📖 ऋकारान्त शब्दरूप : पाणिनीय व्याकरणिक रहस्य एवं सूत्र
जिस प्रातिपदिक (मूल शब्द) के वर्ण-विच्छेद के अन्त में 'ऋ' स्वर आता है, उसे ऋकारान्त कहते हैं (यथा: पितृ = प् + इ + त् + ऋ | धातृ = ध् + आ + त् + ऋ | मातृ = म् + आ + त् + ऋ)। ऋकारान्त शब्दों के रूप दो प्रमुख शैलियों में चलते हैं—(१) सामान्य सम्बन्धवाचक एवं (२) तृच्/तृन्-प्रत्ययान्त कर्तापरक।
१. ऋकारान्त पुल्लिंग के मुख्य पाणिनीय सूत्र
सूत्र १: "ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसां च" (७.१.९४) एवं "अपृक्तलोप"
प्रथमा एकवचन ('सु' प्रत्यय) में ऋकारान्त अङ्ग को 'अनङ्' (अन्) आदेश होता है। इसके पश्चात् उपधा को दीर्घ तथा अन्त्य हल् का लोप होकर 'पिता', 'धाता', 'कर्ता', 'भ्राता' आदि रूप निष्पन्न होते हैं।
सूत्र २: "ऋतो ङिसर्वनामस्थानयोः" (७.३.११०) — गुण (अर्) विधान
सर्वनामस्थान संज्ञक प्रत्ययों (सु, औ, जस्, अम्, औट्) तथा सप्तमी एकवचन (ङि) में ऋकार को गुण (अर्) होता है:
• पितृ + औ = पितरौ | पितृ + जस् = पितरः | पितृ + ङि = पितरि।
• सम्बोधन एकवचन में भी गुण होकर 'ऋ' को 'अर्' होता है: हे पितर्!, हे धातर्!, हे कर्तर्!।
सूत्र ३: "ऋत उत्" (६.१.१११) एवं "तस्माच्छसो नः पुंसि" (६.१.१०३)
• पञ्चमी एवं षष्ठी एकवचन (ङसि / ङस्) में ऋकार के स्थान पर 'उर्' एकादेश होकर विसर्ग लगता है: पितृ + अस् = पितुः | धातृ + अस् = धातुः।
• द्वितीया बहुवचन (शस्) में पूर्वसवर्ण दीर्घ (दीर्घ ॠ) होकर पुल्लिंग में 'न्' आदेश होता है: पितॄन्, भ्रातॄन्, धातॄन्, कर्तॄन्।
• षष्ठी बहुवचन में 'नुट्' का आगम होकर दीर्घ ॠकारान्त पितॄणाम्, धातॄणाम् बनता है।
⚠️ ऋकारान्त पुल्लिंग का सबसे बड़ा परीक्षा रहस्य — 'पिता' बनाम 'धाता' का उपधा-दीर्घ भेद:
सूत्र "अप्तृन्तृच्स्वसृनप्तृनेष्टृत्वष्टृक्षत्तृहोतृपोतृप्रशास्तॄणाम्" (६.४.११):
• तृच्/तृन्-प्रत्ययान्त (धातृ, कर्तृ, नेतृ आदि) तथा सूत्र में परिगणित (नप्तृ, होतृ आदि) शब्दों में असम्बुद्धि सर्वनामस्थान (प्रथमा द्विवचन से द्वितीया द्विवचन तक) में उपधा को दीर्घ (आ) होता है: धातारौ, धातारः, धातारम्, धातारौ | कर्तारौ, कर्तारः, कर्तारम्।
• किन्तु पितृ, भ्रातृ, जामातृ, देवृ आदि सामान्य सम्बन्धवाचक शब्दों में उपधा दीर्घ नहीं होता: पितरौ, पितरः, पितरम् (पितारौ नहीं बनता)।
२. ऋकारान्त स्त्रीलिंग के विशेष नियम एवं अपवाद
सूत्र ४: स्त्रीलिंग में द्वितीया बहुवचन का नियम (मातृ, दुहितृ आदि)
• मातृ, दुहितृ, यातृ आदि सम्बन्धवाची स्त्रीलिंग शब्द प्रायः 'पितृ' के समान ही चलते हैं।
• मुख्य भेद (द्वितीया बहुवचन): स्त्रीलिंग में 'तस्माच्छसो नः पुंसि' (न्-आदेश) नहीं लगता, अतः दीर्घ ॠकार के बाद विसर्ग होकर 'मातॄः', 'दुहितॄः', 'यातॄः' बनता है (मातॄन् नहीं बनता)।
⚠️ स्त्रीलिंग का विशेष पाणिनीय अपवाद — स्वसृ (बहन) एवं ननान्दृ (ननद) शब्द:
सूत्र 'अप्तृन्तृच्स्वसृ...' में 'स्वसृ' शब्द का साक्षात् पाठ होने के कारण तथा 'ननान्दृ' में भी सर्वनामस्थानों में उपधा को दीर्घ (आ) होता है। अतः ये मातृवत् न चलकर धातृवत् उपधा दीर्घ करते हैं:
प्रथमा: स्वसा, स्वसारौ, स्वसारः (मातरौ की तरह 'स्वसरौ' नहीं)
द्वितीया: स्वसारम्, स्वसारौ, स्वसॄः (द्वितीया बहुवचन में स्त्रीलिंग विसर्ग ही रहेगा)
३. ऋकारान्त नपुंसकलिंग के नियम (कर्तृ, धातृ आदि)
सूत्र ५: "इकोऽचि विभक्तौ" (७.१.७३) एवं तृज्वद्भाव
• प्रथमा/द्वितीया द्विवचन में 'औङ्' को 'शी' (ई) होकर कर्तृणी तथा बहुवचन में 'जश्/शस्' को 'शि' (इ), नुम्-आगम एवं दीर्घ होकर कर्तॄणि बनता है।
• तृतीया से आगे अजादि विभक्तियों में विकल्प से 'तृज्वद्भाव' (पुल्लिंगवत्) होने से दो-दो रूप बनते हैं: तृतीया (१व.) = कर्तृणा / कर्त्रा | चतुर्थी (१व.) = कर्तृणे / कर्त्रे | पञ्चमी/षष्ठी (१व.) = कर्तृणः / कर्तुः।
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | पिता | पितरौ | पितरः |
| द्वितीया | पितरम् | पितरौ | पितॄन् |
| तृतीया | पित्रा | पितृभ्याम् | पितृभिः |
| चतुर्थी | पित्रे | पितृभ्याम् | पितृभ्यः |
| पञ्चमी | पितुः | पितृभ्याम् | पितृभ्यः |
| षष्ठी | पितुः | पित्रोः | पितॄणाम् |
| सप्तमी | पितरि | पित्रोः | पितृषु |
| सम्बोधन | हे पितर् | हे पितरौ | हे पितरः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | भ्राता | भ्रातरौ | भ्रातरः |
| द्वितीया | भ्रातरम् | भ्रातरौ | भ्रातॄन् |
| तृतीया | भ्रात्रा | भ्रातृभ्याम् | भ्रातृभिः |
| चतुर्थी | भ्रात्रे | भ्रातृभ्याम् | भ्रातृभ्यः |
| पञ्चमी | भ्रातुः | भ्रातृभ्याम् | भ्रातृभ्यः |
| षष्ठी | भ्रातुः | भ्रात्रोः | भ्रातॄणाम् |
| सप्तमी | भ्रातरि | भ्रात्रोः | भ्रातृषु |
| सम्बोधन | हे भ्रातर् | हे भ्रातरौ | हे भ्रातरः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | जामाता | जामातरौ | जामातरः |
| द्वितीया | जामातरम् | जामातरौ | जामातॄन् |
| तृतीया | जामात्रा | जामातृभ्याम् | जामातृभिः |
| चतुर्थी | जामात्रे | जामातृभ्याम् | जामातृभ्यः |
| पञ्चमी | जामातुः | जामातृभ्याम् | जामातृभ्यः |
| षष्ठी | जामातुः | जामात्रोः | जामातॄणाम् |
| सप्तमी | जामातरि | जामात्रोः | जामातृषु |
| सम्बोधन | हे जामातर् | हे जामातरौ | हे जामातरः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | देवा | देवरौ | देवरः |
| द्वितीया | देवरम् | देवरौ | देवॄन् |
| तृतीया | देव्रा | देवृभ्याम् | देवृभिः |
| चतुर्थी | देव्रे | देवृभ्याम् | देवृभ्यः |
| पञ्चमी | देवुः | देवृभ्याम् | देवृभ्यः |
| षष्ठी | देवुः | देव्रोः | देवॄणाम् |
| सप्तमी | देवरि | देव्रोः | देवृषु |
| सम्बोधन | हे देवर् | हे देवरौ | हे देवरः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | धाता | धातारौ | धातारः |
| द्वितीया | धातारम् | धातारौ | धातॄन् |
| तृतीया | धात्रा | धातृभ्याम् | धातृभिः |
| चतुर्थी | धात्रे | धातृभ्याम् | धातृभ्यः |
| पञ्चमी | धातुः | धातृभ्याम् | धातृभ्यः |
| षष्ठी | धातुः | धात्रोः | धातॄणाम् |
| सप्तमी | धातरि | धात्रोः | धातृषु |
| सम्बोधन | हे धातर् | हे धातारौ | हे धातारः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | कर्ता | कर्तारौ | कर्तारः |
| द्वितीया | कर्तारम् | कर्तारौ | कर्तॄन् |
| तृतीया | कर्त्रा | कर्तृभ्याम् | कर्तृभिः |
| चतुर्थी | कर्त्रे | कर्तृभ्याम् | कर्तृभ्यः |
| पञ्चमी | कर्तुः | कर्तृभ्याम् | कर्तृभ्यः |
| षष्ठी | कर्तुः | कर्त्रोः | कर्तॄणाम् |
| सप्तमी | कर्तरि | कर्त्रोः | कर्तृषु |
| सम्बोधन | हे कर्तर् | हे कर्तारौ | हे कर्तारः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | नेता | नेतारौ | नेतारः |
| द्वितीया | नेतारम् | नेतारौ | नेतॄन् |
| तृतीया | नेत्रा | नेतृभ्याम् | नेतृभिः |
| चतुर्थी | नेत्रे | नेतृभ्याम् | नेतृभ्यः |
| पञ्चमी | नेतुः | नेतृभ्याम् | नेतृभ्यः |
| षष्ठी | नेतुः | नेत्रोः | नेतॄणाम् |
| सप्तमी | नेतरि | नेत्रोः | नेतृषु |
| सम्बोधन | हे नेतर | हे नेतारौ | हे नेतारः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | श्रोता | श्रोतारौ | श्रोतारः |
| द्वितीया | श्रोतारम् | श्रोतारौ | श्रोतॄन् |
| तृतीया | श्रोत्रा | श्रोतृभ्याम् | श्रोतृभिः |
| चतुर्थी | श्रोत्रे | श्रोतृभ्याम् | श्रोतृभ्यः |
| पञ्चमी | श्रोतुः | श्रोतृभ्याम् | श्रोतृभ्यः |
| षष्ठी | श्रोतुः | श्रोत्रोः | श्रोतॄणाम् |
| सप्तमी | श्रोतरि | श्रोत्रोः | श्रोतृषु |
| सम्बोधन | हे श्रोतर् | हे श्रोतारौ | हे श्रोतारः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | वक्ता | वक्तारौ | वक्तारः |
| द्वितीया | वक्तारम् | वक्तारौ | वक्तॄन् |
| तृतीया | वक्त्रा | वक्तृभ्याम् | वक्तृभिः |
| चतुर्थी | वक्त्रे | वक्तृभ्याम् | वक्तृभ्यः |
| पञ्चमी | वक्तुः | वक्तृभ्याम् | वक्तृभ्यः |
| षष्ठी | वक्तुः | वक्त्रोः | वक्तॄणाम् |
| सप्तमी | वक्तरि | वक्त्रोः | वक्तृषु |
| सम्बोधन | हे वक्तर् | हे वक्तारौ | हे वक्तारः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | दाता | दातारौ | दातारः |
| द्वितीया | दातारम् | दातारौ | दातॄन् |
| तृतीया | दात्रा | दातृभ्याम् | दातृभिः |
| चतुर्थी | दात्रे | दातृभ्याम् | दातृभ्यः |
| पञ्चमी | दातुः | दातृभ्याम् | दातृभ्यः |
| षष्ठी | दातुः | दात्रोः | दातॄणाम् |
| सप्तमी | दातरि | दात्रोः | दातृषु |
| सम्बोधन | हे दातर् | हे दातारौ | हे दातारः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | सविता | सवितारौ | सवितारः |
| द्वितीया | सवितारम् | सवितारौ | सवितॄन् |
| तृतीया | सवित्रा | सवितृभ्याम् | सवितृभिः |
| चतुर्थी | सवित्रे | सवितृभ्याम् | सवितृभ्यः |
| पञ्चमी | सवितुः | सवितृभ्याम् | सवितृभ्यः |
| षष्ठी | सवितुः | सवित्रोः | सवितॄणाम् |
| सप्तमी | सवितरि | सवित्रोः | सवितृषु |
| सम्बोधन | हे सवितर् | हे सवितारौ | हे सवितारः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | नप्ता | नप्तारौ | नप्तारः |
| द्वितीया | नप्तारम् | नप्तारौ | नप्तॄन् |
| तृतीया | नप्त्रा | नप्तृभ्याम् | नप्तृभिः |
| चतुर्थी | नप्त्रे | नप्तृभ्याम् | नप्तृभ्यः |
| पञ्चमी | नप्तुः | नप्तृभ्याम् | नप्तृभ्यः |
| षष्ठी | नप्तुः | नप्त्रोः | नप्तॄणाम् |
| सप्तमी | नप्तरि | नप्त्रोः | नप्तृषु |
| सम्बोधन | हे नप्तर् | हे नप्तारौ | हे नप्तारः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | होता | होतारौ | होतारः |
| द्वितीया | होतारम् | होतारौ | होतॄन् |
| तृतीया | होत्रा | होतृभ्याम् | होतृभिः |
| चतुर्थी | होत्रे | होतृभ्याम् | होतृभ्यः |
| पञ्चमी | होतुः | होतृभ्याम् | होतृभ्यः |
| षष्ठी | होतुः | होत्रोः | होतॄणाम् |
| सप्तमी | होतरि | होत्रोः | होतृषु |
| सम्बोधन | हे होतर् | हे होतारौ | हे होतारः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | माता | मातरौ | मातरः |
| द्वितीया | मातरम् | मातरौ | मातॄः |
| तृतीया | मात्रा | मातृभ्याम् | मातृभिः |
| चतुर्थी | मात्रे | मातृभ्याम् | मातृभ्यः |
| पञ्चमी | मातुः | मातृभ्याम् | मातृभ्यः |
| षष्ठी | मातुः | मात्रोः | मातॄणाम् |
| सप्तमी | मातरि | मात्रोः | मातृषु |
| सम्बोधन | हे मातर् | हे मातरौ | हे मातरः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | दुहिता | दुहितरौ | दुहितरः |
| द्वितीया | दुहितरम् | दुहितरौ | दुहितॄः |
| तृतीया | दुहित्रा | दुहितृभ्याम् | दुहितृभिः |
| चतुर्थी | दुहित्रे | दुहितृभ्याम् | दुहितृभ्यः |
| पञ्चमी | दुहितुः | दुहितृभ्याम् | दुहितृभ्यः |
| षष्ठी | दुहितुः | दुहित्रोः | दुहितॄणाम् |
| सप्तमी | दुहितरि | दुहित्रोः | दुहितृषु |
| सम्बोधन | हे दुहितर् | हे दुहितरौ | हे दुहितरः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | याता | यातरौ | यातरः |
| द्वितीया | यातरम् | यातरौ | यातॄः |
| तृतीया | यात्रा | यातृभ्याम् | यातृभिः |
| चतुर्थी | यात्रे | यातृभ्याम् | यातृभ्यः |
| पञ्चमी | यातुः | यातृभ्याम् | यातृभ्यः |
| षष्ठी | यातुः | यात्रोः | यातॄणाम् |
| सप्तमी | यातरि | यात्रोः | यातृषु |
| सम्बोधन | हे यातर् | हे यातरौ | हे यातरः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | स्वसा | स्वसारौ | स्वसारः |
| द्वितीया | स्वसारम् | स्वसारौ | स्वसॄः |
| तृतीया | स्वस्रा | स्वसृभ्याम् | स्वसृभिः |
| चतुर्थी | स्वस्रे | स्वसृभ्याम् | स्वसृभ्यः |
| पञ्चमी | स्वसुः | स्वसृभ्याम् | स्वसृभ्यः |
| षष्ठी | स्वसुः | स्वस्रोः | स्वसॄणाम् |
| सप्तमी | स्वसरि | स्वस्रोः | स्वसृषु |
| सम्बोधन | हे स्वसर् | हे स्वसारौ | हे स्वसारः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | ननान्दा | ननान्दारौ | ननान्दारः |
| द्वितीया | ननान्दारम् | ननान्दारौ | ननान्दॄः |
| तृतीया | ननान्द्रा | ननान्दृभ्याम् | ननान्दृभिः |
| चतुर्थी | ननान्द्रे | ननान्दृभ्याम् | ननान्दृभ्यः |
| पञ्चमी | ननान्दुः | ननान्दृभ्याम् | ननान्दृभ्यः |
| षष्ठी | ननान्दुः | ननान्द्रोः | ननान्दॄणाम् |
| सप्तमी | ननान्दरि | ननान्द्रोः | ननान्दृषु |
| सम्बोधन | हे ननान्दर् | हे ननान्दारौ | हे ननान्दारः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | मातृष्वसा | मातृष्वसारौ | मातृष्वसारः |
| द्वितीया | मातृष्वसारम् | मातृष्वसारौ | मातृष्वसॄः |
| तृतीया | मातृष्वस्रा | मातृष्वसृभ्याम् | मातृष्वसृभिः |
| चतुर्थी | मातृष्वस्रे | मातृष्वसृभ्याम् | मातृष्वसृभ्यः |
| पञ्चमी | मातृष्वसुः | मातृष्वसृभ्याम् | मातृष्वसृभ्यः |
| षष्ठी | मातृष्वसुः | मातृष्वस्रोः | मातृष्वसॄणाम् |
| सप्तमी | मातृष्वसरि | मातृष्वस्रोः | मातृष्वसृषु |
| सम्बोधन | हे मातृष्वसर् | हे मातृष्वसारौ | हे मातृष्वसारः |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | कर्तृ | कर्तृणी | कर्तॄणि |
| द्वितीया | कर्तृ | कर्तृणी | कर्तॄणि |
| तृतीया | कर्तृणा / कर्त्रा | कर्तृभ्याम् | कर्तृभिः |
| चतुर्थी | कर्तृणे / कर्त्रे | कर्तृभ्याम् | कर्तृभ्यः |
| पञ्चमी | कर्तृणः / कर्तुः | कर्तृभ्याम् | कर्तृभ्यः |
| षष्ठी | कर्तृणः / कर्तुः | कर्तृणोः / कर्त्रोः | कर्तॄणाम् |
| सप्तमी | कर्तृणि / कर्तरि | कर्तृणोः / कर्त्रोः | कर्तृषु |
| सम्बोधन | हे कर्तर् / हे कर्तृ | हे कर्तृणी | हे कर्तॄणि |
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
| प्रथमा | धातृ | धातृणी | धातॄणि |
| द्वितीया | धातृ | धातृणी | धातॄणि |
| तृतीया | धातृणा / धात्रा | धातृभ्याम् | धातृभिः |
| चतुर्थी | धातृणे / धात्रे | धातृभ्याम् | धातृभ्यः |
| पञ्चमी | धातृणः / धातुः | धातृभ्याम् | धातृभ्यः |
| षष्ठी | धातृणः / धातुः | धातृणोः / धात्रोः | धातॄणाम् |
| सप्तमी | धातृणि / धातरि | धातृणोः / धात्रोः | धातृषु |
| सम्बोधन | हे धातर् / हे धातृ | हे धातृणी | हे धातॄणि |