प्रस्तुत लेख में डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय द्वारा संपादित पुस्तक 'प्रतिशोध' के सातवें अध्याय 'कश्यप और परशुराम' का सर्वांगीण विश्लेषण है। इसमें भगवान परशुराम के दानवीर स्वरूप, द्रोणाचार्य को शस्त्र शिक्षा और महर्षि कश्यप को पृथ्वी दान करने की कथा चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल' द्वारा प्रस्तुत की गई है।
१. मूल पाठ
पृथ्वी के जाने पर बालक की चंचल वृत्ति को भगवान ने प्रलयंकर भाव में परिवर्तित कर दिया। उस बालक की देखभाल करते हुए परशुराम भक्तवत्सल बन गए। उस अबोध की गलतियों को बालक जानकर कभी ध्यान नहीं देते। वह अनुदिन कुछ न कुछ उत्पात करता रहता। आश्रम में रखे आयुध-भणडार को अनुदिन तोड़-फोड़कर विनष्ट करता हुआ यह बालक सचमुच ही शरारती बन गया, परन्तु भार्गव वचनबद्ध थे। अतः उसने सम्पूर्ण आयुध राशि विनष्ट कर डाली। पृथ्वी अपना उद्देश्य पूर्ण देखकर अपने उस चंचल बालक को लेने उपस्थित हो गई। उसने कृतज्ञतापूर्वक प्राणिपात करते हुए अपने तीर्थाटन के समापन की बात कही। उसने कहा भगवन्! मैं कृत-कार्य हुई। इस बालक की धृष्टता के लिए मैं पुनः पुनः क्षमा प्रार्थी हूँ। कृपया मुझे जाने की अनुमति प्रदान करें। तथास्तु कहते हुए भृगुकुलावतंश शिरोमणि ने उसे विदा किया। वही बालक लक्ष्मण था।
उस बालक के जाने पर भगवान भार्गव का मन नहीं लगता था। उन्होंने घोषणा की कि कोई भी ब्राह्मण दान लेना चाहता है तो उसकी इच्छा अवश्य पूरी की जाएगी। इसके पश्चात सत्पात्र ब्राह्मणों ने आकर इच्छित दान प्राप्त किया। सम्पूर्ण सम्पत्ति को विपुल ब्राम्हणों में दान कर भार्गव निश्चिंत हो गए। इनकी दानशीलता सुनकर भारद्वाज के पुत्र आचार्य द्रोण भी भगवान परशुराम के पास आए। उन्हें देखकर स्नेहपूर्वक भृगुवंशमणि बोले- आचार्य! देर से पहुँचे। इस समय तो मेरे पास धनुर्वेद के अलावा तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है। द्रोणाचार्य ने कहा-नाथ, मुझे इसे ही सम्यक प्रदान करके कृतार्थ करें। इस पर भगवान भार्गव ने उन्हें अशेष धनुर्वेद का परिज्ञान करा दिया। प्रसन्न होकर द्रोण अपने आश्रम को चले। परशुराम की सम्पूर्ण सम्पत्ति लेने के बाद भी ब्राह्मणों का मन नहीं भरा। एक दिन महर्षि कश्यप जी का आगमन हुआ। चराचर सृष्टि के जनक को अपने द्वार पर आया हुआ देखकर भगवान परशुराम निहाल हो गए। आतिथ्य के पश्चात महर्षि से अनुनयपूर्वक भार्गव बोले- हे देवासुर, दनुज-मनुज के गुरु शिरोमणि! आप मुझे आदेशित करें कि मैं आपकी कौन सी इच्छा पूर्ण करूँ? इस पर शान्त भाव से कश्यप ऋषि ने कहा- हे भार्गव, सम्पूर्ण पृथ्वी को मुझे दान कर दो और स्वयं मेरी पृथ्वी से दूर जाकर निवास करो। इस पर प्रसन्न होकर उन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान करके स्वयं समुद्र से अपने निवास के लिए याचना की। समुद्र ने भगवान का आदेश सुन कर कहा प्रभु जितनी जगह आपको अपेक्षित है मेरी परिधि से ग्रहण कर लें। इस पर भार्गव ने अपना परशु समुद्र की ओर उछाल दिया। वह सूखकर परशु के आकार का नक्शा बन गया। वहीं केरल प्रदेश बना। आज तक वहीं वे अदृश्य रूप में किसी को कोई भी दण्ड न देते हुए निवास करते हैं। वैसे कहीं भी ऐसा स्थान नहीं है, जो परशुराम के लिए दुर्गम है। वे सर्वत्र विचरण करते हुए अन्याय के विरोध में सार्थक भूमिका निभाते हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुम्हारी करुण- कथा सुनकर अवश्य ही तुम्हारा कल्याण करेंगे। अम्बा ने इसे सुनकर संतोष की साँस ली।
२. कठिन शब्दार्थ
३. सारांश
पाठ 'कश्यप और परशुराम' भगवान परशुराम के जीवन के उत्तरार्ध की उन घटनाओं का वर्णन करता है जो उनके त्याग और लोक-कल्याणकारी स्वरूप को दर्शाती हैं। कहानी का आरंभ पृथ्वी द्वारा छोड़े गए उस बालक (लक्ष्मण) से होता है, जिसकी शरारतों और आयुधों के विनाश को परशुराम अपने वचन के कारण धैर्यपूर्वक सहन करते हैं। जब पृथ्वी उस बालक को वापस ले जाती है, तो परशुराम स्वयं को अकेला महसूस करते हैं और अपनी समस्त अर्जित संपत्ति को ब्राह्मणों में दान करने का निर्णय लेते हैं। इसी क्रम में आचार्य द्रोण उनके पास आते हैं। चूँकि परशुराम सब कुछ दान कर चुके थे, अतः उन्होंने द्रोण को अपना सबसे बहुमूल्य खजाना—'अशेष धनुर्वेद' का ज्ञान प्रदान किया।
पाठ का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आता है जब चराचर सृष्टि के जनक महर्षि कश्यप उनके द्वार पर आते हैं। परशुराम उनसे दान माँगने का आग्रह करते हैं, जिस पर कश्यप पूरी पृथ्वी का दान माँग लेते हैं और उन्हें अपनी दान की हुई भूमि छोड़ने का आदेश देते हैं। परशुराम बिना किसी मोह के पूरी पृथ्वी कश्यप को सौंप देते हैं और स्वयं के निवास के लिए समुद्र से भूमि की याचना करते हैं। वे अपना 'परशु' समुद्र में फेंकते हैं, जिससे समुद्र पीछे हट जाता है और परशु के आकार का भू-भाग उभरता है, जिसे आज हम 'केरल' के नाम से जानते हैं। अंत में बताया गया है कि परशुराम आज भी अदृश्य रूप में वहीं निवास करते हैं और अन्याय के विरुद्ध सक्रिय रहते हैं। अम्बा, परशुराम के इस महिमामण्डित चरित्र को सुनकर अपनी समस्याओं के समाधान के प्रति आश्वस्त होती है। यह पाठ त्याग की पराकाष्ठा और शस्त्र से शास्त्र की ओर संक्रमण का सुंदर उदाहरण है।
४. महत्वपूर्ण अंशों का संक्षेपीकरण
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'कश्यप और परशुराम' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : पृथ्वी के बालक (लक्ष्मण) द्वारा शस्त्रों के विनाश और पृथ्वी की विदाई का वर्णन।
संक्षेपीकरण : परशुराम ने अपने वचन के कारण बालक द्वारा अस्त्रों के विनाश को सहन किया। कार्य पूर्ण होने पर पृथ्वी ने बालक की धृष्टता के लिए क्षमा माँगते हुए परशुराम से विदा ली।
संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय कृत 'प्रतिशोध' के सातवें अध्याय से।
प्रसंग : आचार्य द्रोण को धनुर्वेद की शिक्षा प्रदान करने का प्रसंग।
संक्षेपीकरण : जब द्रोणाचार्य दान लेने पहुँचे, तब परशुराम अपनी संपत्ति दान कर चुके थे। अतः उन्होंने द्रोण को अपना संपूर्ण शस्त्र ज्ञान विरासत के रूप में सौंप दिया।
संदर्भ : 'प्रतिशोध' पुस्तक के 'कश्यप और परशुराम' पाठ से।
प्रसंग : महर्षि कश्यप को पूरी पृथ्वी दान करने का ऐतिहासिक वृत्तांत।
संक्षेपीकरण : परशुराम ने महर्षि कश्यप के आगमन पर उन्हें ससम्मान पूरी पृथ्वी दान में दे दी और कश्यप की आज्ञा मानकर स्वयं के लिए समुद्र से नई भूमि की विनती की।
संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय रचित 'प्रतिशोध' के सातवें पाठ से।
प्रसंग : केरल प्रदेश की उत्पत्ति और परशुराम की शाश्वत उपस्थिति का वर्णन।
संक्षेपीकरण : परशुराम ने अपना परशु समुद्र में फेंककर केरल प्रदेश की रचना की, जहाँ वे आज भी निवास करते हैं। उनका यह सामर्थ्य देखकर अम्बा को कल्याण की आशा हुई।
५. विस्तृत विशदीकरण (भाव-पल्लवन)
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के कश्यप और परशुराम नामक पाठ से लिया गया है इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : परशुराम की वचनबद्धता और पृथ्वी के बालक (लक्ष्मण) के माध्यम से भविष्य की नियति का संकेत।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने यहाँ भगवान परशुराम के धैर्य और उनके 'भक्तवत्सल' स्वरूप की बड़ी ही सूक्ष्म व्याख्या की है। परशुराम, जो अपने क्रोध के लिए विख्यात थे, यहाँ एक अबोध बालक की शरारतों को शांत भाव से सहते हुए दिखाई देते हैं। यह बालक कोई साधारण शिशु नहीं, बल्कि पृथ्वी का अंश था जिसे लक्ष्मण के रूप में जाना गया। बालक का आश्रम के 'आयुध-भंडार' को नष्ट करना प्रतीकात्मक है; यह भविष्य में शस्त्रों के युग के अंत और एक नई व्यवस्था के आगमन का संकेत था। भार्गव का 'वचनबद्ध' होना उनके महान चरित्र की विशेषता है। एक बार वचन देने के बाद, उन्होंने अपनी प्रिय अस्त्र-संपत्ति के विनाश को भी मौन रहकर स्वीकार किया।
जब पृथ्वी वापस आती है, तो वह एक माता के रूप में 'कृतज्ञता' और 'क्षमा' का भाव लेकर आती है। पृथ्वी का यह कहना कि 'मैं कृत-कार्य हुई', यह सिद्ध करता है कि बालक का वहाँ रहना और शस्त्रों को विनष्ट करना एक ईश्वरीय योजना का हिस्सा था। परशुराम ने न केवल बालक को पाला, बल्कि उसके उत्पातों को सहकर अपनी सहनशीलता की परीक्षा भी दी। 'तथास्तु' कहकर विदा करना उनके मोहभंग और अनासक्ति को दर्शाता है। यह गद्यांश स्पष्ट करता है कि महापुरुष अपने निजी नुकसान की चिंता नहीं करते, बल्कि वे धर्म और वचन की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं। बालक का चले जाना परशुराम के जीवन में एक खालीपन तो लाता है, किंतु यही खालीपन उन्हें सर्वस्व दान की ओर प्रवृत्त करता है। यह अंश शस्त्रों के भौतिक संचय के विरुद्ध त्याग की आध्यात्मिक शक्ति को प्रतिष्ठित करता है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के कश्यप और परशुराम नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : परशुराम द्वारा अपनी अंतिम और श्रेष्ठ संपदा—विद्या—को सुपात्र द्रोणाचार्य को सौंपने का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक ने यहाँ 'दान' की श्रेष्ठता और 'विद्या' के महत्व को बड़ी ही प्रखरता से उकेरा है। परशुराम ने अपनी समस्त भौतिक संपत्ति ब्राह्मणों में बाँट दी थी। जब आचार्य द्रोण उनके पास आए, तो परशुराम के पास सांसारिक अर्थों में कुछ भी नहीं बचा था। 'देर से पहुँचे' कहना उनकी दानवीरता की गति को दर्शाता है। किंतु, एक गुरु और ऋषि के पास जो सबसे बड़ा खजाना होता है, वह है उसका ज्ञान। परशुराम ने द्रोण को बताया कि उनके पास केवल 'धनुर्वेद' बचा है।
द्रोणाचार्य, जो स्वयं एक महान साधक थे, उन्होंने सोने-चांदी के स्थान पर 'विद्या' को चुना। यह सुपात्र की पहचान है। परशुराम द्वारा 'अशेष धनुर्वेद का परिज्ञान' कराना शस्त्र विद्या के एक युग से दूसरे युग में हस्तांतरण का प्रतीक है। यही वह ज्ञान था जिससे आगे चलकर द्रोणाचार्य ने कौरवों और पांडवों को शिक्षित किया और महाभारत के युद्ध की नींव पड़ी। परशुराम का यह दान भौतिक दानों से कहीं बढ़कर था क्योंकि विद्या ही वह संपदा है जो बांटने से बढ़ती है और समाज की रक्षा का आधार बनती है। द्रोण का 'कृतार्थ' होना यह दिखाता है कि एक शिष्य के लिए गुरु की विद्या से बड़ा कोई उपहार नहीं हो सकता। लेखक यहाँ यह संदेश देते हैं कि जब मनुष्य अपनी समस्त भौतिक वस्तुओं का त्याग कर देता है, तब वह अपनी सर्वश्रेष्ठ आंतरिक शक्ति को दूसरों के कल्याण हेतु देने में समर्थ होता है। यह अंश परशुराम के एक महान शिक्षक और परंपरा के संवाहक होने की पुष्टि करता है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'कश्यप और परशुराम' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : परशुराम की दानशीलता की पराकाष्ठा और महर्षि कश्यप द्वारा उनकी विरक्ति की परीक्षा का चित्रण।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : यह अंश भारतीय पौराणिक साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। महर्षि कश्यप का परशुराम के द्वार पर आना 'चराचर सृष्टि के जनक' का आगमन था। परशुराम का 'निहाल' होना उनकी श्रद्धा और भक्ति का परिचायक है। जब परशुराम ने उनसे इच्छा पूर्ति का निवेदन किया, तो कश्यप ने एक ऐसी मांग रखी जो किसी भी चक्रवर्ती सम्राट के लिए असंभव होती—'सम्पूर्ण पृथ्वी का दान'।
परशुराम ने जिस पृथ्वी को २१ बार क्षत्रियों से जीतकर प्राप्त किया था, उसे एक क्षण में महर्षि कश्यप को सौंप देना उनकी अनासक्ति का चरम बिंदु है। कश्यप की शर्त और भी कठिन थी—'मेरी पृथ्वी से दूर जाकर निवास करो'। इसका अर्थ था कि दान देने के बाद दान दी गई वस्तु पर कोई अधिकार नहीं रह जाता। परशुराम ने इसे सहर्ष स्वीकार किया। यह 'सर्वस्व दान' का अनूठा उदाहरण है। इसके बाद परशुराम का स्वयं के लिए भूमि न होने पर 'समुद्र से याचना' करना उनके स्वाभिमान और विनम्रता के समन्वय को दिखाता है। वे अब पूरी पृथ्वी पर अतिथि हो गए थे। लेखक यहाँ यह प्रतिपादित करते हैं कि वास्तविक अधिकार उसी का है जो त्याग करना जानता है। परशुराम का यह कृत्य उन्हें राजाओं की श्रेणी से उठाकर देवतुल्य ऋषियों की श्रेणी में प्रतिष्ठित कर देता है। कश्यप को पृथ्वी दान करना वास्तव में समाज को एक नई व्यवस्था सौंपना था, जहाँ सत्ता का मोह नहीं, बल्कि धर्म का शासन सर्वोपरि हो। यह अंश त्याग की उस महिमा को गाता है जो संपूर्ण संसार को अपना परिवार (वसुधैव कुटुम्बकम्) मानती है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के कश्यप और परशुराम नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : केरल प्रदेश की भौगोलिक उत्पत्ति और परशुराम की अमरता तथा उनकी कल्याणकारी शक्ति का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक ने यहाँ परशुराम के तपोबल और उनकी संकल्प शक्ति का भव्य चित्रण किया है। जब परशुराम के पास रहने के लिए कोई भूमि नहीं बची, तो उन्होंने समुद्र से शरण माँगी। समुद्र, जो स्वयं मर्यादा का प्रतीक है, उसने परशुराम के तेज को पहचानकर उन्हें अपनी परिधि से स्थान देने की स्वीकृति दी। 'परशु को समुद्र की ओर उछालना' एक दिव्य क्रिया थी। जहाँ तक परशु गया, वहाँ तक का समुद्र सूखकर एक नई भूमि में परिवर्तित हो गया, जिसे 'केरल' कहा गया।
यह घटना केवल भूगोल की रचना नहीं, बल्कि एक नई संस्कृति की स्थापना थी। परशुराम का वहाँ 'अदृश्य रूप' में निवास करना उनकी अमरता (चिरंजीवी होने) का प्रमाण है। वे आज भी वहां रहकर बिना दंड दिए समाज का मार्गदर्शन करते हैं। लेखक स्पष्ट करते हैं कि परशुराम के लिए कोई भी स्थान 'दुर्गम' नहीं है, वे आज भी अन्याय के विरोध में 'सार्थक भूमिका' निभाते हैं। अम्बा, जो स्वयं अन्याय की शिकार थी और भीष्म से बदला लेना चाहती थी, उसे जब यह पता चला कि परशुराम जैसे समर्थ देव अभी भी सक्रिय हैं और कल्याणकारी हैं, तो उसे अपनी मुक्ति का मार्ग दिखाई देने लगा। 'संतोष की साँस लेना' अम्बा की आशा की किरण का प्रतीक है। यह अंश सिद्ध करता है कि परशुराम केवल इतिहास के पात्र नहीं, बल्कि एक शाश्वत न्यायकारी शक्ति हैं जो युग-युगांतर तक पीड़ितों की सहायता के लिए तत्पर रहते हैं। उनकी यह यात्रा विनाश से निर्माण की ओर, और क्रोध से शांति की ओर एक महान आध्यात्मिक संक्रमण है।
