सूरदास

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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सूरदास

सूरदास — सूरदास के पद, भ्रमरगीत

सूरदास के वात्सल्य के पद एवं भ्रमरगीत के सवैयों का शब्दार्थ, सन्दर्भ, प्रसङ्ग, हिन्दी व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य।

1. सूरदास के पद

पद — 1
अब हों नाच्यौ बहुत गोपाल। काम क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ विषय की माल॥ महामोह के नूपुर बाजत, निन्दा सब्द रसाल। भरम भर्‌यौ मन भयौ पखावज, चलत कुसंगति चाल॥ तृसना नाद करति घट अन्तर, नानाविध दै ताल। माया कौ कटि फैंटा बांध्यो, लोभ तिलक दियो भाल॥ कोटिक कला काछि दिखराई, जल थल सुधि नहिं काल। सूरदास की सबै अविद्या, दूरि करौ नंदलाल॥ 1
शब्दार्थ — अब हों = अब मैंने, नाच्यौ = नृत्य किया, गोपाल = श्रीकृष्ण, काम = कामना, क्रोध = क्रोध, चोलना = वस्त्र, कंठ = गला, विषय = सांसारिक भोग, माल = माला, महामोह = अत्यन्त मोह, नूपुर = पायल, निन्दा = दूसरों की बुराई, रसाल = मधुर, भरम = भ्रम, पखावज = एक वाद्य, कुसंगति = बुरी संगति, तृसना = तृष्णा/लालसा, नाद = ध्वनि, घट अन्तर = हृदय के भीतर, नानाविध = अनेक प्रकार की, दै ताल = ताल देते हुए, माया = मोह/भ्रम का संसार, कटि = कमर, फैंटा = कमर में बाँधने का वस्त्र, लोभ = लालच, तिलक = माथे पर लगाया जाने वाला चिह्न, भाल = ललाट, कोटिक = करोड़ों, कला = प्रकार/कौशल, काछि = धारण करके/दिखाकर, दिखराई = दिखाई, जल थल सुधि नहिं = चारों ओर का ध्यान नहीं रहा, काल = समय, अविद्या = अज्ञान, दूरि करौ = दूर कर दो, नंदलाल = नन्द के पुत्र श्रीकृष्ण।
सन्दर्भ — सन्दर्भ।
प्रसङ्ग — प्रसङ्ग ।
हिन्दी व्याख्या — हिन्दी व्याख्या
काव्य-सौंदर्य — काव्य-सौंदर्य
पद — 2
अबिगत गति कछु कहति न आवै। ज्यों गूंगो मीठे फल की रस अन्तर्गत ही भावै ॥ परम स्वादु सबहीं जु निरन्तर अमित तोष उपजावै। मन बानी कों अगम अगोचर सो जाने जो पावै ॥ रूप रैख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब मन चकृत धावै। सब बिधि अगम बिचारहिं, तातों सूर सगुन लीला पद गावै ॥2
शब्दार्थ — अबिगत गति = अगम्य स्वरूप/जिसकी गति जानी न जा सके, कछु = कुछ, कहति न आवै = कहा नहीं जा सकता, गूंगो = मूक व्यक्ति, मीठे फल = मधुर फल, रस अन्तर्गत = भीतर का स्वाद, भावै = अनुभव करता है, परम स्वादु = अत्यन्त मधुर आनन्द, सबहीं जु = सभी को, निरन्तर = लगातार, अमित तोष = असीम सन्तोष, मन-बानी कों = मन और वाणी के लिए, अगम अगोचर = पहुँच से परे और इन्द्रियों से न दिखाई देने वाला, सो जाने जो पावै = वही जानता है जो उसे प्राप्त करता है, रूप = आकार/स्वरूप, रैख = रेखा/आकृति, गुन = गुण, जाति = प्रकार/स्वभाव, जुगति = उपाय/युक्ति, निरालंब = बिना किसी आधार के, चकृत = चकित/भ्रमित, धावै = दौड़ता है, सब बिधि अगम = सभी प्रकार से अगम्य, बिचारहिं = विचार करते हैं, तातों = इसलिए, सगुन लीला = साकार भगवान की लीलाएँ, पद गावै = पदों का गान करता है।
सन्दर्भ — सन्दर्भ।
प्रसङ्ग — प्रसङ्ग ।
हिन्दी व्याख्या — हिन्दी व्याख्या
काव्य-सौंदर्य — काव्य-सौंदर्य
पद — 3
हरि किलकत जसुदा की कनियाँ । निरखि-निरखि मुँख कहत लाल सौं, मो निधनी के धनियाँ । अति कोमल तन चितौ श्याम कौ बार-बार पछितात । कैसे बच्यौं, जाँऊ बलि तेरी, तृनावर्त कै घात । ना जानें धौं कौन पुन्य तैं, को करि लेत सहाइ । वैसी काम पूतना कीन्हौं, इहिं एसौं कियो आइ । माता दुखित जानि हरि बिहँसे, नान्हीं दूँतुलि दिखाइ । सूरदास प्रभु माता चित तैं, दुख डार् यौं बिसराइ ।। 3
शब्दार्थ — हरि = श्रीकृष्ण, किलकत = किलकारी मारते हुए, जसुदा = यशोदा, कनियाँ = पुत्र, निरखि-निरखि = बार-बार देखकर, मुँख = मुख, लाल = पुत्र, निधनी = निर्धन, धनियाँ = धन, अति कोमल तन = अत्यन्त कोमल शरीर, चितौ = देखती हैं, बार-बार पछितात = बार-बार पछताती हैं, बच्यौं = बच गया, जाँऊ बलि तेरी = तुझ पर बलिहारी जाऊँ, तृनावर्त = तृणावर्त नामक राक्षस, घात = आक्रमण, पुन्य = पुण्य, सहाइ = सहायता करने वाला, वैसी = उसी प्रकार, काम = कार्य, पूतना = पूतना राक्षसी, माता दुखित जानि = माता को दुःखी जानकर, बिहँसे = मुस्कराए, नान्हीं = छोटी-सी, दूँतुलि = दाँतों की पंक्ति, चित तैं = मन से, दुख डारि = दुःख दूर करके, बिसराइ = भुला दिया ॥3
सन्दर्भ — सन्दर्भ।
प्रसङ्ग — प्रसङ्ग ।
हिन्दी व्याख्या — हिन्दी व्याख्या
काव्य-सौंदर्य — काव्य-सौंदर्य
पद — 4
सोभित कर नवनीत लिए। घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित मुख दधि लेप किए ॥ चारु कपोल लोल लोचन गोरोचन तिलक दिए। लट लटकनि मनु मत्त मधुप गन मादक मधुहिं पिए ॥ कठुला कंठ वज्र केहरि नख राजत रुचिर हिए। धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख का सत कल्प जिए ॥ 4
शब्दार्थ — सोभित = सुशोभित, कर = हाथ, नवनीत = मक्खन, घुटुरुनि चलत = घुटनों के बल चलते हुए, रेनु = धूल, तन मंडित = शरीर सुशोभित, दधि लेप = दही का लेप, चारु कपोल = सुन्दर गाल, लोल लोचन = चंचल नेत्र, गोरोचन तिलक = गोरोचन का तिलक, लट लटकनि = लटकती हुई बालों की लटें, मनु मत्त मधुप गन = मानो मतवाले भौंरों का समूह, मादक मधुहिं पिए = मादक मधु पी रहा हो, कठुला कंठ = गले में कठुला नामक आभूषण, वज्र केहरि नख = वज्र के समान कठोर सिंह के नख, रुचिर हिए = सुन्दर हृदय पर शोभायमान, धन्य सूर = सूरदास धन्य हैं, एकौ पल = एक क्षण, इहिं सुख = इस सुख के कारण, सत कल्प जिए = सौ कल्पों तक जीना सार्थक है ॥4
सन्दर्भ — सन्दर्भ।
प्रसङ्ग — प्रसङ्ग ।
हिन्दी व्याख्या — हिन्दी व्याख्या
काव्य-सौंदर्य — काव्य-सौंदर्य
पद — 5
हरि जू की सोभा कहाँ लौ कहौं बरनि । सकल सुख की सींव, कोटि-मनोज-सोभा हरनि । भुज भुजंग, सरोज नयननि, बदन बिधु, जित्यो लरनि । रहे बिबरनि, सलिल, नभ, उपमा अपर डुरि डरनि । मंजु मेचक मृदुल तनु अनुहरन भूषन भरनि । मनहुँ सुभग-सिंगार-सिसु तरू फर् यौ अद्भुत फरनि । लसत करि प्रतिबिम्ब मनि आँगन घुटुरुवन करनि । जलज संपुट सुभग छाँव, भर लेत उर जनु धरनि । पुन्यफल अनुभवति सुतहिं बिलोकि कै नन्दघरनि । सूर प्रभु की बसी उर किलकनि ललित लरखरनि ।।5
शब्दार्थ — हरि जू = श्रीकृष्ण, सोभा = शोभा, कहाँ लौ = कहाँ तक, बरनि = वर्णन करूँ, सकल सुख की सींव = समस्त सुखों की सीमा, कोटि-मनोज-सोभा हरनि = करोड़ों कामदेवों की शोभा को हरने वाली, भुज भुजंग = सर्प के समान लम्बी भुजाएँ, सरोज नयननि = कमल के समान नेत्र, बदन बिधु = चन्द्रमा के समान मुख, जित्यो लरनि = सौन्दर्य में विजय प्राप्त करने वाला, बिबरनि = वर्णन करने वाली उपमाएँ, सलिल = जल, नभ = आकाश, उपमा अपर डुरि डरनि = उपमाएँ लज्जित होकर दूर भागती हैं, मंजु मेचक = मनोहर श्याम, मृदुल तनु = कोमल शरीर, अनुहरन = अनुकरण करते हुए, भूषन भरनि = आभूषणों से सुशोभित, सुभग-सिंगार-सिसु = सुन्दर श्रृंगारयुक्त बालक, तरू फर् यौ = वृक्ष के समान फलित हुआ, अद्भुत फरनि = अद्भुत फल के रूप में शोभित, प्रतिबिम्ब = परछाईं, मनि आँगन = मणियों से जड़ा आँगन, घुटुरुवन करनि = घुटनों के बल चलते हुए, जलज संपुट = कमल की पंखुड़ियों के समान, सुभग छाँव = सुन्दर छाया, उर = हृदय, पुन्यफल = पुण्य का फल, अनुभवति = अनुभव करती हैं, सुतहिं = पुत्र को, नन्दघरनि = नन्द की पत्नी यशोदा, किलकनि = किलकारी, ललित लरखरनि = मनोहर लड़खड़ाती हुई बाल-चेष्टाएँ ॥5
सन्दर्भ — सन्दर्भ।
प्रसङ्ग — प्रसङ्ग ।
हिन्दी व्याख्या — हिन्दी व्याख्या
काव्य-सौंदर्य — काव्य-सौंदर्य
पद — 6
सिखवति चलन जसोदा मैया। अरबराइ कैं पानि गहावति डगमगा धरनी धरै पैया ॥ कबहुँक सुन्दर बदन बिलोकति उर आनंद भरि लेति बलैया। कबहुँक कुल-देवता मनावति चिर जीवहु मेरी कुँवर कन्हैया ॥ कबहुँक बलकों टेरि बुलावति इहिं आंगर खेलौ दो भैया। सूरदास स्वामी की लीला अति प्रताप बिलसत नंदरैया ॥6।।
शब्दार्थ — सिखवति चलन = चलना सिखाती हैं, जसोदा मैया = माता यशोदा, अरबराइ कैं = जल्दी-जल्दी, पानि गहावति = हाथ पकड़ाती हैं, डगमगा = लड़खड़ाते हुए, धरनी = पृथ्वी, पैया = पैर, बदन बिलोकति = मुख देखती हैं, उर आनंद भरि लेति = हृदय में आनंद भर लेती हैं, बलैया = बलि-बलि जाती हैं, कुल-देवता मनावति = कुलदेवता की पूजा करती हैं, चिर जीवहु = बहुत समय तक जीवित रहो, कुँवर कन्हैया = बालक कृष्ण, बलकों = बलराम को, टेरि बुलावति = पुकारकर बुलाती हैं, इहिं आंगर = इसी आँगन में, खेलौ = खेलो, दो भैया = दोनों भाई, स्वामी की लीला = भगवान की बाल-लीला, अति प्रताप = अत्यन्त प्रभावशाली, बिलसत = प्रकाशित हो रही है, नंदरैया = नन्द के घर में ॥6॥
सन्दर्भ — सन्दर्भ।
प्रसङ्ग — प्रसङ्ग ।
हिन्दी व्याख्या — हिन्दी व्याख्या
काव्य-सौंदर्य — काव्य-सौंदर्य
पद — 7
हरि अपनैं आंगन कछु गावत । तनक तनक चरनन सों नाच मन हीं मनहिं रिझावत ॥ बांह उठाइ कारी धौरी गैयनि टेरि बुलावत । कबहुँक बाबा नंद पुकारत कबहुँक घर में आवत ॥ माखन तनक आपर्ने कर लै तनक बदन में नावत । कबहुं चितै प्रतिबिंब खंभ मैं लोनी लिए खवावत ॥ दुरि देखति जसुमति यह लीला हरष आनंद बढ़ावत । सूर स्याम के बाल चरित नित नितही देखत भावत ॥7
शब्दार्थ — हरि = श्रीकृष्ण, अपनैं आंगन = अपने आँगन में, कछु गावत = कुछ गाते हुए, तनक तनक = थोड़ा-थोड़ा, चरनन सों = पैरों से, नाच = नृत्य करके, मन हीं मनहिं रिझावत = मन-ही-मन प्रसन्न होते हैं, बांह उठाइ = बाँह उठाकर, कारी धौरी गैयनि = काली और सफेद गायों को, टेरि बुलावत = पुकारकर बुलाते हैं, बाबा नंद = पिता नन्द, पुकारत = पुकारते हैं, माखन = मक्खन, आपर्ने कर = अपने हाथ से, बदन में नावत = मुख में डालते हैं, प्रतिबिंब = परछाईं, खंभ = स्तम्भ, लोनी = मक्खन, दुरि देखति = दूर से देखती हैं, जसुमति = यशोदा, लीला = बाल-क्रीड़ा, हरष आनंद बढ़ावत = हर्ष और आनंद बढ़ाती हैं, बाल चरित = बाल-लीलाएँ, नित नितही = प्रतिदिन, देखत भावत = देखकर प्रसन्न होती हैं ॥7
सन्दर्भ — सन्दर्भ।
प्रसङ्ग — प्रसङ्ग ।
हिन्दी व्याख्या — हिन्दी व्याख्या
काव्य-सौंदर्य — काव्य-सौंदर्य

2. भ्रमरगीत

सवैया — 1
गोकुल सबै गोपाल उदासी । जोग अंग साधत जो ऊधौ, ते सब बसत ईसपुर काशी ।  जद्यपि हरि हम तजि, अनाथ करि, तदपि रहति चरनिन-रस-रासी । अपनी सीतलता नहिँ छाँड़त, जद्यपि है ससि राहु गरासी ।  का अपराध जोग लिखि पठवत, प्रेम भजन तजि करत उदासी । सूरदास ऐसी हौं बिरहिन, माँगति मुक्त तजै गुनरासी ।1
शब्दार्थ —गोकुल = गोकुलवासी, गोपाल = गोप-ग्वाल, उदासी = दुःखी और विरक्त, जोग अंग साधत = योग की साधना करते हुए, ऊधौ = उद्धव, ईसपुर काशी = काशी नगरी, जद्यपि = यद्यपि, हरि हम तजि = श्रीकृष्ण ने हमें छोड़ दिया, अनाथ करि = असहाय करके, चरनिन-रस-रासी = श्रीकृष्ण के चरणों के प्रेम-रस की राशि, सीतलता = शीतलता, छाँड़त = छोड़ता, ससि = चन्द्रमा, राहु गरासी = राहु द्वारा ग्रस्त, अपराध = दोष, जोग = योग, प्रेम भजन = प्रेमपूर्वक भक्ति, उदासी = विरक्ति, बिरहिन = विरह से पीड़ित, माँगति मुक्त = मुक्ति माँगती हूँ, गुनरासी = गुणों की राशि ॥1॥
सन्दर्भ —सन्दर्भ।
प्रसङ्ग —प्रसङ्ग।
हिन्दी व्याख्या —हिन्दी व्याख्या।
काव्य-सौंदर्य —काव्य-सौंदर्य।

3. सूरदास का जीवन परिचय

4. चतुर्थ विषय

5. पञ्चम विषय

6. षष्ठ विषय

सूरदास — पद एवं भ्रमरगीत

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