सेनापति — अंगराज कर्ण (प्रतिशोध-18)- संक्षेपीकरण/विशदीकरण एवं सारांश

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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प्रस्तुत लेख में 'प्रतिशोध' पुस्तक के अठारहवें अध्याय 'सेनापति — अंगराज कर्ण' का पूर्ण विश्लेषण है। इसमें कर्ण का अद्वितीय शौर्य, दुःशासन का अंत, कर्ण के रथ का पहिया धँसना और दुर्योधन के पतन की ऐतिहासिक कथा का विस्तृत वर्णन चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल' द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

पुस्तक : प्रतिशोध
संपादक : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय
पाठ क्रम एवं नाम : 18-सेनापति — अंगराज कर्ण
मूल विषय : कर्ण का सेनापतित्व, पांडवों को जीवनदान, दुःशासन और कर्ण का वध तथा दुर्योधन की पराजय।
संक्षेपीकरण/विशदीकरण : चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'

१. मूल पाठ

आचार्य द्रोण के मारे जाने पर महारथी कर्ण को सेनापति चुना गया। कर्ण ने कहा कि — “मुझे यदि श्रीकृष्ण जैसा सारथी उपलब्ध करा दिया जाय तो मैं अर्जुन को सहज ही मार सकता हूँ।” इस समय सारथी के रूप में मद्र नरेश शल्य ही ऐसे एकमात्र सारथी हो सकते हैं, जो श्रीकृष्ण की बराबरी कर सकें। यह सुनकर दुर्योधन अपने साथ कर्ण को लेकर महाराज शल्य के शिविर तक गये। वे कर्ण को बाहर ही छोड़कर अन्दर पहुँचे। संक्षिप्त चर्चा के पश्चात् दुर्योधन बोला-मामाश्री आप जैसा महान व्यक्ति दुर्लभ है। सामान्यजन तो सम्बन्धी तक ही सीमित होते हैं, किन्तु पाण्डवों के मामा होकर भी आप हमें नकुल और सहदेव से कम नहीं मानते। हम पर आपका बड़ा अनुग्रह है। एक उपकार मेरे ऊपर और कर दें। मेरे लिये आपका यह महान अनुग्रह होगा। कृपया आप वचन दें कि इसे आप अन्यथा नहीं लेंगे। शल्य के आश्वासन पर कर्ण को दुर्योधन ने बुलाया। कर्ण ने आकर शल्य को करबद्ध प्रणाम किया। शल्य से कहा-मामाजी! मैं आपकी कृपा चाहता हूँ। यदि श्रीकृष्ण की भाँति मेरे रथ पर बैठकर मुझे गौरव प्रदान करें, तो मैं निश्चय ही अर्जुन-वध कर सकूँगा। शल्य ने गम्भीर मन से कहा कि मैं दुर्योधन से वचनबद्ध हूँ। कृपया कल की युद्ध-रचना के बाद मुझे आदेशित करें मैं समय पर उपस्थित हो जाऊँगा।

दूसरे दिन कर्ण व्यूह रचना करके मन में अत्यन्त हर्षित हुआ। ब्राह्म मुहूर्त में सन्ध्यादिक करके कर्ण अपने रथ को शस्त्रास्त्र से सुसज्जित करते हुए युद्ध वेला से पूर्व ही शल्य की शिविर में उपस्थित हुआ। शल्य ने तब तक तैयारी कर ली थी। कर्ण की पदचाप सुनकर ही वे कर्ण की अगवानी करने उपस्थित हुए। महारथी ! मुझे बुलवा लिया होता, वैसे मैं आ ही रहा था। शल्य की बात सुनकर कर्ण झेंपते हुए बोला- नहीं मामाजी, मैं स्वयं ही समय से पहले तैयार होकर प्रतीक्षा नहीं कर सका। आप मुझे अपने स्नेह और अनुभव से लाभान्वित करते रहियेगा। शल्य ने कहा कि सारथी का काम तो इतना ही है कि अपने महारथी के प्राणों की रक्षा करना, बाकी तो युद्ध आप ही को करना होगा। मैं भला 'सव्यसांची' के दिव्यास्त्रों से आपको कैसे सुरक्षित कर सकूँगा-यह तो विधाता ही जाने। आगे हरि कृपा। दोनों ही यथा स्थान रथारूढ़ होकर युद्ध भूमि को प्रस्थान करते हैं। आज कर्ण कुछ ज्यादा ही उत्साहित दीख रहा था। उसने सारथी से कहा- मद्र नरेश! मेरा रथ शीघ्रतापूर्वक कपिध्वज श्रीकृष्ण के सामने ले चलें। मैं भी जरा देखूँ कि अर्जुन की रक्षा माधव अब कैसे करते हैं? मेरे पास भी उन जैसा सारथी मिल गया है।

आज अंगराज कर्ण ने पितामह जैसे ही नियमों का प्राविधान करके युद्ध-भूमि में विचरण करना प्रारम्भ किया। अपने-अपने स्तर के योद्धाओं से ही द्वन्द्व युद्ध शुरू हुआ। कर्ण अपने चिर प्रतिद्वद्नी की तलाश में आँखें बिछाये रहा। इधर श्रीकृष्ण की नीति दूसरी थी। वे अर्जुन का सामना कर्ण से नहीं कराना चाहते थे। कर्ण का सबसे पहले सामना सहदेव से हुआ। कर्ण उससे नहीं लड़ना चाहते हुए भी लड़ा। सहदेव ने अपनी सामर्थ्यवश कर्ण का मुकाबला किया, किन्तु कर्ण अभेद्य चट्टान की तरह सामने खड़ा हो गया। अंगराज ने रक्षात्मक युद्ध ही किया, किन्तु अधिक देर होने से तीव्र वाण वृष्टि कर सहदेव को विक्षत कर दिया। वह चाहता तो आज माद्रीनन्दन का काम ही तमाम कर देता। उसे कुन्ती माता को दिया वचन याद आ गया। उसने हँसकर कहा मेरे साथ युद्ध करना बालकों का काम नहीं है। जाओ अपने उम्र के लड़कों से युद्ध करो। इस प्रकार सहदेव को प्राणदान देता हुआ कर्ण आगे बढ़ गया। इतने में अंगराज का मार्ग रोकने के लिए नकुल आगे बढ़ा। कर्ण के साथ उसने पराक्रमपूर्वक युद्ध किया, किन्तु थोड़े ही समय में परास्त हो गया। नकुल को भी बालक समझकर कर्ण ने छोड़ दिया।

इसके बाद भीमसेन ने आगे बढ़कर कर्ण से भयंकर युद्ध किया। पहले तो भीम ने एक-एक करके आठ रथों को तहसनहस कर दिया। कर्ण को क्रोध आ गया उसने वाण वर्षा कर भीम को घायल कर दिया। भीम के सारे आयुध समाप्त हो गये तो अपनी गदा ले पैदल ही कर्ण पर टूट पड़ा। कर्ण ने भी गदा लेकर भीम पर टूटते हुए जोर का हमला किया। भीम अत्यन्त थक चुके थे। उनके शरीर से रक्त के फौव्वारे निकल रहे थे, किन्तु कर्ण ने उसका उपहास करके जीवनदान दिया। कर्ण ने कहा- जाओ भोजनभट्ट ! खा-पीकर विश्राम करो, मैं तो तुम्हें वीर मानता ही नहीं। अपने को स्वयं बलवान समझने वाला मूर्ख होता है। इसके बाद वह आगे बढ़ चला। सामने धर्मराज दीख गये।

धर्मराज ने भी पूरी ताकत से कर्ण का मुकाबला किया। दोनों का थोड़ी देर तक भीषण संग्राम चला। युधिष्ठिर को लगा कि आज कर्ण मेरा प्राण लेकर ही छोड़ेगा। इसी समय कुन्ती को दिया वचन याद कर कर्ण ने कहा 'महाराज यह युद्धभूमि है, यहाँ महावीर ही टिक सकते हैं। आप जाइये, महल में जुआ के पाँसे द्वारा मित्रों से खेलिए' और वह हँसता हुआ आगे बढ़ गया। उसकी हँसी धर्मराज को खल गयी। दिन ढल चुका था। इतने में दूर से कपिध्वज फहरता हुआ दिखाई पड़ा। कर्ण ने कहा, सारथी वह देखो अर्जुन आ गया। मुझे उसके सामने ले चलो। जैसी आज्ञा कहकर शल्य ने रथ को सेनापति अंगराज कर्ण अर्जुन के सामने ला खड़ा किया। कर्ण ने माधव को प्रणाम किया। श्रीकृष्ण ने भी मुस्कान सहित कर्ण का स्वागत किया। अर्जुन ने वाणों से ही अभिवादन किया। दोनों महारथियों में घनघोर युद्ध प्रारम्भ हो गया। दोनों ही दिव्यास्त्रों से लड़ रहे थे। दोनों के वाण कटकर वायुमण्डल को प्रभामय कर रहे थे। श्रीकृष्ण ने कर्ण के रणकौशल की जमकर प्रशंसा की। अर्जुन के रणकौशल का उन्होंने बखान करना उचित न समझा। यह बात गाण्डीवधारी को अप्रिय लगी। अर्जुन ने कहा कि माधव ! कर्ण के वाणों से आहत होकर मात्र तीन कदम ही मेरा रथ पीछे होता है और तुम उसकी इतनी प्रशंसा करते हो और मेरे वाणों से उसका रथ कितना पीछे जाता है यह तुम्हें नहीं दिखाई पड़ता। श्रीकृष्ण ने कहा अर्जुन ऊपर बजरंगबली स्वयं तुम्हारे रथ को आगे ठेल रहे हैं और त्रिलोकी का भार लिए मैं भी तुम्हारे साथ हूँ, इस पर भी तीन साढ़े तीन कदम रथ का पीछे हटना तुम्हें आश्चर्यचकित नहीं करता ? इतने में कर्ण ने कहा-आज सूर्य ने तुमको बचा लिया। सूर्यास्त के बाद युद्ध विराम हो गया। सभी अपने-अपने शिविर में वापस चले गए।

आज युद्ध का सत्रहवाँ दिवस था। सभी रण-भूमि पर समय से आ डटे। दुर्योधन आज प्रसन्न था। अर्जुन को खुली चुनौती देकर कर्ण ने युद्ध के लिए ललकारा। श्रीकृष्ण ने भी कर्ण के सामने रथ खड़ा कर दिया। पुनः युद्ध प्रारम्भ हुआ। दोनों अतुलनीय योद्धा रणभूमि में अपना पराक्रम दिखाने लगे। एक-दूसरे को वाणों को काटकर धरती और अम्बर को पाट दिया। श्रीकृष्ण ने आज दोनों की सराहना की। कर्ण और अर्जुन सचमुच में आज अग्नि और इन्द्र के समान शोभायमान हो रहे थे। आज भीम ने भी कौरव सेना को मथ डाला। आज दुःशासन को छोड़कर भीम ने सभी गान्धारी पुत्रों को मार डाला। दुर्योधन अत्यन्त दुखी था। धर्मराज भी कल की पराजय से अनमनस्क होकर ही लड़े। सात्यकी ने आज भूरिश्रवा के साथ द्वन्द्व युद्ध करके अपने पराक्रम का परिचय दिया। लड़ते-लड़ते वह थक चुका था। बेहोश होकर गिर पड़ा। ऐसी स्थिति में ही भूरिश्रवा ने खड्ग लेकर सात्यकी का शिर काटने ही वाला था कि श्रीकृष्ण की दृष्टि पड़ गयी। अर्जुन से उन्होंने कहा-पार्थ ! देखो जरा आज तुम्हारा प्रिय शिष्य मरना ही चाहता है। इतने में त्वरित गति से गाण्डीव से एक वाण ऊपर उठे भूरिश्रवा का हाथ काटकर हवा में उछाल दिया। उसने अर्जुन की भर्त्सना की। पार्थ, क्या तुम्हें द्वन्द्व युद्ध की परिभाषा नहीं मालूम ? कर्ण ने भी युद्ध बन्द कर दिया। अर्जुन ने कहा कि मैंने प्रतिज्ञा की है कि मेरे गाण्डीव की परिधि जहाँ तक जायेगी मैं स्वजनों की रक्षा करूँगा। तुमने भी निहत्थे सात्यकी को मारने हेतु किस धर्म का पालन किया था, जबकि वह मूर्छित पड़ा था? इतना सुनकर भूरिश्रवा युद्धभूमि में ही प्रायोपवेशन के लिए मन बनाकर बैठ गया और होश में आने पर सात्यकी ने तलवार से उसका सिर काट दिया। इतने में सूर्यास्त हो गया और युद्ध विराम का शंख बज उठा।

आज युद्ध का अट्ठारहवाँ दिन था। कर्ण के पास दुर्योधन ने उदास मुख लेकर कहा कि पाण्डवों का कोई भाई नहीं मरा, मेरे ९८ भ्राता काल-कवलित हो चुके। हमारे लड़के भी नहीं बचे। अब मेरे मन का बोझ तुम्ही कम कर सकते हो। कर्ण ने कहा- मित्र! मैं अपनी पूरी कोशिश करके भी अर्जुन का वध अभी तक नहीं कर सका। भगवान जिसकी रक्षा करते हैं वह कैसे मारा जा सकता है। मैं आज उसे अवश्य ही मारूँगा, अन्यथा वीर गति को प्राप्त हो जाऊँगा। युद्ध का शंख बज उठता है। सभी अपना मोर्चा सँभालते हैं। आज भीम दुःशासन को ही ढूँढ़ रहे थे। इतने में दूर लड़ता हुआ दुःशासन दिखाई पड़ा। भीम ने तीव्र गति से अपना रथ उसके सामने खड़ा कर दिया। दोनों ही घनघोर युद्ध करते हुए रक्तरंजित हो उठे। भीम का रौद्र रूप आज चरम पर था। उसने भीमनाद करते हुए घोषणा की-जो भी चाहे आज दुःशासन को मुझसे बचा ले। उसकी घोषणा सुनकर द्रोणी ने कहा- मैंने तो सूत-पुत्र के ध्वज तले युद्ध न करने की घोषणा की है, नहीं तो मैं इस दुष्ट से दुःशासन को बचा लेता। अब कर्ण को ही इसे बचाना होगा। उधर कर्ण भी लथपथ होकर अर्जुन से जूझ रहा था। भीम की गर्जना सुनकर युद्ध विराम करके सभी भीम और दुःशासन का द्वन्द्व युद्ध को देखने लगे। भीम ने बर्बर सिंह की तरह झपटकर रणभूमि में उसे पटक दिया। दुःशासन की दाहिनी भुजा को पकड़कर सीने पर लात रखकर जोर से उखाड़ दिया। भीषण-रव के साथ ही भयानक चीख दुःशासन के मुख से निकल गयी। भीम ने भी हुँकार मारकर कहा-इसी हाथ से द्रौपदी का चीरहरण किया था। इसे मैंने उखाड़कर दूर फेंक दिया। अब मैं अपनी दूसरी प्रतिज्ञा भी पूरी करने जा रहा हूँ। इस पापी का वक्षस्थल विदारित कर इसके गर्म लहू को पान करूँगा। यह कहकर भीम ने सचमुच दुःशासन का छाती फाड़कर रक्त पान कर लिया। उसके खून को अपने शरीर पर लेपन करके मत्त की तरह उसके शव पर नाचने लगा और उसके रक्त को ले जाकर पांचाली के खुले केशों को बाँध दिया। इस दृष्य को देखकर सभी दहल उठे। पुनः युद्ध प्रारम्भ हो गया। शवों के ढेर लग गये।

कर्ण का अर्जुन के साथ भयानक युद्ध हो रहा था। आज वह अत्यन्त क्षुभित हुआ। वह भीम से दुःशासन की रक्षा नहीं कर सका। वह मात्र दुर्योधन का ही अनुज नहीं था, वरन् उसका भी अत्यन्त प्रिय था। इसी बीच एक अनहोनी हो गयी। शवों के अम्बार में कर्ण के रथ का एक पहिया फँस गया। घोड़ों ने कई बार जोर लगाया किन्तु रथ बाहर नहीं निकल सका। उसने अर्जुन से कहा हे महावीर ! तब तक तुम युद्ध बन्द कर दो, जब तक मैं इस रथ के पहिये को निकाल न लूँ। यह कहते हुए कर्ण रथ के पहिये को पकड़कर निकालने लगा। इतने में कृष्ण का संकेत पाकर पार्थ ने एक घातक वाण द्वारा कर्ण का हृदय वेध दिया। अर्जुन की उसने भर्त्सना की। इस पर माधव ने कहा कि अभिमन्यु का वध करते समय तुम्हारी नैतिकता कहाँ रही ? दिन के मध्याह्न में ही कर्ण का भास्वरित मुखमण्डल मलिन हो उठा।

इसके बाद द्रोणी ने आकर दुर्योधन से कहा कि राजन्, अब मुझे सेनापति नियुक्त कर दीजिए, जिससे आपके साथ ही मैं भी अपने पिता की निर्मम हत्या का प्रतिशोध ले सकूँ। दुर्योधन अत्यन्त दुखी था। उसने बिना कुछ उत्तर दिये ही शल्य को सेनापति नियुक्त कर दिया। मद्र नरेश ने भी अपूर्व रणकौशल का परिचय देते हुए भीषण संग्राम किया। युद्ध भूमि में युद्ध करते हुए नकुल का सामना शल्य से हुआ। नकुल ने बड़े वेग से अपने मामा पर हमला किया, किन्तु थोड़ी ही देर में पराजित हो गया। उसके सारथी ने दूर ले जाकर उसके गणों की रक्षा की। सहदेव से शकुनी का भयंकर युद्ध हो रहा था। दोनों ही एक-दूसरे पर जमकर प्रहार करते और अपना बचाव भी करते। सहदेव ने उस शकुनी के एक-एक षड्यन्त्र का ध्यान करते हुए वाण बरसाना जारी रखा। अन्ततः तलवार लेकर शकुनी सहदेव पर टूट पड़ा। सहदेव ने भी तलवार से प्रतिकार करना शुरू किया और अपने असि धार से शकुनि को यमलोक भेज दिया। उधर महाराज युधिष्ठिर ने शल्य पर हमला कर दिया। दोनों का भयंकर युद्ध चल रहा था। शल्य ने धर्मराज के सम्पूर्ण अस्त्र काट दिया। इतने में एक भयानक कुन्त लेकर युधिष्ठिर ने शल्य पर फेंक दिया। इसका काट न कर पाने से शल्य का गला कटकर भू-लुण्ठित हो उठा। सेनापति के मरने पर शेष कौरवी सेना का पाण्डवी सेना ने संहार कर दिया।

इतने में सूर्यास्त हो गया। युद्ध बन्द हो गया। कौरवों में मात्र चार लोग ही शेष रह गये। दुर्योधन, कृपाचार्य, अश्वत्थामा एवं कृतवर्मा। युद्धभूमि से पलायित होकर वे लोग कहीं छिप गये। दूतों ने समाचार दिया कि दुर्योधन दक्षिणी पोखरे के समीप दिखाई पड़े थे। पाण्डव उसे ढूँढ़ते हुए पोखरे तक जा पहुँचे। भीम थक चुके थे। उन्होंने सोचा कि जरा पानी पीकर प्यास बुझा लूँ, तब उसे ढूँढ़ा जाय। जब भीम ने पानी पीने के लिए हाथ बढ़ाया तो पानी बर्फ के रूप में जम चुका था। लोग आश्चर्यचकित हो गये। इतनी सर्दी भी नहीं है कि पानी बर्फ हो जाय। श्रीकृष्ण समझ गये कि दुर्योधन जलस्तम्भन क्रिया जानता है। वह निश्चित ही सरोवर के अन्दर छिपकर बैठा है।

धर्मराज भी जलस्तम्भन जानते थे। उन्होंने मन्त्र पढ़कर इसका काट किया। सरोवर का पानी लहराने लगा। श्रीकृष्ण ने भीम से कहा कि वह महावीर है। उसे द्वन्द्व युद्ध के लिए ललकारो, तभी वह बाहर आयेगा। भीम ने उसे ललकारा-कृतघ्न, नीच, पामर, कुलघाती, हत्यारे, सभी के तुम हत्यारे हो। अपने भाइयों के भी तुम्हीं हत्यारे हो। तुमने पितामह को भी वाणासन दिया, गुरुदेव को भी युद्ध विभीषिका में झोंकने वाले तुम्हीं हो। निर्लज्ज, अब आकर प्राण भय से इस जलाशय में छिप गये हो। भीम की दाहक वाणी सुनकर दुर्योधन आग के समान दहकने लगा। वह जल से बाहर आ धमका। उसने कहा कि तुम सभी पापी हो। पितामह को शिखण्डी की आड़ में कायर अर्जुन ने वाण बरसाकर निहत्थे सिंह को घायल कर दिया। गुरु द्रोण की हत्या, 'अश्वत्थामा वध' जैसी मिथ्या वाणी का आश्रय तुमने लिया। पापी युधिष्ठिर धर्मराज की पदवी लेकर मिथ्या भाषण कर अपने गुरु को मरवा दिया। कायरतापूर्ण मेरे प्रिय बन्धु कर्ण को मारकर वीर बनने का अर्जुन को धिक्कार है। मैं कायर नहीं हूँ। युद्ध से थककर थोड़ा सा विश्राम कर रहा था। अभी मैं अपनी तरफ का राजा हूँ। तुम्हारी तरफ के राजा युधिष्ठिर हैं। दोनों राजाओं का युद्ध होगा और इसमें जो विजयी होगा वही राजा बनेगा। इस पर श्रीकृष्ण ने कहा कि हमारे पक्ष में राजा भीमसेन हैं। अतः तुम भीम से युद्ध कर सकते हो। इनसे जीतकर तुम राजा बने रहोगे। सन्ध्या समय में दोनों का गदा-युद्ध प्रारम्भ हुआ। भीम को दुर्योधन ने काफी परेशान किया, किन्तु महाबली भीम तो अतुलित बलवान था। महावीर पवन-पुत्र भीम ने दुर्योधन को गदा के प्रहार से थका दिया। दोनों के युद्ध-कौशल का श्रीकृष्ण ने बारीकी से निरीक्षण किया। भीम ने थक कर माधव की तरफ दृष्टिपात किया। श्रीकृष्ण ने संकेत किया कि इसके जंघे पर ही गदा से प्रहार करो। भीम ने गदा प्रहार करके दुर्योधन की जांघ तोड़ दी। वह घायल होकर गिर पड़ा। दर्द से कराहते हुए वह श्रीकृष्ण को भला-बुरा कहने लगा। श्रीकृष्ण ने पाण्डवों से कहा कि इसे अब एकान्त में प्रायश्चित करने के लिए छोड़ दिया जाय।

२. कठिन शब्दार्थ

अनुग्रह = कृपा, झेंपना = संकोच करना, सव्यसांची = अर्जुन (दोनों हाथों से बाण चलाने वाला), प्राविधान = नियम/व्यवस्था, चिर प्रतिद्वंद्वी = पुराना दुश्मन, विक्षत = घायल, भोजनभट्ट = अधिक खाने वाला (भीम हेतु व्यंग्य), खलना = बुरा लगना, भर्त्सना = निंदा/डाँट, प्रायोपवेशन = मृत्यु की प्रतीक्षा में अन्न-जल त्यागना, भीमनाद = भीम की भयंकर गर्जना, विदारित = फाड़ना, भास्वरित = चमकता हुआ, असि धार = तलवार की धार, भू-लुण्ठित = जमीन पर गिरना, पलायित = भागना, जलस्तम्भन = जल को स्थिर करने या उसमें छिपने की विद्या, दाहक = जलाने वाली।

३. सारांश

पाठ 'सेनापति — अंगराज कर्ण' महाभारत युद्ध के अंतिम और सर्वाधिक निर्णायक चरणों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। द्रोणाचार्य के पतन के बाद कर्ण को कौरव सेना का सेनापति बनाया जाता है। कर्ण की मांग पर दुर्योधन मद्रराज शल्य को उनका सारथी नियुक्त करता है। युद्ध के सोलहवें और सत्रहवें दिन कर्ण का प्रलयंकारी रूप देखने को मिलता है। कर्ण अपनी शक्ति और कुन्ती को दिए वचन के बीच संतुलन बिठाते हुए सहदेव, नकुल, भीम और युधिष्ठिर को परास्त तो करता है, किंतु उन्हें जीवनदान दे देता है। कर्ण और अर्जुन के बीच हुआ महासंग्राम युद्ध का चरमोत्कर्ष था, जहाँ श्रीकृष्ण कर्ण के रणकौशल की मुक्तकंठ से प्रशंसा करते हैं। सत्रहवें दिन, भीम ने दुःशासन का वीभत्स वध कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की, जिससे कर्ण अत्यंत दुखी और क्षुब्ध हुआ।

युद्ध का सबसे नाटकीय मोड़ तब आता है जब कर्ण के रथ का पहिया शवों के ढेर में फँस जाता है। शस्त्र त्याग कर पहिया निकालते समय श्रीकृष्ण के संकेत पर अर्जुन ने कर्ण का वध कर दिया, जो युद्ध की नैतिकता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न था। कर्ण के बाद शल्य सेनापति बने, जिन्हें युधिष्ठिर ने मृत्युलोक पहुँचाया। शकुनि का अंत सहदेव के हाथों हुआ। अठारहवें दिन के अंत तक कौरव सेना पूरी तरह नष्ट हो गई और दुर्योधन एक सरोवर में जलस्तम्भन विद्या से छिप गया। पांडवों द्वारा ललकारे जाने पर वह बाहर आया और भीम के साथ उसका अंतिम गदा-युद्ध हुआ। श्रीकृष्ण के संकेत पर भीम ने दुर्योधन की जंघा तोड़ दी, जिससे वह असहाय होकर गिर पड़ा। इस प्रकार, यह अध्याय प्रतिशोध की अग्नि के शांत होने और कौरव साम्राज्य के पूर्ण विनाश की गाथा कहता है।

४. महत्वपूर्ण अंशों का संक्षेपीकरण

१. संक्षेपीकरण : "मुझे यदि श्रीकृष्ण जैसा सारथी उपलब्ध करा दिया जाय... शल्य ने गम्भीर मन से कहा कि मैं दुर्योधन से वचनबद्ध हूँ।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'सेनापति — अंगराज कर्ण' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : कर्ण द्वारा सारथी के रूप में शल्य की मांग और शल्य की स्वीकृति का वर्णन।
संक्षेपीकरण : सेनापति बनते ही कर्ण ने अर्जुन के वध हेतु श्रीकृष्ण के टक्कर के सारथी की मांग की। दुर्योधन के अनुनय पर पांडवों के मामा शल्य ने अपनी वचनबद्धता के कारण कर्ण का सारथ्य स्वीकार किया, जिससे कौरव पक्ष में उत्साह का संचार हुआ।

२. संक्षेपीकरण : "उसने कुन्ती माता को दिया वचन याद आ गया... 'महाराज यह युद्धभूमि है, यहाँ महावीर ही टिक सकते हैं। आप जाइये, महल में जुआ के पाँसे द्वारा मित्रों से खेलिए' और वह हँसता हुआ आगे बढ़ गया।"

संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय कृत 'प्रतिशोध' के अठारहवें अध्याय से।
प्रसंग : कर्ण द्वारा पराजित पांडवों को जीवनदान देने और युधिष्ठिर का उपहास करने का चित्रण।
संक्षेपीकरण : कर्ण ने अपनी वीरता का प्रदर्शन करते हुए सहदेव, नकुल, भीम और युधिष्ठिर को युद्ध में पराजित किया। किंतु कुंती को दिए वचन के कारण उसने उन्हें नहीं मारा, बल्कि उपहास करते हुए उन्हें रणभूमि छोड़ने की सलाह दी।

३. संक्षेपीकरण : "भीम ने बर्बर सिंह की तरह झपटकर रणभूमि में उसे पटक दिया... पापी का वक्षस्थल विदारित कर इसके गर्म लहू को पान करूँगा।"

संदर्भ : 'प्रतिशोध' पुस्तक के अठारहवें अध्याय से उद्धृत।
प्रसंग : भीम द्वारा दुःशासन के वध और प्रतिज्ञा पूर्ति का वीभत्स वर्णन।
संक्षेपीकरण : भीम ने भीषण क्रोध में दुःशासन को परास्त कर उसकी भुजा उखाड़ दी और भरी सभा में द्रौपदी के अपमान का बदला लेने के लिए उसका वक्ष विदीर्ण कर रक्तपान किया, जिससे समस्त रणभूमि दहल उठी।

४. संक्षेपीकरण : "शवों के अम्बार में कर्ण के रथ का एक पहिया फँस गया... श्रीकृष्ण के संकेत पर अर्जुन ने कर्ण की जांघ तोड़ दी।" (यहाँ कर्ण वध और दुर्योधन के पतन का मिश्रण है)

संदर्भ : डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय रचित 'प्रतिशोध' के अठारहवें पाठ से।
प्रसंग : कर्ण का अंत और दुर्योधन की निर्णायक पराजय।
संक्षेपीकरण : रथ का पहिया निकलने के दौरान निहत्थे कर्ण का वध अर्जुन ने किया। बाद में, सरोवर में छिपे दुर्योधन को निकालकर भीम ने गदा युद्ध में उसकी जंघा तोड़ दी, जिससे कौरवों की अंतिम आशा भी समाप्त हो गई।

५. विस्तृत विशदीकरण (भाव-पल्लवन)

१. विशदीकरण : "मुझे यदि श्रीकृष्ण जैसा सारथी उपलब्ध करा दिया जाय... मैं भला 'सव्यसांची' के दिव्यास्त्रों से आपको कैसे सुरक्षित कर सकूँगा-यह तो विधाता ही जाने। आगे हरि कृपा।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'सेनापति — अंगराज कर्ण' नामक पाठ से लिया गया है इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : कर्ण और शल्य के मध्य सारथ्य संबंध की स्थापना और शल्य की संदिग्ध निष्ठा का सूक्ष्म चित्रण।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने यहाँ कौरव पक्ष के अंतिम बड़े गठबंधन का वर्णन किया है। कर्ण जानता था कि अर्जुन की विजय का मुख्य कारण श्रीकृष्ण का सारथ्य और उनका मार्गदर्शन है। अतः उसने अपने अहंकार और रणनीतिक आवश्यकता के चलते मद्रराज शल्य की मांग की। शल्य न केवल एक महान योद्धा थे, बल्कि अश्व-संचालन में श्रीकृष्ण के समान निपुण माने जाते थे। दुर्योधन द्वारा शल्य को 'मामाश्री' कहना और उनके आतिथ्य का ऋण याद दिलाना उसकी कुटिल राजनीति का परिचायक है।

शल्य का 'वचनबद्ध' होना उनकी विवशता को दर्शाता है, क्योंकि उनका हृदय अपने भांजों (नकुल-सहदेव) के साथ था। शल्य का कर्ण से यह कहना कि 'सारथी का काम केवल प्राण रक्षा है, युद्ध तुम्हें ही करना होगा', एक स्पष्ट संकेत था कि वे कर्ण को नैतिक समर्थन नहीं देंगे। 'सव्यसांची' (अर्जुन) के दिव्यास्त्रों के प्रति शल्य का भय या उनकी चेतावनी वास्तव में कर्ण के आत्मविश्वास को हिलाने का एक प्रयास भी हो सकती थी। शल्य का 'आगे हरि कृपा' कहना उनके भीतर के उस द्वंद्व को उजागर करता है जहाँ वे जानते हैं कि श्रीकृष्ण के विरुद्ध किसी की भी योजना सफल नहीं हो सकती। लेखक ने यहाँ स्पष्ट किया है कि जब योद्धा और सारथी के मन में एक-दूसरे के प्रति पूर्ण विश्वास न हो, तो युद्ध की दिशा अनिश्चित हो जाती है। कर्ण की 'झेंप' और शल्य की 'गंभीरता' आने वाले विनाशकारी परिणाम की पूर्वपीठिका थी। यह अंश राजनीति के उस स्याह पक्ष को दिखाता है जहाँ संबंधों को सत्ता की वेदी पर चढ़ा दिया जाता है। कर्ण का उत्साह भौतिक साधनों पर आधारित था, जबकि अर्जुन का संबल ईश्वरीय कृपा थी। यह संवाद महाभारत के युद्ध की उस मानसिक कशमकश को बड़ी प्रखरता से प्रस्तुत करता है जिसने अंततः कर्ण के भाग्य का फैसला किया।

२. विशदीकरण : "अंगराज ने रक्षात्मक युद्ध ही किया... उसे कुन्ती माता को दिया वचन याद आ गया... 'महाराज यह युद्धभूमि है, यहाँ महावीर ही टिक सकते हैं। आप जाइये, महल में जुआ के पाँसे द्वारा मित्रों से खेलिए' और वह हँसता हुआ आगे बढ़ गया।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'सेनापति — अंगराज कर्ण' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : कर्ण के चरित्र में दानवीरता और प्रतिशोध के द्वंद्व तथा पांडवों को जीवनदान देने की घटना का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक ने यहाँ कर्ण के व्यक्तित्व के उस महान किंतु विडम्बनापूर्ण पक्ष को उकेरा है जहाँ वह शत्रु होते हुए भी रक्षक बन जाता है। कर्ण के पास अवसर था कि वह नकुल, सहदेव, भीम और युधिष्ठिर का वध कर पांडव सेना की कमर तोड़ देता। किंतु, माता कुन्ती को दिया गया 'वचन' उसके बाणों की गति को रोक देता था। यह कर्ण की चारित्रिक श्रेष्ठता का प्रमाण है कि उसने मृत्यु के मैदान में भी अपने नैतिक मूल्य नहीं छोड़े। 'रक्षात्मक युद्ध' करना यह दर्शाता है कि कर्ण उन पांडवों को चोट पहुँचाना नहीं चाहता था जिन्हें वह अपना भाई जान चुका था।

किंतु, कर्ण का 'उपहास' करना उसके उस वर्षों पुराने अपमान की प्रतिक्रिया थी जो उसे समाज और पांडवों से मिला था। युधिष्ठिर को 'जुआ खेलने' की सलाह देना एक अत्यंत तीखा व्यंग्य था, जो युधिष्ठिर की उस कमजोरी पर प्रहार था जिसने महाभारत की नींव रखी। कर्ण की हँसी में केवल अहंकार नहीं, बल्कि एक पीड़ा भी छिपी थी। वह पांडवों को यह जताना चाहता था कि जिसे वे 'सूतपुत्र' कहकर दुत्कारते थे, आज उसी की दया पर उनके प्राण टिके हैं। लेखक यहाँ स्पष्ट करते हैं कि कर्ण का दान केवल भौतिक वस्तुओं तक सीमित नहीं था, उसने रणभूमि में 'प्राणों का दान' देकर अपनी दानवीरता को सिद्ध किया।

यह प्रसंग युधिष्ठिर और भीम के स्वाभिमान को गहरी चोट पहुँचाता है। भीम को 'भोजनभट्ट' कहना उनके पौरुष को ललकारना था। यह अंश हमें सिखाता है कि कई बार जीवनदान देना वध करने से अधिक कष्टकारी होता है। कर्ण ने अपने वचनों का पालन तो किया, किंतु अपनी वाणी से पांडवों के मानसिक बल को क्षीण कर दिया। यह द्वंद्व कर्ण को महाभारत का सबसे जटिल और स्मरणीय पात्र बनाता है। उसकी यह 'सज्जनता' ही अंततः उसके पक्ष के विनाश का कारण बनी, क्योंकि उसने धर्म के स्तंभों को सुरक्षित रखा। यह विशदीकरण कर्ण के आंतरिक संघर्ष और उसकी नियति के प्रति उसके समर्पण को बड़ी ही संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करता है।

३. विशदीकरण : "भीम ने बर्बर सिंह की तरह झपटकर रणभूमि में उसे पटक दिया... इसी हाथ से द्रौपदी का चीरहरण किया था... पापी का वक्षस्थल विदारित कर इसके गर्म लहू को पान करूँगा। यह कहकर भीम ने सचमुच दुःशासन का छाती फाड़कर रक्त पान कर लिया।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'सेनापति — अंगराज कर्ण' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : भीम द्वारा दुःशासन के वध के माध्यम से प्रतिशोध की पराकाष्ठा और प्रतिज्ञा पूर्ति का विवरण।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय ने यहाँ महाभारत के सबसे वीभत्स और डरावने दृश्य का चित्रण किया है। भीम का 'बर्बर सिंह' के समान व्यवहार उस संचित क्रोध का परिणाम था जो पिछले तेरह वर्षों से उनके भीतर धधक रहा था। दुःशासन का वध केवल एक शत्रु का अंत नहीं था, बल्कि वह स्त्री के अपमान के विरुद्ध एक प्रलयंकारी न्याय था। 'दाहिनी भुजा को उखाड़ना' उस कृत्य का दंड था जिसने द्रौपदी के केश खींचे थे। भीम की घोषणा—'जो चाहे बचा ले'—उनके अजेय पौरुष और कौरव पक्ष की असहायता को उजागर करती है।

'रक्तपान करना' और 'पांचाली के केश बांधना' सभ्य समाज की दृष्टि में क्रूरता लग सकती है, किंतु कुरुक्षेत्र के संदर्भ में यह उस प्रतिज्ञा की पवित्रता थी जिसे भीम ने धर्म-सभा में लिया था। लेखक ने यहाँ दिखाया है कि जब न्याय के सभी मार्ग बंद हो जाते हैं, तो प्रतिशोध ऐसा ही भयानक रूप धारण कर लेता है। इस दृश्य को देखकर 'सभी का दहल उठना' यह सिद्ध करता है कि युद्ध केवल वीरों का खेल नहीं, बल्कि मर्यादाओं के चिथड़े उड़ जाने की कहानी है।

भीम का 'मत्त होकर नाचना' उनके मानसिक आवेग और विजयोन्माद को दर्शाता है। यह घटना कौरवों के मनोबल को जड़ से उखाड़ने वाली थी। दुर्योधन के लिए यह उसके सबसे प्रिय भाई का अंत था, जिसने उसे पहली बार अपनी हार का साक्षात् अनुभव कराया। द्रौपदी के केशों का रक्त से सिंचन होना उस अपमान की अग्नि के शांत होने का प्रतीक था। यह अंश पाठकों को यह गंभीर संदेश देता है कि अधर्म का फल अंततः इतना ही भयावह होता है कि वह देखने वालों की रूह कंपा देता है। यह विशदीकरण भीम के 'रौद्र' रूप और प्रतिशोध की उस ज्वाला को न्यायोचित ठहराता है जो केवल रक्त से ही बुझ सकती थी। यह महाभारत के युद्ध का वह क्षण है जहाँ करुणा पूरी तरह समाप्त हो जाती है और केवल प्रतिशोध शेष रहता है।

४. विशदीकरण : "शवों के अम्बार में कर्ण के रथ का एक पहिया फँस गया... श्रीकृष्ण के संकेत पर पार्थ ने एक घातक वाण द्वारा कर्ण का हृदय वेध दिया... भीम ने गदा प्रहार करके दुर्योधन की जाँघ तोड़ दी। वह घायल होकर गिर पड़ा।"

संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के 'सेनापति — अंगराज कर्ण' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : कर्ण और दुर्योधन के पतन के माध्यम से अधर्म के पूर्ण उच्छेद का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : पाठ के इस अंतिम भाग में लेखक ने नियति के उन क्रूर प्रहारों को दिखाया है जो अभेद्य योद्धाओं को भी धराशायी कर देते हैं। कर्ण का रथ का पहिया फँसना उसके 'प्रारब्ध' और उन शापों का परिणाम था जो उसे परशुराम और ब्राह्मण से मिले थे। 'निहत्थे कर्ण' का वध करना युद्ध की नैतिकता के विरुद्ध था, किंतु श्रीकृष्ण का तर्क—'अभिमन्यु के समय नैतिकता कहाँ थी'—अधर्म के विरुद्ध 'जैसे को तैसा' वाले सिद्धांत की पुष्टि करता है। कर्ण का 'मलिन मुखमंडल' एक महान योद्धा की दुखद विदाई का प्रतीक है।

दुर्योधन का अंत और भी अधिक दार्शनिक और कड़वा है। उसका 'जलस्तम्भन' विद्या से सरोवर में छिपना उसके प्राण-भय और पराजय की स्वीकारोक्ति थी। भीम की 'दाहक वाणी' ने उसके सोए हुए क्षत्रिय स्वाभिमान को जगाया। अंतिम गदा-युद्ध में भीम द्वारा दुर्योधन की 'जांघ तोड़ना' उस प्रतिज्ञा की पूर्ति थी जो द्रौपदी के अपमान के समय ली गई थी। श्रीकृष्ण का संकेत करना यह सिद्ध करता है कि अधर्म के प्रतीक को समाप्त करने के लिए नियमों की सीमा को लांघा जा सकता है।

दुर्योधन का गिरकर श्रीकृष्ण को भला-बुरा कहना उसके अंत समय के अहंकार और हताशा को दर्शाता है। 'प्रायश्चित के लिए एकांत में छोड़ना' उसकी मृत्यु से भी बड़ी सजा थी। लेखक यहाँ यह संदेश देते हैं कि सत्ता, शक्ति और छल अंततः व्यक्ति को अकेलेपन और पीड़ा के गर्त में ले जाते हैं। कौरव वंश का विनाश उस हठ का परिणाम था जिसने शांति के सभी प्रस्तावों को ठुकरा दिया था। यह अंत केवल एक युद्ध की समाप्ति नहीं, बल्कि एक नए युग का सूत्रपात है जहाँ न्याय की स्थापना अधर्म की राख पर हुई। यह विशदीकरण स्पष्ट करता है कि जब विनाश का समय आता है, तो व्यक्ति की बुद्धि और विद्या भी उसका साथ छोड़ देती है, और केवल उसके कर्म ही उसके भाग्य का निर्धारण करते हैं।

साहित्य विश्लेषण श्रृंखला · 'प्रतिशोध - सेनापति अंगराज कर्ण' · सर्वाधिकार सुरक्षित

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