | तूड्भिः |
| चतुर्थी | तुषे | तूड्भ्याम् | तूड्भ्यः |
| पञ्चमी | तुषः | तूड्भ्याम् | तूड्भ्यः |
| षष्ठी | तुषः | तुषोः | तुषाम् |
| सप्तमी | तुषि | तुषोः | तूट्सु |
| सम्बोधन | हे तूट् / हे तूड् | हे तुषौ | हे तुषः |
३२. षकारान्त स्त्रीलिंग - रुष् शब्द रूप
(👉 क्रोध / अमर्ष)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | रुट् / रुड् | रुषौ | रुषः |
| द्वितीया | रुषम् | रुषौ | रुषः |
| तृतीया | रुषा | रुड्भ्याम् | रुड्भिः |
| चतुर्थी | रुषे | रुड्भ्याम् | रुड्भ्यः |
| पञ्चमी | रुषः | रुड्भ्याम् | रुड्भ्यः |
| षष्ठी | रुषः | रुषोः | रुषाम् |
| सप्तमी | रुषि | रुषोः | रूट्सु |
| सम्बोधन | हे रुट् / हे रुड् | हे रुषौ | हे रुषः |
३३. षकारान्त पुल्लिंग - श्लिष् शब्द रूप
(👉 आलिंगन करने वाला)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | श्लिट् / श्लिड् | श्लिषौ | श्लिषः |
| द्वितीया | श्लिषम् | श्लिषौ | श्लिषः |
| तृतीया | श्लिषा | श्लिड्भ्याम् | श्लिड्भिः |
| चतुर्थी | श्लिषे | श्लिड्भ्याम् | श्लिड्भ्यः |
| पञ्चमी | श्लिषः | श्लिड्भ्याम् | श्लिड्भ्यः |
| षष्ठी | श्लिषः | श्लिषोः | श्लिषाम् |
| सप्तमी | श्लिषि | श्लिषोः | श्लिट्सु |
| सम्बोधन | हे श्लिट् / हे श्लिड् | हे श्लिषौ | हे श्लिषः |
३४. षकारान्त पुल्लिंग - पिष् शब्द रूप
(👉 चूर्ण करने वाला / पीसने वाला)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | पिट् / पिड् | पिषौ | पिषः |
| द्वितीया | पिषम् | पिषौ | पिषः |
| तृतीया | पिषा | पिड्भ्याम् | पिड्भिः |
| चतुर्थी | पिषे | पिड्भ्याम् | पिड्भ्यः |
| पञ्चमी | पिषः | पिड्भ्याम् | पिड्भ्यः |
| षष्ठी | पिषः | पिषोः | पिषाम् |
| सप्तमी | पिषि | पिषोः | पिट्सु |
| सम्बोधन | हे पिट् / हे पिड् | हे पिषौ | हे पिषः |
३५. षकारान्त पुल्लिंग - हविर्जुष् शब्द रूप
(👉 हवि का सेवन करने वाले देवता)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | हविर्जुट् / हविर्जुड् | हविर्जुषौ | हविर्जुषः |
| द्वितीया | हविर्जुषम् | हविर्जुषौ | हविर्जुषः |
| तृतीया | हविर्जुषा | हविर्जुड्भ्याम् | हविर्जुड्भिः |
| चतुर्थी | हविर्जुषे | हविर्जुड्भ्याम् | हविर्जुड्भ्यः |
| पञ्चमी | हविर्जुषः | हविर्जुड्भ्याम् | हविर्जुड्भ्यः |
| षष्ठी | हविर्जुषः | हविर्जुषोः | हविर्जुषाम् |
| सप्तमी | हविर्जुषि | हविर्जुषोः | हविर्जुट्सु |
| सम्बोधन | हे हविर्जुट् / हे हविर्जुड् | हे हविर्जुषौ | हे हविर्जुषः |
३६. सकारान्त पुल्लिंग - चन्द्रमस् शब्द रूप
(👉 चन्द्रमा - १व. में 'चन्द्रमाः', हलादि में 'चन्द्रमोभ्याम्')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | चन्द्रमाः | चन्द्रमसौ | चन्द्रमसः |
| द्वितीया | चन्द्रमसम् | चन्द्रमसौ | चन्द्रमसः |
| तृतीया | चन्द्रमसा | चन्द्रमोभ्याम् | चन्द्रमोभिः |
| चतुर्थी | चन्द्रमसे | चन्द्रमोभ्याम् | चन्द्रमोभ्यः |
| पञ्चमी | चन्द्रमसः | चन्द्रमोभ्याम् | चन्द्रमोभ्यः |
| षष्ठी | चन्द्रमसः | चन्द्रमसोः | चन्द्रमसाम् |
| सप्तमी | चन्द्रमसि | चन्द्रमसोः | चन्द्रमःसु / चन्द्रमस्सु |
| सम्बोधन | हे चन्द्रमः | हे चन्द्रमसौ | हे चन्द्रमसः |
३७. सकारान्त पुल्लिंग - वेधस् शब्द रूप
(👉 विधाता / ब्रह्मा - १व. में 'वेधाः')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | वेधाः | वेधसौ | वेधसः |
| द्वितीया | वेधसम् | वेधसौ | वेधसः |
| तृतीया | वेधसा | वेधोभ्याम् | वेधोभिः |
| चतुर्थी | वेधसे | वेधोभ्याम् | वेधोभ्यः |
| पञ्चमी | वेधसः | वेधोभ्याम् | वेधोभ्यः |
| षष्ठी | वेधसः | वेधसोः | वेधसाम् |
| सप्तमी | वेधसि | वेधसोः | वेधःसु / वेधस्सु |
| सम्बोधन | हे वेधः | हे वेधसौ | हे वेधसः |
३८. सकारान्त पुल्लिंग - विद्वस् शब्द रूप
(👉 पण्डित - 'वसोः सम्प्रसारणम्' से 'विदुषः', हलादि में 'विद्वद्')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | विद्वान् | विद्वांसौ | विद्वांसः |
| द्वितीया | विद्वांसम् | विद्वांसौ | विदुषः |
| तृतीया | विदुषा | विद्वद्भ्याम् | विद्वद्भिः |
| चतुर्थी | विदुषे | विद्वद्भ्याम् | विद्वद्भ्यः |
| पञ्चमी | विदुषः | विद्वद्भ्याम् | विद्वद्भ्यः |
| षष्ठी | विदुषः | विदुषोः | विदुषाम् |
| सप्तमी | विदुषि | विदुषोः | विद्वत्सु |
| सम्बोधन | हे विद्वन् | हे विद्वांसौ | हे विद्वांसः |
३९. सकारान्त पुल्लिंग - पुंस् शब्द रूप
(👉 पुरुष / नर - १व. 'पुमान्', हलादि में 'पुम्')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | पुमान् | पुमांसौ | पुमांसः |
| द्वितीया | पुमांसम् | पुमांसौ | पुंसः |
| तृतीया | पुंसा | पुम्भ्याम् | पुम्भिः |
| चतुर्थी | पुंसे | पुम्भ्याम् | पुम्भ्यः |
| पञ्चमी | पुंसः | पुम्भ्याम् | पुम्भ्यः |
| षष्ठी | पुंसः | पुंसोः | पुंसाम् |
| सप्तमी | पुंसि | पुंसोः | पुंसु |
| सम्बोधन | हे पुमन् | हे पुमांसौ | हे पुमांसः |
४०. सकारान्त पुल्लिंग - उशनस् शब्द रूप
(👉 शुक्राचार्य - १व. 'उशना', सम्बोधन 'हे उशनन्/उशन')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | उशना | उशनसौ | उशनसः |
| द्वितीया | उशनसम् | उशनसौ | उशनसः |
| तृतीया | उशनसा | उशनोभ्याम् | उशनोभिः |
| चतुर्थी | उशनसे | उशनोभ्याम् | उशनोभ्यः |
| पञ्चमी | उशनसः | उशनोभ्याम् | उशनोभ्यः |
| षष्ठी | उशनसः | उशनसोः | उशनसाम् |
| सप्तमी | उशनसि | उशनसोः | उशनःसु |
| सम्बोधन | हे उशनन् / हे उशन | हे उशनसौ | हे उशनसः |
४१. सकारान्त पुल्लिंग - सुवचस् शब्द रूप
(👉 मधुर वचन बोलने वाला पुरुष)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | सुवचाः | सुवचसौ | सुवचसः |
| द्वितीया | सुवचसम् | सुवचसौ | सुवचसः |
| तृतीया | सुवचसा | सुवचोभ्याम् | सुवचोभिः |
| चतुर्थी | सुवचसे | सुवचोभ्याम् | सुवचोभ्यः |
| पञ्चमी | सुवचसः | सुवचोभ्याम् | सुवचोभ्यः |
| षष्ठी | सुवचसः | सुवचसोः | सुवचसाम् |
| सप्तमी | सुवचसि | सुवचसोः | सुवचःसु |
| सम्बोधन | हे सुवचः | हे सुवचसौ | हे सुवचसः |
४२. सकारान्त पुल्लिंग - दीर्घायुस् शब्द रूप
(👉 लम्बी आयु वाला पुरुष - उसन्त पुल्लिंग)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | दीर्घायुः | दीर्घायुषौ | दीर्घायुषः |
| द्वितीया | दीर्घायुषम् | दीर्घायुषौ | दीर्घायुषः |
| तृतीया | दीर्घायुषा | दीर्घायुर्भ्याम् | दीर्घायुर्भिः |
| चतुर्थी | दीर्घायुषे | दीर्घायुर्भ्याम् | दीर्घायुर्भ्यः |
| पञ्चमी | दीर्घायुषः | दीर्घायुर्भ्याम् | दीर्घायुर्भ्यः |
| षष्ठी | दीर्घायुषः | दीर्घायुषोः | दीर्घायुषाम् |
| सप्तमी | दीर्घायुषि | दीर्घायुषोः | दीर्घायुःषु |
| सम्बोधन | हे दीर्घायुः | हे दीर्घायुषौ | हे दीर्घायुषः |
४३. सकारान्त पुल्लिंग - सुमनस् शब्द रूप
(👉 प्रसन्नचित्त पुरुष / देव)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | सुमनाः | सुमनसौ | सुमनसः |
| द्वितीया | सुमनसम् | सुमनसौ | सुमनसः |
| तृतीया | सुमनसा | सुमनोभ्याम् | सुमनोभिः |
| चतुर्थी | सुमनसे | सुमनोभ्याम् | सुमनोभ्यः |
| पञ्चमी | सुमनसः | सुमनोभ्याम् | सुमनोभ्यः |
| षष्ठी | सुमनसः | सुमनसोः | सुमनसाम् |
| सप्तमी | सुमनसि | सुमनसोः | सुमनःसु |
| सम्बोधन | हे सुमनः | हे सुमनसौ | हे सुमनसः |
४४. सकारान्त पुल्लिंग - दुर्मनस् शब्द रूप
(👉 खिन्न / दुखी मन वाला व्यक्ति)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | दुर्मनाः | दुर्मनसौ | दुर्मनसः |
| द्वितीया | दुर्मनसम् | दुर्मनसौ | दुर्मनसः |
| तृतीया | दुर्मनसा | दुर्मनोभ्याम् | दुर्मनोभिः |
| चतुर्थी | दुर्मनसे | दुर्मनोभ्याम् | दुर्मनोभ्यः |
| पञ्चमी | दुर्मनसः | दुर्मनोभ्याम् | दुर्मनोभ्यः |
| षष्ठी | दुर्मनसः | दुर्मनसोः | दुर्मनसाम् |
| सप्तमी | दुर्मनसि | दुर्मनसोः | दुर्मनःसु |
| सम्बोधन | हे दुर्मनः | हे दुर्मनसौ | हे दुर्मनसः |
४५. सकारान्त नपुंसकलिंग - मनस् शब्द रूप
(👉 अन्तःकरण / चित्त - मुख्य सकारान्त नपुंसक)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | मनः | मनसी | मनांसि |
| द्वितीया | मनः | मनसी | मनांसि |
| तृतीया | मनसा | मनोभ्याम् | मनोभिः |
| चतुर्थी | मनसे | मनोभ्याम् | मनोभ्यः |
| पञ्चमी | मनसः | मनोभ्याम् | मनोभ्यः |
| षष्ठी | मनसः | मनसोः | मनसाम् |
| सप्तमी | मनसि | मनसोः | मनःसु / मनस्सु |
| सम्बोधन | हे मनः | हे मनसी | हे मनांसि |
४६. सकारान्त नपुंसकलिंग - पयस् शब्द रूप
(👉 दुग्ध / जल - 'पयः, पयसी, पयांसि')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | पयः | पयसी | पयांसि |
| द्वितीया | पयः | पयसी | पयांसि |
| तृतीया | पयसा | पयोभ्याम् | पयोभिः |
| चतुर्थी | पयसे | पयोभ्याम् | पयोभ्यः |
| पञ्चमी | पयसः | पयोभ्याम् | पयोभ्यः |
| षष्ठी | पयसः | पयसोः | पयसाम् |
| सप्तमी | पयसि | पयसोः | पयःसु |
| सम्बोधन | हे पयः | हे पयसी | हे पयांसि |
४७. सकारान्त नपुंसकलिंग - यशस् शब्द रूप
(👉 कीर्ति / ख्याति)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | यशः | यशसी | यशांसि |
| द्वितीया | यशः | यशसी | यशांसि |
| तृतीया | यशसा | यशोभ्याम् | यशोभिः |
| चतुर्थी | यशसे | यशोभ्याम् | यशोभ्यः |
| पञ्चमी | यशसः | यशोभ्याम् | यशोभ्यः |
| षष्ठी | यशसः | यशसोः | यशसाम् |
| सप्तमी | यशसि | यशसोः | यशःसु |
| सम्बोधन | हे यशः | हे यशसी | हे यशांसि |
४८. सकारान्त नपुंसकलिंग - तेजस् शब्द रूप
(👉 कान्ति / पराक्रम / दीप्ति)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | तेजः | तेजसी | तेजांसि |
| द्वितीया | तेजः | तेजसी | तेजांसि |
| तृतीया | तेजसा | तेजोभ्याम् | तेजोभिः |
| चतुर्थी | तेजसे | तेजोभ्याम् | तेजोभ्यः |
| पञ्चमी | तेजसः | तेजोभ्याम् | तेजोभ्यः |
| षष्ठी | तेजसः | तेजसोः | तेजसाम् |
| सप्तमी | तेजसि | तेजसोः | तेजःसु |
| सम्बोधन | हे तेजः | हे तेजसी | हे तेजांसि |
४९. सकारान्त नपुंसकलिंग - तपस् शब्द रूप
(👉 तपस्या / साधना)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | तपः | तपसी | तपांसि |
| द्वितीया | तपः | तपसी | तपांसि |
| तृतीया | तपसा | तपोभ्याम् | तपोभिः |
| चतुर्थी | तपसे | तपोभ्याम् | तपोभ्यः |
| पञ्चमी | तपसः | तपोभ्याम् | तपोभ्यः |
| षष्ठी | तपसः | तपसोः | तपसाम् |
| सप्तमी | तपसि | तपसोः | तपःसु |
| सम्बोधन | हे तपः | हे तपसी | हे तपांसि |
५०. सकारान्त नपुंसकलिंग - चेतस् शब्द रूप
(👉 चेतना / चित्त)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | चेतः | चेतसी | चेतांसि |
| द्वितीया | चेतः | चेतसी | चेतांसि |
| तृतीया | चेतसा | चेतोभ्याम् | चेतोभिः |
| चतुर्थी | चेतसे | चेतोभ्याम् | चेतोभ्यः |
| पञ्चमी | चेतसः | चेतोभ्याम् | चेतोभ्यः |
| षष्ठी | चेतसः | चेतसोः | चेतसाम् |
| सप्तमी | चेतसि | चेतसोः | चेतःसु |
| सम्बोधन | हे चेतः | हे चेतसी | हे चेतांसि |
५१. सकारान्त (उसन्त) नपुंसकलिंग - चक्षुस् शब्द रूप
(👉 नेत्र / आँख - 'चक्षूंषि', हलादि में 'चक्षुर्')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | चक्षुः | चक्षुषी | चक्षूंषि |
| द्वितीया | चक्षुः | चक्षुषी | चक्षूंषि |
| तृतीया | चक्षुषा | चक्षुर्भ्याम् | चक्षुर्भिः |
| चतुर्थी | चक्षुषे | चक्षुर्भ्याम् | चक्षुर्भ्यः |
| पञ्चमी | चक्षुषः | चक्षुर्भ्याम् | चक्षुर्भ्यः |
| षष्ठी | चक्षुषः | चक्षुषोः | चक्षुषाम् |
| सप्तमी | चक्षुषि | चक्षुषोः | चक्षुःषु |
| सम्बोधन | हे चक्षुः | हे चक्षुषी | हे चक्षूंषि |
५२. सकारान्त (उसन्त) नपुंसकलिंग - धनुस् शब्द रूप
(👉 धनुष / कोदण्ड - 'धनूंषि')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | धनुः | धनुषी | धनूंषि |
| द्वितीया | धनुः | धनुषी | धनूंषि |
| तृतीया | धनुषा | धनुर्भ्याम् | धनुर्भिः |
| चतुर्थी | धनुषे | धनुर्भ्याम् | धनुर्भ्यः |
| पञ्चमी | धनुषः | धनुर्भ्याम् | धनुर्भ्यः |
| षष्ठी | धनुषः | धनुषोः | धनुषाम् |
| सप्तमी | धनुषि | धनुषोः | धनुःषु |
| सम्बोधन | हे धनुः | हे धनुषी | हे धनूंषि |
५३. सकारान्त (इसन्त) नपुंसकलिंग - हविस् शब्द रूप
(👉 यज्ञीय आहुति - 'हवींषि', हलादि में 'हविर्')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | हविः | हविषी | हवींषि |
| द्वितीया | हविः | हविषी | हवींषि |
| तृतीया | हविषा | हविर्भ्याम् | हविर्भिः |
| चतुर्थी | हविषे | हविर्भ्याम् | हविर्भ्यः |
| पञ्चमी | हविषः | हविर्भ्याम् | हविर्भ्यः |
| षष्ठी | हविषः | हविषोः | हविषाम् |
| सप्तमी | हविषी (हविषि) | हविषोः | हविःषु |
| सम्बोधन | हे हविः | हे हविषी | हे हवींषि |
५४. सकारान्त (इसन्त) नपुंसकलिंग - सर्पिस् शब्द रूप
(👉 घी / घृत - 'सर्पींषि')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | सर्पिः | सर्पिषी | सर्पींषि |
| द्वितीया | सर्पिः | सर्पिषी | सर्पींषि |
| तृतीया | सर्पिषा | सर्पिर्भ्याम् | सर्पिर्भिः |
| चतुर्थी | सर्पिषे | सर्पिर्भ्याम् | सर्पिर्भ्यः |
| पञ्चमी | सर्पिषः | सर्पिर्भ्याम् | सर्पिर्भ्यः |
| षष्ठी | सर्पिषः | सर्पिषोः | सर्पिषाम् |
| सप्तमी | सर्पिषि | सर्पिषोः | सर्पिःषु |
| सम्बोधन | हे सर्पिः | हे सर्पिषी | हे सर्पींषि |
५५. सकारान्त नपुंसकलिंग - अयस् शब्द रूप
(👉 लोहा / धातु)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | अयः | अयसी | अयांसि |
| द्वितीया | अयः | अयसी | अयांसि |
| तृतीया | अयसा | अयोभ्याम् | अयोभिः |
| चतुर्थी | अयसे | अयोभ्याम् | अयोभ्यः |
| पञ्चमी | अयसः | अयोभ्याम् | अयोभ्यः |
| षष्ठी | अयसः | अयसोः | अयसाम् |
| सप्तमी | अयसि | अयसोः | अयःसु |
| सम्बोधन | हे अयः | हे अयसी | हे अयांसि |
५६. सकारान्त नपुंसकलिंग - वासस् शब्द रूप
(👉 वस्त्र / परिधान - 'वासांसि')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | वासः | वाससी | वासांसि |
| द्वितीया | वासः | वाससी | वासांसि |
| तृतीया | वाससा | वासोभ्याम् | वासोभिः |
| चतुर्थी | वाससे | वासोभ्याम् | वासोभ्यः |
| पञ्चमी | वाससः | वासोभ्याम् | वासोभ्यः |
| षष्ठी | वाससः | वाससोः | वाससाम् |
| सप्तमी | वाससि | वाससोः | वासःसु |
| सम्बोधन | हे वासः | हे वाससी | हे वासांसि |
५७. सकारान्त नपुंसकलिंग - वयस् शब्द रूप
(👉 आयु / उम्र / यौवन)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | वयः | वयसी | वयांसि |
| द्वितीया | वयः | वयसी | वयांसि |
| तृतीया | वयसा | वयोभ्याम् | वयोभिः |
| चतुर्थी | वयसे | वयोभ्याम् | वयोभ्यः |
| पञ्चमी | वयसः | वयोभ्याम् | वयोभ्यः |
| षष्ठी | वयसः | वयसोः | वयसाम् |
| सप्तमी | वयसि | वयसोः | वयःसु |
| सम्बोधन | हे वयः | हे वयसी | हे वयांसि |
५८. सकारान्त नपुंसकलिंग - ओजस् शब्द रूप
(👉 बल / प्राणशक्ति / आभा)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | ओजः | ओजसी | ओजांसि |
| द्वितीया | ओजः | ओजसी | ओजांसि |
| तृतीया | ओजसा | ओजोभ्याम् | ओजोभिः |
| चतुर्थी | ओजसे | ओजोभ्याम् | ओजोभ्यः |
| पञ्चमी | ओजसः | ओजोभ्याम् | ओजोभ्यः |
| षष्ठी | ओजसः | ओजसोः | ओजसाम् |
| सप्तमी | ओजसि | ओजसोः | ओजःसु |
| सम्बोधन | हे ओजः | हे ओजसी | हे ओजांसि |
५९. सकारान्त नपुंसकलिंग - तमस् शब्द रूप
(👉 अन्धकार / अज्ञान)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | तमः | तमसी | तमांसि |
| द्वितीया | तमः | तमसी | तमांसि |
| तृतीया | तमसा | तमोभ्याम् | तमोभिः |
| चतुर्थी | तमसे | तमोभ्याम् | तमोभ्यः |
| पञ्चमी | तमसः | तमोभ्याम् | तमोभ्यः |
| षष्ठी | तमसः | तमसोः | तमसाम् |
| सप्तमी | तमसि | तमसोः | तमःसु |
| सम्बोधन | हे तमः | हे तमसी | हे तमांसि |
६०. सकारान्त नपुंसकलिंग - नभस् शब्द रूप
(👉 आकाश / मेघमण्डल)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | नभः | नभसी | नभांसि |
| द्वितीया | नभः | नभसी | नभांसि |
| तृतीया | नभसा | नभोभ्याम् | नभोभिः |
| चतुर्थी | नभसे | नभोभ्याम् | नभोभ्यः |
| पञ्चमी | नभसः | नभोभ्याम् | नभोभ्यः |
| षष्ठी | नभसः | नभसोः | नभासाम् |
| सप्तमी | नभसि | नभसोः | नभःसु |
| सम्बोधन | हे नभः | हे नभसी | हे नभांसि |
६१. सकारान्त नपुंसकलिंग - शिरस् शब्द रूप
(👉 मस्तक / सिर - 'शिरांसि')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | शिरः | शिरसी | शिरांसि |
| द्वितीया | शिरः | शिरसी | शिरांसि |
| तृतीया | शिरसा | शिरोभ्याम् | शिरोभिः |
| चतुर्थी | शिरसे | शिरोभ्याम् | शिरोभ्यः |
| पञ्चमी | शिरसः | शिरोभ्याम् | शिरोभ्यः |
| षष्ठी | शिरसः | शिरसोः | शिरसाम् |
| सप्तमी | शिरसि | शिरसोः | शिरःसु |
| सम्बोधन | हे शिरः | हे शिरसी | हे शिरांसि |
६२. सकारान्त (इसन्त) नपुंसकलिंग - ज्योतिस् शब्द रूप
(👉 प्रकाश / नक्षत्र - 'ज्योतींषि')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | ज्योतिः | ज्योतिषी | ज्योतींषि |
| द्वितीया | ज्योतिः | ज्योतिषी | ज्योतींषि |
| तृतीया | ज्योतिषा | ज्योतिर्भ्याम् | ज्योतिर्भिः |
| चतुर्थी | ज्योतिषे | ज्योतिर्भ्याम् | ज्योतिर्भ्यः |
| पञ्चमी | ज्योतिषः | ज्योतिर्भ्याम् | ज्योतिर्भ्यः |
| षष्ठी | ज्योतिषः | ज्योतिषोः | ज्योतिषाम् |
| सप्तमी | ज्योतिषि | ज्योतिषोः | ज्योतिःषु |
| सम्बोधन | हे ज्योतिः | हे ज्योतिषी | हे ज्योतींषि |
६३. हकारान्त पुल्लिंग - मधुलिह् शब्द रूप
(👉 भौंरा / मधु चाटने वाला - 'हो ढः' से 'मधुलिट्/मधुलिड्')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | मधुलिट् / मधुलिड् | मधुलिहौ | मधुलिहः |
| द्वितीया | मधुलिहम् | मधुलिहौ | मधुलिहः |
| तृतीया | मधुलिहा | मधुलिड्भ्याम् | मधुलिड्भिः |
| चतुर्थी | मधुलिहे | मधुलिड्भ्याम् | मधुलिड्भ्यः |
| पञ्चमी | मधुलिहः | मधुलिड्भ्याम् | मधुलिड्भ्यः |
| षष्ठी | मधुलिहः | मधुलिहोः | मधुलिहाम् |
| सप्तमी | मधुलिहि | मधुलिहोः | मधुलिट्सु |
| सम्बोधन | हे मधुलिट् / हे मधुलिड् | हे मधुलिहौ | हे मधुलिहः |
६४. हकारान्त पुं./स्त्री. - कामदुह् शब्द रूप
(👉 कामधेनु - 'दादेर्धातोर्घः' + भष्-भाव से 'कामधुक्/कामधुग्')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | कामधुक् / कामधुग् | कामदुहौ | कामदुहः |
| द्वितीया | कामदुहम् | कामदुहौ | कामदुहः |
| तृतीया | कामदुहा | कामधुग्भ्याम् | कामधुग्भिः |
| चतुर्थी | कामदुहे | कामधुग्भ्याम् | कामधुग्भ्यः |
| पञ्चमी | कामदुहः | कामधुग्भ्याम् | कामधुग्भ्यः |
| षष्ठी | कामदुहः | कामदुहोः | कामदुहाम् |
| सप्तमी | कामदुहि | कामदुहोः | कामधुक्षु |
| सम्बोधन | हे कामधुक् / हे कामधुग् | हे कामदुहौ | हे कामदुहः |
६५. हकारान्त पुल्लिंग - मित्रद्रुह् शब्द रूप
(👉 मित्र से द्रोह करने वाला - 'मित्रध्रुक्' अथवा 'मित्रध्रुट्')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | मित्रध्रुक् / मित्रध्रुग् (मित्रध्रुट्) | मित्रद्रुहौ | मित्रद्रुहः |
| द्वितीया | मित्रद्रुहम् | मित्रद्रुहौ | मित्रद्रुहः |
| तृतीया | मित्रद्रुहा | मित्रध्रुग्भ्याम् (मित्रध्रुड्भ्याम्) | मित्रध्रुग्भिः |
| चतुर्थी | मित्रद्रुहे | मित्रध्रुग्भ्याम् | मित्रध्रुग्भ्यः |
| पञ्चमी | मित्रद्रुहः | मित्रध्रुग्भ्याम् | मित्रध्रुग्भ्यः |
| षष्ठी | मित्रद्रुहः | मित्रद्रुहोः | मित्रद्रुहाम् |
| सप्तमी | मित्रद्रुहि | मित्रद्रुहोः | मित्रध्रुक्षु (मित्रध्रुट्सु) |
| सम्बोधन | हे मित्रध्रुक् / हे मित्रध्रुट् | हे मित्रद्रुहौ | हे मित्रद्रुहः |
६६. हकारान्त पुल्लिंग - अनडुह् शब्द रूप
(👉 बैल - १व. 'अनड्वान्', हलादि में 'अनडुद्भ्याम्')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | अनड्वान् | अनड्वाहौ | अनड्वाहः |
| द्वितीया | अनड्वाहम् | अनड्वाहौ | अनडुहः |
| तृतीया | अनडुहा | अनडुद्भ्याम् | अनडुद्भिः |
| चतुर्थी | अनडुहे | अनडुद्भ्याम् | अनडुद्भ्यः |
| पञ्चमी | अनडुहः | अनडुद्भ्याम् | अनडुद्भ्यः |
| षष्ठी | अनडुहः | अनडुहोः | अनडुहाम् |
| सप्तमी | अनडुहि | अनडुहोः | अनडुत्सु |
| सम्बोधन | हे अनड्वन् | हे अनड्वाहौ | हे अनड्वाहः |
६७. हकारान्त स्त्रीलिंग - उपानह् शब्द रूप
(👉 जूता / पादुका - 'नहिवृति...' से 'उपानत्/उपानद्')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | उपानत् / उपानद् | उपानहौ | उपानहः |
| द्वितीया | उपानहम् | उपानहौ | उपानहः |
| तृतीया | उपानहा | उपानद्भ्याम् | उपानद्भिः |
| चतुर्थी | उपानहे | उपानद्भ्याम् | उपानद्भ्यः |
| पञ्चमी | उपानहः | उपानद्भ्याम् | उपानद्भ्यः |
| षष्ठी | उपानहः | उपानहोः | उपानहाम् |
| सप्तमी | उपानहि | उपानहोः | उपानत्सु |
| सम्बोधन | हे उपानत् / हे उपानद् | हे उपानहौ | हे उपानहः |
६८. हकारान्त स्त्रीलिंग - उष्णिह् शब्द रूप
(👉 वैदिक उष्णिग् छन्द - 'उष्णिक्/उष्णिग्')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | उष्णिक् / उष्णिग् | उष्णिहौ | उष्णिहः |
| द्वितीया | उष्णिहम् | उष्णिहौ | उष्णिहः |
| तृतीया | उष्णिहा | उष्णिग्भ्याम् | उष्णिग्भिः |
| चतुर्थी | उष्णिहे | उष्णिग्भ्याम् | उष्णिग्भ्यः |
| पञ्चमी | उष्णिहः | उष्णिग्भ्याम् | उष्णिग्भ्यः |
| षष्ठी | उष्णिहः | उष्णिहोः | उष्णिहाम् |
| सप्तमी | उष्णिहि | उष्णिहोः | उष्णिक्षु |
| सम्बोधन | हे उष्णिक् / हे उष्णिग् | हे उष्णिहौ | हे उष्णिहः |
६९. हकारान्त पुल्लिंग - गोदुह् शब्द रूप
(👉 गाय दुहने वाला ग्वाला - 'गोधुक्/गोधुग्')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | गोधुक् / गोधुग् | गोदुहौ | गोदुहः |
| द्वितीया | गोदुहम् | गोदुहौ | गोदुहः |
| तृतीया | गोदुहा | गोधुग्भ्याम् | गोधुग्भिः |
| चतुर्थी | गोदुहे | गोधुग्भ्याम् | गोधुग्भ्यः |
| पञ्चमी | गोदुहः | गोधुग्भ्याम् | गोधुग्भ्यः |
| षष्ठी | गोदुहः | गोदुहोः | गोदुहाम् |
| सप्तमी | गोदुहि | गोदुहोः | गोधुक्षु |
| सम्बोधन | हे गोधुक् / हे गोधुग् | हे गोदुहौ | हे गोदुहः |
७०. हकारान्त पुल्लिंग - विश्ववाह् शब्द रूप
(👉 संसार का भार उठाने वाला - 'वाह ऊठ्' से 'विश्वौहः')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | विश्ववाट् / विश्ववाड् | विश्ववाहौ | विश्ववाहः |
| द्वितीया | विश्ववाहम् | विश्ववाहौ | विश्वौहः |
| तृतीया | विश्वौहा | विश्ववाड्भ्याम् | विश्ववाड्भिः |
| चतुर्थी | विश्वौहे | विश्ववाड्भ्याम् | विश्ववाड्भ्यः |
| पञ्चमी | विश्वौहः | विश्ववाड्भ्याम् | विश्ववाड्भ्यः |
| षष्ठी | विश्वौहः | विश्वौहोः | विश्वौहाम् |
| सप्तमी | विश्वौहि | विश्वौहोः | विश्ववाट्सु |
| सम्बोधन | हे विश्ववाट् / हे विश्ववाड् | हे विश्ववाहौ | हे विश्ववाहः |
७१. हकारान्त पुल्लिंग - श्वेतवाह् शब्द रूप
(👉 इन्द्र / श्वेत अश्वों वाले - 'श्वेतौहः')| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | श्वेतवाट् / श्वेतवाड् | श्वेतवाहौ | श्वेतवाहः |
| द्वितीया | श्वेतवाहम् | श्वेतवाहौ | श्वेतौहः |
| तृतीया | श्वेतौहा | श्वेतवाड्भ्याम् | श्वेतवाड्भिः |
| चतुर्थी | श्वेतौहे | श्वेतवाड्भ्याम् | श्वेतवाड्भ्यः |
| पञ्चमी | श्वेतौहः | श्वेतवाड्भ्याम् | श्वेतवाड्भ्यः |
| षष्ठी | श्वेतौहः | श्वेतौहोः | श्वेतौहाम् |
| सप्तमी | श्वेतौहि | श्वेतौहोः | श्वेतवाट्सु |
| सम्बोधन | हे श्वेतवाट् / हे श्वेतवाड् | हे श्वेतवाहौ | हे श्वेतवाहः |
७२. हकारान्त पुल्लिंग - पादलिह् शब्द रूप
(👉 चरण चाटने वाला सेवक/श्वान)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | पादलिट् / पादलिड् | पादलिहौ | पादलिहः |
| द्वितीया | पादलिहम् | पादलिहौ | पादलिहः |
| तृतीया | पादलिहा | पादलिड्भ्याम् | पादलिड्भिः |
| चतुर्थी | पादलिहे | पादलिड्भ्याम् | पादलिड्भ्यः |
| पञ्चमी | पादलिहः | पादलिड्भ्याम् | पादलिड्भ्यः |
| षष्ठी | पादलिहः | पादलिहोः | पादलिहाम् |
| सप्तमी | पादलिहि | पादलिहोः | पादलिट्सु |
| सम्बोधन | हे पादलिट् / हे पादलिड् | हे पादलिहौ | हे पादलिहः |
७३. हकारान्त पुल्लिंग - गुरुद्रुह् शब्द रूप
(👉 गुरु से द्रोह करने वाला)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | गुरुध्रुक् / गुरुध्रुग् | गुरुद्रुहौ | गुरुद्रुहः |
| द्वितीया | गुरुद्रुहम् | गुरुद्रुहौ | गुरुद्रुहः |
| तृतीया | गुरुद्रुहा | गुरुध्रुग्भ्याम् | गुरुध्रुग्भिः |
| चतुर्थी | गुरुद्रुहे | गुरुध्रुग्भ्याम् | गुरुध्रुग्भ्यः |
| पञ्चमी | गुरुद्रुहः | गुरुध्रुग्भ्याम् | गुरुध्रुग्भ्यः |
| षष्ठी | गुरुद्रुहः | गुरुद्रुहोः | गुरुद्रुहाम् |
| सप्तमी | गुरुद्रुहि | गुरुद्रुहोः | गुरुध्रुक्षु |
| सम्बोधन | हे गुरुध्रुक् / हे गुरुध्रुग् | हे गुरुद्रुहौ | हे गुरुद्रुहः |
७४. हकारान्त पुल्लिंग - पुरोदिह् शब्द रूप
(👉 आगे लेप करने वाला / पूरक)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | पुरोधिक् / पुरोधिग् | पुरोदिहौ | पुरोदिहः |
| द्वितीया | पुरोदिहम् | पुरोदिहौ | पुरोदिहः |
| तृतीया | पुरोदिहा | पुरोधिग्भ्याम् | पुरोधिग्भिः |
| चतुर्थी | पुरोदिहे | पुरोधिग्भ्याम् | पुरोधिग्भ्यः |
| पञ्चमी | पुरोदिहः | पुरोधिग्भ्याम् | पुरोधिग्भ्यः |
| षष्ठी | पुरोदिहः | पुरोदिहोः | पुरोदिहाम् |
| सप्तमी | पुरोदिहि | पुरोदिहोः | पुरोधिक्षु |
| सम्बोधन | हे पुरोधिक् / हे पुरोधिग् | हे पुरोदिहौ | हे पुरोदिहः |
७५. हकारान्त पुल्लिंग - चित्रलिह् शब्द रूप
(👉 विचित्र आस्वादन करने वाला पक्षी/जीव)| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | चित्रलिट् / चित्रलिड् | चित्रलिहौ | चित्रलिहः |
| द्वितीया | चित्रलिहम् | चित्रलिहौ | चित्रलिहः |
| तृतीया | चित्रलिहा | चित्रलिड्भ्याम् | चित्रलिड्भिः |
| चतुर्थी | चित्रलिहे | चित्रलिड्भ्याम् | चित्रलिड्भ्यः |
| पञ्चमी | चित्रलिहः | चित्रलिड्भ्याम् | चित्रलिड्भ्यः |
| षष्ठी | चित्रलिहः | चित्रलिहोः | चित्रलिहाम् |
| सप्तमी | चित्रलिहि | चित्रलिहोः | चित्रलिट्सु |
| सम्बोधन | हे चित्रलिट् / हे चित्रलिड् | हे चित्रलिहौ | हे चित्रलिहः |
