ठिठुरता हुआ गणतंत्र

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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ठिठुरता हुआ गणतंत्र : विस्तृत समीक्षा, सारांश एवं प्रश्नोत्तर

प्रस्तुत लेख में हिन्दी के युग-प्रवर्तक व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई द्वारा रचित तीक्ष्ण राजनैतिक व्यंग्य 'ठिठुरता हुआ गणतंत्र' का सांगोपांग विश्लेषण है। यह निबन्ध भारतीय राजनीति की खोखली घोषणाओं और व्यवस्था की विसंगतियों पर करारी चोट करता है।

निबन्ध : ठिठुरता हुआ गणतंत्र
निबन्धकार : हरिशंकर परसाई
युग : स्वतंत्र्योत्तर युग (व्यंग्य विधा)
विधा : व्यंग्य निबन्ध
मूल विषय : राजनैतिक पाखंड और प्रशासनिक विसंगतियाँ
भाषा-शैली : बोलचाल की भाषा, मारक और व्यंग्यात्मक

१. निबन्धकार का परिचय

हरिशंकर परसाई (1924–1995 ई.) हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल के सर्वश्रेष्ठ व्यंग्यकार हैं। उन्होंने व्यंग्य को केवल मनोरंजन की विधा से निकालकर समाज और राजनीति की सड़ांध के विरुद्ध एक हथियार के रूप में प्रतिष्ठित किया। जबलपुर से 'वसुधा' नामक साहित्यिक पत्रिका का संपादन करने वाले परसाई जी ने अपनी लेखनी से भ्रष्टाचार, धार्मिक पाखंड और राजनैतिक अवसरवाद पर बेबाक प्रहार किए। उनके प्रमुख व्यंग्य संग्रहों में 'ठिठुरता हुआ गणतंत्र', 'पगडंडियों का जमाना', 'निठल्ले की डायरी' और 'शिकायत मुझे भी है' अत्यंत लोकप्रिय हैं। उन्हें 'विकलांग श्रद्धा का दौर' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। परसाई जी की भाषा अत्यंत सरल, बोलचाल की और सीधी मार करने वाली है। वे समाज के दबे-कुचले लोगों की पीड़ा को अपनी व्यंग्यात्मक तार्किकता से स्वर देने वाले बेजोड़ साहित्यकार थे।

२. मूल पाठ

चार बार मैं गणतंत्र दिवस का जलसा दिल्ली में देख चुका हूं. पांचवी बार देखने का साहस नहीं. आखिर यह क्या बात है कि हर बार जब मैं गणतंत्र समारोह देखता, तब मौसम बड़ा क्रूर रहता. छब्बीस जनवरी के पहले ऊपर बर्फ पड़ जाती है. शीतलहर आती है, बादल छा जाते हैं, बूंदाबांदी होती है और सूर्य छिप जाता है. जैसे दिल्ली की अपनी कोई अर्थनीति नहीं है, वैसे ही अपना मौसम भी नहीं है. अर्थनीति जैसे डॉलर, पौंड, रुपया, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा-कोष या भारत सहायता क्लब से तय होती है, वैसे ही दिल्ली का मौसम कश्मीर, सिक्किम, राजस्थान आदि तय करते हैं.

इतना बेवकूफ भी नहीं कि मान लूं, जिस साल मैं समारोह देखता हूं, उसी साल ऐसा मौसम रहता है. हर साल देखने वाले बताते हैं कि हर गणतंत्र दिवस पर मौसम ऐसा ही धूपहीन ठिठुरनवाला होता है. आखिर बात क्या है? रहस्य क्या है?

जब कांग्रेस टूटी नहीं थी, तब मैंने एक कांग्रेस मंत्री से पूछा था कि यह क्या बात है कि हर गणतंत्र दिवस को सूर्य छिपा रहता है? सूर्य की किरणों के तले हम उत्सव क्यों नहीं मना सकते? उन्होंने कहा, ‘जरा धीरज रखिए. हम कोशिश में हैं कि सूर्य बाहर आ जाए. पर इतने बड़े सूर्य को बाहर निकालना आसान नहीं हैं. वक्त लगेगा. हमें सत्ता के कम से कम सौ वर्ष तो दीजिए.’ दिए. सूर्य को बाहर निकालने के लिए सौ वर्ष दिए, मगर हर साल उसका छोटा-मोटा कोना तो निकलता दिखना चाहिए. सूर्य कोई बच्चा तो है नहीं जो अंतरिक्ष की कोख में अटका है, जिसे आप ऑपरेशन करके एक दिन में निकाल देंगे.

इधर जब कांग्रेस के दो हिस्से हो गए तब मैंने एक इंडिकेटी कांग्रेस से पूछा. उसने कहा, ‘हम हर बार सूर्य को बादलों से बाहर निकालने की कोशिश करते थे, पर हर बार सिंडीकेट वाले अड़ंगा डाल देते थे. अब हम वादा करते हैं कि अगले गणतंत्र दिवस पर सूर्य को निकालकर बताएंगे.’ एक सिण्डीकेटी पास खड़ा सुन रहा था. वह बोल पड़ा, ‘यह लेडी (प्रधानमंत्री) कम्युनिस्टों के चक्कर में आ गई है. वही उसे उकसा रहे हैं कि सूर्य को निकालो. उन्हें उम्मीद है कि बादलों के पीछे से उनका प्यारा ‘लाल सूरज’ निकलेगा. हम कहते हैं कि सूर्य को निकालने की क्या जरूरत है? क्या बादलों को हटाने से काम नहीं चल सकता?’

मैं संसोपाई भाई से पूछ्ता हूं. वह कहता है, ‘सूर्य गैर-कांग्रेसवाद पर अमल कर रहा है. उसने डाक्टर लोहिया के कहने पर हमारा पार्टी-फार्म दिया था. कांग्रेसी प्रधानमंत्री को सलामी लेते वह कैसे देख सकता है? किसी गैर-कांग्रेसी को प्रधानमंत्री बना दो, तो सूर्य क्या, उसके अच्छे भी निकल पड़ेंगे.’

जनसंघी भाई से भी पूछा. उसने कहा, ‘सूर्य सेक्युलर होता तो इस सरकार की परेड में निकल आता. इस सरकार से आशा मत करो कि भगवान अंशुमाली को निकाल सकेगी. हमारे राज्य में ही सूर्य निकलेगा.’ साम्यवादी ने मुझसे साफ कहा, ‘यह सब सी.आई.ए. का षडयंत्र है. सातवें बेड़े से बादल दिल्ली भेजे जाते हैं.’ स्वतंत्र पार्टी के नेता ने कहा, ‘रूस का पिछलग्गू बनने का और क्या नतीजा होगा?’ प्रसोपा भाई ने अनमने ढंग से कहा, ‘सवाल पेचीदा है. नेशनल कौंसिल की अगली बैठक में इसका फैसला होगा. तब बताऊंगा.’ राजाजी से मैं मिल न सका. मिलता, तो वह इसके सिवा क्या कहते कि इस राज में तारे निकलते हैं, यही गनीमत है.’ मैं इंतजार करूंगा, जब भी सूर्य निकले.

स्वतंत्रता दिवस भी तो भरी बरसात में होता है. अंग्रेज बहुत चालाक हैं. भरी बरसात में स्वतंत्र करके चले गए. उस कपटी प्रेमी की तरह भागे, जो प्रेमिका का छाता भी ले जाए. वह बेचारी भीगती बस-स्टैंड जाती है, तो उसे प्रेमी की नहीं, छाता-चोर की याद सताती है. स्वतंत्रता-दिवस भीगता है और गणतंत्र-दिवस ठिठुरता है.

मैं ओवरकोट में हाथ डाले परेड देखता हूं. प्रधानमंत्री किसी विदेशी मेहमान के साथ खुली गाड़ी में निकलती हैं. रेडियो टिप्पणीकार कहता है, ‘घोर करतल-ध्वनि हो रही है.’ मैं देख रहा हूं, नहीं हो रही है. हम सब तो कोट में हाथ डाले बैठे हैं. बाहर निकालने का जी नहीं हो रहा है. हाथ अकड़ जाएंगे. लेकिन हम नहीं बजा रहे हैं, फिर भी तालियां बज रहीं हैं. मैदान में जमीन पर बैठे वे लोग बजा रहे हैं, जिनके पास हाथ गरमाने के लिए कोट नहीं है. लगता है, गणतंत्र ठिठुरते हुए हाथों की तालियों पर टिका है. गणतंत्र को उन्हीं हाथों की ताली मिलतीं हैं, जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिए गर्म कपड़ा नहीं है. पर कुछ लोग कहते हैं, ‘गरीबी मिटनी चाहिए.’ तभी दूसरे कहते हैं, ‘ऐसा कहने वाले प्रजातंत्र के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं.’

गणतंत्र समारोह में हर राज्य की झांकी निकलती है. ये अपने राज्य का सही प्रतिनिधित्व नहीं करतीं. ‘सत्यमेव जयते’ हमारा मोटो है मगर झांकियां झूठ बोलती हैं. इनमें विकास-कार्य, जनजीवन इतिहास आदि रहते हैं. असल में हर राज्य को उस विशिष्ट बात को यहां प्रदर्शित करना चाहिए, जिसके कारण पिछले साल वह राज्य मशहूर हुआ. गुजरात की झांकी में इस साल दंगे का दृश्य होना चाहिए, जलता हुआ घर और आग में झोंके जाते बच्चे. पिछले साल मैंने उम्मीद की थी कि आंध्र की झांकी में हरिजन जलते हुए दिखाए जाएंगे. मगर ऐसा नहीं दिखा. यह कितना बड़ा झूठ है कि कोई राज्य दंगे के कारण अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति पाए, लेकिन झांकी सजाए लघु उद्योगों की. दंगे से अच्छा गृह-उद्योग तो इस देश में दूसरा है नहीं. मेरे मध्यप्रदेश ने दो साल पहले सत्य के नजदीक पहुंचने की कोशिश की थी. झांकी में अकाल-राहत कार्य बतलाए गए थे. पर सत्य अधूरा रह गया था. मध्यप्रदेश उस साल राहत कार्यों के कारण नहीं, राहत-कार्यों में घपले के कारण मशहूर हुआ था. मेरा सुझाव माना जाता तो मैं झांकी में झूठे मास्टर रोल भरते दिखाता, चुकारा करनेवाले का अंगूठा हजारों मूर्खों के नाम के आगे लगवाता. नेता, अफसर, ठेकेदारों के बीच लेन-देन का दृश्य दिखाता. उस झांकी में वह बात नहीं आई. पिछले साल स्कूलों के ‘टाट-पट्टी कांड’ से हमारा राज्य मशहूर हुआ. मैं पिछले साल की झांकी में यह दृश्य दिखाता- ‘मंत्री, अफसर वगैरह खड़े हैं और टाट-पट्टी खा रहे हैं.

जो हाल झांकियों का, वही घोषणाओं का. हर साल घोषणा की जाती है कि समाजवाद आ रहा है. पर अभी तक नहीं आया. कहां अटक गया? लगभग सभी दल समाजवाद लाने का दावा कर रहे हैं, लेकिन वह नहीं आ रहा. मैं एक सपना देखता हूँ. समाजवाद आ गया है और वह बस्ती के बाहर टीले पर खड़ा है. बस्ती के लोग आरती सजाकर उसका स्वागत करने को तैयार खड़े हैं. पर टीले को घेरे खड़े हैं कई समाजवादी. उनमें से हरेक लोगों से कहकर आया है कि समाजवाद को हाथ पकड़कर मैं ही लाऊंगा. समाजवाद टीले से चिल्लाता है, ‘मुझे बस्ती में ले चलो.’ मगर टीले को घेरे समाजवादी कहते हैं, ‘पहले यह तय होगा कि कौन तेरा हाथ पकड़कर ले जाएगा.’

समाजवाद की घेराबंदी है. संसोपा-प्रसोपावाले जनतांत्रिक समाजवादी हैं, पीपुल्स डेमोक्रेसी और नेशनल डेमोक्रेसी वाले समाजवादी हैं. क्रांतिकारी समाजवादी हैं. हरेक समाजवाद का हाथ पकड़कर उसे बस्ती में ले जाकर लोगों से कहना चाहता है, ‘लो, मैं समाजवाद ले आया.’ समाजवाद परेशान है. उधर जनता भी परेशान है. समाजवाद आने को तैयार खड़ा है, मगर समाजवादियों में आपस में धौल-धप्पा हो रहा है. समाजवाद एक तरफ उतरना चाहता है कि उस पर पत्थर पड़ने लगते हैं. ‘खबरदार, उधर से मत जाना!’ एक समाजवादी उसका एक हाथ पकड़ता है, तो दूसरा हाथ पकड़कर खींचता है. तब बाकी समाजवादी छीना-झपटी करके हाथ छुड़ा देते हैं. लहू-लुहान समाजवाद टीले पर खड़ा है.

इस देश में जो जिसके लिए प्रतिबद्ध है, वही उसे नष्ट कर रहा है. लेखकीय स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध लोग ही लेखक की स्वतंत्रता छीन रहे हैं. सहकारिता के लिए प्रतिबद्ध इस आंदोलन के लोग ही सहकारिता को नष्ट कर रहे हैं. सहकारिता तो एक स्पिरिट है. सब मिलकर सहकारितापूर्वक खाने लगते हैं और आंदोलन को नष्ट कर देते हैं. समाजवाद को समाजवादी ही रोके हुए हैं. यों प्रधानमंत्री ने घोषणा कर दी है कि अब समाजवाद आ ही रहा है.

मैं एक कल्पना कर रहा हूं. दिल्ली में फरमान जारी हो जाएगा, ‘समाजवाद सारे देश के दौरे पर निकल रहा है. उसे सब जगह पहुंचाया जाए. उसके स्वागत और सुरक्षा का पूरा बंदोबस्त किया जाए.’ एक सचिव दूसरे सचिव से कहेगा, ‘लो, ये एक और वीआईपी आ रहे हैं. अब इनका इंतजाम करो. नाक में दम है.’ कलेक्टरों को हुक्म चला जाएगा. कलेक्टर एसडीओ को लिखेगा, एसडीओ तहसीलदार को. पुलिस-दफ्तरों में फरमान पहुंचेंगे, समाजवाद की सुरक्षा की तैयारी करो. दफ्तरों में बड़े बाबू छोटे बाबू से कहेंगे, ‘काहे हो तिवारी बाबू, एक कोई समाजवाद वाला कागज आया था न! जरा निकालो!’ तिवारी बाबू कागज निकालकर देंगे. बड़े बाबू फिर से कहेंगे, ‘अरे वह समाजवाद तो परसों ही निकल गया. कोई लेने नहीं गया स्टेशन. तिवारी बाबू, तुम कागज दबाकर रख लेते हो. बड़ी खराब आदत है तुम्हारी.’ तमाम अफसर लोग चीफ सेक्रेटरी से कहेंगे, ‘सर, समाजवाद बाद में नहीं आ सकता? बात यह है कि हम उसकी सुरक्षा का इंतजाम नहीं कर सकेंगे. पूरा फोर्स दंगे से निपटने में लगा है.’ मुख्य सचिव दिल्ली लिख देगा, ‘हम समाजवाद की सुरक्षा का इंतजाम करने में असमर्थ हैं. उसका आना अभी मुल्तवी किया जाए.’

जिस शासन-व्यवस्था में समाजवाद के आगमन के कागज दब जाएं और जो उसकी सुरक्षा की व्यवस्था न करे, उसके भरोसे समाजवाद लाना है तो ले आओ. मुझे खास ऐतराज भी नहीं है. जनता के द्वारा न आकर अगर समाजवाद दफ्तरों के द्वारा आ गया तो एक ऐतिहासिक घटना हो जाएगी.

३. निबन्ध का प्रतिपाद्य एवं सारांश

'ठिठुरता हुआ गणतंत्र' का मूल प्रतिपाद्य गणतंत्र के नाम पर होने वाले राजनैतिक पाखंड, अवसरवाद और प्रशासनिक विफलता को उजागर करना है। परसाई जी ने कड़ाके की ठंड (शीतलहर) को भारतीय लोकतंत्र की ठंडी पड़ी संवेदनाओं का प्रतीक बनाया है। सारांशतः, निबन्ध यह दिखाता है कि छब्बीस जनवरी के समारोह में सूर्य (उम्मीद/विकास) गायब है और विभिन्न राजनैतिक दल अपनी-अपनी विचारधाराओं के आधार पर इसके न निकलने के तर्क दे रहे हैं। लेखक व्यंग्य करते हैं कि हमारा गणतंत्र उन गरीबों की तालियों पर टिका है जिनके पास तन ढंकने को कपड़े नहीं हैं, जबकि सुविधाभोगी वर्ग कोट में हाथ डाले बैठा है। झाँकियों की बनावट और 'सत्यमेव जयते' के मोटो के बीच का अंतर्विरोध यह स्पष्ट करता है कि असली समस्याओं (दंगे, घपले) को सजावट के पीछे छिपाया जाता है। अंत में समाजवाद की दुर्दशा का चित्रण करते हुए लेखक प्रशासनिक सुस्ती और समाजवादियों की आपसी खींचतान को इसकी विफलता का मुख्य कारण बताते हैं।

४. निबन्ध तत्वों के आधार पर ठिठुरता हुआ गणतंत्र की समीक्षा

(क) विषय-वस्तु और राजनैतिक यथार्थ: परसाई जी के इस निबन्ध की विषय-वस्तु दिल्ली के गणतंत्र दिवस समारोह के इर्द-गिर्द बुनी गई है, लेकिन यह केवल एक उत्सव का वर्णन नहीं है। यह भारतीय प्रजातंत्र के भीतर व्याप्त विसंगतियों का कच्चा चिट्ठा है। लेखक ने विषय को 'ठिठुरन' के माध्यम से व्यक्त किया है, जो गरीबी और अभाव का प्रतीक है। विषय-वस्तु में समाजवाद की विफलता, भ्रष्टाचार (मास्टर रोल घपला, टाट-पट्टी कांड) और सांप्रदायिकता (गुजरात दंगे) जैसे गंभीर मुद्दों को व्यंग्य की चाशनी में लपेटकर प्रस्तुत किया गया है।

(ख) प्रतीकात्मकता और उपमानों का सटीक प्रयोग: निबन्ध में 'सूर्य' उस स्वर्णिम भविष्य और समाजवाद का प्रतीक है जिसकी प्रतीक्षा भारत दशकों से कर रहा है। 'ठिठुरते हाथ' उस आम आदमी के प्रतीक हैं जो अभाव में भी व्यवस्था का साथ दे रहा है। 'अंग्रेजों' की तुलना 'कपटी प्रेमी' से करना, जो जाते-जाते छाता (संसाधन) भी ले गया, परसाई जी की मौलिक कल्पनाशीलता को दर्शाता है। झाँकियों को 'झूठ' कहना और 'सत्यमेव जयते' के मोटो पर व्यंग्य करना व्यवस्था के दोहरे चरित्र को उजागर करता है।

(ग) राजनैतिक दलों का चरित्र-चित्रण: लेखक ने निबन्ध में तत्कालीन सभी प्रमुख राजनैतिक धाराओं (कांग्रेस, इंडिकेट, सिंडीकेट, जनसंघ, साम्यवादी, स्वतंत्र पार्टी, संसोपा-प्रसोपा) के पाखंड को बेनकाब किया है। प्रत्येक दल की अपनी स्वार्थी व्याख्या है, जो जनसमस्याओं के समाधान के बजाय एक-दूसरे पर दोषारोपण करने में लगी है। 'समाजवाद' की छीना-झपटी और उसे लहूलुहान करने वाले समाजवादियों का चित्रण राजनैतिक अवसरवाद पर करारा प्रहार है।

(घ) प्रशासनिक व्यंग्य और नौकरशाही: निबन्ध का अंतिम हिस्सा नौकरशाही (Bureaucracy) की कार्यप्रणाली पर केंद्रित है। समाजवाद के आगमन की घोषणा को एक 'फाइल' और 'वीआईपी' की तरह देखना और क्लर्कों (तिवारी बाबू) द्वारा कागज दबा लेना, यह दर्शाता है कि कोई भी क्रांतिकारी विचार फाइलों के जाल में कैसे दम तोड़ देता है। सचिवों और कलेक्टरों की टालमटोल वाली भाषा शासन-व्यवस्था की निष्क्रियता का सजीव चित्रण है।

(ङ) भाषा-शैली और मारक क्षमता: परसाई जी की भाषा अत्यंत सरल किन्तु मारक है। वे 'टाट-पट्टी खाना' और 'गृह-उद्योग के रूप में दंगे' जैसे मुहावरों के माध्यम से व्यवस्था की नग्नता को उजागर करते हैं। उनकी शैली सीधी और तार्किक है, जो पाठक को केवल हँसाती नहीं बल्कि सोचने पर विवश करती है। यह निबन्ध स्वतंत्र भारत के मोहभंग का दस्तावेज है, जहाँ उत्सव तो मनाए जा रहे हैं, किन्तु गणतंत्र की आत्मा ठिठुर रही है।

५. कठिन शब्दावली

क्रूर = निर्दयी/कठोर, अर्थनीति = अर्थव्यवस्था, अंतरिक्ष = आकाश, सिण्डीकेट = कांग्रेस का पुराना धड़ा, इंडिकेट = कांग्रेस का नया धड़ा, अड़ंगा = बाधा, सेक्युलर = धर्मनिरपेक्ष, अंशुमाली = सूर्य, षडयंत्र = साजिश, पिछलग्गू = पीछे चलने वाला/अनुकरणकर्ता, पेचीदा = उलझा हुआ, गनीमत = राहत/संतोष की बात, कपटी = धोखेबाज, करतल-ध्वनि = तालियों की गूँज, प्रतिनिधित्व = अगुवाई करना, मोटो = आदर्श वाक्य (ध्येय), गृह-उद्योग = घर पर चलने वाला व्यापार, घपले = घोटाला, मास्टर रोल = उपस्थिति रजिस्टर, प्रतिबद्ध = वचनबद्ध/डेडीकेटेड, सहकारिता = मिल-जुलकर काम करना, स्पिरिट = भावना/जज्बा, फरमान = आदेश, वीआईपी = अति विशिष्ट व्यक्ति, मुल्तवी = स्थगित/टाला जाना, ऐतराज = आपत्ति, ऐतिहासिक = इतिहास संबंधी, संसोपा = संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, प्रसोपा = प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, महोदय = आदरणीय, ठौर = स्थान, बेदम = थका हुआ, निर्मूलन = जड़ से खत्म करना, गुबार = मन का क्रोध, अरुणोदय = सूर्योदय, प्रज्ञा = बुद्धि, विशीर्ण = टूटा-फूटा, विद्रुम = मूंगा, प्रलाप = व्यर्थ की बात,

६. परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्र. 1. लेखक ने गणतंत्र को 'ठिठुरता हुआ' क्यों कहा है?

उत्तर : लेखक ने 'ठिठुरन' को गरीबी, अभाव और राजनैतिक उदासीनता के प्रतीक के रूप में उपयोग किया है। गणतंत्र दिवस के उत्सव में आम जनता ठंड में ठिठुर रही है, जबकि सत्तासीन लोग केवल दिखावे में व्यस्त हैं।

प्र. 2. गणतंत्र समारोह में तालियाँ कौन बजा रहा है और लेखक उस पर क्या व्यंग्य करता है?

उत्तर : तालियाँ वे गरीब लोग बजा रहे हैं जिनके पास कोट नहीं है और जो हाथ गरम करने के लिए तालियाँ बजा रहे हैं। लेखक व्यंग्य करता है कि हमारा गणतंत्र इन्हीं अभावग्रस्त हाथों की तालियों पर टिका है।

प्र. 3. 'सूर्य' के न निकलने के पीछे विभिन्न राजनैतिक दलों के क्या तर्क हैं?

उत्तर : कांग्रेस सौ साल मांगती है, सिंडीकेट कम्युनिस्टों को दोष देता है, जनसंघी इसे 'सेक्युलर सूर्य' न होना बताते हैं और साम्यवादी इसे सीआईए का षडयंत्र मानते हैं। यह राजनैतिक दलों की अवसरवादिता को दिखाता है।

प्र. 4. लेखक झाँकियों के बारे में क्या सुझाव देता है?

उत्तर : लेखक सुझाव देता है कि झाँकियों में विकास के बजाय वे सच्ची घटनाएँ दिखानी चाहिए जिसके कारण राज्य मशहूर हुआ, जैसे—दंगे, नरसंहार, अकाल-राहत घपले और भ्रष्टाचार के दृश्य।

प्र. 5. 'सत्यमेव जयते' और झाँकियों के बीच क्या अंतर्विरोध है?

उत्तर : भारत का मोटो 'सत्यमेव जयते' है, किन्तु गणतंत्र की झाँकियाँ 'झूठ' बोलती हैं क्योंकि वे राज्यों की असली समस्याओं और कड़वे सच को छिपाकर केवल झूठी प्रगति दिखाती हैं।

प्र. 6. समाजवाद 'टीले' पर क्यों खड़ा है और उसे बस्ती में क्यों नहीं लाया जा पा रहा?

उत्तर : समाजवाद टीले पर इसलिए खड़ा है क्योंकि विभिन्न समाजवादी दल आपस में लड़ रहे हैं कि उसका हाथ पकड़कर कौन लाएगा। उनकी आपसी छीना-झपटी ने समाजवाद को लहूलुहान कर दिया है।

प्र. 7. लेखक ने अंग्रेजों की तुलना 'कपटी प्रेमी' से क्यों की है?

उत्तर : क्योंकि अंग्रेज भारत को भरी बरसात (अव्यवस्थित समय) में स्वतंत्र कर गए और जाते-जाते सारे संसाधन (छाता) भी साथ ले गए, जिससे स्वतंत्रता दिवस भीगता हुआ प्रतीत होता है।

प्र. 8. 'टाट-पट्टी कांड' के माध्यम से लेखक ने किस राज्य और किस समस्या पर व्यंग्य किया है?

उत्तर : लेखक ने अपने राज्य मध्यप्रदेश के स्कूलों में हुए भ्रष्टाचार पर व्यंग्य किया है, जहाँ अफसर और मंत्री विकास के संसाधनों (टाट-पट्टी) को ही डकार जाते हैं।

प्र. 9. सरकारी दफ्तरों में 'समाजवाद' का क्या हश्र होने की कल्पना लेखक ने की है?

उत्तर : लेखक कल्पना करता है कि समाजवाद की फाइलें बाबुओं द्वारा दबा दी जाएँगी, अफसर सुरक्षा देने में असमर्थता जताएँगे और अंततः उसके आगमन को मुल्तवी (स्थगित) कर दिया जाएगा।

प्र. 10. इस निबन्ध का मुख्य संदेश क्या है?

उत्तर : मुख्य संदेश यह है कि जब तक व्यवस्था में ईमानदारी, पारदर्शिता और गरीबों के प्रति संवेदना नहीं होगी, तब तक गणतंत्र केवल एक 'ठिठुरता' हुआ ढाँचा बना रहेगा और समाजवाद केवल कागजों तक सीमित रहेगा।

साहित्य विश्लेषण श्रृंखला · 'ठिठुरता हुआ गणतंत्र' · सर्वाधिकार सुरक्षित

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