2.ललित कलाएँ- श्याम सुन्दरदास

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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ललित कलाएँ - बाबू श्याम सुन्दरदास

ललित कलाएँ : विस्तृत समीक्षा, सारांश एवं प्रश्नोत्तर

प्रस्तुत लेख में प्रसिद्ध आलोचक और विद्वान बाबू श्याम सुन्दरदास द्वारा रचित निबन्ध 'ललित कलाएँ' का गहन विश्लेषण प्रस्तुत है। इसमें उपयोगी और ललित कलाओं के सूक्ष्म अंतर तथा कलाओं के श्रेणी-विभाजन के दार्शनिक आधार को स्पष्ट किया गया है।

निबन्ध : ललित कलाएँ
निबन्धकार : बाबू श्याम सुन्दरदास
युग : द्विवेदी युग (शुक्ल पूर्व काल)
विधा : विचारात्मक एवं विवेचनात्मक निबन्ध
मूल विषय : कला का स्वरूप, वर्गीकरण एवं सोपानक्रम
भाषा-शैली : तत्समप्रधान, गवेषणात्मक एवं तार्किक

१. निबन्धकार का परिचय

बाबू श्याम सुन्दरदास (1875–1945 ई.) आधुनिक हिन्दी साहित्य के आधारस्तंभों में से एक हैं। उन्होंने काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई और हिन्दी शब्दसागर जैसे महान कोश का संपादन किया। द्विवेदी युग के इस विद्वान ने हिन्दी आलोचना को एक व्यवस्थित और वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रथम विभागाध्यक्ष भी रहे। उनके निबन्ध मुख्य रूप से विचारात्मक और आलोचनात्मक होते हैं, जिनमें विषय की स्पष्टता और तार्किकता सर्वोपरि होती है। उन्होंने 'साहित्यालोचन', 'हिन्दी भाषा और साहित्य' जैसी कालजयी कृतियाँ दीं। श्याम सुन्दरदास जी का मानना था कि साहित्य और कला का उद्देश्य न केवल मनोरंजन है, बल्कि भाषा और संस्कृति का उत्थान भी है। उनकी शैली गंभीर, विश्लेषणात्मक और तत्समप्रधान है, जो विषय को गहराई से समझने में सहायक होती है।

२. मूल पाठ

प्राकृतिक सृष्टि में जो कुछ देखा जाता है, किसी न किसी रूप में वह सभी उपयोगों में आता है। ऐसी एक भी वस्तु नहीं, जिसमें उपादेयता का गुण वर्तमान न हो। यह संभव है कि बहुत-सी वस्तुओं के गुणों को हम अभी तक जान ना सके हों। पर ज्यों-ज्यों हमारा ज्ञान बढ़ता है हम उनके गुणों को अधिकाधिक जानते जाते हैं। प्राकृतिक पदार्थों में उपयोगिता के अतिरिक्त एक और भी गुण पाया जाता है। वह उनका सौंदर्य है। फल-फूलों, पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों, नदी-नालों, नक्षत्र-तारों आदि सभी में हम किसी न किसी प्रकार का सौंदर्य पाते हैं। इसका यह तात्पर्य नहीं है कि संसार में और अनुपयोगिता और कुरूपता का अस्तित्व ही नहीं। उपयोगिता और अनुपयोगिता, सुरूपता और कुरूपता सापेक्षिक हैं।

एक के अस्तित्व से ही दूसरे का अस्तित्व प्रकट होता है। एक के बिना दूसरे गुण का भाव मन में उत्पन्न नहीं हो सकता। पर साधारणतः जहाँ तक मनुष्य की सामान्य बुद्धि जाती है, प्रकृति में उपयोगिता और सुंदरता चारों ओर दृष्टिगोचर होती है।

इसी प्रकार मनुष्य द्वारा निर्मित पदार्थों में भी हम उपयोगिता और सुंदरता पाते हैं। एक झोपड़ी को लीजिए। वह शीत से, आतप से, वृष्टि से, वायु से हमारी रक्षा करती है। यही उसकी उपयोगिता है। यदि उस झोपड़ी के बनाने में हम बुद्धि-बल से अपने हाथ का अधिक कौशल दिखाने में समर्थ होते हैं तो वहीं झोपड़ी सुंदरता का गुण भी धारण कर लेती है। इससे उपयोगिता के साथ ही साथ उसमें सुंदरता भी आ जाती है।

जिस गुण कौशल के कारण किसी वस्तु में उपयोगिता और सुंदरता आती है उसकी ‘कला’ संज्ञा है। कला दो प्रकार के हैं- एक उपयोगी कला, दूसरी- ललित कला। उपयोगी में बढ़ई, लोहार, राज, जुलाहे आदि के व्यवसाय सम्मिलित हैं। ललित कला के अंतर्गत वास्तु-कला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीतकला और काव्य कला-ये पांच कलाभेद हैं। पहली अर्थात उपयोगी कलाओं के द्वारा मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति होती है और दूसरी अर्थात ललित कलाओं के द्वारा उनके अलौकिक आनंद की सिद्धि होती है। दोनों ही उसकी उन्नति और विकास के द्योतक हैं। भेद इतना ही है कि एक संबंध मनुष्य की शारीरिक और आर्थिक उन्नति से है और दूसरी का उसके मानसिक विकास से।

यह आवश्यक नहीं कि जो वस्तु उपयोगी हो वह सुंदर भी हो, परंतु मनुष्य सौंदर्योपाक प्राणी है। वह सभी उपयोगी वस्तुओं को यथाशक्ति सुंदर बनाने का उद्योग करता है। अतएव बहुत से पदार्थ ऐसे हैं जो उपयोगी भी हैं और सुंदर भी हैं अर्थात वे दोनों श्रेणियों के अंतर्गत आ सकते हैं। कुछ पदार्थ ऐसे भी हैं जो शुद्ध उपयोगी तो नहीं कहे जा सकते पर उनके सुंदर होने में संदेह नहीं।

खाने, पीने, पहनने, ओढ़ने, रहने, बैठने, आने, जाने आदि की सुविधा के लिए मनुष्य को अनेक वस्तुओं की आवश्यकता होती है। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए उपयोगी कलाएं अस्तित्व में आती है मनुष्य ज्यों-ज्यों सभ्यता की सीढ़ी पर ऊपर चढ़ता जाता है त्यों-त्यों उसकी आवश्यकताएं बढ़ती जाती हैं। इस उन्नति के साथ ही साथ मनुष्य का सौंदर्य ज्ञान भी बढ़ता है और उसे अपनी मानसिक तृप्ति के लिए सुंदरता का आविर्भाव करना पड़ता है। बिना ऐसा किए उनकी मनस्तृप्ति नहीं हो सकती। जिस पदार्थ के दर्शन से मन प्रसन्न नहीं होता वह सुंदर नहीं कहा जा सकता। यही कारण है कि भिन्न- भिन्न देशों के लोग अपनी-अपनी सभ्यता की कसौटी के अनुसार ही सुंदरता का आदर्श स्थिर करते हैं, क्योंकि सब का मन एक सा संस्कृत नहीं होता।

ललित कलाएं दो मुख्य भागों में विभक्त की जा सकती हैं- एक तो वह जो नेत्रेन्द्रिय के सन्निकर्ष से मानसिक तृप्ति प्रदान करती हैं और दूसरे वे जो श्रवणेन्द्रिय के सन्निकर्ष से उस तृप्ति का साधन बनती हैं। इस विचार से वास्तु (मंदिर निर्माण) मूर्ति (अर्थात तक्षण-कला) और चित्र-कलाएं तो नेत्र द्वारा तृप्ति का विधान करने वाली है और संगीत तथा श्रव्य काव्य कानों के द्वारा। पहली कला में किसी मूर्त आधार की आवश्यकता होती है, पर दूसरी में उनकी इतनी आवश्यकता नहीं होती। इस मूर्त आधार की मात्रा के अनुसार ही ललित कलाओं की श्रेणियां उत्तम and मध्यम, स्थिर की गई हैं। जिस कला में मूर्त आधार जितना ही कम रहेगा, उतनी ही उच्च कोटि की वह समझी जाएगी। इसी भाव के अनुसार हम काव्य कला को सबसे ऊंचा स्थान देते हैं, क्योंकि उसमें मूर्त आधार का एक प्रकार से पूर्ण अभाव रहता है। और इसी के अनुसार वह वास्तुकला को सबसे नीचा स्थान देते हैं; क्योंकि मूर्त आधार की विशेषता के बिना उसका अस्तित्व ही संभव नहीं। सच पूछिए तो इस आधार को सुचारू रूप से सजाने में ही वास्तुकला को कला की पदवी प्राप्त होती है। इसके अनंतर दूसरा स्थान मूर्तिकला का है। उसका भी आधार मूर्त ही होता है, परंतु मूर्तिकार किसी प्रस्तर-खण्ड या धातु खंड को ऐसा रूप दे देता है, जो उस आधार से सर्वथा भिन्न होता है। वह उस प्रस्तर खंड या धातु खंड में सजीवता की अनुरूपता उत्पन्न कर देता है। मूर्तिकला के अनंतर तीसरा स्थान चित्रकला का है। उसका भी आधार मूर्त ही होता है। प्रत्येक मुर्त अर्थात साकार पदार्थ में लंबाई, चौड़ाई और मोटाई होती है। वास्तुकार अर्थात भवन निर्माणकर्ता और मूर्तिकार को अपना कौशल दिखाने के लिए मूर्त आधार के पूर्वोक्त तीनों गुणों का आश्रय लेना पड़ता है। परंतु चित्रकार को अपने चित्रपट के लिए लंबाई और चौड़ाई का ही आधार लेना पड़ता है। मुटाई तो चित्र में नाम मात्र ही की होती है। तात्पर्य यह है कि यह जो हम ललित कलाओं में उत्तरोत्तर उत्तमता की ओर बढ़ते हैं, त्यों-त्यों मूर्त आधार का परित्याग होता जाता है। चित्रकार अपनी चित्रपट पर किसी मूर्त पदार्थ का प्रतिबिंब अंकित कर देता है। जो असली वस्तु के रूप, रंग के समान ही दीख पड़ता है।

अब संगीत के विषय में विचार कीजिए। संगीत में नाद परिमाण अर्थात स्वरों का आरोही-अवरोही उसका मूर्त आधार होता है। उसे सुचारू रूप से व्यवस्थित करने से भिन्न-भिन्न रसों और भावों का आविर्भाव होता है। अंतिम अर्थात सर्वोच्च स्थान काव्य कला है। उसमें मूर्त आधार की आवश्यकता ही नहीं होती। उसका प्रादुर्भाव शब्द समूह या वाक्यों से होता है। जो मनुष्य के मानसिक भावों की द्योतक होती है। काव्य में जब केवल अर्थ की रमणीयता रहती है, तब तो मूर्त आधार का अस्तित्व नहीं रहता, पर शब्द की रमणीयता आने से संगीत के सदृश्य ही नाद सौंदर्य-रूप मूर्त आधार की उत्पत्ति हो जाती है। भारतीय काव्य कला में पाश्चात्य काव्य कला की अपेक्षा नाद रूप मूर्त है। आधार की योजना अधिक रहती है पर यह अर्थ की रमणीयता के समान काव्य का अनिवार्य अंग नहीं है। अर्थ की रमणीयता उसका गौण गुण है।

ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे ललित कला के संबंध में नीचे लिखी बातें ज्ञात होती हैं-(1) सब कलाओं में किसी न किसी प्रकार की आधार की आवश्यकता होती है (2) ये आधार ईंट- पत्थर के टुकड़ों से लेकर शब्द संकेत तक हो सकते हैं। जिन उपकरणों द्वारा इन कलाओं का सन्निकर्ष मन से होता है, वे चक्षुरेन्द्रिय और करनेंद्रिय हैं (3) ये आधार और उपकरण केवल एक प्रकार के मध्यस्थ का काम देते हैं जिनके द्वारा कला के उत्पादक का मन देखने या सुनने वाले के मन से संबंध स्थापित करता है और अपने भावों को उस तक पहुंचाकर उसे प्रभावित करता है। अर्थात सुनने या देखने वाले का मन अपने मन के सदृश कर देता है। अतएव यह सिद्धांत निकला कि ललित कला वह वस्तु या कारीगरी है जिसका अनुभव इंद्रियों की मध्यस्थता द्वारा मन को होता है। और जो मन बाह्यार्थ से भिन्न हैं जिसका प्रत्यक्ष ज्ञान इंद्रियां प्राप्त करती हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि ललित कलाएं मानसिक दृष्टि में सौंदर्य का प्रत्यक्षीकरण है।

इस लक्षण को समझने के लिए आवश्यक है कि हम प्रत्येक ललित कला के संबंध में नीचे लिखे तीन बातों पर विचार करें -(1) उसका मूर्त आधार (2) वह साधन जिसके द्वारा यह आधार गोचर होता है और (3) मानसिक दृष्टि में नित्य पदार्थ का जो प्रत्यक्षीकरण होता है वह कैसा और कितना है।

वास्तु कला में मूर्त आधार निकृष्ट होता है, ईंट, पत्थर, लोहा, लकड़ी आदि जिनसे इमारतें बनाई जाती है। यह सब पदार्थ मूर्त हैं, अतएव इनका भाव आँखों पर वैसा ही पड़ता है जैसा कि किसी दूसरे मूर्त पदार्थ का पड़ सकता है। प्रकाश, छाया, रंग, प्राकृतिक स्थिति आदि साधन कला की सभी उत्पादकों को उपलब्ध रहते हैं। वे उनका उपयोग सुगमता से करके आँखों के द्वारा दर्शक के मन पर अपनी कृति की छाप डाल सकते हैं। इसके दो कारण हैं- एक तो उन्हें जीवित पदार्थों की गति आदि प्रदर्शित करने की आवश्यकता नहीं होती। दूसरे उनकी कृति में रूप, रंग आकार आदि के यही गुण वर्तमान रहते हैं जो अन्य निर्जीव पदार्थ में रहते हैं। यह सब होने पर भी जो कुछ भी प्रदर्शित करते हैं, उसमें स्वाभाविक अनुरूपता होने पर भी मानसिक भावों की प्रतया प्रस्तुत रहती है। किसी इमारत को देख कर संज्ञान जन सुगमता से कह सकते हैं कि यह मंदिर, मस्जिद या गिरजा है। अथवा यह महल या मकबरा है। विशेषज्ञ यह भी बता सकते हैं कि इनमें हिंदू, मुसलमान अथवा यूनानी वास्तुकला की प्रधानता है। धर्मस्थानों में भिन्न-भिन्न जातियों के धार्मिक विचारों के अनुकूल उनके धार्मिक विश्वासों के निदर्शक कलश, गुंबज, मिहराबें, जालियां, झरोखे आदि बनाकर वास्तुकार अपने मानसिक भावों को स्पष्ट कर दिखाता है। यही उसके मानसिक भावों का प्रत्यक्षीकरण है। परंतु इस काल में मूर्त पदार्थों का इतना बाहुल्य रहता है कि दर्शक उन्हीं को प्रत्यक्ष देखकर प्रभावित और आनंदित होता है। चाहे वे पदार्थ वास्तुकार के मानसिक भावों के यथार्थ निदर्शक चाहे ना हों, अथवा दर्शक उनके समझने में समर्थ हो या ना हो।

मूर्तिकला में मूल आधार पत्थर, धातु, मिट्टी या लकड़ी आदि के टुकड़े होते हैं जिन्हें मूर्तिकार काँट-छांटकर या ढालकर अपने अभीष्ट आकार में परिणत करता है। मूर्तिकार की छेनी में असली सजीव और निर्जीव पदार्थ के सब गुण अंतरनिहित रहते हैं। वह सब कुछ अर्थात रंग, रूप, आकार आदि प्रदर्शित कर सकता है। केवल गति देना उसकी सामर्थ्य के बाहर रहता है। जब तक वह किसी कल या पूर्जे का अनावश्यक उपयोग न करें। परंतु ऐसा करना उसकी कला सीमा के बाहर है। इसलिए वास्तुकार से मूर्तिकार की कृति अधिक महत्व की है। उसमें मानसिक भावों का प्रदर्शन वास्तुकार की कृति की अपेक्षा अधिकता से हो सकता है। मूर्तिकार अपने प्रस्तर-खंड या धातु-खंड में जीवधारियों की प्रतिच्छाया बड़ी सुगमता से संगठित कर सकता है। यही कारण है कि मूर्तिकला का मुख्य उद्देश्य शारीरिक या प्राकृतिक सुंदरता को प्रकाशित करना है।

चित्रकला का आधार कपड़े, कागज, लकड़ी आदि का चित्रपट है, जिस पर चित्रकार अपने ब्रुश या कलम की सहायता से भिन्न-भिन्न पदार्थों का जीवधारियों के प्राकृतिक रूप, रंग और आकार आदि का अनुभव कराता है। परंतु मूर्तिकार की अपेक्षा उस मूर्त आधार का आश्रय कम रहता है। इसी से उसे अपनी कला की खूबी दिखाने के लिए अधिक कौशल से काम करना पड़ता है। वह अपनी दृश्य कलम से समतल या सपाट सतह पर स्थूलता, लघुता, दूरी और नैकट्य आदि दिखाता है। वास्तविक पदार्थ को दर्शक जिस परिस्थिति में देखता है, उसी के अनुसार अंकन द्वारा वह अपने चित्रपट पर एक ऐसा चित्र प्रस्तुत करता है, जिसे देखकर दर्शक को चित्रगत वस्तु असली वस्तु-सी जान पड़ने लगती है। इस प्रकार वास्तुकार और मूर्तिकार की अपेक्षा चित्रकार को अपनी कला के ही द्वारा मानसिक सृष्टि उत्पन्न करने का अवसर मिलता है। उसकी कृति में मूर्तता कम और मानसिकता अधिक रहती है। किसी ऐतिहासिक घटना या प्राकृतिक दृश्य को अंकित करने में चित्रकार को केवल उस घटना या दृश्य को सजीवता देंनें और मनुष्य या प्रकृति की भाव भंगी का प्रतिरूप आँखों के सामने खड़ा करने के लिए अपना ब्रुश चलाना और परोक्ष रूप से अपने मानसिक भावों का सजीव चित्र सा प्रस्तुत करना पड़ता है। यह स्पष्ट है कि इस कला में मूर्तता का अंश थोड़ा और मानसिकता की बहुत अधिकता होती है।

संगीत का आधार नाद है, जिसे या तो मनुष्य अपने कंठ से या कई प्रकार के यंत्रों द्वारा उत्पन्न करता है। इस नाद का नियमन कुछ निश्चित सिद्धांतों के अनुसार किया गया है। इन सिद्धांतों के स्थिरीकरण में मनुष्य- समाज को अनंत समय लगा है। संगीत के सप्त स्वर इन सिद्धांतों के आधार हैं। वे ही संगीत कला के प्राण रूप या मूल कारण है। इससे स्पष्ट है संगीत कला का आधार या संवाहक नाद है। इसी नाम से हम अपने मानसिक भावों को प्रकट करते हैं। संगीत की विशेषता इस बात में है कि उसका प्रभाव विस्तृत है और वह प्रभाव अनादि काल से मनुष्य मात्र की आत्मा पर पड़ता चला आ रहा है। जंगली से जंगली मनुष्य से लेकर सभ्यतिसभ्य मनुष्य तक उसके प्रभाव के वशीभूत हो सकते हैं। मनुष्य को जाने दीजिए पशु- पक्षी तक उसका अनुशासन मानते हैं। संगीत हमें रुला सकता है, हमें हँसा सकता है, हमारे हृदय में आनंद की हिलोरे उत्पन्न कर सकता है, हमें सुख सागर में डुबा सकता है, हमें क्रोध या उद्वेग के वशीभूत करके उन्मत्त बना सकता है, शांत रस का प्रभाव बहाकर हमारे हृदय में शांति की धारा बहा सकता है परंतु जैसे अन्य कलाओं के प्रभाव की सीमा है वैसे ही संगीत की सीमा है। संगीत द्वारा भिन्न-भिन्न भावों या दृश्यों का अनुभव कलाओं की मध्यस्थता से मन को कराया जा सकता है। उसके द्वारा तलवारों की झनकार, पत्तियों की खड़खड़ आहट, पक्षियों का कलरव, हमारे कर्णकुहरों में पहुंचाया जा सकता है। परंतु यदि कोई चाहे की वायु का प्रचंड वेग, बिजली की चमक, मेघों की गड़गड़ाहट तथा समुद्र की लहरों के आघात भी हम स्पष्ट देख या सुनकर उन्हें पहचान ले तो यह बात संगीत कला के बाहर है। संगीत का उद्देश्य हमारी आत्मा को प्रभावित करना है और इसमें यह कला इतनी सफल हुई है जितनी काव्य कला को छोड़कर और कोई कला नहीं हो पाई। संगीत हमारे मन को अपनी इच्छा अनुसार चंचल कर सकता है और उसमें विशेषताओं का उत्पादन कर सकता है। इस विचार से यह कला वास्तु, मूर्ति और चित्रकला से बढ़कर है। एक बात यहां और जान लेना अत्यंत आवश्यक है। वह यह कि संगीत कला और काव्य कला में परस्पर बड़ा घनिष्ठ संबंध है। उसमें अन्य भाव है। एकाकी होने से दोनों का प्रभाव बहुत कुछ कम हो जाता है।

ललित कलाओं में सबसे ऊंचा स्थान काव्य कला का है। इसका आधार कोई मूर्त पदार्थ नहीं होता। यह शाब्दिक संकेतों के आधार पर अपना अस्तित्व प्रदर्शित करती है। मन को इसका ज्ञान चक्षुरेन्द्रिय या कर्णेन्द्रिय द्वारा होता है। मस्तिष्कों तक अपना प्रभाव पहुंचाने में इस कला के लिए किसी दूसरे साधन की अवलंबन की आवश्यकता नहीं होती। कानों या आँखों को शब्दों का ज्ञान सहज ही हो जाता है। पर यह ध्यान रखना चाहिए कि जीवन की घटनाओं और प्रकृति के बाहरी दृश्यों के जो काल्पनिक रूप इंद्रियों द्वारा मस्तिष्क या मन पर अंकित होते हैं वे केवल भावमय होते हैं और उन भावों के द्योतक कुछ सांकेतिक शब्द हैं। अतएव वे भाव या मानसिक चित्र ही वह सामग्री है, जिसके द्वारा काव्य-कला-विशारद दूसरे की मन से अपना संबंध स्थापित करता है। इस संबंध-स्थापना की वाहक या सहायक भाषा है जिसका कवि उपयोग करता है।

३. निबन्ध का प्रतिपाद्य एवं सारांश

'ललित कलाएं' निबन्ध का मूल प्रतिपाद्य कला की दार्शनिक व्याख्या और उसके वर्गीकरण के आधार को स्पष्ट करना है। लेखक के अनुसार, प्रकृति में प्रत्येक वस्तु 'उपयोगी' और 'सुंदर' होती है। मनुष्य अपनी बुद्धि और कौशल से जब किसी वस्तु में उपयोगिता और सुंदरता का समावेश करता है, तो उसे 'कला' कहते हैं। निबन्ध में कला को दो वर्गों में बाँटा गया है: उपयोगी कला (बढ़ई, लोहार आदि के कार्य जो शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करते हैं) और ललित कला (वास्तु, मूर्ति, चित्र, संगीत और काव्य जो मानसिक आनंद प्रदान करते हैं)। सारांश यह है कि कला का स्तर 'मूर्त आधार' (Material dependence) की कमी पर निर्भर करता है। वास्तुकला सबसे निम्न है क्योंकि वह ईंट-पत्थर पर पूरी तरह निर्भर है, जबकि काव्यकला सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि वह केवल शब्द और अर्थ के अमूर्त संकेतों पर टिकी है। लेखक सिद्ध करते हैं कि ललित कलाएं वास्तव में मानसिक दृष्टि में सौंदर्य का प्रत्यक्षीकरण हैं।

४. निबन्ध तत्वों के आधार पर ललित कलाएँ की समीक्षा

(क) विषय-वस्तु और वैज्ञानिक विवेचन: बाबू श्याम सुन्दरदास ने इस निबन्ध में कला जैसे अमूर्त विषय को अत्यंत वैज्ञानिक और तर्कसंगत ढंग से प्रस्तुत किया है। निबन्ध की विषय-वस्तु केवल कला के वर्णन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य की सभ्यता के विकास और सौंदर्यबोध के अंतर्संबंधों को उजागर करती है। लेखक ने पाश्चात्य और भारतीय कला-दृष्टि का समन्वय करते हुए यह स्थापित किया है कि कला का मुख्य कार्य 'अलौकिक आनंद' की सिद्धि है।

(ख) व्यक्तित्व की व्यंजना: निबन्ध में लेखक का एक गंभीर अध्येता और विचारक रूप उभरता है। उनकी शैली में वह अनुशासन दिखाई देता है जो द्विवेदी युग की पहचान थी। श्याम सुन्दरदास जी विषय को खंडों में विभाजित कर, प्रत्येक का तर्कपूर्ण विश्लेषण करते हैं। उनका व्यक्तित्व यहाँ एक 'शिक्षक' के रूप में है जो पाठक को सौंदर्य और उपयोगिता के सूक्ष्म भेद की शिक्षा दे रहा है। उनके विचार 'सौंदर्योपाक' प्राणी के रूप में मनुष्य की श्रेष्ठता सिद्ध करते हैं।

(ग) भाषा और शैली का गहन निरीक्षण: निबन्ध की भाषा संस्कृतनिष्ठ तत्सम प्रधान है, जो विषय की गंभीरता के अनुकूल है। शैली 'गवेषणात्मक' और 'विश्लेषणात्मक' है। लेखक ने इंद्रियों (नेत्र और कान) के आधार पर कलाओं का जो वर्गीकरण किया है, वह उनकी सूक्ष्म दृष्टि का परिचायक है। "मूर्त आधार की मात्रा के अनुसार उत्तम और मध्यम श्रेणी" का सिद्धांत उनके गहरे शोध का परिणाम है। भाषा में स्पष्टता है और कहीं भी अस्पष्टता या द्वयर्थकता नहीं है।

(घ) संरचनात्मक सौष्ठव और तर्कशीलता: निबन्ध की संरचना सोपानवत है। पहले प्रकृति में सौंदर्य की खोज, फिर उपयोगी कला का विवेचन और अंत में ललित कलाओं का श्रेणीक्रम। लेखक ने काव्य कला को सर्वोच्च स्थान देने के लिए जो तर्क दिया है—"मूर्त आधार का पूर्ण अभाव"—वह उनकी मौलिक सोच को दर्शाता है। संगीत और काव्य के घनिष्ठ संबंध पर उनका विवेचन कला के आंतरिक गुणों की गहरी समझ प्रस्तुत करता है।

(ङ) उद्देश्य और सामाजिक प्रासंगिकता: निबन्ध का उद्देश्य पाठक को केवल कला की जानकारी देना नहीं, बल्कि उसके सौंदर्यबोध (Aesthetic sense) को परिष्कृत करना है। लेखक बताते हैं कि मनुष्य जैसे-जैसे सभ्य होता है, उसकी मानसिक तृप्ति के लिए कला अनिवार्य हो जाती है। आज के मशीनी युग में, जहाँ केवल उपयोगिता पर ध्यान दिया जाता है, यह निबन्ध याद दिलाता है कि बिना 'ललित कला' के मनुष्य का मानसिक विकास अधूरा है। यह निबन्ध भारतीय आलोचना साहित्य में कला-विमर्श का एक महत्वपूर्ण प्रस्थान बिंदु है।

५. कठिन शब्दावली

उपादेयता = उपयोगिता/काम आने का गुण, सापेक्षिक = एक-दूसरे पर निर्भर, दृष्टिगोचर = जो आँखों से दिखाई दे, आतप = धूप/गर्मी, वृष्टि = वर्षा, संज्ञा = नाम, ललित = सुंदर/मनोहर, वास्तु-कला = भवन निर्माण कला, अलौकिक = ईश्वरीय/दिव्य, द्योतक = सूचित करने वाला, सौंदर्योपाक = सुंदरता का उपासक, आविर्भाव = प्रकटीकरण/जन्म, मनस्तृप्ति = मन की संतुष्टि, सन्निकर्ष = संपर्क/निकटता, नेत्रेन्द्रिय = आँखें, श्रवणेन्द्रिय = कान, तक्षण-कला = लकड़ी या पत्थर तराशने की कला, मूर्त = साकार/स्थूल, निकृष्ट = निम्न श्रेणी का, प्रस्तर-खण्ड = पत्थर का टुकड़ा, अनुरूपता = समानता, नैकट्य = निकटता, आरोही = चढ़ता हुआ क्रम, अवरोही = उतरता हुआ क्रम, प्रादुर्भाव = उत्पत्ति, रमणीयता = सुंदरता/आनंद, गौण = कम महत्वपूर्ण, उपकरण = साधन, मध्यस्थ = बिचौलिया, बाह्यार्थ = बाहरी अर्थ, निदर्शक = उदाहरण/संकेत, मिहराबें = दरवाजों के ऊपर का अर्धवृत्ताकार हिस्सा, प्रतिच्छाया = परछाई/प्रतिबिम्ब, अनुशासन = नियमन, कर्णकुहर = कान का छेद, कलरव = पक्षियों की चहचहाहट, उद्वेग = बेचैनी/घबराहट, उन्मत्त = पागल, अवलंबन = सहारा, विशारद = पंडित/विद्वान, नाद = स्वर/ध्वनि,

६. परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्र. 1. लेखक के अनुसार 'कला' की क्या परिभाषा है?

उत्तर : जिस विशेष गुण या कौशल के कारण किसी वस्तु में उपयोगिता के साथ-साथ सुंदरता का समावेश होता है, उसे 'कला' कहा जाता है।

प्र. 2. उपयोगी कला और ललित कला में मुख्य अंतर क्या है?

उत्तर : उपयोगी कला का संबंध मनुष्य की शारीरिक और आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति से है, जबकि ललित कला का संबंध मनुष्य के मानसिक विकास और अलौकिक आनंद से है।

प्र. 3. ललित कलाओं को किन दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है?

उत्तर : इन्हें इंद्रियों के आधार पर दो भागों में बाँटा गया है: 1. नेत्रों द्वारा आनंद देने वाली (वास्तु, मूर्ति, चित्र) और 2. कानों द्वारा आनंद देने वाली (संगीत, काव्य)।

प्र. 4. लेखक ने काव्य कला को सबसे ऊँचा स्थान क्यों दिया है?

उत्तर : क्योंकि काव्य कला में 'मूर्त आधार' (Material base) का पूर्णतः अभाव होता है; यह केवल शाब्दिक संकेतों और मानसिक भावों पर आधारित होती है।

प्र. 5. वास्तुकला को सबसे नीचा स्थान देने का क्या कारण है?

उत्तर : वास्तुकला पूरी तरह से मूर्त आधार (ईंट, पत्थर, लोहा) पर निर्भर है। बिना इन स्थूल पदार्थों के इसका अस्तित्व संभव नहीं है, इसलिए इसे निम्नतम श्रेणी में रखा गया है।

प्र. 6. संगीत कला की क्या विशेषता बताई गई है?

उत्तर : संगीत का आधार 'नाद' है। इसका प्रभाव सार्वभौमिक है, जो मनुष्यों के साथ-साथ पशु-पक्षियों को भी प्रभावित कर उन्हें हँसाने, रुलाने या शांत करने की शक्ति रखता है।

प्र. 7. 'मूर्त आधार' से लेखक का क्या आशय है?

उत्तर : मूर्त आधार से तात्पर्य उन भौतिक साधनों (जैसे पत्थर, रंग, वाद्य यंत्र) से है, जिनका सहारा लेकर कलाकार अपनी कला को प्रकट करता है।

प्र. 8. चित्रकला और मूर्तिकला में क्या अंतर स्पष्ट किया गया है?

उत्तर : मूर्तिकला में लंबाई, चौड़ाई और मोटाई तीनों का प्रयोग होता है, जबकि चित्रकला में मोटाई केवल नाममात्र की होती है; इसमें चित्रकार समतल सतह पर ही दूरी और स्थूलता का आभास कराता है।

प्र. 9. "ललित कलाएं मानसिक दृष्टि में सौंदर्य का प्रत्यक्षीकरण है"—इस कथन का क्या अर्थ है?

उत्तर : इसका अर्थ है कि कलाकार अपनी इंद्रियों के माध्यम से अपने आंतरिक सुंदर भावों को बाहरी रूप प्रदान करता है, जिससे दर्शक का मन भी कलाकार के मन के सदृश आनंदित हो जाता है।

प्र. 10. क्या उपयोगी वस्तु हमेशा सुंदर होती है?

उत्तर : नहीं, यह आवश्यक नहीं है। लेकिन मनुष्य स्वभाव से सौंदर्यप्रिय है, इसलिए वह अपनी प्रत्येक उपयोगी वस्तु (जैसे झोपड़ी) को सुंदर बनाने का प्रयास करता है।

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