सहस्त्रबाहु और यमदग्नि (प्रतिशोध-05)- संक्षेपीकरण/विशदीकरण एवं सारांश

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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प्रस्तुत लेख में डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय द्वारा संपादित पुस्तक 'प्रतिशोध' के पांचवें अध्याय 'सहस्त्रबाहु और यमदग्नि' का सांगोपांग विश्लेषण है। इसमें महाराज कृतवीर्य की तपस्या, सहस्त्रबाहु अर्जुन के जन्म की अलौकिक घटना और उसकी निरंकुश सत्ता का विस्तृत वर्णन चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल' द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

पुस्तक : प्रतिशोध
संपादक : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय
पाठ क्रम एवं नाम : 05-सहस्त्रबाहु और यमदग्नि
मूल विषय : सहस्त्रबाहु का दिव्य जन्म, उसकी अतुलनीय शक्ति और निरंकुश शासन।
संक्षेपीकरण/विशदीकरण : चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'

१. मूल पाठ

कृतवीर्य नामक एक अत्यन्त प्रतापी राजा थे। उनका ऐश्वर्य विरोधी राजाओं को अखरता था। कृतवीर्य विष्णु के अनन्य उपासक थे। विष्णु के उपासक प्राय: दम्भ और पाखण्ड से दूर रहते हैं। उनके कोई सन्तान नहीं थी। इसे वे ईश्वर की इच्छा मानते थे, किन्तु महारानी इसे अपने जीवन की सर्वोच्च रिक्तता समझतीं। प्राय: वे अपने राजमहल में उदास हो जाया करतीं। भक्तपारायण राजा उन्हें धीरज बँधाया करते। मानव जीवन परोपकार के लिए वरदान है। अपनी स्वार्थलिप्सा के लिए ईश्वर की अनुकम्पा का तिरस्कार नहीं करना चाहिए।

प्रजा ही हमारी सन्तान है। प्रजा का हित करना हमारा कर्तव्य है। यही हमारे इष्ट को अभीप्सित है। परन्तु रानी पर इसका कोई असर नहीं होता। वह शान्त मन से ईश्वर से शिकायत करती रहती। अपने आराध्य का अपमान समझकर राजा अत्यन्त मर्माहत हो उठते। मन्त्रीगण उन्हें सान्त्वना देते। राजगुरु सन्तोष का उपदेश करते। ईश्वर सर्वशक्तिमान है। वह सबके मनोरथ पूर्ण करने में समर्थ है। आप निराश न हों, वह आपको भी कृतकार्य अवश्य करेंगे। अपनी नियति समझकर राजा भी शान्त हो जाते। अन्ततः एक दिन राजा ने राज्यभार अपने विश्वासपात्र मंत्रियों पर डालकर भगवान विष्णु की आराधना करने के लिए हिमालय की उपत्यका का मार्ग पकड़ लिया। काफी ऊँचाई पर पहुँचकर बद्रीनारायण की शरण में जाकर उन्होंने अपनी उग्र तपस्या प्रारम्भ की। एकनिष्ठ होकर अपनी तपश्चर्या से राजा ने विष्णु भगवान को प्रसन्न कर लिया। अकस्मात् विष्णु को अपने सामने उपस्थित पाकर राजा ने उनके चरणों पर अपना शिर रख दिया। भाव- विहुल भक्त को देखकर भगवान ने अभीष्ट वर माँगने का आदेश दिया। प्रभु से राजा ने वरदान के रूप में प्रभु-स्वरूप पुत्र की कामना की। एवमस्तु कहकर विष्णु स्वधाम सिधारे।

कदाचिद् लक्ष्मी से नाराज होकर विष्णु ने उन्हें ‘घोड़ी' होने का शाप दे दिया। क्षमा याचना के परिणामस्वरूप इसी रूप में पुत्र प्राप्ति के पश्चात् पुन: लक्ष्मी रूप में दे बैकुण्ठ आ सकेंगी। इस घटना के बाद लक्ष्मी घोड़ी के रूप में बद्रीनाथ जाकर आशुतोष भगवान शिव की आराधना करने लगीं। कुछ दिन की उग्र तपस्या करने पर शंकर जी ने देवी लक्ष्मी से तप का कारण जानना चाह। लक्ष्मी ने कहा प्रभु मुझे पुत्र प्रदान कर आप कृतार्थ करें। पहले तो शिव ने परिहास किया किन्तु लक्ष्मी की प्रसन्नता हेतु भगवान विष्णु का आवाहन किया। विष्णु के आने पर वे बोले-प्रभु! लक्ष्मी के मनोरथ पूर्ण होने का समय आ गया है। इन्हें सुनाथ कीजिये। मुस्कुराते हुए विष्णु बोले-भगवन्, आपकी आज्ञा शिरोधार्य है। क्षण भर में ही लक्ष्मीपति ने ‘हयग्रीव’ के रूप में अवतार लिया। घोड़े के रूप में लक्ष्मी के सहवास से एक अनुपम बालक ने जन्म लिया। इसकी हजार भुजायें थीं। चेहरे पर अमित कान्ति विराजमान थी। बालक को देखते ही लक्ष्मी अपने स्वरूप में आ गयीं। पुनः विष्णु को स्वरूप में पाकर वे स्तुति करने लगी। प्रसन्न होकर विद्या का समालिंगन किया। निज-धाम पधारने के लिए विष्णु द्वारा समादेशित लक्ष्मी ने कहा-प्रभु, यह पुत्र मुझे अत्यन्त प्यारा है। इसी ने मुझे आपसे मिलाया है। मुझपर इसका अनन्त-उपकार है। मैं इसे अपने साथ ले चल की अनुमति चाहती हूँ। प्रभु ने कृतवीर्य राजा की तपस्या का इतिवृत्त सुनाकर इसे उन्हें प्रदान करने का आदेश दिया। प्रभु-प्रेरित कृतवीर्य वहाँ उपस्थित हो गये। उन्हें इस तेजस्वी बालक को सौंपते हुए इसका नामकरण' अर्जुन' रखा। आगे चलकर यही बालक कार्तवीर्य-सहस्रार्जुन नाम से विख्यात हुआ। साक्षात् लक्ष्मीनारायण के तेजश से उत्पन्न यह अत्यन्त पराक्रमी एवं सर्वगुण सम्पन्न हुआ। इसी बालक से हैहय वंश का सूत्रपात हुआ। यह बालक विख्यात तांत्रिक हुआ। कार्तवीर्य-तन्त्र इन्हीं के द्वारा प्रवर्तित माना जाता है। इसने भगवान शिव को प्रसन्न करके अनेक रिद्धि-सिद्धि को प्राप्त किया। इसके ऐश्वर्य से पुरन्दर भी श्रीहीन हो उठा। इसने अपना साम्राज्य विस्तार किया। इसके पाँच सौ पुत्र हुए, जो इसी के समान बलवान थे। पृथ्वी पर इसका सर्वत्र आतंक बढ़ गया। रावण जैसे दुर्जय योद्धा को इसने खेल-खेल में पकड़ लिया। इसके अत्याचार से पृथ्वी काँपने लगी। इसने सम्पूर्ण सुरासुरों को अपने पराक्रम से भयभीत कर रखा था।

यह अत्यन्त विलासी एवं आखेटक राजा था। आखेट के समय यह अपनी विशाल सेना के साथ जंगलों का सर्वनाश करता और ऋषि-मुनिया को भी क्लेश पहुँचाता था। रास्ते में पड़ने वाले नगर, गाँव को भी तहस-नहस करके यह परम खुश होता था। शत्रु राजाओं को परास्त करके उनकी सम्पत्ति लूटना इसका व्यवसाय बन गया था। लोग स्वत: अपनी सम्पत्ति को इसे समर्पण करके संतोष की साँस लेते थे। इसके पराक्रम से देवासुर, यक्ष-गन्धर्व, किन्नरादि को अपना वशवर्ती बना लिया। लोग इससे अपनी राह बचाते। अपने जीवन की खैर मनाते। इस प्रकार वह निरंकुश शासक बन बैठा।

२. कठिन शब्दार्थ

दम्भ = अहंकार/घमंड, लिप्सा = लालच/पाने की इच्छा, अभीप्सीत = चाहा हुआ, मर्माहत = मन को चोट पहुँचना, कृतकार्य = सफल, उपत्यका = पर्वत के पास की भूमि, विहुल = भावुक/अधीर, शिरोधार्य = आदरपूर्वक स्वीकार करना, हयग्रीव = घोड़े की गर्दन जैसा रूप, इतिवृत्त = वृत्तांत/कहानी, सहवास = साथ रहना, सूत्रपात = आरंभ, पुरन्दर = इंद्र, श्रीहीन = शोभा रहित, दुर्जय = जिसे जीतना कठिन हो, आखेटक = शिकारी, क्लेश = दुख, वशवर्ती = नियंत्रण में होना।

३. सारांश

पाठ 'सहस्त्रबाहु और यमदग्नि' महाराज कृतवीर्य के धैर्य और उनके पुत्र सहस्त्रबाहु अर्जुन के उदय की कथा है। महाराज कृतवीर्य भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे, किंतु संतानहीनता के कारण उनकी पत्नी दुखी रहती थीं। राजा का मानना था कि प्रजा ही उनकी संतान है, किंतु रानी के दुःख को दूर करने के लिए उन्होंने अंततः राज-काज त्याग कर हिमालय पर कठिन तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिए और स्वयं उनके पुत्र के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। एक अलौकिक घटनाक्रम के तहत, जब लक्ष्मी शापवश घोड़ी बनी थीं और विष्णु ने हयग्रीव रूप धारण किया था, तब सहस्त्रबाहु अर्जुन का जन्म हुआ।

अर्जुन की एक हजार भुजाएँ थीं और उसका मुख मंडल दिव्य तेज से परिपूर्ण था। वह हैहय वंश का प्रवर्तक बना। सहस्त्रबाहु ने भगवान शिव की आराधना कर अनेक रिद्धि-सिद्धियां प्राप्त कीं और एक महान तांत्रिक के रूप में प्रसिद्ध हुआ। उसकी शक्ति इतनी बढ़ गई कि उसने देवराज इंद्र को भी फीका कर दिया और रावण जैसे अपराजेय योद्धा को बंदी बना लिया। किंतु, अपार शक्ति ने उसे अहंकारी और विलासी बना दिया। वह आखेट के बहाने जंगलों और ऋषि-मुनियों के आश्रमों को नष्ट करने लगा। वह एक निरंकुश और अत्याचारी शासक बन बैठा, जिससे पूरी पृथ्वी और सुरासुर भयभीत रहने लगे। यह पाठ दर्शाता है कि कैसे दैवीय वरदान से प्राप्त शक्ति भी यदि संयमित न हो, तो वह विनाश का कारण बन जाती है।

४. महत्वपूर्ण अंशों का संक्षेपीकरण

१. संक्षेपीकरण संकेत : "कृतवीर्य विष्णु के अनन्य उपासक थे... अपनी स्वार्थलिप्सा के लिए ईश्वर की अनुकम्पा का तिरस्कार नहीं करना चाहिए।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'सहस्त्रबाहु और यमदग्नि' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : महाराज कृतवीर्य की भक्ति और संतानहीनता के प्रति उनके दार्शनिक दृष्टिकोण का वर्णन।
संक्षेपीकरण : कृतवीर्य भगवान विष्णु के सच्चे भक्त थे और आडंबर से दूर रहते थे। संतान न होने पर भी वे उसे ईश्वर की इच्छा मानकर संतुष्ट थे और व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ईश्वरीय विधान को दोष देना अनुचित समझते थे।

२. संक्षेपीकरण संकेत : "प्रजा ही हमारी सन्तान है... वह आपको भी कृतकार्य अवश्य करेंगे।"

संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय रचित 'प्रतिशोध' के पंचम अध्याय से।
प्रसंग : राजा द्वारा रानी को धीरज बँधाने और राजगुरु के आश्वासन का वर्णन।
संक्षेपीकरण : राजा कृतवीर्य प्रजा को ही अपनी संतान मानते थे, किंतु रानी की निराशा देख राजगुरु ने उन्हें ईश्वर की सर्वशक्तिमानता पर विश्वास रखने और सफलता का आशीर्वाद दिया।

३. संक्षेपीकरण संकेत : "चेहरे पर अमित कान्ति विराजमान थी... मुझपर इसका अनन्त-उपकार है।"

संदर्भ : 'प्रतिशोध' पुस्तक के 'सहस्त्रबाहु और यमदग्नि' पाठ से।
प्रसंग : सहस्त्रबाहु के दिव्य जन्म और लक्ष्मी द्वारा उसे अपने साथ ले जाने की इच्छा का वर्णन।
संक्षेपीकरण : विष्णु और लक्ष्मी के सहयोग से जन्मे बालक का मुख तेज से भरा था। लक्ष्मी उसे अत्यंत प्रिय मानती थीं क्योंकि उसी के कारण उन्हें शाप से मुक्ति और विष्णु का सानिध्य पुनः प्राप्त हुआ।

४. संक्षेपीकरण संकेत : "साक्षात् लक्ष्मीनारायण के तेजश से उत्पन्न... सम्पूर्ण सुरासुरों को अपने पराक्रम से भयभीत कर रखा था।"

संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय कृत 'प्रतिशोध' के पंचम अध्याय से।
प्रसंग : सहस्त्रबाहु अर्जुन की शक्तियों, सिद्धियों और उसके बढ़ते आतंक का चित्रण।
संक्षेपीकरण : लक्ष्मीनारायण के अंश से जन्मे सहस्त्रबाहु ने शिव से सिद्धियां पाकर इंद्र और रावण तक को परास्त कर दिया, जिससे समस्त लोकों में उसका भय व्याप्त हो गया।

५. संक्षेपीकरण संकेत : "यह अत्यन्त विलासी एवं आखेटक राजा था... इस प्रकार वह निरंकुश शासक बन बैठा।"

संदर्भ : 'प्रतिशोध' पुस्तक के पंचम पाठ से।
प्रसंग : सहस्त्रबाहु के पतन और उसके अत्याचारपूर्ण शासन का वर्णन।
संक्षेपीकरण : शक्ति के मद में सहस्त्रबाहु विलासी और क्रूर हो गया। उसने नगरों, गाँवों और ऋषियों के आश्रमों को नष्ट करना और प्रजा को लूटना अपना धर्म बना लिया।

५. विस्तृत विशदीकरण (भाव-पल्लवन)

१. विशदीकरण संकेत : "कृतवीर्य विष्णु के अनन्य उपासक थे। विष्णु के उपासक प्राय: दम्भ और पाखण्ड से दूर रहते हैं... अपनी स्वार्थलिप्सा के लिए ईश्वर की अनुकम्पा का तिरस्कार नहीं करना चाहिए।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के सहस्त्रबाहु और यमदग्नि नामक पाठ से लिया गया है इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : महाराज कृतवीर्य के सात्विक चरित्र और भक्ति के वास्तविक स्वरूप का विवेचन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने यहाँ एक आदर्श भक्त और राजा के गुणों का चित्रण किया है। महाराज कृतवीर्य का व्यक्तित्व सादगी और सत्यता का प्रतीक था। 'विष्णु का उपासक' होने का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि अहंकार (दम्भ) और दिखावे (पाखण्ड) का त्याग है। महाराज के जीवन में संतान का अभाव था, जिसे उन्होंने अपनी 'नियति' और 'ईश्वर की इच्छा' के रूप में स्वीकार कर लिया था। यह उनकी मानसिक परिपक्वता को दर्शाता है कि वे अपनी व्यक्तिगत कमी के लिए ईश्वर को दोष नहीं देते थे।

दूसरी ओर, महारानी की उदासी एक सामान्य मानवीय प्रतिक्रिया थी, जिसे राजा ने बड़े ही दार्शनिक ढंग से दूर करने का प्रयास किया। 'मानव जीवन परोपकार के लिए वरदान है'—यह वाक्य भारतीय दर्शन का सार है। कृतवीर्य का मानना था कि यदि ईश्वर ने हमें इतना बड़ा साम्राज्य और प्रजा की सेवा का अवसर दिया है, तो वह भी एक बड़ी 'अनुकम्पा' है। केवल एक व्यक्तिगत इच्छा (पुत्र प्राप्ति) के पूरा न होने पर ईश्वर के शेष उपकारों को भूल जाना या उनका तिरस्कार करना कृतघ्नता है। राजा का यह चरित्र हमें सिखाता है कि भक्ति हमें संतोष और धैर्य देती है। अपनी सुख-सुविधाओं और स्वार्थों से ऊपर उठकर जो व्यक्ति ईश्वर के विधान को स्वीकार करता है, वही वास्तव में सुखी रह सकता है। यह गद्यांश निष्काम कर्म और अटूट श्रद्धा की एक अनुपम व्याख्या प्रस्तुत करता है।

२. विशदीकरण संकेत : "प्रजा ही हमारी सन्तान है। प्रजा का हित करना हमारा कर्तव्य है। यही हमारे इष्ट को अभीप्सित है... वह आपको भी कृतकार्य अवश्य करेंगे।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'सहस्त्रबाहु और यमदग्नि' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : राजा कृतवीर्य की राजधर्म के प्रति निष्ठा और राजगुरु द्वारा दिए गए सांत्वनापूर्ण उपदेश का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक ने यहाँ 'राजधर्म' की उच्चता को स्थापित किया है। प्राचीन भारतीय मान्यताओं के अनुसार राजा प्रजा का पिता होता है। कृतवीर्य इसी भाव को आत्मसात् किए हुए थे। उनका तर्क था कि यदि उन्हें अपनी देह से उत्पन्न संतान नहीं मिली, तो क्या हुआ, पूरा साम्राज्य ही उनकी संतान के समान है। 'प्रजा का हित करना' ही उनके आराध्य विष्णु की वास्तविक सेवा थी। ईश्वर तब प्रसन्न होता है जब हम अपने कर्तव्यों का पालन निष्ठापूर्वक करते हैं।

किंतु, मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर रानी का विलाप भी अपनी जगह सही था, जिससे राजा मर्माहत (दुखी) हो जाते थे। यहाँ राजगुरु और मंत्रियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे राजा को 'संतोष' और 'आशा' का मार्ग दिखाते हैं। राजगुरु का यह कहना कि 'ईश्वर सर्वशक्तिमान है', हमें यह विश्वास दिलाता है कि जब मानवीय प्रयास थक जाते हैं, तब ईश्वरीय हस्तक्षेप प्रारंभ होता है। ईश्वर असंभव को भी संभव करने में समर्थ है। राजगुरु ने राजा को निराश न होने की सलाह दी और भविष्य में 'कृतकार्य' (सफल) होने का आशीर्वाद दिया। यह अंश स्पष्ट करता है कि एक राजा के लिए व्यक्तिगत सुखों से अधिक महत्वपूर्ण उसका कर्तव्य और प्रजा का कल्याण है, किंतु जब वह धर्म की राह पर चलता है, तो ईश्वर स्वयं उसकी व्यक्तिगत कठिनाइयों का समाधान कर देता है। यह गद्यांश श्रद्धा, धैर्य और कर्तव्य के बीच के संतुलन को बड़े ही प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करता है।

३. विशदीकरण संकेत : "चेहरे पर अमित कान्ति विराजमान थी। बालक को देखते ही लक्ष्मी अपने स्वरूप में आ गयीं... मुझपर इसका अनन्त-उपकार है।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के सहस्त्रबाहु और यमदग्नि नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : सहस्त्रबाहु अर्जुन के अलौकिक जन्म और देवी लक्ष्मी के वात्सल्य तथा शाप मुक्ति का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : यह अंश पौराणिक कथा के उस दिव्य पक्ष को उजागर करता है जहाँ ईश्वरीय लीला और मानवीय इच्छाओं का मिलन होता है। बालक सहस्त्रबाहु का जन्म कोई सामान्य घटना नहीं थी, वह 'हयग्रीव' (विष्णु) और 'घोड़ी' (शापग्रस्त लक्ष्मी) के अंश से हुआ था। बालक के चेहरे की 'अमित कान्ति' (असीम चमक) उसके भविष्य के प्रतापी होने का संकेत थी। जैसे ही बालक का जन्म हुआ, लक्ष्मी को अपने वास्तविक स्वरूप की प्राप्ति हुई। यह संकेत है कि संतान का जन्म कई बार माता-पिता के दुखों और शापों के अंत का कारण बनता है।

देवी लक्ष्मी का उस बालक के प्रति विशेष अनुराग होना स्वाभाविक था। उन्होंने कहा कि 'मुझ पर इसका अनंत उपकार है'—यह एक माँ के हृदय की कृतज्ञता है। लक्ष्मी उसे बैकुंठ ले जाना चाहती थीं, क्योंकि उसी बालक के माध्यम से उनका पुनर्मिलन विष्णु से संभव हो पाया था। यहाँ लेखक ने संतान के प्रति माता-पिता की भावनाओं का बड़ा ही कोमल चित्रण किया है। भले ही वह बालक आगे चलकर अत्याचारी बना, किंतु जन्म के समय वह साक्षात् लक्ष्मीनारायण के तेज का पुंज था। लक्ष्मी का उसे 'अनंत उपकार' मानने वाला भाव यह दर्शाता है कि ईश्वर की योजना में हर जन्म का एक विशेष प्रयोजन होता है। यह गद्यांश अलौकिक कथा को मानवीय संवेदनाओं के साथ जोड़कर पाठक के मन में विस्मय और भक्ति का भाव जाग्रत करता है। यह पुत्र की महत्ता और माँ के निस्वार्थ प्रेम का एक दिव्य उदाहरण है।

४. विशदीकरण संकेत : "साक्षात् लक्ष्मीनारायण के तेजश से उत्पन्न यह अत्यन्त पराक्रमी एवं सर्वगुण सम्पन्न हुआ... सम्पूर्ण सुरासुरों को अपने पराक्रम से भयभीत कर रखा था।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'सहस्त्रबाहु और यमदग्नि' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : सहस्त्रबाहु अर्जुन के अभ्युदय, उसकी सिद्धियों और उसके विश्व-विजयी पराक्रम का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक ने यहाँ सहस्त्रबाहु के शौर्य की पराकाष्ठा का वर्णन किया है। सहस्त्रबाहु केवल एक राजा नहीं, बल्कि 'लक्ष्मीनारायण' के तेज का प्रत्यक्ष रूप था। उसकी एक हजार भुजाएँ उसकी असीम शक्ति का प्रतीक थीं। उसने न केवल शस्त्र विद्या में महारत हासिल की, बल्कि वह 'विख्यात तांत्रिक' भी बना। तांत्रोक्त सिद्धियाँ और भगवान शिव की कृपा से प्राप्त रिद्धि-सिद्धियों ने उसे अपराजेय बना दिया। उसकी शक्ति का आलम यह था कि देवराज इंद्र (पुरन्दर) का ऐश्वर्य भी उसके सामने फीका पड़ गया।

सहस्त्रबाहु का सबसे बड़ा गौरवपूर्ण क्षण वह था जब उसने 'रावण' जैसे दुर्जय योद्धा को खेल-खेल में बंदी बना लिया। यह घटना सिद्ध करती है कि उस समय पृथ्वी पर उससे बड़ा कोई योद्धा नहीं था। किंतु, इसी अत्यधिक पराक्रम ने उसे 'निरंकुश' बना दिया। जब शक्ति के साथ विनम्रता और नैतिकता का लोप हो जाता है, तो वह 'आतंक' बन जाती है। उसके पाँच सौ पुत्र भी उसी के समान बलशाली थे, जिससे उसका वंश (हैहय वंश) अजेय हो गया। पूरी पृथ्वी उसके अत्याचारों से काँपने लगी। लेखक यहाँ संकेत देते हैं कि जिस बालक का जन्म ईश्वरीय वरदान से हुआ था, वह अपनी शक्ति के मद में चूर होकर देवताओं और असुरों दोनों के लिए भय का कारण बन गया। यह अंश शक्ति के उस स्वरूप को दर्शाता है जो यदि धर्म से विचलित हो जाए, तो वह सृष्टि के लिए संकट बन जाता है। सहस्त्रबाहु का यह चरमोत्कर्ष ही आगे चलकर उसके पतन और परशुराम के क्रोध का कारण बनता है।

५. विशदीकरण संकेत : "यह अत्यन्त विलासी एवं आखेटक राजा था। आखेट के समय यह अपनी विशाल सेना के साथ जंगलों का सर्वनाश करता... इस प्रकार वह निरंकुश शासक बन बैठा।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के सहस्त्रबाहु और यमदग्नि नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : सहस्त्रबाहु अर्जुन के नैतिक पतन और उसके अत्याचारी शासन का विस्तृत चित्रण।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : पाठ के इस अंतिम अंश में लेखक ने सहस्त्रबाहु के पतन की प्रक्रिया को स्पष्ट किया है। अपार शक्ति और अजेयता ने उसे 'विलासी' बना दिया। उसके लिए 'आखेट' (शिकार) केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि विनाश का माध्यम बन गया था। वह अपनी विशाल सेना के साथ जब निकलता, तो प्राकृतिक संपदा और 'जंगलों का सर्वनाश' कर देता था। एक राजा का कर्तव्य प्रकृति और ऋषियों की रक्षा करना होता है, किंतु सहस्त्रबाहु ने ऋषियों को 'क्लेश' पहुँचाना शुरू कर दिया।

वह केवल वनों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नगरों और गाँवों को 'तहस-नहस' करने में उसे आनंद मिलने लगा। यह उसके मानसिक विक्षेप का प्रमाण है कि दूसरे के दुःख में उसे सुख मिलने लगा था। 'सम्पत्ति लूटना' उसका व्यवसाय बन गया, जिससे भयभीत होकर लोग स्वेच्छा से अपनी संपत्ति उसे सौंप देते थे ताकि उनकी जान बच सके। उसने न केवल मनुष्यों, बल्कि यक्ष, गंधर्व और किन्नरों तक को अपना 'वशवर्ती' (गुलाम) बना लिया था।

'निरंकुश शासक' वह होता है जिस पर न धर्म का अंकुश हो और न नीति का। सहस्त्रबाहु का यह स्वरूप उसके दैवीय जन्म के बिल्कुल विपरीत था। लेखक यहाँ यह संदेश देना चाहते हैं कि व्यक्ति चाहे कितना भी महान कुल में जन्मे या कितनी भी सिद्धियाँ प्राप्त कर ले, यदि उसके भीतर दया, करुणा और लोक-कल्याण की भावना समाप्त हो जाए, तो वह राक्षस तुल्य हो जाता है। सहस्त्रबाहु का यह अत्याचार ही उस 'प्रतिशोध' की आधारशिला है जो आगे चलकर यमदग्नि और परशुराम के माध्यम से प्रकट होता है। यह गद्यांश सत्ता के दुरुपयोग और उसके विनाशकारी परिणामों का एक चेतावनी भरा चित्रण है।

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