अपरिहार्य महाभारत (प्रतिशोध-11)- संक्षेपीकरण/विशदीकरण (भाव-पल्लवन) एवं सारांश

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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प्रस्तुत लेख में डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय द्वारा संपादित पुस्तक 'प्रतिशोध' के ग्यारहवें अध्याय 'अपरिहार्य महाभारत' का सांगोपांग विश्लेषण है। इसमें भीष्म के व्यक्तित्व की सीमाओं, श्रीकृष्ण के शांति प्रयास और महाभारत युद्ध की अपरिहार्यता का विस्तृत वर्णन चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल' द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

पुस्तक : प्रतिशोध
संपादक : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय
पाठ क्रम एवं नाम : 11-अपरिहार्य महाभारत
मूल विषय : भीष्म का मौन, श्रीकृष्ण की विफलता और युद्ध की निश्चितता।
संक्षेपीकरण/विशदीकरण : चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'

१. मूल पाठ

भीष्म का व्यक्तित्व महान था। वे परम भागवत और महान योद्धा थे। राजनीति, धर्मनीति के वे प्रबल पक्षधर थे। चारो वेदों एवं षट् दर्शन के ज्ञाता थे। उनका चरित पावन था। अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करके वे उर्ध्व रेतस् बन चुके थे। सर्वस्व होते हुए भीष्म महामानव थे। भगवान श्रीकृष्ण से वे तनिक भी न्यून महिमा वाले नहीं थे। श्री कृष्ण उन्हें पितामह कहकर सम्मान करते थे। भीष्म पितामह यदि समय पर निर्णय लेने की क्षमता-सम्पन्न होते तो सचमुच वे भगवान कहलाते। यहीं उनका व्यक्तित्व मार खा जाता है।

हस्तिनापुर सिंहासन की रक्षा करने का व्रत लेने का यह मतलब कदापि नहीं है कि राजा के गलत निर्णय को भी समर्थन देते रहना। अद्भुत सामर्थ्य एवं क्षमता रखने के बाद भी धृतराष्ट्र के पुत्र-मोह एवं शकुनि मामा की दुरभिसन्धि तथा दुर्योधन की हठशीलता को सहन करना उनके जैसे व्यक्तित्व के लिए उचित नहीं था। पाण्डवों के प्रति दुर्योधन का वैर भाव एवं धृतराष्ट्र की मौन सहमति से वे पूर्ण परिचित थे। एक बार भी वे धृतराष्ट्र को कड़े शब्दों में कह देते तो राजा का साहस कहाँ कि वह उनको अवहेलना करते। दुर्योधन यद्यपि महावीर था, किन्तु भीष्म के आगे उसका पुरुषार्थ बौना था। वे आसानी से उसे नियन्त्रित कर सकते थे। कर्ण के अनावश्यक उत्साह वे कारण दुर्योधन अप्रिय कर्म कर बैठता, जिसको स्वीकार करना कहाँ का न्याय था? घृत-क्रीड़ा का आयोजन भीष्म की प्रबल इच्छा पर रोका जा सकता था। इनके शील, शौर्य एवं अन्यान्य दैवी गुणों से प्रभावित कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, विदुर इनके अन्ध भक्त थे। इन सबका सम्बल पाकर दुर्योधन सत्ता के मद में चूर्ण रहता। इसका प्रतिकार न करना वह भीष्म की दुर्बलता समझता था। भरी सभा में द्रौपदी को घसीटता हुआ दु:शासन ला रहा है। इस अप्रिय घटना को देखकर भीष्म का न बोलना सहृदय को अखरता है। भीष्म यदि चाह लेते तो महाभारत टाला जा सकता था। किन्तु, यह सच है कि भवितव्यता अटल है।

श्रीकृष्ण, कौरव एव पाण्डवों के सम्बन्धी थे। वे हृदय से चाहते थे कि युद्ध टल जाय। युद्ध टालने के लिए ही दुर्योधन की सभा में दूत बनकर श्रीकृष्ण जाते हैं। दुर्योधन अपने सभासदों से कृष्ण का सम्मान न करने की मंत्रणा करता है। कर्ण से युधिष्ठिर का उपहास कराता है। इतना ही नहीं, भगवान श्रीकृष्ण को बन्दी बनाने का असफल प्रयास भी करता है। भीष्म का मौन यहाँ भी आलोच्य है। श्रीकृष्ण तुरन्त घोषणा करते हैं। एक क्षण भी नहीं लगाते-‘याचना नहीं अब रण होगा, संग्राम महाभीषण होगा।' युद्ध का बिगुल बज चुका। दोनों पक्षों ने मित्रों की सेनाओं को जुटाना शुरू किया। दोनों तरफ से क्रमशः ग्यारह और सात अक्षौहिणी सेना एकत्र हो गयी।

मद्रराज शल्य सहदेव के मामा थे। महाराज युधिष्ठिर के निमंत्रण पर इस महासमर में लड़ने आ रहे थे। दुर्योधन ने रास्ते में उनकी सुविधा का विशेष प्रबन्ध करके अपनी कूटनीति का परिचय दिया। महाराज शल्य ने समझा कि युधिष्ठिर ने मेरा बड़ा ध्यान रखा। उनकी कृतज्ञता ज्ञापित करने लगे। इसके बाद दुर्योधन के सेवकों ने बताया कि हम लोग तो आपकी सेवा में दुर्योधन द्वारा नियुक्त किये गये हैं। इस पर शल्य आश्चर्यचकित रह गये। मद्र नरेश का हृदय परिवर्तित हो गया। उन्होंने कहा कि यह जानते हुए कि मैं उनके विपक्ष में लड़ने जा रहा हूँ। इस पर भी मेरा इस प्रकार सम्मान करना तो दुर्योधन की सदाशयता है। यह प्रसंग चल ही रहा था कि स्वयं दर्योधन वहाँ उपस्थित होकर शल्य का अभिवादन करके बोला-मामा! हम और पाण्डव आपके लिए बराबर है। युद्ध तो क्षत्रियों का आभूषण है। न्याय और प्रेम परस्पर जा विरोधी हैं। ऐसे ही स्थान पर व्यक्ति का परीक्षण होता है। इस पर शल्य ने भारी मन से दुर्योधन के पक्ष में युद्ध करने का निश्चय किया।

२. कठिन शब्दार्थ

उर्ध्व रेतस् = अखंड ब्रह्मचारी/जितेंद्रिय, न्यून = कम, दुरभिसन्धि = षडयंत्र/बुरी नीयत से किया गया मेल, अवह्वेलना = तिरस्कार/उपेक्षा, घृत-क्रीड़ा = जुआ (जुआ खेलना), प्रतिकार = विरोध/बदला, भवितव्यता = होनी/नियति, मंत्रणा = सलाह-मशविरा, उपहास = मज़ाक उड़ाना, अक्षौहिणी = प्राचीन सेना की एक बड़ी इकाई, कृतज्ञता = आभार, सदाशयता = अच्छी नीयत, अभीप्सित = जिसकी इच्छा की गई हो, निर्णय-क्षमता = फैसला लेने की ताकत, अटल = जो टाला न जा सके।

३. सारांश

पाठ 'अपरिहार्य महाभारत' कुरुक्षेत्र के महायुद्ध की पूर्वपीठिका और उन कारणों का विश्लेषण करता है जिन्होंने इस युद्ध को टाले जाने के योग्य नहीं रहने दिया। लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने भीष्म पितामह के चरित्र को इस विनाश का एक महत्वपूर्ण पक्ष माना है। भीष्म एक महान योद्धा, विद्वान और ब्रह्मचारी थे, किंतु उनकी सबसे बड़ी दुर्बलता उनकी निर्णय लेने में देरी और गलत सत्ता के प्रति उनकी मूक निष्ठा थी। हस्तिनापुर के सिंहासन की रक्षा की प्रतिज्ञा ने उन्हें इतना बांध दिया था कि वे दुर्योधन के अधर्म और धृतराष्ट्र के पुत्र-मोह को देखते हुए भी चुप रहे। द्रौपदी के चीर-हरण जैसी जघन्य घटना पर भी उनका मौन रहना उनके व्यक्तित्व पर एक गहरा प्रश्नचिह्न लगाता है।

युद्ध को टालने का अंतिम प्रयास भगवान श्रीकृष्ण ने शांतिदूत बनकर किया। किंतु दुर्योधन ने न केवल पांडवों को पांच गाँव देने से मना किया, बल्कि श्रीकृष्ण को बंदी बनाने का दुस्साहस भी किया। इस अपमान ने युद्ध की घोषणा को अनिवार्य बना दिया। दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी सेनाएं जुटानी शुरू कर दीं। इसी क्रम में दुर्योधन ने अपनी कूटनीति से पांडवों के मामा मद्रराज शल्य को अपने पक्ष में कर लिया। शल्य, जो पांडवों की सहायता के लिए आ रहे थे, दुर्योधन के आतिथ्य के जाल में फंसकर विवशता में कौरवों की ओर से लड़ने को तैयार हो गए। यह पाठ स्पष्ट करता है कि जब महान लोग अधर्म के विरुद्ध खड़े होने का साहस खो देते हैं और सत्ता के मद में चूर लोग मर्यादाओं को लांघ जाते हैं, तो महाभारत जैसा विनाशकारी युद्ध अपरिहार्य हो जाता है। नियति और मानवीय भूलों का यह संगम ही इस महाकाव्य का मूल आधार है।

४. महत्वपूर्ण अंशों का संक्षेपीकरण

१. संक्षेपीकरण संकेत : "भीष्म का व्यक्तित्व महान था... यहीं उनका व्यक्तित्व मार खा जाता है।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'अपरिहार्य महाभारत' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : भीष्म पितामह के महान व्यक्तित्व और उनकी निर्णय लेने की अक्षमता का विश्लेषण।
संक्षेपीकरण : भीष्म एक महान विद्वान और ब्रह्मचारी योद्धा थे, जिनकी महिमा श्रीकृष्ण के समान थी। किंतु, महत्वपूर्ण अवसरों पर सही निर्णय न ले पाना उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विफलता थी, जिसने उन्हें ईश्वर की श्रेणी में पहुँचने से रोक दिया।

२. संक्षेपीकरण संकेत : "इस अप्रिय घटना को देखकर भीष्म का न बोलना सहृदय को अखरता है। भीष्म यदि चाह लेते तो महाभारत टाला जा सकता था। किन्तु, यह सच है कि भवितव्यता अटल है।"

संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय कृत 'प्रतिशोध' के ग्यारहवें अध्याय से।
प्रसंग : द्रौपदी अपमान के समय भीष्म के मौन और युद्ध की निश्चितता का वर्णन।
संक्षेपीकरण : भरी सभा में द्रौपदी के अपमान पर भीष्म की चुप्पी अत्यंत दुखद थी। भीष्म अपनी शक्ति से युद्ध रोक सकते थे, किंतु नियति के खेल और उनकी विवशता के कारण महाभारत का युद्ध टाला नहीं जा सका।

३. संक्षेपीकरण संकेत : "श्रीकृष्ण, कौरव एव पाण्डवों के सम्बन्धी थे... संग्राम महाभीषण होगा।' युद्ध का बिगुल बज चुका। दोनों पक्षों ने मित्रों की सेनाओं को जुटाना शुरू किया। दोनों तरफ से क्रमशः ग्यारह और सात अक्षौहिणी सेना एकत्र हो गयी।"

संदर्भ : 'प्रतिशोध' पुस्तक के 'अपरिहार्य महाभारत' पाठ से।
प्रसंग : श्रीकृष्ण के शांति प्रस्ताव की विफलता और युद्ध की औपचारिक घोषणा।
संक्षेपीकरण : श्रीकृष्ण ने युद्ध टालने का अथक प्रयास किया, किंतु दुर्योधन के अहंकार और उनके अपमान के कारण शांति वार्ता विफल हो गई। अंततः दोनों पक्षों ने विशाल सेनाएँ एकत्र कर युद्ध का शंखनाद कर दिया।

४. संक्षेपीकरण संकेत : "हम और पाण्डव आपके लिए बराबर है। युद्ध तो क्षत्रियों का आभूषण है... शल्य ने भारी मन से दुर्योधन के पक्ष में युद्ध करने का निश्चय किया।"

संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय रचित 'प्रतिशोध' के ग्यारहवें पाठ से।
प्रसंग : दुर्योधन की कूटनीति के कारण शल्य का कौरव पक्ष में सम्मिलित होना।
संक्षेपीकरण : दुर्योधन ने छल से शल्य का आतिथ्य सत्कार किया और उन्हें नैतिक दुविधा में डाल दिया। अंततः शल्य ने भारी मन से पांडवों के बजाय कौरवों की ओर से लड़ने का निर्णय लिया।

५. विस्तृत विशदीकरण (भाव-पल्लवन)

१. विशदीकरण संकेत : "भीष्म का व्यक्तित्व महान था। वे परम भागवत और महान योद्धा थे... भीष्म पितामह यदि समय पर निर्णय लेने की क्षमता-सम्पन्न होते तो सचमुच वे भगवान कहलाते। यहीं उनका व्यक्तित्व मार खा जाता है।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'अपरिहार्य महाभारत' नामक पाठ से लिया गया है इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : भीष्म पितामह के चारित्रिक गुणों और उनकी सबसे बड़ी वैचारिक दुर्बलता का सूक्ष्म विवेचन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने यहाँ भीष्म पितामह के व्यक्तित्व का एक अत्यंत तटस्थ और दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। भीष्म का व्यक्तित्व सामान्य मानवों से कहीं ऊपर था। वे 'परम भागवत' थे, अर्थात ईश्वर के अनन्य भक्त और ज्ञाता थे। 'अखण्ड ब्रह्मचर्य' और 'उर्ध्व रेतस्' होना उनकी उस इंद्रिय-विजय का प्रमाण था जो देवताओं के लिए भी कठिन है। राजनीति और धर्मनीति में उनकी विद्वत्ता ऐसी थी कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उन्हें सम्मान देते थे। लेखक का यह कहना कि वे 'श्रीकृष्ण से तनिक भी न्यून महिमा वाले नहीं थे', भीष्म की आध्यात्मिक और भौतिक शक्ति की पराकाष्ठा को दर्शाता है। वे एक ऐसे 'महामानव' थे जिनके पास ज्ञान, बल और चारित्रिक पवित्रता का अनूठा संगम था।

किंतु, लेखक यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं—इतनी महानता के बाद भी भीष्म 'भगवान' क्यों नहीं बन सके? इसका उत्तर उनकी 'निर्णय-क्षमता' के अभाव में छिपा है। महानता केवल गुणों के संचय में नहीं, बल्कि उचित समय पर उचित निर्णय लेने में होती है। भीष्म अपनी प्रतिज्ञाओं और परंपराओं के बोझ तले इतने दबे हुए थे कि वे 'सही' और 'गलत' के बीच की रेखा को नहीं पहचान सके। जब सत्ता अधर्म की राह पर चल रही थी, तब भीष्म का अपनी प्रतिज्ञा को धर्म से ऊपर रखना उनकी सबसे बड़ी भूल थी। एक महान व्यक्ति जब संकट के समय मौन हो जाता है या निर्णय लेने में हिचकिचाता है, तो उसका पूरा व्यक्तित्व निष्प्रभावी हो जाता है। भीष्म का व्यक्तित्व यहीं 'मार खा जाता है' क्योंकि वे जानते हुए भी अधर्म को रोकने का साहस नहीं जुटा सके। लेखक यह संदेश देना चाहते हैं कि ज्ञान और शक्ति तभी सार्थक हैं जब वे न्याय की स्थापना के लिए समय पर प्रयुक्त हों। भीष्म का मौन और उनकी किंकर्तव्यविमूढ़ता ही उन्हें ईश्वरत्व से वंचित कर एक दुखांत नायक बना देती है। यह विशदीकरण स्पष्ट करता है कि किसी भी युग का महानायक वही हो सकता है जो परंपराओं से अधिक न्याय को महत्व दे।

२. विशदीकरण संकेत : "भरी सभा में द्रौपदी को घसीटता हुआ दु:शासन ला रहा है। इस अप्रिय घटना को देखकर भीष्म का न बोलना सहृदय को अखरता है। भीष्म यदि चाह लेते तो महाभारत टाला जा सकता था। किन्तु, यह सच है कि भवितव्यता अटल है।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'अपरिहार्य महाभारत' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : द्रौपदी के चीर-हरण के समय भीष्म के मौन की आलोचना और नियति की अनिवार्यता का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक ने यहाँ इतिहास के उस सबसे काले क्षण को उकेरा है जिसने महाभारत के युद्ध की नींव को पत्थर की लकीर बना दिया। द्रौपदी का अपमान केवल एक स्त्री का अपमान नहीं था, बल्कि वह हस्तिनापुर की न्याय व्यवस्था और धर्म-सभा का पतन था। भीष्म जैसे महामानव का उस सभा में उपस्थित होना और अपनी कुलवधू को दुशासन द्वारा घसीटते हुए देखते रहना, मानवता के इतिहास की सबसे बड़ी विफलता मानी जाती है। लेखक का कहना है कि यह दृश्य किसी भी 'सहृदय' व्यक्ति को पीड़ा पहुँचाता है। भीष्म की चुप्पी ने दुर्योधन और दुशासन के दुस्साहस को बढ़ाया। यदि भीष्म उस क्षण अपना परशु उठा लेते या केवल कड़े स्वर में डाँट देते, तो किसी की मजाल नहीं थी कि वह द्रौपदी की ओर आँख उठाकर भी देखता।

भीष्म की शक्ति इतनी अपार थी कि वे अकेले ही पूरे युद्ध को और अधर्म को रोक सकते थे। किंतु, वे अपनी 'प्रतिज्ञा' और 'राजा की सेवा' के झूठे जाल में उलझे रहे। लेखक यहाँ एक दार्शनिक विरोधाभास प्रस्तुत करते हैं—एक ओर भीष्म की व्यक्तिगत विफलता है, तो दूसरी ओर 'भवितव्यता' (नियति) का खेल। 'भवितव्यता अटल है' का अर्थ है कि शायद वह विनाश नियति द्वारा पूर्व-निर्धारित था ताकि पृथ्वी का पाप कम हो सके। भीष्म का मौन भी उसी नियति का एक हिस्सा बन गया। यह अंश हमें सिखाता है कि जब समाज के बड़े और बुद्धिमान लोग अन्याय पर चुप हो जाते हैं, तो विनाश अपरिहार्य हो जाता है। भीष्म का मौन उनकी दुर्बलता नहीं, बल्कि उनकी उस वैचारिक जड़ता का प्रतीक था जो न्याय से अधिक नियमों को पूजती थी। अंततः, यही मौन महाभारत के महायुद्ध का सबसे बड़ा निमित्त बना। यह भाव-पल्लवन रेखांकित करता है कि इतिहास कभी उन लोगों को क्षमा नहीं करता जो शक्ति के केंद्र में होकर भी अधर्म को रोकने के लिए मौन का सहारा लेते हैं।

३. विशदीकरण संकेत : "श्रीकृष्ण, कौरव एव पाण्डवों के सम्बन्धी थे। वे हृदय से चाहते थे कि युद्ध टल जाय। युद्ध टालने के लिए ही दुर्योधन की सभा में दूत बनकर श्रीकृष्ण जाते हैं... याचना नहीं अब रण होगा, संग्राम महाभीषण होगा।' युद्ध का बिगुल बज चुका। दोनों पक्षों ने मित्रों की सेनाओं को जुटाना शुरू किया। दोनों तरफ से क्रमशः ग्यारह और सात अक्षौहिणी सेना एकत्र हो गयी।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'अपरिहार्य महाभारत' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : भगवान श्रीकृष्ण के शांति मिशन की विफलता और महायुद्ध की औपचारिक घोषणा का सजीव चित्रण।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक ने यहाँ शांति और युद्ध के बीच की उस अंतिम रेखा का वर्णन किया है जिसे दुर्योधन के अहंकार ने पार कर लिया। श्रीकृष्ण का शांतिदूत बनकर जाना यह सिद्ध करता है कि ईश्वर भी अंतिम क्षण तक रक्तपात को टालने का प्रयास करता है। श्रीकृष्ण दोनों पक्षों के संबंधी थे, इसलिए उनका प्रयास निष्पक्ष और न्यायपूर्ण था। उन्होंने केवल 'पाँच गाँव' की मांग की थी, जो पांडवों के अधिकार की तुलना में अत्यंत अल्प थी। किंतु दुर्योधन का विवेक शून्य हो चुका था। उसने न केवल शांति प्रस्ताव ठुकराया, बल्कि श्रीकृष्ण का अपमान कर उन्हें बंदी बनाने का प्रयास किया। यह कृत्य किसी भी दूत की मर्यादा का उल्लंघन था और साक्षात् ईश्वर को चुनौती देना था।

श्रीकृष्ण की घोषणा—'याचना नहीं अब रण होगा'—इस बात का प्रतीक है कि जब प्रार्थना और याचना विफल हो जाए, तो शस्त्र उठाना ही एकमात्र धर्म बचता है। यह घोषणा केवल एक चेतावनी नहीं थी, बल्कि आने वाले युग-परिवर्तन का शंखनाद था। इसके बाद 'संग्राम महाभीषण' होना निश्चित था क्योंकि अन्याय की जड़ें अब बहुत गहरी हो चुकी थीं। दोनों पक्षों द्वारा सेनाएं जुटाना यह दर्शाता है कि पूरा आर्यावर्त दो गुटों में बँट गया था। कौरवों की 'ग्यारह अक्षौहिणी' और पांडवों की 'सात अक्षौहिणी' सेना का एकत्र होना मानव इतिहास के सबसे बड़े सैन्य जमावड़े को दर्शाता है। लेखक यहाँ स्पष्ट करते हैं कि शांति के सभी मार्ग बंद होने के बाद युद्ध केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक आवश्यकता बन गया था। यह अंश वीरता, स्वाभिमान और न्याय की रक्षा के लिए किए गए महासंकल्प को उजागर करता है। श्रीकृष्ण का 'दूत' से 'रणनीतिकार' में बदलना यह सिखाता है कि शांति की भी एक सीमा होती है, और उस सीमा के बाद युद्ध ही शांति स्थापना का मार्ग बनता है।

४. विशदीकरण संकेत : "मामा! हम और पाण्डव आपके लिए बराबर है। युद्ध तो क्षत्रियों का आभूषण है। न्याय और प्रेम परस्पर जा विरोधी हैं। ऐसे ही स्थान पर व्यक्ति का परीक्षण होता है। इस पर शल्य ने भारी मन से दुर्योधन के पक्ष में युद्ध करने का निश्चय किया।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'अपरिहार्य महाभारत' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : दुर्योधन की धूर्त कूटनीति और शल्य के धर्म-संकट का सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक चित्रण।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने यहाँ राजनीति के उस पक्ष को उजागर किया है जहाँ 'छल' को 'आतिथ्य' का मुखौटा पहना दिया जाता है। मद्रराज शल्य पांडवों के सगे मामा थे और वे स्वाभाविक रूप से धर्म के पक्ष में लड़ने आ रहे थे। किंतु दुर्योधन ने कूटनीति का जाल बिछाया। उसने रास्ते में शल्य को वह सुख-सुविधाएं दीं जो युधिष्ठिर भी नहीं दे सकते थे। शल्य ने बिना जाने उस आतिथ्य को स्वीकार किया और वचनबद्ध हो गए। जब सत्य का पता चला, तब तक शल्य दुर्योधन के उपकारों के नीचे दब चुके थे।

दुर्योधन का संबोधन 'मामा' और उसका यह तर्क कि 'हम और पांडव आपके लिए बराबर हैं', उसकी चतुर राजनीति का हिस्सा था। उसने युद्ध को 'क्षत्रियों का आभूषण' बताकर शल्य के जातीय गौरव को झकझोरा। दुर्योधन का यह कहना कि 'न्याय और प्रेम परस्पर विरोधी हैं', एक अत्यंत कुटिल दर्शन है। वह शल्य को यह समझाना चाहता था कि पांडवों के प्रति उनका प्रेम (न्याय) और दुर्योधन द्वारा किया गया सत्कार (ऋण) आपस में टकरा रहे हैं, और एक सच्चे क्षत्रिय को ऋण (सत्कार) का मूल्य चुकाना चाहिए।

शल्य का 'भारी मन' से निर्णय लेना उनकी विवशता और आत्मग्लानि को दर्शाता है। वे जानते थे कि वे अधर्म का साथ दे रहे हैं, किंतु अपनी कृतज्ञता और क्षत्रिय वचन के कारण वे पीछे नहीं हट सके। यह अंश यह सिखाता है कि अधर्मी लोग केवल बल का नहीं, बल्कि भावनाओं और संबंधों का भी उपयोग अपनी सत्ता के लिए करते हैं। शल्य का पक्ष बदलना पांडवों के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक आघात था। यह विशदीकरण स्पष्ट करता है कि महाभारत का युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि कूटनीति और वचनों के चक्रव्यूह से भी लड़ा गया था, जिसमें शल्य जैसे सज्जन व्यक्ति भी बलि चढ़ गए।

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