जायसी- पद्मावत, नागमती का वियोग वर्णन

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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मलिक मुहम्मद जायसी

मलिक मुहम्मद जायसी — पद्मावत (मंगलाचरण एवं नागमती वियोग वर्णन)

पद्मावत के मंगलाचरण तथा नागमती के वियोग वर्णन के चौपाई-दोहों का शब्दार्थ, सन्दर्भ, प्रसङ्ग, हिन्दी व्याख्या एवं विशेष/काव्यसौंदर्य।

कवि परिचय — मलिक मुहम्मद जायसी

जीवन एवं काल: मलिक मुहम्मद जायसी हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल की निर्गुण प्रेमाश्रयी (सूफ़ी) काव्यधारा के प्रतिनिधि महाकवि हैं। इनका जन्म 15वीं शती के उत्तरार्ध (लगभग 1492 ई.) में उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के जायस नामक नगर में हुआ था, जिसके कारण ये 'जायसी' कहलाए।

काव्यगत विशेषताएँ: जायसी ने लौकिक प्रेम (इश्क-ए-मिज़ाज़ी) के माध्यम से अलौकिक/ईश्वरीय प्रेम (इश्क-ए-हक़ीक़ी) की सुंदर व्यंजना की है। इनका 'नागमती वियोग वर्णन' हिन्दी साहित्य में विप्रलम्भ श्रृंगार का अद्वितीय एवं अनुपम उदाहरण माना जाता है, जिसमें भारतीय बारहमासा पद्धति तथा लोक-जीवन की मार्मिक अनुभूतियों का सजीव समन्वय हुआ है।

भाषा-शैली: इनकी भाषा ठेठ अवधी है। इन्होंने मसनवी शैली, दोहा-चौपाई छन्द तथा उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा एवं विरह की अतिशयोक्तिपूर्ण उक्तियों का सहज और स्वाभाविक प्रयोग किया है।

प्रमुख रचनाएँ: पद्मावत (महाकाव्य), अखरावट, आख़िरी कलाम, कहरनामा, चित्ररेखा, कान्हावत आदि।

पद्मावत — मंगलाचरण

मंगलाचरण संख्या 01
कीन्हेसि मानुष, दिहेसि बडाई । कीन्हेसि अन्न, भुगुति तेहिं पाई ॥ कीन्हेसि राजा भूँजहिं राजू ।कीन्हेसि हस्ति घोर तेहि साजू ॥ कीन्हेसि दरब गरब जेहि होई ।कीन्हेसि लोभ, अघाइ न कोई ॥ कीन्हेसि जियन, सदा सब चाहा ।कीन्हेसि मीचु, न कोई रहा ॥ कीन्हेसि सुख औ कोटि अनंदू ।कीन्हेसि दुख चिंता औ धंदू ॥ कीन्हेसि कोइ भिखारि, कोइ धनी।कीन्हेसि सँपति बिपति पुनि घनी।। कीन्हेसि कोई निभरोसी, कीन्हेसि कोइ बरियार । छारहिं तें सब कीन्हेसि, पुनि कीन्हेसि सब छार ॥1॥
शब्दार्थ:

मानुष = मनुष्य, बडाई = प्रतिष्ठा, महत्त्व, अन्न = भोजन, भुगुति = भोजन, भोग, राजा = राज करने वाला, भूँजहिं = भोगते हैं, राजू = राज्य, हस्ति = हाथी, घोर = घोड़े, दरब = धन, गरब = गर्व, अघाइ = तृप्त होना, जियन = जीवन, मीचु = मृत्यु, अनंदू = आनंद, धंदू = चिंता, द्वन्द्व, भिखारि = भिखारी, धनी = धनवान, सँपति = संपत्ति, बिपति = विपत्ति, निभरोसी = निराश्रित, बरियार = शक्तिशाली, छार = मिट्टी, राख।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पंक्तियाँ मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत के मंगलाचरण से ली गई हैं।

प्रसङ्ग:

कवि परमात्मा की सृष्टि-शक्ति तथा उसके द्वारा संसार में सुख-दुःख, जीवन-मृत्यु और संपत्ति-विपत्ति की व्यवस्था का वर्णन करता है।

व्याख्या:

परमात्मा ने मनुष्य की रचना करके उसे प्रतिष्ठा दी और उसके लिए अन्न तथा भोग की सामग्री बनाई। उसी ने राजा और प्रजा, धन और निर्धनता, जीवन और मृत्यु, सुख और दुःख आदि की व्यवस्था की है। संसार की प्रत्येक वस्तु उसी की बनाई हुई है और अंततः सब उसी मिट्टी में मिल जाती हैं।

टिप्पणी:

सृष्टि की विविधता, जीवन की नश्वरता तथा परमात्मा की सर्वव्यापक सत्ता का प्रभावपूर्ण चित्रण हुआ है।

मंगलाचरण संख्या 02
धनपति उहै जेहिक संसारू । सबै देइ निति, घट न भँडारू ॥ जावत जगत हस्ति औ चाँटा । सब कहँ भुगुति राति दिन बाँटा ॥ ताकर दीठि जो सब उपराहीं । मित्र सत्रु कोइ बिसरै नाहीं ॥ पखि पतंग न बिसरे कोई । परगट गुपुत जहाँ लगि होई ॥ भोग भुगुति बहु भाँति उपाई । सबै खवाई, आप नहिं खाई ॥ ताकर उहै जो खाना पियना । सब कहँ देइ भुगुति ओ जियना ॥ सबै आस-हर ताकर आसा । वह न काहु के आस निरासा ॥ जुग जुग देत घटा नहिं, उभै हाथ अस कीन्ह । और जो दीन्ह जगत महँ सो सब ताकर दीन्ह ॥2॥
शब्दार्थ:

धनपति = धन का स्वामी, जेहिक = जिसका, संसारू = संसार, निति = नित्य, प्रतिदिन, भँडारू = भंडार, जावत = जितने, हस्ति = हाथी, चाँटा = चींटी, भुगुति = भोजन, ताकर = उसका, दीठि = दृष्टि, उपराहीं = ऊपर, पखि = पक्षी, पतंग = छोटा जीव, कीट, परगट = प्रकट, गुपुत = गुप्त, आस-हर = आशा रखने वाले, निरासा = निराशा।

सन्दर्भ:

यह अंश पद्मावत के मंगलाचरण से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि परमात्मा को संसार का वास्तविक धनपति बताते हुए उसकी दयालुता और सर्वव्यापकता का वर्णन करता है।

व्याख्या:

परमात्मा संसार का सच्चा धनपति है। वह सभी जीवों को निरंतर भोजन देता है, फिर भी उसका भंडार कभी समाप्त नहीं होता। हाथी से लेकर चींटी और पक्षी से लेकर छोटे-से-छोटे जीव तक उसकी दृष्टि में हैं। वह सबको भोजन देता है, किंतु स्वयं किसी वस्तु का उपभोग नहीं करता।

टिप्पणी:

परमात्मा की सर्वव्यापकता, पालनकर्ता रूप तथा उसकी अनंत दानशीलता का सुंदर वर्णन है।

मंगलाचरण संख्या 03
आदि एक बरनौं सोइ राजा । आदि न अंत राज जेहि छाजा ॥ सदा सरबदा राज करेई । औ जेहि चहै राज तेहि देई ॥ छत्रहिं अछत, निछत्रहिं छावा ।दूसर नाहिं जो सरवरि पावा ॥ परबत ढाह देख सब लोगू । चाँटहि करै हस्ति-सरि-जोगू ॥ बज्रांह तिनकहिं मारि उडाई । तिनहि बज्र करि देई बडाई ॥ ताकर कीन्ह न जानै कोई । करै सोइ जो चित्त न होई ॥ काहू भोग भुगुति सुख सारा । काहू बहुत भूख दुख मारा ॥ सबै नास्ति वह अहथिर, ऐस साज जेहि केर । एक साजे औ भाँजै, चहै सँवारै फेर ॥3॥
शब्दार्थ:

आदि = आरम्भ से, राजा = परम शासक, सरबदा = सदा, छाजा = शोभित, छत्रहिं = छत्र वाले, अछत = सुरक्षित, निछत्रहिं = बिना छत्र वाले, सरवरि = समान, परबत = पर्वत, ढाह = गिरा देना, चाँटहि = चींटी, हस्ति = हाथी, बज्रांह = वज्र के समान कठोर, ताकर = उसका, भोग भुगुति = भोग और भोजन, नास्ति = नश्वर, अहथिर = अस्थिर, साज = संसार की व्यवस्था, भाँजै = बिगाड़ता है।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पंक्तियाँ पद्मावत के मंगलाचरण से उद्धृत हैं।

प्रसङ्ग:

कवि परमात्मा को संसार का आदि और अनंत राजा बताकर उसकी असीम शक्ति का वर्णन करता है।

व्याख्या:

परमात्मा ही आदि से संसार का वास्तविक राजा है। वही किसी को राज्य देता है और किसी से राज्य छीन लेता है। उसकी शक्ति ऐसी है कि पर्वत को गिरा सकता है और चींटी को हाथी के समान शक्तिशाली बना सकता है। संसार की सारी व्यवस्था उसी की इच्छा से चलती है और संसार की सभी वस्तुएँ नश्वर हैं।

टिप्पणी:

परम सत्ता की सर्वशक्तिमत्ता तथा संसार की अस्थिरता का प्रभावपूर्ण निरूपण हुआ है।

मंगलाचरण संख्या 04
अलख अरूप अबरन सो कर्ता । वह सब सों, सब ओहि सों बर्ता ॥ परगट गुपुत सो सरबबिआपी । धरमी चीन्ह, न चीन्है पापी ॥ ना ओहि पूत न पिता न माता । ना ओहि कुटुब न कोई सँग नाता ॥ जना न काहु, न कोइ ओहि जना । जहँ लगि सब ताकर सिरजना ॥ वै सब कीन्ह जहाँ लगि कोई । वह नहिं कीन्ह काहु कर होई ॥ हुत पहिले अरु अब है सोई । पुनि सो रहै रहै नहिं कोई ॥ और जो होइ सो बाउर अंधा । दिन दुइ चारि मरै करि धंधा ॥ जो चाहा सो कीन्हेसि, करै जो चाहै कीन्ह । बरजनहार न कोई, सबै चाहि जिउ दीन्ह ॥4॥
शब्दार्थ:

अलख = जिसे देखा न जा सके, अरूप = रूपरहित, अबरन = वर्णरहित, कर्ता = रचयिता, बर्ता = व्यवहार करता है, सरबबिआपी = सर्वव्यापी, धरमी = धर्मात्मा, चीन्ह = पहचानता है, कुटुब = परिवार, सिरजना = सृष्टि, हुत = था, बाउर = पागल, धंधा = सांसारिक कार्य।

सन्दर्भ:

यह अंश जायसी के पद्मावत के मंगलाचरण से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि परमात्मा के निराकार, निर्गुण और सर्वव्यापक स्वरूप का वर्णन करता है।

व्याख्या:

परमात्मा को न देखा जा सकता है और न किसी निश्चित रूप या रंग में बाँधा जा सकता है। वह सबमें व्याप्त है और सब उसी में स्थित हैं। उसका न कोई पिता है, न माता और न परिवार। समस्त सृष्टि उसी की रचना है। संसार में जो कुछ उत्पन्न होता है वह नश्वर है, जबकि परमात्मा शाश्वत है।

टिप्पणी:

निर्गुण एवं निराकार ब्रह्म की अवधारणा का सुंदर निरूपण हुआ है।

मंगलाचरण संख्या 05
एहि विधि चीन्हहु करहु गियानू । जस पुरान महँ लिखा बखानू ॥ जीउ नाहिं, पै जियै गुसाईं । कर नाहीं, पै करै सबाईं ॥ जीभ नाहिं, पै सब किछु बोला ।तन नाहीं, सब ठाहर डोला ॥ स्रवन नाहिं, पै सक किछु सुना ।हिया नाहिं पै सब किछु गुना ॥ नयन नाहिं, पै सब किछु देखा ।कौन भाँति अस जाइ बिसेखा ॥ है नाहीं कोइ ताकर रूपा ।ना ओहि सन कोइ आहि अनूपा ॥ ना ओहि ठाउँ, न ओहि बिनु ठाऊँ ।रूप रेख बिनु निरमल नाऊ ॥ ना वह मिला न बेहरा, ऐस रहा भरिपूरि । दीठिवंत कहँ नीयरे, अंध मूरुखहिं दूरि ॥5॥
शब्दार्थ:

गियानू = ज्ञान, गुसाईं = स्वामी, परमात्मा, जीउ = जीव, कर = हाथ, सबाईं = सब कुछ, जीभ = जिह्वा, स्रवन = कान, हिया = हृदय, नयन = आँख, बिसेखा = विशेषता, अनूप = अनुपम, ठाउँ = स्थान, निरमल = शुद्ध, नाऊ = नाम, बेहरा = बहरा, भरिपूरि = पूर्ण रूप से व्याप्त, दीठिवंत = देखने वाला, नीयरे = निकट, मूरुख = मूर्ख।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पंक्तियाँ पद्मावत के मंगलाचरण की पाँचवीं कड़ी से ली गई हैं।

प्रसङ्ग:

कवि परमात्मा की अदृश्य सत्ता और उसकी सर्वव्यापकता को विभिन्न उदाहरणों द्वारा स्पष्ट करता है।

व्याख्या:

परमात्मा के पास कोई स्थूल शरीर नहीं है, फिर भी वह सबको जीवन देता है। उसके पास जीभ नहीं है, फिर भी संसार में होने वाली प्रत्येक ध्वनि और वाणी उसी की शक्ति से संभव है। उसके नयन नहीं हैं, फिर भी वह सब कुछ देखता है। वह किसी एक स्थान में सीमित नहीं है, बल्कि समस्त संसार में व्याप्त है। जो ज्ञानी हैं, उन्हें वह निकट दिखाई देता है, जबकि अज्ञानी उससे दूर रहते हैं।

टिप्पणी:

परमात्मा की सर्वव्यापकता और निर्गुण सत्ता का दार्शनिक निरूपण अत्यंत प्रभावशाली है।

नागमती का वियोग वर्णन

पद संख्या 01
नागमती चितउर-पथ हेरा । पिउ जो गए पुनि कीन्ह न फेरा ॥ नागर काहु नारि बस परा । तेइ मोर पिउ मोसौं हरा ॥ सुआ काल होइ लेइगा पीऊ । पिउ नहिं जात, जात बरु जीऊ ॥ भएउ नरायन बावन करा । राज करत राजा बलि छरा ॥ करन पास लीन्हेउ कै छंदू । बिप्र रूप धरि झिलमिल इंदू ॥ मानत भोग गोपिचंद भोगी । लेइ अपसवा जलंधर जोगी ॥ लेइगा कृस्नहि गरुड अलोपी । कठिन बिछोह, जियहिं किमि गोपी ॥ सारस जोरी कौन हरि, मारि बियाधा लीन्ह ? । झुरि झुरि पींजर हौं भई, बिरह काल मोहि दीन्ह ॥1॥
शब्दार्थ:

नागमती = नागमती ने, चितउर-पथ = चित्तौड़ जाने के मार्ग को, हेरा = देखा, पिउ = प्रियतम, पुनि = फिर, फेरा = लौटना, नागर = चतुर पुरुष, काहु नारि = किसी दूसरी स्त्री के, बस परा = वश में पड़ गए, तेइ = उसी ने, मोसौं = मुझसे, हरा = छीन लिया, सुआ = तोता, काल = मृत्यु, लेइगा = ले जाएगा, पीऊ = प्रियतम, बरु = अच्छा, जीऊ = प्राण, नरायन = विष्णु, बावन करा = वामन रूप धारण किया, बलि = राजा बलि, छरा = छल लिया, करन = कर्ण से, पास = समीप, छंदू = युक्ति/छल, बिप्र रूप = ब्राह्मण का रूप, धरि = धारण करके, इंदू = चन्द्रमा, गोपिचंद = राजा गोपीचन्द, भोगी = भोग-विलासी, अपसवा = अपनी ओर करके, जलंधर = जलंधरनाथ, जोगी = योगी, कृस्नहि = श्रीकृष्ण को, गरुड = गरुड़, अलोपी = छिपाकर ले गया, बिछोह = वियोग, जियहिं = जीवित रहें, किमि = कैसे, गोपी = गोपियाँ, सारस जोरी = सारस पक्षियों का जोड़ा, हरि = छीन लिया, बियाधा = शिकारी, झुरि झुरि = व्याकुल होकर, पींजर = कंकाल, बिरह काल = वियोग के समय, मोहि = मुझे।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत चौपाई-दोहा मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत में नागमती के वियोग-वर्णन से संबंधित है।

प्रसङ्ग:

प्रिय रत्नसेन के वियोग में नागमती की व्याकुलता और विरह-वेदना का मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या:

नागमती प्रिय के वियोग में अत्यंत व्याकुल है। प्रिय से बिछुड़ने के कारण प्रकृति की प्रत्येक वस्तु उसे अपने दुःख की अनुभूति कराती है। उसका मन निरंतर प्रिय के स्मरण में डूबा रहता है और विरह की पीड़ा क्रमशः तीव्र होती जाती है।

टिप्पणी:

वियोग-श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति, प्रकृति के मानवीकरण तथा विरहिणी नायिका की मनःस्थिति का सुंदर चित्रण।

पद संख्या 02
पिउ-बियोग अस बाउर जीऊ । पपिहा निति बोलै `पिउ पीऊ' ॥ अधिक काम दाधै सो रामा । हरि लेइ सुबा गएउ पिउ नामा ॥ बिरह बान तस लाग न डोली । रकत पसीज, भींजि गइ चोली ॥ सूखा हिया, हार भा भारी । हरे हरे प्रान तजहिं सब नारी ॥ खन एक आव पेट महँ ! साँसा । खनहिं जाइ जिउ, होइ निरासा ॥ पवन डोलावहिं, सीचहिं चोला । पहर एक समुजहिं मुख-बोला ॥ प्रान पयान होत को राखा ? । को सुनाव पीतम कै भाखा ?॥ आजि जो मारै बिरह कै, आगि उठै तेहि लागि हंस जो रहा सरीर मह, पाँख जरा, गा भागि ॥2॥
शब्दार्थ:

पिउ-बियोग = प्रिय के वियोग में, अस = ऐसा, बाउर = व्याकुल, जीऊ = हृदय, पपिहा = पपीहा पक्षी, निति = नित्य, पिउ = प्रिय, पीऊ = प्रियतम, अधिक = अत्यधिक, काम = प्रेम की तीव्रता, दाधै = जलाती है, रामा = हे राम, हरि = हरकर, लेइ = लेकर, सुबा = सुआ, तोता, गएउ = चला गया, पिउ नामा = प्रियतम का नाम, बिरह = वियोग, बान = बाण, तस = उसी प्रकार, लाग = लगा, डोली = हिली, रकत = रक्त, पसीज = पिघलकर, भींजि = भीगकर, चोली = स्त्री का वस्त्र, सूखा = सूख गया, हिया = हृदय, हार = हार, भा = हो गया, भारी = अत्यन्त भारी, हरे हरे = धीरे-धीरे, प्रान = प्राण, तजहिं = त्यागती हैं, नारी = स्त्रियाँ, खन = क्षण, आव = आती है, पेट महँ = पेट में, साँसा = साँस, जाइ = चली जाती है, जिउ = जीवन, निरासा = निराश, पवन = वायु, डोलावहिं = हिलाती है, सीचहिं = सींचती हैं, चोला = शरीर, समुजहिं = समझती हैं, मुख-बोला = मुख से निकले शब्द, प्रान = प्राण, पयान = प्रस्थान, राखा = रोक सकता है, सुनाव = सुनाएगा, पीतम = प्रियतम, भाखा = बात, आजि = आज, मारै = मारता है, बिरह कै = विरह के कारण, आगि = अग्नि, उठै = उठती है, तेहि लागि = उसी के कारण, हंस = हंस, सरीर = शरीर, पाँख = पंख, जरा = जल गए, गा भागि = उड़कर चला गया।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत चौपाई-दोहा मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत में नागमती के वियोग-वर्णन से संबंधित है।

प्रसङ्ग:

प्रिय रत्नसेन के वियोग में नागमती की व्याकुलता और विरह-वेदना का मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या:

नागमती प्रिय के वियोग में अत्यंत व्याकुल है। प्रिय से बिछुड़ने के कारण प्रकृति की प्रत्येक वस्तु उसे अपने दुःख की अनुभूति कराती है। उसका मन निरंतर प्रिय के स्मरण में डूबा रहता है और विरह की पीड़ा क्रमशः तीव्र होती जाती है।

टिप्पणी:

वियोग-श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति, प्रकृति के मानवीकरण तथा विरहिणी नायिका की मनःस्थिति का सुंदर चित्रण।

पद संख्या 03
पाट-महादेइ ! हिये न हारू । समुझि जीऊ, चित चेतु सँभारू ॥ भौंर कँवल सँग होइ मेरावा । सँवरि नेह मालति पहँ आवा ॥ पपिहै स्वाती सौं जस प्रीती । टेकु पियास; बाँधु मन थीती ॥ धरतहिं जैस गगन सौं नेहा । पलटि आव बरषा ऋतु मेहा ॥ पुनि बसंत ऋतु आव नबेली । सो रस, सो मधुकर, सो बेली ॥ जिनि अस जीव करसि तू बारी । यह तरिबर पुनि उठिहि सँवारी ॥ दिन दस बिनु जल सूखि बिधंसा । पुनि सोई सरवर, सोइ हंसा ॥ मिलहिं जो बिछुरे साजन, अंकस भेंटि अहंत । तपनि मृगसिरा जे सहैं, ते अद्रा पलुहंत ॥3॥
शब्दार्थ:

पाट-महादेइ = पटरानी, हिये न हारू = हृदय में निराश न हो, समुझि जीऊ = समझकर धैर्य रख, चित चेतु सँभारू = मन को सचेत और सँभालकर रख, भौंर = भौंरा, कँवल = कमल, मेरावा = मिलकर/मिल जाता है, सँवरि = सँवरकर, नेह = प्रेम, मालति = मालती लता/पुष्प, पहँ = पास, पपिहै = पपीहा, स्वाती = स्वाति नक्षत्र, सौं = से, प्रीती = प्रेम, टेकु = दृढ़ता/आश्रय, पियास = प्यास, थीती = धैर्य/स्थिरता, धरती = पृथ्वी, गगन = आकाश, नेहा = प्रेम, पलटि आव = लौटकर आता है, बरषा ऋतु = वर्षा ऋतु, मेहा = मेघ/वर्षा, पुनि = फिर, बसंत ऋतु = वसन्त ऋतु, नबेली = नवीन, सो रस = वही रस, मधुकर = भौंरा, बेली = लता, जिनि = जिस प्रकार, अस जीव = ऐसा जीवन, करसि = करती हो, बारी = नष्ट/व्यर्थ करती हो, तरिबर = वृक्ष, उठिहि = फिर उठेगा/जीवित होगा, सँवारी = सँवर जाएगा, दिन दस = दस दिन, बिनु जल = जल के बिना, सूखि = सूखकर, बिधंसा = नष्ट हो जाता है, सरवर = सरोवर, हंसा = हंस, मिलहिं = मिलते हैं, बिछुरे साजन = बिछड़े प्रियजन, अंकस भेंटि = आलिंगन करके, अहंत = अत्यन्त प्रसन्न होते हैं, तपनि = गर्मी/ताप, मृगसिरा = मृगशिरा नक्षत्र का समय, सहैं = सहते हैं, अद्रा = आर्द्रा नक्षत्र, पलुहंत = हरे-भरे हो जाते हैं।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत चौपाई-दोहा मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत में नागमती के वियोग-वर्णन से संबंधित है।

प्रसङ्ग:

प्रियका मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या:

नागमती की पीड़ा क्रमशः तीव्र होती जाती है।

टिप्पणी:

वियोग-श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति,चित्रण।

पद संख्या 04
चढा असाढ, गगन घन गाजा । साजा बिरह दुंद दल बाजा ॥ धूम, साम, धीरे घन धाए । सेत धजा बग-पाँति देखाए ॥ खडग-बीजु चमकै चहुँ ओरा । बुंद-बान बरसहिं घन घोरा ॥ ओनई घटा आइ चहुँ फेरी । कंत! उबारु मदन हौं घेरी ॥ दादुर मोर कोकिला, पीऊ । गिरै बीजु, घट रहै न जीऊ ॥ पुष्प नखत सिर ऊपर आवा । हौं बिनु नाह, मँदिर को छाँवा ?॥ अद्रा लाग, लागि भुइँ लेई । मोहिं बिनु पिउ को आदर देई ?॥ जिन्ह घर कंता ते सुखी, तिन्ह गारौ औ गर्ब । कंत पियारा बाहिरै, हम सुख भूला सर्ब ॥4॥
शब्दार्थ:

असाढ़ = आषाढ़ मास, गगन = आकाश, घन = बादल, गाजा = गरजा, बिरह = वियोग, दुंद = युद्ध, दल = सेना, बाजा = बाजा बजा, धूम = धुएँ के समान, साम = श्याम/काले, धीरे = धीरे-धीरे, धाए = दौड़े आए, सेत = सफेद, धजा = ध्वजा, बग-पाँति = बगुलों की पंक्ति, खडग-बीजु = तलवार के समान बिजली, चहुँ ओरा = चारों ओर, बुंद-बान = बूँदों के बाण, घन घोरा = भयंकर बादल, ओनई = झुककर, घटा = बादलों की घटा, चहुँ फेरी = चारों ओर, कंत = प्रियतम, उबारु = बचाओ, मदन = कामदेव, घेरी = घेर लिया, दादुर = मेंढक, मोर = मयूर, कोकिला = कोयल, पीऊ = प्रियतम, गिरै बीजु = बिजली गिरती है, घट = शरीर/हृदय, जीऊ = प्राण, पुष्प नखत = पुष्प के समान तारागण, सिर ऊपर = सिर के ऊपर/आकाश में, आवा = आया, नाह = पति, मँदिर = घर, छाँवा = आश्रय, अद्रा = आर्द्रा नक्षत्र, लाग = लगा, भुइँ = पृथ्वी, लेई = लेकर/छूकर, मोहिं = मुझे, बिनु पिउ = प्रिय के बिना, आदर = सम्मान/सहारा, जिन्ह घर कंता = जिनके घर पति हैं, सुखी = सुखी, गारौ = गर्व, गर्ब = अभिमान, बाहिरै = बाहर, सुख भूला = सुख भूल गया, सर्ब = सब।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत चौपाई-दोहा मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत में नागमती के वियोग-वर्णन से संबंधित है।

प्रसङ्ग:

प्रियका मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या:

नागमती की पीड़ा क्रमशः तीव्र होती जाती है।

टिप्पणी:

वियोग-श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति,चित्रण।

पद संख्या 05
सावन बरस मेह अति पानी । भरनि परी, हौं बिरह झुरानी ॥ लाग पुनरबसु पीउ न देखा । भइ बाउरि , कहँ कंत सरेखा ॥ रकत कै आँसु परहिं भुइँ टूटी । रेंगि चली जस बीरबहूटी ॥ सखिन्ह रचा पिउ संग हिंडोला । हरियारि भूमि, कुसुंभी चोला ॥ हिय हिंडोल अस डोलै मोरा । बिरह झुलाइ देइ झकझोरा ॥ बाट असूझ अथाह गँभीरी । जिउ बाउर, भा फिरै भँभीरी ॥ जग जल बूड जहाँ लगि ताकी । मोरि नाव खेवक बिनु थाकी ॥ परबत समुद, अगम बिच, बीहड घन बनढाँख । किमि कै भेंटौं कंत तुम्ह ? ना मोहि पाँव न पाँख ॥5॥
शब्दार्थ:

सावन = श्रावण मास, मेह = वर्षा, अति पानी = बहुत अधिक जल, भरनि परी = भर गई, बिरह झुरानी = वियोग में व्याकुल हूँ, पुनरबसु = पुनर्वसु नक्षत्र, पीउ = प्रियतम, बाउरि = पागल/विह्वल, कंत सरेखा = प्रिय के समान, रकत कै आँसु = रक्त के समान लाल आँसू, भुइँ = पृथ्वी, टूटी = टूटकर/गिरकर, रेंगि चली = रेंगकर चलती है, बीरबहूटी = लाल रंग का एक छोटा कीट, सखिन्ह = सखियों ने, रचा = बनाया/सजाया, हिंडोला = झूला, हरियारि भूमि = हरी-भरी धरती, कुसुंभी चोला = कुसुम्भी रंग का वस्त्र, हिय हिंडोल = हृदय का झूला, डोलै = झूलता है, बिरह = वियोग, झुलाइ = झुलाकर, झकझोरा = जोर से हिलाया, बाट = मार्ग, असूझ = दिखाई नहीं देता, अथाह = जिसकी थाह न हो, गँभीरी = गहरी, जिउ = मन/प्राण, भँभीरी = भँवर के समान चक्कर खाता हुआ, जग = संसार, जल बूड = जल में डूबा हुआ, जहाँ लगि = जहाँ तक, नाव = नौका, खेवक = नाव चलाने वाला/नाविक, बिनु थाकी = नाविक के बिना थक गई, परबत = पर्वत, समुद = समुद्र, अगम = दुर्गम, बिच = बीच में, बीहड = दुर्गम/भयानक, घन बनढाँख = घने वन और झाड़ियाँ, किमि कै = कैसे, भेंटौं = मिलूँ, कंत = प्रियतम, पाँव = पैर, पाँख = पंख।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत चौपाई-दोहा मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत में नागमती के वियोग-वर्णन से संबंधित है।

प्रसङ्ग:

प्रियका मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या:

नागमती की पीड़ा क्रमशः तीव्र होती जाती है।

टिप्पणी:

वियोग-श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति,चित्रण।

पद संख्या 06
भा भादों दूभर अति भारी । कैसे भौंर रैनि अँधियारी ॥ मंदिर सून पिउ अनतै बसा । सेज नागिनी फिरि फिरि डसा ॥ रहौं अकेलि गहे एक पाटी । नैन पसारि मरौं हिय फाटी ॥ चमक बीजु, घन गरजि तरासा । बिरह काल होइ जीउ गरासा ॥ बरसै मघा झकोरि झकोरि । मोर दुइ नैन चुवैं जस ओरी ॥ धनि सूखै भरे भादौं माहाँ । अबहुँ न आएन्हि सीचेन्हि नाहाँ ॥ पुरबा लाग भूमि जल पूरी । आक जवास भई तस झूरी ॥ थल जल भरे अपूर सब, धरनि गगन मिलि एक । जनि जोबन अवगाह महँ दे बूडत ,पिउ ! टेक ॥6॥
शब्दार्थ:

भादों = भाद्रपद मास, दूभर = कठिन, अँधियारी = अँधेरी, भौंर = भोर/रात का समय, मंदिर = घर, सून = सूना, अनतै = अन्य स्थान पर, सेज नागिनी = शय्या सर्पिणी के समान, डसा = डसती है, अकेलि = अकेली, पाटी = खाट/पलंग, नैन पसारि = आँखें फैलाकर, हिय फाटी = हृदय विदीर्ण होकर, चमक बीजु = बिजली चमकती है, घन = बादल, गरजि = गरजकर, तरासा = भयभीत करता है, जीउ = प्राण, गरासा = ग्रस लिया, मघा = मघा नक्षत्र, झकोरि = झकझोरकर, मोर दुइ नैन = मेरे दोनों नेत्र, चुवैं = बरसते हैं, ओरी = वर्षा की झड़ी के समान, धनि = धन्य/स्त्री, सूखै = सूखती है, भरे भादौं माहाँ = भादों में जल से भरा होने पर भी, अबहुँ = अब तक, आएन्हि = आए, सीचेन्हि = सींचा, नाहाँ = पति ने, पुरबा = पूर्वी हवा, भूमि जल पूरी = धरती जल से भर गई, आक = आक का पौधा, जवास = जवास का पौधा, झूरी = सूखी/कुम्हलाई हुई, थल जल = स्थल और जल, अपूर = अथाह/असीम, धरनि = पृथ्वी, गगन = आकाश, मिलि एक = एक हो गए, जनि = मानो, जोबन = यौवन, अवगाह = डूबना/जल में प्रवेश, बूडत = डूबते हुए, टेक = सहारा।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत चौपाई-दोहा मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत में नागमती के वियोग-वर्णन से संबंधित है।

प्रसङ्ग:

प्रियका मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या:

नागमती की पीड़ा क्रमशः तीव्र होती जाती है।

टिप्पणी:

वियोग-श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति,चित्रण।

पद संख्या 07
लाग कुवार, नीर जग घटा । अबहूँ आउ, कंत! तन लटा ॥ तोहि देखे, पिउ ! पलुहै कया । उतरा चीतु, बहुरि करु मया ॥ चित्रा मित्र मीन कर आवा । पपिहा पीउ पुकारत पावा ॥ उआ अगस्त, हरित-घन गाजा । तुरय पलानि चढे रन राजा ॥ स्वाति-बूँद चातक मुख परे । समुद सीप मोती सब भरे ॥ सरवर सँवरि हंस चलि आए । सारस कुरलहिं, खँजन देखाए ॥ भा परगास, काँस बन फूले । कंत न फिरे, बिदेसहि भूले ॥ बिरह-हस्ति तन सालै, घाय करै चित चूर । वेगि आइ, पिउ ! बाजहु, गाजहु होइ सदूर ॥7॥
शब्दार्थ:

कुवार = आश्विन मास, नीर = जल, जग = संसार, घटा = घट गया, तन लटा = शरीर क्षीण हो गया, तोहि देखे = तुम्हें देखकर, पलुहै = हरा-भरा/प्रफुल्लित होगा, कया = शरीर, उतरा चीतु = मन को शान्ति मिलेगी, बहुरि = फिर, मया = कृपा/प्रेम, चित्रा = चित्रा नक्षत्र, मित्र = मित्रवत/सूर्य, मीन = मछली, कर आवा = हाथ में आया, पपिहा = चातक पक्षी, पीउ = प्रियतम, उआ = उदित हुआ, अगस्त = अगस्त्य तारा, हरित-घन = हरे/जल से भरे बादल, तुरय = घोड़े, पलानि = काठी, रन राजा = युद्ध के लिए राजा, स्वाति-बूँद = स्वाति नक्षत्र की बूँद, चातक = पपीहा, मुख परे = मुँह में पड़ी, समुद = समुद्र, सीप = शुक्ति, मोती = मुक्ताफल, सरवर = तालाब, सँवरि = सुन्दर होकर, हंस = राजहंस, सारस = सारस पक्षी, कुरलहिं = पुकारते हैं, खँजन = खंजन पक्षी, परगास = प्रकाश, काँस = काश नामक घास, फूले = फूल गए, बिदेस = विदेश, न फिरे = लौटकर नहीं आए, भूले = भूल गए, बिरह-हस्ति = वियोगरूपी हाथी, तन = शरीर, सालै = पीड़ित करता है, घाय = घाव, चित चूर = हृदय को चूर-चूर, वेगि = शीघ्र, बाजहु = बिना बाजे/बिना देर किए, सदूर = दूर।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत चौपाई-दोहा मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत में नागमती के वियोग-वर्णन से संबंधित है।

प्रसङ्ग:

प्रियका मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या:

नागमती की पीड़ा क्रमशः तीव्र होती जाती है।

टिप्पणी:

वियोग-श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति,चित्रण।

पद संख्या 08
कातिक सरद-चंद उजियारी । जग सीतल, हौं बिरहै जारी ॥ चौदह करा चाँद परगासा । जनहुँ जरैं सब धरति अकासा ॥ तम मन सेज करै अगिदाहू । सब कहँ चंद, खएउ मोहिं राहू ॥ चहूँ खंड लागै अँधियारा । जौं घर नाहीं कंत पियारा ॥ अबहूँ, निठुर ! आउ एहि बारा । परब देवारी होइ संसारा ॥ सखि झूमक गावैं अँग मोरी । हौं झुरावँ, बिछुरी मोरि जोरी ॥ जेहि घर पिउ सो मनोरथ पूजा । मो कहँ बिरह, सवति दुख दूजा ॥ सखि मानैं तिउहार सब गाइ, देवारी खेलि । हौं का गावौं कंत बिनु, रही छार सिर मेलि ॥8॥
शब्दार्थ:

कातिक = कार्तिक मास, सरद-चंद = शरद ऋतु का चन्द्रमा, उजियारी = उज्ज्वल प्रकाश, सीतल = शीतल, बिरहै = वियोग में, जारी = जल रही हूँ, चौदह करा = चौदह कलाओं से पूर्ण, परगासा = प्रकाशित, जनहुँ = मानो, धरति = पृथ्वी, अकासा = आकाश, तम = अन्धकार, मन सेज = मन की शय्या, अगिदाहू = अग्नि की जलन, खएउ = खा गया/नष्ट कर दिया, राहू = राहु, चहूँ खंड = चारों दिशाओं में, अँधियारा = अन्धकार, जौं = यदि, कंत पियारा = प्रिय पति, अबहूँ = अब भी, निठुर = निर्दयी, एहि बारा = इस समय, परब = पर्व, देवारी = दीपावली, संसारा = संसार, सखि = सखियाँ, झूमक = झूमकर/उल्लासपूर्वक, अँग मोरी = मेरे अंगों के पास/मेरी सखियाँ, झुरावँ = व्याकुल होती हूँ, बिछुरी = बिछुड़ी हुई, जोरी = जोड़ी, जेहि घर पिउ = जिस घर पति है, मनोरथ पूजा = मनोकामना पूरी होना, मो कहँ = मेरे लिए, सवति = सौत, दुख दूजा = दूसरा दुःख, मानैं = मनाती हैं, तिउहार = त्योहार, गाइ = गाकर, देवारी = दीपावली, खेलि = मनाकर/उत्सव करके, कंत बिनु = प्रिय के बिना, छार = राख, सिर मेलि = सिर पर डालकर।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत चौपाई-दोहा मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत में नागमती के वियोग-वर्णन से संबंधित है।

प्रसङ्ग:

प्रियका मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या:

नागमती की पीड़ा क्रमशः तीव्र होती जाती है।

टिप्पणी:

वियोग-श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति,चित्रण।

पद संख्या 09
अगहन दिवस घटा, निसि बाढी । दुभर रैनि, जाइ किमि गाढी ? ॥ अब यहि बिरह दिवस भा राती । जरौं बिरह जस दीपक बाती ॥ काँपै हिया जनावै सीऊ । तौ पै जाइ होइ सँग पीऊ ॥ घर घर चीर रचे सब काहू । मोर रूप-रँग लेइगा नाहू ॥ पलटि त बहुरा गा जो बिछोई । अबहुँ फिरै, फिरै रँग सोई ॥ वज्र-अगिनि बिरहिन हिय जारा । सुलुगि-सुलुगि दगधै होइ छारा ॥ यह दुख-दगध न जानै कंतू । जोबन जनम करै भसमंतू ॥ पिउ सौ कहेहु सँदेसडा, हे भौंरा ! हे काग ! सो धनि बिरहै जरि मुई, तेहि क धुवाँ हम्ह लाग ॥9॥
शब्दार्थ:

अगहन = मार्गशीर्ष मास, दिवस = दिन, घटा = घट गया, निसि = रात, बाढी = बढ़ गई, दुभर = कठिन, रैनि = रात्रि, गाढी = गहरी, बिरह = वियोग, राती = रात, जरौं = जलती हूँ, दीपक बाती = दीपक की बत्ती, काँपै = काँपता है, हिया = हृदय, जनावै = अनुभव कराता है, सीऊ = शीत/ठंड, तौ पै = तभी, सँँग = साथ, चीर = वस्त्र, रचे = बनाते/सजाते हैं, सब काहू = सभी लोग, रूप-रँग = सौन्दर्य और रंग, लेइगा = ले गया, नाहू = पति, पलटि = लौटकर, बहुरा = फिर से, बिछोई = बिछुड़ा हुआ, रँग = सौन्दर्य/उल्लास, वज्र-अगिनि = वज्र के समान तीव्र अग्नि, हिय = हृदय, जारा = जला दिया, सुलुगि-सुलुगि = धीरे-धीरे सुलगकर, दगधै = जलती है, छारा = राख, दुख-दगध = दुःख से जला हुआ, कंतू = प्रियतम, जोबन = यौवन, जनम = जीवन, भसमंतू = भस्म करने वाला, पिउ सौ = प्रिय से, कहेहु = कहना, सँदेसडा = संदेश, भौंरा = भ्रमर, काग = कौआ, धनि = स्त्री/प्रिया, बिरहै = वियोग में, जरि मुई = जलकर मर गई, धुवाँ = धुआँ, हम्ह लाग = हमें लगा/हम तक पहुँचा।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत चौपाई-दोहा मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत में नागमती के वियोग-वर्णन से संबंधित है।

प्रसङ्ग:

प्रियका मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या:

नागमती की पीड़ा क्रमशः तीव्र होती जाती है।

टिप्पणी:

वियोग-श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति,चित्रण।

पद संख्या 10
पूस जाड थर थर तन काँपा । सुरुज जाइ लंका-दिसि चाँपा ॥ बिरह बाढ, दारुन भा सीऊ । कँपि कँपि मरौं, लेइ हरि जीऊ ॥ कंत कहाँ लागौं ओहि हियरे । पंथ अपार, सूझ नहिं नियरे ॥ सौंर सपेती आवै जूडी । जानहु सेज हिवंचल बूडी ॥ चकई निसि बिछूरे दिन मिला । हौं दिन राति बिरह कोकिला ॥ रैनि अकेलि साथ नहिं सखी । कैसे जियै बिछोही पखी ॥ बिरह सचान भएउ तन जाडा । जियत खाइ औ मुए न छाँडा ॥ रकत ढुरा माँसू गरा, हाड भएउ सब संख । धनि सारस होइ ररि मुई, पाउ समेटहि पंख ॥10॥
शब्दार्थ:

पूस = पौष मास, जाड = ठंड, थर-थर = काँपते हुए, तन = शरीर, काँपा = काँप उठा, सुरुज = सूर्य, लंका-दिसि = दक्षिण दिशा की ओर, चाँपा = चला गया, बिरह = वियोग, बाढ = बढ़ गया, दारुन = अत्यन्त कष्टदायक, सीऊ = शीत, कँपि-कँपि = काँपते-काँपते, हरि जीऊ = प्राण हर लेता है, कंत = प्रियतम, कहाँ लागौं = कहाँ जाकर लगूँ, हियरे = हृदय से, पंथ = मार्ग, अपार = जिसका पार न हो, नियरे = पास, सौंर सपेती = शीत की सफेदी, जूडी = ज्वर/ठंड से होने वाली कंपकंपी, हिवंचल = हिमाचल पर्वत, चकई = चकवा पक्षी की स्त्री, निसि = रात, बिछूरे = बिछुड़ी हुई, दिन मिला = दिन में मिलती है, बिछोही = वियोगिनी, सचान = बाज/शिकारी पक्षी, जियत खाइ = जीवित ही खा जाता है, मुए = मरने पर, न छाँडा = नहीं छोड़ता, रकत ढुरा = रक्त बह गया, माँसू गरा = मांस गल गया, हाड = हड्डियाँ, संख = शंख के समान, धनि = धन्य/वह स्त्री, सारस = सारस पक्षी, ररि मुई = रोते-रोते मर गई, पाउ समेटहि पंख = पैर समेटकर पंखों में छिपा लेती है।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत चौपाई-दोहा मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत में नागमती के वियोग-वर्णन से संबंधित है।

प्रसङ्ग:

प्रियका मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या:

नागमती की पीड़ा क्रमशः तीव्र होती जाती है।

टिप्पणी:

वियोग-श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति,चित्रण।

पद संख्या 11
लागेउ माघ, परै अब पाला । बिरह काल भएउ जड काला ॥ पहल पहल तन रूई झाँपै । हहरि हहरि अधिकौ हिय काँपै॥ आइ सूर होइ तपु, रे नाहा । तोहि बिनु जाड न छूटै माहा ॥ एहि माह उपजै रसमूलू । तू सो भौंर, मोर जोबन फूलू ॥ नैन चुवहिं जस महवट नीरू । तोहि बिनु अंग लाग सर-चीरू ॥ टप टप बूँद परहिं जस ओला । बिरह पवन होइ मारै झोला ॥ केहि क सिंगार, कौ पहिरु पटोरा । गीउ न हार, रही होइ डोरा ॥ तुम बिनु कापै धनि हिया, तन तिनउर भा डोल । तेहि पर बिरह जराइ कै चहै उढावा झोल ॥11॥
शब्दार्थ:

माघ = माघ मास, पाला = हिम/कड़ाके की ठंड, बिरह काल = वियोग का समय, जड = जड़वत्/निश्चेष्ट, पहल-पहल = आरम्भ में, रूई = कपास, झाँपै = ढकती है, हहरि-हहरि = तीव्रता से, अधिकौ = और अधिक, हिय = हृदय, सूर = सूर्य, तपु = ताप/गर्मी, नाहा = नाथ/प्रियतम, तोहि बिनु = तुम्हारे बिना, माह = मास, रसमूलू = रस का मूल/रस उत्पन्न करने वाला, भौंर = भ्रमर, जोबन = यौवन, महवट नीरू = माघ की वर्षा का जल, अंग = शरीर, सर-चीरू = बाण के समान वस्त्र/वस्त्र भी चुभने वाला, ओला = ओले, बिरह पवन = वियोग की पीड़ा रूपी हवा, झोला = झोंका/आघात, सिंगार = श्रृंगार, पटोरा = सुन्दर वस्त्र, गीउ = शरीर, डोरा = धागे के समान कृश शरीर, कापै = काँपता है, धनि = विरहिणी स्त्री, तिनउर = तिनके के समान, डोल = काँपता/हिलता हुआ, जराइ कै = जलाकर, उढावा झोल = राख की झोली उड़ाना चाहता है।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत चौपाई-दोहा मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत में नागमती के वियोग-वर्णन से संबंधित है।

प्रसङ्ग:

प्रियका मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या:

नागमती की पीड़ा क्रमशः तीव्र होती जाती है।

टिप्पणी:

वियोग-श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति,चित्रण।

पद संख्या 12
फागुन पवन झकोरा बहा । चौगुन सीउ जाइ नहिं सहा ॥ तन जस पियर पात भा मोरा । तेहि पर बिरह देइ झकझोरा ॥ तरिवर झरहि झरहिं बन ढाखा । भइ ओनंत फूलि फरि साखा ॥ करहिं बनसपति हिये हुलासू । मो कहँ भा जग दून उदासू ॥ फागु करहिं सब चाँचरि जोरी । मोहि तन लाइ दीन्ह जस होरी ॥ जौ पै पीउ जरत अस पावा । जरत-मरत मोहिं रोष न आवा ॥ राति-दिवस सब यह जिउ मोरे । लगौं निहोर कंत अब तोरे ॥ यह तन जारों छार कै, कहौं कि `पवन ! उडाव' । मकु तेहि मारग उडि परै कंत धरै जहँ पाव ॥12॥
शब्दार्थ:

फागुन = फाल्गुन मास, पवन = वायु, झकोरा = तेज झोंका, चौगुन = चार गुना, सीउ = शीत, पियर पात = पीला पत्ता, तरिवर = वृक्ष, झरहि = झड़ते हैं, ढाखा = पलाश के वृक्ष, ओनंत = अनन्त/असंख्य, साखा = शाखाएँ, बनसपति = वनस्पतियाँ, हुलासू = प्रसन्नता, उदासू = दुःखी, फागु = होली का उत्सव, चाँचरि = होली का गीत/नृत्य, जोरी = समूह बनाकर, होरी = होली, पीउ = प्रियतम, जरत = जलता हुआ, रोष = क्रोध, निहोर = विनय/प्रार्थना, कंत = प्रियतम, जारों = जला दूँ, छार = राख, उडाव = उड़ा दे, मकु = कदाचित्/शायद, मारग = मार्ग, धरै = रखे/धारण करे, पाव = पैर।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत चौपाई-दोहा मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत में नागमती के वियोग-वर्णन से संबंधित है।

प्रसङ्ग:

प्रियका मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या:

नागमती की पीड़ा क्रमशः तीव्र होती जाती है।

टिप्पणी:

वियोग-श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति,चित्रण।

पद संख्या 13
चैत बसंता होइ धमारी । मोहिं लेखे संसार उजारी ॥ पंचम बिरह पंच सर मारे । रकत रोइ सगरौं बन ढारै ॥ बूडि उठे सब तरिवर-पाता । भीजि मजीठ, टेसु बन राता ॥ बौरे आम फरैं अब लागै । अबहुँ आउ घर, कंत सभागे ! ॥ सहस भाव फूलीं बनसपती । मधुकर घूमहिं सँवरि मालती ॥ मोकहँ फूल भए सब काँटे । दिस्टि परत जस लागहिं चाँटे ॥ फिर जोबन भए नारँग साखा । सुआ-बिरह अब जाइ न राखा ॥ घिरिन परेवा होइ, पिउ ! आउ बेगि ,परु टूटि । नारि पराए हाथ है, तोह बिनु पाव न छूटि ॥13॥
शब्दार्थ:

चैत = चैत्र मास, बसंता = वसन्त ऋतु, धमारी = धूमधाम/उल्लास, मोहिं लेखे = मेरी दृष्टि में, उजारी = उजाड़/सूना, पंचम = पंचम स्वर, बिरह = वियोग, पंच सर = कामदेव के पाँच बाण, रकत = रक्त, सगरौं = सम्पूर्ण, ढारै = बहाता/गिराता है, बूडि उठे = भीगकर उभर आए, तरिवर-पाता = वृक्षों के पत्ते, मजीठ = लाल रंग, टेसु = पलाश, बौरे = मंजरियों से भर गए, फरैं = फलने लगे, सभागे = सौभाग्यशाली, सहस भाव = हजारों प्रकार के भाव/रूप, मधुकर = भौंरे, घूमहिं = घूमते हैं, दिस्टि = दृष्टि, चाँटे = डंक/चोट के समान, नारँग = नारंगी के वृक्ष, साखा = शाखाएँ, सुआ-बिरह = सुग्गे के समान बोलने वाले प्रिय के वियोग का दुःख, घिरिन = घिरा हुआ/बंधन में पड़ा, परेवा = कबूतर, बेगि = शीघ्र, परु टूटि = बंधन तोड़कर आओ, नारि पराए हाथ = स्त्री दूसरे के अधिकार में है, पाव = पैर/बंधन, छूटि = मुक्ति।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत चौपाई-दोहा मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत में नागमती के वियोग-वर्णन से संबंधित है।

प्रसङ्ग:

प्रियका मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या:

नागमती की पीड़ा क्रमशः तीव्र होती जाती है।

टिप्पणी:

वियोग-श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति,चित्रण।

पद संख्या 14
भा बैसाख तपनि अति लागी । चोआ चीर चंदन भा आगि ॥ सूरुज जरत हिवंचल तअका । बिरह -बजागि सौंह रथ हाँका ॥ जरत बजागिनि करु, पिउ ! छाहाँ । आइ बुझाउ, अँगारन्ह माहाँ ॥ तोहि दरसन होइ सीतल नारी । आइ आगि तें करु फुलवारी ॥ लागिउँ जरै, जरै जस भारू । फिर फिर भूंजेसि, तजेउँ न बारू ॥ सरवर-हिया घटत निति जाई । टूक-टूक होइ कै बिहराई ॥ बिहरत हिया करहु, पिउ ! टेका । दीठी-दवँगरा मेरवहु एका ॥ कँवल जो मानसर बिनु जल गएउ सुखाइ । कवहुँ बेलि फिरि पलुहै जौ पिउ सींचै आइ ॥14॥
शब्दार्थ:

बैसाख = वैशाख मास, तपनि = गर्मी/ताप, चोआ = सुगन्धित लेप, चीर = वस्त्र, चंदन = चन्दन का लेप, सूरुज = सूर्य, हिवंचल = हिमालय, तअका = तपाने लगा, बिरह-बजागि = वियोग की अग्नि, सौंह = शपथ लेकर, रथ हाँका = रथ चलाया, बजागिनि = अग्नि, छाहाँ = छाया, बुझाउ = बुझा दो, अँगारन्ह = अंगारों, दरसन = दर्शन, सीतल = शीतल, आगि तें = अग्नि से, फुलवारी = फूलों का उद्यान, लागिउँ = लगी हुई हूँ, जरै = जलती है, भारू = बोझ/भार, भूंजेसि = भूनता/जलाता रहा, तजेउँ न बारू = छोड़ने में देर नहीं की, सरवर-हिया = सरोवर के समान हृदय, घटत = घटता, टूक-टूक = टुकड़े-टुकड़े, बिहराई = बिखर गया, बिहरत = बिछुड़ता/व्याकुल होता हुआ, टेका = सहारा, दीठी-दवँगरा = दृष्टि की दोनों धाराएँ/दृष्टि, मेरवहु = मिला दो, कँवल = कमल, मानसर = मानसरोवर, सुखाइ = सूख गया, कवहुँ = कभी, बेलि = लता, पलुहै = फिर हरी-भरी हो जाए, सींचै = जल दे।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत चौपाई-दोहा मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत में नागमती के वियोग-वर्णन से संबंधित है।

प्रसङ्ग:

प्रियका मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या:

नागमती की पीड़ा क्रमशः तीव्र होती जाती है।

टिप्पणी:

वियोग-श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति,चित्रण।

पद संख्या 15
जेठ जरै जग चलै लुवारा । उठहि बवंडर परहिं अँगारा ॥ बिरह गाजि हनुवंत होइ जागा । लंका-दाह करै तनु लागा ॥ चारिहु पवन झकोरे आगी । लंका दाहि पलंका लागी ॥ दहि भइ साम नदी कालिंदी । बिरह क आगि कठिन अति मंदी ॥ उठै आगि औ आवै आँधी । नैन न सूझ, मरौ दुःख-बाँधी ॥ अधजर भइउ, माँसु तनु सूखा । लागेउ बिरह काल होइ भूखा ॥ माँसु खाइ सब हाडन्ह लागै । अबहुँ आउ; आवत सुनि भागै ॥ गिरि, समुद्र, ससि, मेघ, रबि सहि न सकहिं वह आगि । मुहमद सती सराहिए, जरै जो अस पिउ लागि ॥15॥
शब्दार्थ:

जेठ = ज्येष्ठ मास, जरै = जल रहा है, लुवारा = लू चलने वाला, बवंडर = धूल का चक्रवात, अँगारा = जलता हुआ कोयला, बिरह = वियोग, गाजि = गर्जना करके, हनुवंत = हनुमान, लंका-दाह = लंका को जलाना, तनु = शरीर, चारिहु पवन = चारों दिशाओं की वायु, झकोरे = तेज झोंके, आगी = आग, पलंका = पलंग/शय्या, दहि = जलकर, साम = श्याम/काली, कालिंदी = यमुना नदी, मंदी = प्रचण्ड/तीव्र, आँधी = तेज हवा, दुःख-बाँधी = दुःख से बँधी हुई, अधजर = आधा जला हुआ, माँसु = मांस, हाडन्ह = हड्डियों पर, लागै = लग जाता है/चिपक जाता है, सुनि = सुनकर, भागै = भाग जाता है, गिरि = पर्वत, समुद्र = सागर, ससि = चन्द्रमा, मेघ = बादल, रबि = सूर्य, सहि न सकहिं = सहन नहीं कर सकते, मुहमद = कवि का नाम, सती = पतिव्रता स्त्री, सराहिए = प्रशंसा करनी चाहिए, पिउ लागि = प्रियतम के प्रेम में।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत चौपाई-दोहा मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत में नागमती के वियोग-वर्णन से संबंधित है।

प्रसङ्ग:

प्रियका मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या:

नागमती की पीड़ा क्रमशः तीव्र होती जाती है।

टिप्पणी:

वियोग-श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति,चित्रण।

पद संख्या 16
तपै लागि अब जेठ-असाढी । मोहि पिउबिनु छाजनि भइ गाढी ॥ तन तिनउर भा, झूरौं खरी । भइ बरखा, दुख आगरि जरी ॥ बंध नाहिं औ कंध न कोई । बात न आव कहौं का रोई ?॥ साँठि नाहिं,जग बात को पूछा ?। बिनु जिउ फिरै मूँज-तनु छूँछा ॥ भइ दुहेली टेक बिहूनी । थाँभ नाहि उठि सकै न थूनी ॥ बरसै मेह, चुवहिं नैनाहा । छपर छपर होइ रहि बिनु नाहा ॥ कोरौं कहाँ ठाट नव साजा ?। तुम बिनु कंत न छाजन छाजा ॥ अबहूँ मया-दिस्ट करि, नाह निठुर ! घर आउ । मँदिर उजार होत है, नव कै आई बसाउ ॥16॥
शब्दार्थ:

जेठ-असाढ़ी = जेठ और आषाढ़ के महीने, तपै = तपता है, छाजनि = छाया/छाजन, गाढी = घनी/कठिन, तिनउर = तिनके के समान, झूरौं = सूखती/कृश होती हूँ, आगरि = आगे/अत्यधिक, बंध = बन्धु/सहारा, कंध = कन्धा/साथ देने वाला, साँठि = सम्बन्ध/सहयोग, मूँज-तनु = मूँज की तरह सूखा शरीर, छूँछा = खाली/निःसार, दुहेली = दुःखी/कष्टपूर्ण, टेक = सहारा, बिहूनी = रहित, थाँभ = स्तम्भ/सहारा, थूनी = खम्भा/आधार, मेह = वर्षा, नैनाहा = नेत्रों से, छपर-छपर = लगातार टपकने की ध्वनि, नाहा = नाथ/प्रियतम, कोरौं = किस प्रकार बनाऊँ/सजाऊँ, ठाट = सजावट/व्यवस्था, नव साजा = नई सजावट, छाजन छाजा = छाया/सहारा अच्छा लगता है, मया-दिस्ट = दया की दृष्टि, निठुर = निर्दयी, मँदिर = घर, उजार = उजाड़, नव कै = फिर से नया करके, बसाउ = बसा दूँ।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत चौपाई-दोहा मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत में नागमती के वियोग-वर्णन से संबंधित है।

प्रसङ्ग:

प्रियका मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या:

नागमती की पीड़ा क्रमशः तीव्र होती जाती है।

टिप्पणी:

वियोग-श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति,चित्रण।

पद संख्या 17
रोइ गँवाए बारह मासा । सहस सहस दुख एक एक साँसा ॥ तिल तिल बरख बरख परि जाई । पहर पहर जुग जुग न सेराई ॥ सो नहिं आवै रूप मुरारी । जासौं पाव सोहाग सुनारी ॥ साँझ भए झुरु झुरि पथ हेरा । कौनि सो घरी करै पिउ फेरा ?॥ दहि कोइला भइ कंत सनेहा । तोला माँसु रही नहिं देहा ॥ रकत न रहा, बिरह तन गरा । रती रती होइ नैनन्ह ढरा ॥ पाय लागि जोरै धनि हाथा । जारा नेह, जुडावहु, नाथा ॥ बरस दिवस धनि रोइ कै, हारि परी चित झंखि । मानुष घर घर बझि कै, बूझै निसरी पंखि ॥17॥
शब्दार्थ:

बारह मासा = बारह महीने, सहस सहस = हजारों-हजारों, साँसा = श्वास, तिल-तिल = थोड़ा-थोड़ा करके, बरख = वर्ष, पहर = समय की एक अवधि, जुग-जुग = युगों के समान, सेराई = समाप्त होती/बीतती, रूप मुरारी = भगवान् कृष्ण के समान सुन्दर प्रियतम, सोहाग = सौभाग्य/पति-प्रेम, सुनारी = सुन्दरी स्त्री, साँझ = संध्या, पथ हेरा = मार्ग देखती रही, पिउ फेरा = प्रियतम का लौटना, कोइला = कोयला, कंत सनेहा = प्रियतम का प्रेम, तोला = थोड़ा-सा, देहा = शरीर, बिरह = वियोग, गरा = गल गया, रती-रती = थोड़ा-थोड़ा, नैनन्ह = आँखों से, ढरा = बहा, पाय लागि = चरणों में लगकर, धनि = विरहिणी स्त्री, जारा नेह = जलाने वाले प्रेम, जुड़ावहु = शान्त/शीतल करो, नाथा = स्वामी/प्रियतम, हारि परी = थककर निराश हो गई, चित झंखि = मन व्याकुल हुआ, मानुष घर घर = मनुष्यों के प्रत्येक घर में, बझि कै = बाँधकर/फँसाकर, बूझै = पूछता/जानता है, निसरी पंखि = निकलकर उड़ जाने वाला पक्षी।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत चौपाई-दोहा मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत में नागमती के वियोग-वर्णन से संबंधित है।

प्रसङ्ग:

प्रियका मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या:

नागमती की पीड़ा क्रमशः तीव्र होती जाती है।

टिप्पणी:

वियोग-श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति,चित्रण।

पद संख्या 18
भई पुछार, लीन्ह बनवासू । बैरिनि सवति दीन्ह चिलवाँसू ॥ होइ खर बान बिरह तनु लागा । जौ पिउ आवै उडहि तौ कागा ॥ हारिल भई पंथ मैं सेवा । अब तहँ पठवौं कौन परेवा ?॥ धौरी पंडुक कहु पिउ नाऊँ । जौं चित रोख न दूसर ठाऊँ ॥ जाहि बया होइ पिउ कँठ लवा । करै मेराव सोइ गौरवा ॥ कोइल भई पुकारति रही । महरि पुकारै `लेइ लेइ दही' पेड तिलोरी औ जल हंसा । हिरदय पैठि बिरह कटनंसा ॥ जेहि पखी के निअर होइ कहै बिरह कै बात । सोई पंखी जाइ जरि, तरिवर होइ निपात ॥18॥
शब्दार्थ:

पुछार = पछुआ हवा/पश्चिमी वायु, बनवासू = वनवास, बैरिनि = शत्रु के समान, सवति = सौत, चिलवाँसू = चिल्लाकर/कष्ट देकर रहने की स्थिति, खर बान = तीक्ष्ण बाण, बिरह = वियोग, उडहि = उड़ जाएँ, कागा = कौआ, हारिल = एक पक्षी, पंथ = मार्ग, सेवा = सेवा/प्रतीक्षा, परेवा = कबूतर, धौरी = सफेद, पंडुक = एक प्रकार का पक्षी, नाऊँ = नाम, चित रोख = मन का लगाव, बया = एक पक्षी, कँठ लवा = गले से लगाना, मेराव = मिलाना/मिलाप कराना, गौरवा = गौरैया, कोइल = कोयल, पुकारति = पुकारती, महरि = ग्वालिन/दही बेचने वाली स्त्री, तिलोरी = एक पक्षी, हंसा = हंस, हिरदय पैठि = हृदय में प्रवेश करके, कटनंसा = काटने वाला/पीड़ा देने वाला, निअर = निकट, बिरह कै बात = वियोग की बात, जरि = जलकर, तरिवर = वृक्ष, निपात = विनाश/पतन।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत चौपाई-दोहा मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत में नागमती के वियोग-वर्णन से संबंधित है।

प्रसङ्ग:

प्रियका मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या:

नागमती की पीड़ा क्रमशः तीव्र होती जाती है।

टिप्पणी:

वियोग-श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति,चित्रण।

पद संख्या 19
कुहुकि कुहुकि जस कोइल रोई । रकत-आँसु घुँघुची बन बोई ॥ भइ करमुखी नैन तन राती । को सेराव ? बिरहा-दुख ताती ॥ जहँ जहँ ठाढि होइ वनबासी । तहँ तहँ होइ घुँघुचि कै रासी ॥ बूँद बूँद महँ जानहुँ जीऊ । गुंजा गूँजि करै `पिउ पीऊ '॥ तेहि दुख भए परास निपाते । लोहू बुडि उठे होइ राते ॥ राते बिंब भीजि तेहि लोहू । परवर पाक, फाट हिय गोहूँ ॥ दैखौं जहाँ होइ सोइ राता । जहाँ सो रतन कहै को बाता ? ॥ नहिं पावस ओहि देसरा:नहिं हेवंत बसंत । ना कोकिल न पपीहरा, जेहि सुनि आवै कंत ॥19॥
शब्दार्थ:

कुहुकि-कुहुकि = बार-बार कूककर, कोइल = कोयल, रकत-आँसु = रक्त के समान लाल आँसू, घुँघुची = लाल-काली बीज वाली लता, बोई = बोई/उत्पन्न की, करमुखी = काले मुख वाली, नैन = आँखें, राती = लाल, सेराव = शान्ति/सान्त्वना दे, ताती = तीव्र/जलाने वाली, ठाढि = खड़ी, वनबासी = वन में रहने वाली/विरहिणी, रासी = ढेर, बूँद-बूँद = प्रत्येक बूँद में, जीऊ = प्राण/जीवन, गुंजा = लाल-काली रंग की वनस्पति का बीज, गूँजि = गूँजकर, परास = पलाश, निपाते = झड़कर गिर पड़े, लोहू = रक्त, बुडि उठे = डूबकर उभर आए, राते = लाल, बिंब = बिम्बफल, भीजि = भीगकर, परवर = परवल, पाक = पकना, फाट = फट गया, हिय गोहूँ = हृदय रूपी गेहूँ, दैखौं = देखती हूँ, राता = लाल, रतन = रत्न, देसरा = देश/प्रदेश, पावस = वर्षा ऋतु, हेवंत = हेमन्त ऋतु, बसंत = वसन्त ऋतु, पपीहरा = पपीहा, जेहि सुनि = जिसे सुनकर, आवै कंत = प्रियतम लौट आए।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत चौपाई-दोहा मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत में नागमती के वियोग-वर्णन से संबंधित है।

प्रसङ्ग:

प्रियका मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या:

नागमती की पीड़ा क्रमशः तीव्र होती जाती है।

टिप्पणी:

वियोग-श्रृंगार की मार्मिक अभिव्यक्ति,चित्रण।

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