कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम् के आधार पर दुष्यन्त के व्यक्तित्व, गुण, स्वभाव, त्रुटियों और नाट्य-महत्त्व का विस्तृत अध्ययन।
दुष्यन्त का चरित्र-चित्रण (हिन्दी में)
1. युवा दुष्यन्त —
अभिज्ञानशाकुन्तल का नायक राजा दुष्यन्त एक सुन्दर शरीर वाला युवक है। इसका शरीर विशाल तथा दृढ़ है। दुष्यन्त के स्वरूप को देखकर प्रियम्बदा सोचती है — 'को न खलु एष दुरवगाहगम्भीराकृतिः मधुरमालपन् प्रभुत्वदाक्षिण्यं विस्तारयति।' राजा को पहली बार देखकर अनसूया कहती है — 'आर्यस्य मधुरालापजनितो विस्रम्भो मामालापयति।' ऋषि कुमारों ने दुष्यन्त की आकृति को देखकर कहा — 'दीप्तिमतोऽपि विश्वसनीयताऽस्य वपुषः।' राजा दुष्यन्त देखने में नगर परिप्रांशु बाहु हैं तथा अनवरत धनुर्ज्यास्फालन क्रूरवर्ष्मा है। पौरुष सम्पन्न राजा को मृगया का व्यसन है। वह इन्द्र की सहायता के लिए स्वर्गलोक जाता है तथा दुर्जय नामक दैत्यगणों का विनाश करता है। इसीलिए दुष्यन्त को देखकर ही महर्षि कश्यप अपनी पत्नी अदिति से कहते हैं।
'पुत्रस्य ते रणशिरस्ययमग्रयायी,
दुष्यन्त इत्यभिहितो भुवनस्यभर्ता।
चापेन यस्य विनिवर्तितकर्मजातम्,
तत् कोटिमत् कुलिशमाभरणं मधोनः।।'
राजा दुष्यन्त राक्षसों से तपोवन की रक्षा करके महर्षि कण्व की अनुपस्थिति में भी ऋषियों की इष्टि को सम्पन्न करवाता है। मातलि द्वारा अदृश्य होकर माधव्य को पीडित किए जाने पर राजा जब अदृश्य मातलि को नहीं देख पाता है तो वह अपने धनुष पर ऐसे बाण को चढ़ाता है जिससे कि अदृश्य तत्त्वों का विनाश किया जा सके। इससे स्पष्ट है कि दुष्यन्त धनुविद्या का पूर्ण जानकार, प्रख्यात शूरवीर और पराक्रमी राजा है।
2. मिष्टभाषी दुष्यन्त —
राजा दुष्यन्त जितना ही बड़ा प्रख्यात वीर और मनोज्ञ शरीर वाला है, वह उतना ही अधिक मिष्टभाषी भी है। जब वह महर्षि कण्व के आश्रम में पहुँचता है और प्रियम्बदा तथा अनसूया के साथ शकुन्तला से उसका प्रथम साक्षात्कार होता है, तो शकुन्तला आदि उसका सत्कार करना चाहती हैं, उस समय वह कहता है — 'दर्शनेनैव भवतीनां सम्भूतसत्कारोऽस्मि।' यही नहीं, जब शाङ्गरव और शारद्वत शकुन्तला को लेकर राजा के पास जाते हैं, तो उस समय दुर्वासा के शाप से ग्रस्त होने के कारण शकुन्तला को न पहचानने पर भी किसी अपशब्द का प्रयोग नहीं करता है। वह उसके लिए सर्वदा 'अत्र भवती' जैसे सम्मानजनक शब्द का ही प्रयोग करता है। यद्यपि शाङ्गरव और शारद्वत राजा के लिए अपमानजनक शब्द का प्रयोग करते हैं।
'आजन्मनः शाठ्यमशिक्षितो यस्तस्या प्रमाणं वचनं जनस्य।
पराभिसन्धानमधीयते यैर्विद्येति ते सन्तु किलाप्तवाचः।'
किन्तु इस तरह की बात सुनकर भी राजा शाङ्गरवादि के लिए किसी अपशब्द का प्रयोग नहीं करता है।
3. सौन्दर्यपारखी दुष्यन्त —
दुष्यन्त सौन्दर्य का बहुत बड़ा समादरकर्ता है। वह सर्वप्रथम जब शकुन्तला को देखता है तो उसके मुख से अचानक निकल जाता है —
'शुद्धान्तदुर्लभमिदं वपुराश्रमवासिनो यदि जनस्य।
दूरीकृताः खलु गुणैरुद्यानलता वनलताभिः॥'
वह शकुन्तला के अव्याजमनोहर शरीर को देखकर उसे तपस्या के लिए अयोग्य समझता है। वल्कल पहनी हुई भी शकुन्तला उसके मन को सहसा आकृष्ट कर लेती है। वह उसके सौन्दर्य की प्रशंसा करते हुए कहता है —
'सरसिजमनुविद्धं शैवलेनापि रम्यम्, मलिनमपि हिमांशोलक्ष्म लक्ष्मी तनोति।
इयमधिकमनोज्ञा बल्कलेनापि तन्वी, किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम्।।'
4. अनेक पत्नियों का स्वामी दुष्यन्त —
हिन्दू शास्त्र की यह मान्यता है कि सामर्थ्य रहने पर अनेक पत्नियों के साथ विवाह करना कोई अनुचित कार्य नहीं है। राजा दुष्यन्त की तीन पत्नियाँ स्पष्ट रूप से हैं। उसने कण्वमुनि की पुत्री शकुन्तला के साथ गान्धर्व विवाह किया। पाँचवें अङ्क में उसकी एक पत्नी सानुमती का भी साक्षात्कार होता है जो संगीतशाला में वीणा पर गाती है।
'अभिनवमधुलोभभावितस्तथा परिचुम्ब्य चूतमञ्जरीम्।
कमलवसतिमात्र निवृतो मधुकर! विस्मृतोऽसि एनां कथम्।।'
राजा की प्रथम पट्टमहिषी देवी वसुमती हैं, जिनका साक्षात्कार अभिज्ञानशाकुन्तल के षष्ठ अङ्क में होता है। द्वितीय अङ्क में माधव्य की बातों से लगता है कि इनके अतिरिक्त भी राजा दुष्यन्त की पत्नियाँ हैं। किन्तु राजा दुष्यन्त किसी भी पत्नी का अनादर नहीं करते हैं। देवी वसुमती का तो वे सर्वदा समादर ही करते हैं। सानुमती को भी वे माधव्य के माध्यम से सान्त्वना दिलाते हैं। दुर्वासा के शाप के कारण भले ही दुष्यन्त शकुन्तला का प्रत्याख्यान कर देते हैं, किन्तु अँगूठी को देख लेने के पश्चात् जब उन्हें अपनी पूर्व परिणीता पत्नी शकुन्तला याद आती है, तो वे शकुन्तला के विरह में उन्मत्त से हो जाते हैं। इस तरह दुष्यन्त एक दक्षिण धीरोदात्त नायक हैं।
5. धार्मिक दुष्यन्त —
राजा दुष्यन्त धार्मिक पुरुष हैं। वे ऋषियों के यज्ञों की रक्षा राक्षसों को दूर करके करते हैं। जब कभी भी वे तपोवन में पहुँचते हैं तो चाहते हैं कि ऋषियों के धर्माचरण में उनके आने से किसी भी प्रकार की बाधा न उत्पन्न हो। शकुन्तला के प्रति आकृष्ट होने पर भी जब माधव्य कहता है कि आप राजा हैं, अतः कभी भी तपोवन में जा सकते हैं, ऋषियों से कर वसूलने के ही बहाने तपोवन में चले आइए, तो वे कहते हैं कि ऋषियों के द्वारा तो मुझे अक्षय पुण्यरूपी कर प्राप्त होता है।
'यदुत्तिष्ठति वर्णेभ्यो नृपाणां क्षयि तद् धनम्।
तपःषड्भागमक्षय्यं ददत्यारण्यका हि नः।।'
मारीचाश्रम में जाकर वे कश्यप तथा अदिति का अभिवादन करना चाहते हैं।
6. भारतीय संस्कृति के संरक्षक दुष्यन्त —
दुष्यन्त भारतीय संस्कृति के पूर्ण संरक्षक हैं। यद्यपि वे शकुन्तला के 'रूपराशि' को देखकर उस पर मोहित हो जाते हैं, फिर भी उन्हें जब तक यह नहीं ज्ञात हो जाता है कि शकुन्तला कण्व की पुत्री नहीं, मेनका नामक अप्सरा में उत्पन्न महर्षि विश्वामित्र की पुत्री है, तब तक वे शकुन्तला के साथ विवाह करने का निश्चय नहीं करते हैं। इसी तरह पञ्चमाङ्क में जब कण्वशिष्य तथा गौतमी शकुन्तला को लेकर दुष्यन्त के समक्ष आते हैं, तब भी राजा शकुन्तला के सौन्दर्य से प्रभावित हो जाते हैं, किन्तु उसे पूर्व परिणीता पत्नी के रूप में याद न कर सकने के कारण परदारग्रहणजन्य होने वाले पाप से डरते हैं।
'इदमुपनतमेवं रूपमक्लिष्टकान्ति-
प्रथमपरिगृहीतं स्यान्न वेत्यध्यवस्यन्।
भ्रमर इव निशान्ते कुन्दमन्तस्तुषारम्
न खलु सपदि भोक्तुं नापि शक्नोमि मोक्तुम्।।'
राजा को अपने चरित्र पर पूर्ण विश्वास है। वे कहते हैं — 'विनिपातः पौरवैर्लभ्यते इत्यश्रद्धेयम् वचः।' संक्षेपतः राजा दुष्यन्त अपनी माताओं का आज्ञाकारी पुत्र, कर्तव्यपरायण, प्रजाप्रेमी, मन से ऋषियों का समादर करने वाला तथा संयत स्वभाव वाला धीरोदात्त नायक है।
7. वीर एवं धनुर्विद्याविशारद दुष्यन्त —
राजा दुष्यन्त देखने में नगरपरिप्रांशु बाहु हैं तथा अनवरत धनुर्ज्यास्फालन क्रूरवर्ष्मा हैं। पौरुष सम्पन्न राजा को मृगया का व्यसन है। वह इन्द्र की सहायता के लिए स्वर्गलोक जाता है तथा दुर्जय नामक दैत्यगणों का विनाश करता है। इसीलिए दुष्यन्त को देखकर ही महर्षि कश्यप अपनी पत्नी अदिति से कहते हैं —
'पुत्रस्य ते रणशिरस्ययमग्रयायी,
दुष्यन्त इत्यभिहितो भुवनस्यभर्ता।
चापेन यस्य विनिवर्तितकर्मजातम्,
तत् कोटिमत् कुलिशमाभरणं मधोनः।।'
8. निष्कर्ष —
दुष्यन्त के स्वभाव में गम्भीरता, प्रेम, दया और वीरता का अद्भुत मेल मिलता है। शकुन्तला के प्रति उनका प्रेम तात्कालिक आकर्षण नहीं, बल्कि हृदय-स्पर्शी और पवित्र है। राजधर्म और निजी जीवन के बीच उत्पन्न द्वन्द्व के कारण वे कठिन परिस्थितियों में पड़ते हैं और यही उनकी चरित्र-यथार्थता को अधिक स्पष्ट करता है। कालिदास ने दुष्यन्त को एक आदर्श नायक की तरह ही नहीं, बल्कि एक मानव के रूप में चित्रित किया है, जिसमें गुण भी हैं और त्रुटियाँ भी।
दुष्यन्त का चरित्र-चित्रण (संस्कृत में)
1. राजर्षिः दुष्यन्तः —
अथ दिव्योदिव्यो वा गुणवान् नायको मतः। साहित्यदर्पणस्य सूक्तेरनुसारेण नाटकस्य नायकः शौर्यवीर्यपराक्रमशीलार्जवमार्दवादि-गुणसम्पन्न इतिहासपुराणादिप्रख्यातवंशे लब्धजनिः स्यात्। अभिज्ञानशाकुन्तलस्यापि नायको राजा दुष्यन्तः इतिहासपुराणप्रख्याते चन्द्रवंशे लब्धजनिः पुरुवंशीयो राजा वर्तते। अभिज्ञानशाकुन्तलस्य अनेकैः पात्रैः वर्णितो राजर्षिः वर्तते। तथा चाह प्रियम्बदानसूयाम् — 'अनसूये! तस्य राजर्षेः प्रथमदर्शनादारभ्य।' इत्यादिकम्। तथा च द्वितीयाङ्के एकः ऋषिकुमारः प्राह — 'अथवा उपपन्नमेतस्मिन् ऋषिकल्पे राजनि। कुतः'
अध्याक्रान्ता वसतिरमुनाऽप्याश्रमे सर्वभोग्ये,
रक्षायोगादयमपि तपः प्रत्यहं सञ्चिनोति।
अस्यापि द्यां स्पृशति वशिनश्चारणद्वन्द्वगीतः
पुण्यः शब्दो मुनिरिति मुहुः केवलं राजपूर्वः।।
2. धीरोदात्तनायको दुष्यन्तः —
राजनि दुष्यन्ते धीरोदात्तनायकस्य समे गुणाः विद्यमानाः सन्ति। साहित्यदर्पणकारो विश्वनाथः धीरोदात्तनायकस्य लक्षणे प्राह —
अविकत्थनः क्षमावानतिगम्भीरो महासत्त्वः,
स्थेयान् निगूढमानो धीरोदात्तो दृढव्रतः कथितः।।
राजा दुष्यन्तः स्वभावेनैवाविकत्थनो वर्तते। सः स्वेनैवात्मप्रशंसां नहि करोति। यदा स दुर्जयनामकं दैत्यगणं हत्वा स्वर्गादायाति तदा मातलिना प्रशंसितः सन् स वक्ति यत् अस्य सम्पूर्णस्य कर्मणः पूर्तिः मयेन्द्रस्य प्रभावेनैव कृता। एतेषु कर्मसु मम किमपि महत्त्वं नास्तीति। राजा अतीवगम्भीरस्वभावो वर्तते। तस्य स्वमनसि महान् विश्वासो वर्तते। शकुन्तला विलोक्य स वक्ति —
'असंशयं क्षत्रपरिग्रहक्षमा यदार्यमस्यामभिलाषि मे मनः,
सतां हि संदेहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः।।'
3. युवा दुष्यन्त —
अभिज्ञानशाकुन्तलस्य नायको राजा दुष्यन्तः मनोज्ञशरीरमवेक्ष्य प्रियम्वदा स्वमनसि विचारयति — 'कोऽनु खलु एष दुरवगाहगम्भीराकृतिः मधुरमालपन् प्रभुत्वदाक्षिण्यं विस्तारयति।' इति। राजानं प्रथमं विलोक्य अनसूया वक्ति — 'आर्यस्य मधुरालापजनितो विस्रम्भो मामालापयति।' इति। ऋषिकुमारौ दुष्यन्तस्य अतिगम्भीराकृतिमवलोक्य प्राहतुः — 'दीप्तिमतोऽपि विश्वसनीयता अस्य वपुषः।' इति। राजा दुष्यन्तः नगरपरिघप्रांशुबाहुः, अनवरतधनुस्फालनक्रूरवर्ष्मा च वर्तते। स इन्द्रसखा सन् दुर्जयाख्यनामकं दैत्यगणं हन्तुं स्वर्गं गत्वा दैत्यान् विनाशयति। अत एव महर्षिः कश्यपः स्वपत्नीमदितिं प्रत्याह राज्ञो दुष्यन्तस्य विषये —
'पुत्रस्य ते रणशिरस्ययमग्रयायी,
दुष्यन्त इत्यभिहितो भुवनस्यभर्ता।
चापेन यस्य विनिवर्तितकर्मजातम्,
तत्कोटिमत्कुलिशमाभरणं मघोनः।।'
राजा दुष्यन्तः कुलपतेः कण्वस्य अनुपस्थितौ दैत्यान् विनाश्य यज्ञस्य रक्षां कृत्वा ऋषीणामिष्टिं पूरयति। अदृश्यो मातलिर्यदा माधव्यं पीडयति, तदा मातलिमनवलोकयन्नपि राजा दिव्यास्त्राणां प्रयोगेण जिघांसया बाणसन्धानं करोति। अनेन विवेचनेनायमर्थः स्पष्टो भवति यद् राजा दिव्यास्त्राणां ज्ञाता शूरवीरः प्रतापवान् मनोज्ञशरीरश्च विद्यते।
4. मधुरभाषी दुष्यन्त —
प्रभूतैश्वर्यवान्, अनवरतधनुर्ज्यास्फालनक्रूरवर्माऽपि राजा दुष्यन्तः मधुरभाषी अपि वर्तते। तस्य वचनेषु क्वापि केनापि रुक्षता नानुभूयते। तथाहि — यदा अनसूयाप्रियम्बदाभ्यां सङ्गतां शकुन्तलां स विलोकयति तदा ताः तस्य सत्कारं चिकीर्षन्ति, किन्तु राजा वक्ति — 'दर्शनेनैव भवतीनां सम्भूतसत्कारोऽस्मि।' इति। द्वितीयाङ्के ऋषिकुमाराभ्यां विदितो भवान् इहस्थस्तपस्विनां ते च भवन्तमभ्यर्थयन्ते इत्युक्तः सन् वक्ति — 'किमाज्ञापयन्तीति।' अनेनैव प्रकारेण नगरादागतस्य करभकमुखात् स्वमातृणां वचनं श्रुत्वा स वक्ति — 'किमाज्ञापयन्ति।' इति। राज्ञो मधुरं वचो निशम्य प्रियम्वदाऽप्यनुभवति — 'को नु खल्वेष दुरवगाहाकृतिः मधुरमालपन् प्रभुत्वदाक्षिण्यं विस्तारयति।' पञ्चमाङ्केऽपि शार्ङ्गरवशारद्वताभ्यां बहुधाक्षिप्तोऽपि सन् स्वशीलं न विजहाति राजा।
5. निसर्गसौन्दर्यस्य ज्ञाता दुष्यन्त —
राजा दुष्यन्तः स्वामिकस्य सौन्दर्यस्य अत्यधिकमहत्त्वमाकलयति। निसर्गसुन्दरीं शकुन्तलां प्रथमे एवावलोकने विलोक्य सः तस्याः प्रशंसायां सहसा प्राह —
'शुद्धान्तदुर्लभमिदं वपुराश्रमवासिनो यदि जनस्य।
दूरीकृता खलु गुणैरुद्यानलता वनलताभिः।।'
सः शकुन्तलाया अव्याजमनोहरं वपुर्विलोक्य वक्ति —
'इदं किलाव्याजमनोहरं वपुः, तपः क्षमं साधयितुं य इच्छति।
ध्रुवं स नीलोत्पलपत्रधारया, शमीलतां क्षेत्तुमृषिर्व्यवस्यति।।'
वल्कलवस्त्रधारिणी अपि शकुन्तला तेनैव प्रकारेण दुष्यन्तमतानुसारेण शोभते। तथाहि —
'सरसिजमनुविद्धं शैवलेनापि रम्यम्, मलिनमपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मी तनोति।
इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम्।।'
6. बह्वीनां पत्नीनाṃ स्वामी दुष्यन्त —
हिन्दूधर्मशास्त्राणां मान्यता वर्तते यत् सति सामर्थ्ये बह्वीनां पत्नीनां स्वामित्वं दोषाय नहि भवतीति। अभिज्ञानशाकुन्तलस्याध्ययनेन ज्ञायते यद् राज्ञो दुष्यन्तस्य बह्व्यः पत्न्यः सन्ति। राजा दुष्यन्तः निसर्गसुन्दर्या शकुन्तलया साकं कण्वाश्रमे गान्धर्वविवाहविधिना विवाहमकरोत्। दुष्यन्तस्यैका पत्नी सानुमती विद्यते। तस्याः साक्षात्कारं सहृदयाः शाकुन्तलस्य पञ्चमाङ्के कुर्वन्ति यदा सा वीणायां गायति —
'अभिनवमधुलोभभावितस्तथा परिचुम्ब्य चूतमञ्जरीम्।
कमलवसतिमात्र निर्वृतो मधुकर! विस्मृतोऽस्येनां कथम्।।'
दुष्यन्तस्य तृतीया पत्नी वसुमती वर्तते। सा हि दुष्यन्तस्य पट्टमहिषी वर्तते। यस्याः साक्षात्कारं सहृदयाः शाकुन्तलस्य षष्ठाङ्के कुर्वन्ति। द्वितीयाङ्के माधव्यस्य वार्तालापेन ज्ञायते यत् दुष्यन्तस्य बह्व्यः पत्न्यो वर्तन्ते। एतासु सत्स्वपि पत्नीषु राजा दुष्यन्तः कस्याश्चनापि पत्न्या अनादरं नहि करोति। सः सानुमतीमपि माधव्यस्य माध्यमेन सान्त्वयति। यद्यपि राजा दुर्वाससो महर्षेः शापेन ग्रस्तः सन् पूर्वपरिणीताया अपि शकुन्तलायाः प्रत्याख्यानं करोति, किन्तु आभरणदर्शनानन्तरं यदा शापो निवर्तते तदा सः पूर्वमूढां पत्नीं शकुन्तलां संस्मृत्योन्मत्त इव जायते। अतएव दुष्यन्तः एको धीरोदात्तो दक्षिणो नायको वर्तते।
7. धार्मिको राजा दुष्यन्त —
राजा दुष्यन्तो धार्मिकः पुरुषो वर्तते। सः राक्षसान् निहत्य ऋषीणां यज्ञानां रक्षां करोति। यदा सः कदाचित् तपोवने याति तदा सः ऋषीणां निर्विघ्नं धर्माचरणं कामयते। यदा राजानं माधव्यो वक्ति यत् त्वं राजा असि अतएव ऋषिभ्यः करमादात्तुं तपोवनं याहि, तदा राजा वक्ति यत् तपोधनास्तु मह्यमक्षय्यं करं ददति। तथाहि —
'यदुत्तिष्ठति वर्णेभ्यो नृपाणां क्षयितद्धनम्।
तपः षड्भागमक्षय्यं ददत्यारण्यका हि नः।।'
स्वर्गलोकादपि मातलिना साकमागच्छन् राजा दुष्यन्तः मध्ये मार्गस्थितं मारीचाश्रमं गत्वा कश्यपादित्योः अभिवादनमावश्यकमनुभवति।
8. भारतीयसंस्कृतेः संरक्षको दुष्यन्तः —
राजा दुष्यन्तो भारतीयसंस्कृतेः संरक्षको वर्तते। यद्यपि सः शकुन्तलाया रूपराशिं विलोक्य तस्यामासक्तो भवति तथापि यावत्कालपर्यन्तं स न जानाति यत् शकुन्तला मेनकायां संजाता महर्षेः विश्वामित्रस्य पुत्री वर्तते, तावत्कालपर्यन्तं स तया साकमुद्वाहं कर्तुमुद्यतो नहि राजा। यदा कण्वशिष्याः शकुन्तलामादाय राज्ञः समक्षमुपस्थिताः भवन्ति, तदा राजा दुर्वाससः शापमोहितः सन् तामपरिचिन्वन्नपि शकुन्तलायाः स्वाभाविकेन सौन्दर्येण प्रभावितो भवति। अथापि तस्याः पूर्वपरिणीतापत्नीरूपेण स्मरणाभावात् परदारग्रहणजन्यपापभियाक्रान्तः सन् तां पत्नीरूपेण नहि स्वीकरोति। दुष्यन्तस्यैव शब्देषु —
'इदमुपनतमेवं रूपमक्लिष्टकान्ति प्रथमपरिगृहीतं स्यान्न वेत्यध्यवस्यन्।
भ्रमर इव निशान्ते कुन्दमन्तस्तुषारं, न खलुसपदि भोक्तुं नापि शक्नोमि मोक्तुम्।'
राजा स्वचरित्रस्य विषये पूर्णरूपेण विश्वस्तो वर्तते। सः शकुन्तलामवलोक्य वक्ति —
'असंशयं क्षत्रपरिग्रहक्षमा यदार्यमस्यामभिलाषि मे मनः।
सतां हि संदेहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः।।'
सः जानाति पौरवाणां विनिपातः असंभवो वर्तते, अतएव वक्ति सः कण्वशिष्ययोः समक्षम् — 'विनिपातः पौरवैर्लभ्यत इत्यश्रद्धेयम् वचः।' इति। संक्षेपतः राजा दुष्यन्तः स्वमातृणामाज्ञाकारी पुत्रः, कर्तव्यपरायणः, प्रजाणां पालकः, ऋषीणां मनसा समादरकर्ता, संयतस्वभाववान् धीरोदात्तो नायकश्च वर्तते।
दुष्यन्त का चरित्र-चित्रण — सामान्य प्रश्न
दुष्यन्त कौन थे?
दुष्यन्त कालिदास के नाटक अभिज्ञानशाकुन्तलम् के नायक हैं, जो पराक्रमी, कर्तव्यनिष्ठ, धार्मिक और संवेदनशील राजा के रूप में चित्रित हैं।
दुष्यन्त के प्रमुख गुण क्या हैं?
दुष्यन्त के प्रमुख गुणों में वीरता, कर्तव्यनिष्ठा, मधुरभाषिता, सौन्दर्यबोध, धर्मपरायणता, प्रजाप्रेम, ऋषियों के प्रति सम्मान और धीरोदात्त स्वभाव प्रमुख हैं।
दुष्यन्त के चरित्र की प्रमुख त्रुटि क्या है?
दुर्वासा के शाप के प्रभाव में दुष्यन्त शकुन्तला को पहचान नहीं पाते और उसका प्रत्याख्यान कर देते हैं। यही प्रसंग उनके चरित्र में मानवीय दुर्बलता और नाटकीय द्वन्द्व को स्पष्ट करता है।