कवि और कविता — महावीर प्रसाद द्विवेदी
महावीर प्रसाद द्विवेदी के विचारप्रधान निबन्ध ‘कवि और कविता’ का मूल पाठ, निबन्धकार का परिचय, निबन्ध का सारांश तथा निबन्ध-तत्त्वों के आधार पर निबन्ध की समीक्षा।
मूल निबन्ध
यह बात सिद्ध समझी गयी है कि अच्छी कविता अभ्यास से नहीं आती। जिसमें कविता करने का स्वाभाविक माद्दा होता है वही कविता कर सकता है। देखा गया है कि जिस विषय पर बड़े-बड़े विद्वान अच्छी कविता नहीं कर सकते उसी पर अपढ़ और कम उम्र के लड़के कभी-कभी अच्छी कविता लिख देते हैं। इससे स्पष्ट है कि किसी-किसी में कविता लिखने की इस्तेदाद स्वाभाविक होती है, ईश्वरदत्त होती है। जो चीज ईश्वरदत्त है वह अवश्य लाभदायक होगी। वह निरर्थक नहीं हो सकती। इसमें समाज को कुछ न कुछ लाभ अवश्य पहुँचता है। अतएव कोई यह समझता हो कि कविता करना व्यर्थ है तो वह इसकी भूल है, हाँ कविता के लक्षणों से च्युत तुले हुए वर्णों या मात्राओं की पद्य नामक पंक्तियाँ व्यर्थ हो सकती हैं। आजकल पद्यमालाओं का प्राचुर्य है। इससे यदि कविता को कोई व्यर्थ समझे तो आश्चर्य नहीं होगा।
कविता यदि यथार्थ में कविता है तो संभव नहीं कि उसे सुनकर सुनने वाले पर कुछ असर न हो। कविता से दुनिया में आज तक बहुत बड़े-बड़े काम हुए हैं। इस बात के प्रमाण मौजूद हैं। अच्छी कविता सुनकर कवितागत रस के अनुसार दुःख, शोक, क्रोध, करुणा और जोश आदि भाव पैदा हुए बिना नहीं रहते। जैसा भाव मन में पैदा होता है कार्य के रूप में फल भी वैसा ही होता है। हम लोगों में पुराने जमाने में भाट, चारण आदि अपनी कविता ही की बदौलत वीरता का संचार कर देते थे। पुराणादि में कारुणिक प्रसंगों का वर्णन सुनने और उत्तररामचरित आदि दृश्य काव्यों का अभिनय देखने से जो अश्रुपात होने लगता है वह क्या है? वह अच्छी कविता का ही प्रभाव है।
संसार में जो बात जैसी दीख पड़े कवि को उसे वैसी ही वर्णन करना चाहिए। उसके लिए किसी तरह की रोक या पाबन्दी का होना अच्छा नहीं। दबाव से कवि का अंश दब जाता है। उसके मन में जो भाव आप ही आप पैदा होते हैं उन्हें जब वह निडर होकर अपनी कविता में प्रकट करता है तभी उसका असर लोगों पर पूरा-पूरा पड़ता है। बनावट से कविता बिगड़ जाती है। किसी राजा या किसी व्यक्ति विशेष के गुण-दोषों को देख कर कवि के मन में जो भाव उद्भूत हों उन्हें यदि वह बेरोक-टोक प्रकट कर दे तो उसकी कविता हृदयद्रावक हुए बिना न रहे, परन्तु परतन्त्रता या पुरस्कार प्राप्ति या और किसी कारण से, यदि उसे अपने मन की बात कहने का साहस नहीं होता तो, कविता का रस जरूर कम हो जाता है। इस दशा से अच्छे कवियों की भीरविता नीरस, अतएव प्रभावहीन हो जाती है। सामाजिक और राजनीतिक विषयों में कटु होने के कारण, सच कहना भी जहाँ मना है वहाँ इन विषयों पर कविता करने वाले कवियों की उक्तियों का प्रभाव क्षीण हुए बिना नहीं रहता। कवि के लिए कोई रोक न होनी चाहिए अथवा जिस विषय पर रोक हो उस विषय पर कविता ही न लिखनी चाहिए। नदी, तालाब, वन, पर्वत, फूल, पत्ती, गरमी, सरदी आदि के ही वर्णन से उसे संतोष करना उचित है।
खुशामद के जमाने में कविता की बुरी हालत होती है। जो कवि राजों, नबाबों या बादशाहों के आश्रय में रहते हैं, अथवा उनको खुश करने के इरादे से कविता करते हैं, उनको खुशामद करनी पड़ती है। वे अपने आश्रयदाताओं की इतनी प्रशंसा करते हैं, इतनी स्तुति करते हैं कि उनकी उक्तियाँ असलियत से बहुत दूर जा पड़ती हैं। इससे कविता को बहुत हानि पहुँचती है। विशेष करके शिक्षित और सभ्य देशों में कवि का काम प्रभावोत्पादक रीति से यथार्थ घटनाओं का वर्णन करना है। आकाश-कुसुमों के गुलदस्ते तैयार करना नहीं। अलंकारशास्त्र के आचार्यों ने अतिशयोक्ति एक अलंकार जरूर माना है परन्तु अभावोक्तियाँ भी क्या कोई अलंकार है, किसी कवि की बेसिर-पैर की बातें सुनकर किस समझदार आदमी को आनन्द-प्राप्ति हो सकती है? जिस समाज के लोग अपनी झूठी प्रशंसा सुनकर प्रसन्न होते हैं वह समाज कभी प्रशंसनीय नहीं समझा जाता।
कारणवश अमीरों की झूठी प्रशंसा करने, अथवा किसी एक ही विषय की कविता में कवि समुदाय के आमरण लगे रहने से कविता की सीमा कट-छँट कर बहुत थोड़ी रह जाती है। इस तरह की कविता उर्दू में बहुत अधिक है। यदि यह कहें कि आशिकाना अर्थात श्रृंगारिक कविता के सिवा और तरह की कविता उर्दू में है ही नहीं, तो बहुत बड़ी अत्युक्ति न होगी। किसी दीवान को उठाइए, किसी मसनवी को उठाइए, आशिक-माशूकों के रंगीन रहस्यों से आप उसे आरम्भ से अन्त तक रंगी हुई पाइएगा। इश्क भी यदि सच्चा हो तो कविता में कुछ असलियत आ सकती है। पर क्या कोई कह सकता है कि आशिकाना शेर कहने वालों का सारा रोना, कराहना, ठंडी साँसे लेना, जीते जी अपनी कब्रों पर चिराग जलाना सब सच है? सब न सही, उनके प्रलापों का क्या थोड़ा सा भी अंश सच है? फिर, इस तरह की कविता सैकड़ों वर्षों से होती आ रही है। अनेक कवि हो चुके, जिन्होंने इस विषय पर न मालूम क्या-क्या लिख डाला है। इस दशा में नये कवि अपनी कविता में नयापन कैसे ला सकते हैं? वही तुक, वही छन्द, वही शब्द, वही उपमा, वही रूपक। इस पर भी लोग पुरानी लकीर को बराबर पीटते जाते हैं। कवित्त, सवैये, घनाक्षरी, दोहे-सोरठे लिखने से बाज नहीं आते। नख-शिख, नायिका-भेद, अलंकारशास्त्र पर पुस्तकों पर पुस्तकें लिखते चले जाते हैं। अपनी व्यर्थ बनावटी बातों से देवी-देवताओं तक को बदनाम करने से नहीं सकुचाते। फल इसका यह हुआ है कि कविता की असलियत काफूर हो गई है। उसे सुनकर सुनने वाले के चित्त पर कुछ भी असर नहीं होता, उल्टा कभी मन में घृणा का उद्रेक अवश्य उत्पन्न हो जाता है।
साहित्य के बिगड़ने और उसकी सीमा परिमित हो जाने से साहित्य पर भारी आघात होता है। यह बरबाद हो जाता है। भाषा में दोष आ जाता है। जब कविता की प्रणाली बिगड़ जाती है तब उसका असर सारे ग्रन्थकारों पर पड़ता है। यही क्यों, साधारण तक की बोलचाल तक में कविता के दोष आ जाते हैं। जिन शब्दों, जिन भावों, जिन उक्तियों का प्रयोग कवि करते हैं उन्हीं का प्रयोग और लोग भी करने लगते हैं। भाषा और बोलचाल के सम्बन्ध में कवि ही प्रमाण माने जाते हैं, कवियों ही के प्रयुक्त शब्दों और मुहावरों को कोशकार अपने कोशों में रखते हैं, मतलब यह है कि भाषा और बोलचाल का बनना और बिगड़ना प्रायः कवियों के हाथ में ही रहता है। जिस भाषा के कवि अपनी कविता में बुरे शब्द और बुरे भाव भरते रहते हैं, उस भाषा की उन्नति तो होती नहीं, उल्टी अवनति हो जाती है।
कविता प्रणाली के बिगड़ जाने पर कोई नए तरह की स्वाभाविक कविता करने लगता है तो लोग उसकी निन्दा करते हैं। कुछ नासमझ और नादान आदमी कहते हैं यह बड़ी भद्दी कविता है। कुछ कहते हैं यह कविता ही नहीं। कुछ कहते हैं कि यह कविता तो छन्दोदिवाकर में दिये लक्षणों में च्युत है अतएव यह निर्दोष नहीं। बात यह है कि जिसे अब तक कविता कहते आते हैं वही उनकी समझ में कविता है और सब कोरी काँव-काँव। इसी तरह की नुक्ताचीनी से तंग आकर अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि गोल्डस्मिथ ने अपनी कविता को संबोधन करके उसकी सान्त्वना की है। वह कहता है कविते यह बेकदरी का जमाना है। लोगों के चित्त तेरी तरफ खिंचने तो दूर रहे उल्टी सब कहीं तेरी निन्दा होती है। तेरी बदौलत सभा समाजों और जलसों में मुझे लज्जित होना पड़ता है। पर जब मैं अकेला होता हूँ तो तब तुझ पर मैं घमण्ड करता हूँ। याद रख तेरी उत्पत्ति स्वाभाविक है। जो लोग अपने प्राकृतिक बल पर भरोसा रखते हैं वे निर्धन होकर भी आनन्द से रह सकते हैं पर अप्राकृतिक बल पर किया गया गर्व कुछ दिन बाद जरूर चूर्ण हो जाता है।
गोल्डस्मिथ ने इस विषय में बहुत कुछ कहा है पर हमने उसके कथन का सारांश बहुत ही थोड़े शब्दों में दे दिया है। इससे प्रकट है कि नई कविता प्रणाली पर भृकुटी टेढ़ी करने वाले कवि प्रकाण्डों के कहने की कुछ भी परवाह न करके अपने स्वीकृत पथ से जरा भी इधर-उधर होना उचित नहीं। कई बातों से घबराना और उनके पक्षपातियों की निन्दा करना मनुष्य का स्वभाव सा ही हो गया है। अतएव नयी भाषा और नयी कविता पर यदि कोई नुक्ताचीनी करे तो कोई आश्चर्य नहीं।
आजकल लोगों ने कविता और पद्य को एक ही चीज समझ रखा है, यह भ्रम है। कविता और पद्य में वही भेद है जो अंग्रेजी की पोयेट्री और वर्स में है। किसी प्रभावोत्पादक और मनोरंजन लेख, बात या वक्तृता का नाम कविता है और नियमानुसार तुली हुई सतरों का नाम पद्य है। जिस पद्य को पढ़ने या सुनने से चित्त पर असर नहीं होता वह कविता नहीं, वह नपी-तुली शब्दस्थापना मात्र है। गद्य और पद्य दोनों में कविता हो सकती है। तुकबन्दी और अनुप्रास कविता के लिए अपरिहार्य नहीं। संस्कृत का प्रायः सारा पद्य समूह बिना तुकबन्दी का है और संस्कृत से बढ़कर कविता शायद ही किसी और भाषा में हो। अरब में भी सैकड़ों अच्छे-अच्छे कवि हो गये हैं। वहाँ भी शुरू-शुरू में तुकबन्दी का बिलकुल ख्याल न था। अंग्रेजी में भी अनुप्रासहीन बेतुकी कविता होती है। हाँ एक बात जरूर है कि वजन और काफिये से कविता अधिक चित्ताकर्षक हो जाती है। पर कविता के लिए ये बातें ऐसी ही हैं जैसे कि शरीर के लिए वस्त्राभरण। यदि कविता का प्रधान धर्म मनोरंजकता और प्रभावोत्पादकता उसमें न हो तो इसका होना निष्फल समझना चाहिए। पद्य के काफिये वगैरह की जरूरत है कविता के लिए नहीं। कविता के लिए तो ये बातें एक प्रकार से उल्टा हानिकारक हैं। तुले हुए शब्दों में कविता करने और तुक, अनुप्रास आदि ढूँढ़ने से कवियों के विचार स्वातन्त्र्य में बड़ी बाधा आती है। पद्य के नियम कवि के लिए एक प्रकार की बेड़ियाँ हैं। उनके जकड़ जाने से कवियों को अपने स्वाभाविक उड़ान में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कवि का काम है कि वह अपने मनोभावों को स्वाधीनतापूर्वक प्रकट करे पर काफिये और वजन उसकी स्वाधीनता में विघ्न डालते हैं। वे उसे अपने भावों को स्वतंत्रतापूर्वक नहीं प्रकट होने देते। काफिये और वजन को पहले ढूँढ़कर कवि को मनोभाव तदनुकूल गढ़ने पड़ते हैं। इसका यह मतलब हुआ कि प्रधान बात अप्रधानता को प्राप्त हो जाती है और एक बहुत ही गौण बात प्रधानता के आसन पर जा बैठती है। इससे कवि अपने भाव स्वतंत्रतापूर्वक नहीं प्रकट कर सकता। फल यह होता है कि कवि की कविता का असर कम हो जाता है। कभी-कभी तो यह बिलकुल ही जाता रहता है। अब आप ही कहिये कि जो वजन और काफिया कविता के लक्षण का कोई अंश नहीं उन्हें ही प्रधानता देना भारी भूल है या नहीं।
कवि का सबसे बड़ा गुण नई-नई बातों का सूझना है। उसके लिए कल्पना की बड़ी जरूरत है। जिसमें जितनी अधिक यह शक्ति होगी वह उतनी ही अच्छी कविता लिख सकेगा। कविता के लिए उपज चाहिए, नये-नये भावों की उपज जिसके हृदय में ही नहीं वह कभी अच्छी कविता नहीं लिख सकता। ये बातें प्रतिभा की बदौलत होती हैं। इस लिए संस्कृत वालों ने प्रतिभा को प्रधानता दी है। प्रतिभा ईश्वरदत्त होती है। अभ्यास से वह नहीं प्राप्त होती है। इसी की बदौलत वह भूत और भविष्यत् को हस्तामलकवत् देखता है, वर्तमान की तो कोई बात ही नहीं। इसी की कृपा से वह सांसारिक बातों को एक अजीव निराले ढंग से बयान करता है जिसे सुनकर सुनने वाले के हृदयोदधि में नाना प्रकार के सुख, दुःख, आश्चर्य आदि विकारों की लहरें उठने लगती हैं। कवि कभी-कभी ऐसी अद्भुत बातें कह देते हैं कि जो कवि नहीं है उनकी पहुँच वहाँ तक कभी हो ही नहीं सकती।
कवि का काम है कि वह प्राकृतिक विकास को खूब ध्यान से देखे। प्रकृति की लीला का कोई ओर-छोर नहीं। वह अनन्त है। प्रकृति अद्भुत-अद्भुत खेल खेला करती है। एक छोटे से फूल में वह अजीब-अजीब कौशल दिखाती है। वे साधारण आदमियों के ध्यान में नहीं आते। वे उनको समझ ही नहीं सकते। पर कवि अपनी सूक्ष्म दृष्टि से प्रकृति के कौशल अच्छी तरह देख लेता है, उनका वर्णन भी करता है, उससे नाना प्रकार की शिक्षा भी ग्रहण करता है और अपनी कविता के द्वारा संसार को लाभ भी पहुँचाता है। जिस कवि में प्राकृतिक दृश्य और प्रकृति के कौशल देखने और समझने का जितना भी अधिक ज्ञान होता है वह उतना बड़ा कवि भी होता है। कवि-कुल-गुरु कालिदास में विश्व-विख्यात काव्य रघुवंश तथा कविवर बिहारी लाल की सतसई से विषय का एक-एक प्रत्युदाहरण सुनिए—
इक्षुच्छायनिषादिन्यस्तस्य गोप्तुर्गुणोदयम्।
आकुमारकखोद्घातं शालिगोप्यो जगुर्यशः।।
— रघुवंश
रघु की दिग्विजय यात्रा के उपोद्घात में शरदृतु का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि ईख की छाया में बैठी हुई धान रखने वाली स्त्रियाँ रघु का यश गाती थीं। शरत् काल में जब धान के खेत पकते हैं, तब ईख इतनी-इतनी बड़ी हो जाती है कि उसकी छाया में बैठकर खेत रख सकें। ईख और धान के खेत प्रायः पास ही पास हुआ करते हैं। कवि को ये सब बातें विदित थीं। श्लोक पढ़ते ही वह समाँ आँखों में फिरने लगता है।
महाराजाधिराज विक्रमादित्य के सखा राजसी ठाठ से रहने वाले कालिदास ने गरीब किसानों की, नगर से दूर जंगल में सम्बन्ध रखने वाली एक वास्तविक घटना का कैसा मनोहर चित्र उतारा है। यह उसके प्रकृति पर्यालोचक होने का दृढ़ प्रमाण है। दूसरा प्रत्युदाहरण—
सन सूक्यौ बीत्यौ बनौ ऊखौ लई उखरि।
हरी-हरी अरहर अजौं धर घर हर हिय नारि।।
— सतसई
पहले सन सूखता है, फिर बन-बाड़ी या कपास के खेत की बहार खत्म होती है। पुनः ईख उखड़ने की बारी आती है और इन सबसे पीछे गेहुँओं के साथ तक अरहर हरी-भरी खड़ी रहती है।
प्रकृति पर्यालोचना के सिवा कवि को मानव स्वभाव की आलोचना का अभ्यास करना चाहिए। उसकी दशा कभी एक सी नहीं रहती। अनेक प्रकार के विकार तरंग उसके मन में उठा ही करते हैं। इन विकारों की जाँच, ज्ञान और अनुभव करना सबका काम नहीं। केवल कवि ही इनके अनुभव करने और कविता द्वारा औरों को इनका अनुभव कराने में समर्थ होता है। जिसे कभी पुत्र शोक नहीं हुआ उसे उस शोक का यथार्थ ज्ञान होना सम्भव नहीं। पर यदि वह कवि है तो वह पुत्र शोकाकुल पिता या माता की आत्मा में प्रवेश सा करके उसका अनुभव कर लेता है। उस अनुभव का वह इस तरह वर्णन करता है कि सुनने वाला तन्मनस्क होकर उस दुःख से अभिभूत हो जाता है। उसे ऐसा मालूम होने लगता है कि स्वयं उसी पर वह दुःख पड़ रहा है। जिस कवि को मनोविकारों और प्राकृतिक बातों का यथेष्ट ज्ञान नहीं वह कदापि अच्छा कवि नहीं हो सकता।
कविता को प्रभावोत्पादक बनाने के लिए उचित शब्द-स्थापना की भी बड़ी जरूरत होती है। किसी मनोविकार या दृश्य के वर्णन में ढूँढ़-ढूँढ़ कर ऐसे शब्द रखने चाहिए जो सुनने वालों की आँखों के सामने वर्ण्य विषय का चित्र सा खींच दे। मनोभाव चाहे कैसा ही अच्छा क्यों न हो, यदि वह तदनुकूल शब्दों में न प्रकट किया गया तो उसका असर यदि जाता नहीं रहता तो कम जरूर हो जाता है। इसीलिए कवि को चुन-चुन कर ऐसे शब्द रखने चाहिए और इस क्रम से रखने चाहिए, जिससे उसके मन का भाव पूरे तौर पर व्यक्त हो जाय। उस पर कसर न पड़े। मनोभाव शब्दों ही के द्वारा व्यक्त होता है। अतएव युक्तिसंगत शब्द स्थापना के बिना कवि की कविता तादृश्य जानता अथवा यों कहिए कि उसके पास काफी शब्द समूह नहीं है कि किस शब्द में उनका भाव प्रकट करने की एक बाल भर की कमी होती है, उसका वे कभी प्रयोग नहीं करते। आजकल पद्य रचनाकर्ता महाशयों को इस बात का बहुत कम ख्याल रहता है इसी से उनकी कविता, यदि अच्छे भाव से भरी हुई भी हो तो भी बहुत कम असर पैदा करती है। जो कवि प्रति पंक्ति में निरर्थक सु, जु और रु का प्रयोग करता है, वह मानों इस बात का खुद ही सर्टिफिकेट दे रहा है कि मेरे अधिकृत शब्दकोष में शब्दों की कमी है। ऐसे कवियों की कविता सर्व-सम्मत और प्रभावोत्पादक नहीं हो सकती।
अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि मिल्टन ने कविता के तीन गुण वर्णन किये हैं। उनकी राय है कि कविता सादी हो, जोश से भरी हो और असलियत से गिरी हुई न हो।
सादगी से यह मतलब नहीं कि सिर्फ शब्द-समूह ही सादा हो, किन्तु विचार परम्परा भी सादी हो, भाव और विचार ऐसे सूक्ष्म और छिपे हुए न हों कि उनका मतलब समझ में न आवे, या देर से समझ आवे। यदि कविता में कोई ध्वनि हो तो इतनी दूर की न हो जो उसे समझने में गहरे विचार की जरूरत हो। कविता पढ़ने या सुनने वाले को ऐसी साफ-सुथरी सड़क मिलनी चाहिए जिस पर कंकड़, पत्थर, टीले, खंदक, काँटे और झाड़ियों का नाम न हो। वह खूब साफ और हमवार हो, जिससे उस पर चलने वाला आराम से चला जाय। जिस तरह सड़क जरा भी ऊँची-नीची हो तो बाइसिकल के सवार को दचके लगते हैं, उसी तरह यदि कविता की सड़क थोड़ी भी नाहमवार हुई तो पढ़ने वाले के हृदय पर धक्का लगे बिना नहीं रहता। कविता रूपी सड़क के इधर-उधर स्वच्छ पानी के नदी-नाले बहते हों, दोनों तरफ फल-फूलों से लदे हुए पेड़ हों, जगह-जगह पर विश्राम करने योग्य स्थान बने हों, प्राकृतिक दृश्यों की नई-नई झाँकियाँ आँखों को लुभाती हों। दुनिया में आज तक जितने भी अच्छे-अच्छे कवि हुए हैं उनकी कविता ऐसी ही देखी गयी है। अटपटे भाव और अटपटे शब्द प्रयोग करने वाले कवियों की कद्र नहीं हुई। यदि कभी किसी की कुछ हुई भी है तो थोड़े ही दिनों तक ऐसे कवि विस्मृत के अन्धकार में ऐसे छुप गये हैं कि इस समय उनका कोई नाम तक नहीं जानता। एकमात्र सूची शब्द झंकार की जिन कवियों की करामात है उन्हें चाहिए कि वे एकदम ही बोलना बन्द कर दें।
भाव चाहे कैसा ही ऊँचा क्यों न हो, पेचीदा न होना चाहिए। वह ऐसे शब्दों के द्वारा प्रकट किया जाना चाहिए जिनसे सब लोग परिचित हों। मतलब यह कि भाषा बोलचाल की हो। क्योंकि कविता की भाषा बोलचाल से जितनी ही अधिक दूर जा पड़ती है, उतनी ही उसकी सादगी कम हो जाती है। बोलचाल से मतलब उस भाषा से है जिसे खास और आम सब बोलते हैं, विद्वान और अविद्वान दोनों जिसे काम में लाते हैं। इसी तरह कवि को मुहावरों का भी ख्याल रखना चाहिए। जो मुहाविरा सर्वसम्मत है, उसी का प्रयोग करना चाहिए। हिन्दी में कुछ शब्द अन्य भाषाओं के भी आ गए हैं। वे यदि बोलचाल के हैं तो उनका प्रयोग सदोष नहीं माना जा सकता। उन्हें त्याज्य नहीं समझना चाहिए। कोई-कोई ऐसे शब्दों को उनके मूल रूप में लिखना ही सही समझते हैं पर यह उनकी भूल है। जब अन्य भाषा का कोई शब्द किसी और भाषा में आ जाता है, तब वह उसी भाषा का हो जाता है। अतएव उसे उसकी मूल भाषा के रूप में लिखते जाना ही भाषा विज्ञान के नियमों के खिलाफ है।
असलियत से मतलब नहीं कि कविता एक प्रकार का इतिहास समझा जाय और हर बात में सच्चाई का ख्याल रखा जाय। यह नहीं कि सच्चाई की कसौटी पर यदि कुछ भी कसर मालूम हो तो कविता का वितापन जाता रहे। असलियत से सिर्फ इतना ही मतलब है कि कविता बेबुनियाद न हो, उसमें जो उक्ति हो वह मानवी मनोविकारों और प्राकृतिक नियमों के आधार पर कही गई हो। स्वाभाविकता से उसका लगाव न छूटा हो। क्योंकि स्वाभाविक अर्थात नेचुरल (Natural) उक्तियाँ ही सुनने वाले के हृदय पर असर कर सकती हैं, अस्वाभाविक नहीं। असलियत को लिए हुए कवि स्वतंत्रतापूर्वक जो चाहे कह सकता है, असल बात को एक नये साँचे में ढाल कर कुछ दूर इधर-उधर भी उड़ान भर सकता है, पर असलियत के लगाव को वह नहीं छोड़ता। असलियत को हाथ से जाने देना मानो कविता को प्रायः निर्जीव कर डालना है। शब्द और अर्थ दोनों ही के सम्बन्ध में उसे स्वाभाविकता का अनुधावन करना चाहिए। जिस बात के कहने में लोग स्वाभाविक रीति का जैसे और जिस क्रम से शब्द प्रयोग करते हैं वैसे ही कवि को भी करना चाहिए। कविता में कोई बात ऐसी न कहनी चाहिए जो दुनिया में न होती हो। जो बातें हमेशा हुआ करती हैं अथवा जिन बातों का होना सम्भव है, वही स्वाभाविक हैं।
जोश से मतलब है कि कवि जो कहे इस तरह कहे मानों उसके प्रयुक्त शब्द आप ही आप उसके मुँह से निकल गये हैं। उनसे बनावट न जाहिर हो। यह न मालूम हो कि कवि ने कोशिश करके ये बातें कही हैं, किन्तु यह मालूम हो कि उसके हृदयगत भावों ने कविता के रूप में अपने को प्रकट कराने के लिए उसे विवश किया है। जो कवि है, उसमें जोश स्वाभाविक होता है। वर्ण्य वस्तु को देखकर, किसी अदृश्य शक्ति की प्रेरणा से वह उस पर कविता करने के लिए विवश सा हो जाता है। उसमें एक अलौकिक शक्ति पैदा हो जाती है। इसी शक्ति के बल से वह सजीव ही नहीं निर्जीव चीजों तक का वर्णन ऐसे प्रभावोत्पादक ढंग से करता है कि यदि उन चीजों में बोलने की शक्ति होती तो खुद वे भी उससे अच्छा वर्णन न कर सकतीं।
सादगी, असलियत और जोश यदि ये तीनों गुण कविता में हों तो कहना ही क्या है परन्तु बहुधा अच्छी कविता में भी इनमें से एकाध गुण की कमी पाई जाती है। कभी-कभी देखा जाता है कि कविता में केवल जोश रहता है, सादगी और असलियत नहीं। परन्तु बिना असलियत के जोश का होना बहुत कठिन है। अतएव कवि को असलियत का सबसे अधिक ध्यान रखना चाहिए।
अच्छी कविता की सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि उसे सुनते ही लोग बोल उठें कि सच कहा। वही कवि सच्चे कवि हैं, जिनकी कविता सुनकर लोगों के मुँह से सहसा यह उक्ति निकलती है, ऐसे कवि धन्य हैं और जिस देश में ऐसे कवि पैदा होते हैं वह देश भी धन्य है। ऐसे ही कवियों की कविता चिरकाल तक जीवित रहती है।
निबन्धकार का परिचय
महावीर प्रसाद द्विवेदी (1864–1938) हिन्दी साहित्य के युग-प्रवर्तक निबन्धकार, आलोचक और साहित्य-सुधारक थे। उन्होंने आधुनिक हिन्दी गद्य को व्यवस्थित, अनुशासित और विचारप्रधान स्वरूप प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।
वे प्रसिद्ध पत्रिका ‘सरस्वती’ के सम्पादक रहे और उनके सम्पादनकाल में हिन्दी साहित्य में भाषा-शुद्धि, विचार-गम्भीरता, सामाजिक चेतना तथा साहित्यिक अनुशासन को विशेष महत्त्व मिला।
उनके प्रमुख निबन्धों में ‘कवि और कविता’, ‘साहित्य का उद्देश्य’, ‘हिन्दी भाषा’ आदि उल्लेखनीय हैं। उनके साहित्य में सुधारवादी, यथार्थवादी और नैतिक दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
निबन्ध का सारांश
लेखक के अनुसार अच्छी कविता अभ्यास से नहीं आती, उसमें कविता करने का स्वाभाविक माद्दा और ईश्वरदत्त प्रतिभा होती है। कविता व्यर्थ नहीं है, क्योंकि उसका समाज पर कुछ न कुछ प्रभाव अवश्य पड़ता है। अच्छी कविता सुनकर दुःख, शोक, क्रोध, करुणा और जोश आदि भाव पैदा होते हैं और जैसा भाव मन में पैदा होता है कार्य के रूप में फल भी वैसा ही होता है।
कवि को संसार में जो बात जैसी दिखाई पड़े, उसे वैसी ही वर्णन करना चाहिए। बनावट, खुशामद, परतन्त्रता और पुरस्कार की इच्छा कविता के प्रभाव को कम करती है। कवि का काम आकाश-कुसुमों के गुलदस्ते तैयार करना नहीं, बल्कि प्रभावोत्पादक रीति से यथार्थ घटनाओं का वर्णन करना है। कविता की सीमा को एक ही विषय तक सीमित कर देने और पुरानी लकीर को बराबर पीटते रहने से कविता की असलियत नष्ट हो जाती है।
लेखक कविता और पद्य को एक ही चीज मानने को भ्रम बताते हैं। कविता गद्य और पद्य दोनों में हो सकती है। तुकबन्दी, अनुप्रास, वजन और काफिया कविता के लिए अपरिहार्य नहीं हैं। कविता का प्रधान धर्म मनोरंजकता और प्रभावोत्पादकता है। पद्य के नियम यदि कवि के विचार-स्वातन्त्र्य में बाधा डालते हैं तो वे कविता के लिए हानिकारक हो सकते हैं।
कवि का सबसे बड़ा गुण नई-नई बातों का सूझना है। इसके लिए कल्पना, प्रतिभा और नये-नये भावों की उपज आवश्यक है। कवि को प्रकृति के कौशल और मानव स्वभाव के विकारों का सूक्ष्म ज्ञान होना चाहिए। उचित शब्द-स्थापना द्वारा वह अपने मनोभावों को पूरे तौर पर व्यक्त करता है और कविता को प्रभावोत्पादक बनाता है।
मिल्टन के मत का उल्लेख करते हुए लेखक कविता के तीन गुण सादगी, असलियत और जोश बताते हैं। कविता की भाषा बोलचाल की होनी चाहिए और भाव पेचीदा नहीं होने चाहिए। असलियत का अर्थ कविता का बेबुनियाद न होना तथा मानवीय मनोविकारों और प्राकृतिक नियमों के आधार पर स्वाभाविक उक्ति करना है। जोश का अर्थ है कि कवि के हृदयगत भाव स्वाभाविक रूप से कविता के रूप में प्रकट हों। अच्छी कविता की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि उसे सुनते ही लोग बोल उठें—सच कहा।
निबन्ध तत्वों के आधार पर निबन्ध की समीक्षा
- विषयवस्तु — निबन्ध का मुख्य विषय कविता का स्वरूप, कवि की प्रतिभा, कविता का उद्देश्य तथा उसकी प्रभावोत्पादकता है। लेखक ने कविता और पद्य के भेद, कविता में स्वाभाविकता, प्रकृति और मानव स्वभाव की आलोचना, उचित शब्द-स्थापना तथा कविता के गुणों पर विस्तार से विचार किया है।
- कविता का उद्देश्य — लेखक के अनुसार कविता व्यर्थ नहीं हो सकती। अच्छी कविता सुनने वाले के हृदय पर प्रभाव डालती है और उसके भीतर दुःख, शोक, क्रोध, करुणा तथा जोश आदि भाव पैदा करती है। जैसा भाव मन में पैदा होता है कार्य के रूप में फल भी वैसा ही होता है।
- कवि की प्रतिभा — कवि का सबसे बड़ा गुण नई-नई बातों का सूझना है। कविता के लिए कल्पना, उपज और प्रतिभा की आवश्यकता होती है। प्रतिभा ईश्वरदत्त होती है और अभ्यास से प्राप्त नहीं होती।
- स्वाभाविकता और असलियत — संसार में जो बात जैसी दीख पड़े कवि को उसे वैसी ही वर्णन करना चाहिए। बनावट और खुशामद से कविता बिगड़ जाती है। असलियत का अर्थ है कि कविता बेबुनियाद न हो और उसमें मानवीय मनोविकारों तथा प्राकृतिक नियमों के आधार पर स्वाभाविक उक्ति हो।
- प्रकृति और मानव स्वभाव — कवि को प्राकृतिक विकास और प्रकृति के कौशल को सूक्ष्म दृष्टि से देखना चाहिए। इसके साथ ही उसे मानव स्वभाव और मनोविकारों का भी यथेष्ट ज्ञान होना चाहिए। तभी वह अपने अनुभव को कविता द्वारा औरों को अनुभव करा सकता है।
- भाषा और शब्द-स्थापना — कविता को प्रभावोत्पादक बनाने के लिए उचित शब्द-स्थापना की बड़ी आवश्यकता है। कवि को चुन-चुन कर ऐसे शब्द रखने चाहिए जिनसे उसके मन का भाव पूरे तौर पर व्यक्त हो जाय। कविता की भाषा बोलचाल की होनी चाहिए और सर्वसम्मत मुहावरों का प्रयोग करना चाहिए।
- कविता के तीन गुण — मिल्टन के मत के अनुसार कविता सादी हो, जोश से भरी हो और असलियत से गिरी हुई न हो। लेखक भी सादगी, असलियत और जोश को अच्छी कविता के प्रमुख गुण मानते हैं।
- कविता और पद्य का भेद — कविता और पद्य एक ही चीज नहीं हैं। कविता प्रभावोत्पादक और मनोरंजक लेख, बात या वक्तृता भी हो सकती है, जबकि नियमानुसार तुली हुई सतरों का नाम पद्य है। गद्य और पद्य दोनों में कविता हो सकती है।
- संदेश — अच्छी कविता वही है जो स्वाभाविक, प्रभावोत्पादक, मनोरंजक और असलियत से युक्त हो। कवि को अपनी कविता में मनोभावों को स्वाधीनतापूर्वक प्रकट करना चाहिए तथा तुक, काफिया और बाहरी बनावट को कविता का प्रधान धर्म नहीं समझना चाहिए।

बहुत सुंदर विद्वता पूर्ण लेख है आदरणीय , मैं चंडीगढ़ से एक चेस्ट स्पेसलिस्ट व लेखक हूँ क्या आप मुझे इस लेख का अंश मेरे गजल सीएचएचएनडी पुस्तक में उद्धृत करने की अनुमति देंगे अगर हाँ तो कृपया अनुमति व यह लेख मेरे मेल venus01973@gmail भेजने का कष्ट करें
जवाब देंहटाएंयह लेख महावीर प्रसाद द्विवेदी जी का निबन्ध है, आप सब इसे अवश्य पढ़िए ।
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में" शनिवार 03 दिसम्बर 2022 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद! !
जवाब देंहटाएंकाव्य की आत्मा की सूक्ष्म अभिव्यक्ति।अनुपम लेख।🙏
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