प्रस्तुत लेख में डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय द्वारा संपादित पुस्तक 'प्रतिशोध' के दसवें अध्याय 'क्षत्रियों को शिक्षा न देने की प्रतिज्ञा' का सांगोपांग विश्लेषण है। इसमें कर्ण के छद्म वेश, गुरु-सेवा की पराकाष्ठा और परशुराम के अमोघ शाप की कथा चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल' द्वारा प्रस्तुत की गई है।
१. मूल पाठ
इसके पश्चात् परशुराम ने भीष्म द्वारा अपनी अवज्ञा से क्षुभित होकर प्रतिज्ञा की कि आज से मैं किसी क्षत्रिय कुमार को शिक्षा नहीं दूँगा। इस घटना को बीते काफी समय बीत गया। आचार्य द्रोण का गुरुकुल मात्र 'कुरुकुल' तक सीमित हो गया। इतना बड़ा उस समय कोई आचार्य नहीं था। अधिरथ का पुत्र कर्ण विद्याध्ययन के लिए द्रोणाचार्य की शरण में गया। वे राजकुमारी को ही शिक्षा प्रदान कर सकते हैं। इस अनुबन्ध को सुन कर्ण अत्यन्त निराश हो गया। भगवान परशुराम की शरण में जाकर विद्याध्ययन करने का मन बना लिया। वह ब्राह्मण वेश में परशुराम के आश्रम जा पहुँचा।
कर्ण को ब्राह्मण-वटु के रूप में परशुराम ने स्वीकार करते हुए अपन व शिष्य बना लिया। अपनी सेवा से कर्ण ने परशुराम को अत्यन्त प्रभावित किया। गुरु के पहले उठता, नित्यक्रिया से उपरत होकर वह गुरु सेवा में लग जाता और गुरु के शयन-कक्ष में चरण दबाते हुए गुरु की आज्ञा पाकर ही सोना उसकी नीयति बन गयी। गुरु के आदेश बिना वह कोई कार्य नहीं करता।
अपनी दिनचर्या से प्रभावित करके कर्ण ने बड़े ही निष्ठापूर्वक गुरु द्वारा सम्पूर्ण विद्या को अचिर काल में ही ग्रहण कर लिया। एक दिन की बात है, कर्ण को शस्त्राभ्यास कराने के कारण थके गुरुदेव कुछ क्षण विश्राम करना चाह रहे थे। कर्ण ने आदरपूर्वक अगं-वस्त्र बिछाकर उपधान के स्थान पर बैठकर गुरुदेव का शिर अपनी गोद में रख लिया। थोड़ी देर में ही भगवान को नींद आ गयी। वे गहरी नींद में सो गये। इतने में ही कर्ण की जाँघ पर एक कीड़ा आ बैठा।' अलर्क' नामक यह कीड़ा सूक्ष्म सूकर के आकार का था। कर्ण की जाँघ को बुरी तरह काटना प्रारम्भ किया। गुरुदेव की नींद भंग न हो जाय-इस भय से कर्ण ने अपनी असह्य पीडा की परवाह किये बिना स्थिर बैठा रहा। अलर्क ने जाँघ के आर-पार छेद कर दिया। इससे भयंकर रक्त बह निकला। रक्त की उष्णता एवं आर्द्रता के परिणाम से भार्गव की निद्रा भङ्ग हो गयी। रक्तस्त्राव देखकर महर्षि अत्यन्त व्याकुल हो उठे। झटके से उठकर बड़े प्रेम से बोले-अरे ! इतना घायल होकर भी तुमने मुझे नहीं बताया? धीर-वीर कर्ण ने कहा-प्रभु, अभी तो ठीक से आप सो भी नहीं सके थे, गुरुदेव को मैं कैसे कच्ची नींद उठा सकता था।
इस घटना के कुछ क्षण व्यतीत होते ही परशुराम जी की आँखें आग्नेय हो उठीं। मुखमण्डल तप्त अंगार की तरह दहकने लगा। क्रोधावेग में वे काँपने लगे। क्षण भर में ही कोमल स्वभाव के स्थान पर रौद्रता के भाव प्रकट होने लगे। कड़कती आवाज उनके मुख से निकली-कपटी, पामर तू ब्राह्मण नहीं । हो सकता। तुम्हारा कृत्य बताता है कि निश्चय ही तू क्षत्रिय वंश का कुल-कलंक है। ब्राह्मण तो शीलवान कृपालु होता है। किन्तु, साधारण-सी बात को लेकर इतना भयंकर कष्ट नहीं सह सकता। मुझे ठगने का साहस तुमने क्यों किया? मैंने तो यह उद्घोष कर रखा था कि नराधम क्षत्रियों को मैं अपना शिष्य नहीं बनाऊँगा। तू सच बोल नहीं तो अभी मेरे क्रोधानल में जलकर भस्म हो जायेगा । कर्ण भय के मारे काँप उठा।
धरती पर लगुड की तरह सोकर कर्ण ने प्रणाम किया। पुनः उठकर करबद्ध होकर संयत स्वर में बोला-प्रभु ! मेरा अपराध क्षमा हो। मैं अधिरथ सूत का पुत्र हूँ। मुझे राधेय नाम से जाना जाता है। आचार्य द्रोण से तिरस्कृत होकर मैं आपकी शरण में विद्याध्ययन करने आया हूँ। गुरु-श्रद्धा ही मेरे साथ घटी इस घटना का मूल है। मैं ईश्वर की सौगन्ध खाता हूँ कि मैंने कुछ भी आपसे नहीं छिपाया। अपना शिष्य जानकर मेरा अपराध क्षमा करें। मैं जीवन भर आपका ऋणी रहूँगा। इतना सुनकर गुरुदेव समाधिस्थ हो गये। पल भर में ने उन्हें कर्ण के जन्म से लेकर इस समय तक का ज्ञान हो उठा। सत्य से परिचित होने पर गुरु ने कहा-'तू क्षत्रिय है।' सूर्यपुत्र होने के कारण तू सत्य एवं ज्ञान से सम्पन्न है। तुमको मैंने धनुर्वेद की शिक्षा दी है। मैं चाहूँ तो तुम्हे प्रदान की ने गयी विद्या को अभी वापस ले सकता हूँ। तुमने मेरी सेवा करके विधा प्राप्त किया है। मैं इस समय तुमसे वह विद्या वापस नहीं लूंगा। परन्तु मैं तुम्हें शाप देता हूँ कि मेरी दी हुई विद्या तुम्हें अन्तिम समय में काम नहीं आयेगी। इसका ने ज्ञान अपने मृत्यु-काल में तुम भूल जाओगे। यह कहकर भगकल-केतु अपने आश्रम की ओर तेज कदमों से चल पड़े। कर्ण हतप्रभ होकर वहीं खड़ा रहा।
आश्रम पर आकर परशुराम कुछ संतोष का अनुभव कर रहे थे। अकिंचन की तरह कर्ण आकर साष्टाङ्ग दण्डवत लेटा रहा। उसके मुख से निकला- मुझे निर्जीव करके मेरा प्राण प्रभु आपने क्यों छोड़ दिया? मुझे आप मृत्य-दण्ड प्रदान करें। मेरा अपराध इसी कोटि का है। मेरा जीवन ही अभिशप्त है।
अब जीने की मेरी लालसा समाप्त हो गयी है। आपके द्वारा मेरा प्राणान्त हो मेरे लिए परम श्रेयष्कर है। कर्ण की वाणी सुनकर भार्गव बोले-कर्ण! मेरा शाप अमोघ है, इसे मैं चाहकर भी वापस नहीं ले सकता। परन्तु, तुम्हें में पाँच वाण दे रहा हूँ। यह अमोघ बाण है। इसके प्रयोग से देव-दानव, यक्ष-गन्धर्व एवं अशेष प्राणी अपना प्राण नहीं बचा सकते। इसे ही अपने अन्तिम समय के लिए तुम सुरक्षित रखना। कर्ण उठकर परशुराम के चरण-रज की वंदना करता हुआ इन्हें ग्रहण किया और भारी मन से अपने गन्तव्य की ओर प्रस्थान किया। कर्ण ने मन में सोचा कि प्रारब्ध पर किसका जोर चल सकता है।
२. कठिन शब्दार्थ
३. सारांश
पाठ 'क्षत्रियों को शिक्षा न देने की प्रतिज्ञा' महर्षि परशुराम के सिद्धांतों और कर्ण की नियति के बीच के कड़े संघर्ष की कथा है। भीष्म के साथ हुए विवाद के बाद, परशुराम ने यह कठोर प्रतिज्ञा की कि वे किसी भी क्षत्रिय को अपनी शस्त्र-विद्या प्रदान नहीं करेंगे। उधर, सूतपुत्र कर्ण जब द्रोणाचार्य द्वारा केवल राजकुमारों को शिक्षा देने की शर्त के कारण तिरस्कृत हुआ, तो उसने ब्राह्मण वेश धारण कर परशुराम की शरण ली। कर्ण ने एक आदर्श ब्राह्मण शिष्य के रूप में गुरु की अनन्य सेवा की और अल्पकाल में ही संपूर्ण धनुर्वेद का ज्ञान प्राप्त कर लिया।
कथा का चरमोत्कर्ष उस दिन हुआ जब परशुराम कर्ण की जाँघ पर सिर रखकर सो रहे थे। तभी 'अलर्क' नामक एक कीड़े ने कर्ण की जाँघ को बुरी तरह काटना शुरू कर दिया। गुरु की नींद में विघ्न न पड़े, इसलिए कर्ण ने उस असह्य पीड़ा को चुपचाप सहा। जब रक्त की गर्मी से परशुराम की नींद खुली, तो वे समझ गए कि इतना शारीरिक कष्ट सहने वाला ब्राह्मण नहीं हो सकता। परशुराम का क्रोध प्रलयंकारी हो उठा और उन्होंने कर्ण को सत्य बोलने के लिए विवश किया। सत्य जानने के बाद परशुराम ने कर्ण को शाप दिया कि उनकी दी हुई विद्या अंतिम समय में उसके काम नहीं आएगी। किंतु, कर्ण की सेवा और उसकी विवशता को देखकर परशुराम ने उसे पाँच अमोघ बाण भी उपहार में दिए। यह पाठ गुरु-भक्ति, सत्य की विवशता और प्रारब्ध (भाग्य) की अनिवार्यता को बड़ी ही मार्मिकता से दर्शाता है। कर्ण की त्रासदी यहाँ से अपनी पूर्णता की ओर बढ़ती है।
४. महत्वपूर्ण अंशों का संक्षेपीकरण
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'क्षत्रियों को शिक्षा न देने की प्रतिज्ञा' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : अलर्क कीट द्वारा कर्ण को काटने और रक्त बहने के बाद परशुराम के संदेह और क्रोध का वर्णन।
संक्षेपीकरण : कर्ण के रक्त की उष्णता देख परशुराम का क्रोध भड़क उठा। उन्हें विश्वास हो गया कि इतना कष्ट केवल क्षत्रिय ही सह सकता है। उन्होंने कर्ण को दंड और भस्म करने की चेतावनी देकर सत्य उगलने का आदेश दिया।
संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय कृत 'प्रतिशोध' के दसवें अध्याय से।
प्रसंग : कर्ण द्वारा अपना वास्तविक परिचय देना और छद्म वेश का कारण बताना।
संक्षेपीकरण : कर्ण ने क्षमा माँगते हुए स्वयं को सूतपुत्र बताया और स्वीकार किया कि द्रोणाचार्य द्वारा तिरस्कृत होने के कारण ही उसने विद्या प्राप्ति हेतु झूठ का सहारा लिया। उसने अपनी पीड़ा सहने का कारण गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा को बताया।
संदर्भ : 'प्रतिशोध' पुस्तक के दसवें अध्याय से उद्धृत।
प्रसंग : परशुराम द्वारा कर्ण के सत्य को स्वीकार करना किंतु छद्म वेश के कारण उसे शाप देना।
संक्षेपीकरण : परशुराम ने कर्ण की सेवा के बदले विद्या तो नहीं छीनी, किंतु सिद्धांतों की रक्षा हेतु उसे शाप दिया कि जीवन के सबसे निर्णायक और अंतिम युद्ध के समय वह अपनी संपूर्ण शस्त्र-विद्या को भूल जाएगा।
संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय रचित 'प्रतिशोध' के दसवें पाठ से।
प्रसंग : कर्ण की ग्लानि और परशुराम द्वारा उसे अमोघ बाणों का उपहार देना।
संक्षेपीकरण : शाप के बाद कर्ण ने मृत्यु माँगी, किंतु परशुराम ने शाप को अटल बताते हुए उसकी सेवा के प्रतिफल के रूप में पाँच अमोघ बाण दिए। कर्ण ने इसे अपनी नियति मानकर स्वीकार किया।
५. विस्तृत विशदीकरण (भाव-पल्लवन)
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'क्षत्रियों को शिक्षा न देने की प्रतिज्ञा' नामक पाठ से लिया गया है इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : कर्ण के रक्त को देखकर परशुराम के भीतर के तपस्वी और क्षत्रिय-विरोधी भाव का जाग्रत होना।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने यहाँ भगवान परशुराम के प्रचंड क्रोध और उनके वर्ण-निश्चय की मानसिकता का चित्रण किया है। जब अलर्क कीट ने कर्ण की जाँघ को छलनी कर दिया और रक्त की 'उष्णता' (गर्मी) से परशुराम की नींद खुली, तो यह केवल एक निद्रा भंग होने की घटना नहीं थी, बल्कि एक महान सत्य के उद्घाटन का क्षण था। परशुराम की 'आग्नेय आँखें' और 'तप्त अंगार' जैसा मुखमंडल उनके सिद्धांतों के प्रति उनकी कट्टरता को दर्शाता है। परशुराम का मानना था कि ब्राह्मण स्वभाव से कोमल और शीलवान होता है; वह मानसिक पीड़ा तो सह सकता है, किंतु इतनी भयंकर शारीरिक यातना को मौन रहकर सहना केवल एक क्षत्रिय के ही वश की बात है।
परशुराम का क्रोध यहाँ इसलिए भी अधिक है क्योंकि उन्हें लगा कि उनके साथ 'छल' हुआ है। एक गुरु के लिए उसके शिष्य का झूठ सबसे बड़ा आघात होता है। उन्होंने कर्ण को 'कपटी' और 'पामर' (नीच) कहकर संबोधित किया। यह क्रोध केवल एक व्यक्ति पर नहीं था, बल्कि उन सभी 'नराधम क्षत्रियों' के प्रति था जिनके विरुद्ध परशुराम ने जीवन भर संघर्ष किया था। परशुराम ने कर्ण को 'क्रोधानल' (क्रोध की अग्नि) में भस्म करने की चेतावनी दी। यह दृश्य गुरु और शिष्य के बीच के विश्वास के टूटने की मार्मिक अभिव्यक्ति है। कर्ण का 'भय के मारे काँपना' उसके अपराधबोध और गुरु के प्रताप के सम्मुख उसकी विवशता को दर्शाता है। लेखक यहाँ यह स्पष्ट करते हैं कि ज्ञान की प्राप्ति के लिए किया गया छल, अंततः विनाशकारी सिद्ध होता है। परशुराम के सिद्धांतों की कठोरता यहाँ उनके 'रौद्र' रूप में प्रकट होती है, जो उनके कोमल 'भक्तवत्सल' स्वरूप को ढँक लेती है। यह भाव-पल्लवन सिद्ध करता है कि सत्य के बिना प्राप्त विद्या का आधार अत्यंत कमजोर होता है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'क्षत्रियों को शिक्षा न देने की प्रतिज्ञा' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : कर्ण द्वारा अपने छद्म वेश का रहस्योद्घाटन और समाज द्वारा किए गए तिरस्कार की पीड़ा का प्रकटीकरण।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक ने यहाँ कर्ण के चरित्र के उस पक्ष को उजागर किया है जहाँ वह एक पीड़ित और विवश पात्र के रूप में उभरता है। कर्ण का 'लगुड' (लाठी) की तरह धरती पर गिरकर प्रणाम करना उसकी पूर्ण शरणागति का प्रतीक है। कर्ण का यह स्वीकारोक्ति कि वह 'अधिरथ सूत का पुत्र' है, उसके साहस को दर्शाता है। उसने झूठ इसलिए बोला क्योंकि समाज ने उसे सत्य के आधार पर शिक्षा देने से मना कर दिया था। आचार्य द्रोण का तिरस्कार कर्ण के जीवन का वह मोड़ था जिसने उसे छल के मार्ग पर धकेला।
कर्ण का तर्क अत्यंत प्रभावशाली है—'गुरु-श्रद्धा ही इस घटना का मूल है'। उसने यह सिद्ध किया कि उसने कीड़े के काटने को इसलिए सहा क्योंकि वह गुरु की सेवा में बाधक नहीं बनना चाहता था। यहाँ कर्ण का छल उसकी 'गुरु-भक्ति' के आवरण में लिपटा हुआ है। वह स्पष्ट करता है कि उसने कुछ भी स्वेच्छा से नहीं छिपाया, बल्कि विद्या की प्यास ने उसे विवश कर दिया था। 'आजीवन ऋणी रहना' उसकी कृतज्ञता को दर्शाता है। लेखक यहाँ पाठक के मन में कर्ण के प्रति सहानुभूति जाग्रत करते हैं। यह अंश यह प्रश्न उठाता है कि यदि समाज किसी योग्य व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर ज्ञान से वंचित करता है, तो क्या उस व्यक्ति द्वारा अपनाया गया छद्म मार्ग सर्वथा अनुचित है? कर्ण का विलाप और उसकी करबद्ध प्रार्थना गुरु-शिष्य परंपरा की एक करुण व्याख्या है, जहाँ एक योग्य शिष्य अपने भाग्य के हाथों छला जा रहा है। कर्ण की श्रद्धा सत्य है, किंतु उसका परिचय असत्य था। इसी द्वंद्व को लेखक ने यहाँ बड़ी ही कुशलता से प्रस्तुत किया है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'क्षत्रियों को शिक्षा न देने की प्रतिज्ञा' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : परशुराम द्वारा कर्ण के छद्म वेश का दंड देने और विद्या के निष्फल होने का शाप देने का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने यहाँ 'नियति' और 'न्याय' के अटूट संबंध की व्याख्या की है। परशुराम ने कर्ण की सेवा से प्रभावित होकर उससे विद्या वापस नहीं ली, किंतु उन्होंने अपने सिद्धांतों और अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए एक ऐसा शाप दिया जो मृत्युदण्ड से भी कठोर था। 'अंतिम समय में विद्या का काम न आना' किसी भी योद्धा के लिए सबसे बड़ी पराजय है। एक धनुर्धर का अस्तित्व उसके ज्ञान पर टिका होता है, और परशुराम ने उसी ज्ञान के मूल पर प्रहार किया।
यह शाप कर्ण की उस 'अपूर्णता' का प्रतीक बन गया जो उसे जीवन भर कचोटती रही। परशुराम का यह निर्णय एक गुरु के धर्म-संकट को भी दर्शाता है। वे कर्ण की योग्यता को जानते थे, इसलिए उन्होंने उसे 'सूर्यपुत्र' और 'ज्ञान से सम्पन्न' कहा, किंतु ब्राह्मण वेश धारण कर एक ऋषि को ठगने का अपराध अक्षम्य था। 'मृत्यु-काल में ज्ञान भूल जाना' यह सुनिश्चित करता है कि जब कर्ण को अपनी विद्या की सबसे अधिक आवश्यकता होगी, तब उसका मस्तिष्क साथ छोड़ देगा। लेखक यहाँ यह दार्शनिक संदेश देते हैं कि असत्य की नींव पर खड़ी की गई ज्ञान की इमारत संकट के समय ढह जाती है। परशुराम का 'तेज कदमों से आश्रम की ओर चलना' उनके भीतर के अशांत मन और सिद्धांतों के प्रति अडिगता को दिखाता है। वे कर्ण को दण्ड देकर भी सुखी नहीं थे, किंतु वे अपनी प्रतिज्ञा के वश में थे। यह शाप महाभारत के युद्ध का वह निर्णायक बिंदु बना जहाँ कर्ण का रथ का पहिया धँसता है और वह मंत्र भूल जाता है। यह अंश गुरु की वाणी की शक्ति और कर्मफल की अनिवार्यता को बड़ी ही प्रखरता से सिद्ध करता है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'क्षत्रियों को शिक्षा न देने की प्रतिज्ञा' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : कर्ण की आत्मग्लानि, परशुराम का पश्चाताप मिश्रित उपहार और नियति के प्रति स्वीकारोक्ति।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : पाठ के इस अंतिम भाग में लेखक ने करुणा और विवशता का अद्भुत मिश्रण प्रस्तुत किया है। कर्ण की 'जीने की लालसा समाप्त होना' उसके उस मानसिक अवसाद को दर्शाता है जहाँ उसे लगने लगा कि उसका संपूर्ण श्रम और विद्या अब व्यर्थ है। उसके लिए गुरु का शाप उसकी मृत्यु के समान ही था। परशुराम, जो अब तक कठोर बने हुए थे, उनके हृदय में भी एक पिता और गुरु का वात्सल्य जाग उठा। उन्होंने स्वीकार किया कि 'मेरा शाप अमोघ है'—अर्थात वे स्वयं भी इसे वापस लेने में असमर्थ हैं।
किंतु, कर्ण की निष्कपट सेवा का फल देने के लिए उन्होंने उसे 'पाँच अमोघ बाण' दिए। ये बाण परशुराम की उस ममता का प्रतीक थे जो वे अपने प्रिय शिष्य को देना चाहते थे। ये बाण इतने शक्तिशाली थे कि देव-दानव भी इनसे नहीं बच सकते थे। यहाँ गुरु का द्वंद्व स्पष्ट है—वे शाप के माध्यम से न्याय भी करते हैं और अमोघ बाणों के माध्यम से शिष्य की सुरक्षा भी सुनिश्चित करते हैं। कर्ण का 'भारी मन' से प्रस्थान करना और यह सोचना कि 'प्रारब्ध पर किसका जोर चल सकता है'—अत्यंत दार्शनिक है। 'प्रारब्ध' (भाग्य) ही वह शक्ति है जो कर्ण को एक सूतपुत्र से योद्धा और फिर एक अभिशप्त नायक बनाती है। वह समझ गया कि उसका जीवन संघर्षों और प्रतिशोधों का एक ऐसा चक्र है जिसे वह चाहकर भी नहीं तोड़ सकता। लेखक यहाँ यह संदेश देते हैं कि मनुष्य का पुरुषार्थ महान है, किंतु नियति के खेल के आगे कभी-कभी सर्वोत्तम योद्धा भी विवश हो जाता है। कर्ण का परशुराम के 'चरण-रज' की वंदना करना उसकी अविचल गुरु-भक्ति को सिद्ध करता है, जो शाप मिलने के बाद भी कम नहीं हुई। यह अध्याय कर्ण की महानता और उसकी त्रासदी के बीज को बड़ी ही गहराई से बो देता है।
