प्रस्तुत लेख में डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय द्वारा संपादित पुस्तक 'प्रतिशोध' के छठे अध्याय 'सहस्त्रबाहु और कामधेनु' का सांगोपांग विश्लेषण है। इसमें कामधेनु का चमत्कार, सहस्त्रबाहु का अत्याचार और भगवान परशुराम के इक्कीस बार क्षत्रिय विहीन पृथ्वी करने के महासंकल्प का विस्तृत वर्णन चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल' द्वारा प्रस्तुत किया गया है।
१. मूल पाठ
किसी समय शिकार खेलने के व्याज से सहस्रबाहु ने महर्षि यमदग्नि के आश्रम को समलंकृत किया। आश्रम की व्यवस्था ने इनका मन मोह लिया। वह कुछ समय विश्राम कर आश्रम की रमणीयता का सौन्दर्य-पान करता रहा। उसको ढूँढता हुआ विशाल सैन्य समूह भी आश्रम में उपस्थित हो गया। कोलाहल सुनकर महर्षि ने स्वयं आकर राजा की आगवानी की। महर्षि ने राजा को अपने आश्रम को सनाथ करने का आमंत्रण दिया। राजा की सारी सेना भी उनके साथ हो ली। वन-सुषमा ने सबको मोह लिया। सारे आश्रमवासी प्रफुल्ल मनसा राजा एवं राज सेना का आतिथ्य सँभाल रहे थे। उन्हें मनवांक्षित सामग्रियाँ यथेष्ठ मात्रा में मिल रही थीं। सम्पूर्ण राज सेना आह्लादित हो रही थी। राजा भी आनन्दित हो उठा।
राजा की समुचित व्यवस्था करके महर्षि ने महाराज के सम्मुख जाकर स्वस्तिवाचन किया। प्रसन्न होकर राजा ने भी ऋषिराज की आश्रम-व्यवस्था की भूरि-भूरि प्रशंसा की। राजा ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए यमदग्नि से पूछा-मुनिवर ! आपने मेरी और मेरे सैनिकों की इस प्रकार सेवा करके मुझ पर अमित उपकार किया है। कृपया मेरे कुतूहल को शान्त करते हुए यह बतायें कि इतनी दिव्य व्यवस्था आपने कैसे सम्भव कर दिखायी ? विनम्र स्वर में मुनिवर बोले-राजन् ! मेरे पास एक कामधेनु है। इसी के प्रभाव से में मनवांक्षित सेवा करने में सफल हो सका। यह दिव्य गौ सभी आप्त-काम करने में समर्थ है।
राजा ने अत्यन्त आश्चर्यचकित होते हुए कामधेनु का दर्शन करना चाहा। यमदग्नि ने बिना किसी संकोच के कामधेनु के कक्ष में महाराज को ले जाकर दर्शन कराया। महाराज ने सोचा कि यह गाय यदि मुझे मिल जाय तो इसके प्रभाव से बिना किसी प्रयास के हम और हमारा राज परिवार दिव्य ऐश्वर्य-भोग को प्राप्त होगा। इस स्वल्प इच्छा वाले वनवासी तपस्वी को इसका क्या प्रयोजन? राजा ने अपने मन की बात से मुनिवर को अवगत कराया। मुनि ने इसे सुनकर अत्यन्त आश्चर्य प्रकट किया। उन्होंने कहा—कामधेनु मेरी तपस्या है। यह किसी दूसरे के घर जाकर अपनी सामर्थ्य खो देगी । इसे सुन राजा ने सोचा कि मुनिवर हमें यह गाय देना नहीं चाहते इसलिए यह बहाना कर रहे हैं। उसने अपने सैनिकों को यह आदेश दिया कि यह करामाती गाय ले चलो।
सैनिकों का आदेश पाकर सेवक ने गाय को बँटे से खोलकर अपनी राह पकड़ी। सभी लोग अवाक् इस दृश्य को देखते रहे। राजा भी अपनी राजधानी ‘माहिष्मती' को रवाना हुआ। थोड़ी देर में परशुराम जो कि आश्रम से बाहर गये थे, वापस आ गये। आने पर वे घर में कामधेनु को न देखकर पूछने लगे-माँ कामधेनु कहाँ है? सब लोग क्यों चुप हैं? क्या कोई अनहोनी। घटना घट गयी है? आखिर आप लोग कुछ बोलते क्यों नहीं हैं? इस पर माता ने सम्पूर्ण घटना संक्षेप में परशुराम से कह सुनाई।
इसके बाद परशुराम का रौद्र रूप देखकर सभी भयभीत हो उठे। परशुराम ने भयानक गर्जना की। सुनकर सम्पूर्ण वन प्रान्त दहल उठा। उनके मुख से हठात् निकल पड़ा-दुष्ट सहस्रबाहु ! अब मैं तुम्हारा सर्वनाश करके ही शान्त हूँगा। कृतघ्न! तू इतना बड़ा नीच है कि मेरे पिता की सज्जनता को तुम उनकी कमजोरी समझता है। अगर वे चाहते तो पल भर में ही तुम्हें सेना सहित यमलोक का पथिक बना देते। उनकी मुनिवृत्ति को तुमने चुनौती दी। है। मैं यामदग्नि इस आमंत्रण को स्वीकार करता हूँ। सावधान ! अपनी रक्षा में तू तत्पर रहना। यह कहते हुए वे वायुवेग से माहिष्मती की ओर प्रस्थान कर गये।
उनके गर्जन-तर्जन से रास्ते में लोग भयभीत हो उठे। पक्षी कलरव करने लगे। लोग अपना सुरक्षित ठिकाना तलाशने लगे। वृक्षों में कम्पन होने लगी। हिंसक जन्तु भी डर के मारे भागने लगे। अभी सहस्रबाहु ठीक से पहुँचकर विश्राम भी नहीं कर पाया था कि सम्पूर्ण माहिष्मती में तूफान उठ खड़ा हो गया। नगर के लोग डर के मारे अपने दरवाजे बन्द करने लगे। सैनिक भाग खडे हए । अर्जुन के ५०० लड़के जो वीरता के अवतार माने जाते थे भागकर अपना जीवन बचा लिये। भार्गव की दहाड़ सुनकर अकेला सहस्रबाहु निकलकर मैदान में डट गया। उसने अपने हाथों से एक ही बार ५०० वाण प्रत्यञ्चित करके धनुष से परशुराम पर परहार किया। परन्तु उसे परशुराम ने देखते ही देखते अपने ‘परशु' से काट डाला और झपटकर एक ही वार में राम ने परशु के प्रहार से सहस्रबाहु का सिर धड़ से अलग कर दिया। रनिवास चीत्कार कर उठा। सर्वत्र चीख पुकार होने लगी। परशुराम ने रम्भाती हुई कामधेनु परप्रेम से हाथ फेरा। उसके बछड़े को स्नेह से उठा लिया और अपने आश्रम की राह पकड़ी। पीछे-पीछे कामधेनु वापस लौट पड़ी।
आश्रम पहुँचर परशुराम ने गाय-बछड़े को बाँध दिया। अपने पिता को प्रणाम करते हुए सम्पूर्ण इतिवृन्त सुना डाला। इस रोमाञ्चित घटना को सुनकर महर्षि यमदग्नि आश्चर्यचकित हो उठे। सहसा उनके मुख से निकल गया- अरे बेटा, तू बड़ा बलवान है। अकेले ही तुमने वह कार्य कर दिखाया जो बड़े-बड़े बलवानों के लिए दुष्कर है। परन्तु तुमने सर्वदेवमय नरदेव को मार डाला। यह महान पातक है। एक साल पर्यन्त तुम अशेष तीर्थों का सेवन करके इसका प्रायश्चित करो। इसी में तुम्हारा कल्याण है। पिता की आज्ञा शिरोधार्य करके भगवान परशुराम ने सम्पूर्ण तीर्थों का विधिवत अनुष्ठानपूर्वक दर्शन-पूजन किया। समस्त तीर्थाटन में एक वर्ष व्यतीत हो गया। इस बीच 'परशुराम-चरित' जगत विख्यात हो गया। आततायी सहस्रार्जुन मारा गया इससे जामदग्न्य की कीर्ति-पताका सर्वत्र फहर उठी। यह सहस्रबाहु के पाँच सौ भगोड़ा पुत्रों को असह्यदाहक जान पड़ती। वे रात-दिन इस अपमान का बदला लेने के फेर में रहते। गुप्तचरों द्वारा यह ज्ञात होने पर कि इस समय परशुराम तीर्थ-यात्रा पर हैं, वे फूले न समाये। एक दिन सायंकाल वे सभी यमदग्नि के आश्रम पहुँचे। महर्षि अग्निहोत्र-कक्ष में दैनिक अनुष्ठान कर रहे थे। बाह्य जगत से अनभिज्ञ यमदग्नि का उन आततायियों ने शिर काट कर अपने साथ ले लिया। बेचारी रेणुका दहाड़ मारकर विलाप करने लगी। उस जंगल की नीरव रात्रि में उसे धीरज बँधाने वाला कोई नहीं था। रेणुका और जोर से अपने यशस्वी महावीर परशुराम को पुकारने लगी। हा बेटा, आज तुम होते तो मुझे इस दशा में विलाप नहीं करना पड़ता। कुत्तों की तरह दुम दबाकर वे इस सुनसान मखशाला में तुम्हारे पिता की नशंस हत्या न करते। इतना ही नहीं, वे दुष्ट तुम्हारे पिता का कटा हुआ शिर भी अपने साथ ले गये। मुझे अब मर जाना उचित मालूम होता है। इस पामर देह को रखकर अब मैं क्या करूँगी ? मुझे मरना ही होगा।
तीर्थाटन करके लौट रहे परशुराम को दूर से माता का विलाप सुनाई। पड़ा। माता की आवाज ध्यान से सुनकर उन्होंने अनुमान लगाया कि निश्चय ही मेरी अनुपस्थिति में उन आतताइयों ने कोई बड़ा अनर्थ कर डाला। वायुवेग से आश्रम पहुँचने पर उन्हें सम्पूर्ण घटना का बोध हुआ। समाचार से अवगत होने पर परशुराम का प्रलयंकर रूप प्रकट हुआ। वे वायुवेग से माहिष्मती की ओर दौड़े। रास्ते में जो भी पड़ा उसे नष्ट करते हुए आगे बढ़ते चले गये। पेड़ों को उखाड़ फेंकते और पहाड़ों को ढहाते हुए भीषण झंझावत की तरह वे माहिष्मती पहुँचे। वहाँ जाकर आबाल वृद्ध को मौत के घाट उतारकर अपने पिता के मुण्ड को लेकर आश्रम आये। सारे ब्रह्माण्ड में खलबली मच गयी। उनके पहुँचते ही माता की गोद में जैसे मुण्ड को रखा एक विलक्षण घटना घटित हुई। रुण्ड और मुण्ड आपस में जुड़ गये और। माता रेणुका को साथ लेकर आकाश में तिरोहित हो गये। आकाशवाणी हुई कि अब इनके पृथ्वी पर रहने के दिन पूर्ण हो गये। इनकी चिन्ता छोड़कर हे भार्गव, तुम पृथ्वी से पापियों का सर्वनाश करो। तुम्हारे माता-पिता अब सप्तर्षि-मण्डल में विराजमान होंगे।
इस अनर्थकारी घटना को निमित्त बनाकर भगवान परशुराम ने पृथ्वी पर से आततायी क्षत्रियों का २१ बार विनाश कर दिया। मात्र वे ही क्षत्रिय इनकी कोपाग्नि से बचे रहते जो धर्म-परायण एवं प्रजा-वत्सल होते। विस्तारवादी, 'आतंक के पर्याय एवं दम्भी क्षत्रियों का अहंकार चूर्ण करते हुए वे उनका सर्वनाश करके ही दम लेते। सारी पृथ्वी पर से उन्होंने अन्याय, पाप एवं अत्याचार का उच्छेद कर दिया था। उन क्षत्रियों के रूप में मानों राक्षसों ने पुनर्जन्म लेकर पृथ्वी को आतंकित कर दिया था। अत्याचार के प्रतिमूर्ति दानव राजागण मानो पृथ्वी के भार बन गये थे। भगवान परशुराम का अवतार इन्हीं के संहार एवं भक्तों के कल्याणार्थ हुआ था। सारी पृथ्वी का पाप उतारकर उन्हें संतोष हुआ। सम्पूर्ण पापियों की सम्पत्ति एवं आयुध से इनका आश्रम पट गया। विध्वंसक हथियारों का प्रयोग गलत हाथों में पड़ने का भय बना जानकर पृथ्वी ने विधवा तपस्विनी के रूप में अपने छोटे बालक को साथ ले जाकर विनयपूर्वक निवेदन किया। हे प्रभु! मैं इस अबोध बालक की अभागिनी माता हूँ। इसके पिता की छाया इसका साथ छोड़ चुकी है। मेरा मन सर्वथा दुखित रहता है। मैं कुछ दिनों तक तीर्थाटन हेतु जाना चाहती हूँ। कृपया अपने आश्रम में इसे कुछ काल तक आश्रय प्रदान करें। मैं वापस आकर इसे पुन: ले जाऊँगी। भगवान को उस पर दया आ गयी और उन्होंने उस बालक को रखने की स्वीकृति प्रदान कर दी। जब कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए वह तापसी जाने को उद्यत हुई तो प्रणिपात करते हुए निवेदन किया कि यह अत्यन्त चपल बालक है। अज्ञानतावश इससे कोई भूल हो जाय तो इसके प्राणों की मैं भीख माँगती हूँ। भगवान ने उसे अभयदान दिया। वह अपने गन्तव्य को चली गयी।
२. कठिन शब्दार्थ
३. सारांश
पाठ 'सहस्त्रबाहु और कामधेनु' शक्ति के अहंकार, लोभ और उसके विनाशकारी परिणामों की एक अत्यंत मार्मिक और ओजस्वी कथा है। महाराज सहस्त्रबाहु शिकार के दौरान महर्षि यमदग्नि के आश्रम पहुँचते हैं। महर्षि अपनी दिव्य गौ 'कामधेनु' की सहायता से राजा और उनकी विशाल सेना का ऐसा भव्य सत्कार करते हैं कि राजा चकित रह जाता है। लोभवश सहस्त्रबाहु उस कामधेनु को छीन लेता है। जब परशुराम को इसका पता चलता है, तो वे क्रोधित होकर माहिष्मती नगरी पहुँचते हैं और सहस्त्रबाहु का वध कर कामधेनु को वापस आश्रम ले आते हैं। यमदग्नि इसे 'नरदेव' (राजा) की हत्या मानकर परशुराम को एक वर्ष के प्रायश्चित और तीर्थाटन पर भेज देते हैं।
परशुराम की अनुपस्थिति में सहस्त्रबाहु के पुत्र प्रतिशोधवश आश्रम पर हमला करते हैं और ध्यानमग्न महर्षि यमदग्नि की नृशंस हत्या कर उनका सिर काट ले जाते हैं। माता रेणुका का विलाप सुनकर तीर्थाटन से लौटे परशुराम का क्रोध प्रलयंकारी हो जाता है। वे माहिष्मती को तहस-नहस कर देते हैं और पिता का मुण्ड वापस लाते हैं। एक विलक्षण घटना में यमदग्नि और रेणुका दिव्य रूप धारण कर सप्तर्षि मंडल में स्थान पाते हैं। इसके पश्चात, परशुराम पृथ्वी को इक्कीस बार आततायी क्षत्रियों से विहीन करने का महासंकल्प लेते हैं। वे केवल उन्हीं क्षत्रियों को छोड़ते हैं जो धर्मपरायण और प्रजावत्सल थे। कहानी के अंत में, पृथ्वी एक विधवा तपस्विनी का रूप धारण कर परशुराम से अपने बालक की रक्षा की भिक्षा माँगती है, जिससे परशुराम का क्रोध शांत होता है। यह पाठ धर्म की स्थापना और अहंकार के समूल विनाश का संदेश देता है।
४. महत्वपूर्ण अंशों का संक्षेपीकरण
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'सहस्त्रबाहु और कामधेनु' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : सहस्त्रबाहु का यमदग्नि के आश्रम में आगमन और अभूतपूर्व आतिथ्य का वर्णन।
संक्षेपीकरण : शिकार के बहाने सहस्त्रबाहु यमदग्नि के आश्रम पहुँचा, जहाँ महर्षि ने अपनी दिव्य शक्ति से राजा और उनकी विशाल सेना का इतना उत्कृष्ट सत्कार किया कि राजा और सैनिक आनंदित और विस्मित हो उठे।
संदर्भ : 'प्रतिशोध' पुस्तक के छठे अध्याय 'सहस्त्रबाहु और कामधेनु' से।
प्रसंग : सहस्त्रबाहु के मन में उत्पन्न लोभ और कामधेनु के अपहरण का वर्णन।
संक्षेपीकरण : कामधेनु के चमत्कार को देख सहस्त्रबाहु के मन में लोभ जाग गया। महर्षि द्वारा उसे अपनी तपस्या बताने और देने से मना करने पर राजा ने बलपूर्वक उस दिव्य गौ का अपहरण करने का आदेश दे दिया।
संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय कृत 'प्रतिशोध' के छठे पाठ से।
प्रसंग : परशुराम का क्रोध और सहस्त्रबाहु के वध का वर्णन।
संक्षेपीकरण : कामधेनु के अपहरण का समाचार पाकर परशुराम ने माहिष्मती पर आक्रमण किया। उन्होंने सहस्त्रबाहु के पाँच सौ बाणों को काटकर एक ही प्रहार में उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया और कामधेनु को मुक्त कराया।
संदर्भ : 'प्रतिशोध' पुस्तक के छठे अध्याय से उद्धृत।
प्रसंग : सहस्त्रबाहु के पुत्रों द्वारा यमदग्नि की हत्या और रेणुका के विलाप का मार्मिक चित्रण।
संक्षेपीकरण : परशुराम की तीर्थयात्रा के दौरान सहस्त्रबाहु के पुत्रों ने आश्रम में घुसकर अनुष्ठानरत यमदग्नि की हत्या कर दी। माता रेणुका ने अपने मृत पति और अपहृत मुण्ड को देख अत्यंत करुण विलाप किया।
संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय रचित 'प्रतिशोध' के 'सहस्त्रबाहु और कामधेनु' पाठ से।
प्रसंग : परशुराम का अंतिम प्रतिशोध और यमदग्नि-रेणुका का दिव्य लोक गमन।
संक्षेपीकरण : पिता की हत्या से क्रुद्ध परशुराम ने माहिष्मती का विनाश कर पिता का सिर वापस लाया। एक दिव्य चमत्कार में यमदग्नि और रेणुका के शरीर जुड़ गए और वे आकाश में सप्तर्षि मंडल के रूप में स्थापित हो गए।
५. विस्तृत विशदीकरण (भाव-पल्लवन)
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के सहस्त्रबाहु और कामधेनु नामक पाठ से लिया गया है इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : महर्षि यमदग्नि के आश्रम की दिव्यता और उनके तपोबल से प्राप्त अभूतपूर्व आतिथ्य का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने यहाँ तपोवन की शांति और राजसी वैभव के मिलन का चित्रण किया है। महाराज सहस्त्रबाहु 'व्याज' (बहाने) से आश्रम आए थे, किंतु आश्रम की 'रमणीयता' ने उन्हें प्रभावित किया। यहाँ ऋषि और राजा का विरोधाभास स्पष्ट है—ऋषि के पास भौतिक साधनों का अभाव है, फिर भी उनके पास वह शक्ति है जो एक विशाल सैन्य समूह को संतुष्ट कर सके। महर्षि यमदग्नि का राजा को 'आश्रम सनाथ करने' का आमंत्रण उनकी उदारता और ऋषि परंपरा के अतिथि सत्कार के गौरव को दर्शाता है। आश्रमवासियों का प्रफुल्लित होकर सेवा करना यह सिद्ध करता है कि तपोवन में सेवा ही परम धर्म माना जाता था।
विशाल सेना को 'यथेष्ठ मात्रा' में सामग्री मिलना एक चमत्कार था, जिसे देखकर पूरी राज सेना 'आह्लादित' हो गई। लेखक यहाँ यह संदेश देना चाहते हैं कि जिस सुख और संतोष की तलाश राजा शिकार और युद्धों में करता है, वह संतोष उसे एक शांत आश्रम में अनायास ही प्राप्त हो गया। यमदग्नि का आश्रम केवल झोपड़ियों का समूह नहीं था, बल्कि वह मानवीय मूल्यों, शांति और ईश्वरीय शक्तियों का केंद्र था। राजा का आनंदित होना उसकी आत्मा की तृप्ति का प्रतीक है, किंतु यही आनंद आगे चलकर उसके लोभ का कारण बनता है। यह अंश प्रकृति और अध्यात्म के सामंजस्य को बड़ी ही सूक्ष्मता से रेखांकित करता है, जहाँ एक ऋषि का तपोबल राजसी संपदा पर भारी पड़ता है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय कृत 'प्रतिशोध' के छठे अध्याय से लिया गया है।
प्रसंग : सहस्त्रबाहु के मन में उपजे लोभ और राजसी अहंकार द्वारा ऋषि की तपस्या के अपमान का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : इस गद्यांश में लेखक ने मनुष्य की 'स्वल्प इच्छा' (छोटी सोच) और ऋषि के 'विराट संकल्प' के बीच के संघर्ष को दिखाया है। जब सहस्त्रबाहु ने कामधेनु के प्रभाव को जाना, तो उसके भीतर का राजा जाग उठा, जो हर बहुमूल्य वस्तु पर अपना अधिकार समझता था। राजा का यह सोचना कि 'एक वनवासी तपस्वी को इसका क्या प्रयोजन'—उसकी भौतिकवादी दृष्टि को दर्शाता है जो अध्यात्म और तपस्या के महत्व को नहीं समझ सकती। महर्षि यमदग्नि का यह कहना कि 'कामधेनु मेरी तपस्या है', अत्यंत गंभीर है। कामधेनु केवल एक गाय नहीं, बल्कि वर्षों की साधना का प्रतिफल है।
तपस्या हस्तांतरणीय नहीं होती, वह साधक के साथ ही अपनी सामर्थ्य रखती है। किंतु मदोन्मत्त राजा ने इसे एक 'बहाना' समझा। शक्ति का अहंकार व्यक्ति को इतना अंधा कर देता है कि वह यह भूल जाता है कि जिस ऋषि के आतिथ्य का उसने अभी आनंद लिया, उसी की मर्यादा का वह हनन कर रहा है। 'करामाती गाय ले चलो'—यह आदेश सहस्त्रबाहु के पतन की घोषणा थी। यहाँ लेखक यह चेतावनी देते हैं कि जब सत्ता ऋषियों के ज्ञान और तपस्या को अपनी दासी बनाने का प्रयास करती है, तो उसका सर्वनाश सुनिश्चित हो जाता है। राजा का यह कृत्य कृतघ्नता की पराकाष्ठा है, जो आगे चलकर पूरे हैहय वंश के विनाश का बीज बनता है। यह अंश सत्ता के दुरुपयोग और लोभ के मनोवैज्ञानिक पक्ष को बड़ी प्रखरता से उजागर करता है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के छठे पाठ से लिया गया है।
प्रसंग : भगवान परशुराम के न्यायपूर्ण क्रोध और सहस्त्रबाहु के वध के माध्यम से धर्म की स्थापना का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : यहाँ लेखक ने परशुराम के 'प्रलयंकर' स्वरूप का चित्रण किया है। परशुराम का क्रोध व्यक्तिगत नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध एक दैवीय प्रतिक्रिया है। उनकी 'भयानक गर्जना' से वन प्रान्त का दहलना उनके असीम तपोबल और शौर्य का प्रतीक है। वे सहस्त्रबाहु को 'कृतघ्न' कहते हैं क्योंकि उसने पिता की 'सज्जनता' का अनुचित लाभ उठाया था। यमदग्नि की मुनिवृत्ति (शांति) को कमजोरी समझना सहस्त्रबाहु की सबसे बड़ी भूल थी।
परशुराम का माहिष्मती की ओर 'वायुवेग' से प्रस्थान करना समय के न्याय की गति को दर्शाता है। युद्ध के मैदान में सहस्त्रबाहु की हजार भुजाओं की शक्ति और उसके '५०० बाण' परशुराम के एक ही 'परशु' के प्रहार के सामने निष्फल साबित हुए। यह सिद्ध करता है कि अधर्म का बल चाहे कितना भी विराट क्यों न हो, वह सत्य के एक प्रहार से नष्ट हो जाता है। 'सिर धड़ से अलग करना' केवल एक राजा की मृत्यु नहीं, बल्कि एक अत्याचारी युग का अंत था। रनिवास का चीत्कार और चहुँओर चीख-पुकार पाप के ढहते हुए साम्राज्य की ध्वनि है। परशुराम द्वारा कामधेनु और उसके बछड़े पर स्नेह से हाथ फेरना उनके व्यक्तित्व के 'कोमल' पक्ष को दर्शाता है—वे रक्षक के लिए कोमल और भक्षक के लिए कठोर हैं। यह अंश अन्याय के विरुद्ध त्वरित और कठोर न्याय का समर्थन करता है और सिद्ध करता है कि क्षमा तब तक ही शोभा देती है जब तक सामने वाला धर्म की मर्यादा में हो।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय कृत 'प्रतिशोध' के छठे अध्याय से लिया गया है।
प्रसंग : यमदग्नि की नृशंस हत्या और रेणुका के मर्मभेदी विलाप के माध्यम से अधर्म की नीचता का चित्रण।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : यह अंश पाठ का सबसे करुण और दुखद भाग है। यमदग्नि ने परशुराम को प्रायश्चित के लिए भेजा क्योंकि वे जीव-मात्र के प्रति अहिंसक थे, किंतु सहस्त्रबाहु के पुत्रों ने इस अहिंसा का उत्तर नृशंस हत्या से दिया। 'अग्निहोत्र-कक्ष' में ध्यानमग्न ऋषि की हत्या करना अधर्म की पराकाष्ठा है। लेखक ने यहाँ 'कुत्तों की तरह दुम दबाकर' जैसे शब्दों का प्रयोग कर सहस्त्रबाहु के पुत्रों की कायरता को उजागर किया है। वे परशुराम की अनुपस्थिति में आए, जो उनके पौरुषहीन स्वभाव को दर्शाता है।
माता रेणुका का विलाप केवल एक विधवा का विलाप नहीं, बल्कि मानवता की कराह है। 'पामर देह' का त्याग करने की इच्छा यह दिखाती है कि जब जीवन का आधार (धर्म और पति) ही छिन जाए, तो एक सती नारी के लिए संसार शून्य हो जाता है। यमदग्नि का कटा हुआ सिर ले जाना उस समय की बर्बरता का प्रमाण है। यहाँ लेखक यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या शांतिप्रिय ऋषियों को भी अपनी रक्षा के लिए अस्त्र उठाना अनिवार्य है? रेणुका का अपने पुत्र 'महावीर परशुराम' को पुकारना यह संकेत है कि अब न्याय केवल शब्दों से नहीं, बल्कि शस्त्रों से होगा। यह प्रसंग पाठक के मन में उन आततायियों के प्रति तीव्र घृणा और परशुराम के आगामी प्रतिशोध के प्रति एक नैतिक समर्थन उत्पन्न करता है। यह दृश्य शांति और अहिंसा के मार्ग पर चलने वालों के साथ हुए विश्वासघात की एक अमिट छाप छोड़ता है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के छठे पाठ से लिया गया है।
प्रसंग : परशुराम का महा-प्रतिशोध, माता-पिता की दिव्य सद्गति और पृथ्वी के शुद्धिकरण का संकल्प।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक ने यहाँ परशुराम के क्रोध को एक 'ऐतिहासिक झंझावात' के रूप में चित्रित किया है। माता का विलाप सुनकर परशुराम का प्रलयंकर रूप धारण करना और माहिष्मती के 'आबाल वृद्ध' का विनाश करना यह दर्शाता है कि जब अधर्म की जड़ें बहुत गहरी हो जाती हैं, तो पूरे वृक्ष को ही उखाड़ना पड़ता है। 'रुण्ड और मुण्ड का जुड़ना' एक चमत्कारिक घटना है जो यमदग्नि की आध्यात्मिक श्रेष्ठता और परशुराम की सिद्धि को प्रमाणित करती है। आकाशवाणी के माध्यम से माता-पिता का 'सप्तर्षि-मण्डल' में स्थान पाना यह सिद्ध करता है कि उनका सांसारिक कष्ट केवल एक लीला थी, वास्तव में वे दिव्य आत्माएँ थीं।
परशुराम को मिला आदेश—'पृथ्वी से पापियों का सर्वनाश करो'—उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य बन गया। 'इक्कीस बार विनाश' करना केवल हिंसा नहीं, बल्कि पृथ्वी को अत्याचार के भार से मुक्त करने का अनुष्ठान था। उन्होंने केवल उन क्षत्रियों का संहार किया जो 'आतंक के पर्याय' और 'विस्तारवादी' थे, जबकि धर्मपरायण राजाओं को अभयदान दिया। यह अंश स्पष्ट करता है कि परशुराम का प्रतिशोध व्यक्तिगत दुख से शुरू होकर लोक-कल्याणकारी मार्ग की ओर बढ़ गया। अंत में, पृथ्वी का एक 'विधवा तपस्विनी' के रूप में आना और अपने बालक की रक्षा की भिक्षा माँगना, परशुराम के भीतर की करुणा को जाग्रत करता है। यह सिद्ध करता है कि एक महान योद्धा वही है जो शस्त्रों का प्रयोग अधर्म के विनाश के लिए करे, किंतु शरण में आए हुए अबोध की रक्षा के लिए उसे त्याग भी दे। यह पाठ प्रतिशोध की अग्नि के शांत होने और धर्म की पुनः स्थापना के साथ एक गरिमापूर्ण समापन पाता है।
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