📖 अकारान्त एवं आकारान्त : शास्त्रीय एवं व्याकरणिक नियम
संस्कृत व्याकरण में किसी भी प्रातिपदिक (शब्द) का वर्गीकरण उसके अन्तिम वर्ण (स्वर/व्यंजन) तथा उसके लिंग के आधार पर होता है।
१. वर्ण-विच्छेद से निर्णय (अकारान्त बनाम आकारान्त)
- अकारान्त (अ-कार-अन्त): जिस शब्द के अन्त में ह्रस्व 'अ' स्वर हो।
यथा: राम = र् + आ + म् + अ | बालक = ब् + आ + ल् + अ + क् + अ
- आकारान्त (आ-कार-अन्त): जिस शब्द के अन्त में दीर्घ 'आ' स्वर हो।
यथा: रमा = र् + अ + म् + आ | बालिका = ब् + आ + ल् + इ + क् + आ
२. क्या संस्कृत में "अकारान्त स्त्रीलिंग" शब्द होते हैं?
उत्तर: कदापि नहीं। संस्कृत व्याकरण की व्यवस्था के अनुसार अकारान्त स्त्रीलिंग शब्द असम्भव हैं। इसके शास्त्रीय प्रमाण निम्नलिखित हैं:
सूत्र १: "अजाद्यतष्टाप्" (अष्टाध्यायी ४.१.४)
अर्थ: अजादिगण में पठित शब्दों से तथा 'अदन्त' (ह्रस्व 'अ' पर समाप्त होने वाले) प्रातिपदिकों को जब स्त्रीलिंग में बदला जाता है, तब उसमें 'टाप्' प्रत्यय लगता है। 'टाप्' में से 'ट्' और 'प्' की इत्संज्ञा (लोप) होकर केवल 'आ' शेष रहता है। अतः मूल अकारान्त शब्द स्त्रीलिंग बनते ही अनिवार्य रूप से आकारान्त हो जाता है।
यथा: बालक (अकारान्त) + टाप् (आ) = बालिका (आकारान्त) | रम + टाप् = रमा।
सूत्र २: "प्रत्ययस्थात् कात् पूर्वस्यात इदाप्यसुपः" (७.३.४४)
अर्थ: 'बालक + आ' बनने पर प्रत्यय से पहले स्थित 'क' के पूर्ववर्ती 'अ' को 'इ' होकर 'बालिका' बनता है।
३. आकारान्त पुल्लिंग का रहस्य (गोपा, विश्वपा, सोमपा, बलदा)
आकारान्त शब्द प्रायः स्त्रीलिंग होते हैं, किन्तु जब किसी धातु (Root Verb) से सीधे संज्ञा बनाई जाती है (क्विप् अथवा विच् प्रत्यय लगाकर), तब वे आकारान्त पुल्लिंग बनते हैं:
- विश्वपा = विश्वं पाति (रक्षति) इति विश्वपाः (सम्पूर्ण विश्व की रक्षा करने वाला - पुल्लिंग)।
- सोमपा = सोमं पिबति इति सोमपाः (यज्ञ में सोमरस पीने वाला - पुल्लिंग)।
- बलदा = बलं ददाति इति बलदाः (शक्ति देने वाला - पुल्लिंग)।
- गोपा = गां पाति इति गोपाः (गायों का रक्षक/ग्वाला - पुल्लिंग)।
महत्वपूर्ण पाणिनीय सूत्र: "आतो धातोः" (६.४.१४०)
अर्थ: धातु से बने आकारान्त पुल्लिंग शब्दों (विश्वपा, सोमपा, बलदा आदि) के अन्तिम 'आ' का भ-संज्ञक (शस्, टा, ङे, ङसि आदि अजादि) विभक्तियों के परे रहने पर लोप हो जाता है। इसीलिए द्वितीया बहुवचन में 'विश्वपान्' न बनकर 'विश्वपः' (विश्वप् + अस्) और तृतीया एकवचन में 'विश्वपा' (विश्वप् + आ) बनता है।
४. क्या "आकारान्त नपुंसकलिंग" शब्द होते हैं?
सूत्र: "ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य" (१.२.४७)
अर्थ: यदि कोई दीर्घ आकारान्त शब्द नपुंसकलिंग में प्रयोग किया जाता है, तो उसका अन्तिम 'आ' ह्रस्व होकर 'अ' (अकारान्त) बन जाता है। जैसे—'उपगोप' से नपुंसकलिंग में 'उपगोपम्' बनता है। अतः संस्कृत में कोई मूल आकारान्त नपुंसकलिंग शब्दरूप नहीं होता।
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | रमा | रमे | रमाः |
| द्वितीया | रमाम् | रमे | रमाः |
| तृतीया | रमया | रमाभ्याम् | रमाभिः |
| चतुर्थी | रमायै | रमाभ्याम् | रमाभ्यः |
| पञ्चमी | रमायाः | रमाभ्याम् | रमाभ्यः |
| षष्ठी | रमायाः | रमययोः | रमाणाम् |
| सप्तमी | रमायाम् | रमययोः | रमासु |
| सम्बोधन | हे रमे | हे रमे | हे रमाः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | बालिका | बालिके | बालिकाः |
| द्वितीया | बालिकाम् | बालिके | बालिकाः |
| तृतीया | बालिकया | बालिकाभ्याम् | बालिकाभिः |
| चतुर्थी | बालिकायै | बालिकाभ्याम् | बालिकाभ्यः |
| पञ्चमी | बालिकायाः | बालिकाभ्याम् | बालिकाभ्यः |
| षष्ठी | बालिकायाः | बालिकयोः | बालिकानाम् |
| सप्तमी | बालिकायाम् | बालिकयोः | बालिकासु |
| सम्बोधन | हे बालिके | हे बालिके | हे बालिकाः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | गोपा | गोपौ | गोपाः |
| द्वितीया | गोपाम् | गोपौ | गोपः |
| तृतीया | गोपा | गोपाभ्याम् | गोपाभिः |
| चतुर्थी | गोपै | गोपाभ्याम् | गोपाभ्यः |
| पञ्चमी | गोपः | गोपाभ्याम् | गोपाभ्यः |
| षष्ठी | गोपः | गोपोः | गोपाम् |
| सप्तमी | गोपि | गोपोः | गोपासु |
| सम्बोधन | हे गोपा | हे गोपौ | हे गोपाः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | विश्वपा | विश्वपौ | विश्वपाः |
| द्वितीया | विश्वपाम् | विश्वपौ | विश्वपः |
| तृतीया | विश्वपा | विश्वपाभ्याम् | विश्वपाभिः |
| चतुर्थी | विश्वपे | विश्वपाभ्याम् | विश्वपाभ्यः |
| पञ्चमी | विश्वपः | विश्वपाभ्याम् | विश्वपाभ्यः |
| षष्ठी | विश्वपः | विश्वपोः | विश्वपाम् |
| सप्तमी | विश्वपि | विश्वपोः | विश्वपासु |
| सम्बोधन | हे विश्वपा | हे विश्वपौ | हे विश्वपाः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | सोमपा | सोमपौ | सोमपाः |
| द्वितीया | सोमपाम् | सोमपौ | सोमपः |
| तृतीया | सोमपा | सोमपाभ्याम् | सोमपाभिः |
| चतुर्थी | सोमपे | सोमपाभ्याम् | सोमपाभ्यः |
| पञ्चमी | सोमपः | सोमपाभ्याम् | सोमपाभ्यः |
| षष्ठी | सोमपः | सोमपोः | सोमपाम् |
| सप्तमी | सोमपि | सोमपोः | सोमपासु |
| सम्बोधन | हे सोमपा | हे सोमपौ | हे सोमपाः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | बलदा | बलदौ | बलदाः |
| द्वितीया | बलदाम् | बलदौ | बलदः |
| तृतीया | बलदा | बलदाभ्याम् | बलदाभिः |
| चतुर्थी | बलदे | बलदाभ्याम् | बलदाभ्यः |
| पञ्चमी | बलदः | बलदाभ्याम् | बलदाभ्यः |
| षष्ठी | बलदः | बलदोः | बलदाम् |
| सप्तमी | बलदि | बलदोः | बलदासु |
| सम्बोधन | हे बलदा | हे बलदौ | हे बलदाः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | विद्या | विद्ये | विद्याः |
| द्वितीया | विद्याम् | विद्ये | विद्याः |
| तृतीया | विद्यया | विद्याभ्याम् | विद्याभिः |
| चतुर्थी | विद्यायै | विद्याभ्याम् | विद्याभ्यः |
| पञ्चमी | विद्यायाः | विद्याभ्याम् | विद्याभ्यः |
| षष्ठी | विद्यायाः | विद्ययोः | विद्यानाम् |
| सप्तमी | विद्यायाम् | विद्ययोः | विद्यासु |
| सम्बोधन | हे विद्ये | हे विद्ये | हे विद्याः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | लता | लते | लताः |
| द्वितीया | लताम् | लते | लताः |
| तृतीया | लतया | लताभ्याम् | लताभिः |
| चतुर्थी | लतायै | लताभ्याम् | लताभ्यः |
| पञ्चमी | लतायाः | लताभ्याम् | लताभ्यः |
| षष्ठी | लतायाः | लतयोः | लतानाम् |
| सप्तमी | लतायाम् | लतयोः | लतासु |
| सम्बोधन | हे लते | हे लते | हे लताः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | गङ्गा | गङ्गे | गङ्गाः |
| द्वितीया | गङ्गाम् | गङ्गे | गङ्गाः |
| तृतीया | गङ्गया | गङ्गाभ्याम् | गङ्गाभिः |
| चतुर्थी | गङ्गायै | गङ्गाभ्याम् | गङ्गाभ्यः |
| पञ्चमी | गङ्गायाः | गङ्गाभ्याम् | गङ्गाभ्यः |
| षष्ठी | गङ्गायाः | गङ्गयोः | गङ्गानाम् |
| सप्तमी | गङ्गायाम् | गङ्गयोः | गङ्गासु |
| सम्बोधन | हे गङ्गे | हे गङ्गे | हे गङ्गाः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | सभा | सभे | सभाः |
| द्वितीया | सभाम् | सभे | सभाः |
| तृतीया | सभया | सभाभ्याम् | सभाभिः |
| चतुर्थी | सभायै | सभाभ्याम् | सभाभ्यः |
| पञ्चमी | सभायाः | सभाभ्याम् | सभाभ्यः |
| षष्ठी | सभायाः | सभयोः | सभानाम् |
| सप्तमी | सभायाम् | सभयोः | सभासु |
| सम्बोधन | हे सभे | हे सभे | हे सभाः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | कथा | कथे | कथाः |
| द्वितीया | कथाम् | कथे | कथाः |
| तृतीया | कथया | कथाभ्याम् | कथाभिः |
| चतुर्थी | कथायै | कथाभ्याम् | कथाभ्यः |
| पञ्चमी | कथायाः | कथाभ्याम् | कथाभ्यः |
| षष्ठी | कथायाः | कथयोः | कथानाम् |
| सप्तमी | कथायाम् | कथयोः | कथासु |
| सम्बोधन | हे कथे | हे कथे | हे कथाः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | माला | माले | मालाः |
| द्वितीया | मालाम् | माले | मालाः |
| तृतीया | मालया | मालाभ्याम् | मालाभिः |
| चतुर्थी | मालायै | मालाभ्याम् | मालाभ्यः |
| पञ्चमी | मालायाः | मालाभ्याम् | मालाभ्यः |
| षष्ठी | मालायाः | मालयोः | मालानाम् |
| सप्तमी | मालायाम् | मालयोः | मालासु |
| सम्बोधन | हे माले | हे माले | हे मालाः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | शंखध्मा | शंखध्मौ | शंखध्माः |
| द्वितीया | शंखध्माम् | शंखध्मौ | शंखध्मः |
| तृतीया | शंखध्मा | शंखध्माभ्याम् | शंखध्माभिः |
| चतुर्थी | शंखध्मे | शंखध्माभ्याम् | शंखध्माभ्यः |
| पञ्चमी | शंखध्मः | शंखध्माभ्याम् | शंखध्माभ्यः |
| षष्ठी | शंखध्मः | शंखध्मोः | शंखध्माम् |
| सप्तमी | शंखध्मि | शंखध्मोः | शंखध्मासु |
| सम्बोधन | हे शंखध्मा | हे शंखध्मौ | हे शंखध्माः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | धूम्रपा | धूम्रपौ | धूम्रपाः |
| द्वितीया | धूम्रपाम् | धूम्रपौ | धूम्रपः |
| तृतीया | धूम्रपा | धूम्रपाभ्याम् | धूम्रपाभिः |
| चतुर्थी | धूम्रपे | धूम्रपाभ्याम् | धूम्रपाभ्यः |
| पञ्चमी | धूम्रपः | धूम्रपाभ्याम् | धूम्रपाभ्यः |
| षष्ठी | धूम्रपः | धूम्रपोः | धूम्रपाम् |
| सप्तमी | धूम्रपि | धूम्रपोः | धूम्रपासु |
| सम्बोधन | हे धूम्रपा | हे धूम्रपौ | हे धूम्रपाः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | हाहाः | हाहौ | हाहाः |
| द्वितीया | हाहाम् | हाहौ | हाहान् |
| तृतीया | हाहा | हाहाभ्याम् | हाहाभिः |
| चतुर्थी | हाहै | हाहाभ्याम् | हाहाभ्यः |
| पञ्चमी | हाहाः | हाहाभ्याम् | हाहाभ्यः |
| षष्ठी | हाहाः | हाहौ / हाहोः | हाहाम् |
| सप्तमी | हाहे | हाहौ / हाहोः | हाहासु |
| सम्बोधन | हे हाहा | हे हाहौ | हे हाहाः |