कबीरदास - जीवन परिचय, शब्दार्थ, सन्दर्भ, प्रसङ्ग, हिन्दी व्याख्या, वस्तुनिष्ठ प्रश्न

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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कबीरदास

कबीरदास का जीवन परिचय तथा कबीरदास के पद, कबीरदास के दोहे का शब्दार्थ, सन्दर्भ, प्रसङ्ग, हिन्दी व्याख्या एवं विशेष/टिप्पणी।

कबीरदास का जीवन परिचय

चौदह सौ पचपन साल गये।
चन्द्रवार एक ठाठ भये॥
जेठ सुदी बरसायत को॥
पूरनमासी प्रगट भये॥

जन्म समय :-
यह एक अति विवादास्पद प्रश्न है। इसके लिए हमें अंतः साक्ष्य एवं वाह्य साक्ष्यों पर जाना पड़ता है।

अंतः साक्ष्य :- वे सिकन्दर लोधी के समकालीन थे। यह बात नाभादास के भक्तमाल और वील, हंटर, ग्रिप्स, मेकलिफ, स्मिथ तथा भण्डारकर आदि के इतिहास ग्रन्थो से पता चलती है। कबीर दास ने अपने साहित्य में जयदेव और नामदेव का भी उल्लेख किया है। अतः ये उनके पश्चात्वर्ती थे। नामदेव का समय तेरहवीं शताब्दी माना गया है। पीपा ने कबीर का नाम बड़ी श्रद्धा से लिया है इससे सिद्ध है कि पीपा से पहले कबीर थे।

कबीर चरित्र बोध में 1455 विक्रम ज्येष्ठ सुदी पूर्णिमा सोमवार को कबीर का जन्म हुआ। इसका आधार निम्नांकित दोहा है-
चौदह सौ पचपन साल गये चन्द्रवार इक ठाठ ठये।
जेठ सुदी बरसायत को पूरनमासी प्रगट भये।
डा० श्याम सुन्दर दास ने उक्त दोहे में 'गए' शब्द का अर्थ व्यतीत लगाकर 1456 को कबीर का जन्म संवत माना है। डा० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी इसी संवत् को स्वीकार किया है। किन्तु डा० माताप्रसाद गुप्त प्रभृति विद्वानो ने सं० 1455 ज्येष्ठ पूर्णिमा सोमवार को कबीर की जन्म तिथि माना है, क्योकि इण्डियन एस्ट्रोलाजी के आधार पर यह गणना ठीक बैठती है।

गुरु :- स्वामी रामानन्द कबीर के शिक्षागुरु थे। दीक्षागुरु थे। कबीर ने स्वयं कहा है - 'काशी में हम प्रगट भये रामानन्द चेताये।' कुछ विद्वानो ने 'शेख तकी' को कबीर का गुरु माना है। किन्तु यह सर्वथा अमान्य है। शेख तकी को सम्बोधन करते हुए कबीर द्वारा कहे गये 'सुनहु शेख तकी तुम' इन शब्दो में जो कठोरता एवं कर्कशता है वह कबीर जैसे गुरुभक्त से अपने गुरु के प्रति प्रत्याशित नही थी।
अबुल फजल द्वारा लिखित आइने अकबरी में भी कबीर का नाम आया है जिसमें लिखा है- 'अद्वैतवादी कबीर की आत्मा यहाँ (समाधिस्थल) पर विश्राम करती है।' कबीर अद्वैतवादी थे।
शेख अकरदी, सेय्य सकरदी, मानहुँ बन्दन हमार।
भावै अन्त और जुग जुग बन्दन...

मोहसिन फानी की पुस्तक 'दविस्ताने मजाहिब' इसमें बताया गया है कि कबीर जन्म से जुलाहे थे। एकेश्वरवादी तथा वैरागी थे।
मौलवी नसीरुद्दीन की पुस्तक- 'तजकीरातुल फुकरा' इसमें कबीर को रामानन्द का शिष्य बताया गया है।
मौलवी गुलाम सरवर कृत पुस्तक 'खजीद अतुल असाफिया' इसमें कबीर का जन्म संवत् हिजरी में दिया गया है। परिवर्तित करने पर सन् 1394 ठहरता है।
सेन नाई नामक सन्त ने कबीर एवं रैदास को गुरुभाई बताया है।

जन्म स्थान :-
जन्म स्थान को लेकर काशी और मगहर दो स्थान बताये जाते हैं। एक अन्य मत के अनुसार आजमगढ़ अन्तर्गत 'बेलहरा' नामक ग्राम इनका जन्म स्थान बताया जाता है।
'तू बाम्हन मैं कासीक जोलहा' कथन से काशी में ही जन्म होने की बात अपेक्षाकृत अधिक प्रतीत होती है। कदाचित् अन्यथा वे इतनी निर्भीकता से 'कासीक जोलहा' कहने का साहस न करते।

माता-पिता :-
कबीर के माता पिता कौन थे। इस सम्बन्ध में नीरू तथा नीमा का नाम लिया जाता है। कुछ लोग कबीर को नीरू और नीमा का पोष्य पुत्र मानते हैं। किन्तु इसकी सम्भावना विरल जान पड़ती है। कबीर नीरू नीमा के औरस पुत्र थे।
'सुसि-सुसि रोवै कबीर की माई' जैसे अन्तः साक्ष्य से यही बात प्रमाणित होता है। कबीर को हिन्दू विचारधारा से सम्बन्ध करने के लिये उन्हें विधवा ब्राह्मणी अथवा ब्राह्मण कन्या आदि का पुत्र कल्पित किया गया है।

जाति :-
कबीर जाति से जुलाहा थे। यह उन्ही की बातो से स्पष्ट थे।
तू बाम्हन मै कासीक जुलहा। मोहि तोहि बराबरी कैसे कै बनहि।
अन्य स्थलो पर भी कबीर ने अपने को जुलाहा कहा-
तूँ ब्राह्मण मैं कासीक जुलहा चीन्हि न मोर गियाना।
जाति के उल्लेख से कबीर द्वारा 'कोरी' की ओर संकेत किया गया ज्ञात होता है-
कोरी कौ काहू मरमु न जानां। सब जगु आनि तनायौ तांना॥
कहत कबीर कारगह तोरी, सूत सूत मिलाये कोरी

जीवन विषयक अन्य विवरण :-
अपनी रचनाओ में कबीर ने कहा है कि उन्होंने ताना बुनना छोड़ दिया है। और शरीर पर राम नाम लिख लिया है। कबीर की माता ठगी-ठगी सी रो रही हैं कि ये खुदा यह बालक अपना धन्धा छोड़कर किस प्रकार जियेगा।
तनना बुनना तज्यौ कबीर, राम नाम लिख लियो शरीर
मुसि-मुसि रोवै कबीर की माई। ए बारिक कैसे जीवहि खुदाई
जब भनि तागा वाहौँ बेही तब लगि बिसरै राम सनेही।
कहहु कबीर सुनहु मेरी माई पूरनहारा त्रिभुवन राई

गुरू से पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाने पर कबीर ने लोक लाज और कुल मर्यादा को साधारण धागे की तरह तोड़ दिया है-
लोक लाज कुल की मरजादा तोरि दियो जस धांगा
कहै कबीर गुर पूरा पाया भाग हमारा जागा।
कबीर ने काजी द्वारा हाथी से कुचलवाने की ओर संकेत करते हुए कहा है कि हे गोविन्द आपकी शक्ति की बलिहारी।
अहि मेरे ठाकुर तुम्हारा जोर
काजी बांकिबौ हस्ती तौर
भूजा बाँधि-भिला करि डार्यो। हस्ती कांपि मूँड महि मार्यो
क्या अपराध सन्त ह्वै कीन्हा। बाँधि पोटि कुंजर कौ दीन्हा
कुंजर पोट बहु बंदन करै। अजहूँ न सूझै काजी अंधरै
तीन्ह बेर पतियारा लीन्हा मन कठोर अजहूँ न पतीना॥
कहै कबीर हमरा गोविन्द चौथे पद महि जनकी जिन्द॥

कबीर ने कहा है कि यदि मन दृढ़ है तो शरीर के लिये भयभीत होने की क्या आवश्यकता।
मन न डिगै तौ काहे की डेराई, चरन कमल चित रह्यौ समाई
गंग गुसाइंनि गहिर गम्भीर। जंजीर बाँधि कर खरे कबीर
गंगा की लहर मेरी टूटी जंजीर मृगछाला पर बैठे कबीर
कहँ कबीर कोउ संग न साथ जल थल मे राखै रघुनाथ
इसलिये कबीर ने अन्यत्र भी राम के आश्रय की ओर स्पष्ट संकेत किया है।
अब मोहि राम भरोसा तोरा। तब काहूँ का कवन निहोरा॥

कबीर ने कदाचित् ही कोई मित्र बनाया हो-
भाई रे विरलै दोस्त कबीर, के यहूँ तत बार-बार कसै कहिये
भानन गड़न सवारन समर्थ ज्यौं राखै त्यौ रहिये।
मित्र की बात छोड़ धीरे-धीरे उनका कोई अपना कहा जाने वाला व्यक्ति भी नहीं रहा।
कहत कबीर सुनौ नर लोई। हम न किसी के न हमरा कोई
कबीर ने न स्वयं लोकाचार किया और न करने की सलाह दी-
परिहरू लोभहु अरु लोकाचारु। परिहरू काम क्रोध हुँकारू
कबीर गृहस्थ थे। यह बात सर्वविदित है परन्तु उन्होंने अपने को वैरागी भी बताया है।
नाथ जी हम तब के वैरागी। हमारी सुरति नाम सौं लागी॥
कबीर ने विवाह भी किया था और उनके सन्तान भी थी।
बूड़ा वंश कबीर का उपजा पूत कमाल
हरि का सुमिरन छाँड़ि कै...

कबीर ने विद्याध्ययन नहीं किया था। यह लोक प्रसिद्ध है।
मसि कागद छूयो नही कल़म गह्यो नहि हाथ।
चारो जुग के महातम, मुखहि जनाई बात॥
कागजी विद्या की व्यर्थता का प्रतिपादन भी कबीर की वाणी में हुआ है।
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥

मृत्यु :-
संवत पन्द्रह सौ पछतरा मगहर कियो गवन।
माघ सुदी एकादशी, मिल्यो पवन मे पवन॥
(कबीर कसौटी-भूमिका पृष्ठ- 24 बाबू लहना सिंह) कबीर पंथ में प्रचलित उक्त दोहे का एक रूपान्तर डॉ० एस विल्सन को किसी सन्त से प्राप्त हुआ था। जो इस प्रकार है-
संवत पन्द्रह सौ औ पाँच में मगहर कियो गवन
माघ सुदी एकादशी मिल्यो पवन से पवन
इस प्रकार विवादित स्थिति में भी इनका निधन सम्वत 1575 मे एवं द्वितीय मतानुसार 1505 में ठहरता है।
कबीर जीवन भर काशी रहे एवं मरते समय मगहर चले गए।
अब कहुँ राम कवन गति मोरी। तजिले बनारस मति भई थोरी॥
सकल जनम शिवपुरी गवाँया। मरती बार मगहर उठि आया!
बहुत बरिष तपु कीया कासी। मरनु भया मगहर के वासी॥
एक अन्य पद में भी कबीर ने काशी और मगहर का उल्लेख किया है-
लोगो तुम हौ मति के भोरा
जउ कासी तनु तजहि कबीर तौ रामहि कौन निहोरा
कहहुँ कबीर सुनहु रे भोई भरमि न भूलहूँ कोई।
क्या काशी क्या मगहर ऊबर हरदै राम जो होई॥
इस प्रकार कबीर का जीवन काशी में व्यतीत हुआ परन्तु मरते वक्त मगहर पहुँच गए।

व्यक्तित्व :- महात्मा कबीर परम सन्तोषी, उदार, स्वतंत्रचेता निर्भीक, सत्यवादी, अहिंसा, सत्य एवं प्रेम के समर्थक, सात्विक प्रकृति बाह्याडम्बर-विरोधी तथा क्रान्तिकारी सुधारक थे। वे मस्त मौला लापरवाह फक्कड़ फकीर थे। वे जन्मजात विद्रोही थे और उनमें एक अदम्य साहस एवं अखण्ड आत्मविश्वास था। वे प्रखर प्रतिभा तथा विलक्षण अथक सशक्त व्यक्तित्व से सम्पन्न थे। वे सिकन्दर लोदी के सामने झुके नही, हिन्दू मुसलमानो के प्रबल रोष ने उन्हें तनिक भी विचलित नही किया। वे योगियो के प्रभाव से आहत नही हुए। उन्होने कदाचार का डटकर विरोध किया। वे जीवन पर्यन्त अपनी अटपटी वाणी से उत्तरी भारत को प्रेरित करते रहे। सुकरात के समान वे सामाजिक व्यवस्था और धार्मिक व्यवस्था पर तीव्रतम आघात करते थे। शासक वर्ग ने उन्हें भी विष का प्याला पीने को दिया किन्तु वे पीकर पचा गये। कबीर का व्यक्तित्व...

साखी के पद

पद संख्या 01
रस गगन गुफा में अजर झरै । बिन बाजा झंकार उठै जँह, समुझि परै जब ध्यान धरै । बिना ताल जँह कमल फुलाने, तिहिं चढ़ि हंसा केलि करै । बिन चंदा उजियारी दरसे, जँह-तहँ हंसा नजर परै । दसवें द्वार ताड़ी लागी, अलख पुरुष जाको ध्यान धरै । काल कराल निकट नहिं आवै, काम, क्रोध, मद, लोभ टरै । जुगन-जुगन की तृषा बुझानी, करम- भरम अतिव्याधि टरै । कहै कबीर सुनो भाई साधो, अमर होय कबहूँ न मरै ।।
शब्दार्थ:

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सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

प्रसङ्ग:

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व्याख्या:

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टिप्पणी:

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पद संख्या 02
संतौं भाई आई ग्यान की आँधी रे। भ्रम की टाटी सबै उडाँणी, माया रहै न बाँधी॥ हिति चित की द्वै थूँनी गिराँनी, मोह बलिंडा तूटा। त्रिस्नाँ छाँति परि घर ऊपरि, कुबधि का भाँडाँ फूटा॥ जोग जुगति करि संतौं बाँधी, निरचू चुवै न पाँणी॥ कूड़ कपट काया का निकस्या हरि की गति जब जाँणी॥ आँधी पीछै जो जल बूठा, प्रेम हरि जन भींनाँ। कहै कबीर माँन के प्रगटे उदित भया तम षींनाँ॥
शब्दार्थ:

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सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

प्रसङ्ग:

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व्याख्या:

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टिप्पणी:

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पद संख्या 03
पानी बिच मीन पियासी । मोहि सुनि-सुनि आवत हाँसी ।। आतम ज्ञान बिना सब सूना क्या मथुरा क्या कासी । घर की बस्तु घरी नहिं सूझै, बाहर खोजन जासी । मृग की नाभि माँहि कस्तूरी, बन-बन फिरत उदासी । कहत कबीर सुनो भाई साधो, सहज मिले अविनासी ।।
शब्दार्थ:

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सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

प्रसङ्ग:

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व्याख्या:

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टिप्पणी:

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पद संख्या 04
मेरा तेरा मनुआ कैसे इक होय रे । मैं कहता हूँ आँखिन की देखी, तू कागद की लेखी रे । मैं कहता सुरझावनहारी, तू राख्यो अरूझाइ रे । मैं कहता हूँ जागत रहियो, तू कहता है सोई रे । मैं कहता निर्मोही रहियो, तू जाता है मोहि रे । जुगन-जुगन समझावतहारा, कहा न मानत कोइ रे ।।
शब्दार्थ:

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सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

प्रसङ्ग:

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व्याख्या:

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पद संख्या 05
भीजै चुनरिया प्रेमरस बूँदन, आरति साजि के चली है सुहागिन, अपने पिय को ढूँढ़न, काहे की तोरी बनी है चुनरिया,काहे को लागे चारों फूँदन । पाँच तत्व की बनी है चुनरिया, नाम के लागे फूँदन । चढ़िगे महल खुलि गइ रे किवरिया, दास कबीर लागे झूलन ।।
शब्दार्थ:

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सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

प्रसङ्ग:

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व्याख्या:

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पद संख्या 06
मन लागो मेरो यार फकीरी में । जो सुख पायो राम भजन में, सो सुख नाहिँ अमीरी में । भलो बुरो सबको सुनि लीजै, कर गुजरान गरीबी में । प्रेम नगर में रहनि हमारी, भलि बनि आइ सबूरी में । हाथ में कूड़ी बगल में सोटा, चारों दिशा जगीरी में । आखिर यह मन खाक मिलेगा, कहाँ फिरत मँगरूरी में । कहै कबीर सुनो भाई साधो, साहिब मिलै सबूरी में ।
शब्दार्थ:

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सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

प्रसङ्ग:

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व्याख्या:

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टिप्पणी:

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पद संख्या 07
दुलहनी गावहु मंगलचार, हम घरि आए हो राजा राम भरतार॥टेक॥ तन रत करि मैं मन रत करिहूँ, पंचतत्त बराती। राम देव मोरैं पाँहुनैं आये मैं जोबन मैं माती॥ सरीर सरोवर बेदी करिहूँ, ब्रह्मा वेद उचार। रामदेव सँगि भाँवरी लैहूँ, धनि धनि भाग हमार॥ सुर तेतीसूँ कौतिग आये, मुनिवर सहस अठ्यासी। कहै कबीर हँम ब्याहि चले हैं, पुरिष एक अबिनासी॥
शब्दार्थ:

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सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

प्रसङ्ग:

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व्याख्या:

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टिप्पणी:

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पद संख्या 08
एक अचंभा देखा रे भाई, ठाढ़ा सिंध चरावै गाई॥टेक॥ पहले पूत पीछे भइ माँई, चेला कै गुरु लागै पाई। जल की मछली तरवर ब्याई, पकरि बिलाई मुरगै खाई॥ बैलहि डारि गूँनि घरि आई, कुत्ता कूँ लै गई बिलाई॥ तलिकर साषा ऊपरि करि मूल बहुत भाँति जड़ लगे फूल । कहै कबीर या पद को बूझै, ताँकूँ तीन्यूँ त्रिभुवन सूझै ॥
शब्दार्थ:

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सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

प्रसङ्ग:

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व्याख्या:

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टिप्पणी:

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पद संख्या 09
सतगुर सवाँ न कोइ सगा, सोधी सईं न दाति। हरिजी सवाँ न कोइ हितू, हरिजन सईं न जाति ॥
शब्दार्थ:

सगा = सगा सम्बन्धी, दाति = दाता, हितू = हितैषी, हरिजन = ईश्वर का भक्त।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

प्रसङ्ग:

गुरु एवं ईश्वर भक्ति की महिमा का वर्णन है।

व्याख्या:

कबीरदास कहते हैं कि साधक के लिए सद्‌गुरु के समान कोई अपना निकट का सम्बन्धी नहीं है, साधु के समान कोई दाता नहीं है (क्योंकि वह ज्ञान को देने वाला है)। ईश्वर के समान कोई जीवों का भला चाहने वाला नहीं है तथा भगवान के भक्तों की जाति के समान कोई जाति (समाज) नहीं है।

टिप्पणी:

अलंकार — अनुप्रास, वक्रोक्ति तथा अनम्योपमा। विशेष — भगवद् भक्तों का सम्प्रदाय सर्वव्यापी एवं सार्वभौम होता है, जबकि अन्य संगठन निहित स्वार्थों पर आधारित होते हैं।

पद संख्या 10
सतगुर की महिमा, अनँत, अनँत किया उपगार। लोचन अनँत उघाड़िया, अनँत दिखावणहार ।।
शब्दार्थ:

अनंत = जिसकी गणना न की जा सके, उपगार = उपकार, उखाड़िया = उद्घाटित किया, खोल दिया।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

प्रसङ्ग:

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व्याख्या:

सतगुरु की महिमा अपार है, उनकी महता का वर्णन नहीं किया जा सकता है। गुरुदेव ने ज्ञान प्रदान करके मेरे प्रति जो उपकार किया है, वह अनन्त है। इन्हीं की असीम कृपा से अपार ब्रह्म के दर्शन योग्य दृष्टि मुझको प्राप्त हुई है। उनके द्वारा प्राप्त ज्ञान ने ही मुझको अनन्त ब्रह्म का दर्शन कराया है।

टिप्पणी:

अलंकार — सांगरूपक, ‘अनन्त’ तथा ‘अनन्त दिखावणहार’। विशेष — लक्षणा: ‘लोचन अनन्त’ में अनन्त। अनन्त लोचन का तात्पर्य दिव्य दृष्टि से है—वह स्थिति जब कर्तापन का अभिमान नष्ट हो जाता है।

कबीरदास के दोहे

पद संख्या-01
सतगुर सवाँ न कोइ सगा, सोधी सईं न दाति। हरिजी सवाँ न कोइ हितू, हरिजन सईं न जाति।
शब्दार्थ:

सगा = निकट सम्बन्धी, दाति = दाता, हितू = हितैषी, हरिजन = ईश्वर का भक्त।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

साधक के लिए सद्गुरु के समान कोई निकट सम्बन्धी नहीं है और साधु के समान कोई सच्चा दाता नहीं है। ईश्वर के समान कोई हितैषी नहीं तथा भगवान के भक्तों के समान कोई श्रेष्ठ जाति नहीं है।

टिप्पणी:

कबीर ने गुरु, ईश्वर और हरिभक्त की महिमा बताई है। इसमें उपमा एवं अनुप्रास का सौंदर्य है।

पद संख्या-02
सतगुर की महिमा, अनँत, अनँत किया उपगार। लोचन अनँत उघाड़िया, अनँत दिखावणहार।
शब्दार्थ:

अनँत = जिसकी सीमा न हो, उपगार = उपकार, लोचन = नेत्र, उघाड़िया = खोल दिए, दिखावणहार = दिखाने वाला।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

सद्गुरु की महिमा अनन्त है। उन्होंने मुझ पर अनन्त उपकार किया और मेरे ज्ञान-चक्षु खोलकर मुझे उस अनन्त परमात्मा का दर्शन कराया।

टिप्पणी:

सांगरूपक अलंकार। ‘अनन्त’ शब्द की पुनरावृत्ति से गुरु की महिमा और प्रभाव अत्यन्त मार्मिक बन गया है।

पद संख्या 03
गुरु गोविन्द तौ एक है, दूजा यह आकार। आपा मेट जीवत मरै, तो पावै दीदार॥3॥
शब्दार्थ:

गोविन्द = परमात्मा, दूजा = दूसरा, आकार = रूप शरीर, आपा = अहंकार, मेट = मिटाकर, जीवत मरै = जीते-जी अहंकार का त्याग करना, दीदार = दर्शन।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

गुरु और परमात्मा वास्तव में एक ही हैं, दूसरा केवल यह दिखाई देने वाला भौतिक रूप है। जो मनुष्य अपने अहंकार को समाप्त करके जीते-जी अपने 'मैं' भाव को मिटा देता है, उसे परमात्मा के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं।

टिप्पणी:

कबीर ने गुरु को परमात्मा का स्वरूप माना है। आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए अहंकार का त्याग आवश्यक है। अलंकार: रूपक एवं विरोधाभास का भाव। विशेष: गुरु-भक्ति तथा अहंकार-त्याग को आध्यात्मिक साधना का आधार बताया गया है।

पद संख्या 04
गुरु धोबी सिष कापड़ा, साबुन सिरजनहार। सुरति-सिला पर धोइए, निकसे ज्योति अपार॥4॥
शब्दार्थ:

धोबी = कपड़े धोने वाला, सिष = शिष्य, कापड़ा = कपड़ा, सिरजनहार = सृष्टिकर्ता परमात्मा, सुरति = चेतना, सिला = शिला पत्थर, ज्योति = ज्ञान का प्रकाश, अपार = असीम।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

गुरु धोबी के समान है और शिष्य कपड़े के समान। परमात्मा द्वारा दिया गया ज्ञान रूपी साबुन और सजग चेतना रूपी पत्थर पर गुरु शिष्य के मन को निर्मल करता है। इससे उसके भीतर छिपा हुआ असीम ज्ञान-प्रकाश प्रकट हो जाता है।

टिप्पणी:

कबीर ने गुरु की भूमिका को धोबी के रूपक द्वारा अत्यंत प्रभावशाली ढंग से स्पष्ट किया है। अलंकार: रूपक। गुरु शिष्य के अज्ञान और विकारों को दूर करके उसके भीतर स्थित ज्ञान-ज्योति को प्रकाशित करता है।

पद संख्या 05
कबिरा ते नर अंध है, गुरू को कहते और। हरि रूठे गुरू ठौर है, गुरू रूठे नहिं ठौर॥5॥
शब्दार्थ:

अंध = अज्ञानी, और = अन्य अलग, रूठे = नाराज हो जाएँ, ठौर = स्थान आश्रय।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

कबीर कहते हैं कि जो लोग गुरु और परमात्मा को अलग-अलग मानते हैं, वे अज्ञानी हैं। यदि परमात्मा नाराज हो जाएँ तो गुरु उनका आश्रय प्रदान कर सकता है, लेकिन यदि गुरु ही नाराज हो जाएँ तो मनुष्य के लिए कोई आश्रय नहीं बचता।

टिप्पणी:

इस पद में गुरु की सर्वोच्च महत्ता प्रतिपादित की गई है। अलंकार: अतिशयोक्ति का भाव। विशेष: कबीर की भक्ति-साधना में गुरु को परमात्मा तक पहुँचने का प्रमुख माध्यम माना गया है।

पद संख्या 06
चकई बिछुरी रैनि की, आइ मिलै परभाँति। जे नर बिछुरे राम सौं, ते दिन मिले न राति॥6॥
शब्दार्थ:

चकई = चकवी पक्षी, बिछुरी = बिछुड़ी, रैनि = रात्रि, परभाँति = प्रभात के समय, नर = मनुष्य, राम सौं = परमात्मा से, दिन मिले न राति = कभी मिलन नहीं होता।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

चकवी पक्षी रात में अपने प्रिय चकवे से बिछुड़ जाती है, परंतु प्रभात होते ही दोनों फिर मिल जाते हैं। लेकिन जो मनुष्य परमात्मा से बिछुड़ गया है, उसका वियोग इतना गहरा है कि उसे दिन या रात किसी भी समय परमात्मा का मिलन नहीं हो पाता।

टिप्पणी:

यहाँ सांसारिक विरह के माध्यम से जीव और परमात्मा के चिरन्तन वियोग को व्यक्त किया गया है। अलंकार: निदर्शना। विशेष: जीव का परमात्मा से मिलन ही आध्यात्मिक जीवन का परम लक्ष्य है।

पद संख्या 07
बिरहा बिरहा जिनि कहौ, बिरहा है सुलितान। जिह घटि बिरह न संचरै, सो घट सदा मसान॥7॥
शब्दार्थ:

बिरहा = विरह, जिनि कहौ = ऐसा मत कहो, सुलितान = सुल्तान सर्वोच्च, घटि = हृदय/शरीर में, संचरै = व्याप्त होता है, मसान = श्मशान मरघट।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

विरह को सामान्य या तुच्छ मत समझो। विरह तो प्रेम और साधना का सर्वोच्च भाव है। जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा के प्रति विरह और प्रेम नहीं है, उसका जीवन श्मशान के समान निर्जीव और निरर्थक है।

टिप्पणी:

कबीर ने ईश्वर-विरह को आध्यात्मिक जीवन की श्रेष्ठ अवस्था माना है। अलंकार: यमक—'बिरहा' शब्द की आवृत्ति; अपन्हुति का भाव। विशेष: प्रभु-प्रेम के अभाव में जीवन निरर्थक माना गया है।

पद संख्या 08
परबति परबति में फिर्‌या, नैन गँवाये रोइ।
सो बूटी पाऊँ नहीं, जातें जीवनि होइ॥8॥
शब्दार्थ:

परबति = पर्वत, फिर्‌या = घूमा, नैन = आँखें, गँवाये = खो दीं, रोइ = रोकर, बूटी = औषधि, जातें = जिससे, जीवनि होइ = जीवन प्राप्त हो।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

कबीर कहते हैं कि मैंने पर्वत-पर्वत घूमकर उस औषधि की खोज की, जिससे जीवन प्राप्त हो सके। प्रियतम के वियोग में रोते-रोते मेरी आँखों की ज्योति तक चली गई, फिर भी वह जीवनदायिनी बूटी मुझे नहीं मिली।

टिप्पणी:

यहाँ 'बूटी' सांसारिक औषधि नहीं, बल्कि परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। अलंकार: अतिशयोक्ति। विशेष: साधक की परमात्मा-प्राप्ति की तीव्र उत्कंठा और विरह-वेदना व्यक्त हुई है।

पद संख्या 09
अंषड़ियाँ झाई पड़ी, पंथ निहारि निहारि।
जीभड़ियाँ छाला पड़्या, राम पुकारि पुकारि॥9॥
शब्दार्थ:

अंषड़ियाँ = आँखें, झाई = मंदता धब्बा, पंथ = मार्ग, निहारि = देखते हुए, जीभड़ियाँ = जीभ में, छाला = फोड़ा, पुकारि = पुकारते हुए।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

प्रियतम राम के आने की प्रतीक्षा करते-करते मार्ग को बार-बार देखते हुए विरहिणी की आँखों की ज्योति मंद पड़ गई है। राम को पुकारते-पुकारते उसकी जीभ में छाले पड़ गए हैं।

टिप्पणी:

कबीर ने विरह की तीव्रता को शारीरिक कष्टों के माध्यम से व्यक्त किया है। अलंकार: पुनरुक्तिप्रकाश—'निहारि-निहारि', 'पुकारि-पुकारि'; अतिशयोक्ति—सम्पूर्ण साखी। विशेष: यह वर्णन विरह की चरम अवस्था को प्रकट करता है।

पद संख्या 10
नैंना नीझर लाइया, रहट बहै निस जाम। पपीहा ज्यूँ पिव पिव करौं, कबरू मिलहुगे राम॥10॥
शब्दार्थ:

नैंना = नेत्र, नीझर = झरना, रहट = पानी निकालने का यंत्र, निस जाम = रात-दिन, पपीहा = एक पक्षी, पिव = प्रियतम, कबरू = कब, मिलहुगे = मिलोगे।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

विरह के कारण मेरी आँखों से आँसुओं की धारा निरंतर बह रही है। मैं रात-दिन रहट की तरह आँसू बहाता रहता हूँ और पपीहे की तरह बार-बार 'पिव-पिव' पुकारता हूँ। हे राम! आप मुझे कब मिलेंगे?

टिप्पणी:

पपीहे की प्रियतम के लिए पुकार साधक की परमात्मा-प्राप्ति की उत्कट इच्छा का प्रतीक है। अलंकार: उपमा—पपीहे के समान; पुनरुक्तिप्रकाश—'पिव-पिव'। विशेष: विरह में निरंतर अश्रुधारा और मिलन की उत्कंठा व्यक्त हुई है।

पद संख्या 11
सुमिरन सुरत लगाइके, मुख से कछू न बोल। बाहर के पट देइ के, अन्तर के पट खोल॥11॥
शब्दार्थ:

सुमिरन = स्मरण, सुरत = चित्त ध्यान, पट = द्वार परदा, देइके = बंद करके, अन्तर = भीतर।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

मन को एकाग्र करके परमात्मा का स्मरण करो और बाहरी विषयों के प्रति मौन हो जाओ। बाहरी इंद्रियों के द्वार बंद करके अपने भीतर के ज्ञान और चेतना के द्वार खोलो।

टिप्पणी:

कबीर बाह्य आडंबर के स्थान पर अंतर्मुखी साधना का संदेश देते हैं। अलंकार: रूपक—'बाहर के पट' और 'अन्तर के पट'। विशेष: सच्ची साधना मन को भीतर की ओर मोड़ने से संभव होती है।

पद संख्या 12
तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझ मैं रही न हूँ। वारी फेरी बलि गई, जित देखौं तित तूँ॥12॥
शब्दार्थ:

तूँ = तुम परमात्मा, आपा/हूँ = अहंकारयुक्त मैं, वारी फेरी = बार-बार समर्पित होना, बलि गई = न्यौछावर हो गई, जित देखौं तित = जहाँ देखता हूँ वहाँ।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

हे प्रभु! 'तू-तू' का निरंतर स्मरण करते-करते मैं स्वयं 'तू' हो गया हूँ। मेरे भीतर 'मैं' और अहंकार का भाव नहीं रहा। मैंने स्वयं को पूर्णतः तुम्हारे ऊपर न्यौछावर कर दिया है। अब मैं जहाँ भी देखता हूँ, वहाँ केवल तुम्हीं दिखाई देते हो।

टिप्पणी:

यह भक्ति और प्रेम-योग की चरम अवस्था है, जिसमें साधक का अहंकार समाप्त होकर वह परमात्मा में एकाकार हो जाता है। अलंकार: पुनरुक्तिप्रकाश—'तूँ-तूँ'; रूपक का भाव। विशेष: अद्वैत और पूर्ण आत्मसमर्पण की अनुभूति।

पद संख्या 13
लालन की ओबरी नहीं, हंसन की नाही पांति। सिंहन के लेहड़ा नहीं, साधु न चलै जमाँति॥13॥
शब्दार्थ:

लालन = लाड़ले/प्रियजन, ओबरी = बैठक विशेष स्थान, हंसन = हंसों, पांति = पंक्ति, सिंहन = सिंहों, लेहड़ा = झुंड, साधु = संत, जमाँति = भीड़ समूह।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

प्रियतम की सभा में कोई विशेष आसन या स्थान नहीं होता, हंसों की कोई भीड़ नहीं होती और सिंहों का कोई झुंड नहीं होता। इसी प्रकार सच्चा साधु भी भीड़ के पीछे नहीं चलता; वह अपने स्वतंत्र आध्यात्मिक मार्ग पर चलता है।

टिप्पणी:

कबीर सच्चे साधु की स्वतंत्रता और विशिष्टता पर बल देते हैं। अलंकार: दृष्टान्त का भाव। विशेष: सच्चा साधक लोक-प्रदर्शन और भीड़ का अनुकरण नहीं करता।

पद संख्या 14
हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराड़ा हाथि। अब घर जालौं तास का, जै चलै हमारे साथि॥14॥
शब्दार्थ:

घर = मोह-माया का संसार, जाल्या = जला दिया, आपणाँ = अपना, मुराड़ा = मशाल, हाथि = हाथ में, तास का = उसका, जै = जो, साथि = साथ।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

कबीर कहते हैं कि मैंने अपने मोह-माया के घर को स्वयं जला दिया है और हाथ में मशाल ले ली है। अब जो भी मेरे साथ इस आध्यात्मिक मार्ग पर चलेगा, उसके भीतर के मोह-माया के घर को भी मैं जला दूँगा।

टिप्पणी:

यहाँ 'घर जलाना' सांसारिक भवन जलाना नहीं, बल्कि मोह, माया और आसक्ति का त्याग करना है। अलंकार: रूपक। विशेष: कबीर निर्भीक होकर सांसारिक मोह का त्याग करने का संदेश देते हैं।

पद संख्या 15
कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि। ऐसै घटि घटि राँम हैं, दुनियाँ देखै नाँहि॥15॥
शब्दार्थ:

कस्तूरी = मृगनाभि से प्राप्त सुगंधित पदार्थ, कुंडलि = नाभि, मृग = हिरण, बन = वन, घटि घटि = प्रत्येक हृदय में, राँम = परमात्मा।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

जिस प्रकार कस्तूरी हिरण की अपनी नाभि में ही होती है, लेकिन हिरण उसकी सुगंध को बाहर वन में खोजता फिरता है, उसी प्रकार परमात्मा प्रत्येक प्राणी के हृदय में विद्यमान हैं, फिर भी संसार उन्हें बाहर खोजता रहता है।

टिप्पणी:

यह कबीर की प्रसिद्ध आत्मान्वेषण की शिक्षा है। अलंकार: उपमा और दृष्टान्त। विशेष: परमात्मा को बाहर खोजने के बजाय अपने भीतर खोजने का संदेश दिया गया है।

पद संख्या 16
नाँ कुछ किया न करि सक्या, नाँ करणे जोग सरीर। जे कुछ किया सु हरि किया, ताथै भया कबीर कबीर॥16॥
शब्दार्थ:

नाँ = नहीं, करि सक्या = कर सका, करणे जोग = करने योग्य, सरीर = शरीर, सु = वह, ताथै = इसलिए, भया = हुआ।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

कबीर कहते हैं कि मैंने अपने बल से कुछ नहीं किया और न ही मेरा शरीर कुछ करने योग्य है। जो कुछ भी हुआ है, वह सब परमात्मा की कृपा से हुआ है। इसी कारण कबीर का जीवन सार्थक हुआ और उन्हें आध्यात्मिक पहचान प्राप्त हुई।

टिप्पणी:

इस पद में पूर्ण विनम्रता और ईश्वर-कृपा में विश्वास व्यक्त हुआ है। अलंकार: पुनरुक्ति का भाव। विशेष: कबीर अपने किसी भी कार्य का श्रेय स्वयं न लेकर परमात्मा को देते हैं।

पद संख्या 17
हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराइ। बूँद समानी समंद मैं, सो कत हेरी जाइ॥17॥
शब्दार्थ:

हेरत = देखते/खोजते, सखी = सखी, हिराइ = लुप्त हो गया, बूँद = जल की बूंद, समंद = समुद्र, कत = कहाँ, हेरी = देखी/खोजी।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

हे सखी! परमात्मा को खोजते-खोजते कबीर स्वयं ही उनमें लीन हो गए। जिस प्रकार जल की एक बूंद समुद्र में मिल जाने पर अलग दिखाई नहीं देती, उसी प्रकार कबीर परमात्मा में ऐसे समा गए कि उनका अलग अस्तित्व नहीं रहा।

टिप्पणी:

यहाँ जीवात्मा के परमात्मा में पूर्ण विलय का चित्र प्रस्तुत किया गया है। अलंकार: उपमा—बूँद और समुद्र की। विशेष: अद्वैत भाव तथा आत्मा-परमात्मा की एकता का सुंदर निरूपण है।

पद संख्या 18
कबीर सबद सरीर मैं, bini गुण बाजै तंति। बाहरि भीतरि भरि रह्या, ताथैं छूटि भरंति॥18॥
शब्दार्थ:

सबद = शब्द परमात्मा का नाम, सरीर = शरीर, bini गुण = बिना तार/गुण के, बाजै = बजता है, तंति = तार, बाहरि = बाहर, भीतरि = भीतर, भरि रह्या = व्याप्त है, भरंति = भ्रम।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

कबीर कहते हैं कि परमात्मा का शब्द मेरे शरीर में बिना किसी दिखाई देने वाले तार के वाद्य की तरह निरंतर बज रहा है। वह परम सत्ता बाहर और भीतर सभी जगह व्याप्त है। इस सत्य को जान लेने पर संसार के सारे भ्रम समाप्त हो जाते हैं।

टिप्पणी:

यहाँ 'शब्द' से दिव्य नाद अथवा परमात्मा की आंतरिक अनुभूति का संकेत है। अलंकार: रूपक। विशेष: परमात्मा की सर्वव्यापकता और आत्मानुभूति के द्वारा भ्रम से मुक्ति का भाव व्यक्त हुआ है।

पद संख्या 19
हंसि हंसि कंत न पाइए, जिनि पाया तिनि रोइ। जो हाँसेही हरि मिलै, तो नहीं दुहागनि कोइ॥19॥
शब्दार्थ:

हंसि हंसि = हँसते-हँसते, कंत = प्रियतम परमात्मा, जिनि = जिसने, तिनि = उसने, हाँसेही = केवल हँसने से, दुहागनि = दुर्भाग्यवती/विरहिणी स्त्री।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

परमात्मा रूपी प्रियतम को केवल हँसते-खेलते हुए नहीं पाया जा सकता। जिन्होंने उन्हें पाया है, उन्होंने गहरी साधना और विरह-वेदना सहन की है। यदि केवल हँसने से ही भगवान मिल जाते, तो संसार में कोई भी स्त्री या मनुष्य विरह से दुखी न होता।

टिप्पणी:

कबीर साधना की गंभीरता और प्रेम-विरह की आवश्यकता बताते हैं। अलंकार: व्यतिरेक एवं प्रश्नात्मक शैली का प्रभाव। विशेष: ईश्वर-प्राप्ति के लिए त्याग, तपस्या और सच्चे प्रेम की आवश्यकता है।

पद संख्या 20
हिरदा भीतरि दौ बलै, धूंवां प्रगट न होइ। जाके लागी सो लखे, के जिहि लाई सोइ॥20॥
शब्दार्थ:

हिरदा = हृदय, भीतरि = भीतर, दौ = दो, बलै = जलती है, धूंवां = धुआँ, प्रगट = प्रकट, जाके = जिसको, लागी = लगी है, लखे = जानता है, जिहि = जिसने।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

हृदय के भीतर विरह और प्रेम की अग्नि जल रही है, पर उसका धुआँ बाहर दिखाई नहीं देता। जिसके हृदय में यह अग्नि लगी है, वही उसकी पीड़ा को समझ सकता है और जिसने इसे लगाया है, वही इसके वास्तविक स्वरूप को जानता है।

टिप्पणी:

यहाँ विरह की आंतरिक और अदृश्य पीड़ा का मार्मिक चित्रण है। अलंकार: रूपक—प्रेम और विरह को अग्नि के रूप में प्रस्तुत किया गया है। विशेष: सच्चे प्रेम की अनुभूति बाहरी प्रदर्शन से नहीं, अंतःकरण से होती है।

पद संख्या 21
मानुष जन्म दुलम्भ है, होइ न बारम्बार। पाका फल जो गिरि पड़ा, बहुरि न लागै डारि॥21॥
शब्दार्थ:

मानुष = मनुष्य, दुलम्भ = दुर्लभ, बारम्बार = बार-बार, पाका = पका हुआ, गिरि पड़ा = गिर गया, बहुरि = फिर, डारि = डाली।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

मनुष्य का जन्म अत्यंत दुर्लभ है और यह बार-बार प्राप्त नहीं होता। जिस प्रकार पेड़ से टूटकर गिरा हुआ पका फल दोबारा उसी डाल पर नहीं लग सकता, उसी प्रकार प्राप्त हुआ मनुष्य जीवन समाप्त होने के बाद फिर उसी रूप में नहीं मिलता। इसलिए इस जीवन का सदुपयोग परमात्मा की प्राप्ति और सत्कर्मों में करना चाहिए।

टिप्पणी:

कबीर मनुष्य जीवन की दुर्लभता और उसकी सार्थकता का संदेश देते हैं। अलंकार: दृष्टान्त एवं उपमा—पके फल और मनुष्य जीवन की तुलना। विशेष: मनुष्य जीवन को व्यर्थ न गँवाकर आत्मज्ञान और ईश्वर-साधना में लगाने की प्रेरणा दी गई है।

पद संख्या-22
चाकी चलती देखि कै, दिया कबीरा रोइ। दो पट भीतर आइकै, सालिम बचा न कोइ।
शब्दार्थ:

चाकी = अनाज पीसने का यंत्र, पट = पाट, सालिम = साबुत सुरक्षित।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

कबीर संसार की चक्की को चलते देखकर दुखी होते हैं। जैसे चक्की के दो पाटों के बीच आने वाला कोई दाना साबुत नहीं बचता, वैसे ही संसार के द्वंद्वों में फँसकर मनुष्य नष्ट होता रहता है।

टिप्पणी:

रूपक एवं दृष्टान्त अलंकार। संसार की चक्की जीवन की निरन्तर पीड़ा और संघर्ष का प्रतीक है।

पद संख्या-23
रोवणहारे भी मुए, मुए जलाँवणहार।
हा हा करते ते मुए, कासनि करौं पुकार।
शब्दार्थ:

रोवणहारे = रोने वाले, जलाँवणहार = जलाने वाले, कासनि = किससे, पुकार = शिकायत।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

जो लोग मृतकों के लिए रोते और उनका अंतिम संस्कार करते हैं, वे भी एक दिन मर जाते हैं। इस नश्वर संसार में किसके लिए रोया जाए और किससे शिकायत की जाए?

टिप्पणी:

पुनरुक्ति प्रकाश एवं व्यंग्य। मृत्यु की सार्वभौमिकता और संसार की नश्वरता का बोध कराया गया है।

पद संख्या-24
पाँणी ही तें हिम भया, हिम ह्नै गया बिलाइ।
जो कुछ था सोई भया, अब कछू कह्या न जाइ।
शब्दार्थ:

पाँणी = पानी, हिम = बर्फ, बिलाइ = पिघल गया, सोई = वही।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

पानी से बर्फ बनी और फिर बर्फ पिघलकर पानी में मिल गई। इसी प्रकार जीव और परमात्मा का भेद अन्ततः समाप्त हो जाता है और मूल सत्ता में एकत्व स्थापित हो जाता है।

टिप्पणी:

दृष्टान्त एवं रूपक। आत्मा-परमात्मा की एकता को पानी और बर्फ के उदाहरण से समझाया गया है।

पद संख्या-25
लाली मेरे लाल की जित देखूँ तित लाल।
लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गइ लाल।
शब्दार्थ:

लाली = लालिमा प्रेम का रंग, लाल = प्रिय परमात्मा, जित = जहाँ, तित = वहाँ।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

भक्त को अपने प्रिय परमात्मा के प्रेम का ऐसा अनुभव हुआ कि उसे संसार की प्रत्येक वस्तु उसी प्रेम के रंग में रंगी दिखाई देने लगी। परमात्मा के प्रेम को देखने निकला साधक स्वयं भी उसी रंग में रंग गया।

टिप्पणी:

रूपक एवं पुनरुक्ति प्रकाश। ‘लाल’ और ‘लाली’ के माध्यम से प्रेमानुभूति का आध्यात्मिक रंग व्यक्त किया गया है।

पद संख्या-26
गगन गरजि बरसै अमी, बादल गहिर गम्भीर।
चहुँदिसि चमकै दामिनी, भींजै दास कबीर।
शब्दार्थ:

गगन = आकाश, अमी = अमृत, गहिर = गहरा, दामिनी = बिजली, भींजै = भीगता है।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

ज्ञान और प्रेम के अमृत से भरा आध्यात्मिक आकाश गरज रहा है। चारों ओर ज्ञान की बिजली चमक रही है और कबीर उस आध्यात्मिक अमृत-वर्षा में भीग रहे हैं।

टिप्पणी:

रूपक एवं सांगरूपक। प्राकृतिक वर्षा के माध्यम से ज्ञान और प्रेम की आध्यात्मिक वर्षा का चित्र प्रस्तुत किया गया है।

पद संख्या-27
सेष सबूरी बाहिरा, क्या हज काबा जाइ।
दिल महि खोजहु दिलहि माहि, यहीं करीम खुदाइ।
शब्दार्थ:

सबूरी = धैर्य, हज = तीर्थयात्रा, काबा = मुस्लिमों का पवित्र तीर्थ, दिल = हृदय, करीम = दयालु ईश्वर, खुदाइ = ईश्वर।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

यदि हृदय में धैर्य और सच्ची भक्ति नहीं है तो हज या काबा जाने से क्या लाभ? परमात्मा को अपने हृदय में ही खोजना चाहिए, क्योंकि वही दयालु ईश्वर भीतर विद्यमान है।

टिप्पणी:

कबीर बाह्य आडम्बर की अपेक्षा आंतरिक साधना को महत्त्व देते हैं। प्रश्नोक्ति और विरोधाभास का प्रभाव है।

पद संख्या-28
कासी काठैं घर करैं, पीवै निर्मल नीर।
मुकुति नहीं हरि नाँव बिन, यौं कहे दास कबीर।
शब्दार्थ:

कासी = वाराणसी, काठैं = किनारे, निर्मल = शुद्ध, मुकुति = मुक्ति, नाँव = नाम।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

काशी में रहने और पवित्र जल पीने मात्र से मुक्ति नहीं मिलती। कबीर कहते हैं कि ईश्वर के नाम का स्मरण और सच्ची भक्ति ही मुक्ति का मार्ग है।

टिप्पणी:

धार्मिक आडम्बर पर व्यंग्य। बाह्य तीर्थ की अपेक्षा नाम-स्मरण और आंतरिक शुद्धता को महत्त्व दिया गया है।

पद संख्या-29
मूरिष संग न कीजिए, लोहा जलि न तिराइ।
कदली सीप भवंग मुषी, एक बूँद तिहुँ भाइ।
शब्दार्थ:

मूरिष = मूर्ख, लोहा = लोहे का टुकड़ा, कदली = केला, सीप = सीप, भवंग = सर्प, तिहुँ = तीनों।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

मूर्खों की संगति नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उसका परिणाम हानिकारक होता है। जैसे एक ही जल की बूंद अलग-अलग स्थानों पर पड़कर अलग परिणाम देती है, वैसे ही संगति के अनुसार मनुष्य का स्वरूप बदलता है।

टिप्पणी:

दृष्टान्त एवं उदाहरण अलंकार। सत्संग और कुसंगति के प्रभाव को स्पष्ट किया गया है।

पद संख्या-30
गावन ही मैं रोग है, रोवन ही मैं राग।
इक बैरागी गृह करै, एक गृही बैराग।
शब्दार्थ:

गावन = गाना, रोग = व्यथा, रोवन = रोना, राग = अनुराग, बैरागी = विरक्त, गृही = गृहस्थ।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

गाना और रोना, सुख और दुख एक ही जीवन के दो पक्ष हैं। इसी प्रकार कोई वैरागी होकर भी गृहस्थ जीवन अपनाता है और कोई गृहस्थ होकर वैराग्य धारण कर लेता है। वास्तविक वैराग्य मन की अवस्था है, बाहरी वेश नहीं।

टिप्पणी:

विरोधाभास एवं व्यंग्य। कबीर ने बाहरी वेश के बजाय मन के वैराग्य को वास्तविक माना है।

पद संख्या-31
राजा रंक फकीर, सबहि का एक शरीर।
इक सिंघासन चढ़ि चले, इक बँधि जात जंजीर।
शब्दार्थ:

राजा = शासक, रंक = निर्धन, फकीर = साधु, सिंघासन = सिंहासन, जंजीर = बंधन।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

राजा, निर्धन और फकीर सभी का शरीर नश्वर है। कोई सिंहासन पर बैठता है और कोई बंधन में रहता है, पर मृत्यु सबको समान रूप से अपने अधीन कर लेती है।

टिप्पणी:

समानता और नश्वरता का प्रतिपादन। विरोधाभास के माध्यम से सामाजिक भेद की निरर्थकता बताई गई है।

पद संख्या-32
माया मुई न मन मुवा, मरि मरि गया सरीर। आसा त्रिस्नाँ ना मुई, यों कहि गया कबीर।
शब्दार्थ:

माया = सांसारिक मोह, मन = चित्त, आसा = आशा, त्रिस्नाँ = तृष्णा, सरीर = शरीर।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

मनुष्य का शरीर बार-बार नष्ट होता रहता है, लेकिन उसकी माया, आशा और तृष्णा समाप्त नहीं होती। मनुष्य की इच्छाएँ ही उसे संसार के बंधन में बाँधे रखती हैं।

टिप्पणी:

पुनरुक्ति प्रकाश एवं व्यंग्य। माया और तृष्णा के अनन्त बंधन पर तीखा प्रहार किया गया है।

पद संख्या-33
आँधी आयी ज्ञान की, ढही भरम की भीति। माया टाटी उड़ि गयी, लागी नाम से प्रीति।
शब्दार्थ:

आँधी = तेज हवा, ज्ञान = आत्मज्ञान, भरम = भ्रम, भीति = दीवार, टाटी = टाट की दीवार, प्रीति = प्रेम।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

जब आत्मज्ञान की आँधी आती है तो अज्ञान और भ्रम की दीवारें गिर जाती हैं। माया का आवरण उड़ जाता है और मनुष्य का प्रेम परमात्मा के नाम में लग जाता है।

टिप्पणी:

सांगरूपक। ज्ञान को आँधी, भ्रम को दीवार और माया को टाटी मानकर आध्यात्मिक जागरण का प्रभावशाली चित्रण है।

पद संख्या-34
जिनको साँई रंग दिया, कभी न होय कुरंग। दिन-दिन बानी आगरी, चढ़ै सवाया रंग।
शब्दार्थ:

साँई = परमात्मा, रंग = प्रेम का रंग, कुरंग = फीका, बानी = बढ़ती हुई, सवाया = अधिक।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

जिस भक्त को परमात्मा के प्रेम का रंग लग जाता है, वह कभी फीका नहीं पड़ता। समय बीतने के साथ उसका प्रेम और अधिक गहरा होता जाता है।

टिप्पणी:

रूपक अलंकार। प्रेम को रंग के रूप में चित्रित करके उसकी स्थायित्व और गहराई व्यक्त की गई है।

पद संख्या-35
साँच कहूँ तो मारिहैं, झूठे जग पतियाय। ये जग काली कूकरी, जो छेड़ैं तो खाइ।
शब्दार्थ:

साँच = सत्य, मारिहैं = मारेंगे, पतियाय = विश्वास करता है, कूकरी = कुतिया, छेड़ैं = छेड़ता है।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

सत्य बोलने वाले को संसार प्रायः स्वीकार नहीं करता और झूठी बातों पर विश्वास कर लेता है। यह संसार क्रोधी कुतिया के समान है, जो उसे छेड़ता है उसे काट लेती है।

टिप्पणी:

रूपक एवं व्यंग्य। कबीर ने संसार की कटुता और सत्य के प्रति उसकी असहिष्णुता पर तीखा व्यंग्य किया है।

पद संख्या-36
जाति न पूँछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।
शब्दार्थ:

जाति = सामाजिक पहचान, साधु = संत, ज्ञान = आध्यात्मिक बोध, तरवार = तलवार, म्यान = तलवार का खोल।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

किसी साधु का मूल्य उसकी जाति से नहीं, उसके ज्ञान से आँकना चाहिए। जैसे तलवार की कीमत उसकी धार से होती है, म्यान से नहीं, वैसे ही मनुष्य की श्रेष्ठता उसके ज्ञान और गुणों से होती है।

टिप्पणी:

दृष्टान्त एवं रूपक। जातिगत भेदभाव का विरोध और ज्ञान की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया गया है।

पद संख्या-37
कबीर दुविधा दूरि करि, एक अंग ह्नै लागि। यहु सीतल वहु तपति है, दोऊ कहिये आगि।
शब्दार्थ:

दुविधा = द्वैत असमंजस, एक अंग = एक पक्ष, सीतल = ठंडा, तपति = गरम।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

मनुष्य को द्वैत और दुविधा छोड़कर एक परम सत्य में मन लगाना चाहिए। जो एक को शीतल और दूसरे को तप्त मानता है, वह भी अन्ततः एक ही परम सत्ता की ओर संकेत करता है।

टिप्पणी:

विरोधाभास एवं व्यंग्य। कबीर अद्वैत भावना और मानसिक एकाग्रता का संदेश देते हैं।

पद संख्या-38
कबीर हरदी पीयरी, चूना ऊजल भाइ। रामसनेही यूँ मिले, दुन्यूँ बरन गँवाइ।
शब्दार्थ:

हरदी = हल्दी, पीयरी = पीली, चूना = सफेद पदार्थ, बरन = रंग, रामसनेही = राम का प्रेमी।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

हल्दी पीली और चूना सफेद होता है, लेकिन दोनों के मिलने पर उनका अपना रंग बदल जाता है। उसी प्रकार राम के प्रेम में रंगे हुए साधक अपने अहंकार और अलग पहचान को खोकर परमात्मा में एकरूप हो जाते हैं।

टिप्पणी:

दृष्टान्त एवं रूपक। दो रंगों के मिलन के माध्यम से आत्मा-परमात्मा के एकत्व को समझाया गया है।

पद संख्या-39
बोलत ही पहिचानिएँ, साहु चोर को घाट। अंतर की करनी सबै, निकसै मुँह की बाट।
शब्दार्थ:

साहु = सज्जन, चोर = कपटी व्यक्ति, करनी = कर्म, मुँह की बाट = वाणी के द्वारा।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

मनुष्य की वाणी से उसके भीतर के विचार और संस्कारों का पता चल जाता है। बोलने के ढंग से सज्जन और कपटी व्यक्ति की पहचान की जा सकती है।

टिप्पणी:

दृष्टान्त एवं व्यंग्य। वाणी को व्यक्ति के आंतरिक चरित्र का दर्पण बताया गया है।

पद संख्या-40
जाकै मह माथा नहीं, तिनकौं कहाँ खुदाइ। जो सिर नाँवै साँई को, सो सिर धरती भाइ।
शब्दार्थ:

माथा = मस्तक, खुदाइ = ईश्वर, नाँवै = झुकाता है, साँई = परमात्मा।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

जिस व्यक्ति में विनम्रता नहीं है, उसके हृदय में ईश्वर का निवास कैसे हो सकता है? जो व्यक्ति परमात्मा के सामने अपना सिर झुका देता है, वही वास्तव में विनम्र और ईश्वर का प्रिय होता है।

टिप्पणी:

प्रश्नोक्ति अलंकार। विनय और अहंकार-त्याग को ईश्वर-प्राप्ति का आवश्यक साधन बताया गया है।

पद संख्या-41
ऐसा यह संसार है, जैसा सेमर फूल। दिन दस के व्यवहार में, झूठा सब अनमोल।
पुहुप बास थैं पतला, ऐसा तत अनूप।
शब्दार्थ:

सेमर = एक वृक्ष, पुहुप = फूल, बास = सुगन्ध, पतला = सूक्ष्म, अनूप = अनुपम, तत = तत्व।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

यह संसार सेमर के फूल के समान क्षणभंगुर और आकर्षक दिखाई देता है। कुछ दिनों का सांसारिक व्यवहार समाप्त हो जाता है। वास्तविक और सूक्ष्म आध्यात्मिक तत्व को पहचानना आवश्यक है।

टिप्पणी:

उपमा एवं रूपक अलंकार। संसार की नश्वरता और बाहरी आकर्षण की क्षणिकता को सेमर के फूल से समझाया गया है।

पद संख्या-42
सतगुर ऐसा चाहिए, जैसा सिकलीगर होइ। सबद मसकला फेरि करि, देह द्रपन करे सोइ।
शब्दार्थ:

सिकलीगर = धातु चमकाने वाला कारीगर, सबद = ज्ञान-वचन, मसकला = घिसने का औजार, द्रपन = दर्पण।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

सच्चा गुरु सिकलीगर के समान होता है। जैसे सिकलीगर धातु को घिसकर चमका देता है, वैसे ही गुरु अपने ज्ञान-वचनों से शिष्य के मन को शुद्ध करके उसे आत्मज्ञान का दर्पण बना देता है।

टिप्पणी:

उपमा एवं रूपक अलंकार। सिकलीगर के माध्यम से गुरु के संस्कार-निर्माण और ज्ञान-प्रदान का कार्य स्पष्ट किया गया है।

पद संख्या-43
ज्ञान रतन की कोठरी, चुप करि दीन्हों ताल। पारखि आगे खोलिए, कुंजी वचन रसाल।
शब्दार्थ:

ज्ञान रतन = ज्ञान रूपी रत्न, कोठरी = कक्ष, ताल = ताला, कुंजी = चाबी, रसाल = मधुर।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

ज्ञान रूपी अमूल्य रत्न की कोठरी भीतर बंद है। योग्य साधक के लिए गुरु के मधुर और सारपूर्ण वचन उस कोठरी की चाबी का काम करते हैं और उसके द्वारा ज्ञान का द्वार खुलता है।

टिप्पणी:

रूपक अलंकार। ज्ञान को रत्न, हृदय को कोठरी और गुरु-वचन को उसकी चाबी माना गया है।

पद संख्या-44
कबीर घास न नींदिये, जो पाऊँ तलि होइ। उड़ि पड़ै जब आँखि में, खरा दुहेली होइ।
शब्दार्थ:

नींदिये = तुच्छ समझना, पाऊँ तलि = पैरों के नीचे, दुहेली = अत्यन्त पीड़ादायक।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

किसी छोटी या तुच्छ वस्तु को भी कभी तुच्छ नहीं समझना चाहिए। पैरों के नीचे रहने वाली घास का छोटा-सा तिनका भी यदि आँख में पड़ जाए तो बहुत कष्ट देता है।

टिप्पणी:

दृष्टान्त अलंकार। छोटी वस्तु के महत्त्व को प्रभावशाली उदाहरण द्वारा समझाया गया है।

पद संख्या-45
आहेड़ी दौ लाइया, मृग पुकारै रोइ। जा बन में क्रीला करी, दाझत है बन सोइ।
शब्दार्थ:

आहेड़ी = शिकारी, दौ = आग, मृग = हिरण, क्रीला = क्रीड़ा, दाझत = जल रहा है।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक मंदाकिनी के साखी के पद नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तक कवि कबीरदास जी हैं।

व्याख्या:

जिस वन में हिरण कभी स्वतंत्र होकर खेलते थे, उसी वन को शिकारी ने घेर लिया है और वह जल रहा है। संकट में फँसा हिरण करुण पुकार कर रहा है। यह संसार की अस्थिरता और मोह में फँसे जीव की विवशता का प्रतीक है।

टिप्पणी:

रूपक एवं करुण भाव। वन और हिरण के माध्यम से संसार में जीव की असहाय स्थिति तथा मोह-माया के संकट को व्यक्त किया गया है।

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1 टिप्पणियाँ

  1. चकई बिछुरी रैनि की, आइ मिलै परभाँति. जे नर बिछुरे राम सौं, ते दिन मिले न राति ...

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