प्रस्तुत लेख में डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय द्वारा संपादित पुस्तक 'प्रतिशोध' के प्रथम अध्याय 'राजकुमार शिखण्डी' का विस्तृत शैक्षिक विश्लेषण प्रस्तुत है। यह पाठ महाभारत के एक अत्यंत विशिष्ट पात्र शिखण्डी के जन्म, उसके पूर्वजन्म की व्यथा और भीष्म के प्रति अटूट प्रतिशोध की भावना को केंद्र में रखता है। चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल' द्वारा प्रस्तुत इस संक्षेपीकरण और विशदीकरण में काशीराज की पुत्री अम्बा के अपमान, महाराज शाल्व के तिरस्कार और भीष्म के अडिग संकल्पों के बीच पिसती एक स्त्री के अंतर्र्द्वंद्व को बड़ी प्रखरता से उकेरा गया है। यह लेख पाठकों को शिखण्डी के उस 'प्रतिशोध' की गहराई तक ले जाता है, जो समय की सीमाओं को लांघकर अगले जन्म तक जीवित रहता है। इसमें पाठ के मूल भावों का विस्तारपूर्वक पल्लवन किया गया है ताकि विद्यार्थियों को इसके नैतिक और साहित्यिक पक्षों का पूर्ण बोध हो सके।
१. मूल पाठ
भरद्वाज-शिष्य द्रुपद पांचाल नरेश था। वह अत्यन्त बलशाली, धनुर्धर एवं महत्वाकांक्षी राजा था। आचार्य द्रोण उसके सतीर्थ रहे। चिर प्रतीक्षा के पश्चात उसके एक सन्तान हुई। जन्म से कन्या सन्तति के बारे में ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी-‘यह आगे चलकर यशस्वी योद्धा होगा। इसी आधार पर उसका लड़के के रूप में पालन-पोषण हुआ। एक आकर्षक घटना के चलते इस कृत्रिम बालक को पुरुषत्व की प्राप्ति हुई। आगे चलकर ‘शिखण्डी’ नाम से विख्यात यह अप्रतिम योद्धा बना।
द्रुपद का साम्राज्य सम्पन्न था। वह अच्छा प्रशासक, न्यायप्रिय एवं प्रजापालक राजा था। अत्याचार एवं अवांक्षित कर्म उसके राज्य की सीमा में नहीं होते थे। प्रजा का मत्व उसे सहज प्राप्त था। राजा का सहज ठाट-बाट सभी को आकर्षित करता था। शस्त्र एवं शास्त्र दोनों में वह पारंगत था। इस स्वाभिमानी राजा से अनेक लोगों की प्रतिद्वन्दिता थी।
राजा का उन्नत सौध। उसमें एक सुसज्जित-कक्ष, जिसमें राजकुमार शिखण्डी सोया है। उसकी प्रेयसी बगल में लेटी अपने जीवन-खुशहाली की चादर बीन रही है। अभी ठीक से सो भी न सकी थी कि उसके कान में एक गम्भीर घोष सुनाई पड़ा-‘इस आततायी का वध कोई नहीं कर सकता। धर्म-धुरन्धर बनने का ढ़ोंग करता है। यह दुुरधर्ष बड़ा पापी है। इस गुरुद्रोही को मारकर ही मुझे चैन मिलेगा। भगवान भार्गव केवल उसके गुरु ही नहीं, मेरे भी पथ-प्रदर्शक हैं। मैं उन्हें अपना गुरु मानता हूँ। मेरे जीवन का मात्र यहीं उद्देश्य है कि पापी भीष्म की इच्छा-मृत्यु के कवच के बावजूद उसका सर्वनाश कर सकूँ।’ ये शब्द शिखण्डी की पत्नी की कानों में अक्षरशः गूँज रहे हैं। वह सोच रही है कि अभी और कुछ सुनने को मिलेगा, किन्तु आगे खामोशी छाई रही। पत्नी ने शिखण्डी को झकझोर कर जगाया। वह उठ बैठा। जगाने का कारण पूछा। अक्षरशः दुहराते हुए पत्नी ने सुप्तावस्था में उसके कथन का रहस्य जानना चाहा। पहले तो राजकुमार नें टालने की कोशिश की, परन्तु प्रियतमा की जिद ने रहस्योद्घाटन करने को उसे मजबूर कर दिया। एक लम्बी निःश्वास के साथ शिखण्डी ने बताना शुरू किया –
यह पूर्व जन्म की बात है मैं काशिराज की तनया थी। मेंरी दो और बहनें थीं। हमारा क्रमशः अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका नाम था। विवाह योग्य होने पर हम लोंगों का एक ही साथ स्वयंवर आयोजित किया गया। देश भर के राजा और राजकुमार वहाँ उपस्थित हुए। उसी समय शान्तनु-सुत भीष्म वहाँ आये। उनके आते ही राजाओं में खलबली मच गयी। उनके अद्वितीय पराक्रम से सभी परिचित थे। आते ही भीष्म गर्जना हुयी- ‘उपस्थित राजगण! मैं अपने समक्ष इन राजकुमारियों का अपहरण कर रहा हूँ। जिसके बाहुबल में ताकत हो, हमें रोके।’ यह कहकर उन्होंने हम तीनों को बलपूर्वक अपने रथ में बैठा लिया। उसका सारथी वायु-वेग से हम लोगों को ले उड़ा। सभी लोग अवाक् रह गये। किसी की हिम्मत उनके पीछे पड़ने की नहीं हुई। रास्ते में ही सुस्थिर होने पर मैंने साहसपूर्वक भीष्म से कहा- राजन्! आप विश्रुत महात्मा हैं। मैने मन ही मन मद्र नरेश शाल्व को अपना पति वरण किया है। वे भी मुझे चाहते हैं। पर पुरुष में अनुराग रखने वाली स्त्री को अपनी भार्या स्वीकार करना कहाँ तक उचित है थोड़ी देर के बाद भीष्म ने कहा- मैंने तो आजीवन ब्रह्मचारी रहने का संकल्प किया है। अपने भाई के लिए तुम लोगों को ले जा रहा हूँ। तुम अगर शाल्व को चाहती हो तो सम्मानपूर्वक जा सकती हो। व्यवस्था कर दी जाएगी। हस्तिनापुर पहुँचकर मुझे भीष्म ने सम्मानपूर्वक महाराज शाल्व के पास भेज दिया।
मुझे देखकर महाराज शाल्व प्रसन्न नहीं हुए। उन्होंने उदासीन होकर मुझसे कहा- भरी सभा में मुझे अपमानित करते हुए भीष्म ने तुम्हारा अपहरण किया है। अब तुम उनके पास ही जाकर रहो। मैंने राजा शाल्व से बड़ी ही मनुहार की, किन्तु उनका मन नहीं पसीजा। मैंने आत्मोत्सर्ग का निश्चय कर अकेले ही राज-प्रासाद का परित्याग कर जंगल की राह पकड़ ली। मैंने सोंचा कि वृहदारण्य भयानक जानवरों से व्याप्त होगा। वहाँ मुझे कोई भी क्षुधित हिंसक जीव अपना आहार बना लेगा। कम से कम मुझे वही स्वीकार कर लेगा। इस आशय से मैं निर्जन प्रान्त में अटन कर रही थी।
मेरे सम्मुख एक स्नेहमूर्ति महात्मा प्रकट हुए। उन्होंने बड़े प्यार से मेरा परिचय प्राप्त करके असमय में तपोवन आने का कारण पूछा। अब मुझे ज्ञात हुआ कि यह तपोवन है। इसीलिए मुझ अभागिनी पर किसी हिंसक जीव ने भी अब तक कृपा की।
२. कठिन शब्दार्थ
३. सारांश
पाठ 'राजकुमार शिखण्डी' का आरंभ पांचाल नरेश द्रुपद के वैभवशाली शासन और शिखण्डी के रहस्यमयी जन्म से होता है। द्रुपद के यहाँ कन्या का जन्म हुआ था, परंतु भविष्यवाणी के अनुसार उसे पुत्र की भांति पाला गया और कालांतर में वह शिखण्डी के रूप में एक महान योद्धा बना। कथा का मुख्य केंद्र शिखण्डी के भीतर धधक रही प्रतिशोध की वह ज्वाला है, जो उसके पूर्वजन्म से जुड़ी है। एक रात शिखण्डी की पत्नी उसे नींद में भीष्म को 'पापी' और 'आततायी' कहते हुए उनके सर्वनाश की प्रतिज्ञा करते सुनती है। पत्नी के विवश करने पर शिखण्डी अपने पूर्वजन्म का वृत्तांत सुनाता है कि वह काशीराज की पुत्री अम्बा था।
अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका के स्वयंवर में भीष्म ने अपने बाहुबल से तीनों बहनों का अपहरण कर लिया था। अम्बा ने जब भीष्म को बताया कि वह राजा शाल्व को अपना पति मान चुकी है, तो भीष्म ने उसे सम्मानपूर्वक शाल्व के पास भेज दिया। परंतु शाल्व ने भीष्म द्वारा अपहृत स्त्री को स्वीकार करने से मना कर दिया, जिससे अम्बा का भारी अपमान हुआ। अम्बा ने इस तिरस्कार का मुख्य दोषी भीष्म को माना। शाल्व द्वारा त्याग दिए जाने के बाद अम्बा ने आत्मोत्सर्ग का निश्चय किया और भयानक वनों की ओर चल दी, जहाँ उसकी भेंट एक महात्मा से हुई। यही अपमान और प्रतिशोध की भावना शिखण्डी के रूप में पुनर्जन्म का आधार बनी। शिखण्डी का एकमात्र उद्देश्य भीष्म की 'इच्छा-मृत्यु' के कवच को भेदकर उनका अंत करना है, ताकि अम्बा के अपमान का प्रतिशोध पूरा हो सके।
४. महत्वपूर्ण अंशों का संक्षेपीकरण
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'राजकुमार शिखण्डी' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : काशीराज की पुत्रियों के स्वयंवर में भीष्म द्वारा शक्ति प्रदर्शन और अपहरण का वर्णन।
संक्षेपीकरण : भीष्म ने स्वयंवर की मर्यादा को भंग करते हुए अपने अतुलनीय पराक्रम के मद में काशीराज की कन्याओं का अपहरण किया और वहां उपस्थित राजाओं को उन्हें रोकने की खुली चुनौती दी।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'प्रतिशोध' के 'राजकुमार शिखण्डी' नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : भीष्म द्वारा अपहरण का कारण स्पष्ट करना।
संक्षेपीकरण : भीष्म ने स्पष्ट किया कि उनका कार्य व्यक्तिगत स्वार्थ या कामवासना के लिए नहीं, बल्कि अपने भाई के प्रति कर्तव्य पूर्ति हेतु था, क्योंकि वे स्वयं कठोर ब्रह्मचर्य के व्रत का पालन कर रहे थे।
५. विस्तृत विशदीकरण (भाव-पल्लवन)
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के राजकुमार शिखण्डी नामक पाठ से लिया गया है इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : शिखण्डी के जन्म की पृष्ठभूमि और उसके पुरुषत्व प्राप्ति के रहस्य का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : लेखक ने यहाँ नियति और मानवीय प्रयासों के अद्भुत संगम को दर्शाया है। पांचाल नरेश द्रुपद और द्रोणाचार्य के संबंधों की पृष्ठभूमि यह संकेत देती है कि भविष्य में होने वाला संघर्ष कितना भीषण होगा। शिखण्डी का जन्म वस्तुतः एक कन्या के रूप में हुआ था, किंतु ज्योतिषियों की भविष्यवाणी ने उसके जीवन को एक नई दिशा दी। समाज और शत्रुओं के भय से उसे 'कृत्रिम बालक' के रूप में पाला गया। यह अंश इस बात को रेखांकित करता है कि कैसे एक व्यक्ति की पहचान सामाजिक और राजनैतिक कारणों से बदल दी जाती है। शिखण्डी का 'अप्रतिम योद्धा' बनना यह सिद्ध करता है कि शारीरिक संरचना से अधिक व्यक्ति का मानसिक संकल्प और उसका प्रशिक्षण महत्वपूर्ण होता है। नियति ने उसे स्त्री के रूप में जन्माया, परंतु समय की मांग और प्रतिशोध की आवश्यकता ने उसे पुरुष के रूप में ढाल दिया।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के राजकुमार शिखण्डी नामक पाठ से लिया गया है इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : शिखण्डी के अवचेतन मन में भीष्म के प्रति पल रही घृणा और प्रतिशोध का प्रकटीकरण।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : यह अंश शिखण्डी के अंतर्द्वंद्व और उसके मानसिक संताप का सजीव चित्रण है। 'उन्नत सौध' और 'सुसज्जित कक्ष' सुख-सुविधाओं के प्रतीक हैं, लेकिन शिखण्डी के भीतर प्रतिशोध की ज्वाला उसे शांत नहीं रहने देती। नींद में बड़बड़ाना उसके अवचेतन मन की उस गहरी चोट को दर्शाता है जो उसे पूर्वजन्म में मिली थी। वह भीष्म को 'धर्म-धुरन्धर' मानने से इंकार करता है और उन्हें 'गुरुद्रोही' कहता है, क्योंकि भीष्म ने परशुराम (भार्गव) की आज्ञा का उल्लंघन किया था। लेखक ने यहाँ यह स्पष्ट किया है कि प्रतिशोध की भावना व्यक्ति को चैन से सोने भी नहीं देती। भीष्म की 'इच्छा-मृत्यु' का वरदान शिखण्डी के लिए एक चुनौती है, जिसे वह अपने सर्वनाश के संकल्प से भेदना चाहता है। यह प्रतिशोध केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आत्मिक है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के राजकुमार शिखण्डी नामक पाठ से लिया गया है इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : भीष्म द्वारा काशीराज की पुत्रियों के अपहरण के माध्यम से उनके पराक्रम और क्रूरता का वर्णन।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : भीष्म का यह कृत्य मध्यकालीन सामंती समाज में स्त्री की स्थिति और पुरुष के अहंकार को दर्शाता है। 'गर्जना' और 'बाहुबल' का उल्लेख भीष्म के उस आतंक को प्रमाणित करता है, जिसके सामने बड़े-बड़े राजा नतमस्तक थे। स्वयंवर जैसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाहुबल से कुचलना भीष्म के चरित्र का एक विवादास्पद पक्ष है। 'वायु-वेग' से रथ का उड़ना और सभा का 'अवाक्' रह जाना यह दिखाता है कि शक्ति के समक्ष न्याय अक्सर मौन हो जाता है। यही वह घटना है जिसने अम्बा के जीवन को अंधकार में धकेला। लेखक ने भीष्म के शौर्य के पीछे छिपी उस निर्ममता को उजागर किया है, जो प्रतिशोध के नए बीज बोती है। किसी की हिम्मत न होना, समाज की कायरता और भीष्म के दुरधर्ष व्यक्तित्व का परिचायक है।
संदर्भ : प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक प्रतिशोध के राजकुमार शिखण्डी नामक पाठ से लिया गया है इसके लेखक डॉ. रमेशचन्द्र पाण्डेय जी हैं।
प्रसंग : शाल्व द्वारा अम्बा का त्याग और अम्बा की दयनीय स्थिति का चित्रण।
विशदीकरण (भाव-पल्लवन) : यह अंश नारी के उस सामाजिक बहिष्कार को दर्शाता है, जहाँ उसे केवल एक वस्तु माना जाता है। शाल्व का 'उदासीन' होना और अम्बा को 'अपमानित' कहना यह सिद्ध करता है कि पुरुष प्रधान समाज में स्त्री की भावनाओं का कोई मूल्य नहीं था। शाल्व ने अम्बा के प्रेम को नहीं, बल्कि भीष्म द्वारा किए गए उसके अपहरण को महत्व दिया। अम्बा की 'मनुहार' का न पसीजना उसके हृदय की शून्यता को दिखाता है। विवश होकर अम्बा का 'राज-प्रासाद' त्यागना और 'जंगल' की राह पकड़ना उसके आत्म-सम्मान की अंतिम लड़ाई थी। वह समाज के बजाए हिंसक पशुओं के बीच मरना बेहतर समझती है, जो मनुष्य की तुलना में अधिक दयालु हो सकते हैं। यही तिरस्कार अम्बा को प्रतिशोध की देवी में बदल देता है, जो आगे चलकर भीष्म के अंत का कारण बनती है।
