प्रस्तुत लेख में डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय द्वारा संपादित पुस्तक 'प्रतिशोध' के आठवें अध्याय 'सृंजय और परशुराम' का सर्वांगीण विश्लेषण है। इसमें अम्बा के दुखों का अंत करने हेतु भगवान परशुराम का भीष्म को युद्ध की चुनौती देने का रोमांचक वर्णन चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल' द्वारा प्रस्तुत किया गया है।
१. मूल पाठ
अमावस्या के पावन पर्व पर अपनी नियत समय से भगवान परशुराम ने उस आश्रम को सनाथ किया, जहाँ अम्बा अपने के नाना सृंजय के साथ निवास कर रही थी। भार्गव के अभिन्न सखा अकृतव्रण ने उनका सम्मान किया। आसन, अर्घ्य देकर श्रद्धापूर्वक उनकी आरती उतारी। सभी लोग यथोचित आसन पर विराजमान हुए। कुशल-मंगल के क्रम में एक राजकुमारी को देखकर भार्गव की दृष्टि कुतूहल प्रकट करने लगी। इस पर राजर्षि सृंजय ने भगवान को प्रणाम करके कहना शुरू किया-
हे त्रिभुवनविख्यात भगवान भार्गव! यह मेरी दौहित्री अम्बा है। यह अत्यन्त विपदा की मारी है। प्राणोत्सर्ग का निश्चय करके यह जंगल में भटक रही थी। मैंने इसका वही परिचय प्राप्त किया। इसी क्रम में मुझे ज्ञात हुआ कि यह मेरी दौहित्री है। इसीलिए इसके प्राणों की रक्षा के लिए अपने साथ लाकर आपकी कृपा का भाजन बनाना चाहता हूँ। इसका कल्याण करके प्रभु मुझे कृत-कार्य करें। मैं आजीवन आपका ऋणी रहूँगा। अपनी करुण कथा यह स्वयं आपसे कहेगी। इसके पश्चात स्वयं अम्बा ने हाथ जोड़कर प्रभु के श्री चरणों में अपना शीश नवाया। अश्रुपात करते हुए उसने अपना कारूणिक वृत्तात्त सुनाना प्रारम्भ किया- नाथ! काशिराज की तीन कन्याओं का एक ही साथ स्वयंवर आयोजित था। मैं ज्येष्ठ राजकुमारी अम्बा हूँ। स्वयंवर-सभा में देशभर से राजा एवं राजकुमार पधारे थे। स्वयंवर की कार्यवाही प्रारम्भ हो चुकी थी। हम तीनों बहिने हाथ में जयमाल लेकर सभा में उपस्थित हुई। बन्दीजन, राजाओं की विरुदावली सहित वंश- परंपरा का परिचय दे रहे थे। कुछ ही समय बीता कि इतने में गंगापुत्र महारथी भीष्म का ओजमय स्वर उद्घोषित हुआ- उपस्थित राजसमूह एवं महाराज काशिराज! मैं शान्तनुपुत्र भीष्म आप सभी के सामने इन तीनों का अपहरण कर रहा हूँ। जिसमें साहस हो युद्धभूमि में मुझे परास्त कर इन्हें वापस ले सकता है। यह कहकर अविलम्ब ही हम तीनों को बलपूर्वक अपने रथ में बैठाकर वे हस्तिनापुर की ओर वायुवेग से चल पड़े। उपस्थित राजाओं का साहस नहीं हुआ कि महाप्रतापी भीष्म से हमलोगों का कोई उद्धार करा सके।
असहाय हम तीनों भीष्म के साथ पथिक बन गयीं। भीष्म की सदय दृष्टि से मेरा मन कुछ कहने को व्यग्र हो उठा। मैंने अनुनयपूर्वक कहा-महाराज आप नीतिज्ञ धर्मात्मा हैं। आप मेरी बातें ध्यानपूर्वक सुनकर उचित परामर्श हैं। मैं मन ही मन मद नरेश ‘शाल्व' से प्रेम करने लगी हूँ और वह भी मुझे स्निग्ध दृष्टि से देख रहा था। आप ही बताइये कि पर-पुरुष में अनुरक्त स्त्री को भला कोई अपनी भार्या बना सकता है? मेरी बात सुनकर उन्होंने कहा कि मैं तो आजीवन ब्रह्मचारी रहने का व्रती हूँ। अपने भाई के लिए तुम लोगों को ले चल रहा हूँ। अगर तुम शाल्व से सचमुच प्रेम करती हो तो मैं तुम्हें सम्मानपूर्वक वहाँ भेजवा दूंगा। गंगापुत्र ने मुझे आदर के साथ मद्राधिप के पास भेज दिया। मैं जब वहाँ पहुँची तो शाल्व ने मेरा अभिनन्दन नहीं किया और मुझे स्वीकार करने से साफ मना कर दिया।
सम्प्रति निराश्रित होकर मरने का निश्चय करके वनभूमि में विचरण कर रही थी कि कोई हिंसक जीव मुझे अपना भोज्य बना ले। यहाँ किसी हिंसक जीव ने मेरी तरफ देखा तक नहीं। मैं हैरान थी। मुझे तपोवन एवं इसका प्रभाव ज्ञात नहीं था। इसी बीच नाना जी ने मुझे आपका दर्शन सुलभ करा दिया। मैं आपकी शरण में हूँ। अब आपही मेरा उद्धार कर सकते हैं। यह कहकर वह विलख पड़ी।
अम्बा की बात सुनकर करुणावरुणालय भगवान भार्गव पिघल गये। उन्होंने अम्बा को आश्वस्त करते हुए कहा कि जो कहो, मैं वही करने को प्रस्तुत हुँ । शाल्व भी मेरा कहा नहीं टाल सकता और भीष्म तो मेरा शिष्य हैं। तुम कहाँ जाना चाहती हो? अम्बा ने कहा- भगवन, मुझे शाल्व निरपराध जान पड़ता है। मेरे जीवन की बर्बादी भीष्म ने की है। अतः मैं अब उसी के पास जाना चाहती हूँ। भगवान परशुराम ने भीष्म के पास चलने की तैयारी करने को कह कर रात्रिकालीन विश्राम किया।
ब्राह्म-मुहूर्त में उठकर सन्ध्यादिक क्रिया सम्पन्न करके ऋषि-मुनियों के वध अम्बा को लेकर भगवान भार्गव कुरुक्षेत्र के मैदान में डेरा डालकर भीष्म के पास सन्देश भेजवा दिया। गुरु का आगमन सुनकर अत्यन्त प्रेमपूर्वक आकर भीष्म ने आगवानी की और अपनी श्रद्धा-भक्ति से गुरु का आशीर्वाद प्राप्त किया। कुशलान्तर परशुराम ने कहा-गंगापुत्र! तुम्हारी भक्ति से मैंअत्यन्त प्रसन्न हूँ। मैं जानता हूँ कि तुमने जीवनभर ब्रह्मचर्य व्रत की दीक्षा ली है। मैं तुम्हारा गुरु हूँ। मेरे आदेश से तुम्हें व्रतभङ्ग का दोष नहीं लगेगा। अत: मेरे आदेश से तुम अम्बा से शादी कर लो। इसे सुनकर भीष्म चौंक पडे। विनम्र होकर उन्होंने कहा—गुरुवर मुझे ऐसा आदेश न दें जिसे मैं पूरा न कर सकें। मैंने उस समय यह नहीं कहा था कि गुरु के आदेश से मैं विवाह कर सर्केगा। भीष्म का उत्तर सुनकर परशुराम ने कहा- जानते हो मेरा आदेश न मानकर तुमने अपने मृत्यु को निमन्त्रण दिया है। अब मेरे साथ युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। गुरुदेव, मैं आपसे युद्ध नहीं कर सकता। चाहे मेरे ऊपर अपने परशु का प्रहार करके मेरे प्राण आप ले लें। मुझे तनिक भी आपत्ति नहीं है। इस पर परशुराम ने धिक्कारते हुए कहा-तुम मेरे शिष्य हो। मैंने तुम्हें अशेष धनुर्वेदीय ज्ञान दिया है। तुम्हारे मुख से यह कायरता की बात मैं नहीं सुन सकता। उठो युद्ध की तैयारी करो। भीष्म ने कहा आपका आदेश शिरोधार्य है। आप भी आरामपूर्वक विश्राम करें। पुनः कल युद्ध-भूमि में आपका दर्शन करूंगा। यह कहकर परशुराम के साथ आये अतिथियों का सम्मानपूर्वक प्रबन्ध-व्यवस्था सुनिश्चित करके भीष्म राजमहल की ओर प्रस्थान कर गये। परशुराम ने भी सन्ध्या वन्दनादि करके वह रात्रि कुरुक्षेत्र में ही व्यतीत की।
२. कठिन शब्दार्थ
३. सारांश
पाठ 'सृंजय और परशुराम' प्रतिशोध की उस ज्वाला का वर्णन करता है जो सामाजिक मर्यादाओं और व्यक्तिगत वचनों के टकराव से उत्पन्न होती है। कहानी राजर्षि सृंजय के आश्रम से शुरू होती है, जहाँ अमावस्या के पावन अवसर पर भगवान परशुराम का आगमन होता है। वहाँ सृंजय अपनी नातिन अम्बा का परिचय कराते हैं, जो भीष्म के अपहरण और शाल्व के तिरस्कार के कारण दर-दर भटक रही थी। अम्बा अपनी करुण कथा सुनाते हुए बताती है कि कैसे भीष्म ने उसके स्वयंवर से बलपूर्वक उसका अपहरण किया और बाद में शाल्व ने उसे 'पर-पुरुष द्वारा अपहृत' मानकर अस्वीकार कर दिया।
अम्बा की व्यथा सुनकर करुणावतार परशुराम द्रवित हो उठते हैं। अम्बा भीष्म को ही अपनी बर्बादी का मुख्य कारण मानती है और उनके पास ही जाने की इच्छा प्रकट करती है। परशुराम अम्बा को लेकर कुरुक्षेत्र पहुँचते हैं और अपने शिष्य भीष्म को बुलवाते हैं। गुरु परशुराम भीष्म को आदेश देते हैं कि वे अम्बा से विवाह कर लें, क्योंकि गुरु के आदेश से उन्हें 'व्रत-भंग' का दोष नहीं लगेगा। किंतु भीष्म अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहते हुए गुरु की आज्ञा मानने से विनम्रतापूर्वक इनकार कर देते हैं। शिष्य की इस हठ से क्रुद्ध होकर परशुराम उसे युद्ध की चुनौती देते हैं। भीष्म गुरु पर अस्त्र उठाने में संकोच करते हैं, किंतु परशुराम उन्हें 'कायरता' का उलाहना देकर युद्ध के लिए विवश कर देते हैं। अंततः, गुरु और शिष्य के बीच एक धर्म-युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार होती है, जहाँ एक ओर प्रतिज्ञा की मर्यादा है और दूसरी ओर गुरु की आज्ञा। यह पाठ नारी के सम्मान की रक्षा और अडिग सिद्धांतों के बीच होने वाले भीषण संघर्ष को रेखांकित करता है।
४. महत्वपूर्ण अंशों का संक्षेपीकरण (बोल्ड अंश)
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'सृंजय और परशुराम' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : राजर्षि सृंजय द्वारा भगवान परशुराम से अम्बा का परिचय और उसकी रक्षा हेतु विनती।
संक्षेपीकरण : सृंजय ने परशुराम को बताया कि अम्बा उनकी नातिन है, जो अत्यधिक विपत्ति के कारण प्राण त्यागने वन में आई थी। उन्होंने अम्बा के कल्याण हेतु परशुराम से कृपा की प्रार्थना की।
संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय कृत 'प्रतिशोध' के आठवें अध्याय से।
प्रसंग : अम्बा द्वारा अपने स्वयंवर से अपहरण की घटना का वर्णन।
संक्षेपीकरण : अम्बा ने रोते हुए बताया कि उसके स्वयंवर के समय भीष्म ने अचानक पहुँचकर उसे और उसकी बहनों को बलपूर्वक अपहृत कर लिया और वहां उपस्थित समस्त राजाओं को युद्ध की चुनौती दी।
संदर्भ : 'प्रतिशोध' पुस्तक के 'सृंजय और परशुराम' पाठ से।
प्रसंग : अम्बा का भीष्म को अपने प्रेम के बारे में बताना और भीष्म का उत्तर।
संक्षेपीकरण : अम्बा ने भीष्म से शाल्व के प्रति अपने अनुराग की बात कही, जिस पर भीष्म ने अपने ब्रह्मचर्य व्रत का हवाला देते हुए उसे आदरपूर्वक शाल्व के पास भेजने का आश्वासन दिया।
संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय रचित 'प्रतिशोध' के आठवें पाठ से।
प्रसंग : अम्बा की पीड़ा देख परशुराम का द्रवित होना और न्याय का संकल्प।
संक्षेपीकरण : परशुराम अम्बा की व्यथा देख पिघल गए और उन्होंने भीष्म से वार्ता कर अम्बा के जीवन को संवारने का निश्चय किया, जिसके लिए वे भीष्म के पास जाने को तैयार हुए।
संदर्भ : 'प्रतिशोध' के आठवें अध्याय 'सृंजय और परशुराम' से।
प्रसंग : भीष्म द्वारा विवाह से इनकार और परशुराम द्वारा युद्ध की चुनौती।
संक्षेपीकरण : भीष्म के इनकार पर परशुराम ने उन्हें युद्ध के लिए ललकारा। भीष्म ने पहले संकोच किया, किंतु गुरु द्वारा कायरता का उलाहना देने पर उन्होंने युद्ध स्वीकार कर लिया।
५. विस्तृत विशदीकरण (भाव-पल्लवन)
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के सृंजय और परशुराम नामक पाठ से लिया गया है इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : राजर्षि सृंजय का परशुराम के प्रति समर्पण और अपनी नातिन के प्रति उनकी चिंता का मार्मिक चित्रण।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने यहाँ एक नाना (सृंजय) की पीड़ा और एक ऋषि (परशुराम) की सामर्थ्य के बीच के सेतु को दिखाया है। सृंजय राजर्षि हैं, किंतु अम्बा की दशा देख वे केवल एक भावुक वृद्ध परिजन रह जाते हैं। 'त्रिभुवनविख्यात' संबोधन परशुराम की उस अलौकिक शक्ति की ओर संकेत करता है, जो असंभव को संभव कर सकती है। सृंजय का यह कहना कि अम्बा 'विपदा की मारी' है, उस सामाजिक तिरस्कार की ओर इशारा है जिसने एक राजकुमारी को वन-वन भटकने पर मजबूर कर दिया।
अम्बा का 'प्राणोत्सर्ग' का निश्चय यह दर्शाता है कि एक स्त्री के लिए सम्मानहीन जीवन मृत्यु से भी अधिक कष्टकारी है। सृंजय यहाँ परशुराम के 'भक्तवत्सल' स्वरूप का आवाहन करते हैं। वे जानते हैं कि यदि परशुराम का हाथ अम्बा के सिर पर पड़ जाए, तो उसका कल्याण निश्चित है। 'कृत-कार्य होना' और 'आजीवन ऋणी रहना' सृंजय की कृतज्ञता को प्रकट करता है। यह अंश स्पष्ट करता है कि प्राचीन काल में महापुरुष ही समाज के अंतिम संबल होते थे। एक नाना का अपनी नातिन को लेकर किसी सिद्ध पुरुष के पास जाना, पितृसत्तात्मक समाज में एक असहाय नारी के लिए सुरक्षा और न्याय की खोज है। सृंजय का यह व्यवहार हमें सिखाता है कि संकट के समय अपनों का साथ देना और उन्हें सही मार्गदर्शन देना ही वास्तविक धर्म है। परशुराम के सामने अम्बा को प्रस्तुत करना, वास्तव में न्याय की अदालत में एक याचिका दायर करने के समान है। लेखक ने यहाँ मानवीय संबंधों की कोमलता और ऋषि परंपरा के प्रति अटूट विश्वास को बड़ी ही गहराई से उकेरा है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के सृंजय और परशुराम नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : अम्बा द्वारा अपने स्वयंवर की त्रासदी और भीष्म के उद्दंड पौरुष का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक ने यहाँ अम्बा के माध्यम से उस ऐतिहासिक घटना का पुनर्स्मरण किया है जिसने महाभारत के बीज बोए थे। अम्बा का 'अश्रुपात' करना उसके हृदय की उस गहरी चोट को दिखाता है, जो उसे भीष्म ने दी थी। स्वयंवर की खुशी और जयमाला की तैयारी के बीच भीष्म का अचानक प्रकट होना नियति के एक भयानक क्रूर मजाक की तरह था। भीष्म का 'ओजमय स्वर' और उनकी घोषणा केवल अपहरण नहीं, बल्कि समस्त क्षत्रिय समाज को दी गई एक खुली चुनौती थी।
'शाश्वत सत्य' और 'ब्रह्मचर्य' के प्रतीक भीष्म यहाँ एक ऐसी भूमिका में हैं जो नारी की इच्छाओं का अनादर करती है। 'बलपूर्वक रथ में बैठाना' उस काल की 'राक्षस विवाह' परंपरा का प्रतीक है, जहाँ शक्ति ही सर्वोपरि थी। अम्बा का यह वृत्तांत यह सिद्ध करता है कि भीष्म ने अपने कुल (कुरु वंश) की मर्यादा के लिए अम्बा के व्यक्तिगत अधिकारों को कुचल दिया था। उपस्थित राजाओं का 'साहस न होना' भीष्म के अपराजेय व्यक्तित्व को दर्शाता है, किंतु साथ ही वह उस समाज की कायरता पर भी प्रहार करता है जो अपनी आँखों के सामने एक नारी का अपमान होते देख भी मौन रहा। अम्बा का यह कथन कि 'वायुवेग से चल पड़े' उसकी विवशता और भीष्म के अदम्य वेग को स्पष्ट करता है। यह अंश नारी के वस्तुकरण और पुरुष के अहंकार के बीच के अंतर्संबंधों को उजागर करता है। अम्बा का विलाप केवल व्यक्तिगत दुख नहीं है, बल्कि वह उन सभी स्त्रियों की आवाज है जिनकी मर्जी के बिना उनके जीवन के फैसले पुरुष प्रधान समाज की तथाकथित 'वीरता' के नाम पर कर दिए जाते हैं।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के सृंजय और परशुराम नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : अम्बा का भीष्म को अपने प्रेम से अवगत कराना और भीष्म के धर्म-संकट तथा उदारता का चित्रण।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : यह गद्यांश अम्बा के साहस और भीष्म की धर्मनिष्ठा के बीच के संवाद को प्रस्तुत करता है। अपहरण के बाद भी अम्बा ने हार नहीं मानी और 'नीतिज्ञ धर्मात्मा' कहकर भीष्म के विवेक को जगाने का प्रयास किया। अम्बा का शाल्व के प्रति अपने प्रेम को स्वीकार करना उस समय के समाज में एक अत्यंत क्रांतिकारी कदम था। उसने तार्किक प्रश्न किया कि 'पर-पुरुष में अनुरक्त' स्त्री को कोई कैसे स्वीकार कर सकता है? यह प्रश्न भीष्म की उस योजना पर प्रहार था जिसमें वे अम्बा को अपने भाई (विचित्रवीर्य) की पत्नी बनाना चाहते थे।
भीष्म का उत्तर उनके महान चरित्र की पुष्टि करता है। वे क्रूर नहीं थे, बल्कि कर्तव्य के वश में थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे स्वयं विवाह नहीं कर सकते क्योंकि वे 'ब्रह्मचारी' हैं। भीष्म की 'सम्मानपूर्वक वहाँ भेजना' की बात उनकी नैतिकता को दर्शाती है। किंतु, लेखक यहाँ यह भी संकेत देते हैं कि भीष्म ने अम्बा की भावनाओं का सम्मान तो किया, किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। समाज और शाल्व की नजर में अम्बा 'अपहृत' हो चुकी थी। भीष्म की यह उदारता अम्बा के लिए वरदान बनने के बजाय एक और त्रासदी का कारण बनी। यह अंश दिखाता है कि केवल नीति और धर्म के नियम पर्याप्त नहीं होते; समय और सामाजिक दृष्टिकोण भी महत्वपूर्ण होते हैं। भीष्म का निर्णय यद्यपि न्यायपूर्ण था, किंतु उसने अम्बा के जीवन में जो अस्थिरता पैदा कर दी, उसका कोई समाधान उनके पास नहीं था। यह संवाद स्त्री की अस्मिता और पुरुष की प्रतिज्ञा के बीच के उस जटिल जाल को बुनता है, जिसमें अंततः स्त्री ही पीसती है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के सृंजय और परशुराम नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : परशुराम का करुणा भाव और अम्बा को न्याय दिलाने का दृढ़ संकल्प।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक ने यहाँ परशुराम के चरित्र के एक अत्यंत कोमल पक्ष 'करुणावरुणालय' (करुणा के सागर) को उजागर किया है। जिन्हें विश्व 'प्रलयंकर' के रूप में जानता था, वे एक असहाय नारी के आँसुओं से पिघल गए। यह सिद्ध करता है कि वास्तविक शक्ति वही है जिसमें दया का वास हो। परशुराम का अम्बा को 'आश्वस्त' करना उसकी आधी पीड़ा को समाप्त कर देता है। उनका यह आत्मविश्वास कि 'शाल्व भी मेरा कहा नहीं टाल सकता' और 'भीष्म तो मेरा शिष्य है', उनके विराट व्यक्तित्व और प्रभाव को दर्शाता है।
वे केवल शस्त्र के नहीं, बल्कि संबंधों और अधिकारों के भी स्वामी हैं। परशुराम का यह निर्णय कि वे स्वयं भीष्म के पास चलेंगे, एक महान गुरु की गरिमा को बढ़ाता है जो अपने शिष्य की गलती को सुधारने का बीड़ा उठाता है। 'रात्रिकालीन विश्राम' केवल शारीरिक थकान मिटाने के लिए नहीं, बल्कि उस धर्म-युद्ध की मानसिक तैयारी का समय है जो आने वाला था। परशुराम यहाँ न्याय के देवता के रूप में उभरते हैं। वे जानते हैं कि भीष्म को समझाना सरल नहीं होगा, किंतु वे अम्बा के सम्मान के लिए अपनी गरिमा को दांव पर लगाने को तैयार हैं। यह अंश नारी की पीड़ा के प्रति ऋषि समाज की संवेदनशीलता को दर्शाता है। यह पाठ हमें सिखाता है कि जब समाज के रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तब ईश्वर या महापुरुषों का हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है। परशुराम का संकल्प अम्बा की उस 'प्रतिशोध' की अग्नि का पहला प्रज्वलन है, जो भीष्म के अंत तक नहीं बुझेगी।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के सृंजय और परशुराम नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : गुरु-शिष्य के मध्य प्रतिज्ञा और मर्यादा का भीषण टकराव तथा युद्ध का निश्चय।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने यहाँ साहित्य के सबसे महान द्वंद्वों में से एक का चित्रण किया है। एक ओर गुरु परशुराम का 'आदेश' है और दूसरी ओर शिष्य भीष्म की 'प्रतिज्ञा'। परशुराम का यह कहना कि 'मृत्यु को निमंत्रण दिया है', केवल धमकी नहीं बल्कि न्याय की कठोर घोषणा है। भीष्म का संकोच—'मैं आपसे युद्ध नहीं कर सकता'—एक आदर्श शिष्य की विनम्रता है, किंतु परशुराम इसे 'कायरता' मानकर धिक्कारते हैं। परशुराम का तर्क है कि जिस शिष्य को उन्होंने 'अशेष धनुर्वेदीय ज्ञान' दिया, वह शस्त्र चलाने से कैसे पीछे हट सकता है?
गुरु के लिए शिष्य की शस्त्र-विमुखता सबसे बड़ा अपमान है। परशुराम यहाँ भीष्म को उनके क्षत्रिय धर्म और शिष्य धर्म की याद दिलाते हैं। 'उठो युद्ध की तैयारी करो' यह वाक्य उस शांतिपूर्ण वार्ता के अंत और सशस्त्र संघर्ष के आरंभ का प्रतीक है। भीष्म का उत्तर—'आपका आदेश शिरोधार्य है'—यह दिखाता है कि भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ी, बल्कि गुरु की आज्ञा मानकर युद्ध स्वीकार कर लिया। भीष्म का यह निर्णय कि वे कल युद्ध-भूमि में मिलेंगे, एक महान योद्धा की शालीनता को दर्शाता है जो युद्ध के मैदान में भी मर्यादा को नहीं भूलता। यह अंश स्पष्ट करता है कि जब सत्य के दो स्वरूप (प्रतिज्ञा और न्याय) आपस में टकराते हैं, तो उसका समाधान केवल संघर्ष से ही संभव होता है। परशुराम और भीष्म का यह युद्ध केवल दो योद्धाओं का युद्ध नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं का महासंग्राम है। लेखक ने यहाँ गुरु के तेज और शिष्य के धैर्य का जो अद्भुत संतुलन दिखाया है, वह भारतीय संस्कृति के महान मूल्यों की व्याख्या करता है। कुरुक्षेत्र की वह रात्रि उस महायुद्ध की पूर्व-संध्या थी जिसने इतिहास की दिशा बदल दी।
