रस सिद्धान्त
रस सिद्धान्त — परिभाषा, भेद, संख्या, अवयव एवं तत्व
रस सिद्धान्त काव्यशास्त्र का सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है। “रस” शब्द का अर्थ है — आस्वाद या अनुभूति। भरतमुनि ने रस को नाट्य और काव्य दोनों का आत्मा माना है। रस वह भाव है जिसका आस्वादन करके सहृदय आनन्दानुभूति प्राप्त करता है।
रस का मूल सूत्र भरतमुनि के नाट्यशास्त्र (अध्याय 6) में है — “विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः” — अर्थात् विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।
आचार्य अभिनवगुप्त ने रस को “आनन्दमय चेतनानुभव” बताया है, जो सामान्य भाव से ऊपर उठकर सार्वत्रिक हो जाता है।
रसों के भेद एवं संख्या
भरतमुनि ने आठ रस बताए — श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स और अद्भुत।
परवर्ती आचार्यों ने इनमें शान्त रस को जोड़कर रसों की संख्या नौ मानी।
- श्रृंगार रस: प्रेम और सौन्दर्य की अभिव्यक्ति (स्थायी भाव — रति)
- हास्य रस: हँसी और उल्लास (स्थायी भाव — हास)
- करुण रस: दुःख और करुणा (स्थायी भाव — शोक)
- रौद्र रस: क्रोध और उग्रता (स्थायी भाव — क्रोध)
- वीर रस: साहस और उत्साह (स्थायी भाव — उत्साह)
- भयानक रस: भय का अनुभव (स्थायी भाव — भय)
- बीभत्स रस: घृणा और वितृष्णा (स्थायी भाव — जुगुप्सा)
- अद्भुत रस: विस्मय और चमत्कार (स्थायी भाव — विस्मय)
- शान्त रस: समत्व और निर्विकारता (स्थायी भाव — शम)
रस के अवयव (तत्व)
रस की उत्पत्ति में निम्न चार प्रमुख तत्वों की भूमिका होती है —
- विभाव: कारण — रस उत्पन्न करने वाले हेतु। ये आलंबन और उद्दीपन दो प्रकार के होते हैं।
- अनुभाव: परिणाम — भाव की बाह्य अभिव्यक्ति जैसे नेत्रों का छलकना, अंगों का कंपना।
- व्यभिचारी भाव: सहायक भाव जो रस को पुष्ट करते हैं (जैसे लज्जा, शंका, उत्सुकता आदि)।
- स्थायी भाव: हृदय में निहित स्थायी भावना जो रस के रूप में परिणत होती है।
इन चारों के संयोग से ही रस की पूर्ण अनुभूति होती है।
रस सिद्धान्त के प्रमुख आचार्य
- भरतमुनि: रस के जनक — उन्होंने नाट्यशास्त्र में रस सूत्र प्रतिपादित किया।
- अभिनवगुप्त: रस को ब्रह्मानुभूति समान माना — ‘सहृदय’ में अनुभूत आनन्द।
- भट्टलोल्लट, शंकर, मम्मट, विश्वनाथ: सभी ने रस की उत्पत्ति और अनुभव पर विशिष्ट मत दिए।
काव्य में रस का महत्व
रस को काव्यात्मा कहा गया है क्योंकि वही काव्य को जीवन देता है। रस के बिना काव्य नीरस और निर्जीव प्रतीत होता है। आचार्य मम्मट ने कहा है —
“वाक्यं रसात्मकं काव्यम्।”
अर्थात् जहाँ रस है, वही काव्य है; रस के बिना शब्द मात्र भाषा रह जाती है।
