प्रस्तुत लेख में डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय द्वारा संपादित पुस्तक 'प्रतिशोध' के नौवें अध्याय 'भीष्म और परशुराम का संग्राम' का सांगोपांग विश्लेषण है। इसमें गुरु-शिष्य के मध्य हुए बीस दिवसीय महासंग्राम और अम्बा के शिखण्डी बनने की कथा चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल' द्वारा प्रस्तुत की गई है।
१. मूल पाठ
महात्मा भीष्म अपने गुरु का आदेश शिरोधार्य कर दूसरे दिन सन्ध्यावन्दन से निवृत्त होकर कुरुक्षेत्र के समराङ्गण में आ डटे। उन्होंने गुरु को प्रणाम करते हुए निवेदन किया कि मैं आपसे कैसे संग्राम करूं? एक तो आप हमारे गुरु हैं। दूसरे निहत्थे हैं और बिना कवच और वर्म के आपका शरीर युद्ध के विभीषिका को झेलने में असमर्थ है। आप पैदल और मैं रथारूढ़ हूँ। ऐसी स्थिति में युद्ध करना धर्म-विरुद्ध है। अपने योग्य शिष्य की नीति-परक वाणी सुनकर भगवान भार्गव अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि हे गंगानन्दन! ऐसी बातें तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा कौन कह सकता है ? मैं प्रसन्न होकर तुम्हें युद्ध करने का आदेश देता हूँ। मेरे लिए सम्पूर्ण पृथ्वी ही रथ है। दशों दिशायें ही घोड़े हैं। इन्द्रिय-निग्रह ही घोड़ों की राशि है। यम-संयम ही मेरे कवच एवं वर्म हैं; पुनरपि तुम्हारी प्रसन्नता-हेतु मैं तुम्हारे समान युद्ध में उपयोगी सामग्री से सुसज्जित होकर ही समर भूमि में उपस्थित हो रहा हूँ। इतना कहकर उन्होंने मानसिक संकल्प द्वारा ही एक दिव्य रथ, जिस पर अक्षय तूर्ण, धनुष, कवचादि सामग्री रखी थी। उनके अनन्य सखा अकृतव्रण भी घोड़ों की वल्गा सँभाल चुके थे। परशुराम की समरभूमि में अद्भुत छटा देखकर भीष्म दंग रह गये। उन्होंने गुरु के चरणों के पास एक दिव्यास्त्र फेंककर प्रणामपूर्वक युद्ध का आदेश माँगा और शिष्य की मनसा जानकर परशुराम ने शिर के ऊपर से निकल जाने वाला दूसरा दिव्यास्त्र प्रक्षेपित किया। इस प्रकार दोनों का युद्ध प्रारम्भ हो गया। दर्शक की भूमिका में जानेमाने योद्धागण, धर्मात्मा ऋषिगण, देव, यक्ष, गन्धर्व एवं अनेक अशरीरी पितृगण भी अपना-अपना स्थान सुरक्षित कर चुके थे।
दिनभर युद्ध चलता रहा। सरसन्धान इस रूप में हो रहा था मानों गुरु शिष्य को युद्धाभ्यास करा रहा था। सूर्यास्त होने को आया तो भीष्म ने कहा गुरुदेव ! सन्ध्या का समय हो गया है अब युद्ध बन्द करने की आज्ञा दें। बाण-वर्षा बन्द हो गयी। समरभूमि से हटकर दोनों अपराजेय योद्धा सन्ध्यावन्दन करने चले गये। शरीर के घावों का उपचारादि कर रात्रि में दोनों ही विश्राम करके नयी उर्जा के साथ दूसरे दिन कुरुक्षेत्र में आ डटे। युद्ध का माहौल गर्म होता जा रहा था। दोनों एक दूसरे का प्रत्युत्तर बाणों की बौछार द्वारा देते थे। भीष्म के हस्तकौशल से मुदित होते हुए भगवान भार्गव और कठिन बाणों का प्रयोग करते जिसे सहज ही काटकर भीष्म अपनी योग्यता का प्रमाण देते रहते। दिन भर अनवरत बाण-वर्षा होती रही। युद्ध शाम को पुनः बन्द हो गया। नित्य कर्म करते हुए दोनों ने रात्रि में विश्राम किया। इस प्रकार दोनों का भयंकर युद्ध एक पक्ष तक चलता रहा। दोनों ने अपने दिव्यास्त्रों से एक दूसरे का शरीर छलनी कर दिया। युद्ध-विराम की भूमिका बन ही नहीं पा रही थी। दोनों ही धर्म-युद्ध कर रहे थे। रणनीति में दोनों ही पारंगत थे। इस प्रकार दोनों के दिवस रात्रि व्यतीत हो रहे थे मानो अभी कल की बात है। युद्ध के सोलहवें दिन गुरु गम्भीर हो उठे। आज उन्होंने मन से निर्णायक युद्ध करने का विचार किया। युद्ध प्रारम्भ हुआ। एक-दूसरे पर प्रबल बाणों की बौछार होने लगी। भीष्म का काम तमाम करने की कामना से भार्गव ने ज्यों ही बाण प्रत्यञ्चित किया कि देखा कि युद्ध भूमि में एक वृद्धा उपस्थित होकर सफाई कर रही थी। उस पर दृष्टिपात करते ही राम ने पूछ लिया-तू कौन है? अपने प्राणों को हथेली पर रख इस समराङ्गण में तू क्या कर रही है? इस पर मुस्कुराते हुए वह बोली-मेरा पुत्र बहुत थक गया है। आज मैं उसे अपने गोद में लेकर विश्राम देंगी, ताकि वह कल पुन: युद्ध में आकर आपके बाणों का प्रत्युत्तर दे सके। इसको देखकर परशुराम समझ गये कि यह गंगा है। अपने पुत्र का व्यामोह उसे हठात् युद्ध भूमि में आने को बाध्य कर दिया। यह क्या बाण लगते ही भीष्म की आँखें बन्द होने लगीं। लोग भयाक्रान्त हो गये। भीष्म अपने रथ से नीचे आकर लड़खड़ाने लगे। उसी वृद्धा तापसी ने भीष्म को उस साफ-सुथरी भूमि पर ले जाकर अपने गोद में लिटाकर अपने अम्लान साड़ी के पल्लू से व्यजन करने लगी। थोड़ी ही देर में भीष्म उठ खड़े हुए और पुन: रथ में जाकर युद्ध करने लगे। भीष्म का उत्साह आज चरम पर। था। परशुराम के बाणों का उत्तर देने में भीष्म को जरा भी विलम्ब नहीं लगता। गुरुदेव ने कहा आज तो गंगा निपूती होने से बच गयी।
दूसरे दिन घनघोर युद्ध शुरू हुआ। आज दोनों ही एक दूसरे के प्राणों को लेने के लिए आतुर थे। मन में सभी की अभिलाषा थी कि युद्धविराम हो 'जाय किन किसी में साहस कहाँ कि युद्ध समाप्त करने का पहल कर सके। आज का युद्ध कहा नहीं जा सकता था कि पासा किसके पक्ष में गिरेगा। दोनों ही अपराजेय युद्ध लड़ रहे थे। भार्गव ने अमोघ-बाण का सन्धान करना चाहा कि अस्तंगधित सर्य पर उनकी निगाह पड़ गयी। उन्होंने युद्ध विराम की घोषणा करते हुए कहा- भीष्म ! आज तुम्हारे प्राणों को सूर्य ने बचा दिया, किन्तु कल तुम्हें मारे बिना मैं चैन न लँगा। भीष्म मारे क्रोध के कुछ बोल न सके। उनका सारथी युद्धभूमि से रथ वापस ले गया। इस प्रकार एक दूसरे को मारने का असफल प्रयास करते हुए युद्ध का दो दिन और व्यतीत हो गया। कोई परिणाम नहीं निकल सका।
बिना किसी व्यवधान के युद्ध बीस दिन तक अनवरत चलता रहा। भीष्म ने अपने पितरों का आवाहन करते हुए कहा कि मैं भगवान परशुराम को यदि युद्ध भूमि पर मौत की नींद सुला सकें तो मुझे स्वप्न-दर्शन दें। यह कहकर वे रात में विश्राम करने चले गये।।
भीष्म को स्वप्न में उनके पास आकर एक दिव्यात्मा ने दर्शन दिया। उसके आने पर मानों चतुर्दिक प्रकाश फैल गया। भीष्म को सम्बोधन करके बोला-हे शान्तनु-कुमार ! पूर्व जन्म में तुम ‘प्रभास' नामक वसु थे। महर्षि वशिष्ठ के शाप से तुम मनुष्य योनि में जन्म लिये हो। भार्गव तो स्वयं विष्णु के अवतार हैं। उन्हें कोई भी मार नहीं सकता। तुम भी उनके द्वारा अवध्य हो। प्रात: तुम्हारे पास ‘प्रस्वाप' नामक अस्त्र आ जायेगा। इसे देखकर स्वत: तुम्हें इसका सन्धान एवं सम्वरण आ जायेगा। तुम इसको पूर्व जन्म से ही सम्यक रूप से जानते हो। इसके प्रयोग से तुम भार्गव के ऊपर दबाव बना सकते हो। यह कहकर वे महात्मा चले गये।
प्रात: उठने पर वह दिव्यास्त्र उन्हें चारपाई पर रखा मिला। इसे देखकर भीष्म को सम्पूर्ण रहस्य समझ में आ गया। नित्य कर्म से निवृत्त होकर वे समरभूमि जा पहुँचे। नित्य की भाँति परशुराम भी युद्ध-भूमि में आ डटे। रात्रि में भार्गव को भी स्वप्न हुआ कि भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त है। अत: वे आप द्वारा नहीं मारे जा सकते । युद्ध-विराम करना ही श्रेयस्कर होगा। युद्ध भयानक दौर में जा पहुँचा तो कल स्वप्न में प्राप्त ‘प्रस्वाप' का विनियोग करके भीष्म ने अपने गुरु पर सन्धान कर दिया। इसका सम्बरण करते हुए भार्गव इधर-उधर घूमने लगे-मानों उन्हें चक्कर आने लगा हो। देवताओं के अनुरोध पर दोनों के पितृगण आकाशमार्ग से कुरुक्षेत्र में प्रकट हुए। दोनों ही अपने पर्वजों द्वारा युद्धविराम का अनुरोध करने पर रुक गये। उनकी बात दोनों ने मानकर युद्ध रोक दिया। अपने पूर्वजों द्वारा प्रेरित होकर भीष्म ने भार्गव को करबद्ध प्रणाम करके हस्तिनापुर की राह पकड़ी।
परशुराम ने अम्बा से कहा कि मैंने तुम्हारे कल्याण के लिए अपने इतने शिष्य को खो दिया। सम्प्रति तुम चराचर ईश भगवान शंकर की शरण जाओ। वही तुम्हें अभीष्ट वरदान देंगे। गुरु परशुराम द्वारा निर्दिष्ट मार्ग का अनशीलन करते हुए अम्बा ने भगवान आशुतोष को प्रसन्न करके एक दिव्य अम्लान माला प्राप्त किया; जिसे पहनकर अजेय भीष्म को परास्त किया जा सकता है। उसे लेकर अम्बा ने पाञ्चाल नरेश द्रुपद के दरबार में आकर भीष्म-वध करने को उकसाया। राजन ! आपका अपमान करने वाला इस जगत में भीष्म को छोड़कर दूसरा नहीं है। इस माला को पहनकर आप दम्भी भीष्म का वध कर सम्पूर्ण विश्व में अपनी कीर्ति-पताका फहरा सकते हैं। द्रुपद को इस लड़की पर विश्वास नहीं हुआ। वह परिहासपूर्वक इसकी बात टाल गये। महाराज द्रुपद के यहाँ कोई यज्ञ का आयोजन चल रहा था। यज्ञशाला में कहीं यह माला टाँगकर अम्बा ने होमाग्नि में कूदकर प्राणोत्सर्ग कर लिया। कालान्तर में उसी अम्बा ने महाराजा द्रुपद के यहाँ जन्म लिया; जिसे आज सम्पूर्ण राज-समाज शिखण्डी के नाम से जानता है। वह दिव्य माला पहनकर मैं हमेशा भीष्म-वध के बारे में सचेष्ट रहता हूँ। मेरे हृदय में भीष्म का वध करने का प्रतिशोध मूर्तमान होकर करवट बदलता रहता है। वही आज अनचाहे में तुम्हारे समक्ष स्वप्नावस्था में मेरे मुख से प्रस्फुटित हो गया। यही मेरे स्वप्न का निहितार्थ है।
२. कठिन शब्दार्थ
३. सारांश
पाठ 'भीष्म और परशुराम का संग्राम' गुरु-शिष्य के मध्य हुए एक धर्म-युद्ध की गाथा है। कुरुक्षेत्र के मैदान में भीष्म और परशुराम युद्ध के लिए आमने-सामने खड़े होते हैं। भीष्म, गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए धर्म-विरुद्ध युद्ध (निहत्थे और पैदल गुरु से युद्ध) करने में संकोच करते हैं, किंतु परशुराम अपने तपोबल से दिव्य रथ और शस्त्र प्राप्त कर भीष्म को युद्ध की आज्ञा देते हैं। बीस दिनों तक चलने वाला यह युद्ध अत्यंत भयानक था, जिसमें दोनों ही योद्धा अपनी श्रेष्ठता और दिव्यास्त्रों का परिचय देते हैं। युद्ध के दौरान माता गंगा स्वयं वृद्धा के रूप में भीष्म की रक्षा के लिए प्रकट होती हैं, जिससे परशुराम भी चकित रह जाते हैं।
जब युद्ध का कोई परिणाम नहीं निकलता, तो भीष्म अपने पितरों का आवाहन करते हैं। स्वप्न में उन्हें एक दिव्यात्मा द्वारा ज्ञात होता है कि वे पूर्वजन्म के 'प्रभास' वसु हैं और परशुराम विष्णु के अवतार हैं, अतः दोनों ही एक-दूसरे के लिए अवध्य हैं। भीष्म को 'प्रस्वाप' नामक अस्त्र प्राप्त होता है, जिससे वे परशुराम को वशीभूत कर सकते थे। अंततः पितरों के हस्तक्षेप से युद्ध विराम होता है और भीष्म गुरु को प्रणाम कर हस्तिनापुर लौट जाते हैं। पराजित अनुभव करने वाली अम्बा को परशुराम शिव की शरण में जाने को कहते हैं। अम्बा शिव से एक दिव्य माला प्राप्त करती है और भीष्म से प्रतिशोध लेने के लिए राजा द्रुपद के यहाँ 'शिखण्डी' के रूप में पुनर्जन्म लेती है। यह अध्याय स्पष्ट करता है कि भीष्म के प्रति शिखण्डी का प्रतिशोध जन्मों पुराना है, जो महाभारत के युद्ध में चरमोत्कर्ष तक पहुँचता है।
४. महत्वपूर्ण अंशों का संक्षेपीकरण
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'भीष्म और परशुराम का संग्राम' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : परशुराम द्वारा अपनी आध्यात्मिक शक्ति से युद्ध सामग्री प्राप्त करने का वर्णन।
संक्षेपीकरण : परशुराम ने स्पष्ट किया कि एक योगी के लिए प्रकृति और उसके नियम ही अस्त्र-शस्त्र हैं, किंतु भीष्म के संतोष के लिए उन्होंने संकल्प मात्र से दिव्य रथ, तरकश और सारथी (अकृतव्रण) प्राप्त कर लिए।
संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय कृत 'प्रतिशोध' के नौवें पाठ से।
प्रसंग : युद्ध के नियमों और मर्यादापूर्ण संघर्ष का चित्रण।
संक्षेपीकरण : भीष्म और परशुराम ने युद्ध की शास्त्रीय मर्यादा का पालन करते हुए सूर्यास्त पर बाण-वर्षा रोक दी। दोनों योद्धा रात्रि में विश्राम और उपचार के पश्चात पुनः नव-ऊर्जा के साथ युद्ध में डट जाते थे।
संदर्भ : 'प्रतिशोध' पुस्तक के नौवें अध्याय से उद्धृत।
प्रसंग : पन्द्रह दिनों तक चलने वाले बराबरी के मुकाबले का वर्णन।
संक्षेपीकरण : पन्द्रह दिनों तक चले इस प्रलयंकारी युद्ध में दोनों योद्धाओं ने एक-दूसरे के शरीर को घायल कर दिया, किंतु धर्म-युद्ध और श्रेष्ठ रणनीति के कारण कोई भी हारने को तैयार नहीं था।
संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय रचित 'प्रतिशोध' के नौवें पाठ से।
प्रसंग : निर्णायक युद्ध की विफलता और गतिरोध का वर्णन।
संक्षेपीकरण : युद्ध के सत्रहवें और अठारहवें दिन भी दोनों योद्धा एक-दूसरे के प्राण लेने को आतुर थे, किंतु सूर्यास्त और दोनों की अपार शक्ति के कारण युद्ध बेनतीजा रहा।
संदर्भ : 'प्रतिशोध' पुस्तक के नौवें अध्याय 'भीष्म और परशुराम का संग्राम' से।
प्रसंग : स्वप्न के माध्यम से भीष्म को उनके पूर्वजन्म और भावी रणनीति का ज्ञान होना।
संक्षेपीकरण : भीष्म को स्वप्न में ज्ञात हुआ कि वे पूर्वजन्म के वसु हैं और परशुराम विष्णु के अवतार हैं। उन्हें 'प्रस्वाप' अस्त्र प्रदान किया गया ताकि वे युद्ध को समाप्त कर सकें।
संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय कृत 'प्रतिशोध' के 'भीष्म और परशुराम का संग्राम' पाठ से।
प्रसंग : प्रस्वाप अस्त्र के प्रयोग और पितरों के हस्तक्षेप से युद्ध विराम का वर्णन।
संक्षेपीकरण : भीष्म ने प्रस्वाप अस्त्र का प्रयोग किया, जिससे परशुराम विचलित हुए। अंततः पितरों और देवताओं के अनुरोध पर दोनों ने युद्ध रोक दिया और भीष्म गुरु को प्रणाम कर लौट गए।
संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय कृत 'प्रतिशोध' के नौवें अध्याय से।
प्रसंग : अम्बा के त्याग, पुनर्जन्म और शिखण्डी के रूप में प्रतिशोध का रहस्योद्घाटन।
संक्षेपीकरण : अम्बा ने भीष्म के विनाश हेतु स्वयं को अग्नि को समर्पित कर शिखण्डी के रूप में जन्म लिया। आज वही पुराना प्रतिशोध शिखण्डी के स्वप्न के माध्यम से प्रकट हुआ है।
५. विस्तृत विशदीकरण (भाव-पल्लवन)
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'भीष्म और परशुराम का संग्राम' नामक पाठ से लिया गया है इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : परशुराम की आध्यात्मिक संप्रभुता और भौतिक संसाधनों के प्रति उनकी अनासक्ति का विवेचन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने यहाँ भगवान परशुराम के विराट और दार्शनिक स्वरूप का अंकन किया है। जब भीष्म एक धर्मनिष्ठ योद्धा के रूप में अपने गुरु की पैदल और निहत्थी स्थिति पर चिंता जताते हैं, तब परशुराम का उत्तर एक योगी की पराकाष्ठा को दर्शाता है। परशुराम के लिए भौतिक रथ और घोड़े अनिवार्य नहीं हैं; उनके लिए संपूर्ण 'पृथ्वी' ही आधार है और 'दसों दिशाएं' गति का माध्यम। 'इंद्रिय-निग्रह' (इंद्रियों पर नियंत्रण) ही उनकी शक्ति के अश्व हैं और 'यम-संयम' उनका अभेद्य कवच है। यह पंक्तियाँ सिद्ध करती हैं कि एक सिद्ध पुरुष के लिए बाह्य उपकरणों का कोई मूल्य नहीं होता, क्योंकि उसकी वास्तविक शक्ति उसके भीतर स्थित होती है।
परंतु, युद्ध की मर्यादा (समर-नीति) को बनाए रखने और अपने प्रिय शिष्य भीष्म के संतोष के लिए, परशुराम अपनी योग-माया का प्रयोग करते हैं। 'मानसिक संकल्प' से ही एक दिव्य रथ का प्रकट होना यह दर्शाता है कि संकल्प की शक्ति भौतिक वस्तुओं के निर्माण में सक्षम है। 'अक्षय तूर्ण' का होना यह संकेत देता है कि उनके बाण कभी समाप्त नहीं होंगे, जो उनके अदम्य साहस और अनंत शक्ति का प्रतीक है। अकृतव्रण का वल्गा (लगाम) संभालना यह स्पष्ट करता है कि श्रेष्ठ कार्यों में प्रकृति और सच्चे मित्र भी सहायक बन जाते हैं। यह अंश परशुराम को केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि एक दिव्य सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित करता है, जिनके लिए अस्त्र-शस्त्र केवल एक खेल की सामग्री मात्र हैं। लेखक ने यहाँ यह संदेश दिया है कि वास्तविक विजय शस्त्रों से नहीं, बल्कि आत्मिक बल और संयम से प्राप्त होती है। परशुराम की यह 'अद्भुत छटा' भीष्म जैसे महारथी को भी विस्मित कर देती है, जो इस महासंग्राम की गरिमा को और अधिक बढ़ा देती है। यह विशदीकरण स्पष्ट करता है कि अध्यात्म और युद्ध का समन्वय ही भारतीय वीरता का मूल मंत्र रहा है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'भीष्म और परशुराम का संग्राम' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : प्राचीन भारतीय युद्ध पद्धति की नैतिकता और मर्यादापूर्ण संघर्ष का आदर्श चित्रण।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : यह अंश भारतीय 'धर्म-युद्ध' की श्रेष्ठता का परिचायक है। लेखक ने यहाँ यह प्रतिपादित किया है कि प्राचीन काल में युद्ध केवल संहार का माध्यम नहीं था, बल्कि वह नियमों और मर्यादाओं के अधीन एक अनुष्ठान था। 'बाण-वर्षा बंद होना' और 'संध्यावंदन' के लिए प्रस्थान करना यह दर्शाता है कि योद्धाओं के लिए ईश्वर की भक्ति और समय की मर्यादा सर्वोपरि थी। सूर्यास्त के बाद शत्रुता का विसर्जन हो जाता था और योद्धा अपने शरीर के घावों का उपचार कर अगले दिन के लिए स्वयं को तैयार करते थे।
'नयी ऊर्जा' का संचार यह संकेत देता है कि दोनों ही योद्धा मानसिक रूप से अत्यंत दृढ़ थे। भीष्म का हस्तकौशल और परशुराम का उस पर मुदित (प्रसन्न) होना, गुरु-शिष्य के अनूठे संबंध को दर्शाता है। युद्ध के मैदान में भी परशुराम अपने शिष्य की योग्यता की सराहना करते हैं, जो उनके विशाल हृदय का प्रमाण है। 'अनवरत बाण-वर्षा' के बावजूद उनके मन में एक-दूसरे के प्रति सम्मान बना रहता है। रात्रि में विश्राम करना और नित्य कर्मों का संपादन करना यह सिद्ध करता है कि वे अपनी दिनचर्या और धार्मिक उत्तरदायित्वों के प्रति सजग थे। लेखक स्पष्ट करना चाहते हैं कि वास्तविक योद्धा वही है जो क्रोध में भी अपनी मर्यादा न भूले। भीष्म और परशुराम का यह व्यवहार आधुनिक युद्धों की तुलना में अत्यंत गरिमापूर्ण है। यहाँ युद्ध केवल जीतने के लिए नहीं, बल्कि अपने-अपने धर्म और प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए किया जा रहा था। रात्रि का विश्राम केवल शरीर को आराम देने के लिए नहीं, बल्कि आत्म-चिंतन के लिए भी था। यह अंश वीरता के साथ-साथ संयम और शालीनता के उस समन्वय को प्रस्तुत करता है जो केवल भारतीय ऋषि और क्षत्रिय परंपरा में ही संभव है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'भीष्म और परशुराम का संग्राम' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : युद्ध के दीर्घकालीन और बराबरी के संघर्ष का वर्णन, जहाँ शक्ति और नैतिकता का संतुलन है।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने यहाँ युद्ध की उस चरम अवस्था का वर्णन किया है जहाँ हार-जीत का निर्णय असंभव जान पड़ता है। 'एक पक्ष' अर्थात पन्द्रह दिनों तक निरंतर भयंकर संग्राम होना यह प्रमाणित करता है कि दोनों ही योद्धा पराक्रम की पराकाष्ठा पर थे। 'शरीर का छलनी होना' उनके द्वारा झेली गई शारीरिक पीड़ा और उनके अदम्य साहस को दर्शाता है। गुरु और शिष्य होने के नाते, दोनों एक-दूसरे की रणनीतियों और कमियों से भली-भाँति परिचित थे, इसलिए 'युद्ध-विराम की भूमिका' नहीं बन पा रही थी।
यह युद्ध केवल बल का नहीं, बल्कि 'रणनीति' (Strategy) का भी था। दोनों ही धर्म-युद्ध कर रहे थे, जिसका अर्थ है कि वे किसी भी छल-कपट का सहारा नहीं ले रहे थे। जब दो समान शक्तिशाली और नीतिवान योद्धा आपस में टकराते हैं, तो परिणाम अनिश्चित हो जाता है। पन्द्रह दिन बीतने के बाद भी उनका उत्साह कम नहीं हुआ, यह उनकी योग-शक्ति और क्षत्रिय तेज का प्रभाव था। लेखक ने 'कल की बात है' कहकर युद्ध की निरंतरता और उसमें व्याप्त तन्मयता को व्यक्त किया है। यह अंश यह संदेश देता है कि जब उद्देश्य पवित्र हो और योद्धा न्यायप्रिय हो, तो संघर्ष लंबा और कष्टकारी हो सकता है, किंतु वह कभी अपनी मर्यादा से नहीं गिरता। परशुराम और भीष्म का यह युद्ध संसार को यह सिखाता है कि वीरता का अर्थ केवल शत्रु का नाश करना नहीं, बल्कि युद्ध के नियमों पर अडिग रहना भी है। उनकी समानता ने युद्ध को एक शाश्वत द्वंद्व में बदल दिया था। यह विशदीकरण स्पष्ट करता है कि धर्म के लिए किया गया संघर्ष कभी निष्फल नहीं होता, भले ही वह तत्काल परिणाम न दे।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'भीष्म और परशुराम का संग्राम' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : युद्ध के चरमोत्कर्ष पर व्याप्त हताशा और गतिरोध का सूक्ष्म चित्रण।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : पाठ के इस अंश में युद्ध की उस भयावहता और जटिलता को उकेरा गया है जहाँ दोनों योद्धा 'प्राण लेने को आतुर' हो गए थे। सत्रहवें और अठारहवें दिन का युद्ध भावनाओं और शस्त्रों का महासंग्राम था। यद्यपि दोनों के मन में 'युद्धविराम' की अभिलाषा जाग्रत हो रही थी, किंतु उनका 'क्षत्रिय स्वाभिमान' और 'गुरु का मान' उन्हें पहल करने से रोक रहा था। यह एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है जहाँ योद्धा अपनी थकान और विनाश को समझता है, किंतु अहंकार या मर्यादा के कारण पीछे हटने को 'कायरता' मानता है।
'पासा किसके पक्ष में गिरेगा' कहना यह दर्शाता है कि युद्ध अब अनिश्चितता के दौर में था। परशुराम द्वारा 'अमोघ-बाण' का संधान करना यह बताता है कि वे अब युद्ध को समाप्त करना चाहते थे। किंतु, 'अस्तंगधित सूर्य' (डूबते हुए सूर्य) ने नियति की भांति हस्तक्षेप किया। परशुराम का यह कहना कि 'आज सूर्य ने तुम्हें बचा लिया', उनके भीतर के योद्धा के असंतोष और भीष्म के प्रति उनकी चुनौती को व्यक्त करता है। भीष्म का 'क्रोध के मारे कुछ न बोल पाना' उनकी विवशता और रण-क्षेत्र की गर्मी को दर्शाता है। दो और दिनों का 'असफल प्रयास' यह सिद्ध करता है कि जब दो अजेय शक्तियाँ टकराती हैं, तो केवल समय और नियति ही उनका फैसला कर सकती है। लेखक ने यहाँ युद्ध के उस थकान भरे पक्ष को भी दिखाया है जहाँ वीरता तो है, किंतु परिणाम शून्य है। यह गतिरोध केवल शारीरिक नहीं, बल्कि वैचारिक भी था, क्योंकि भीष्म गुरु को नहीं मारना चाहते थे और परशुराम शिष्य के हाथों पराजित नहीं होना चाहते थे। यह अंश स्पष्ट करता है कि अत्यधिक शक्ति कई बार शांति की स्थापना में बाधक बन जाती है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'भीष्म और परशुराम का संग्राम' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : भीष्म के स्वप्न के माध्यम से ईश्वरीय रहस्य और 'प्रस्वाप' अस्त्र की प्राप्ति का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने यहाँ कहानी में एक 'दैवीय मोड़' (Divine Intervention) दिया है। बीस दिनों के संघर्ष के बाद जब भीष्म अत्यंत व्यथित होकर पितरों की शरण में जाते हैं, तब उन्हें उनके वास्तविक स्वरूप का ज्ञान कराया जाता है। 'चतुर्दिक प्रकाश का फैलना' एक सात्विक और ईश्वरीय वातावरण का प्रतीक है। भीष्म को यह बोध कराना कि वे पूर्वजन्म के 'प्रभास वसु' हैं, उनके भीतर के आत्म-विश्वास को जाग्रत करता है।
यह अंश एक महत्वपूर्ण दार्शनिक तथ्य को उजागर करता है—परशुराम का 'विष्णु अवतार' होना। जब योद्धा को यह पता चलता है कि उसका प्रतिद्वंद्वी साक्षात् ईश्वर है, तो उसका द्वंद्व शांत हो जाता है। दिव्यात्मा ने स्पष्ट किया कि परशुराम 'अवध्य' हैं, और भीष्म भी उनके हाथों नहीं मारे जा सकते क्योंकि उन्हें 'इच्छा-मृत्यु' का वरदान प्राप्त है। 'प्रस्वाप' (सुलाने वाला) अस्त्र की प्राप्ति इस युद्ध के समाधान की कुंजी है। इसका उद्देश्य परशुराम को मारना नहीं, बल्कि उन्हें 'निद्रा' के वश में कर युद्ध को रोकना था। 'दबाव बनाना' यहाँ राजनीतिक और सामरिक बुद्धिमत्ता का परिचायक है। लेखक यह संदेश देते हैं कि जब बाहुबल असफल हो जाता है, तब 'प्रज्ञा' और 'दिव्य ज्ञान' ही मार्ग दिखाते हैं। भीष्म को पूर्वजन्म का ज्ञान होना यह सिद्ध करता है कि हमारे वर्तमान संघर्ष हमारे अतीत के कर्मों और शापों से जुड़े होते हैं। यह स्वप्न-दृश्य भीष्म के लिए केवल एक अस्त्र की प्राप्ति नहीं था, बल्कि उनके जीवन के उद्देश्य की स्पष्टता थी। यहाँ से युद्ध का रुख बदल जाता है और संहार के स्थान पर 'समर्पण' और 'मर्यादा' की स्थापना की भूमिका तैयार होती है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'भीष्म और परशुराम का संग्राम' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : युद्ध का शांतिपूर्ण समापन और पितरों के माध्यम से गुरु-शिष्य के मान की रक्षा।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक ने यहाँ युद्ध के 'तर्कसंगत अंत' का वर्णन किया है। भीष्म और परशुराम दोनों को ही अलग-अलग माध्यमों से यह ज्ञात हो गया था कि इस युद्ध का कोई संहारक परिणाम नहीं निकल सकता। भीष्म ने 'प्रस्वाप' अस्त्र का प्रयोग किया, जो शस्त्र विद्या के 'सम्बरण' (रोकने) वाले पक्ष को दर्शाता है। परशुराम का चक्कर खाकर घूमना उनके मानवीय शरीर की सीमाओं को दिखाता है, भले ही वे ईश्वरीय अवतार थे।
'पितृगणों का आकाशमार्ग से प्रकट होना' भारतीय संस्कृति की उस मान्यता को पुष्ट करता है जहाँ पूर्वजों का आशीर्वाद और निर्देश संकट के समय मार्गदर्शक बनते हैं। पितरों ने दोनों योद्धाओं को याद दिलाया कि वे एक ही कुल और मर्यादा के अंग हैं। देवताओं और पितरों का हस्तक्षेप यह सिद्ध करता है कि जब संसार के विनाश की स्थिति आती है, तो दिव्य शक्तियों को प्रकट होना पड़ता है। भीष्म द्वारा गुरु को 'करबद्ध प्रणाम' करना उनके अटूट शिष्य-धर्म का प्रमाण है। युद्ध हार-जीत के बिना समाप्त हुआ, किंतु नैतिकता की जीत हुई। भीष्म हस्तिनापुर लौटे, किंतु उनके मन में गुरु के प्रति कोई द्वेष नहीं था। यह समापन एक 'धर्म-युद्ध' का आदर्श अंत है, जहाँ अस्त्रों पर 'विवेक' की विजय होती है। लेखक यहाँ यह स्पष्ट करते हैं कि गुरु और शिष्य का संबंध किसी भी प्रतिज्ञा या प्रतिशोध से ऊपर होता है। युद्ध-विराम का यह निर्णय केवल एक संधि नहीं थी, बल्कि यह भविष्य के महायुद्ध (महाभारत) के लिए भीष्म को सुरक्षित रखने की नियति की योजना थी। यह अंश पाठकों को सिखाता है कि कई बार पीछे हटना भी महानता का परिचायक होता है, यदि वह धर्म और बड़ों के सम्मान के लिए किया जाए।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'भीष्म और परशुराम का संग्राम' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : अम्बा के पुनर्जन्म (शिखण्डी) और उसके मन में दबे 'प्रतिशोध' के रहस्योद्घाटन का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : यह अंश पूरे पाठ का वैचारिक निष्कर्ष है। लेखक ने यहाँ 'प्रतिशोध' की उस निरंतरता को दिखाया है जो मृत्यु के बाद भी समाप्त नहीं होती। अम्बा ने जब देखा कि परशुराम भी भीष्म को नहीं मार सके, तो उसने स्वयं अपनी नियति चुनने का निर्णय लिया। राजा द्रुपद के यहाँ 'शिखण्डी' के रूप में जन्म लेना केवल एक संयोग नहीं, बल्कि अम्बा की वर्षों की तपस्या और आहुति का परिणाम था। शिखण्डी के भीतर जो 'प्रतिशोध मूर्तमान' होकर करवट बदलता रहता है, वह अम्बा की वही पुरानी पीड़ा है जो स्वयंवर से शुरू हुई थी।
द्रुपद द्वारा माला को 'परिहास' में टालना और अम्बा का 'प्राणोत्सर्ग' करना यह दर्शाता है कि एक पीड़ित स्त्री के लिए न्याय की लड़ाई कितनी एकाकी और कठिन होती है। शिखण्डी का अपनी पत्नी को यह रहस्य बताना उस मनोवैज्ञानिक दबाव को स्पष्ट करता है जिसे वह अपनी आत्मा में लेकर चल रहा था। 'अनचाहे में स्वप्नावस्था में प्रस्फुटित होना' यह सिद्ध करता है कि दमित भावनाएं (Suppressed Emotions) अंततः प्रकट होकर ही रहती हैं। शिखण्डी का भीष्म-वध के लिए 'सचेष्ट' रहना महाभारत की उस घटना की पूर्वपीठिका है जहाँ वह भीष्म के सामने खड़ा होता है और भीष्म अपनी अस्त्र-शस्त्र त्याग देते हैं। लेखक यहाँ यह गहरा संदेश देते हैं कि अन्याय का फल भविष्य में किसी न किसी रूप में अवश्य भुगतना पड़ता है। भीष्म के अपराजेय होने के बावजूद, अम्बा का संकल्प उनके अंत का कारण बना। यह विशदीकरण स्पष्ट करता है कि शिखण्डी का चरित्र केवल एक पात्र नहीं, बल्कि भीष्म के पुराने कर्मों का जीता-जागता हिसाब है। प्रतिशोध की यह अग्नि जो अम्बा ने जलाई थी, वह शिखण्डी के माध्यम से कुरुक्षेत्र की रणभूमि में भीष्म के शांत होने तक प्रज्वलित रही।
