प्रस्तुत लेख में 'प्रतिशोध' पुस्तक के उन्नीसवें अध्याय 'सेनापति — अश्वत्थामा' का पूर्ण विश्लेषण है। इसमें अश्वत्थामा का प्रतिशोध, पांडव पुत्रों का रात्रि-संहार और ब्रह्मास्त्र के संधान से लेकर नियति के न्याय तक की ऐतिहासिक कथा का विस्तृत वर्णन चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल' द्वारा प्रस्तुत किया गया है।
१. मूल पाठ
दुर्योधन के आसपास ही उसके शेष महारथी भी छिपे हुए थे। कृपाचार्य,कृतवर्मा,अश्वत्थामा। वे सब इस ताक में थे कि द्वन्द्व युद्ध में अन्य भी हस्तक्षेप करें तो हम लोग भी दुर्योधन की सहायता करेंगे। पाण्डवों के चले जाने पर दुर्योधन के पास वे लोग आये। अपने राजा की दुर्दशा देखकर द्रोणी ने कहा-मित्र, अब हमारे लिए क्या आदेश है ? हम आपकी कौन सी अधूरी इच्छा पूरी कर सकते हैं? दुर्योधन ने अपने रक्त का टीका लगाकर द्रोणी को सेनापति नियुक्त किया और कराहते हुए कहा कि हे मित्र अश्वत्थामा ! तुम मेरे लिए पापी पाण्डवों का मस्तक काटकर ले आना, यही मेरी तुमसे अन्तिम प्रार्थना है। 'जो आज्ञा' कहकर वे तीनों दुर्योधन को छोड़कर अन्धकार में कहीं चले गये।
दिन भर थके तीनों भट एक शाल्मली वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगे। कृतवर्मा और कृपाचार्य सो गये किन्तु द्रोणी को नींद नहीं आई। वह अतीत की घटनाओं को स्मरण कर उसमें खोया रहा। इतने में एक निशाचर पक्षी ने आकर उस वृक्ष पर निवास करने वाले शकुनी- समूह को निष्प्राण कर नीचे गिराना प्रारम्भ किया। कुछ देर तक द्रोणी का ध्यान इधर नहीं गया। किन्तु, पक्षियों के समूह को देखकर उसका ध्यान टूटा। वह विचार करने लगा कि जिस तरह से इसने अकेले ही इतने पक्षियों को मार गिराया, वैसे ही हम लोग भी विजयोल्लास में डूबी पाण्डवों की सेना को सोते ही मौत के घाट सहज ही उतार सकते हैं। उसने अपने विचार से कृपाचार्य और कृतवर्मा को जगाकर अवगत कराया। कृपाचार्य ने उसके कुत्सित विचारों की भर्त्सना की। द्रोणी तुम अपराजेय योद्धा हो, इससे तुम्हारी अपकीर्ति होगी। तुम्हें ऐसा सोचना नहीं चाहिए। द्रोणी ने अमर्ष भरे शब्दों में कहा कि जिन दुष्टों ने निरपराध मेरे पिता की ऐसी निर्मम हत्या की, उन्हें किसी प्रकार मौत के घाट उतारना ही एकमात्र मेरे जीवन का उद्देश्य है। जाइये, आप दोनों अपनी कीर्ति-पताका फहराइये। इस पर विलखते हुए कृपाचार्य ने कहा-तुम ही कृपी के एकमात्र सन्तान हो, हम तुम्हें कैसे अकेले छोड़ सकते हैं ? तुम्हारे पाप कर्म में भी हम तुम्हें छोड़ नहीं सकते। यह कहकर तीनों ही पाञ्चाल सेना की शिविर में पहुँचे। थकी माँदी सेना बेखबर सो रही थी। सर्वप्रथम तीनों ने चुपचाप पहरेदारों की हत्या कर दी। इसके बाद द्रोणी ने धृष्टद्युम्न, शिखण्डी,द्रौपदी के पाँचों पुत्रों को पाण्डु-पुत्र समझकर मार डाला। इस प्रकार निर्भय होकर सभी ने सम्पूर्ण पाण्डवी सेना का संहार कर दिया। इससे पूर्व ही द्रौपदी सहित सात्यकी एवं पाँचो पाण्डवों को लेकर श्रीकृष्ण कहीं अन्यत्र चले गये थे। अपना काम समाप्त करने के बाद वे तीनों दुर्योधन के पास गये, तब तक वह मर चुका था।
दूसरे दिन द्रौपदी ने देखा कि सम्पूर्ण पाञ्चाल-सेना मृत्यु की नींद सो गयी है तो उसे अपार कष्ट हुआ। गुप्तचरों द्वारा यह जानकर कि पापी द्रोणी ने यह दुष्कृत्य किया है तो उसे ढूँढ़ने पाण्डव निकल पड़े। गुप्तचरों ने सूचना दी कि तीनों तीन दिशा में चले गये। कृपाचार्य हस्तिनापुर की ओर, कृतवर्मा द्वारका तथा द्रोणी व्यास के आश्रम की ओर जाते देखे गये। व्यासजी ने द्रोणी को तिरस्कृत किया और कहा कि इस कृत्य से तुम कभी चैन नहीं प्राप्त कर सकोगे। यह वार्ता हो ही रही थी कि उसे पाण्डवों सहित श्रीकृष्ण आते दिखाई पड़े। उन्हें अपनी ओर आता देखकर द्रोणी ने छिपने का प्रयास किया, किन्तु अपने प्राण-संकट को देखकर उसने ब्रह्मास्त्र का संधान कर दिया। श्रीकृष्ण के संकेत पर अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र चलाया। दोनों ही प्रलयंकर दिव्यास्त्रों को देखकर व्यास जी ने उन्हें रोका और दोनों ही धनुर्धारियों को इन्हें वापस बुलाने का आदेश दिया। अर्जुन ने जो आज्ञा कहकर ब्रह्मास्त्र को वापस बुला लिया। द्रोणी ने कहा भगवन्! मैं इसे वापस नहीं कर सकता। इस पर व्यास ने कहा कि मूर्ख ! तब इसका संधान क्यों किया ? अच्छा इसका दिशा ही बदलो। व्यास जी की आज्ञा मानकर द्रोणी ने उत्तरा के गर्भ को नष्ट करने के लिए ब्रह्मास्त्र को प्रेरित किया। तत्काल ही माधव ने चक्रसुदर्शन को आदेश दिया कि तुम जाकर उत्तरा के गर्भ की रक्षा करो। भीम और अर्जुन ने क्रोध में आकर द्रोणी की हत्या करना चाह, किन्तु श्रीकृष्ण का संकेत पाकर वे रुक गये। कृष्ण ने कहा- 'यह अपने नियति के अनुसार जीवन और मृत्यु के बीच दोलायमान होकर जीवनयापन करेगा। इसकी दिव्य मणि को इसके मस्तक से निकाल लो।' इस पर द्रोणी ने अपने हाथ से ही दिव्य मणि को निकाल कर भीम के हाथ पर रख दिया। इसे लेकर वे सभी द्रौपदी के पास लौट आये।
महाभारत के इस दुःखद अवसान पर श्रीकृष्ण ने पाण्डवों सहित द्रौपदी को ढाढ़स बंधाया। माधव ने कहा मनुष्य नियति के हाथ की कठपुतली मात्र है। नियति जैसे चाहे उसे नचाती रहती है। मैंने तो इसे टालने का अन्तिम समय तक प्रयास किया, किन्तु नियति के मारे दुर्योधन, शकुनी, कर्णादि नहीं माने। इसमें किसी का दोष नहीं है। दुष्टों के सामने अच्छी बात एवं अच्छे लोगों का सुझाव काम नहीं आता। सम्प्रति आगे का कर्तव्य सम्पादन करना ही उचित है।
२. कठिन शब्दार्थ
३. सारांश
पाठ 'सेनापति — अश्वत्थामा' महाभारत युद्ध के अंतिम और सर्वाधिक वीभत्स चरण का वर्णन करता है। भीम द्वारा दुर्योधन की जंघा तोड़े जाने के बाद, अश्वत्थामा (द्रोणी) अपने राजा की दयनीय स्थिति देख प्रतिशोध की अग्नि में जल उठता है। दुर्योधन अपने रक्त से अश्वत्थामा का तिलक कर उसे अंतिम सेनापति नियुक्त करता है और पांडवों के वध की अंतिम इच्छा प्रकट करता है। रात्रि के समय, एक उल्लू द्वारा कौओं के समूह का संहार देखकर अश्वत्थामा को सोते हुए शत्रुओं पर आक्रमण करने का कुत्सित विचार आता है। कृपाचार्य के विरोध के बावजूद, अश्वत्थामा अपने पिता द्रोण की निर्मम हत्या का बदला लेने के लिए कृतसंकल्प रहता है।
अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा ने मिलकर मध्यरात्रि में पांडव शिविर पर हमला किया और सो रहे धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा द्रौपदी के पाँचों पुत्रों का पांडव समझकर संहार कर दिया। इस महापाप के बाद अश्वत्थामा व्यास के आश्रम में शरण लेता है। पांडवों द्वारा पीछा किए जाने पर वह प्राण रक्षा हेतु ब्रह्मास्त्र छोड़ देता है। प्रत्युत्तर में अर्जुन भी ब्रह्मास्त्र चलाते हैं, किंतु महर्षि व्यास के हस्तक्षेप पर अर्जुन अपना अस्त्र वापस ले लेते हैं, जबकि अश्वत्थामा उसे वापस लेने में असमर्थ रहता है। वह नीचतापूर्वक ब्रह्मास्त्र की दिशा उत्तरा के गर्भ की ओर मोड़ देता है, जिसकी रक्षा श्रीकृष्ण अपने चक्र से करते हैं। दंडस्वरूप श्रीकृष्ण अश्वत्थामा की दिव्य मणि छीन लेते हैं और उसे अनंत काल तक रोगों और पीड़ा के साथ भटकने का शाप देते हैं। अंत में, श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि नियति सर्वोपरि है और मनुष्य केवल उसके हाथ की कठपुतली है। यह पाठ प्रतिशोध के विनाशकारी परिणाम और धर्म की अंतिम रक्षा का जीवंत दस्तावेज है।
४. महत्वपूर्ण अंशों का संक्षेपीकरण
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'सेनापति — अश्वत्थामा' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : दुर्योधन द्वारा पराजय की स्थिति में अश्वत्थामा को कमान सौंपने और अपनी अंतिम क्रूर इच्छा प्रकट करने का वर्णन।
संक्षेपीकरण : मृत्यु शय्या पर पड़े दुर्योधन ने अपने रक्त से तिलक कर अश्वत्थामा को कौरव सेना का अंतिम सेनापति बनाया। उसने अपने मित्र से पांडवों के वध का वचन लिया, जिसे अश्वत्थामा ने प्रतिशोध की भावना से स्वीकार कर लिया।
संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय कृत 'प्रतिशोध' के उन्नीसवें अध्याय से।
प्रसंग : प्रकृति की एक घटना से अश्वत्थामा को अधर्मपूर्ण युद्ध की प्रेरणा मिलने का चित्रण।
संक्षेपीकरण : रात में एक शिकारी पक्षी द्वारा सोते हुए पक्षियों के संहार को देखकर अश्वत्थामा के मन में सोती हुई पांडव सेना पर आक्रमण करने का विचार आया। कृपाचार्य ने इसे कायरतापूर्ण बताया, किंतु पिता की हत्या के प्रतिशोध में अंधे अश्वत्थामा ने इसे ही अपना मार्ग चुना।
संदर्भ : 'प्रतिशोध' पुस्तक के 'सेनापति — अश्वत्थामा' पाठ से।
प्रसंग : अश्वत्थामा द्वारा विनाशकारी अस्त्र का प्रयोग और श्रीकृष्ण द्वारा उसे दिए गए भयानक दंड का वर्णन।
संक्षेपीकरण : संकट में घिरे अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया और उसे उत्तरा के गर्भ की ओर मोड़ दिया। श्रीकृष्ण ने अजन्मे शिशु की रक्षा की और अश्वत्थामा की मणि छीनकर उसे युगों-युगों तक व्याधिग्रस्त होकर भटकने का शाप दिया।
संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय रचित 'प्रतिशोध' के उन्नीसवें पाठ से।
प्रसंग : युद्ध के अंत में श्रीकृष्ण द्वारा पांडवों को दिया गया दार्शनिक ढाढ़स।
संक्षेपीकरण : श्रीकृष्ण ने शोकग्रस्त पांडवों को समझाया कि संसार की सभी घटनाएँ नियति के अधीन हैं। अधर्म का मार्ग चुनने वालों का विनाश निश्चित था। अब अतीत को भूलकर भविष्य के उत्तरदायित्वों को निभाना ही वास्तविक धर्म है।
५. विस्तृत विशदीकरण (भाव-पल्लवन)
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'सेनापति — अश्वत्थामा' नामक पाठ से लिया गया है इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : दुर्योधन के अंतिम क्षणों की घृणा और अश्वत्थामा के भीतर दहकती प्रतिशोध की ज्वाला का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने यहाँ महाभारत के अंत के उस भयावह दृश्य को उकेरा है जहाँ 'प्रतिशोध' धर्म और मानवता से ऊपर हो जाता है। दुर्योधन की जंघा टूट चुकी है, वह मृत्यु के द्वार पर है, किंतु उसका पांडवों के प्रति द्वेष शांत नहीं हुआ है। 'रक्त का टीका' लगाना एक अत्यंत वीभत्स और अशुभ कृत्य है, जो यह दर्शाता है कि अब युद्ध में किसी भी प्रकार की शुचिता शेष नहीं बची है। दुर्योधन ने अपनी अंतिम सेनापति की नियुक्ति हथियारों से नहीं, बल्कि अपने ही शरीर के लहू से की। यह कृत्य आने वाले उस खूनी खेल की पूर्वपीठिका थी जो अश्वत्थामा को करना था।
दुर्योधन की 'अंतिम प्रार्थना' पांडवों के मस्तक माँगना है, जो उसकी राक्षसी वृत्ति का परिचायक है। वह शांति से नहीं मरना चाहता, बल्कि अपने शत्रुओं के विनाश का समाचार सुनकर प्राण त्यागना चाहता है। अश्वत्थामा, जो स्वयं अपने पिता द्रोणाचार्य की छलपूर्वक हत्या से मर्माहत था, इस आदेश को पाकर प्रतिशोध की साक्षात् मूर्ति बन गया। यहाँ मित्रता का वह विकृत रूप दिखाई देता है जहाँ एक मित्र दूसरे मित्र के महापाप में सहभागी बनता है। 'जो आज्ञा' कहकर अंधकार में ओझल हो जाना, मानवता के पतन की ओर संकेत करता है। यह अंश सिद्ध करता है कि जब शासन और शक्ति अधर्म के हाथों में होती है, तो उसका अंत इसी प्रकार के रक्तपात और घृणा के साथ होता है। दुर्योधन का यह रक्त-तिलक अश्वत्थामा के लिए वरदान नहीं, बल्कि एक ऐसा अभिशाप बन गया जिसने उसे इतिहास का सबसे बड़ा अपराधी बना दिया। लेखक यहाँ यह संदेश देते हैं कि प्रतिशोध में लिया गया निर्णय केवल विनाश ही लाता है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'सेनापति — अश्वत्थामा' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : प्रकृति की क्रूरता से अधर्मपूर्ण रणनीति की प्रेरणा मिलने का मनोवैज्ञानिक चित्रण।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक ने यहाँ अश्वत्थामा के मानसिक पतन की प्रक्रिया को बड़ी सूक्ष्मता से चित्रित किया है। रात के अंधकार में एक उल्लू (निशाचर पक्षी) द्वारा सो रहे कौओं (शकुनी-समूह) पर हमला करना प्रकृति का एक सहज नियम हो सकता है, किंतु अश्वत्थामा ने इसे अपनी युद्ध-नीति बना लिया। यह दृश्य दर्शाता है कि जब मनुष्य का विवेक समाप्त हो जाता है, तो वह हिंसक पशुओं के आचरण से प्रेरणा लेने लगता है। सोती हुई सेना पर प्रहार करना प्राचीन भारतीय युद्ध-मर्यादा के सर्वथा विरुद्ध था।
कृपाचार्य जैसे धर्मनिष्ठ वृद्ध ने अश्वत्थामा को चेतावनी दी कि इससे उसकी 'अपकीर्ति' होगी, किंतु अश्वत्थामा के लिए 'पिता की निर्मम हत्या' का प्रतिशोध किसी भी मान-अपमान से ऊपर था। उसने अपनी मर्यादा को अपनी पीड़ा की वेदी पर चढ़ा दिया। कृपाचार्य का विवश होकर उसके साथ जाना 'पारिवारिक मोह' और 'अकेलेपन के भय' को दर्शाता है। वे जानते थे कि अश्वत्थामा पाप कर रहा है, फिर भी वे उसे अकेला नहीं छोड़ सके। यह प्रसंग उस 'सामूहिक पतन' का गवाह है जहाँ अच्छे लोग भी बुरों का साथ देने को विवश हो जाते हैं। रात्रि का वह सन्नाटा और सोई हुई सेना की बेखबरी, अश्वत्थामा की कायरता को और अधिक प्रखर बनाती है। लेखक यहाँ यह स्पष्ट करते हैं कि प्रतिशोध व्यक्ति को इतना अंधा कर देता है कि उसे अबोध बच्चों (पांडव पुत्रों) और निहत्थे योद्धाओं में कोई अंतर दिखाई नहीं देता। यह घटना महाभारत के युद्ध के 'धर्म-युद्ध' होने के दावे को अंतिम रूप से ध्वस्त कर देती है। यह विशदीकरण मनुष्य की पाशविक प्रवृत्तियों के जाग्रत होने की एक भयानक व्याख्या है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'सेनापति — अश्वत्थामा' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : अश्वत्थामा की नीचता की पराकाष्ठा, ब्रह्मास्त्र का दुरुपयोग और श्रीकृष्ण का अंतिम न्याय।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने यहाँ अश्वत्थामा के अपराध की उस सीमा का वर्णन किया है जिसे स्वयं ईश्वर भी क्षमा नहीं कर सके। ब्रह्मास्त्र जैसे प्रलयंकारी अस्त्र का प्रयोग अपनी व्यक्तिगत रक्षा के लिए करना ही एक अपराध था, किंतु उसे एक 'अजन्मे शिशु' (उत्तरा के गर्भ) की ओर मोड़ देना मानवता के विरुद्ध सबसे बड़ा कृत्य था। अश्वत्थामा पांडव वंश के बीज को ही नष्ट कर देना चाहता था। अर्जुन की महानता यहाँ प्रकट होती है कि वे अस्त्र वापस लेना जानते थे और गुरु-पुत्र के प्रति श्रद्धावश उन्होंने महर्षि व्यास की आज्ञा मानी।
श्रीकृष्ण का यहाँ 'रक्षक' और 'न्यायाधीश' दोनों रूपों में प्राकट्य होता है। उन्होंने उत्तरा के गर्भ की रक्षा कर यह सिद्ध किया कि अधर्म कभी भविष्य को नहीं जीत सकता। अश्वत्थामा को मृत्युदण्ड न देकर 'मणि' छीन लेना और 'अमरता का शाप' देना, मृत्यु से भी भयानक सजा थी। श्रीकृष्ण का न्याय अत्यंत दार्शनिक है—जो व्यक्ति जीवन की गरिमा का सम्मान नहीं करता, उसे 'जीवन' ही एक बोझ बनाकर दे दिया गया। 'दोलायमान होकर जीवनयापन' करने का अर्थ है कि वह न जी सकेगा और न मर सकेगा। वह युगों-युगों तक अपने पापों की सड़न लेकर भटकेगा। यह शाप प्रतिशोध की उस अग्नि का परिणाम है जिसने अश्वत्थामा को भस्म तो नहीं किया, किंतु उसे एक अनंत पीड़ा में बदल दिया। लेखक यहाँ यह संदेश देते हैं कि शक्ति का दुरुपयोग करने वाले को प्रकृति स्वयं दंडित करती है। अश्वत्थामा का मस्तक आज भी उस मणि के घाव से रिस रहा है, जो यह याद दिलाता है कि अधर्म का अंत सदा ही ग्लानि और पीड़ा में होता है। यह अंश ईश्वरीय न्याय की सर्वोच्चता को स्थापित करता है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'सेनापति — अश्वत्थामा' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : युद्ध के समापन पर श्रीकृष्ण का दार्शनिक निष्कर्ष और भविष्य की ओर बढ़ने का संदेश।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : पाठ के इस अंतिम भाग में लेखक ने महाभारत का सार प्रस्तुत किया है। जब सब कुछ नष्ट हो गया—लाखों योद्धा मारे गए, कुल का दीपक बुझने की कगार पर पहुँच गया—तब श्रीकृष्ण ने 'नियति' के सिद्धांत को स्पष्ट किया। 'मनुष्य नियति के हाथ की कठपुतली है'—यह वाक्य कर्तापन के अभिमान को तोड़ता है। श्रीकृष्ण ने स्वयं को भी इस चक्र का हिस्सा बताया, क्योंकि उन्होंने भी इसे टालने का अथक प्रयास किया था। किंतु जब मनुष्य का अहंकार (जैसे दुर्योधन और शकुनि का) चरम पर होता है, तो वह ईश्वर के सुझावों को भी ठुकरा देता है।
'नियति के मारे' वे लोग थे जिनकी बुद्धि उनके विनाश से पहले ही हर ली गई थी। श्रीकृष्ण का यह कहना कि 'इसमें किसी का दोष नहीं है', पांडवों के अपराध-बोध को कम करने के लिए था। वे यह समझाना चाहते थे कि जो कुछ हुआ, वह एक विराट ईश्वरीय योजना का हिस्सा था ताकि अधर्म का बोझ कम हो सके। 'दुष्टों के सामने अच्छी बात काम नहीं आती'—यह कटु सत्य है जो हर युग में प्रासंगिक है। अंत में, कृष्ण ने 'कर्तव्य संपादन' पर बल दिया। जीवन रुकने का नाम नहीं है; युद्ध की राख में से ही नए शांति-युग का निर्माण करना था।
यह समापन पाठकों को एक गहरा जीवन-दर्शन प्रदान करता है कि अतीत की कड़वाहट और विभीषिका में डूबे रहने के बजाय, वर्तमान के दायित्वों को निभाना ही सच्ची वीरता है। नियति ने अपना खेल खेल लिया, अब पांडवों को एक नया राष्ट्र और समाज गढ़ना था। यह अध्याय प्रतिशोध की विफलता और धर्म की कठिन विजय के साथ समाप्त होता है, जहाँ श्रीकृष्ण की शांतिपूर्ण वाणी विनाश के कोलाहल को शांत करती है। यह विशदीकरण स्पष्ट करता है कि मनुष्य का पुरुषार्थ तभी सार्थक है जब वह ईश्वरीय इच्छा और धर्म के साथ संरेखित हो।
