सुभाषित सूक्ति

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
1

अलसस्य कुतो विद्या कुतो वित्तं कुतो यशः ।
अमित्रस्य कुतः सौख्यं कुतो भाग्यमदण्डिनः

।— चाणक्यनीति / सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: आलसी को विद्या कहाँ, धन कहाँ, यश कहाँ और मित्र के बिना सुख कहाँ?

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ॥

।— नीतिशतकम् (भर्तृहरि)
अर्थ: शरीर में स्थित आलस्य ही सबसे बड़ा शत्रु है और परिश्रम ही सबसे बड़ा मित्र।

किं करिष्यति वक्तव्यं विवदन्ति नराः सदा ।
आपदापदमनुधावति काले दुर्बुद्धिदायकम् ॥

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: एक आपत्ति के पीछे दूसरी आपत्ति आती है और वह बुद्धि को भी नष्ट कर देती है।

उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे ।
राजद्वारे श्मशाने च आपदि मित्रपरीक्षा

।— चाणक्यनीति
अर्थ: संकट, अकाल और युद्ध के समय ही सच्चे मित्र की परीक्षा होती है।

धीराः कष्टं समासाद्य न भवन्ति विषादिनः ।
आपत्स्वपि न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुध्दयः

।— पञ्चतन्त्रम्
अर्थ: बुद्धिमान लोग घोर विपत्ति आने पर भी मोहग्रस्त या विचलित नहीं होते।

यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः ।
चित्ते वाचि क्रियायां च साधूनामेकरूपता

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: सज्जनों के मन, वाणी और कर्म में एकरूपता होती है।

अपि स्वशक्त्या तपसि प्रवर्तसे ।
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्

।— कुमारसंभवम् (कालिदास) 5.33
अर्थ: धर्म के सभी साधनों में शरीर ही प्रथम और मुख्य साधन है।

वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मं श्रोतव्यं खलु वृध्दानां
धर्मो न स यत्र न सत्यमस्ति ॥

।— महाभारत (उद्योगपर्व)
अर्थ: वे वृद्ध नहीं जो धर्म की बात न करें, और वह धर्म नहीं जिसमें सत्य न हो।

न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः ।
यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः

।— मनुस्मृति 2.156
अर्थ: बाल सफेद होने से कोई वृद्ध नहीं होता, जो युवा होकर भी ज्ञानवान है, वही वृद्ध है।

कृषौ धन्या वसेल्लक्ष्मी: पाले लक्ष्मीस्तु मध्यमा ।
वाणिज्ये वसते लक्ष्मीः भिक्षयां नैव नैव च ॥

।— लोकोक्ति / सुभाषित
अर्थ: व्यापार में लक्ष्मी का साक्षात् निवास होता है, भिक्षा में कभी नहीं।

दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य ।
धनेन किं यन्न ददाति नाश्नुते

।— नीतिशतकम्
अर्थ: धन की तीन गतियां हैं- दान, भोग और नाश। जो न दान देता है न भोगता है, उसका धन नष्ट हो जाता है।

तावत् प्रीतिर्भवेल्लोके यावद्दानं प्रदीयते ।
यावत् वित्तोपार्जनसक्तः तावत् निजपरिवरो रक्तः

।— चर्पटपञ्जरिका (शंकराचार्य)
अर्थ: जब तक मनुष्य धन कमाता है, तब तक ही परिवार के लोग उससे स्नेह करते हैं।

यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः ।
धनं यस्य कुलं तस्य स एव वक्ता स च दर्शनीयः ॥

।— नीतिशतकम् 41
अर्थ: जिसके पास धन है, वही कुलीन, पंडित और गुणवान माना जाता है।

यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः ।
मित्राण्यमित्रतां यान्ति यस्य न स्युः कपर्दकाः

।— पञ्चतन्त्रम्
अर्थ: धनवान के ही सब मित्र और संबंधी होते हैं, निर्धन के मित्र भी शत्रु बन जाते हैं।

सुखस्य मूलं धर्मः। धर्मस्य मूलमर्थः
अर्थस्य मूलं राज्यं राज्यस्य मूलं इन्द्रियजयः ॥

।— चाणक्य सूत्र
अर्थ: सुख का आधार धर्म है और धर्म का आधार धन (अर्थ) है।

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते

।— भगवद्गीता 2.34
अर्थ: सम्मानित व्यक्ति के लिए अपयश मृत्यु से भी बढ़कर कष्टकारी है।

आशाया ये कृता दासास्ते दासाः सर्वदेहिनाम् ।
आशया ये कृता दासास्ते मुक्तार्थाः

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: जो आशा के गुलाम हैं, वे पूरी दुनिया के गुलाम हैं; जिन्होंने आशा को जीत लिया, दुनिया उनकी गुलाम है।

अरावप्युचितं कार्यमातिथ्यं गृहमागते ।
छेत्तुः पार्श्वगतां छायां नोपसंहरते द्रुमः

।— महाभारत / हितोपदेश
अर्थ: शत्रु का भी स्वागत करना चाहिए, जैसे पेड़ उसे काटने वाले को भी छाया देता है।

परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते ।
स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम्

।— नीतिशतकम् 32
अर्थ: जन्म तो सबका होता है, पर जन्म लेना उसी का सफल है जिससे कुल की उन्नति हो।

बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् ।
पश्य सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः ॥

।— पञ्चतन्त्रम्
अर्थ: जिसमें बुद्धि है वही बलवान है; बुद्धिहीन का बल व्यर्थ है।

विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् ।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्

।— हितोपदेश
अर्थ: विद्या विनय देती है, विनय से योग्यता आती है, और योग्यता से धन व सुख प्राप्त होता है।

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणं किं करिष्यति

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: जिसके पास अपनी बुद्धि नहीं, शास्त्र उसके लिए अंधे के सामने दर्पण जैसे हैं।

वरं प्राणत्यागो न च पुनरधमानां उपगमः ।
दैन्यान्मरणमुत्तमम्

।— नीतिशतकम्
अर्थ: नीच लोगों की शरण में जाने से अच्छा है कि प्राण त्याग दिए जाएँ।

एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना ।
आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी

।— चाणक्यनीति
अर्थ: एक ही विद्वान पुत्र से पूरा कुल वैसे ही प्रकाशित होता है जैसे चंद्रमा से रात।

न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि ।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: विद्या धन सभी धनों में श्रेष्ठ है, इसे न कोई बाँट सकता है न चुरा सकता है।

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् ।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः

।— मनुस्मृति 4.138
अर्थ: सत्य बोलो, प्रिय बोलो, पर अप्रिय सत्य मत बोलो और प्रिय असत्य भी मत बोलो।

दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्यया अलंकृतोऽपि सन् ।
मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकरः

।— चाणक्यनीति
अर्थ: दुष्ट व्यक्ति विद्वान होने पर भी त्यागने योग्य है, जैसे मणि वाला सांप भी डरावना होता है।

पापान्निवारयति योजयते हिताय गुह्यं निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति ।
सन्मित्रलक्षणमिदं निगदन्ति सन्तः

।— नीतिशतकम् 72
अर्थ: अच्छा मित्र बुराई से रोकता है और हित के कार्यों में लगाता है।

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः

।— हितोपदेश
अर्थ: कार्य परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं।

शशविषाणमपि आसाद्येत कदाचित् पर्यटता ।
न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत्

।— नीतिशतकम् 5
अर्थ: असंभव कार्य संभव हो सकते हैं, पर जिद्दी मूर्ख को समझाना असंभव है।

सर्पः क्रूरः खलः क्रूरः सर्पात् क्रूरतरः खलः ।
सर्पः शाम्यति मन्त्रैश्च खलः केन न शाम्यति

।— चाणक्यनीति
अर्थ: सांप और दुष्ट दोनों क्रूर हैं, पर दुष्ट सांप से भी अधिक क्रूर है।

खलः सर्षपमात्राणि परच्छिद्राणि पश्यति ।
आत्मनो बिल्वमात्राणि पश्यन्नपि न पश्यति

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: दुष्ट दूसरों के राई जैसे दोष देखता है, पर अपने बेल जैसे बड़े दोष नहीं देखता।

प्रारम्भते न खलु विघ्नभयेन नीचैः ।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः

।— नीतिशतकम् 27
अर्थ: नीच लोग बाधा के डर से काम शुरू नहीं करते, पर श्रेष्ठ लोग बाधा आने पर भी काम पूरा करते हैं।

केयूरा न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वला ।
वाण्येका समलंकरोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते

।— नीतिशतकम् 19
अर्थ: गहने मनुष्य की शोभा नहीं बढ़ाते, केवल सुसंस्कृत वाणी ही असली आभूषण है।

नमन्ति फलिनो वृक्षा नमन्ति गुणिनो जनाः ।
शुष्ककाष्ठश्च मूर्खश्च न नमन्ति कदाचन

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: फलदार पेड़ और गुणी लोग झुकते हैं, पर सूखा पेड़ और मूर्ख कभी नहीं झुकते।

यथा खरश्चन्दनभारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य ।
एवं हि शास्त्राणि बहून्यधीत्य

।— सुश्रुत संहिता
अर्थ: जैसे गधा चंदन ढोता है पर उसकी सुगंध नहीं जानता, वैसे ही बिना ज्ञान के शास्त्र पढ़ना बेकार है।

विदेशेषु धनं विद्या व्यसनेषु धनं मतिः ।
परलोके धनं धर्मः शीलं सर्वत्र वै धनम्

।— चाणक्यनीति
अर्थ: विदेश में विद्या धन है, संकट में बुद्धि, परलोक में धर्म और शील (चरित्र) हर जगह धन है।

अयमस्मिन् मुहूर्तेऽसौ न भविष्यति निश्चितम् ।
मृतो दरिद्रः पुरुषः

।— विदुरनीति
अर्थ: दरिद्र पुरुष जीवित होते हुए भी मरे हुए के समान है।

काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् ।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा

।— हितोपदेश
अर्थ: बुद्धिमानों का समय शास्त्रों की चर्चा में बीतता है और मूर्खों का व्यसन, नींद या झगड़े में।

चिन्तनीया हि विपदां आदावेव प्रतिक्रिया ।
न कूपखननं युक्तं प्रदीप्ते वह्निना गृहे

।— हितोपदेश
अर्थ: विपत्ति आने से पहले ही समाधान सोच लेना चाहिए, घर में आग लगने पर कुआँ खोदना व्यर्थ है।

सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः ।
अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः

।— रामायण (मारीच वचन)
अर्थ: मीठा बोलने वाले बहुत मिल जाते हैं, पर कड़वा और हितकारी बोलने और सुनने वाले दुर्लभ हैं।

विद्या विहीनाः पशवः ।
येषां न विद्या न तपो न दानं न ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ॥

।— नीतिशतकम्
अर्थ: जिसके पास विद्या, तप, दान, ज्ञान और धर्म नहीं है, वह पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में पशु है।

महाजनस्य संसर्गः कस्य नोन्नतिकारकः ।
पद्मपत्रस्थितं वारि धत्ते मुक्ताफलश्रियम्

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: महापुरुषों का साथ सबको उन्नति देता है, जैसे कमल के पत्ते पर पानी की बूंद मोती जैसी लगती है।

स्वभावेन हि तुष्यन्ति देवाः सत्पुरुषास्तथा ।
विवेकानुसारेण हि बुध्दयो मधु निस्यन्दंते

।— विदुरनीति
अर्थ: सज्जन लोग स्वभाव से ही संतुष्ट रहते हैं और बुद्धि विवेक के अनुसार फल देती है।

यतो धर्मस्ततो जयः ।
यतो बुद्धिः ततः शान्तिः

।— महाभारत
अर्थ: जहाँ धर्म है वहाँ विजय है और जहाँ बुद्धि है वहाँ शांति है।

गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति ते निर्गुणं प्राप्य भवन्ति दोषाः ।
आस्वाद्यतोयाः प्रवहन्ति नद्यः

।— नीतिशतकम्
अर्थ: गुणवानों के साथ गुण बढ़ते हैं, पर निर्गुणी के साथ दोष बन जाते हैं; जैसे नदी समुद्र में मिलकर खारी हो जाती है।

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका ।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः

।— हितोपदेश
अर्थ: छोटी चीजों की एकता भी बड़े कार्य कर सकती है, जैसे घास की रस्सियों से हाथी बांधा जा सकता है।

सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् ।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः

।— किरातार्जुनीयम् 2.30
अर्थ: बिना विचारे काम न करें, सोच-समझकर काम करने वाले के पास लक्ष्मी स्वयं आती है।

न कश्चित् कस्यचित् मित्रं न कश्चित् कस्यचित् रिपुः ।
व्यवहारेण मित्राणि जायन्ते रिपवस्तथा

।— चाणक्यनीति
अर्थ: न कोई किसी का मित्र है न शत्रु, व्यवहार से ही मित्र और शत्रु बनते हैं।

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ।
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्

।— पञ्चतन्त्रम् / हितोपदेश
अर्थ: यह मेरा है यह पराया है, ऐसी सोच छोटे मन वालों की होती है; उदार मन वालों के लिए पूरी पृथ्वी ही परिवार है।

सुखार्थी चेत् त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी चेत् त्यजेत्सुखम् ।
सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः सुखम् ॥

।— चाणक्यनीति / सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: सुख चाहने वाले को विद्या छोड़ देनी चाहिए और विद्यार्थी को सुख। सुखार्थी को विद्या और विद्यार्थी को सुख कहाँ?

यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत् ।
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति

।— याज्ञवल्क्य स्मृति / सुभाषित
अर्थ: जैसे एक पहिये से रथ नहीं चलता, वैसे ही पुरुषार्थ (मेहनत) के बिना भाग्य सिद्ध नहीं होता।

प्रदोषे दीपकश्चन्द्रः प्रभाते दीपको रविः ।
त्रैलोक्ये दीपको धर्मः सुपुत्रः कुलदीपकः

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: शाम का दीपक चन्द्रमा है, सुबह का सूरज; तीनों लोकों का दीपक धर्म है और सुपुत्र पूरे कुल का दीपक है।

गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत् ।
वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः

।— चाणक्यनीति
अर्थ: बीते समय का शोक नहीं करना चाहिए और भविष्य की चिंता नहीं; बुद्धिमान वर्तमान में ही जीते हैं।

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: वृक्ष, नदियाँ और गाय परोपकार के लिए हैं; यह शरीर भी परोपकार के लिए ही मिला है।

दुर्जनः स्वस्वभावेन परकार्यं विहन्ति च ।
मशकः सद्यः कुरुते भक्षणं विनिपातितः ॥

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: दुष्ट अपने स्वभाव से दूसरों के काम बिगाड़ता है, जैसे मच्छर खून पीकर ही शांत होता है।

वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि ।
लोकोत्तराणां चेतांसि को नु विज्ञातुमर्हति

।— उत्तररामचरितम् (भवभूति) 2.7
अर्थ: महापुरुषों का हृदय वज्र से भी कठोर और फूल से भी कोमल होता है; उसे कौन समझ सकता है?

क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च चिन्तयेत् ।
क्षणत्यागे कुतो विद्या कणत्यागे कुतो धनम्

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: एक-एक क्षण से विद्या और एक-एक कण से धन बचाना चाहिए; समय गंवाने पर विद्या और कण गंवाने पर धन नहीं मिलता।

वाणी रसवती यस्य यस्य श्रमवती क्रिया ।
लक्ष्मीः दानवती यस्य सफलं तस्य जीवितम्

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: जिसकी वाणी मीठी, कर्म परिश्रमी और धन दान में लगता हो, उसी का जीवन सफल है।

चिन्ताग्निर्वर्धते नित्यं चिन्ता हन्ति च जीवितम् ।
चिता दहति निर्जीवं चिन्ता दहति जीवितम्

।— सुभाषित / नीति
अर्थ: चिता मरे हुए को जलाती है, पर चिंता (चिन्ता) जीवित व्यक्ति को ही जला देती है।

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः न ते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम् ।
नासौ धर्मो यत्र न सत्यमस्ति

।— महाभारत (उद्योगपर्व)
अर्थ: वह सभा नहीं जहाँ वृद्ध न हों, वे वृद्ध नहीं जो धर्म न बोलें और वह धर्म नहीं जहाँ सत्य न हो।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः

।— मनुस्मृति 3.56
अर्थ: जहाँ स्त्रियों की पूजा (सम्मान) होती है वहाँ देवता निवास करते हैं, और जहाँ नहीं होती वहाँ सब कर्म निष्फल होते हैं।

विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय ।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतत्

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: दुष्ट की विद्या विवाद के लिए, धन अहंकार के लिए और शक्ति दूसरों को सताने के लिए होती है; सज्जन इसके विपरीत होते हैं।

न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये ।
भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम्

।— चाणक्यनीति
अर्थ: ईश्वर न लकड़ी में है, न पत्थर में, न मिट्टी में; ईश्वर तो केवल आपके भाव (श्रद्धा) में निवास करता है।

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः ।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्

।— मनुस्मृति 2.121
अर्थ: जो बड़ों का अभिवादन और सेवा करता है, उसकी आयु, विद्या, यश और बल- ये चारों बढ़ते हैं।

यथा हि मलिनं वासः कुत्रचिदुपविश्यते ।
तथा चलति संसारे मृतो दरिद्रः पुरुषः

।— विदुरनीति
अर्थ: दरिद्र पुरुष इस संसार में वैसे ही उपेक्षित होता है जैसे कोई गंदा कपड़ा।

अतिपरिचयादवज्ञा सन्ततगमनादनादरो भवति ।
मलये भिल्लपुरन्ध्री चन्दनतरुकाष्ठमिन्धनं कुरुते

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: अधिक परिचय से अनादर होता है, जैसे मलय पर्वत की भीलनी चन्दन की लकड़ी को ईधन की तरह जलाती है।

परं क्षिपति दोषेण न आत्मानं वीक्षते खलः ।
खलानां चरित्रे खला एव विज्ञाः

।— पञ्चतन्त्रम्
अर्थ: दुष्ट दूसरों पर दोष मढ़ता है पर खुद को नहीं देखता; दुष्ट के चरित्र को दुष्ट ही समझ सकता है।

वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये ।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ

।— रघुवंशम् (कालिदास) 1.1
अर्थ: शब्द और अर्थ की तरह मिले हुए, संसार के माता-पिता शिव-पार्वती की मैं वन्दना करता हूँ।

न निन्दति न वा शंसति अल्पमपि न संजयेत् ।
बुद्धेर्फलमनाग्रहः

।— सुभाषित / विदुरनीति
अर्थ: किसी की निंदा न करना और किसी बात का व्यर्थ हठ न करना ही बुद्धि का असली फल है।

सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता ।
उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये तथा

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: महापुरुष सुख और दुःख में एक समान रहते हैं, जैसे सूर्य उगते और डूबते समय दोनों बार लाल ही होता है।

हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम् ।
श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं भूषणैः किं प्रयोजनम्

।— नीतिशतकम्
अर्थ: हाथ का आभूषण दान है, गले का सत्य और कान का शास्त्र; फिर बाहरी गहनों की क्या जरूरत?

लोभमूलानि पापानि रसज्ञानेन वर्धते ।
जीविताशा धनाशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यति

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: शरीर बूढ़ा हो जाता है, पर जीवित रहने की और धन की आशा कभी बूढ़ी (समाप्त) नहीं होती।

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणं किं करिष्यति

।— चाणक्यनीति
अर्थ: जिसके पास अपनी बुद्धि नहीं, शास्त्र उसके लिए वैसे ही बेकार हैं जैसे अंधे के लिए दर्पण।

अन्यायोपार्जितं वित्तं दश वर्षाणि तिष्ठति ।
प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं तद्विनश्यति

।— चाणक्यनीति
अर्थ: अन्याय से कमाया धन दस साल तक रहता है, पर ग्यारहवें साल वह मूल (पूंजी) के साथ नष्ट हो जाता है।

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम् ॥

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: वृक्ष, नदियाँ और गायें परोपकार के लिए ही कार्य करते हैं।

पण्डिते च गुणाः सर्वे मूर्खे दोषाः हि केवलम् ।
तस्मात् मूर्खसहस्रेषु प्राज्ञ एको विशिष्यते

।— चाणक्यनीति
अर्थ: विद्वान में सब गुण और मूर्ख में केवल दोष होते हैं, इसलिए हजार मूर्खों से एक विद्वान श्रेष्ठ है।

न विना परवादेन रमते दुर्जनोजनः ।
काकः सर्वरसान् भुक्ते विना मेध्यं न तृप्यति

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: दुष्ट बिना दूसरों की निंदा किए खुश नहीं रहता, जैसे कौआ सब कुछ खाकर भी गंदगी के बिना तृप्त नहीं होता।

यः पठति लिखति पश्यति पृच्छति पण्डितोपाश्रयति च ।
तस्य दिवाकरकिरणैर्नलिनीव विकास्यते बुद्धिः

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: जो पढ़ता, लिखता, देखता, पूछता और विद्वानों की सेवा करता है, उसकी बुद्धि सूर्य की किरणों से कमल की तरह खिल उठती है।

धनं धान्यं च सर्वं हि भ्रातॄणां विभज्यते ।
विद्याधनं तु तत्सर्वं भ्रातृभिश्च न गृह्यते

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: धन-धान्य भाइयों में बँट सकता है, पर विद्या रूपी धन को भाई कभी नहीं छीन सकते।

सर्पः पिबति पवनं न च दुर्बलोऽसौ ।
शुष्कैस्तृणैर्वनगजा बलिनो भवन्ति

।— नीतिशतकम्
अर्थ: सांप हवा पीकर भी कमजोर नहीं होता और हाथी सूखी घास खाकर भी बलवान रहता है; बल आहार में नहीं, संकल्प में है।

न कश्चित् कस्यचित् मित्रं न कश्चित् कस्यचित् रिपुः ।
व्यवहारेण मित्राणि जायन्ते रिपवस्तथा

।— चाणक्यनीति
अर्थ: न कोई मित्र है न शत्रु, हमारे व्यवहार से ही लोग मित्र और शत्रु बनते हैं।

शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात्परं सुखम् ।
न च लोभात्परो व्याधिः न च धर्मो दयापरः

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: शांति जैसा तप नहीं, संतोष जैसा सुख नहीं, लोभ जैसी बीमारी नहीं और दया जैसा धर्म नहीं।

पाप प्रच्छन्नं भवति पुण्यं च प्रकटीकृतम् ।
खलः करोति दुर्वृत्तं नूनं फ़लति साधुषु

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: दुष्ट के किए हुए बुरे कार्यों का दुष्परिणाम कभी-कभी सज्जनों को भी भुगतना पड़ जाता है।

विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय ।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय

।— सुभाषित / नीति
अर्थ: दुष्ट की विद्या विवाद के लिए, धन मद के लिए और शक्ति सताने के लिए; सज्जन की विद्या ज्ञान के लिए, धन दान के लिए और शक्ति रक्षा के लिए होती है।

किं कुलेन विशालेन विद्याहीनस्य देहिनः ।
विद्यावान् पूज्यते लोके नाविद्यावान् पूज्यते

।— चाणक्यनीति
अर्थ: बड़े कुल में जन्म लेने से क्या लाभ अगर व्यक्ति विद्याहीन हो; संसार में केवल विद्वान ही पूजे जाते हैं।

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका ।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः

।— हितोपदेश
अर्थ: छोटी-छोटी वस्तुओं की एकता बड़े कार्य सिद्ध कर देती है, जैसे तिनकों से बनी रस्सी से हाथी बँध जाता है।

वृत्तं यत्नेन संरक्षेत वित्तमायाति याति च ।
अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः

।— मनुस्मृति / विदुरनीति
अर्थ: चरित्र की रक्षा यत्नपूर्वक करनी चाहिए, धन तो आता-जाता रहता है। धन जाने पर कुछ नहीं बिगड़ता, पर चरित्र जाने पर सब कुछ नष्ट हो जाता है।

जननी जन्मभूमिश्च जाह्नवी च जनार्दनः ।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

।— रामायण
अर्थ: माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर महान (भारी) हैं।

विद्वान प्रलपन्नपि न मुह्यति ।
आपत्सम्पदिवाभाति विद्वज्जनसमागमे

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: विद्वान पुरुषों के साथ रहने पर संकट भी संपत्ति (सुख) जैसा प्रतीत होने लगता है।

एको हि दोषो गुणसन्निपाते निमज्जतीन्दोः किरणेष्विवाङ्कः ।
यतो बुद्धिः ततः जयः

।— कुमारसंभवम् (कालिदास)
अर्थ: बहुत सारे गुणों के बीच एक छोटा दोष वैसे ही छिप जाता है जैसे चंद्रमा की किरणों में उसका दाग।

परं क्षिपति दोषेण न आत्मानं वीक्षते खलः ।
आत्मनो बिल्वमात्राणि पश्यन्नपि न पश्यति

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: दुष्ट व्यक्ति दूसरों के छोटे दोष तो देखता है, पर अपने बड़े दोषों को भी अनदेखा कर देता है।

चलत्येकेन पादेन तिष्ठत्यन्येन बुद्धिमान ।
न विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः

।— चाणक्यनीति / किरातार्जुनीयम्
अर्थ: बुद्धिमान व्यक्ति एक पैर से चलता है और दूसरे से खड़ा रहता है, अर्थात पूरी तरह सोच-विचार कर ही अगला कदम बढ़ाता है।

लोभः पापस्य कारणं क्रोधो दुःखस्य कारकः ।
अहो दुःखमहो दुःखमहो दुःखं दरिद्रता

।— सुभाषित / विदुरनीति
अर्थ: लोभ पाप की जड़ है, क्रोध दुःख का कारण है; और दरिद्रता संसार का सबसे बड़ा दुःख है।

उत्पद्यन्ते विलीयन्ते दरिद्राणां मनोरथाः ।
दरिद्रयमेकं गुणराशिनाशि

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: दरिद्र मनुष्यों की इच्छाएँ मन में ही पैदा होकर खत्म हो जाती हैं; दरिद्रता मनुष्य के सभी गुणों का नाश कर देती है।

धनहीनः स्वपत्न्यापि त्यज्यते किं पुनः परेः ।
सर्वं शून्यं दरिद्रता

।— चाणक्यनीति
अर्थ: धनहीन व्यक्ति को उसकी पत्नी भी छोड़ देती है, फिर दूसरों की क्या बात? दरिद्र के लिए सब कुछ सूना (शून्य) है।

आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् ।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥

।— हितोपदेश
अर्थ: खाना, सोना, डरना और वंश बढ़ाना पशुओं और मनुष्यों में समान है; केवल 'धर्म' ही मनुष्य को पशु से श्रेष्ठ बनाता है।

न कश्चित् जायते मूर्खः न कश्चित् जायते सुधीः ।
अभ्यासेन हि जायन्ते मूर्खाः पण्डितबुद्धयः ॥

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: न कोई जन्म से मूर्ख होता है न विद्वान; केवल निरंतर अभ्यास से ही मूर्ख भी विद्वान बन जाते हैं।

प्रारम्भते न खलु विघ्नभयेन नीचैः ।
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः

।— नीतिशतकम् 27
अर्थ: नीच लोग विघ्न के डर से काम शुरू नहीं करते, मध्यम लोग काम शुरू तो करते हैं पर विघ्न आने पर छोड़ देते हैं; केवल श्रेष्ठ लोग अंत तक नहीं रुकते।

वयमिह परितुष्टा वल्कलैस्त्वं दुकूलैः सम इव परितोषो निर्विशेषो विशेषः ।
स तु भवति दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला

।— नीतिशतकम् 52
अर्थ: हम पेड़ों की छाल पहनकर खुश हैं, तुम रेशमी कपड़े पहनकर; संतोष दोनों का बराबर है। वास्तव में दरिद्र वही है जिसकी लालसा (तृष्णा) बहुत बड़ी है।

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः

।— हितोपदेश (प्रस्ताविका, ७) / पञ्चतन्त्रम्
अर्थ: कार्य परिश्रम से ही सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं। सोए हुए शेर के मुँह में हिरण खुद प्रवेश नहीं करता।

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् ।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः

।— मनुस्मृति (४.१३८)
अर्थ: सत्य और प्रिय बोलना चाहिए, पर अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिए। साथ ही, प्रिय लगने वाला असत्य भी नहीं बोलना चाहिए।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि

।— श्रीमद्भगवद्गीता (२.४७)
अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में कभी नहीं। कर्मफल की इच्छा वाले मत बनो और अकर्मण्यता में भी आसक्ति न रखो।

जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति ।
सत्सङ्गतिः कथय किं न करोति पुंसाम्

।— नीतिशतकम् (भर्तृहरि, २३)
अर्थ: सत्संगति बुद्धि की जड़ता हरती है, वाणी में सत्य भरती है और पाप दूर करती है। कहो, सत्संगति मनुष्य का क्या भला नहीं करती?

श्रद्धवाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति

।— श्रीमद्भगवद्गीता (४.३९)
अर्थ: श्रद्धा रखने वाला और इंद्रियों को वश में करने वाला ही ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान पाकर वह शीघ्र ही परम शांति प्राप्त करता है।

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति

।— श्रीमद्भगवद्गीता (२.६३)
अर्थ: क्रोध से मोह, मोह से स्मृति भ्रम और स्मृति भ्रम से बुद्धि का नाश होता है। बुद्धि का नाश होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है।

विद्यां ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् ।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्

।— हितोपदेश (प्रस्ताविका, ६)
अर्थ: विद्या विनय देती है, विनय से योग्यता आती है, योग्यता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख प्राप्त होता है।

अतिदानेन बलिर्बद्धो ह्यतिमाने च कौरवाः ।
अतिलोभाद्विनाशो हि ह्यति सर्वत्र वर्जयेत्

।— चाणक्यनीति
अर्थ: अधिक दान से बलि बंधा, अधिक अभिमान से कौरव नष्ट हुए। अति लोभ विनाशकारी है; अतः 'अति' का हर जगह त्याग करना चाहिए।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्

।— श्रीमद्भगवद्गीता (४.७)
अर्थ: जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं (ईश्वर) स्वयं को प्रकट करता हूँ।

यन्मुखं पादपैः सिक्तं यद्वाचः करुणार्द्रिताः ।
अहिंसा परमो धर्मः तथा धर्मस्तथा दमः ॥

।— महाभारत (अनुशासन पर्व, ११५.१)
अर्थ: अहिंसा ही परम धर्म है, अहिंसा ही परम तप है और अहिंसा ही परम सत्य है।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे

।— श्रीमद्भगवद्गीता (४.८)
अर्थ: सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में जन्म लेता हूँ।

दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्यया अलङ्कृतोऽपि सन् ।
मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयङ्करः

।— चाणक्यनीति (४.६) / नीतिशतकम्
अर्थ: दुष्ट व्यक्ति यदि विद्या से सुशोभित भी हो, तो भी वह त्यागने योग्य है। क्या मणि से युक्त सांप भयानक नहीं होता?

धैर्यं यस्य पिता क्षमा च जननी शान्तिश्चिरं गेहिनी ।
सत्यं सूनुरियं दया च भगिनी भ्राता मनःसंयमः

।— नीतिशतकम् / सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: जिसका धैर्य पिता, क्षमा माता, शांति पत्नी, सत्य पुत्र, दया बहन और मन का संयम भाई है, उसे किसी और की आवश्यकता नहीं।

अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्या अल्पश्च कालो बहवश्च विघ्नाः ।
यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्

।— पञ्चतन्त्रम् (कथामुखम्)
अर्थ: शास्त्र अनंत हैं, विद्याएँ बहुत हैं, पर समय कम और विघ्न अनेक हैं। अतः जैसे हंस जल से दूध चुन लेता है, वैसे ही सार ग्रहण करना चाहिए।

शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात्परं सुखम् ।
न च लोभात्परो व्याधिः न च धर्मो दयापरः

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार / चाणक्यनीति
अर्थ: शांति जैसा तप नहीं, संतोष जैसा सुख नहीं, लोभ जैसी कोई बीमारी नहीं और दया जैसा कोई धर्म नहीं।

मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत् ।
आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः

।— चाणक्यनीति / सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: जो दूसरों की स्त्रियों को माता के समान, दूसरों के धन को मिट्टी के ढेले के समान और सभी प्राणियों को अपने समान देखता है, वही सच्चा विद्वान (पंडित) है।

गुणाः कुर्वन्ति दूतत्वं दूरेऽपि वसतां सताम् ।
केतकीगन्धमाघ्राय स्वयमायान्ति षट्पदाः

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: सज्जन दूर रहने पर भी अपने गुणों से सबको प्रभावित करते हैं, जैसे केवड़े की गंध सूंघकर भँवरे अपने आप खिंचे चले आते हैं।

तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नासौ ऋषिर्यस्य मतं न भिन्नम् ।
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः

।— महाभारत (वन पर्व, ३१३.११७)
अर्थ: तर्क अस्थिर है, वेद भिन्न हैं, ऋषियों के मत अलग हैं; धर्म का तत्व बहुत गहरा है। अतः जिस मार्ग पर श्रेष्ठ पुरुष चले हों, वही सही मार्ग है।

अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते ।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

।— रामायण (राम वचन) / सुभाषित
अर्थ: हे लक्ष्मण! सोने की लंका भी मुझे अच्छी नहीं लगती; माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर (महान) हैं।

क्षमा शस्त्रं करे यस्य दुर्जनः किं करिष्यति ।
अतणे पतितो वह्निः स्वयमेवोपशाम्यति

।— चाणक्यनीति
अर्थ: जिसके हाथ में क्षमा रूपी शस्त्र है, दुष्ट उसका क्या बिगाड़ पाएगा? जैसे तृणरहित (घासहीन) भूमि पर गिरी आग अपने आप बुझ जाती है।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः

।— मनुस्मृति (३.५६)
अर्थ: जहाँ नारियों की पूजा (सम्मान) होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। जहाँ उनका सम्मान नहीं होता, वहाँ सारे पुण्य कर्म निष्फल हो जाते हैं।

न कश्चित्कस्यचिन्मित्रं न कश्चित्कस्यचिद्रिपुः ।
व्यवहारेण जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा

।— चाणक्यनीति / सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: न कोई किसी का मित्र है और न शत्रु। केवल हमारे व्यवहार से ही लोग मित्र और शत्रु बनते हैं।

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्

।— महोपनिषद् (४.७१) / हितोपदेश
अर्थ: "यह मेरा है, यह पराया है"—ऐसी सोच संकुचित मन वालों की होती है। उदार हृदय वालों के लिए पूरी पृथ्वी ही एक परिवार है।

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: वृक्ष परोपकार के लिए फलते हैं, नदियाँ परोपकार के लिए बहती हैं, गायें परोपकार के लिए दूध देती हैं; यह शरीर भी परोपकार के लिए ही है।

लोभः पापस्य कारणं लोभः क्रोधस्य कारकः ।
लोभान्मोहश्च नाशश्च लोभः पापस्य कारणम्

।— हितोपदेश (२.५६)
अर्थ: लोभ पाप का मूल कारण है, लोभ से ही क्रोध उत्पन्न होता है, लोभ से मोह और अंततः विनाश होता है।

विद्या विहीनाः पशवः ।
विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय

।— नीतिशतकम् / सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: दुष्ट की विद्या विवाद, धन घमंड और शक्ति दूसरों को सताने के लिए होती है।

विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं ।
विद्या राजसु पूज्यते न तु धनं विद्याविहीनः पशुः

।— नीतिशतकम् (भर्तृहरि, २०)
अर्थ: विद्या मनुष्य का असली रूप और गुप्त धन है। राजाओं में विद्या पूजी जाती है धन नहीं; विद्याहीन मनुष्य पशु समान है।

वनेऽपि दोषाः प्रभवन्ति रागिणां गृहेऽपि पञ्चेन्द्रियनिग्रहस्तपः ।
यतो बुद्धिः ततः शान्तिः

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: रागी मनुष्य वन में भी दुखी रहता है और इंद्रियों को जीतने वाला घर में भी तपस्वी है; बुद्धि से ही शांति संभव है।

यः पठति लिखति पश्यति पृच्छति पण्डितोपाश्रयति च ।
तस्य दिवाकरकिरणैर्नलिनीव विकास्यते बुद्धिः

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: जो पढ़ता, लिखता, देखता, पूछता और विद्वानों की संगति करता है, उसकी बुद्धि सूर्य की किरणों से कमल की तरह खिल जाती है।

विद्यां च अविद्यां च यस्तद्वेद उभयं सह ।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते

।— ईशोपनिषद् (११)
अर्थ: जो भौतिक ज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान दोनों को जानता है, वह कर्म से मृत्यु को पार कर ज्ञान से अमरता प्राप्त करता है।

विद्वत्त्वं च नृपत्त्वं च नैव तुल्यं कदाचन ।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते

।— चाणक्यनीति / सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: विद्वता और राजपद की तुलना कभी नहीं हो सकती; राजा केवल अपने देश में पूजनीय है, विद्वान सर्वत्र पूजा जाता है।

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते

।— श्रीमद्भगवद्गीता (२.४८)
अर्थ: हे अर्जुन! सफलता और असफलता में समान भाव रखकर योग में स्थित होकर कर्म करो; यह 'समत्व' ही योग कहलाता है।

दूरेऽपि वसतां गुणाः कुर्वन्ति दूतत्वं ।
वाणिज्ये वसते लक्ष्मीः भिक्षयां नैव नैव च ॥

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: लक्ष्मी व्यापार (वाणिज्य) में बसती है, भिक्षा मांगने से कभी लक्ष्मी प्राप्त नहीं होती।

न कश्चिज्जायते मूर्खः न कश्चिज्जायते सुधीः ।
अभ्यासेन हि जायन्ते मूर्खाः पण्डितबुद्धयः

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: जन्म से न कोई मूर्ख होता है न विद्वान; निरंतर अभ्यास से ही मूर्ख भी विद्वान बन जाते हैं।

व्यवसायेन सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
बुद्धिः ज्ञानेन शुध्यति धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥

।— हितोपदेश / मनुस्मृति
अर्थ: कार्य प्रयत्न से सिद्ध होते हैं, और बुद्धि ज्ञान के अर्जन से ही शुद्ध होती है।

बुद्धिः प्रभावः प्रज्ञा च उत्साहो यस्य वर्तते ।
यस्य बुद्धिरबलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् ॥

।— पञ्चतन्त्रम् (१.२०४)
अर्थ: जिसके पास बुद्धि है, उसी के पास वास्तविक बल है; बुद्धिहीन के पास बल कहाँ?

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका ।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः

।— हितोपदेश (१.३२)
अर्थ: छोटी-छोटी वस्तुओं का संघ (एकता) भी बड़े कार्य सिद्ध कर देता है, जैसे घास के तिनकों से बनी रस्सी हाथी को बाँध देती है।

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्ति यममन्दिरम् ।
शेषाः स्थिरत्वमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्

।— महाभारत (वन पर्व, ३१३.११६)
अर्थ: प्रतिदिन प्राणी यमलोक जाते हैं, फिर भी जो जीवित हैं वे अमर रहना चाहते हैं। इससे बड़ा आश्चर्य और क्या होगा?

परं क्षिपति दोषेण न आत्मानं वीक्षते खलः ।
खलः सर्षपमात्राणि परच्छिद्राणि पश्यति

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: दुष्ट दूसरों के राई के समान छोटे दोष भी देख लेता है, पर अपने बेल के समान बड़े दोष भी नहीं देखता।

गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत् ।
वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः

।— चाणक्यनीति (१३.२)
अर्थ: बीते समय का शोक नहीं करना चाहिए और भविष्य की चिंता नहीं; बुद्धिमान वर्तमान में ही जीते हैं।

शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात्परं सुखम् ।
न च लोभात्परो व्याधिः न च धर्मो दयापरः

।— चाणक्यनीति / नीतिशतकम्
अर्थ: शांति जैसा तप नहीं, संतोष जैसा सुख नहीं, लोभ जैसी बीमारी नहीं और दया जैसा धर्म नहीं।

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणं किं करिष्यति

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार / चाणक्यनीति
अर्थ: जिसके पास अपनी बुद्धि नहीं, शास्त्र उसका क्या भला करेंगे? जैसे आँखों से हीन के लिए दर्पण बेकार है।

एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना ।
आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी

।— चाणक्यनीति (३.१६)
अर्थ: एक ही गुणवान और विद्वान पुत्र से पूरा कुल वैसे ही आनंदित होता है जैसे चंद्रमा से रात।

मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम् ।
मनस्यन्यद्वचस्यन्यत्कर्मण्यन्यद्दुरात्मनाम्

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: महापुरुषों के मन, वाणी और कर्म एक समान होते हैं; जबकि दुष्टों के मन में कुछ, वाणी में कुछ और कर्म में कुछ और होता है।

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: वृक्ष, नदियाँ और गायें परोपकार के लिए हैं; यह मानव शरीर भी परोपकार के लिए ही मिला है।

पुस्तकेषु च या विद्या परहस्तेषु यद्धनम् ।
उत्पन्नेषु च कार्येषु न सा विद्या न तद्धनम्

।— चाणक्यनीति / सुभाषित
अर्थ: पुस्तकों में रखी विद्या और दूसरों के हाथ में गया धन, समय आने पर (जरूरत पड़ने पर) काम नहीं आता।

धनं धान्यं च सर्वं हि भ्रातॄणां विभज्यते ।
विद्याधनं तु तत्सर्वं भ्रातृभिश्च न गृह्यते

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: धन-धान्य भाइयों में बँट सकता है, पर विद्या रूपी धन को भाई कभी नहीं छीन सकते।

किं करिष्यति वक्तव्यं विवदन्ति नराः सदा ।
आपदापदमनुधावति काले दुर्बुद्धिदायकम् ॥

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: आपत्ति के पीछे दूसरी आपत्ति आती है; विपत्ति के समय व्यर्थ विवाद करने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः ।
षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र देवः सहायकः

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार / चाणक्यनीति
अर्थ: परिश्रम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम—ये छह गुण जहाँ होते हैं, वहाँ ईश्वर भी सहायक होता है।

अनालस्यं अपैकुन्यं शौचं संतोषं आर्जवं ।
विना दैन्यं विना शोकं विना पापेन जीवितम्

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: आलस्य रहित, पवित्र, संतोषी और सरल जीवन ही बिना दीनता और शोक का श्रेष्ठ जीवन है।

सर्वस्य हि परीक्ष्यन्ते स्वभावा नेतरे गुणाः ।
अतीत्य हि गुणान् सर्वान् स्वभावो मूर्ध्नि वर्तते

।— हितोपदेश (२.२६)
अर्थ: सबके स्वभाव की ही परीक्षा होती है, गुणों की नहीं। क्योंकि स्वभाव सभी गुणों से ऊपर होता है।

कोऽतिभारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम् ।
को विदेशः सविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम्

।— चाणक्य नीति (४.१३)
अर्थ: सामर्थ्यवान के लिए भार क्या? व्यापारियों के लिए दूर क्या? विद्वानों के लिए विदेश क्या और प्रिय बोलने वालों के लिए पराया कौन?

संसारविषवृक्षस्य द्वे एव रसवत्फले ।
काव्यामृतरसास्वादः सङ्गमः सुजनैः सह

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार / चाणक्य नीति
अर्थ: इस संसार रूपी विषवृक्ष के केवल दो ही मीठे फल हैं- काव्य रूपी अमृत का स्वाद और सज्जनों की संगति।

गच्छन् पिपीलिको याति योजनानां शतान्यपि ।
अगच्छन् वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति

।— सुभाषित / नीति
अर्थ: चलती हुई चींटी सैकड़ों कोस चली जाती है, पर न चलता हुआ गरुड़ एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाता।

परोपदेशवेलायां शिष्टाः सर्वे भवन्ति वै ।
विस्मरन्तीह शिष्टत्वं स्वकार्ये समुपस्थिते

।— पञ्चतन्त्रम् (१.३७४)
अर्थ: दूसरों को उपदेश देते समय सभी विद्वान बन जाते हैं, पर अपना काम पड़ने पर वे स्वयं उस विद्वता को भूल जाते हैं।

योजनं दूरमपि याति संसर्गजा दोषगुणा भवन्ति ।
वरं मौनं न च सत्यं ब्रूयात्

।— हितोपदेश (१.७१)
अर्थ: संगति से ही दोष और गुण आते हैं; इसलिए बुरी संगति से मौन रहना कहीं बेहतर है।

कालः पचति भूतानि कालः संहरते प्रजाः ।
कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः

।— महाभारत / चाणक्य नीति
अर्थ: समय ही सबको परिपक्व करता है और नष्ट भी। जब सब सोते हैं, तब भी समय जागता रहता है; समय को जीतना असंभव है।

स्वल्पमप्यपकाराय काले छिद्रमवेक्षते ।
छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति

।— पञ्चतन्त्रम् / सुभाषित
अर्थ: बुरा समय आने पर छोटी सी कमी भी बड़ा नुकसान पहुँचाती है; कमियों (छिद्रों) में अनर्थ बढ़ जाते हैं।

यथा खरश्चन्दनभारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य ।
तथैव शास्त्रं बह्वपि अधीतं

।— सुश्रुत संहिता / सुभाषित
अर्थ: जैसे गधा चन्दन का भार तो ढोता है पर उसकी सुगंध नहीं जानता, वैसे ही बिना ज्ञान के शास्त्र पढ़ना केवल बोझ ढोना है।

उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम् ।
सोत्साहस्य च लोकेषु न किञ्चिदपि दुर्लभम्

।— रामायण (किष्किन्धा काण्ड, १.१२१)
अर्थ: उत्साह ही सबसे बड़ा बल है। उत्साहित व्यक्ति के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

किं कुलेन विशालेन विद्याहीनस्य देहिनः ।
कुलं हि विद्या न तु केवलं जन्म

।— चाणक्य नीति (८.१८)
अर्थ: यदि मनुष्य विद्याहीन है तो ऊँचे कुल में जन्म लेने से क्या लाभ? असली कुल तो विद्या से ही होता है।

विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः ।
महात्मानां संसर्गः श्रेष्ठः

।— नीतिशतकम् (६३)
अर्थ: विपत्ति में धैर्य, उन्नति में क्षमा, सभा में चतुराई और युद्ध में वीरता ही महापुरुषों के लक्षण हैं।

लुब्धमर्थेन गृह्णीयात् स्तब्धमञ्जलिकर्मणा ।
मूर्खं छन्दोऽनुवृत्तेन तत्त्वार्थेन च पण्डितम्

।— चाणक्य नीति (६.१२)
अर्थ: लालची को धन से, अहंकारी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को उसकी बात मानकर और विद्वान को सत्य से वश में करना चाहिए।

तावत् भयात् भेतव्यं यावत् भयम् अनागतम् ।
आगतं तु भयं वीक्ष्य प्रहर्तव्यम् अशङ्कया

।— पञ्चतन्त्रम् (१.३५१) / हितोपदेश
अर्थ: भय से तभी तक डरना चाहिए जब तक वह आया न हो; भय सामने आ जाए तो निडर होकर उस पर प्रहार करना चाहिए।

किं तया क्रियते धेन्वा या न सूते न दुग्धदा ।
कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान न धार्मिकः

।— चाणक्य नीति (२.३)
अर्थ: उस गाय से क्या लाभ जो न बच्चा दे न दूध? वैसे ही उस पुत्र से क्या लाभ जो न विद्वान हो न धार्मिक।

विद्वान प्रलपन्नपि न मुह्यति ।
आपत्सम्पदिवाभाति विद्वज्जनसमागमे

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: विद्वानों के साथ रहने पर विपत्ति भी संपत्ति (सुख) जैसी लगने लगती है।

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका ।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः

।— हितोपदेश (१.३२)
अर्थ: छोटी-छोटी चीजों की एकता कार्य सिद्ध करती है, जैसे तिनकों से बनी रस्सी से हाथी बँध जाता है।

यः पठति लिखति पश्यति पृच्छति पण्डितोपाश्रयति च ।
तस्य दिवाकरकिरणैर्नलिनीव विकास्यते बुद्धिः

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: जो पढ़ता, लिखता, देखता और पूछता है, उसकी बुद्धि सूर्य की किरणों से कमल की तरह खिल जाती है।

दूरेऽपि वसतां गुणाः कुर्वन्ति दूतत्वं ।
केतकीगन्धमाघ्राय स्वयमायान्ति षट्पदाः

।— सुभाषित / चाणक्य नीति
अर्थ: गुण दूर रहने पर भी सबको खींच लेते हैं, जैसे केवड़े की खुशबू से भँवरे अपने आप खिंचे चले आते हैं।

अनालस्यं अपैकुन्यं शौचं संतोषं आर्जवं ।
विना दैन्यं विना शोकं विना पापेन जीवितम्

।— विदुर नीति
अर्थ: आलस्य रहित, पवित्र और संतोषी जीवन ही शोक और पाप से मुक्त जीवन है।

वयमिह परितुष्टा वल्कलैस्त्वं दुकूलैः ।
स तु भवति दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला

।— नीतिशतकम् (५२)
अर्थ: हम छाल पहनकर खुश हैं, तुम रेशम पहनकर; संतोष बराबर है। दरिद्र तो वही है जिसकी इच्छाएँ बहुत बड़ी हैं।

परं क्षिपति दोषेण न आत्मानं वीक्षते खलः ।
खलः सर्षपमात्राणि परच्छिद्राणि पश्यति

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: दुष्ट दूसरों के राई के समान छोटे दोष देखता है, पर अपने बेल जैसे बड़े दोष नहीं देखता।

धैर्यं यस्य पिता क्षमा च जननी शान्तिश्चिरं गेहिनी ।
सत्यं सूनुरियं दया च भगिनी

।— चाणक्य नीति (१२.११)
अर्थ: धैर्य जिसका पिता, क्षमा माता और सत्य पुत्र है, उसे संसार में किसी अन्य की आवश्यकता नहीं।

अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्या अल्पश्च कालो बहवश्च विघ्नाः ।
यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्

।— पञ्चतन्त्रम् (कथामुखम्)
अर्थ: शास्त्र अनंत हैं पर समय कम। इसलिए जैसे हंस जल से दूध चुन लेता है, वैसे ही ज्ञान का सार ग्रहण करें।

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणं किं करिष्यति

।— चाणक्य नीति (१०.९)
अर्थ: जिसके पास अपनी बुद्धि नहीं, शास्त्र उसके लिए अंधे के सामने दर्पण के समान बेकार हैं।

सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः ।
अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः

।— रामायण (आरण्य काण्ड, ३७.२)
अर्थ: मीठा बोलने वाले बहुत हैं, पर कड़वा और हितकारी बोलने व सुनने वाले दुर्लभ हैं।

विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय ।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: दुष्ट की विद्या विवाद, धन घमंड और शक्ति सताने के लिए होती है; सज्जन की इसके विपरीत।

अन्यायोपार्जितं वित्तं दश वर्षाणि तिष्ठति ।
प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं तद्विनश्यति

।— चाणक्य नीति (१५.६)
अर्थ: अन्याय से कमाया धन दस साल तक रहता है, ग्यारहवें साल वह ब्याज समेत नष्ट हो जाता है।

नमन्ति फलिनो वृक्षा नमन्ति गुणिनो जनाः ।
शुष्ककाष्ठश्च मूर्खश्च न नमन्ति कदाचन

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: फलदार पेड़ और गुणी लोग झुकते हैं, पर सूखा पेड़ और मूर्ख कभी नहीं झुकते।

चलत्येकेन पादेन तिष्ठत्यन्येन बुद्धिमान ।
न विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः

।— चाणक्य नीति / सुभाषित
अर्थ: बुद्धिमान व्यक्ति एक पैर से चलता है और दूसरे से खड़ा रहता है (पूरी तरह सोचकर कदम बढ़ाता है)।

विद्वत्त्वं च नृपत्त्वं च नैव तुल्यं कदाचन ।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते

।— चाणक्य नीति / सुभाषित
अर्थ: राजा और विद्वान की तुलना नहीं हो सकती। राजा अपने देश में, जबकि विद्वान हर जगह पूजा जाता है।

शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात्परं सुखम् ।
न च लोभात्परो व्याधिः न च धर्मो दयापरः

।— चाणक्य नीति (८.१३)
अर्थ: शांति जैसा तप नहीं, संतोष जैसा सुख नहीं, लोभ जैसी बीमारी नहीं और दया जैसा धर्म नहीं।

विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं ।
विद्या राजसु पूज्यते न तु धनं विद्याविहीनः पशुः

।— नीतिशतकम् (२०)
अर्थ: विद्या मनुष्य का असली रूप और गुप्त धन है। विद्या के बिना मनुष्य पशु समान है।

पुस्तकेषु च या विद्या परहस्तेषु यद्धनम् ।
उत्पन्नेषु च कार्येषु न सा विद्या न तद्धनम्

।— चाणक्य नीति (१६.२०)
अर्थ: पुस्तक में रखी विद्या और पराया धन जरूरत पड़ने पर कभी काम नहीं आते।

षड्दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता

।— विदुर नीति (३३.६८)
अर्थ: तरक्की चाहने वाले को नींद, ऊँघ, डर, गुस्सा, आलस्य और काम टालने की आदत छोड़ देनी चाहिए।

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: वृक्ष, नदियाँ और गायें परोपकार के लिए हैं; यह शरीर भी परोपकार के लिए ही है।

मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम् ।
मनस्यन्यद्वचस्यन्यत्कर्मण्यन्यद्दुरात्मनाम्

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: महापुरुषों के मन, वाणी और कर्म एक समान होते हैं, जबकि दुष्टों के तीनों अलग-अलग।

न विना परवादेन रमते दुर्जनोजनः ।
काकः सर्वरसान् भुक्ते विना मेध्यं न तृप्यति

।— सुभाषित / नीति
अर्थ: दुष्ट दूसरों की बुराई के बिना खुश नहीं रहता, जैसे कौआ गंदगी के बिना तृप्त नहीं होता।

पण्डिते च गुणाः सर्वे मूर्खे दोषाः हि केवलम् ।
तस्मात् मूर्खसहस्रेषु प्राज्ञ एको विशिष्यते

।— चाणक्य नीति / सुभाषित
अर्थ: हजार मूर्खों से एक विद्वान कहीं बेहतर है क्योंकि विद्वान गुणों की खान होता है।

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणं किं करिष्यति

।— चाणक्य नीति (१०.९)
अर्थ: जिसके पास अपनी बुद्धि नहीं, शास्त्र उसके लिए अंधे के सामने आईने जैसे हैं।

विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय ।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: दुष्ट की विद्या विवाद और धन घमंड के लिए है, जबकि सज्जन की विद्या ज्ञान और धन दान के लिए।

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः

।— हितोपदेश
अर्थ: मेहनत से ही काम पूरे होते हैं। सोए हुए शेर के मुँह में हिरण खुद नहीं आता।

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्ति यममन्दिरम् ।
शेषाः स्थिरत्वमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्

।— महाभारत (वन पर्व)
अर्थ: रोज लोग मरते हैं, फिर भी जीवित लोग हमेशा रहने की इच्छा करते हैं। यही सबसे बड़ा आश्चर्य है।

काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् ।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा

।— हितोपदेश (१.३)
अर्थ: बुद्धिमानों का समय शास्त्रों के आनंद में और मूर्खों का समय नींद और झगड़े में बीतता है।

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका ।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः

।— हितोपदेश (१.३२)
अर्थ: तिनकों की एकता से बनी रस्सी हाथी को भी बाँध सकती है (एकता में बल है)।

यः पठति लिखति पश्यति पृच्छति पण्डितोपाश्रयति च ।
तस्य दिवाकरकिरणैर्नलिनीव विकास्यते बुद्धिः

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: पढ़ने, लिखने और विद्वानों के साथ रहने से बुद्धि कमल की तरह खिल जाती है।

विद्वान प्रलपन्नपि न मुह्यति ।
आपत्सम्पदिवाभाति विद्वज्जनसमागमे

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: विद्वानों के साथ रहने पर विपत्ति भी सुख (संपत्ति) जैसी लगती है।

यतो धर्मस्ततो जयः ।
यतो बुद्धिः ततः शान्तिः

।— महाभारत
अर्थ: जहाँ धर्म है वहाँ जीत है, और जहाँ बुद्धि है वहाँ शांति है।

प्रारम्भते न खलु विघ्नभयेन नीचैः ।
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः

।— नीतिशतकम् (२७)
अर्थ: नीच लोग काम शुरू ही नहीं करते, मध्यम लोग बाधा आने पर छोड़ देते हैं; केवल श्रेष्ठ लोग अंत तक लड़ते हैं।

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणं किं करिष्यति

।— चाणक्य नीति / सुभाषित
अर्थ: जिसके पास खुद की समझ नहीं, शास्त्र उसके लिए वैसे ही बेकार हैं जैसे अंधे के लिए आईना।

न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्तेऽपि न विश्वसेत् ।
विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलाण्यपि निकृन्तति

।— चाणक्य नीति (२.६) / पञ्चतन्त्रम्
अर्थ: अविश्वसनीय व्यक्ति पर विश्वास न करें और विश्वसनीय पर भी अति-विश्वास न करें; विश्वास से उत्पन्न भय जड़ों को भी काट देता है।

ययोश्चित्तेन वा वाचा समता नैव विद्यते ।
संसर्गजा दोषगुणा भवन्ति तस्मात् सङ्गं विवर्जयेत् ॥

।— हितोपदेश (१.७१)
अर्थ: दोष और गुण संगति से ही पैदा होते हैं, इसलिए जिनके मन और वाणी में समानता न हो, उनकी संगति छोड़ देनी चाहिए।

परोपकारशून्यस्य धिङ् मनुष्यस्य जीवितम् ।
जीवन्ति पशवोऽपि हि केवलं स्वोदरम्भरः

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: उस मनुष्य के जीवन को धिक्कार है जो परोपकार नहीं करता; केवल अपना पेट तो पशु भी भर लेते हैं।

धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् ।
सन्निमित्तं वरं त्यागो विनाशे नियते सति

।— हितोपदेश (१.४१)
अर्थ: बुद्धिमान को दूसरों के भले के लिए धन और प्राण का त्याग कर देना चाहिए; जब विनाश निश्चित हो, तो अच्छे कार्य के लिए त्याग करना ही श्रेष्ठ है।

माता यस्य गृहे नास्ति भार्या च प्रियवादिनी ।
अरण्यं तेन गन्तव्यं यथा गृहं तथा वनम्

।— चाणक्य नीति (१४.१९)
अर्थ: जिसके घर में माता न हो और पत्नी मधुर बोलने वाली न हो, उसके लिए घर और जंगल एक समान है; उसे वन चले जाना चाहिए।

लुब्धमर्थेन गृह्णीयात् स्तब्धमञ्जलिकर्मणा ।
मूर्खं छन्दोऽनुवृत्तेन यथार्थत्वेन पण्डितम्

।— चाणक्य नीति (६.१२)
अर्थ: लालची को धन से, अहंकारी को विनय से, मूर्ख को उसकी हाँ में हाँ मिलाकर और विद्वान को सच्चाई से वश में करना चाहिए।

अतिपरिचयादवज्ञा सन्ततगमनादनादरो भवति ।
मलये भिल्लपुरन्ध्री चन्दनतरुकाष्ठमिन्धनं कुरुते

।— सुभाषित / नीति
अर्थ: बहुत अधिक मेल-जोल से सम्मान कम हो जाता है, जैसे मलय पर्वत की भीलनी चन्दन की लकड़ी को ईधन समझकर जलाती है।

वरं मौनं कार्यं न च वचनमुक्तं यदनृतं ।
स्वभावेन हि तुष्यन्ति देवाः सत्पुरुषास्तथा

।— विदुर नीति
अर्थ: झूठ बोलने से मौन रहना बेहतर है। देवता और सज्जन लोग केवल शुद्ध स्वभाव से ही प्रसन्न होते हैं।

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणं किं करिष्यति

।— चाणक्य नीति (१०.९)
अर्थ: जिसके पास अपनी बुद्धि नहीं, शास्त्र उसका क्या भला करेंगे? जैसे अंधे के लिए दर्पण बेकार है।

मृगा मृगैः सङ्गमनुव्रजन्ति गावश्च गोभिस्तुरगास्तुरङ्गैः ।
समानशीलव्यसनेषु सख्यम्

।— पञ्चतन्त्रम् / सुभाषित
अर्थ: हिरण हिरणों के साथ, गाय गायों के साथ और घोड़े घोड़ों के साथ रहते हैं; मित्रता हमेशा समान स्वभाव वालों में ही होती है।

उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या

।— हितोपदेश (प्रस्ताविका, ३१)
अर्थ: लक्ष्मी उद्यमी पुरुष के पास ही आती है। "भाग्य से मिलेगा" ऐसा कायर कहते हैं। भाग्य को छोड़कर अपनी शक्ति से पुरुषार्थ करो।

षड्दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता

।— विदुर नीति (३३.६८)
अर्थ: ऐश्वर्य चाहने वाले को निद्रा, ऊँघ, डर, क्रोध, आलस्य और काम टालने की आदत—इन छह दोषों को छोड़ देना चाहिए।

तावत् प्रीतिर्भवेल्लोके यावद्दानं प्रदीयते ।
गजबद्वतचर्मेव रक्षणं न तु दानतः

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: संसार में प्रेम तभी तक रहता है जब तक लाभ या दान मिलता है; बिना स्वार्थ के संबंध कम ही होते हैं।

पण्डिते च गुणाः सर्वे मूर्खे दोषाः हि केवलम् ।
तस्मात् मूर्खसहस्रेषु प्राज्ञ एको विशिष्यते

।— चाणक्य नीति
अर्थ: विद्वान में सब गुण होते हैं और मूर्ख में केवल दोष; इसलिए हजार मूर्खों के बदले एक विद्वान श्रेष्ठ है।

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका ।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः

।— हितोपदेश (१.३२)
अर्थ: छोटी चीजों की एकता भी बड़े कार्य सिद्ध करती है; तिनकों से बनी रस्सी से पागल हाथी भी बाँधा जा सकता है।

न कश्चित् कस्यचित् मित्रं न कश्चित् कस्यचित् रिपुः ।
व्यवहारेण मित्राणि जायन्ते रिपवस्तथा

।— चाणक्य नीति
अर्थ: न कोई जन्म से मित्र है न शत्रु; हमारे व्यवहार से ही लोग मित्र और शत्रु बनते हैं।

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: वृक्ष, नदियाँ और गायें दूसरों के लिए ही उपकार करते हैं; यह शरीर भी परोपकार के लिए ही है।

वरं प्राणत्यागो न च पुनरधमानां उपगमः ।
दैन्यान्मरणमुत्तमम्

।— नीतिशतकम्
अर्थ: नीच लोगों की शरण में जाकर दीन जीवन जीने से अच्छा है कि मृत्यु को गले लगा लिया जाए।

दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्यया अलङ्कृतोऽपि सन् ।
मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयङ्करः

।— चाणक्य नीति (४.६)
अर्थ: दुष्ट व्यक्ति विद्वान होने पर भी त्यागने योग्य है; क्या मणि वाला सांप भयानक नहीं होता?

काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् ।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा

।— हितोपदेश (१.३)
अर्थ: बुद्धिमानों का समय शास्त्रों के आनंद में और मूर्खों का समय नींद, झगड़े या बुरी आदतों में बीतता है।

अतिदानेन बलिर्बद्धो ह्यतिमाने च कौरवाः ।
अति सर्वत्र वर्जयेत्

।— चाणक्य नीति
अर्थ: अधिक दान से राजा बलि और अधिक अभिमान से कौरव नष्ट हुए; इसलिए 'अति' का हर जगह त्याग करना चाहिए।

यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः ।
यस्यार्थाः स पुमांल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः

।— हितोपदेश (१.१२८) / पञ्चतन्त्रम्
अर्थ: जिसके पास धन है, उसी के मित्र और संबंधी होते हैं; संसार में उसे ही पुरुष और विद्वान माना जाता है।

नमन्ति फलिनो वृक्षा नमन्ति गुणिनो जनाः ।
शुष्ककाष्ठश्च मूर्खश्च न नमन्ति कदाचन

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: फलों वाले वृक्ष और गुणी लोग झुकते हैं (विनम्र होते हैं), पर सूखी लकड़ी और मूर्ख कभी नहीं झुकते।

गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत् ।
वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः

।— चाणक्य नीति (१३.२)
अर्थ: बीते समय का शोक और भविष्य की चिंता नहीं करनी चाहिए; बुद्धिमान वर्तमान में ही कार्य करते हैं।

विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय ।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतत्

।— सुभाषित / नीति
अर्थ: दुष्ट की विद्या विवाद, धन घमंड और शक्ति दूसरों को सताने के लिए होती है; सज्जन इसके ठीक उलट होते हैं।

यः पठति लिखति पश्यति पृच्छति पण्डितोपाश्रयति च ।
तस्य दिवाकरकिरणैर्नलिनीव विकास्यते बुद्धिः

।— सुभाषित / नीति
अर्थ: जो पढ़ता, लिखता, पूछता और विद्वानों की सेवा करता है, उसकी बुद्धि सूर्य की किरणों से कमल की तरह खिल जाती है।

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः

।— हितोपदेश
अर्थ: कार्य मेहनत से पूरे होते हैं, केवल सोचने से नहीं। सोए हुए शेर के मुँह में हिरण खुद नहीं आता।

विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं ।
विद्याविहीनः पशुः

।— नीतिशतकम् (२०)
अर्थ: विद्या मनुष्य का सबसे सुंदर रूप और छिपा हुआ खजाना है; विद्या के बिना मनुष्य पशु समान है।

आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् ।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो

।— हितोपदेश
अर्थ: खाना, सोना, डरना और वंश बढ़ाना पशु और मनुष्य में समान है; केवल 'धर्म' ही मनुष्य को विशेष बनाता है।

विद्वत्त्वं च नृपत्त्वं च नैव तुल्यं कदाचन ।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते

।— चाणक्य नीति / सुभाषित
अर्थ: राजा और विद्वान की तुलना नहीं हो सकती; राजा अपने देश में, जबकि विद्वान हर जगह पूजा जाता है।

अन्यायोपार्जितं वित्तं दश वर्षाणि तिष्ठति ।
प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं तद्विनश्यति

।— चाणक्य नीति (१५.६)
अर्थ: गलत तरीके से कमाया धन दस साल ही टिकता है; ग्यारहवें साल वह जड़ समेत नष्ट हो जाता है।

सर्पः क्रूरः खलः क्रूरः सर्पात् क्रूरतरः खलः ।
सर्पः शाम्यति मन्त्रैश्च खलः केन न शाम्यति

।— चाणक्य नीति / सुभाषित
अर्थ: सांप क्रूर है और दुष्ट भी, पर दुष्ट सांप से भी अधिक क्रूर है; सांप मंत्रों से शांत हो जाता है, पर दुष्ट किसी से नहीं।

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणं किं करिष्यति

।— चाणक्य नीति
अर्थ: जिसके पास अपनी समझ नहीं, शास्त्र उसके लिए अंधे के सामने आईने के समान बेकार हैं।

चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चलं जीवितयौवनम् ।
चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: धन, प्राण और जवानी सब चंचल (नश्वर) हैं; इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही स्थिर और शाश्वत है।

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् ।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः

।— मनुस्मृति (४.१३८)
अर्थ: सच बोलो, प्रिय बोलो, पर कड़वा सच और मीठा झूठ कभी मत बोलो।

यः स्वभावेन वै शुद्धः स एव हि महानरः ।
विवेकानुसारेण हि बुध्दयो मधु निस्यन्दंते

।— विदुर नीति
अर्थ: जो स्वभाव से शुद्ध है वही महान है; बुद्धि विवेक के अनुसार मीठे फल (सफलता) प्रदान करती है।

न कश्चिद् कस्यचिन्मित्रं न कश्चिद् कस्यचिद्रिपुः ।
व्यवहारेण मित्राणि जायन्ते रिपवस्तथा

।— चाणक्य नीति / सुभाषित
अर्थ: कोई किसी का मित्र या शत्रु बनकर पैदा नहीं होता; हमारे आचरण से ही मित्र और शत्रु बनते हैं।

यतो धर्मस्ततो जयः यतो बुद्धिस्ततो जयः ।
यतो बुद्धिः ततः शान्तिः

।— महाभारत / सुभाषित
अर्थ: जहाँ धर्म और बुद्धि है, वहाँ जीत निश्चित है; और जहाँ बुद्धि है, वहीं शांति का निवास है।

प्रारम्भते न खलु विघ्नभयेन नीचैः ।
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः

।— नीतिशतकम् (२७)
अर्थ: नीच लोग बाधा के डर से काम शुरू नहीं करते, मध्यम लोग बाधा आने पर छोड़ देते हैं; केवल उत्तम लोग अंत तक डटे रहते हैं।

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: वृक्ष, नदियाँ और गायें परोपकार के लिए हैं; यह शरीर भी दूसरों की सेवा के लिए ही है।

आशाया ये कृता दासास्ते दासाः सर्वदेहिनाम् ।
आशां संश्रुत्य यो हन्ति स लोके पुरुषाधमः

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: जो आशा का दास है वह सबका दास है। जो किसी को आशा देकर उसे तोड़ता है, वह दुनिया का सबसे नीच मनुष्य है।

दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्यया अलङ्कृतोऽपि सन् ।
मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयङ्करः

।— चाणक्य नीति
अर्थ: दुष्ट व्यक्ति विद्वान होने पर भी त्यागने लायक है; मणि वाला सांप भी उतना ही जहरीला और डरावना होता है।

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्ति यममन्दिरम् ।
शेषाः स्थिरत्वमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्

।— महाभारत (वन पर्व)
अर्थ: रोज लोग मरते हैं, फिर भी जीवित लोग हमेशा रहने की उम्मीद करते हैं; यह दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य है।

शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात्परं सुखम् ।
न च लोभात्परो व्याधिः न च धर्मो दयापरः

।— चाणक्य नीति / सुभाषित
अर्थ: शांति जैसा तप नहीं, संतोष जैसा सुख नहीं, लोभ जैसी बीमारी नहीं और दया जैसा श्रेष्ठ धर्म नहीं।

एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना ।
आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी

।— चाणक्य नीति
अर्थ: एक ही विद्वान पुत्र से पूरा कुल वैसे ही प्रकाशित होता है जैसे रात चाँद से।

पुस्तकेषु च या विद्या परहस्तेषु यद्धनम् ।
उत्पन्नेषु च कार्येषु न सा विद्या न तद्धनम्

।— चाणक्य नीति (१६.२०)
अर्थ: किताब में रखी विद्या और दूसरों को दिया धन, समय पड़ने पर कभी काम नहीं आते।

नमन्ति फलिनो वृक्षा नमन्ति गुणिनो जनाः ।
शुष्ककाष्ठश्च मूर्खश्च न नमन्ति कदाचन

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: फलदार वृक्ष और गुणी जन विनम्र होते हैं, पर सूखा पेड़ और मूर्ख कभी नहीं झुकते।

विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय ।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: दुष्ट की विद्या बहस के लिए और धन घमंड के लिए; सज्जन की विद्या ज्ञान के लिए और धन दान के लिए होता है।

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका ।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः

।— हितोपदेश
अर्थ: छोटी चीजों की एकता बड़े काम कर सकती है; घास के तिनकों से बनी रस्सी हाथी को भी बाँध देती है।

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणं किं करिष्यति

।— चाणक्य नीति (१०.९)
अर्थ: जिसकी अपनी बुद्धि नहीं, शास्त्र उसके लिए वैसे ही बेकार हैं जैसे अंधे के लिए दर्पण।

अग्निहृत् ऋणपुत्रस्य व्याधिं शत्रुं च शेषयेत् ।
अग्निशेषमृणशेषं च व्याधिशेषं न शेषयेत्

।— चाणक्य नीति (६.१५)
अर्थ: आग, कर्ज और बीमारी का थोड़ा सा अंश भी बाकी नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि ये दोबारा बढ़कर विनाश कर सकते हैं।

गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गं न च वयः ।
गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते

।— उत्तररामचरितम् (४.११) / सुभाषित
अर्थ: गुणीजनों में गुणों की ही पूजा होती है, लिंग या आयु की नहीं। गुण ही हर जगह आदर पाते हैं।

यथा हि एकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत् ।
यथा बीजं विना सस्यं न सिध्यति

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: जैसे बिना बीज के फसल नहीं होती, वैसे ही बिना कर्म (पुरुषार्थ) के भाग्य सिद्ध नहीं होता।

न विश्वसेत् कुमित्रे च मित्रे चापि न विश्वसेत् ।
कदाचित् कुपितं मित्रं सर्वं गुह्यं प्रकाशयेत्

।— चाणक्य नीति (२.६)
अर्थ: बुरे मित्र पर तो कभी नहीं, और अच्छे मित्र पर भी आँख मूँदकर विश्वास न करें; क्योंकि क्रोधित होने पर वह आपके सारे राज खोल सकता है।

मृदुना सलिलं खनति मृदुना हन्ति कुञ्जरम् ।
मृदुना सर्वं साध्यते तस्मात् तीक्ष्णं न रोचयेत्

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार / महाभारत
अर्थ: कोमलता से जल खोदा जा सकता है और हाथी को भी जीता जा सकता है; कोमलता से सब कुछ सिद्ध होता है, इसलिए कठोरता उचित नहीं।

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्ति यममन्दिरम् ।
शेषाः स्थिरत्वमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्

।— महाभारत (वन पर्व, ३१३.११६)
अर्थ: हर दिन लोग मरते हैं, फिर भी जो जीवित हैं वे अमर रहना चाहते हैं। इससे बड़ा आश्चर्य क्या होगा?

दुर्जनः प्रियवादी च नैव विश्वासकारणम् ।
मधु तिष्ठति जिह्वाग्रे हृदये तु हलाहलम्

।— चाणक्य नीति
अर्थ: मीठा बोलने वाला दुष्ट कभी विश्वास के लायक नहीं होता; उसकी जीभ पर शहद होता है पर हृदय में जहर।

यद्भावि न तद्भावि भावि चेन्न तदन्यथा ।
इति चिन्ताविषघ्नोऽयमगदः किं न पीयते

।— हितोपदेश (प्रस्ताविका, २१)
अर्थ: जो होने वाला है वह होकर रहेगा, और जो नहीं होने वाला वह नहीं होगा। यह चिंता रूपी जहर को खत्म करने वाली दवा आप क्यों नहीं पीते?

लोभः प्रतिष्ठा पापस्य क्रोधो दुःखस्य कारकः ।
लोभान्मोहश्च नाशश्च लोभः पापस्य कारणम्

।— हितोपदेश (२.५६)
अर्थ: लोभ पाप और क्रोध का कारण है। लोभ से ही मोह और विनाश पैदा होता है।

विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय ।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतत्

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: दुष्ट की विद्या बहस, धन घमंड और ताकत सताने के लिए होती है; सज्जन इसके ठीक विपरीत होते हैं।

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्

।— सुभाषित / नीति
अर्थ: वृक्ष, नदियाँ और गायें दूसरों के हित के लिए काम करते हैं। यह शरीर भी परोपकार के लिए ही है।

षड्दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता

।— विदुर नीति (३३.६८)
अर्थ: उन्नति चाहने वाले को नींद, ऊँघ, डर, गुस्सा, आलस्य और काम टालने की आदत छोड़ देनी चाहिए।

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका ।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः

।— हितोपदेश (१.३२)
अर्थ: छोटी चीजों की एकता भी बड़े कार्य सिद्ध करती है, जैसे घास के तिनकों से बनी रस्सी हाथी को बाँध देती है।

सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् ।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः

।— किरातार्जुनीयम् (२.३०)
अर्थ: अचानक बिना सोचे कोई काम न करें, अज्ञान विपत्तियों का घर है। सोच-समझकर काम करने वाले के पास लक्ष्मी स्वयं आती है।

नमन्ति फलिनो वृक्षा नमन्ति गुणिनो जनाः ।
शुष्ककाष्ठश्च मूर्खश्च न नमन्ति कदाचन

।— सुभाषित / नीति
अर्थ: फलदार पेड़ और गुणी लोग विनम्र होते हैं, पर सूखी लकड़ी और मूर्ख कभी नहीं झुकते।

विद्वत्त्वं च नृपत्त्वं च नैव तुल्यं कदाचन ।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते

।— चाणक्य नीति / सुभाषित
अर्थ: राजा अपने देश में सम्मान पाता है, पर विद्वान की पूजा पूरी दुनिया में होती है।

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणं किं करिष्यति

।— चाणक्य नीति (१०.९)
अर्थ: जिसकी अपनी बुद्धि नहीं, शास्त्र उसके लिए अंधे के सामने आईने के समान बेकार हैं।

अतिपरिचयादवज्ञा सन्ततगमनादनादरो भवति ।
मलये भिल्लपुरन्ध्री चन्दनतरुकाष्ठमिन्धनं कुरुते

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: बहुत अधिक मेल-जोल से आदर कम हो जाता है, जैसे मलय की भीलनी चन्दन को ईधन की तरह जलाती है।

अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्या अल्पश्च कालो बहवश्च विघ्नाः ।
यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्

।— पञ्चतन्त्रम् (कथामुखम्)
अर्थ: शास्त्र अनंत हैं पर समय कम। इसलिए जैसे हंस जल से दूध चुन लेता है, वैसे ही ज्ञान का सार ग्रहण करें।

सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः ।
अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः

।— रामायण / विदुर नीति
अर्थ: मीठा बोलने वाले बहुत मिल जाते हैं, पर कड़वा और हितकारी बोलने व सुनने वाले बहुत दुर्लभ हैं।

चिन्ताग्निर्वर्धते नित्यं चिन्ता हन्ति च जीवितम् ।
चिता दहति निर्जीवं चिन्ता दहति जीवितम्

।— सुभाषित / नीति
अर्थ: चिता केवल मरे हुए शरीर को जलाती है, लेकिन चिंता जीवित व्यक्ति को ही राख कर देती है।

यः पठति लिखति पश्यति पृच्छति पण्डितोपाश्रयति च ।
तस्य दिवाकरकिरणैर्नलिनीव विकास्यते बुद्धिः

।— सुभाषित / नीति
अर्थ: जो पढ़ता, लिखता, देखता और विद्वानों के साथ रहता है, उसकी बुद्धि सूर्य की किरणों से कमल की तरह खिल जाती है।

दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्यया अलङ्कृतोऽपि सन् ।
मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयङ्करः

।— चाणक्य नीति (४.६)
अर्थ: दुष्ट व्यक्ति विद्वान होने पर भी त्यागने योग्य है; मणि वाला सांप भी उतना ही जहरीला और डरावना होता है।

न कश्चित् कस्यचित् मित्रं न कश्चित् कस्यचित् रिपुः ।
व्यवहारेण मित्राणि जायन्ते रिपवस्तथा

।— चाणक्य नीति / सुभाषित
अर्थ: कोई किसी का मित्र या शत्रु बनकर पैदा नहीं होता; हमारे व्यवहार से ही मित्र और शत्रु बनते हैं।

यथा खरश्चन्दनभारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य ।
तथैव शास्त्रं बह्वपि अधीतं

।— सुश्रुत संहिता / सुभाषित
अर्थ: जैसे गधा चन्दन का भार ढोता है पर उसकी सुगंध नहीं जानता, वैसे ही बिना ज्ञान के शास्त्र पढ़ना केवल बोझ ढोना है।

शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात्परं सुखम् ।
न च लोभात्परो व्याधिः न च धर्मो दयापरः

।— चाणक्य नीति (८.१३)
अर्थ: शांति जैसा तप नहीं, संतोष जैसा सुख नहीं, लोभ जैसी बीमारी नहीं और दया जैसा श्रेष्ठ धर्म नहीं।

एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना ।
आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी

।— चाणक्य नीति
अर्थ: एक ही गुणवान और विद्वान पुत्र से पूरा कुल वैसे ही आनंदित होता है जैसे चंद्रमा से रात।

पुस्तकेषु च या विद्या परहस्तेषु यद्धनम् ।
उत्पन्नेषु च कार्येषु न सा विद्या न तद्धनम्

।— चाणक्य नीति (१६.२०)
अर्थ: किताब में रखी विद्या और दूसरों को दिया धन, जरूरत पड़ने पर कभी काम नहीं आते।

वृत्तं यत्नेन संरक्षेत वित्तमायाति याति च ।
अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः

।— मनुस्मृति / विदुरनीति
अर्थ: चरित्र की रक्षा यत्नपूर्वक करनी चाहिए। धन जाने पर कुछ नहीं बिगड़ता, पर चरित्र जाने पर सब कुछ नष्ट हो जाता है।

चलत्येकेन पादेन तिष्ठत्यन्येन बुद्धिमान ।
न विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः

।— चाणक्य नीति / सुभाषित
अर्थ: बुद्धिमान व्यक्ति एक पैर से चलता है और दूसरे से खड़ा रहता है (पूरी तरह सोचकर कदम बढ़ाता है)।

विद्वान प्रलपन्नपि न मुह्यति ।
आपत्सम्पदिवाभाति विद्वज्जनसमागमे

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: विद्वानों के साथ रहने पर विपत्ति भी सुख (संपत्ति) जैसी लगती है।

यतो धर्मस्ततो जयः यतो बुद्धिस्ततो जयः ।
यतो बुद्धिः ततः शान्तिः

।— महाभारत / सुभाषित
अर्थ: जहाँ धर्म और बुद्धि है, वहाँ जीत निश्चित है; और जहाँ बुद्धि है, वहीं शांति का निवास है।

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: वृक्ष, नदियाँ और गायें परोपकार के लिए हैं; यह शरीर भी दूसरों की सेवा के लिए ही है।

मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम् ।
मनस्यन्यद्वचस्यन्यत्कर्मण्यन्यद्दुरात्मनाम्

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: महापुरुषों के मन, वाणी और कर्म एक समान होते हैं, जबकि दुष्टों के तीनों अलग-अलग।

न विना परवादेन रमते दुर्जनोजनः ।
काकः सर्वरसान् भुक्ते विना मेध्यं न तृप्यति

।— सुभाषित / नीति
अर्थ: दुष्ट दूसरों की बुराई के बिना खुश नहीं रहता, जैसे कौआ गंदगी के बिना तृप्त नहीं होता।

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः

।— हितोपदेश
अर्थ: मेहनत से ही काम पूरे होते हैं। सोए हुए शेर के मुँह में हिरण खुद नहीं आता।

काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् ।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा

।— हितोपदेश (१.३)
अर्थ: बुद्धिमानों का समय शास्त्रों के आनंद में और मूर्खों का समय नींद और झगड़े में बीतता है।

आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् ।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो

।— हितोपदेश
अर्थ: खाना, सोना, डरना और वंश बढ़ाना पशु और मनुष्य में समान है; केवल 'धर्म' ही मनुष्य को विशेष बनाता है।

अन्यायोपार्जितं वित्तं दश वर्षाणि तिष्ठति ।
प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं तद्विनश्यति

।— चाणक्य नीति (१५.६)
अर्थ: गलत तरीके से कमाया धन दस साल ही टिकता है; ग्यारहवें साल वह जड़ समेत नष्ट हो जाता है।

सर्पः क्रूरः खलः क्रूरः सर्पात् क्रूरतरः खलः ।
सर्पः शाम्यति मन्त्रैश्च खलः केन न शाम्यति

।— चाणक्य नीति / सुभाषित
अर्थ: सांप क्रूर है और दुष्ट भी, पर दुष्ट सांप से भी अधिक क्रूर है; सांप मंत्रों से शांत हो जाता है, पर दुष्ट किसी से नहीं।

विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय ।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: दुष्ट की विद्या बहस और धन घमंड के लिए है, जबकि सज्जन की विद्या ज्ञान और धन दान के लिए।

विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं ।
विद्याविहीनः पशुः

।— नीतिशतकम् (२०)
अर्थ: विद्या मनुष्य का सबसे सुंदर रूप और छिपा हुआ खजाना है; विद्या के बिना मनुष्य पशु समान है।

षड्दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता

।— विदुर नीति (३३.६८)
अर्थ: तरक्की चाहने वाले को नींद, ऊँघ, डर, गुस्सा, आलस्य और काम टालने की आदत छोड़ देनी चाहिए।

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका ।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः

।— हितोपदेश (१.३२)
अर्थ: तिनकों की एकता से बनी रस्सी हाथी को भी बाँध सकती है (एकता में बल है)।

यः पठति लिखति पश्यति पृच्छति पण्डितोपाश्रयति च ।
तस्य दिवाकरकिरणैर्नलिनीव विकास्यते बुद्धिः

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: पढ़ने, लिखने और विद्वानों के साथ रहने से बुद्धि कमल की तरह खिल जाती है।

विद्वान प्रलपन्नपि न मुह्यति ।
आपत्सम्पदिवाभाति विद्वज्जनसमागमे

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: विद्वानों के साथ रहने पर विपत्ति भी सुख (संपत्ति) जैसी लगती है।

यतो धर्मस्ततो जयः यतो बुद्धिस्ततो जयः ।
यतो बुद्धिः ततः शान्तिः

।— महाभारत
अर्थ: जहाँ धर्म है वहाँ जीत है, और जहाँ बुद्धि है वहाँ शांति है।

प्रारम्भते न खलु विघ्नभयेन नीचैः ।
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः

।— नीतिशतकम् (२७)
अर्थ: नीच लोग काम शुरू ही नहीं करते, मध्यम लोग बाधा आने पर छोड़ देते हैं; केवल श्रेष्ठ लोग अंत तक लड़ते हैं।

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणं किं करिष्यति

।— चाणक्य नीति / सुभाषित
अर्थ: जिसके पास खुद की समझ नहीं, शास्त्र उसके लिए वैसे ही बेकार हैं जैसे अंधे के लिए आईने।

यथा हि एकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत् ।
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति

।— सुभाषितरत्नभाण्डागार
अर्थ: जैसे एक पहिये से रथ नहीं चलता, वैसे ही बिना मेहनत (पुरुषार्थ) के भाग्य कभी फल नहीं देता।

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