महाकवि भारवि विरचित किरातार्जुनीयम् महाकाव्य के सभी सर्गों का संस्कृत एवं हिन्दी कथासार।
इत्यत्र सुयोधनस्य राजनीतिचातुर्यं कथं विकीर्णमिति सहृदयाः एव प्रमाणम्। अतो मल्लिनाथेन साधूक्तम् –
'नारिकेलफलसम्मितं वचो भारवेः सपदि तद्विभज्यते ।
स्वादयन्तु रसगर्भनिर्भरं सारमस्य रसिका यथेप्सितम् ।।' इति ।।
प्रथम सर्ग का कथासार
प्रथमसर्गस्य कथासारः (संस्कृत में)
द्वैतवने राज्यभ्रष्टो युधिष्ठिरः चतुरनुजैः द्रौपद्या च सह वसन् दुर्योधनशासनव्यवस्थां ज्ञातुं वनेचरं हस्तिनापुरं प्रेषयति । सः ततः प्रत्यावृत्य युधिष्ठिरं कथयति-
हे राजन् ! दूतनयनाः राजानो भृत्यैर्न वञ्चनीयाः । अतो यत् किमपि मया ज्ञातं, दृष्टं वा तदेव कथ्यते, भवतु नाम प्रियमप्रियं वा सुयोधनो नयमार्गेण महीमायत्तीकर्तुमभिलषति । भवन्तं जेतुकामश्च दयादानदाक्षिण्यादिगुणैर्यशो वितन्वति । कालविभागं विधाय सः निस्तन्द्रः पौरुषं विस्तारयति । गर्वरहितो भूत्वा सः अनुचरेषु मित्रवत्, मित्रेषु भ्रातृवत्, भ्रातृषु चात्मवत् व्यवहरति । दुर्योधनस्य धर्मार्थकामवर्गाः परस्परं न बाधते । सः प्रचुरदानं ससम्मानं ददाति, पक्षपातरहितो भूत्वा धर्मं च रक्षति । तेन सर्वत्र रक्षकस्पेणात्मीयजनाः नियुक्ताः । तस्य सामाद्युपायाः सम्पदः प्रसुवते । साम्प्रतं सस्यसम्पदा समन्विताः कुरवः चकासन्ते । दुर्योधनभटास्तस्य प्राणैरपि हितं कर्तुं वाञ्छन्ति । सः गुप्तचरैः समस्तनृपाणां रहस्यं जानाति परन्तु तस्य रहस्यं ज्ञातुं कोऽपि न समर्थः । दुर्योधनाज्ञा माल्यमिव महीपैर्मस्तकैर्धार्यते । दुःशासने राजभरं निधाय स्वयं यज्ञं करोति । कथाप्रसङ्गेषु भवतो नाम-स्मरणेन दुःखायते दुर्योधनः । अतो हे राजन् ! मया सत्यं सर्वं खलु प्रतिपादितम् । साम्प्रतं शीघ्रमेव प्रतिक्रिया विधेयेति । इत्थं कथयित्वा पुरस्कारमवाप्य गते वनेचरे काननं, युधिष्ठिरः वनेचरकथितां वार्तामभिमान्त्रयितुं युधिष्ठिरः अनुजैः द्रौपद्या चाधिष्ठितं द्रौपदीभवनं प्रविवेश । अकथयच्च सर्वां वार्तन्ति ।
द्रौपदीकथनम्— तद्वचः श्रुत्वा द्रौपदी व्याजहार । मनोव्यथा पीडिता दुर्योधनादिकौरवकृतापकारान् स्मारयन्ती युधिष्ठिरं सा नार्यपि द्रौपदी भणति सारगभितां वाचम्— हे राजन् ! ते पराजयं प्राप्नुवन्ति ये मायाविषु कपटिनो न भवन्ति । एतादृशीं दुरवस्थामधिगतं भवन्तं कथं न दहति कोपाग्निः । यस्य कोपः सफलः सर्वे तस्याधीनाः भवन्ति । एते तवानुजाः भीमार्जुननकुलसहदेवाः वनमधिवसन्तो निन्दितामवस्थामुपैताः । दृष्ट्वैतानद्यापि भवान् धैर्यं त्यक्तुं न प्रवर्तते । नाहं जाने ते चित्तवृत्तिरहस्यम् । भवान् पुरा स्तुतिपाठैः विगतनिद्रो जातः, परन्तु अद्य शृगालीरवैः निद्रां त्यजति । 'भवच्छरीरमिदानीं कृशतामधिगतम् । शत्रुकौरवैर्भवानिमां दशामधिगतः । सर्वं खलु दृष्ट्वा मे मनः खिद्यते । शमं विहाय साम्प्रतं पौरुषं धारय । शत्रुं नाशय । शान्तिरेवास्ति यदि सुखसाधनं भवन्मते तर्हि तपः करोतु । त्रयोदशवर्षपरिमितं प्रतिज्ञापालनमसाम्प्रतम् । शत्रवः सन्ति कपटपटवः । विजयार्थिनो नृपाः केनचिद् कपटेन सन्धिदोषमुत्पादयन्ति । 'भवन्तं राजलक्ष्मीः पुनः प्राप्नोत्विति उक्त्वा विरमति द्रौपदीति दिक् ।
प्रथम सर्ग का सारांश (हिन्दी में)
जुए में राज्य को हारकर तेरह वर्ष के वनवास की अवधि में महाराज युधिष्ठिर ने कुछ काल तक द्वैतवन में वास किया । वहीं से उन्होंने दुर्योधन की शासन व्यवस्थादि को ज्ञात करने के लिए एक वनेचर को हस्तिनापुर भेजा । वनेचर हस्तिनापुर से लौटकर युधिष्ठिर को सूचित करता है—
(वनेचर का कथन)— 'हे राजन् ! दूतों को चाहिए कि वे राजा से (प्रिय या अप्रिय) सत्य-संदेश कहें। क्योंकि राजा की आँखें गुप्तचर ही हैं। अतः जो कुछ मेरे द्वारा कहा जाय, उसके लिए मैं क्षमा चाहता हूँ। इस समय दुर्योधन नीति मार्ग से छल से प्राप्त पृथ्वी को अपने वश में करना चाहता है। आपको जीतने की इच्छा से वह दया, दान, दाक्षिण्य आदि गुणों से यश का विस्तार कर रहा है। समय का विभाजन करके आलस्य रहित हो वह पराक्रम का विस्तार कर रहा है। गर्वरहित हो वह अनुचरों में मित्र जैसा, मित्रों में भाई जैसा और भाइयों में अपने जैसा व्यवहार कर रहा है। दुर्योधन के धर्म, अर्थ और काम परस्पर बाधक नहीं बनते। वह आदर के साथ दान करता है और पक्षपात रहित हो धर्म की रक्षा करता है। अपने चारों ओर विश्वासपात्र आत्मीय-जनों को रक्षक के रूप में नियुक्त कर वह निर्भय है। सामादि उपाय सम्पदाओं की वर्षा कर रहे हैं। इस समय सस्यसम्पदा से पूरे कुरुप्रदेश शोभित हो रहे हैं।
दुर्योधन के शूर प्राणों से भी उसका हित करना चाहते हैं। गुप्तचरों के द्वारा वह समस्त राजाओं के कार्यों को जानता है पर उसके रहस्य को कोई नहीं जानता। राजाओं के द्वारा दुर्योधन की आज्ञा माला के समान मस्तक पर धारण किया जाता है। दुःशासन के ऊपर शासन का भार सौंप कर दुर्योधन आजकल केवल यज्ञों का सम्पादन करता है। वार्तालाप क्रम मे आप युधिष्ठिर का नाम आने पर अर्जुन के पराक्रम को याद करता हुआ वह मन्त्रमुग्ध फणीधर की तरह कष्ट पाता है। अतः हे राजन् ! यह सब मेरे द्वारा सत्य कहा गया, इस समय आपके द्वारा उचित प्रतिक्रिया शीघ्र ही करनी चाहिए'।
इतना कहकर वनेचर के रुकने पर और पारितोषिक प्राप्त कर चले जाने पर युधिष्ठिर ने भीमादि अनुजों के साथ द्रौपदी के घर मे प्रवेश किया और द्रौपदी से वनेचर द्वारा कथित कथन को कहा। अनन्तर द्रौपदी अपनी राय दी—
(द्रौपदी का कथन) 'हे राजन् ! वे लोग पराजय को पाते हैं जो कपटियों में कपट का व्यवहार नही करते। ऐसी विपन्नावस्था को भी प्राप्त किये हुए आप को क्रोधाग्नि क्यों नहीं जलाती। जिसका क्रोध सफल है, सभी उसी के अधीन होते हैं। ये तुम्हारे भाई भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव वन में रहते हुए निन्दित अवस्था को प्राप्त हो गये हैं। आप इनकी अवस्था को देखकर आज भी अपना धैर्य नहीं छोड़ रहे हैं। मैं आप के मन की बात को नहीं जानती। आप ही पहले स्तुतिपाठकों द्वारा मङ्गलगीतों से जगाये जाते थे पर आज सियारिनों के अमङ्गलमय (हुआँ हुआँ की) आवाज से जगाये जाते हैं। आप का शरीर आजकल अत्यधिक दुर्बल हो गया है। यह दशा शत्रुओं के द्वारा आप को प्राप्त करायी गई है। यह सब देखकर मेरा मन खिन्न हो रहा है। इसलिए हे राजन् ! शान्ति को छोड़ आप पौरुष धारण करें। शत्रुओं का नाश करें।
अगर आप के विचार से शान्ति ही सुख का साधन है, तो आप तपस्या करें। तेरह वर्ष की अवधि तक प्रतिज्ञा का पालन करना उचित नहीं है। क्योंकि शत्रु कौरव कपट में दक्ष हैं। अतः आप को भी कपट का ही अवलम्बन कर तेरह वर्ष वनवासी बनकर नहीं व्यतीत करना चाहिए। क्योंकि विजयार्थी राजा किसी भी प्रकार सन्धि में दोष को दिखाकर सन्धि (प्रतिज्ञा) तोड़ देते हैं। राज्यलक्ष्मी आप को पुनः वरण करे ऐसी कामना मैं करती हूँ।' इतना कहकर द्रौपदी चुप हो गई।
द्वितीय सर्ग का कथासार
द्वितीयसर्गस्य कथासारः (संस्कृत में)
द्रौपदी परामर्शनन्तरं भीमोऽपि द्रौपदीकथन मोजपूर्णवाण्या प्रशंसति । तद्यथा—
(भीमकथनम्)— द्रौपद्या गुणसमन्वितोक्तिः प्रस्तुता। द्रौपदीकथनं भवतेऽपि स्वदताम्। साम्प्रतम्भवतः सदसद्विवेकसमन्विता प्रज्ञाऽविवेकं प्राप्य नश्यति । सुरैरपि प्रशंसितो भवत्पुरुषार्थः इदानीं गर्हितां दशां प्रापितः कौरवशत्रुभिः । अस्मादधिकं कष्टमन्यत् किं भविष्यति ? वैरिणामभ्युदयोन्मुखा अवनतिनैव सुसहा । विजिगीषुः पुरुषः आत्मानं रक्षन् वैरिणः विनाशयितुं प्रयतते । यो राजा शत्रूणां प्रभुशक्तिमुपेक्षतं, तस्य सम्पदः शीघ्रं तं परित्यज्य अपसरन्ति । यो नृपः क्षीणोऽपि सहजं तेजो धत्ते, तं प्रजाः नमस्कुर्वन्ति । धीरस्य आत्मपौरुषमेवैकं विशिष्टमालम्बनं निरूप्यते । योऽस्ति पौरुषहीनस्तमाक्रमन्ति आपदः । राजश्रियः पौरुषाश्रयाः भवन्ति । त्रयोदशवर्ष यावत् वनवासकालोऽपि न परिपालनीयः ।
यदि शत्रुः स्वराज्यं स्वयमेव प्रत्यर्पयति तर्हि तवानुजानामस्माकं पराक्रमोऽस्ति प्रयोजनहीनः । इगमनुचितम् । यतो हि तेजस्विनः अन्यतः ऐश्वर्यं न काङ्क्षन्ति । गमनशीलैः प्राणैः स्थिरं यशः प्राप्तव्यम् । अभिमानिनः प्राणान् त्यक्तुमिच्छन्ति न तु तेजः । मनस्वी शत्रोः वृद्धिं न सहते । अतः हे राजन् ! पौरुषं विना न कोऽप्युपायः । पौरुषमेवाङ्गीकुरु । तव भीमार्जननकुलसहदेवाभिधानामनुजानां पराक्रमं शत्रुमध्ये कः सोढुं समर्थः । तव क्रोधाग्निः शत्रून् दग्ध्वा एव शाम्यतु' इति ।
युधिष्ठिरकथनम्— क्रोधाविष्टचेतसः भीमस्य कथनं श्रुत्वा राजा युधिष्ठिरस्तं नम्रवाक्यैः प्रशंसति । परन्तु विमृश्यकारिण एव जयन्ति । यतोहि अविवेकः आपदामास्ति आस्पदम् । विवेकी अनुकूलकालं प्रतीक्षमाणः कार्यं प्रारभते, पश्चात् सिद्धि लभते नूनम् । शान्तिसमर्थितः पुरुषार्थः सिद्धि नमति । साधुपुरुषैः समाचरिते मार्गे व्यवहरतां जनानां विपदपि उन्नतिसमा । विजयार्थिनो नृपाः क्रोधं जित्वा पुरुषार्थं कल्याणकरमुपायमधिगच्छन्ति । जयाभिलाषे भवति बाधकः क्रोधः । समवृत्तिको राजान एव भुवनं वशीकर्तुं समर्थाः । जितेन्द्रिया एव सम्पदयोऽधिगन्तुं सक्षमाः । ये स्वशरीरस्थान् कामक्रोधादिशत्रून् न नियच्छन्ति तेऽपकीर्तिमधिगच्छन्ति । क्षमातुल्यं न किमपि साधनम् ।
विहायास्मान् बलरामकृष्णादियादवाः सदैव दुर्योधनसहाया न भविष्यन्ति । अन्येऽपि नृपाः स्वार्थसिद्धयै दुर्योधनमुपासन्ते । काले व्यतीते कृतमाक्रमणं सफलं भविष्यति । दर्पयुक्तो दुर्योधनोऽन्यान् नृपान् तिरस्कुर्वन् भेदयोग्यान् विधास्यति । दर्पयुक्तो राजा नीतिमार्गाच्च्युतो भवति । एतादृशं राजानं प्रजा अपि त्यजन्ति । अन्तरङ्गमात्यादिजनितं वैरं नृपं नाशयति । योऽविनयी शत्रुस्तस्य समृद्धिरुपेक्षणीया । स सुखेन जेतुं शक्यते । इति ।
उक्तप्रकारेण यदा युधिष्ठिरो भीममुपदिशानासीनदैव पराशरात्मजो महर्षिव्यासः आगतः । तं सम्पूज्य युधिष्ठिरः तदुपदिष्टमासनमलञ्चकारोति दिक् ।
द्वितीय सर्ग का सारांश (हिन्दी में)
प्रथम सर्ग मे द्रौपदी ने ओजपूर्ण वाणी मे परामर्श दिया, उसकी प्रशंसा भीम ने किया।
(भीम का कथन)— 'द्रौपदी ने गुणों से युक्त परामर्श दिया है। द्रौपदी का कथन आपको भी अच्छा लगना चाहिए। इस समय अविवेक को प्राप्त कर आपकी सत् और असत् को पहचानने वाली बुद्धि नष्ट हो रही है। दोनों के द्वारा प्रशंसित आपका पुरुषार्थ इस समय शत्रु कौरवों के द्वारा निन्दित अवस्था को प्राप्त करा दिया गया है। इससे बढ़कर और क्या कष्ट हो सकता है ? शत्रुओं का अभ्युदय की ओर उन्मुख अपकर्ष सुसह्य होता है। जयाभिलाषी पुरुष अपनी रक्षा करता हुआ वैरियों के नाश का प्रयत्न करता है। जो राजा शत्रुओं की प्रभुशक्ति की उपेक्षा करता है, उसकी सम्पत्तियाँ शीघ्र ही उसे छोड़कर चली जाती हैं। जो राजा क्षीण होता हुआ भी सहज तेज को धारण करता है उसे प्रजा नमस्कार करती है। धीर पुरुष का अपना पौरुष ही एकमात्र विशिष्ट आलम्बन कहा गया है। जो पौरुषहीन होता है उसे विपत्तियाँ आक्रान्त कर देती हैं। राज्यलक्ष्मी पौरुष पर ही आधारित होती है। तेरह वर्ष तक वनवास के समय की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए।
यदि शत्रु स्वयं ही तेरह वर्ष पूरा होने पर हमारा राज्य दे दें तो हम लोगों का पराक्रम प्रयोजनहीन ही कहा जायेगा। जो अनुचित है। क्योंकि तेजस्वी लोग दूसरे से ऐश्वर्य की इच्छा नहीं करते। गतिशील प्राणों से स्थिर यश को प्राप्त करना चाहिए। अभिमानी प्राणों को छोड़ना पसन्द करते हैं तेज को नहीं। अभिमानी शत्रु की वृद्धि को नहीं सहता है। इसलिए हे राजन् ! पौरुष के बिना दूसरा कोई उपाय नहीं है। अतः आप पराक्रम को ही स्वीकार करें। शत्रु कौरव पक्ष में ऐसा कौन वीर है जो आपके अनुजों के पराक्रम को सह लेगा ? अतः आपकी क्रोधाग्नि शत्रुओं को जला करके ही शान्त होवे' ।
(युधिष्ठिर का कथन)— क्रोध से अशान्त चित्त वाले भीम के कथन को सुनकर राजा युधिष्ठिर ने संयत वाक्यों से भीम की प्रशंसा की और उन्हें शान्त करते हुए कहा- 'सोच विचार कर कार्य करने वाले ही विजयी होते हैं। क्योंकि अविवेक विपत्तियों की जड़ है। विवेकी पुरुष उचित समय की प्रतीक्षा कर ही कार्य का प्रारम्भ करते हैं और अन्त में निश्चित ही सिद्धि को प्राप्त करते हैं। शान्ति से समर्थित पुरुषार्थ सिद्धि को दिलाता है। सज्जन लोगों के द्वारा प्रदर्शित मार्ग का आचरण करते हुए लोगों की विपत्तियाँ भी उन्नति के ही समान हैं। विजयाभिलाषी राजा क्रोध को जीतकर कल्याणकारी उपाय पुरुषार्थ को प्राप्त करते हैं। क्रोध जय की अभिलाषा में बाधक होता है। मध्यम मार्ग (न क्रूरता का और न सीधापन का) पर चलता हुआ राजा भुवन को वश में करने में समर्थ होता है। विजितेन्द्रिय ही सम्पत्तियों को प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। जो लोग अपने शरीर में स्थित काम, क्रोधादि शत्रुओं को वश में नहीं रखते वे अयश को प्राप्त करते हैं। क्षमा के समान दूसरा कोई उपाय नहीं है।
बलराम कृष्णादि यदुवंशी राजा हमेशा हमें छोड़कर दुर्योधन के ही सहायक नहीं होंगे। और भी दूसरे राजा अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए ही दुर्योधन की परिचर्या कर रहे हैं। गर्वयुक्त उद्धत दुर्योधन उन राजाओं का तिरस्कार कर उन्हें भेदयुक्त बना देगा। दर्पयुक्त राजा नीतिमार्गा से भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे राजा को प्रजा भी छोड़ देती है। राजा के अन्तरङ्ग अमात्यादि (मन्त्री आदि) के बीच उत्पन्न वैर राजा को नष्ट करता है। अविनयी शत्रु की समृद्धि भी उपेक्षा के योग्य होती है। उचित समय पर आक्रमण कर उसे शीघ्र ही सुखपूर्वक जीता जा सकता है।
ऐसा कहते हुए युधिष्ठिर के सामने पराशर ऋषि के पुत्र महर्षि व्यास प्रकट हुए। राजा युधिष्ठिर उनकी पूजा कर उनके द्वारा आदिष्ट हो सिंहासन पर विराजमान हुए।
तृतीय सर्ग का कथासार
तृतीयसर्गस्य कथासारः (संस्कृत में)
सर्गस्यादौ व्यासः प्रदर्शितः । कपिलवर्णसटासमन्वितोऽसौ श्यामवर्णः विद्युत्स-मन्वितं मेघमनुकरोति । तस्य शरीरशोभाऽलोकसामान्या । तस्याकृतिः शान्ता। स यज्ञादिधर्माधाराणां पापान्तकानां वेदानां कारणः । युधिष्ठिरस्तस्यागमनकारणं ज्ञातुकामो जगाद—यैः पुण्यसञ्चयो न कृतः, तैः भवद्दर्शनं न प्राप्यते। अद्यास्माकं यागानां चेष्टाः सफलाः, विप्राणामाशिषः सत्यमाप्ताः । भवदागमनेनाहं सत्कृतोऽस्मि । भवद्दर्शनं श्रियं विकर्षति, पापानि नाशयति, शुभं स्रवति, यशस्तनोति च । यद्यपि भवतामस्माभिः सह न किमपि प्रयोजनम्, तथापि भवद्वचः श्रोतुमभिलाषो मां प्रेरयति।
व्यासोक्तिः— युधिष्ठिरं प्रति व्यासोऽकथयद्यद्यपि तपस्विनस्तुल्यवृत्तयः, पुनरपि मम हृदयं भवद्गुणैरावर्जितं भवदायत्तम्। किं यूयं तस्य नृपस्य तनया न ? अथवा गुणैर्दुर्योधनं नातिक्रान्ताः । कथं दुर्योधनं प्रयोजनसिद्धिः न त्यजतु, यः सन्देहकार्येषु कर्णादीन् श्रयते । भवतां शत्रवः कपटेन भवतामपकारं कृत्वोपकारमेव कृतवन्तः । अधुना बलेनास्त्रेण, सेनया च शत्रुः ज्यायान्, अतः प्रकर्षायोपाय करणीयः । भीष्म-पराक्रमेण तद्गुरुः परशुरामोऽपि धिक्कृतः । यमोऽपि तेन प्रत्यादिष्ट इव। कालाग्निरिव द्रोणाचार्यः, तस्य प्रतिद्वन्द्वी भवितुं भवतां कः शक्नोति । कर्णं दृष्ट्वा मृत्युरपि भयमेति। यया विद्यया तपः कृत्वा पाशुपतास्त्रं लब्ध्वाऽर्जुनो भीष्मादीनामन्तको भविष्यति, तां विद्यां सिद्धिमिव दातुमागतोऽस्मि। अनन्तरं युधिष्ठिरादेशेनार्जुनो व्यासस्य पुरतः स्थितोऽभवत् । व्यासस्तपस्याबलेन तां योगविद्यामर्जुनाय प्रादात् । व्यासोऽकथयत् यत् सशस्रः स्वसरणिं परस्मैऽददन् ऋषिकर्मपद्धतिं सम्पादय। यत्रेन्द्रस्य मुदे तपश्चरिष्यसि, तं शैलं त्वां यक्षः प्रापयिष्यति।
व्यासे तिरोभूते यक्षस्तत्रागतः। यक्षः प्रणामं चकार । तदनु पाण्डवानर्जुनभावि-वियोगजनितशोकान्धकारः प्राप । धृत्या, मुनिव्यासस्य श्रद्धेयोक्त्या, शत्रुकृतापमानजनित-क्रोधेन, अर्जुनस्य बलज्ञानेन च पाण्डवेषु शोकः पदं नाप्नोत् । तदनु द्रौपदी शोकमप्ता । अर्जुनो द्रौपदीप्रदत्तमवलोकनं शम्बलम् इव स्वीकार।
द्रौपदीकथनम्— द्रौपदी जगादार्जुनं प्रति—तपःसिद्धिं यावद् अस्माभिः विना चेखिद्यमानचित्तो मा भूः । ये उद्योगिनः दुःखं नानुभवन्ति, ते सिद्धिं प्राप्नुवन्ति । दुर्योधनस्य सभायां मां प्रति यत् किमपि शत्रुभिर्चरितं, तन्निन्दितं कर्म भवद्यशो हिनस्तीव। स विप्रकारः स्मर्तुं न योग्यः । अनुभूतेः विषयः कथम् ? भवत्तेजो रिपुतेजसाऽऽवृतमस्ति। यशोनाशात् तव नैसर्गिकं रूपं न भासते। अधुना मम केशाः शरणहीनाः। यः सज्जनानां रक्षणे शक्तः, स क्षत्रियः । युद्धक्रियासु यस्य योग्यता, तत् शरासनम्। रिपूत्पाटनरूपधूर्वस्त्वामाश्रिता वर्तते। यः क्रियाभियोग्यतामर्थयुक्तां करोति, स पुरुषोऽद्वितीयः । यैः दुरितैश्चेतो दुःखं प्राप्नोति, जयाय गच्छतस्तव दुरितानां दुःखानां वोन्माथं कुर्यादिन्द्रः । विजने स्थानेऽनवधानतां मा गाः । महर्षिव्यासस्यादेशं पालयन् अस्मान् सफलकामान् कुरु।
द्रौपदीकथितं वचो निशम्यार्जुनस्य मन्युः ववृधे। तदनु पुरोहितधौम्यरोपित-शस्त्रोऽर्जुनश्चापं, महानिषङ्गौ, कवचं चोवाहा। स यक्षनिर्दिष्टमार्गेण गच्छन् तपोधनानां मनांसि खेदयामास । तदनु दिशो दुन्दुभिशब्दमनुदध्वनुः, गगने पुष्पवृष्टिरभूत्, सागरो भूमिं परिष्वब्जे च।
तृतीय सर्ग का सारांश (हिन्दी में)
सर्ग का प्रारम्भ व्यास के प्रादुर्भाव से होता है। कुछ पिङ्गल वर्ण की जटाओं को धारण करने वाले व्यास को श्याम वर्ण की शोभा वाले विद्युद्युक्त जलद के समान माना गया है। उनकी शरीरशोभा अलोकसामान्या है। उनकी आकृति शान्त है। वे धर्ममूलक, पाप को नष्ट करनेवाले वेदों के प्रभव हैं। युधिष्ठिर ने उनके आने का कारण जानने की इच्छा से कहा कि जिन्होंने पुण्य का संचय नहीं किया है, ऐसे लोगों द्वारा आपकी प्राप्ति नहीं हो सकती। आज हमारे यज्ञों के अनुष्ठान सफल हो गये और ब्राह्मणों के आशीर्वाद सत्य हो गये। आपके आने से मैं अधिक सम्मानित हो गया हूँ। आपका दर्शन लक्ष्मी को बढ़ाता है, पापों को दूर करता है, कल्याण की वर्षा करता है और कीर्ति फैलाता है। यद्यपि हम लोगों से आपका कोई प्रयोजन नहीं है, फिर भी आपकी वाणी सुनने की इच्छा मुझे प्रेरित करती है। फिर व्यास ने युधिष्ठिर से कहा कि यद्यपि तपस्वी लोग तुल्यवृत्ति होते हैं, फिर भी मेरा हृदय आपके गुणसमूहों से आकृष्ट होकर वश में हो गया है। आप सब उस राजा के पुत्रों में नहीं हैं क्या ? अथवा गुणों द्वारा दुर्योधन को नहीं जीता है क्या ? दुर्योधन को अर्थसिद्धि क्यों न छोड़ दे, जो सन्देह के कार्यों में कर्ण आदि पर आश्रित हो जाता है। आपके शत्रु छल से आपका अपकार करके उपकार ही किये। इस समय बल, अस्त्र और सेना द्वारा शत्रु प्रबलतर है, इसलिए उससे अधिक होने के लिए उपाय करना चाहिए। भीष्म के बल में उनके गुरु परशुराम भी तिरस्कृत हो गये थे। यमराज भी मानो उनसे पराजित हैं। कालाग्नि के समान गुरु द्रोणाचार्य का सामना आप लोगों में कौन कर सकता है। कर्ण को देखकर मृत्यु भी भयभीत हो जाती है। जिस विद्या द्वारा तपस्या कर पाशुपत अस्त्र प्राप्त कर अर्जुन भीष्मादि का नाश करेंगे, उस विद्या को सिद्धि के समान देने के लिए आया हूँ। फिर युधिष्ठिर के आदेश से अर्जुन व्यास के सामने उपस्थित हुए। व्यास ने तपस्या के प्रभाव से उस योग-विद्या को अर्जुन को बतला दिया। व्यास ने कहा कि शस्त्र धारण किये हुए अपने मार्ग को किसी को न बतलाकर मुनियों के समान आचरण करो। जहाँ पर इन्द्र की प्रसन्नता के लिए तपस्या करोगे, उस पर्वत पर तुम्हें यक्ष ले जायेगा। व्यास के तिरोहित होने पर यक्ष वहाँ आ गया। यक्ष ने प्रणाम किया। तदनन्तर पाण्डवों को अर्जुन के भावी वियोग के कारण शोकान्धकार प्राप्त हुआ। धैर्य के कारण, व्यास के वचन में विश्वास के कारण, शत्रुकृत व्यवहार से उत्पन्न क्रोध के कारण और अर्जुन के बल को जानने के कारण पाण्डवों में अधिक देर तक शोक न रह सका। फिर द्रौपदी को शोक हुआ। अर्जुन ने द्रौपदी द्वारा अर्पित अवलोकन को सम्बल की तरह ग्रहण किया। द्रौपदी ने अर्जुन से कहा कि तपस्या की सिद्धि तक हम लोगों का विरह आपको दुःखी न करे। उद्योग करने वाले, दुःख का अनुभव न करने वाले मनुष्यों की सिद्धि गोद में आ जाती है। दुर्योधन की सभा में मेरा अपमानरूप निन्दित कर्म आपके यश को मानो संकुचित कर रहा है। वह पराभव स्मरण करने योग्य नहीं है, अनुभव करने की तो बात ही क्या ? आपका प्रताप रिपुप्रताप से ढँक गया है। यश नष्ट हो जाने से आपका रूप बिगड़ गया है। इस समय मेरे केश अनाथ हैं। जो सज्जनों की रक्षा कर सके, वह क्षत्रिय है और जो युद्धों में शक्ति दिखाये, वही कार्मुक है। शत्रून्मूलन रूप कार्यभार आपके ऊपर आश्रित है। जो योग्यता को कर्मों द्वारा सार्थक बनाता है, वही अद्वितीय है। जिन पापों से चित्त दुःखी होता है, जय के लिए जाते हुए उन पापों या दुःखों का नाश इन्द्र करें। विजन देश में आप अवधान मत होना। महर्षि व्यास के वचनों का पालन करते हुए हम लोगों के मनोरथों को सफल करें। द्रौपदी की बातें सुनकर अर्जुन क्रुद्ध हो उठे। फिर पुरोहित धौम्य ने अर्जुन के आयुधों को अभिमन्त्रित किया। अर्जुन ने धनुष, तरकस और कवच धारण किया। वे यक्ष द्वारा निर्दिष्ट पर्वत-मार्ग को जाते हुए तपस्वियों को वियोग से दुःखी कर दिये। इसके बाद दिशाओं ने दुन्दुभि-सी ध्वनि की, आकाश ने पुष्पवर्षा की और समुद्र ने पृथ्वी का आलिङ्गन किया।
चतुर्थ सर्ग का कथासार
चतुर्थसर्गस्य कथासारः (संस्कृत में)
तदन्वर्जुन एतादृशीं धरां प्राप, या प्रियासाम्यमाप्ता। स शरदो लक्ष्म्या सम्भृताः स्थलीः निरीक्षन् प्रसन्नोऽभवत्। प्रोष्ठीस्फुरितान्यर्जुनस्य चेतो जहुः। अर्जुनः सकमले सलिले शालिसौन्दर्यं पश्यन् हर्षं जगाम। स दुकूलशुक्लं नदीनां पुलिनं दृष्ट्वाऽऽनन्दितोऽभवत्। स नानाप्रकारेणालङ्कृतां, सौन्दर्यमण्डितां शालिगोपिकां दृष्ट्वा शरत्कालस्य सिद्धिं मेने। अपररात्रवनात् प्रत्यागता धेनुसमवाया अर्जुनं दर्शनलुब्धम् अकुर्वन्। स शरत्कालजनितां पुष्टिं वहन्तं वृषभपतिं सशरीरम् अभिमानमिवापश्यत्। स गवाद्यानां सहजतनभ्रातृत्वं प्राप्तान्, कोमलत्वे गोभिः विहितानुकारान् इव गोपालकान् दृष्टवान्। अर्जुनैनातादृश्यो गोपस्त्रियो दृष्टाः, या अभिप्रनृत्ता गणिका इवासन्। ताश्चलत्केशाः स्फुरितौष्ठाश्चासन्। तासां गोपाङ्गनानां मन्थनदण्डानां परिचालनैः पुनः पुनः कम्पिता घटा मुरज्वन्मन्दं शब्दं कुर्वन्ति स्म। अर्जुनस्तान् मार्गान् जगाम, ये प्रावृट् प्राप्तां कुटिलतां त्यक्त्वा सुगमा आसन्। स आश्रमजनाश्रयनिभा गृहलता अपश्यत्।
तदनु यक्षोऽर्जुनं प्रत्यकथयत्—
यक्षकथनम्— हे अर्जुन ! मङ्गलप्रदायाः नियतेरुत्तरः काल इव लोकस्य कर्माणि सस्यैः सफलयन्ती शरत् ते विजयलक्ष्मीं द्विगुणीकरोतु। अधुना चारुता सस्यं, नम्रता निम्नागाश्च प्राप्नोति। भूमिः पङ्करहिता। नभसि बलाका न प्रचरन्ति, मेघेषु नेन्द्रधनुः, पुनरपि गगनं श्रेष्ठां लक्ष्मीं प्राप्नोति। मयूरस्य केकायां निःस्पृहो भूत्वा श्रवणं मत्तहंसस्वरं श्रयति। कलमाः क्षेत्रनीरे श्यामनलिनम् आघ्रातुम् इव नम्रा भवन्ति। नानावर्णमिश्रणेनावदीर्णं जलमिन्द्रस्य चापशकलम् इवाभाति। हंसानां वाशितैः गुम्फिता, जलदावरोधरहिता निर्मलाशाः परस्पराभाषणं कुर्वन्तीव। गोचरादाभीरपल्लीं गन्तुकामा धेनवो वत्सेभ्य उपानानि इवोधंसि वहन्ति। धेनूनां समितिः जगत्प्रधानपवित्रकर्त्री। गोपाङ्गनागीतस्वरेणार्जितं मृगकामिनीवृन्दमृतुमिच्छां त्यक्त्वा सस्यं न प्राप्नोति। रक्तैः वदनैः कपिलाभाः शालिशिखा आदधती कीरालिः सुरपतिचापलक्ष्मीमनुकरोति। तदनु हिमालयो दृष्टः। अर्जुनो हिमाद्रिं प्राप्य बलरामस्य शोभां स्मृतवान्।
चतुर्थ सर्ग का सारांश (हिन्दी में)
इसके बाद अर्जुन ने ऐसी पृथ्वी को प्राप्त किया, जो प्रिया की समता प्राप्त कर रही थी। जैसे कूजते हुए कलहंस मेखला के समान थे और पके हुए धान पीलापन प्रदर्शित कर रहे थे। वह शरत्कालीन लक्ष्मी वाली गाँव के पास की भूमि को देखकर प्रसन्न हो उठे। शफरी मछली की चेष्टाओं ने अर्जुन के मन को हर लिया। अर्जुन कमलसहित जल में धान की सुन्दरता देखते हुए प्रसन्न हो उठे। वे दुकूल वस्त्र की तरह स्वच्छ नदियों के सैकत को देखकर आनन्दित हुए। वे अनेक प्रकार से अलङ्कृत और सुन्दरता से मण्डित धान की रखवाली करने वाली गोपिकाओं को देखकर शरत्काल की सफलता समझे। वे अपररात्रि चरागाह से लौटी हुई उत्कण्ठित गायों के समूह को देखने के लिए बाध्य हो गये। उन्होंने पशुओं के सहोदर भ्रातृत्व को प्राप्त, कोमलता में गायों-सा व्यवहार रखने वाले गोपालकों को देखा। अर्जुन ने ऐसी गोपिकाओं को देखा, जो नृत्य में प्रवृत्त वेश्याओं के समान थीं, जिनके केश बिखरे हुए थे और जिनके होंठ काँप रहे थे। जिनके द्वारा मथनी के चारो ओर घूमने में बार-बार कम्पित होने वाले घड़ों में मृदङ्ग के समान ध्वनि आती थी। अर्जुन उन मार्गों से गये, जो वर्षाकालीन कुटिलता को छोड़कर सुगम बन गये थे और जिनके पास की धान की फसल को बैलों ने खा लिया था। उन्होंने मुनियों के आश्रम-मण्डप के समान गृहलताओं को देखा। इसके बाद यक्ष ने अर्जुन से कहा—
हे अर्जुन ! मंगलकारिणी नियति के उत्तरकाल के समान जगत् की क्रियाओं को फलों द्वारा सार्थक बनाती हुई यह शरत् आपकी विजयश्री को द्विगुणित करे। इस समय सुन्दरता धान को और नम्रता नदियों को प्राप्त होती है। पृथ्वी कीचड़रहित हो जाती है। आकाश में बलाकायें नहीं उड़तीं, बादलों में इन्द्रधनुष नहीं है, फिर भी आकाश शोभा धारण करता है। मोर के स्वर में निःस्पृह होकर कान मतवाले हंस के स्वर का आश्रय लेता है। धान के पौधे केदार के जल में नील कमल को सूंघने के लिए मानो झुक रहे हैं। अनेक वर्णों के मिश्रण होने से वेगशील जल इन्द्रधनुष के खण्ड-सा लगता है। हंसों की ध्वनि से ग्रथित, मेघ के अवरोध से रहित निर्मल दिशायें मानों परस्पर बातचीत कर रही हैं। चरागाह से आभीरपल्ली की ओर उत्सुक ये गायें थनों को बछड़ों के लिए मानो उपहार ला रही हैं। गायें संसार को पवित्र करती हैं। गोपिकाओं के गीतस्वर से आकृष्ट हरिणियों का समूह खाने की इच्छा छोड़कर धान की फसल के पास नहीं जाता। लाल चोंचों से पीले धान के अग्रभाग को धारण करती हुई शुकों की पंक्ति इन्द्रधनुष की शोभा की विडम्बना कर रही है। अनन्तर समीप ही हिमालय दिखाई पड़ा। अर्जुन ने वनपंक्तियों से श्यामल उपत्यका वाले और ऊपर बर्फ के समूह से श्वेत हिमालय को प्राप्त कर नीला वस्त्र धारण किये हुए बलराम की शोभा का स्मरण किया।
पञ्चम सर्ग का कथासार
पञ्चमसर्गस्य कथासारः (संस्कृत में)
अस्मिन् सर्गे हिमालयस्य तदनु तत्सम्बद्धस्य कैलासस्य तदन्विन्द्रनीलस्य वर्णनं कृतं वर्तते।
महाकविभारविकृतं हिमालयवर्णनम् - हिमालयोऽतीवोन्नतः । सः स्वतुङ्गत्वेन सुमेरुपर्वतं जेतुम् इवेच्छति। एकतः प्रकाशेनान्यतोऽन्धकारेण सः करिचर्मणाच्छादितं शङ्करमनुकरोति। हिमालये लोकत्रयनिवासिनः सन्ति। प्रतीयते यत् स्वप्रभुत्वं दर्शयितुं शङ्कर इमं भुवनानां प्रतिमानम् इव कृतवान्। सर्पराजश्वेतोऽस्य सानुः स्वर्णलेखासमुद्भासितोऽस्ति। अयं पत्तनभूमिम् अनुकरोति। विशालकटकाश्रितैर्मेघैरयं हिमालयः सपक्ष इव भाति। विविधवैशिष्ट्यसम्पन्नाः हिमालयस्य नद्यः प्रशंसनीयाः। अयं जपाप्रसूनप्रभायुक्तानां रत्नानां निकरेण स्वसौवर्णरूपस्य सम्मिश्रणं कृत्वा सान्ध्य-सूर्यस्य किरणानां सौन्दर्यं जनयति। अत्र विशालकदम्बवृक्षास्तमालवनानि च सन्ति। अत्र मदयुक्ताः सुन्दराननाश्र गजाः सन्ति। हिमालयस्य शिखराणि सरलानि। नद्यः कमलयुक्ताः, पुलिनयुक्ताश्च। वृक्षाः सकुसुमाः सन्ति। अत्र सर्पाणां कुलानि सन्ति। अयं मानससरः शङ्ख रञ्च दधाति। अयं तृणविशेषजनितेन पावकेन प्रत्येकं रात्रौ शङ्करभृत्यान् प्रमथादिगणान् त्रिपुरदाहम् अनुस्मरयति। अयम् उच्चसानौ गङ्गां दधाति।
यक्षकृतं हिमालयवर्णनम्— हिमालयः शृङ्गैराकाशं दुरितानि सद्यो हन्ति। अयं परमात्मनस्तुलनामधिगच्छति। ब्रह्मैवेमं ज्ञातुं सहस्रधा कुर्वन् लोकानां समर्थः। अयं कामोद्दीपकरः, धैर्ययुक्ताः कामिनीः अपि अविरतमौत्कण्ठ्यं प्रापयति। अयं विशिष्टैश्वर्येण समन्वितः। अनेन हेतुना पृथिवीं, स्वर्गं पातालंच समतिक्रम्य राजते। अत्र सर्वदा शङ्करो निवसति, अतस्त्रिभुवनमपि इमं तुलयितुं न शक्नोति। अज्ञानान्धका-रच्छेत्तुः शास्त्राद् इवास्माद्धिमालयद् बुद्धयः प्रादुर्भवन्ति। जन्मनिर्वर्तकाः अत्र देवाङ्गनाशयनानि सुरतविशेषं सूचयन्ति। अत्र ओषधयः प्रज्वलिताः सन्ति। अत्र देवगजानां गण्डकाषः पिकान् असमयेऽपि मदयति। सुधाऽत्र विद्यते। अत्रत्यसुखसाधन-हेतुर्भिर्देवाङ्गनाः स्वर्गं नैव स्मरन्ति। शंकरोऽत्रैव स्वकरेण पार्वत्या अग्रकरं गृहीतवान्। अत्र स्फटिकरूप्यकुड्यप्रभा सूर्यस्य मयूखैः श्यामकान्तिभिः मणिभिश्च मिश्रिता दिवसस्य मध्येऽपि कौमुदीसन्देहं सूते।
कैलासवर्णनम्— यस्मिन् कुबेरः शङ्करस्य मुदे उच्चगो पुरं निर्मितवान्, स कैलासः प्रान्तगामिनः सूर्यस्य समयेऽप्राप्तेऽपि अस्तमयं करोति। अत्र विविधमणि-प्रभाजनितकुड्यभ्रान्तिं मुहुः मुहुः वहन् पवनो हिनस्ति। अस्मात् स्थानात् नवता नापैति। कमलिनीवनानि सदा श्यामलीभवन्ति। वृक्षाणां पल्लवानि जीर्णानि न भवन्ति। वायुसमूहैर्नभसि उद्धृतः स्थलकमलपरागः स्वर्णयुक्तच्छत्रशोभामावहति। अत्र गङ्गायास्तटे पार्वतीमहेश्वरयोरर्द्धनारीश्वररूपं स्फुटमवलोक्यते। वनितालोकचितेषु चन्द्रभ्रान्तिं जनयन् शङ्करस्य वृषोऽस्य शिखराणि श्रयते। अत्र कूटका रत्नदीप्तयः खण्डिताकारम् इन्द्रधनुः पूरयन्ति। अत्र शङ्करस्य चन्द्रलेखा कृष्णपक्षस्य रात्रिष्वपि वनप्रदेशं धवलयति।
इन्द्रनीलवर्णनम्— यः स्वर्णप्रदक्तां द्युतिं विशालोत्तरासङ्गमू इव तनोति, स इन्द्रस्याभीष्टः शैल इन्द्रनीलोऽस्ति। अत्र मत्तगजकषणेन कम्पिता हरिचन्दनवृक्षाः सर्पहीना जायन्ते। अत्र मेघसान्द्रैरिन्द्रनीलरत्नानां किरणैः सूर्यप्रभायाः सम्मिश्रणेन प्रतीयते यत् साऽन्धकारसंवलितेव वर्तते।
अनन्तरं यक्षः कथयति यद् अर्जुनः सावधानो भूत्वा तपश्चरतु। तस्य विषयितुरङ्गाः कुमार्गहतो न भवेयुः। सः कल्याणं कामयते। यक्षे स्वस्थानं गतेऽर्जुनं तद्वियोगजनितं दुःखं बबाधे। अर्जुनः स्वपुरुषार्थम् इवाभीष्टं शैलमिन्द्रनीलं प्रपेदे।
पञ्चम सर्ग का सारांश (हिन्दी में)
इस सर्ग में हिमालय वर्णन, अनन्तर उससे सम्बद्ध कैलास, फिर इन्द्रनील पर्वत का वर्णन हुआ है।
भारविकृत हिमालय-वर्णन— हिमालय अतीव उन्नत है। वह मानो अपने तुङ्गत्व से सुमेरु पर्वत को परास्त करना चाहता है। एक ओर प्रकाश एवं दूसरी ओर अन्धकार के कारण वह गजचर्म से आच्छादित शङ्कर की समता प्राप्त कर रहा है। यहाँ तीनों लोकों के निवासी रहते हैं। मानो शङ्कर जी ने अपनी प्रभुता दिखने के लिए इसे तीनों लोकों का प्रतिनिधि बनाया है। यह सर्पराज-सा श्वेत है एवं इसके शिखर स्वर्णलेखा से समुद्भासित हैं। यह नगरभूमि की विडम्बना करता है। विशाल कटकाश्रित मेघों से हिमालय पक्षवान्-सा लगता है। विविध वैशिष्ट्यसम्पन्न, हिमालय की नदियाँ प्रशंसनीय हैं। यह अड़हुलप्रसून की प्रभा वाले मणियों के समूह से अपना स्वर्णिम रूप मिश्रित कर सायङ्कालीन सूर्य की किरणों के सौन्दर्य का आभास कराता है। यहाँ विशाल कदम्बवृक्ष एवं तमालवन हैं। यहाँ मदयुक्त सुन्दर सूँड़ वाले हाथी हैं। यहाँ के शिखर रत्नराशियुक्त हैं। नदियाँ पुलिन एवं कमलों वाली हैं। वृक्ष सपुष्प हैं। यहाँ सर्पों के कुल भी हैं। यह हिमालय मानसरोवर एवं शङ्कर जी—दोनों को धारण करता है। यह तृणविशेष-जनित अग्नि से प्रत्येक रात्रि में शङ्कर जी के सेवकों—प्रमथादिगणों को त्रिपुर-दाह का स्मरण कराता है। यह उन्नत शिखर पर बहती हुई गंगा को धारण करता है।
यक्षकृत-वर्णन— शिखरों द्वारा आकाश को मानो सहस्रों भागों में विभक्त करता हुआ यह हिमालय लोगों के पापों को तुरन्त नष्ट कर देता है। यह श्रेष्ठ पुरुष परमात्मा के समान है। ब्रह्मा द्वारा ही यह जाना जा सकता है। यह कामोद्दीपक है एवं मानिनी स्त्रियों को भी निरन्तर उत्कण्ठित करता है। यह विशिष्ट ऐश्वर्य से युक्त है। इसके कारण पृथिवी स्वर्ग एवं पाताल लोक का उल्लङ्घन कर शोभित होती है। यहाँ शङ्कर जी सर्वदा रहते हैं, अतः इसकी तुलना त्रिभुवन भी नहीं कर सकता। अज्ञानान्धकार को नष्ट करने वाले शास्त्र के समान इस हिमालय से बन्धन को काटने वाली बुद्धियाँ आविर्भूत होती हैं। यहाँ देवाङ्गनाओं की शय्यायें सुरतविशेष को सूचित करती हैं। यहाँ पर ओषधियाँ प्रज्वलित रहती हैं। यहाँ सुरगजों के गण्डस्थल का घर्षण असमय में कोकिलों को मत्त बनाता है। सुधा यहीं पर रहती है। यहाँ के सुखसाधनों के कारण देवाङ्गनायें स्वर्ग का भी स्मरण नहीं करतीं। शङ्कर जी ने यहीं पर अपने हाथ से पार्वती के पाणि का ग्रहण किया था। स्फटिक एवं रजतयुक्त दीवाल की प्रभा सूर्य की किरणों एवं नीलाभ रत्नों से मिश्रित हो मध्याह्न में भी चाँदनी की भ्रान्ति उत्पन्न करती है।
कैलास-वर्णन— जिस पर शङ्कर जी के सन्तोष के लिए कुबेर ने उन्नत पुरद्वार वाले पुर का निर्माण किया, वह कैलास समीप में आये सूर्य को असमय में अस्त कर देता है। यहाँ पर अनेक रत्नप्रभाओं के सम्मिश्रण से जनित दीवाल की भ्रान्ति को बार-बार बहता हुआ पवन निरस्त कर देता है। यहाँ से नवीनता नहीं हटती। कमलिनीवन सदा नीले रहते हैं। वृक्षों के पल्लव नहीं सूखते। पवनसमूह द्वारा आकाश में उठाया गया स्थलकमलपराग स्वर्णयुक्त छत्र की शोभा धारण करता है। यहाँ गंगा के किनारे पार्वती-महेश्वर का अर्द्धनारीश्वर रूप स्पष्ट दिखाई पड़ता है। कामिनीलोक के चित्रों में चन्द्रमा की भ्रान्ति पैदा करता हुआ शङ्कर जी का वृष इसके शिखरों का आश्रय लेता है। यहाँ पर शिखरमणिप्रभायें खण्डिताकार इन्द्रधनुष को भी पूर्ण बना देती हैं। यहाँ पर शङ्कर जी की चन्द्रलेखा कृष्ण पक्ष की रात्रियों में भी वनप्रदेश को निर्मल बना देती है।
इन्द्रनील-वर्णन— जो स्वर्णिम प्रभा को विशाल उत्तरीय के समान फेंकता है, वह इन्द्र का प्रिय पर्वत इन्द्रनील है। यहाँ मदोन्मत्त हाथियों के घर्षण से कम्पित हरिचन्दन के वृक्ष साँपों से रहित हो जाते हैं। यहाँ पर मेघसदृश घने इन्द्रनीलमणियों की किरणों से सूर्यप्रभा का सम्मिश्रण होने से ऐसा लगता है कि वह अन्धकार से मिश्रित है।
इसके बाद यक्ष कहता है कि अर्जुन सावधान होकर तपस्या करें। वह कहता है कि उनके इन्द्रियरूपी घोड़े उन्मार्गगामी न हों। वह अर्जुन के कल्याण की कामना करता है। यक्ष के अपने निवास-स्थान को चले जाने पर अर्जुन को वियोगजन्य दुःख हुआ। फिर अर्जुन ने अपने पुरुषार्थ के समान अभीष्ट इन्द्रनील पर्वत को प्राप्त किया।
षष्ठ सर्ग का कथासार
षष्ठसर्गस्य कथासारः (संस्कृत में)
विष्णुः गरुडमिवार्जुन इन्द्रनीलशैलमारुरोह। वृक्षाः प्रसूनैरर्जुनमभिननन्दुः। त्रिविधाः पवनाः सुहृदो मित्रम् इवार्जुनमालिङ्गितवन्तः। अर्जुनो जलप्रवाहे वञ्जुलसमूहकृतां श्रेयःप्रदां प्रणतिमपश्यत्। सः सरितः संव्यानम् इव कादम्बसमूहं द्रष्टुं न शशाक। तिर्यग्दन्तप्रहारिकुञ्जरक्षतमपि भ्रमराङ्गनाविलसितं तीरमर्जुनस्य मुदेऽभवत्। सः दुःखभरितैः वाशितैः सहचरम् अन्विष्यन्तीं चक्रवाकाङ्गनाम् अभिननन्द। दीप्तयो जले विद्यमानपि रत्नजालम् अर्जुनायाकथयन्। शुभ्रम् अपां फेनं सरितः प्रहासम् इव स ददर्श। स पतन्नेत्राम्बुकणां वनिताम् इव शुक्तिं सैकते ददर्श। अर्जुनेन कुञ्जरप्रतिद्वन्द्वित्वं प्राप्ताः कुञ्जराकारा जलजन्तवो दृष्टाः। सः सर्पस्य फूत्कारैराकाशे प्रेषितं शरन्मेघोपमजलराशिं दृष्ट्वाऽऽश्चर्यं प्राप। स गङ्गया सङ्गमं कुर्वतीः सरितस्ततार। स शैलस्य शृङ्गे वनभूमिं प्राप; सा परिमार्जिता, पवित्रा चासीत्। कृच्छ्रादिकर्मानुकूलः शैलोऽर्जुनस्यानन्दाया-भवत्। तत्र मुनिकर्म आचरतोऽर्जुनस्य दुष्करं तपो दुःखदं न बभूव। स चन्द्र इव स्वतपःकर्मभिर्वृद्धिं गतः। तस्य शान्त्यानन्दानुभवः इन्द्रियार्थसङ्गमासक्तिं धिक्कृतवान्। स कामक्रोधादिविषयाद् बुद्धिं दूरस्थां चकार। मनसा, वाचा, कर्मणाऽर्जुन इन्द्रं प्रसादयन् जयशमौ युगपद् दधार। तस्य सटाः पिङ्गलवर्णा जाताः। स स्वपवित्रैश्चरितै-र्मुनीनपि तिरश्चकार। तपःप्रभावेण प्रकृतिरपि जाताऽनुकूला। पुष्पावचये वृक्षाः नम्रा जाताः, रात्रौ पृथिवी सुकुमारैः शष्पैराच्छादिता शय्याभावमुपेता। अर्जुनो निमितकुसुमं दृष्ट्वाऽऽश्चर्यान्वितो नाभवत्। तपःपुण्यैरल्पदिवसविहेतं दुर्लभं वैभवं ज्ञात्वा वनवासिन इन्द्रस्य सदनं प्रपेदिरे। विषण्णमतयो वनचराः कृतनमस्कारा इन्द्रं प्रति कथितवन्तः।
हे इन्द्र ! अन्धकारापसारणकर्तृणां सूर्यादीनाम् अद्वितीय इव पापरहितः पुरुषः शैले इन्द्रनीलाख्ये विपुलविजयाय तपः करोति। भयानकसर्पबाहुः स धनुर्वहति। तस्य सुकृतेन तपस्विनः प्रत्यादिष्टाः। पृथिव्यादिभूतगणस्तस्य परिचर्यामिव सम्पादयति। शिष्या आचार्यम् इव पशवस्तं पुरुषमुपासते। प्रसूनावचये द्रुमा नता भवन्ति। इन्द्रनीलशैलस्तद यतः परतन्त्रश्च। श्रमे कृतेऽपि तस्मिन् पुरुषे श्रमस्य नानुभूतिः। स मुनिकुलजो, दानववंशजो, भूपतीनां कुले वा जात इति ज्ञातुं वयं न समर्थाः। अस्माकं वचः सोढुमर्हसि। वनवासिनः क्व, यतिनश्च क्व। अर्जुनस्य तत् तपः श्रुत्वेन्द्रो जातमानन्दं जुगोप। अर्जुनस्य तपो ज्ञात्वाऽपि सुरपतिस्तद्व्रतस्थिरतां ज्ञातुं देवाङ्गना अकथयत्—
यूयम् इव न किमपि विजयाय कामस्येतरमस्त्रम्। इदमद्वितीयं, सूक्ष्ममतीव-विप्रकृष्टगामि। इदं कदापि निष्फलं न भवति। योगिनां ज्ञानजलं युष्माकं नेत्राञ्जलिभिः परिपीयमाणं नाशमेति। अनेकधा प्राप्तां चन्द्रकमलादिगतां चारुतां समभिहृत्य प्राणिकर्त्री विधात्रा भवद्रचना कृता। अतः गीतवाद्यादिकलासु कुशलैः सहायैर्गन्धर्वादिभिः सह गत्वा तस्य पुरुषस्य तपसि विघ्नं कुरुत। स रिपूणां घातेनेन्द्रियार्थसुखं कामयते। तादृशः पुरुषो नारीविषयेषु दुष्कृतानि न चिन्तयिष्यति। प्राप्ताचितिदेवाङ्गनासंहतिरिन्द्रस्यादेशं लब्ध्वा दीप्तिं प्राप। नमस्कारं कृत्वा ताः सुरपतिसदनात् प्रचलिताः।
षष्ठ सर्ग का सारांश (हिन्दी में)
जिस प्रकार विष्णु गरुड़ पर आरूढ़ होते हैं, उसी प्रकार अर्जुन इन्द्रनील पर्वत पर आरूढ़ हुए। वृक्षों ने अर्जुन पर प्रसून-वर्षा की। सुगन्धियुक्त शीतल एवं मन्द पवनों ने मानों मित्र अर्जुन के सामने आकर आलिंगन किया। अर्जुन ने जल-प्रवाह में वानीरलतासमूहों द्वारा की गई श्रेयःपद प्रणति को देखा। वे नदी के उत्तरीय के समान कलहंससमूह को देखने में समर्थ न हो सके।
उन्होंने क्षतों को धारण करते हुए, लेकिन हाथियों के मद-स्रवण से भ्रमराङ्गनाओं वाले तट में अधिक प्रसन्नता धारण की। उन्होंने चक्रवाक का करुण क्रन्दन से अन्वेषण करती हुई चक्रवाकी का अभिनन्दन किया। दीप्तियों ने जल में निमग्न भी मणिसमूह को अर्जुन को सूचित कर दिया। श्वेत जलफेन मानों नदी का अट्टहास है, ऐसा अर्जुन ने देखा। उन्होंने सीप को सैकत पर देखा। उन्होंने गजों के आकाश वाले जल-जन्तुओं को आये हुए गजों के सामने मानो प्रतिद्वन्द्वी गज हैं, ऐसा देखा। वे साँप के फुफकार से आकाश में फेंकी गई जलराशि को देखकर विस्मित हो गये। उन्होंने गंगा से मिलने वाली अनेक नदियों को पार किया। उन्होंने पर्वत के शिखर पर वनभूमि को प्राप्त किया, जो पवित्र और संशोधित थी। उस पर्वत ने अर्जुन को तपस्या करने के लिए उत्सुक कर दिया। वहाँ पर मुनि-व्यापार धारण करते हुए अर्जुन को तपस्या से खेद नहीं हुआ। वे चन्द्रमा के समान अपने पुण्यों से बढ़ने लगे। उन्होंने काम-क्रोधादिरूप दोषों से चित्तवृत्ति को दूर रखा। उनके शान्तिसुख के अनुभव ने विषयानुरक्ति को निष्फल बना दिया। उन्होंने मन, वाणी एवं कर्म से इन्द्र की आराधना की और हिंसादि कर्म से निवृत्त हो विजय एवं शान्ति को धारण करने वाली तेजस्विता को धारण किया। उनकी जटायें पिङ्गल हो गईं। उन्होंने अपने पवित्र आचरणों से ऋषियों को भी तिरस्कृत कर दिया। तपस्या उनके अनुकूल हो गई। तपस्या प्रसून चुनने के अवसर पर वृक्षों को नत करती थी और रात्रि में शयन-स्थान को प्राप्त पृथ्वी को कमालतृणों से ढँकती थी। अर्जुन मंगलकारी हेतुरूप कुसुम को देखकर आश्चर्यान्वित नहीं हुए। थोड़े दिनों में तपस्या द्वारा उन्हें असम्भव ऐश्वर्य मिला, उसे देखकर दुःखी हो वनचर इन्द्र के निवास-स्थान पर पहुँचे। उन्होंने इन्द्र से कहा—
हे इन्द्र ! सूर्यादि प्रकाश करने वाले तत्त्वों में अन्यतम-सा पापरहित पुरुष इन्द्रनील पर्वत पर महान् जय के लिए तपस्या कर रहा है। सर्प-सी उसकी भुजाएँ हैं और वह धनुष धारण करते हैं। उसके आचरण से मुनि पराजित हैं। पञ्चमहाभूतगण मानो उसकी परिचर्या करते हैं। गुरु की सेवा करने वाले शिष्य के समान पशु उसकी सेवा करते हैं। उसके कुसुमावचय में वृक्ष नम्र हो जाते हैं। वह पर्वत उसके अधीन हो गया है। परिश्रम करने पर भी वह थकावट का अनुभव नहीं करता। वह मुनिकुल का, दानवकुल का या राजाओं के कुल का है, इसका रहस्य समझने में हम असमर्थ हैं, आप हमारी बातें सहन करने योग्य हैं। कहाँ हम वनवासी और कहाँ मुनि लोग!
अर्जुन की उस तपस्या को सुनकर इन्द्र ने उत्पन्न आनन्द को छिपा लिया। अर्जुन की भक्ति विदित होते हुए भी, उनकी तपःस्थिरता को समझने के लिए इन्द्र ने देवाङ्गनाओं से कहा—
तुम लोगों के समान सूक्ष्म, अतिदूरगामी और अप्रतिद्वन्द्वी कोई दूसरा अस्त्र विजय के लिए नहीं है। यह काम का ऐसा अस्त्र है, जो कभी विफल नहीं होता। आप सब अपनी नेत्राञ्जलि से ज्ञानियों के ज्ञानरूपी जल को समाप्त कर देती हैं। ब्रह्मा ने चन्द्रादिगत सौन्दर्य को इकट्ठा कर आप सबकी सृष्टि की है। अतः कलाओं में कुशल सहायकों—गन्धर्वादि के साथ जाकर उसकी तपस्या में बाधा डालें। वह शत्रुओं के वध द्वारा इन्द्रिय-सुख चाहता है। यह बात असन्दिग्ध है। उसके विषय में अन्य मुनि के समान विकार अर्थात् शापादि का आप लोग ध्यान न दें। देवाङ्गनायें इस प्रकार से सम्मानित हो कान्तियुक्त हो गईं। उन्होंने इन्द्र को प्रणाम कर वहाँ से प्रस्थान कर दिया।
