गोस्वामी तुलसीदास

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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गोस्वामी तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास का जीवन परिचय तथा श्रीरामचरितमानस, कवितावली, दोहावली,गीतावली और विनयपत्रिका के पदों का शब्दार्थ, सन्दर्भ, प्रसङ्ग, हिन्दी व्याख्या एवं टिप्पणी।

गोस्वामी तुलसीदास का जीवन परिचय

गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल की रामभक्ति शाखा के महानतम कवि और भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त थे। उनका जन्म सामान्यतः संवत् 1554 (लगभग 1497 ई.) में उत्तर प्रदेश के बाँदा जनपद के राजापुर में माना जाता है। उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। बाल्यकाल में ही माता-पिता का स्नेह छूट जाने के कारण उन्हें अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा। बाद में संत नरहरिदास से उन्हें रामकथा और भक्ति की शिक्षा मिली। उनका विवाह रत्नावली से हुआ था। पत्नी के प्रति अत्यधिक आसक्ति और रत्नावली के उपदेश ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और वे श्रीराम की भक्ति में पूर्णतः समर्पित हो गए। उन्होंने लोकभाषा में रामकथा को प्रस्तुत करके भक्ति, नीति, मर्यादा और लोकमंगल के आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाया। उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना रामचरितमानस है, जो अवधी भाषा में रचित है और हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि मानी जाती है। उनकी प्रमुख रचनाओं में रामचरितमानस, विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, कृष्णगीतावली, बरवै रामायण, जानकीमंगल, पार्वतीमंगल, रामलला नहछू, हनुमान बाहुक तथा वैराग्यसंदीपनी का विशेष उल्लेख किया जाता है। तुलसीदास ने अपने काव्य में भक्ति के साथ-साथ धर्म, नीति, आदर्श परिवार, आदर्श राज्य और मानवीय मूल्यों का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण किया। उनकी भाषा सरल, सरस, भावपूर्ण और जनसामान्य के निकट है। उनके काव्य में भक्ति, करुणा, वीरता, वात्सल्य तथा लोकमंगल की अद्भुत समन्वित अभिव्यक्ति मिलती है। माना जाता है कि उनका अधिकांश जीवन काशी में व्यतीत हुआ और वहीं उन्होंने साहित्य-साधना की। संवत् 1680 (लगभग 1623 ई.) में काशी के अस्सीघाट पर उनका निधन हुआ। हिन्दी साहित्य में तुलसीदास का स्थान अत्यन्त ऊँचा है और वे आज भी रामभक्ति तथा लोकमंगल की अमर परम्परा के महान प्रतिनिधि माने जाते हैं।

श्रीरामचरितमानस

पद संख्या 01

रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु। सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु॥३२(ख)॥ कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी। जेहि बिधि संकर कहा बखानी॥ सो सब हेतु कहब मैं गाई। कथाप्रबंध बिचित्र बनाई॥ जेहि यह कथा सुनी नहिं होई। जनि आचरजु करैं सुनि सोई॥ कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी। नहिं आचरजु करहिं अस जानी॥ रामकथा कै मिति जग नाहीं। असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं॥ नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा॥ कलपभेद हरिचरित सुहाए। भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए॥ करिअ न संसय अस उर आनी। सुनिअ कथा सादर रति मानी॥

शब्दार्थ:

रामचरित = श्रीराम का चरित्र, राकेस = चन्द्रमा, सरिस = समान, सुखद = सुख देने वाला, सज्जन = सज्जन पुरुष, कुमुद = कुमुदिनी, चकोर = चकोर पक्षी, चित हित = मन को प्रिय, बड़ लाहु = बहुत बड़ा लाभ, प्रस्न = प्रश्न, जेहि भाँति = जिस प्रकार, भवानी = पार्वती, जेहि बिधि = जिस प्रकार, संकर = भगवान शिव, बखानी = वर्णन किया, हेतु = कारण, गाई = गाकर, कथाप्रबंध = कथा का क्रमबद्ध वर्णन, बिचित्र = अद्भुत, आचरजु = आश्चर्य, अलौकिक = लौकिक जगत से परे, ग्यानी = ज्ञानीजन, मिति = सीमा, प्रतीति = विश्वास, नाना भाँति = अनेक प्रकार से, अवतारा = अवतार, सत कोटि = सौ करोड़, अपारा = असीम, कलपभेद = विभिन्न कल्पों के अनुसार, हरिचरित = भगवान के चरित्र, मुनीसन्ह = श्रेष्ठ मुनियों ने, संसय = संदेह, उर आनी = हृदय में लाकर, सादर = आदरपूर्वक, रति मानी = प्रेमपूर्वक ॥३२(ख)॥

सन्दर्भ:

प्रस्तुत दोहा-चौपाई हमारी पाठ्यपुस्तक ‘मंदाकिनी’ के श्रीरामचरितमानस-परिचय नामक पाठ से लिया गया है । इसके रचयिता भक्तिकाल के रामाश्रयी शाखा के सुप्रसिद्ध महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी हैं ।

प्रसङ्ग:

यहाँ प्रसङ्ग लिखा जाएगा।

हिन्दी व्याख्या:

यहाँ पद की हिन्दी व्याख्या लिखी जाएगी। इसमें कोई लाल-काला शब्दार्थ पैटर्न नहीं रहेगा।

टिप्पणी:

यहाँ आवश्यक साहित्यिक एवं विशेष टिप्पणी लिखी जाएगी।

कवितावली

पद संख्या 01

कागर कीर ज्यों भूषन-चीर सरीरु लस्यो तजि नीरु ज्यों काई। मातु-पिता प्रिय लोग सबै सनमानि सुभायँ सनेह सगाई॥ संग सुभामिनि, भाइ भलो, दिन द्वै जनु औध हुते पहुनाई। राजिवलोचन रामु चले तजि बापको राजु बटाउ कीं नाईं॥

शब्दार्थ:

कागर = कागज, कीर = तोता, भूषन-चीर = आभूषण और वस्त्र, सरीरु लस्यो = शरीर पर सुशोभित थे, तजि नीरु ज्यों काई = जैसे जल को छोड़कर काई ऊपर आ जाती है, मातु-पिता = माता-पिता, प्रिय लोग = प्रियजन, सनमानि = सम्मान करके, सुभायँ = स्वभाव से, सनेह सगाई = प्रेम और संबंध के कारण, संग सुभामिनि = सुन्दर स्त्री सीता के साथ, भाइ भलो = श्रेष्ठ भाई लक्ष्मण, दिन द्वै = दो दिन, औध = अयोध्या, पहुनाई = अतिथि के रूप में निवास, राजिवलोचन = कमल के समान नेत्रों वाले, राजु = राज्य, बटाउ कीं नाईं = राहगीर की भाँति छोड़कर ॥

सन्दर्भ:

यह पद गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित कवितावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

श्रीराम द्वारा राज-पाट, वस्त्र और आभूषण त्यागकर सीता तथा लक्ष्मण के साथ वन जाने के प्रसंग में कवि ने उनके त्याग और वैराग्य का चित्रण किया है।

हिन्दी व्याख्या:

तुलसीदास जी कहते हैं कि जैसे कीर (तोता) अपने पंखों का त्याग कर देता है वैसे ही भगवान श्रीराम ने अपने वस्त्र आभूषण का त्याग कर दिये। उनका शरीर वैसे ही शोभित हो रहा है जैसे काई से रहित जल शोभायमान होता है। माता-पिता और प्रिय लोगों को स्वभाव से ही उनके स्नेह और सम्बन्धानुसार सम्मानित कर कमलनयन भगवान राम साथ में सुन्दर स्त्री और भले भाई को ले अपने पिता का राज्य त्याग कर इस तरह से वन की ओर चल दिये जैसे अयोध्या में दो ही दिन की मेहमानी पर थे।

टिप्पणी:

1. अलंकार: उपमा अलंकार — ‘कीर ज्यों’, ‘नीरु ज्यों काई’ और ‘बटाउ की नाईं’ में उपमा है।
2. रस: करुण रस — श्रीराम द्वारा राज्य और सुखों का त्याग करके वन जाने से करुण भाव उत्पन्न होता है।
3. छन्द: कवित्त छन्द।
4. भाव: इस पद में श्रीराम के त्याग, वैराग्य, विनम्रता तथा माता-पिता और प्रियजनों के प्रति प्रेम का भाव व्यक्त हुआ है।

पद संख्या 02

जलको गए लक्खनु, हैं लरिका परिखौ, पिय! छाँह घरीक ह्वै ठाढ़े। पोंछि पसेउ बयारि करौं, अरु पाय पखारिहौं भूभुरि-डाढ़े॥ तुलसी रघुबीर प्रियाश्रम जानि कै बैठि बिलंब लौं कंटक काढ़े। जानकीं नाहको नेहु लख्यो, पुलको तनु, बारि बिलोचन बाढ़े॥

शब्दार्थ:

जलको गए = जल लेने गये, लक्खनु = लक्ष्मण, लरिका = बालक, छाँह घरीक = कुछ देर छाया में, पसेउ = पसीना, बयारि = हवा करना, पाय पखारिहौं = पैर धोऊँगी, भूभुरि-डाढ़े = धूल-मिट्टी से भरे हुए, प्रियाश्रम = प्रिय के श्रम को, कंटक काढ़े = काँटे निकालना, पुलको तनु = शरीर पुलकित होना, बारि बिलोचन = आँखों में आँसू।

सन्दर्भ:

यह पद गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित कवितावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

वन-मार्ग में लक्ष्मण के जल लेने जाने और उनके श्रम को देखकर सीता जी के हृदय में उत्पन्न स्नेह एवं ममता का वर्णन किया गया है।

हिन्दी व्याख्या:

तुलसीदास जी कहते हैं कि लक्ष्मण जल लेने गये हैं। सीता जी श्रीराम से कहती हैं कि वे अभी बालक हैं, उन्हें कुछ देर छाया में खड़े रहने दें। मैं उनका पसीना पोंछकर हवा करूँगी और उनके धूल से भरे हुए पैर धोऊँगी। श्रीराम ने सीता जी के लक्ष्मण के प्रति प्रेम को समझकर कुछ देर बैठकर लक्ष्मण के पैर से काँटे निकालने में विलम्ब किया। लक्ष्मण के प्रति सीता जी का यह स्नेह देखकर उनका शरीर पुलकित हो गया और उनकी आँखों में प्रेम के आँसू भर आये।

टिप्पणी:

1. अलंकार: अनुप्रास अलंकार — ‘पाय पखारिहौं’ आदि में वर्णों की पुनरावृत्ति से अनुप्रास की शोभा है।
2. रस: वात्सल्य रस — लक्ष्मण के प्रति सीता जी की ममता और स्नेह वात्सल्य भाव को व्यक्त करता है।
3. छन्द: कवित्त छन्द।
4. भाव: इस पद में सीता जी के हृदय में लक्ष्मण के प्रति उमड़ते मातृवत स्नेह, ममता और करुणा का अत्यन्त मार्मिक चित्रण है।

पद संख्या 03

सीस जटा, उर- बाहु बिसाल, बिलोचन लाल, तिरीछी सी भौहैं। तून सरासन-बान धरें तुलसी बन-मारगमें सुठि सोहैं॥ सादर बारहिं बार सुभायँ चितै तुम्ह त्यों हमरो, मनु मोहैं। पूँछत ग्रामबधू सिय सों, कहौ, साँवरे-से सखि! रावरे को हैं॥

शब्दार्थ:

सीस = सिर, जटा = जटाएँ, उर = वक्षस्थल, बिसाल = विशाल, बिलोचन = नेत्र, तिरीछी भौहैं = टेढ़ी भौंहें, तून = तरकश, सरासन = धनुष, बन-मारग = वन का रास्ता, चितै = देखते हैं, ग्रामबधू = गाँव की स्त्रियाँ।

सन्दर्भ:

यह पद गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित कवितावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

वन जाते समय श्रीराम के रूप-सौन्दर्य से प्रभावित ग्रामीण स्त्रियाँ सीता जी से उनके सम्बन्ध के विषय में पूछती हैं।

हिन्दी व्याख्या:

तुलसीदास जी कहते हैं कि वन जाते समय ग्रामीण स्त्रियाँ श्री सीता जी से पूछती हैं कि जिनके सिर पर जटाएँ हैं, वक्षस्थल और भुजाएँ विशाल हैं, जिनकी आँखें लाल व भौंहें तिरछी हैं, जो धनुष-बाण और तरकश धारण किये हुए वन-मार्ग की शोभा बढ़ा रहे हैं तथा जो बार-बार बड़े ही प्रेमपूर्ण भाव से तुम्हारी ओर देख रहे हैं, वे हम लोगों का भी मन मोह लेते हैं। अतः हे सखि! बताओ तो ऐसे साँवले रंग वाले तुम्हारे कौन हैं और तुम्हारा उनसे क्या सम्बन्ध है?

टिप्पणी:

1. अलंकार: अनुप्रास अलंकार — ‘सीस जटा’, ‘बिसाल बिलोचन’ आदि में वर्णों की आवृत्ति है; साथ ही रूप-सौन्दर्य का चित्रात्मक वर्णन है।
2. रस: शृंगार रस — श्रीराम के मनोहर रूप और उनके प्रति ग्रामीण स्त्रियों के आकर्षण का वर्णन है।
3. छन्द: कवित्त छन्द।
4. भाव: पद में श्रीराम के अनुपम सौन्दर्य, वीरता और आकर्षक व्यक्तित्व से प्रभावित ग्रामीण स्त्रियों की सहज जिज्ञासा एवं मुग्धता व्यक्त हुई है।

पद संख्या 04

सुनि सुंदर बैन सुधारस-साने सयानी हैं जानकीं जानी भली। तिरछे करि नैन, दै सैन तिन्हैं, समुझाइ कछू मुसुकाइ चली॥ तुलसी तेहि औसर सोहैं सबै अवलोकति लोचनलाहु अलीं। अनुराग-तड़ागमें भानु उदैं बिगसी मनो मंजुल कंजकलीं।।

शब्दार्थ:

सुधारस-साने = अमृत से सने हुए, बैन = वचन, सयानी = चतुर, सैन = संकेत, तड़ाग = तालाब, भानु = सूर्य, कंजकली = कमल की कली, लोचनलाहु = आँखों का लाभ, दर्शन का सुख।

सन्दर्भ:

यह पद गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित कवितावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

प्रस्तुत पद्य में गोस्वामी जी ने नारी-सुलभ लज्जा और सीता जी की चतुराई का अत्यन्त मनोहर चित्रण किया है।

हिन्दी व्याख्या:

गोस्वामी जी कहते हैं कि गाँव की स्त्रियों के अमृत से सने हुए सुन्दर वचनों को सुनकर जानकी जी जान गईं कि ये सब बड़ी चतुर हैं। अतः नेत्रों को तिरछा कर उन्हें संकेत से ही कुछ समझाकर मुस्कुराकर चल दीं। भक्त तुलसीदास कहते हैं कि उस समय जितनी भी ग्रामीण स्त्रियाँ थीं, वे सभी उन मूर्तियों का दर्शन कर लोचन-लाभ उठाती हुई शोभायमान होने लगीं। वह शोभा ऐसी थी मानो सूर्य के उदय से प्रेमरूपी तालाब में कमलों की मनोहर कलियाँ खिल गई हों। अर्थात श्रीरामरूपी सूर्य के उदय से प्रेमरूपी सरोवर में सखियों के नेत्र कमल-कली के समान विकसित हो गये।

टिप्पणी:

1. अलंकार: रूपक एवं उपमा अलंकार — ‘अनुराग-तड़ाग’ में रूपक तथा ‘मनो मंजुल कंजकलीं’ में उपमा का सौन्दर्य है।
2. रस: शृंगार रस — सीता जी की लज्जा, मुस्कान और ग्रामीण स्त्रियों की मुग्धता से शृंगार भाव प्रकट होता है।
3. छन्द: कवित्त छन्द।
4. भाव: सीता जी की लज्जा, चतुराई और मधुर मुस्कान के साथ श्रीराम के रूप-दर्शन से ग्रामीण स्त्रियों के हृदय में उत्पन्न अनुराग का अत्यन्त मनोहर चित्रण किया गया है।

पद संख्या 05

बालधी बिसाल बिकराल, ज्वालजाल मानो लंक लीलिबेको काल रसना पसारी है। कैधौं ब्योमबीथिका भरे हैं भूरि धूमकेतु, बीररस बीर तरवारि सो उघारी है॥ 'तुलसी' सुरेस-चापु, कैधौं दामिनि-कलापु, कैधौं चली मेरु तें कृसानु-सरि भारी है। देखें जातुधान-जातुधानीं अकुलानी कहैं, काननु उजार यो, अब नगरू प्रजारिहै॥

शब्दार्थ:

बालधी = पूँछ, बिसाल = विशाल, बिकराल = भयंकर, ज्वालजाल = आग की लपटों का समूह, लीलिबेको = निगलने के लिए, व्योमबीथिका = आकाशरूपी मार्ग, धूमकेतु = पुच्छल तारा, सुरेस-चापु = इन्द्रधनुष, दामिनि-कलापु = बिजली का समूह, कृसानु-सरि = अग्नि की नदी, जातुधान-जातुधानीं = राक्षस और राक्षसियाँ, प्रजारिहै = जला देगा।

सन्दर्भ:

यह पद गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित कवितावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

यहाँ कवि ने हनुमान जी द्वारा जलाई जा रही लंका तथा लंका निवासी राक्षस-राक्षसियों की व्याकुलता का वर्णन किया है।

हिन्दी व्याख्या:

तुलसीदास जी कहते हैं कि हनुमान जी की विशाल पूँछ में भयंकर आग की लपटें उठ रही थीं। उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो लंका को निगलने के लिए स्वयं मृत्यु ने अपनी जिह्वा फैला दी हो अथवा जैसे आकाश-मार्ग में बहुत से पुच्छल तारे भरे हुए हों अथवा ऐसा लगता था जैसे किसी वीर ने वीर रस से भरकर रक्तरंजित तलवार निकाल ली हो। आग की लपटों से परिपूर्ण वह पूँछ ऐसी लगती थी जैसे इन्द्रधनुष चमक रहा हो, अथवा बिजली का कोई समूह हो अथवा किसी ज्वालामुखी से भयंकर आग की नदी बह रही हो। हनुमान जी की भयंकर पूँछ को देखकर राक्षस-राक्षसियाँ व्याकुल होकर कह रहे थे कि इस बन्दर ने अभी तक तो अशोक वाटिका को ही उजाड़ा था और अब नगर में भी आग लगा दी है।

टिप्पणी:

1. अलंकार: उपमा एवं उत्प्रेक्षा अलंकार — हनुमान जी की पूँछ को मृत्यु की जिह्वा, धूमकेतु, तलवार, इन्द्रधनुष, बिजली तथा अग्नि की नदी के समान बताया गया है।
2. रस: रौद्र एवं वीर रस — हनुमान जी के प्रचण्ड पराक्रम और लंका-दहन से रौद्र तथा वीर भाव की अभिव्यक्ति हुई है।
3. छन्द: कवित्त छन्द।
4. भाव: इस पद में हनुमान जी के अद्भुत पराक्रम, प्रचण्ड शक्ति और लंका-दहन की भयंकरता का प्रभावशाली चित्रण किया गया है। राक्षस-राक्षसियों की भय और व्याकुलता भी स्पष्ट दिखाई देती है।

गीतावली

पद संख्या 01

पालने रघुपति झुलावै | लै लै नाम सप्रेम सरस स्वर कौसल्या कल कीरति गावै || केकिकण्ठ दुति स्यामबरन बपु, बाल-बिभूषन बिरचि बनाए | अलकैं कुटिल, ललित लटकनभ्रू, नील नलिन दोउ नयन सुहाए || सिसु-सुभाय सोहत जब कर गहि बदन निकट पदपल्लव लाए | मनहुँ सुभग जुग भुजग जलज भरि लेत सुधा ससि सों सचु पाए || उपर अनूप बिलोकि खेलौना किलकत पुनि-पुनि पानि पसारत | मनहुँ उभय अंभोज अरुन सों बिधु-भय बिनय करत अति आरत || तुलसिदास बहु बास बिबस अलि गुञ्जत, सुछबि न जाति बखानी | मनहुँ सकल श्रुति ऋचा मधुप ह्वै बिसद सुजस बरनत बर बानी ||

शब्दार्थ:

रघुपति—श्रीराम। सरस—मधुर। कीरति—यश। केकिकण्ठ—मोर के कण्ठ के समान। दुति—कान्ति। स्यामबरन—श्यामवर्ण। बपु—शरीर। अलकैं—बालों की लटें। पदपल्लव—कोमल चरण। अंभोज—कमल। बिधु—चन्द्रमा। आरत—व्याकुल। बास—सुगन्ध। अलि—भौंरा। सुछबि—सुन्दर शोभा। श्रुति—वेद।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के बालकाण्ड से सम्बद्ध है, जिसमें बालक राम की मनोहर छवि तथा माता कौसल्या के वात्सल्य का चित्रण किया गया है।

प्रसङ्ग:

माता कौसल्या बालक राम को पालने में झुलाते हुए उनके रूप और यश का मधुर स्वर में वर्णन करती हैं। तुलसीदास जी बालक राम की अनुपम बाल-छवि को देखकर मुग्ध हो उठते हैं।

हिन्दी व्याख्या:

माता कौसल्या श्रीराम को पालने में झुला रही हैं और प्रेमपूर्वक उनका नाम लेकर मधुर स्वर में उनका यश गा रही हैं। बालक राम का शरीर मोर के कण्ठ के समान श्यामवर्ण है तथा वे सुन्दर बाल-विभूषणों से सजे हुए हैं। उनकी घुँघराली अलकें, सुन्दर भौंहें और नीलकमल के समान दोनों नेत्र अत्यन्त मनोहर हैं। बाल-सुलभ चेष्टाएँ करते हुए जब वे अपने कोमल चरणों को माता के समीप लाते हैं तो उनकी शोभा अद्भुत लगती है। वे हाथ फैलाकर सुन्दर खिलौने को पाने के लिए बार-बार किलकारी भरते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि राम की ऐसी अनुपम शोभा का वर्णन करना सम्भव नहीं है। ऐसा लगता है मानो समस्त वेदों की ऋचाएँ भौंरों का रूप धारण करके उनके निर्मल यश का गान कर रही हों।

टिप्पणी:

① अलंकार: उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा एवं अनुप्रास। ② रस: वात्सल्य रस। ③ छन्द: पद-गीत शैली। ④ भाव: बालक राम की मनोहर बाल-छवि तथा माता कौसल्या के वात्सल्य-प्रेम का अत्यन्त सजीव एवं भावपूर्ण चित्रण।

पद संख्या 02

जब दोउ दसरथ-कुँवर बिलोके | जनक नगर नर-नारि मुदित मन निरखि नयन पल रोके || बय किसोर, घन-तड़ित-बरन तनु नखसिख अंग लोभारे | दै चित, कै हित, लै सब छबि-बित बिधि निज हाथ सँवारे || सङ्कट नृपहि, सोच अति सीतहि, भूप सकुचि सिर नाए | उठे राम रघुकुल-कुल-केहरि, गुर-अनुसासन पाए || कौतुक ही कोदण्ड खण्डि प्रभु, जय अरु जानकि पाई | तुलसिदास कीरति रघुपतिकी मुनिन्ह तिहूँ पुर गाई ||

शब्दार्थ:

दोउ—दोनों। दसरथ-कुँवर—दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण। बिलोके—देखा। मुदित—प्रसन्न। किसोर—किशोर अवस्था के। घन-तड़ित—बादल और बिजली। लोभारे—मनोहारी। छबि-बित—रूप-सम्पत्ति। नृपहि—राजा जनक को। सकुचि—लज्जित होकर। कुल-केहरि—कुलरूपी सिंह। कोदण्ड—शिव का धनुष। खण्डि—तोड़कर। जानकि—सीता। कीरति—यश।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद में तुलसीदास जी ने श्रीराम-लक्ष्मण के जनकपुर पहुँचने, उनके अनुपम रूप तथा श्रीराम द्वारा शिवधनुष भंग कर सीता को प्राप्त करने का वर्णन किया है।

प्रसङ्ग:

जनकपुर के नर-नारी दोनों राजकुमारों को देखकर अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। श्रीराम गुरु की आज्ञा पाकर शिवधनुष को खेल-खेल में तोड़ देते हैं और सीता को प्राप्त करते हैं।

हिन्दी व्याख्या:

जनकपुर के स्त्री-पुरुष दशरथ के दोनों पुत्र राम और लक्ष्मण को देखकर इतने प्रसन्न हुए कि उनकी आँखें उनके रूप से हटना नहीं चाहती थीं। दोनों किशोर राजकुमारों के शरीर बादल और बिजली के समान सुन्दर लग रहे थे। ऐसा प्रतीत होता था मानो विधाता ने स्वयं अपने हाथों से उनके रूप की सम्पूर्ण शोभा सँवार दी हो। शिवधनुष को देखकर राजा जनक और सीता चिन्तित हुए, परन्तु गुरु की आज्ञा पाकर रघुकुल के सिंह श्रीराम उठे और उन्होंने खेल-खेल में ही कोदण्ड धनुष को तोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने सीता को प्राप्त किया और श्रीराम की कीर्ति तीनों लोकों में फैल गई।

टिप्पणी:

① अलंकार: उपमा, रूपक, अनुप्रास एवं अतिशयोक्ति। ② रस: वीर रस तथा श्रृंगार रस। ③ छन्द: पद-गीत शैली। ④ भाव: श्रीराम के अनुपम सौन्दर्य, वीरता और सीता-स्वयंवर की गौरवपूर्ण घटना का चित्रण।

पद संख्या 03

लोने लाल लषन, सलोने राम, लोनी सिय, चारु चित्रकूट बैठे सुरतरु-तर हैं | गोरे-साँवरे सरीर पीत नीलनीरज-से प्रेम-रुप-सुखमाके मनसिज-सर हैं || लोने नख-सिख, निरुपम, निरखन जोग, बड़े उर कन्धर बिसाल भुज बर हैं | लोने लोने लोचन, जटनिके मुकुट लोने, लोने बदननि जीते कोटि सुधाकर हैं || लोने लोने धनुष, बिसिष कर-कमलनि, लोने मुनिपट, कटि लोने सरघर हैं | प्रिया प्रिय बन्धुको दिखावत बिटप, बेलि, मञ्जु कुञ्ज, सिलातल, दल, फूल, फर हैं || ऋषिनके आश्रम सराहैं, मृग-नाम कहैं, लागी मधु, सरित झरत निरझर हैं | नाचत बरहि नीके, गावत मधुप-पिक, बोलत बिहङ्ग, नभ-जल-थल-चर हैं || प्रभुहि बिलोकि मुनिगन पुलके कहत भूरिभाग भये सब नीच नारि-नर हैं | तुलसी सो सुख-लाहु लूटत किरात-कोल जाको सिसकत सुर बिधि-हरि-हर हैं ||

शब्दार्थ:

लोने—सुन्दर। लषन—लक्ष्मण। चारु—सुन्दर। सुरतरु—कल्पवृक्ष। नख-सिख—पैर के नख से सिर तक। निरुपम—उपमा रहित। उर—हृदय/वक्षस्थल। कन्धर—गर्दन। सुधाकर—चन्द्रमा। बिसिष—बाण। मुनिपट—मुनियों के वस्त्र। सरघर—तरकस। बिटप—वृक्ष। मञ्जु—सुन्दर। सिलातल—शिला का तल। बरहि—मोर। मधुप—भौंरा। पिक—कोयल। बिहङ्ग—पक्षी। भूरिभाग—अत्यन्त भाग्यशाली। किरात-कोल—वनवासी जातियाँ।

सन्दर्भ:

इस पद में तुलसीदास जी ने चित्रकूट में निवास करते हुए श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के अनुपम सौन्दर्य तथा वहाँ के प्राकृतिक वातावरण का मनोरम चित्रण किया है।

प्रसङ्ग:

चित्रकूट में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को देखकर मुनि, वनवासी तथा वहाँ के पशु-पक्षी सभी आनन्दित हैं। तुलसीदास जी उनके रूप और चित्रकूट की प्राकृतिक शोभा का वर्णन करते हैं।

हिन्दी व्याख्या:

चित्रकूट में श्रीराम, लक्ष्मण और सीता ऐसे सुन्दर लगते हैं मानो कल्पवृक्ष के नीचे बैठे हों। राम और लक्ष्मण के शरीर गौर और श्याम वर्ण के हैं तथा सीता की छवि अत्यन्त मनोहर है। उनके अंग-प्रत्यंग अनुपम हैं। उनके विशाल वक्ष, कन्धे, लम्बी भुजाएँ, सुन्दर नेत्र, जटाओं के मुकुट और चन्द्रमा को भी मात देने वाले मुख अत्यन्त आकर्षक हैं। वे धनुष-बाण धारण किए हुए हैं और मुनियों के समान वस्त्र पहने हैं। वे सीता और लक्ष्मण को वन के वृक्ष, लताएँ, कुञ्ज, फूल और फल दिखाते हैं। चित्रकूट में पक्षी मधुर स्वर में गाते हैं, मोर नाचते हैं और झरने बहते हैं। मुनिगण राम के दर्शन करके पुलकित होते हैं और वनवासी स्वयं को अत्यन्त भाग्यशाली समझते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि जिस सुख के लिए देवता भी तरसते हैं, वही सुख वनवासी लोग राम के सान्निध्य में प्राप्त कर रहे हैं।

टिप्पणी:

① अलंकार: उपमा, रूपक, अनुप्रास एवं अतिशयोक्ति। ② रस: श्रृंगार एवं शान्त रस। ③ छन्द: पद-गीत शैली। ④ भाव: चित्रकूट में राम-सीता-लक्ष्मण के दिव्य सौन्दर्य तथा वन-प्रकृति के मनोहारी वातावरण का चित्रण।

पद संख्या 04

दूल्ह राम, सीय दुलही री। घन-दामिन-बर बरन, हरन-मन सुन्दरता नख-शिख निबही री॥ ब्याह-विभूषन-बसन-बिभूषित, सखि-अवली लखि ठगि सी रही री॥ जीवन-जनम-लाहु लोचन फल है इतनोइ, लह्यो आजु सही री॥ सुखमा-सुरभि सिंगार-छीर दुहि, मयन अमिय मय कियो है दही री॥ मथि माखन सिय राम सँवारे, सकल भुवन छवि मनहुँ मही री॥ तुलसिदास जोरी देखत सुख सोभा, अतुल न जाति कही री॥ रूप रासि बिरची बिरंची मनो, सिला लवनि रति काम लही री॥

शब्दार्थ:

दूल्ह—वर। दुलही—वधू। घन—बादल। दामिन—बिजली। हरन-मन—मन को हरने वाली। नख-शिख—पैर से सिर तक। विभूषण—आभूषण। सखि-अवली—सखियों की पंक्ति। लाहु—लाभ। लोचन फल—आँखों की सार्थकता। सुरभि—सुगन्ध। मयन—मयूर/मय का बनाया हुआ, यहाँ सौन्दर्य का संकेत। अमिय—अमृत। मथि—मथकर। जोरी—युगल। बिरंची—ब्रह्मा। रूप रासि—सौन्दर्य की राशि।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद में तुलसीदास जी ने श्रीराम और सीता के विवाह के अवसर पर उनके अनुपम रूप, वेशभूषा और दाम्पत्य-सौन्दर्य का मनोहारी वर्णन किया है।

प्रसङ्ग:

विवाह के अवसर पर श्रीराम वर और सीता वधू के रूप में अत्यन्त सुन्दर दिखाई दे रहे हैं। सखियाँ तथा उपस्थित लोग उनके दिव्य रूप को देखकर मुग्ध हैं।

हिन्दी व्याख्या:

श्रीराम दूल्हे और सीता दुल्हन के रूप में अत्यन्त मनोहर लग रहे हैं। श्रीराम का श्याम शरीर बादल के समान और सीता का रूप बिजली के समान चमक रहा है। दोनों की नख-शिख सुन्दरता मन को हर लेने वाली है। विवाह के आभूषणों और सुन्दर वस्त्रों से सजे हुए इस युगल को देखकर सखियाँ भी मानो सुध-बुध खो बैठी हैं। उनके दर्शन से नेत्रों का जीवन सफल हो गया है। उनका सौन्दर्य इतना अनुपम है कि मानो ब्रह्मा ने समस्त रूप-सौन्दर्य को एकत्र करके इस युगल की रचना की हो। तुलसीदास जी कहते हैं कि राम-सीता की इस जोड़ी की शोभा का वर्णन करना सम्भव नहीं है।

टिप्पणी:

① अलंकार: उपमा, रूपक, अनुप्रास एवं उत्प्रेक्षा। ② रस: श्रृंगार रस। ③ छन्द: पद-गीत शैली। ④ भाव: राम-सीता के विवाहोत्तर दिव्य सौन्दर्य और उनके युगल रूप को देखकर उत्पन्न आनन्द एवं प्रेम का चित्रण।

पद संख्या 05

सब दिन चित्रकूट नीको लागत | बरषाऋतु प्रबेस बिसेष गिरि देखन मन अनुरागत || चहुँदिसि बन सम्पन्न, बिहँग-मृग बोलत सोभा पावत | जनु सुनरेस देस-पुर प्रमुदित प्रजा सकल सुख छावत || सोहत स्याम जलद मृदु घोरत धातु रँगमगे सृङ्गनि | मनहु आदि अंभोज बिराजत सेवित सुर-मुनि-भृङ्गनि || सिखर परस घन-घटहि, मिलति बग-पाँति सो छबि कबि बरनी | आदि बराह बिहरि बारिधि मनो उठ्यो है दसन धरि धरनी || जल जुत बिमल सिलनि झलकत नभ बन-प्रतिबिम्ब तरङ्ग | मानहु जग-रचना बिचित्र बिलसति बिराट अँग अंग || मन्दाकिनिहि मिलत झरना झरि झरि भरि भरि जल आछे | तुलसी सकल सुकृत-सुख लागे मानो राम-भगतिके पाछे ||

शब्दार्थ:

नीको—सुन्दर। बरषाऋतु—वर्षा ऋतु। अनुरागत—प्रेम उत्पन्न होता है। बिहँग—पक्षी। मृग—हिरन। जलद—बादल। धातु—गेरू आदि खनिज। सृङ्ग—शिखर। अंभोज—कमल। घन-घटहि—बादलों के समूह। बग-पाँति—बगुलों की पंक्ति। आदि बराह—भगवान विष्णु का वराह रूप। बारिधि—समुद्र। दसन—दाँत। बिमल—निर्मल। बिराट—विशाल विराट पुरुष। सुकृत—पुण्य।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद में तुलसीदास जी ने वर्षा ऋतु में चित्रकूट पर्वत की प्राकृतिक शोभा का अत्यन्त मनोहर एवं कल्पनापूर्ण वर्णन किया है।

प्रसङ्ग:

गोस्वामी तुलसीदास जी चित्रकूट पर्वत की प्राकृतिक शोभा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि-

हिन्दी व्याख्या:

चित्रकूट पर्वत सभी दिनों में अत्यन्त सुन्दर लगता है, परन्तु वर्षा ऋतु में उसकी शोभा विशेष रूप से मनोहारी हो जाती है। चारों ओर हरे-भरे वन, पशु-पक्षियों की मधुर ध्वनियाँ और आनन्दमय वातावरण दिखाई देता है। काले बादल पर्वत-शिखरों पर ऐसे सुशोभित होते हैं मानो देवताओं और मुनियों से सेवित कमल खिला हो। बादलों से मिलती बगुलों की पंक्ति ऐसी प्रतीत होती है मानो भगवान वराह समुद्र से पृथ्वी को अपने दाँतों पर धारण करके निकल रहे हों। निर्मल जल से भरी शिलाओं में आकाश और वन का प्रतिबिम्ब ऐसा दिखाई देता है मानो विराट पुरुष के अंग-प्रत्यंग में सम्पूर्ण संसार की रचना झलक रही हो। झरने मन्दाकिनी में मिलते हुए ऐसे लगते हैं मानो सारे पुण्य और सुख रामभक्ति की ओर जा रहे हों।

टिप्पणी:

① अलंकार: उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा एवं अनुप्रास। ② रस: शान्त एवं अद्भुत रस। ③ छन्द: पद-गीत शैली। ④ भाव: वर्षा ऋतु में चित्रकूट की प्राकृतिक शोभा और रामभक्ति से उसके आध्यात्मिक सम्बन्ध का अत्यन्त रमणीय चित्रण।

पद संख्या 06

राघौ! एक बार फिरि आवौ | ए बर बाजि बिलोकि आपने, बहुरो बनहि सिधावौ || जे पय प्याइ, पोखि कर-पङ्कज, बार-बार चुचुकारे | क्यों जीवहिं, मेरे राम लाड़िले! ते अब निपट बिसारे || भरत सौगुनी सार करत हैं, अति प्रिय जानि तिहारे | तदपि दिनहिं दिन होत झाँवरे, मनहु कमल हिम-मारे || सुनहु पथिक! जो राम मिलहिं बन, कहियो मातु-सँदेसो | तुलसी मोहि और सबहिनतें इन्हको बड़ो अँदेसो ||

शब्दार्थ:

राघौ—हे राघव। फिरि आवौ—फिर लौट आओ। बर बाजि—सुन्दर घोड़े। सिधावौ—चले जाओ। पय—दूध। पय प्याइ—दूध पिलाकर। पोखि—पोंछकर। कर-पङ्कज—कमल के समान हाथ। चुचुकारे—स्नेह से पुकारे। निपट—बिल्कुल। झाँवरे—कुम्हलाए हुए। हिम-मारे—पाले से मुरझाए। पथिक—यात्री। सँदेसो—सन्देश। अँदेसो—चिन्ता/भय।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद में माता कौसल्या की राम-वियोगजनित व्यथा और पुत्र के प्रति उनके वात्सल्यपूर्ण प्रेम का मार्मिक चित्रण किया गया है।

प्रसङ्ग:

माता कौसल्या राम के वन चले जाने के बाद अत्यन्त दुखी हैं। वे किसी पथिक के द्वारा राम तक अपना सन्देश पहुँचाने की कामना करती हैं।

हिन्दी व्याख्या:

माता कौसल्या राम से कहती हैं कि हे राघव! एक बार फिर लौट आओ और अपने घोड़ों तथा वन की ओर जाते हुए मार्ग को देख लो। जिन हाथों से मैंने तुम्हें दूध पिलाया, स्नान कराया और बार-बार स्नेह से पुकारा, उन्हीं माता को तुमने अब बिल्कुल भुला दिया है। भरत तुम्हें बहुत प्रिय मानकर तुम्हारी बहुत सेवा करते हैं, फिर भी वे दिन-प्रतिदिन ऐसे कुम्हला रहे हैं जैसे पाले से कमल मुरझा जाता है। माता किसी पथिक से कहती हैं कि यदि वन में राम मिलें तो मेरा सन्देश अवश्य कहना। तुलसीदास जी कहते हैं कि माता को संसार की अन्य किसी बात की इतनी चिन्ता नहीं जितनी राम की कुशलता की चिन्ता है।

टिप्पणी:

① अलंकार: उपमा, अनुप्रास एवं उत्प्रेक्षा। ② रस: करुण रस तथा वात्सल्य भाव। ③ छन्द: पद-गीत शैली। ④ भाव: राम-वियोग में माता कौसल्या की ममता, चिन्ता और करुण व्यथा का अत्यन्त मार्मिक चित्रण।

पद संख्या 07

अतिहि अधिक दरसनकी आरति | राम-बियोग असोक-बिटपतर सीय निमेष कलपसम टारति || बार-बार बर बारिजलोचन भरि भरि बरत बारि उर ढारति | मनहु बिरहके सद्य घाय हिये लखि तकि-तकि धरि धीरज तारति || तुलसिदास जद्यपि निसिबासर छिन-छिन प्रभुमूरतिहि निहारति | मिटति न दुसह ताप तौ तनकी, यह बिचारि अंतर गति हारति ||

शब्दार्थ:

दरसनकी आरति—दर्शन की तीव्र इच्छा। असोक-बिटप—अशोक वृक्ष। निमेष—क्षण। कलपसम—कल्प के समान। बारिजलोचन—कमल के समान नेत्र। बारि—जल/आँसू। बिरह—वियोग। सद्य घाय—ताजा घाव। हिये—हृदय में। निसिबासर—रात-दिन। दुसह ताप—असहनीय पीड़ा। अंतर गति—मन की दशा।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद में सीता की राम-वियोगजनित करुण दशा का चित्रण किया गया है। तुलसीदास जी ने विरह की तीव्रता को अत्यन्त मार्मिक रूप में व्यक्त किया है।

प्रसङ्ग:

राम से वियोग के कारण सीता निरन्तर उनके दर्शन की इच्छा से व्याकुल रहती हैं और आँसू बहाते हुए अपने विरह-दुःख को सहती हैं।

हिन्दी व्याख्या:

सीता को श्रीराम के दर्शन की अत्यन्त तीव्र इच्छा है। राम-वियोग में उनके लिए एक-एक क्षण कल्प के समान बीतता है। वे बार-बार अपने कमल-समान नेत्रों से आँसू बहाती हैं और उन्हें हृदय में समेटती रहती हैं। ऐसा लगता है मानो विरह का कोई ताजा घाव उनके हृदय में हो और वे उसे देखकर बार-बार धैर्य धारण कर रही हों। तुलसीदास जी कहते हैं कि सीता रात-दिन, क्षण-क्षण राम की मूर्ति को स्मरण करती हैं, फिर भी उनके शरीर की असहनीय पीड़ा दूर नहीं होती। इस विचार से उनका मन अत्यन्त व्याकुल हो उठता है।

टिप्पणी:

① अलंकार: उपमा, रूपक एवं उत्प्रेक्षा। ② रस: करुण रस। ③ छन्द: पद-गीत शैली। ④ भाव: राम-वियोग में सीता की तीव्र विरह-व्यथा, आँसुओं और दर्शन की उत्कट आकांक्षा का मार्मिक चित्रण।

पद संख्या 08

तुम्हरे बिरह भई गति जौन | चित दै सुनहु, राम करुनानिधि! जानौं कछु, पै सकौं कहि हौं न || लोचन-नीर कृपिनके धन ज्यों रहत निरन्तर लोचनन कोन | "हा धुनि-खगी लाज-पिञ्जरी महँ राखि हिये बड़े बधिक हठि मौन || जेहि बाटिका बसति, तहँ खग-मृग तजि-तजि भजे पुरातन भौन | स्वास-समीर भेण्ट भै बोरेहु, तेहि मग पगु न धर्यो तिहुँ पौन || तुलसिदास प्रभु! दसा सीयकी मुख करि कहत होति अति गौन | दीजै दरस, दूरि कीजै दुख, हौ तुम्ह आरत-आरति दौन ||

शब्दार्थ:

बिरह—वियोग। गति—दशा। करुनानिधि—करुणा के सागर। लोचन-नीर—आँसू। कृपिन—कंजूस। कोन—कोने में। धुनि—ध्वनि। खगी—पक्षी। लाज-पिञ्जरी—लज्जा की पिंजरी। बधिक—शिकारी। बाटिका—उद्यान। खग-मृग—पक्षी और पशु। पुरातन भौन—पुराने भवन। स्वास-समीर—श्वास की वायु। भेण्ट—भेंट। गौन—मन्द/क्षीण। आरत—दुःखी।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद में सीता की अत्यन्त दयनीय विरह-दशा का वर्णन है, जिसमें वे हनुमान के माध्यम से श्रीराम को अपनी स्थिति बताती हैं।

प्रसङ्ग:

सीता अपनी विरह-दशा का वर्णन करते हुए श्रीराम से करुणापूर्वक निवेदन करती हैं कि वे उनके दुःख को दूर करने के लिए दर्शन दें।

हिन्दी व्याख्या:

सीता कहती हैं कि हे करुणानिधान राम! आपके वियोग में मेरी जो दशा हुई है, उसे सुनिए। मेरी आँखों के आँसू कंजूस के धन की तरह निरन्तर आँखों के कोनों में भरे रहते हैं। जिस वाटिका में मैं रहती हूँ, वहाँ के पक्षी और पशु भी मुझे छोड़कर पुराने भवनों में चले गए हैं। यहाँ तक कि मेरी साँसों की वायु से भी वे भयभीत हो जाते हैं। सीता की यह दशा सुनाते हुए तुलसीदास जी कहते हैं कि उनका मुख अत्यन्त मलिन और क्षीण हो गया है। वे राम से प्रार्थना करती हैं कि वे दर्शन देकर उनके दुःख को दूर करें, क्योंकि वे अत्यन्त व्याकुल हैं।

टिप्पणी:

① अलंकार: उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा एवं अतिशयोक्ति। ② रस: करुण रस। ③ छन्द: पद-गीत शैली। ④ भाव: सीता की विरह-वेदना, असहायता और श्रीराम के दर्शन की उत्कट आकांक्षा का करुण चित्रण।

पद संख्या 09

कपिके सुनि कल कोमल बैन | प्रेमपुलकि सब गात सिथिल भए, भरे सलिल सरसीरुह-नैन || सिय-बियोग-सागर नागर-मनु बूड़न लग्यो सहित चित-चैन | लही नाव पवनज-प्रसन्नता, बरबस तहाँ गह्यो गुन-मैन || सकत न बूझि कुसल, बूझे बिन गिरा बिपुल ब्याकुल उर-ऐन | ज्यों कुलीन सुचि सुमति बियोगिनि सनमुख सहै बिरह-सर पैन || धरि-धरि धीर बीर कोसलपति किए जतन, सके उत्तरु दै न | तुलसिदास प्रभु सखा अनुजसों सैनहिं कह्यौ चलहु सजन सैन ||

शब्दार्थ:

कपि—हनुमान। कल—मधुर। बैन—वचन। पुलकि—रोमांचित होकर। गात—शरीर। सिथिल—शिथिल। सलिल—जल। सरसीरुह—कमल। नागर—श्रीराम। पवनज—पवनपुत्र हनुमान। गुन-मैन—गुणों में मन लगाना। कुसल—कुशल। बिरह-सर—विरह का बाण। बीर—वीर। कोसलपति—अयोध्या के राजा श्रीराम। सैन—सेना।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद में हनुमान द्वारा सीता का समाचार सुनाए जाने पर श्रीराम की भावुक एवं करुण दशा का चित्रण किया गया है।

प्रसङ्ग:

हनुमान सीता की दशा और उनका सन्देश श्रीराम को सुनाते हैं। सीता के वियोग का समाचार सुनकर श्रीराम अत्यन्त भावुक और व्याकुल हो उठते हैं।

हिन्दी व्याख्या:

हनुमान के मधुर और कोमल वचन सुनकर श्रीराम का शरीर प्रेम से पुलकित हो गया और उनके कमल-समान नेत्र आँसुओं से भर गए। सीता के वियोग का समाचार सुनकर उनका मन मानो विरह के अथाह समुद्र में डूबने लगा। हनुमान की प्रसन्नता और उनके गुणों के कारण श्रीराम को कुछ धैर्य मिला, किन्तु सीता की कुशलता का पूरा समाचार जानने से पहले उनका हृदय अत्यन्त व्याकुल रहा। वे विरह के बाण से उसी प्रकार पीड़ित थे जैसे कोई कुलीन और सद्बुद्धि वाली विरहिणी अपने प्रिय के सामने विरह की पीड़ा सहती है। श्रीराम ने धैर्य धारण करते हुए भी हनुमान के समाचार का उचित उत्तर न दे सके। अन्त में उन्होंने अपने भाई लक्ष्मण और मित्रों को सेना सहित चलने की आज्ञा दी।

टिप्पणी:

① अलंकार: उपमा, रूपक एवं उत्प्रेक्षा। ② रस: करुण रस तथा वीर रस। ③ छन्द: पद-गीत शैली। ④ भाव: सीता के समाचार से श्रीराम की भावुकता, विरह-वेदना और तत्पश्चात् युद्ध के लिए संकल्प का मार्मिक चित्रण।

पद संख्या 10

जौ हौं अब अनुसासन पावौं | तौ चन्द्रमहि निचोरि चैल-ज्यों, आनि सुधा सिर नावौं || कै पाताल दलौं ब्यालावलि अमृत-कुण्ड महि लावौं | भेदि भुवन, करि भानु बाहिरो तुरत राहु दै तावौं || बिबुध-बैद बरबस आनौं धरि, तौ प्रभु-अनुग कहावौं | पटकौं मीच नीच मूषक-ज्यौं, सबहिको पापु बहावौं || तुम्हरिहि कृपा, प्रताप तिहारेहि नेकु बिलम्ब न लावौं | दीजै सोइ आयसु तुलसी-प्रभु, जेहि तुम्हरे मन भावौं ||

शब्दार्थ:

अनुसासन—आज्ञा। चन्द्रमहि—चन्द्रमा को। निचोरि—निचोड़कर। चैल—वस्त्र। सुधा—अमृत। पाताल—पाताल लोक। ब्यालावलि—सर्पों का समूह। भुवन—लोक। भानु—सूर्य। राहु—राक्षस जो सूर्य को ग्रहण करता है। बिबुध—देवता। बैद—वैद्य। प्रभु-अनुग—प्रभु का सेवक। मीच—मृत्यु। नीच मूषक—तुच्छ चूहा। प्रताप—पराक्रम। आयसु—आज्ञा। भावौं—आपको अच्छा लगे।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद में श्रीराम के प्रति भक्त की दास्य-भावना तथा प्रभु की आज्ञा प्राप्त होने पर असम्भव कार्य को भी कर दिखाने के उत्साह का वर्णन है।

प्रसङ्ग:

भक्त श्रीराम से कहता है कि यदि मुझे आपकी आज्ञा मिल जाए तो मैं आपके कार्य की सिद्धि के लिए किसी भी असम्भव कार्य को करने में देर नहीं करूँगा।

हिन्दी व्याख्या:

भक्त श्रीराम से कहता है कि यदि मुझे आपकी आज्ञा प्राप्त हो जाए तो मैं चन्द्रमा को निचोड़कर उसमें से अमृत निकालकर आपके चरणों में अर्पित कर दूँ। आवश्यकता पड़ने पर पाताल में जाकर सर्पों के समूह को परास्त कर अमृत-कुण्ड भी ले आऊँ। तीनों लोकों को भेदकर सूर्य को बाहर निकाल दूँ और राहु को दण्डित कर दूँ। देवताओं के वैद्य को भी बलपूर्वक ले आऊँ और इस प्रकार स्वयं को आपका सच्चा सेवक सिद्ध कर दूँ। मैं मृत्यु को भी तुच्छ समझकर सबके पापों को दूर करने का प्रयत्न करूँगा। भक्त कहता है कि आपकी कृपा और प्रताप से मैं आपके किसी भी कार्य को करने में क्षणभर की देर नहीं करूँगा। अतः हे तुलसी के प्रभु! मुझे वही आज्ञा दीजिए जो आपके मन को प्रिय हो।

टिप्पणी:

① अलंकार: अतिशयोक्ति, उपमा, रूपक एवं अनुप्रास। ② रस: वीर रस तथा भक्ति रस। ③ छन्द: पद-गीत शैली। ④ भाव: प्रभु की आज्ञा के प्रति पूर्ण समर्पण, दास्य-भाव और रामकार्य के लिए असम्भव को सम्भव कर देने वाले उत्साह का चित्रण।

दोहावली

दोहा संख्या 01

राम नाम अवलंब बिनु परमारथ की आस । बरषत बारिद बूँद गहि चाहत चढ़न अकास ॥

शब्दार्थ:

अवलंब = सहारा, बिनु = बिना, परमारथ = परमार्थ, मोक्ष, आस = आशा, बरषत = बरसते हुए, बारिद = बादल, बूँद = जल की बूँद, गहि = पकड़कर, चढ़न = चढ़ना, अकास = आकाश।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है। इसमें कवि ने राम-नाम के महत्त्व को स्पष्ट किया है।

प्रसङ्ग:

कवि कहते हैं कि रामनाम का आश्रय लिए बिना मोक्ष की इच्छा करना असम्भव कार्य की आशा करना है।

हिन्दी अर्थ:

जो रामनाम का सहारा लिए बिना ही परमार्थ अर्थात मोक्ष की आशा करता है, वह तो मानो बरसते हुए बादल की बूँद को पकड़कर आकाश में चढ़ना चाहता है।

टिप्पणी:

1. अलंकार: उपमा अलंकार — रामनाम के बिना मोक्ष की आशा करने वाले की तुलना वर्षा की बूँद पकड़कर आकाश में चढ़ने वाले से की गई है।
2. रस: शांत रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: रामनाम के आश्रय के बिना मोक्ष की प्राप्ति असम्भव है।

दोहा संख्या 02

तुलसी हठि हठि कहत नित चित सुनि हित करि मानि । लाभ राम सुमिरन बड़ो बड़ी बिसारें हानि ॥

शब्दार्थ:

हठि हठि = बार-बार आग्रहपूर्वक, नित = नित्य, चित = हे मन, हित = कल्याणकारी, मानि = मानकर, लाभ = फायदा, सुमिरन = स्मरण, बड़ो = बड़ा, बिसारें = भुलाने में, हानि = नुकसान।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि अपने मन को रामनाम के स्मरण का उपदेश देते हुए उसके लाभ और विस्मरण की हानि बताते हैं।

हिन्दी अर्थ:

तुलसीदास जी नित्य निरन्तर बड़े आग्रह के साथ कहते हैं कि हे चित्त! तू मेरी बात सुनकर उसे हितकारी समझ। राम का स्मरण ही बड़ा भारी लाभ है और उसे भुलाने में ही सबसे बड़ी हानि है।

टिप्पणी:

1. अलंकार: अनुप्रास अलंकार — ‘बड़ो-बड़ी’, ‘लाभ-हानि’ आदि में ध्वनि-सौन्दर्य है।
2. रस: शांत रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: राम-स्मरण जीवन का सबसे बड़ा लाभ है और राम को भूलना सबसे बड़ी हानि है।

दोहा संख्या 03

बिगरी जनम अनेक की सुधरै अबहीं आजु । होहि राम को नाम जपु तुलसी तजि कुसमाजु ॥

शब्दार्थ:

बिगरी = बिगड़ी हुई, जनम = जन्म, अनेक = बहुत से, सुधरै = सुधर सकती है, अबहीं = अभी, आजु = आज, होहि = हो जाओ, जपु = जप करो, तजि = छोड़कर, कुसमाजु = कुसंगति, बुरा समाज।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि मनुष्य को कुसंगति छोड़कर रामनाम का जप करने की प्रेरणा देते हैं।

हिन्दी अर्थ:

तुलसीदास जी कहते हैं कि तू कुसंगति और चित्त के सारे बुरे विचारों को त्यागकर राम का बन जा और उनके नाम का जप कर। ऐसा करने से तेरी अनेक जन्मों की बिगड़ी हुई स्थिति आज अभी सुधर सकती है।

टिप्पणी:

1. अलंकार: अनुप्रास अलंकार — ‘बिगरी’, ‘जनम’, ‘सुधरै’ आदि में ध्वनि-साम्य है।
2. रस: शांत रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: कुसंगति छोड़कर रामनाम का जप करने से जीवन सुधर सकता है।

दोहा संख्या 04

ज्यों जग बैरी मीन को आपु सहित बिनु बारि । त्यों तुलसी रघुबीर बिनु गति आपनी बिचारि ॥

शब्दार्थ:

ज्यों = जैसे, जग = संसार, बैरी = शत्रु, मीन = मछली, आपु = स्वयं, बिनु = बिना, बारि = जल, त्यों = वैसे, रघुबीर = श्रीराम, गति = उपाय, स्थिति, बिचारि = विचार करके।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि श्रीराम के बिना जीव की असहाय स्थिति को जल के बिना मछली के उदाहरण से स्पष्ट करते हैं।

हिन्दी अर्थ:

जैसे जल को छोड़कर सारा जगत मछली का वैरी है, यहाँ तक कि जल के बिना वह स्वयं भी अपने लिए वैरी का कार्य करती है; उसी प्रकार तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीरघुवीर के बिना अपनी वास्तविक स्थिति पर विचार करो तो कोई गति नहीं है।

टिप्पणी:

1. अलंकार: उपमा अलंकार — राम-विहीन जीव की तुलना जल-विहीन मछली से की गई है।
2. रस: शांत रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: श्रीराम का आश्रय ही जीव के जीवन का वास्तविक आधार है।

दोहा संख्या 05

राम दूरि माया बढ़ति घटति जानि मन माँह । भूरि होति रबि दूरि लखि सिर पर पगतर छाँह ॥

शब्दार्थ:

दूरि = दूर होने पर, माया = सांसारिक मोह, बढ़ति = बढ़ती है, घटति = घटती है, जानि = जानकर, मन माँह = मन में, भूरि = बहुत, रबि = सूर्य, लखि = देखकर, सिर पर = सिर के ऊपर, पगतर = पैरों के नीचे, छाँह = छाया।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि राम और माया के पारस्परिक सम्बन्ध को सूर्य और उसकी छाया के उदाहरण से समझाते हैं।

हिन्दी अर्थ:

जैसे सूर्य को दूर देखकर छाया लम्बी हो जाती है और सूर्य जब सिर पर आ जाता है तो वह ठीक पैरों के नीचे आ जाती है, उसी प्रकार श्रीराम जी से दूर रहने पर माया बढ़ती है और जब श्रीराम जी को मन में विराजित जानती है तब घट जाती है।

टिप्पणी:

1. अलंकार: दृष्टान्त अलंकार — सूर्य और छाया के उदाहरण द्वारा राम और माया का सम्बन्ध स्पष्ट किया गया है।
2. रस: शांत रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: भगवान से दूरी बढ़ने पर माया बढ़ती है और भगवान के निकट होने पर माया का प्रभाव घट जाता है।

दोहा संख्या 06

राम कामतरु परिहरत सेवत कलि तरु ठूँठ । स्वारथ परमारथ चहत सकल मनोरथ झूँठ ॥

शब्दार्थ:

कामतरु = कल्पवृक्ष, परिहरत = छोड़कर, सेवत = सेवा करते हैं, कलि = कलियुग, तरु = वृक्ष, ठूँठ = सूखा वृक्ष, स्वारथ = सांसारिक लाभ, परमारथ = आध्यात्मिक कल्याण, चहत = चाहते हैं, सकल = सभी, मनोरथ = इच्छाएँ, झूँठ = व्यर्थ, मिथ्या।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि राम की भक्ति छोड़कर सांसारिक विषयों में सुख खोजने वालों की मूर्खता बताते हैं।

हिन्दी अर्थ:

जो मनुष्य श्रीराम रूपी कल्पवृक्ष का सेवन छोड़कर कलियुग के विषय-वासना रूपी सूखे ठूँठ वृक्ष से फल चाहते हैं, उनके सभी मनोरथ व्यर्थ जाते हैं; अर्थात वे अपना स्वार्थ तथा परमार्थ कुछ भी सिद्ध नहीं कर पाते।

टिप्पणी:

1. अलंकार: रूपक अलंकार — राम को कामतरु तथा कलियुग की विषय-वासनाओं को ठूँठ वृक्ष रूप में प्रस्तुत किया गया है।
2. रस: शांत रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: रामभक्ति छोड़कर विषयों में सुख और सफलता खोजना व्यर्थ है।

दोहा संख्या 07

तुलसी सुखी जो राम सों दुखी सो निज करतूति । करम बचन मन ठीक जेहि तेहि न सकै कलि धूति ॥

शब्दार्थ:

सुखी = सुखी, राम सों = राम से, दुखी = दुःखी, निज = अपने, करतूति = कर्म, आचरण, करम = कर्म, बचन = वचन, ठीक = उचित, शुद्ध, जेहि = जिसका, कलि = कलियुग, धूति = छल, धोखा।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि बताते हैं कि रामभक्त व्यक्ति कलियुग के छल-कपट से सुरक्षित रहता है।

हिन्दी अर्थ:

तुलसीदास जी कहते हैं कि जो मनुष्य अपने को श्रीराम की कृपा से सुखी तथा अपने क्रिया-कलाप से अपने को दुखी मानता है और अपने कर्म, वचन तथा मन को श्रीराम जी की सेवा में लगाता है, उसे कलियुग कभी भी धोखा नहीं दे सकता।

टिप्पणी:

1. अलंकार: अनुप्रास अलंकार — ‘करम, बचन, मन’ आदि में ध्वनि-सौन्दर्य है।
2. रस: शांत रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: जो मन, वचन और कर्म से राम के प्रति समर्पित रहता है, कलियुग उसका अहित नहीं कर सकता।

दोहा संख्या 08

बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल । बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल ॥

शब्दार्थ:

बारि = जल, मथें = मथने पर, घृत = घी, होइ = हो जाए, बरु = चाहे, सिकता = बालू, ते = से, तेल = तेल, बिनु = बिना, हरि भजन = भगवान का भजन, भव = संसार, तरिअ = पार किया जाए, अपेल = अटल, अकाट्य।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि हरिभजन की अनिवार्यता सिद्ध करने के लिए असम्भव उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

हिन्दी अर्थ:

जल के मथने से भले ही उसमें से घी निकल आए तथा बालू के पेरने से चाहे उसमें तेल निकल आए, किन्तु बिना हरि के भजन के संसाररूपी भवसागर को पार नहीं किया जा सकता। यह सिद्धान्त अटल है।

टिप्पणी:

1. अलंकार: अतिशयोक्ति अलंकार — जल से घी और बालू से तेल निकलने जैसी असम्भव बातें कही गई हैं।
2. रस: शांत रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: हरिभजन के बिना भवसागर से मुक्ति नहीं मिल सकती।

दोहा संख्या 09

बिनु गुरु होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु । गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु ॥

शब्दार्थ:

बिनु = बिना, गुरु = सद्गुरु, होइ = होता है, ग्यान = ज्ञान, बिराग = वैराग्य, बेद = वेद, पुरान = पुराण, सुख = आनन्द, लहिअ = प्राप्त किया जा सकता है, हरि भगति = भगवान की भक्ति।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि गुरु, ज्ञान, वैराग्य और हरिभक्ति के पारस्परिक सम्बन्ध को स्पष्ट करते हैं।

हिन्दी अर्थ:

क्या बिना गुरु के ज्ञान हो सकता है? बिना वैराग्य के ज्ञान पाना असम्भव है। सभी वेद-पुराण कहते हैं कि बिना गुरु तथा वैराग्य के ज्ञान पाना असम्भव है तथा हरि की भक्ति के बिना सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती।

टिप्पणी:

1. अलंकार: प्रश्नोक्ति अलंकार — प्रश्नों के माध्यम से ज्ञान और भक्ति का महत्त्व बताया गया है।
2. रस: शांत रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: गुरु, वैराग्य और हरिभक्ति के बिना सच्चे ज्ञान और सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती।

दोहा संख्या 10

तुलसी जाने सुनि समुझि कृपासिंधु रघुराज । महँगे मनि कंचन किए सौंधे जग जल नाज ॥

शब्दार्थ:

जाने = जाना है, सुनि = सुनकर, समुझि = समझकर, कृपासिंधु = कृपा के समुद्र, रघुराज = श्रीराम, महँगे = मूल्यवान, मनि = मणि, कंचन = सोना, किए = कर दिए, सौंधे = सस्ते, जल = पानी, नाज = अनाज।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि श्रीराम की करुणा और लोककल्याणकारी स्वरूप का वर्णन करते हैं।

हिन्दी अर्थ:

तुलसीदास जी कहते हैं कि हमने सन्त-महात्माओं से सुनकर और स्वयं के आत्मज्ञान से भली-भाँति यह जान लिया है कि भगवान श्रीराम कृपा के सागर हैं, जिन्होंने मणियों और सोने को महँगा कर दिया तथा जीवन की आवश्यकता के लिए समस्त जल और अन्न को सस्ता एवं सुलभ बना दिया।

टिप्पणी:

1. अलंकार: विरोधाभास अलंकार — मूल्यवान मणि-सोने को महँगा तथा जल-अन्न को सस्ता करने के कथन में भाव-सौन्दर्य है।
2. रस: शांत रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: भगवान ने मनुष्य के जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं को सहज-सुलभ बनाया है।

दोहा संख्या 11

सूधे मन सूधे बचन सूधी सब करतूति । तुलसी सूधी सकल बिधि रघुबर प्रेम प्रसूति ॥

शब्दार्थ:

सूधे = सरल, सीधे, मन = हृदय, बचन = वाणी, सूधी = सरल, करतूति = आचरण, सकल = सम्पूर्ण, बिधि = प्रकार से, रघुबर = श्रीराम, प्रेम = भक्ति-भाव, प्रसूति = उत्पत्ति का कारण।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि बताते हैं कि सरल मन, वचन और आचरण से भगवान के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है।

हिन्दी अर्थ:

जिसका मन, वाणी और समस्त क्रिया-कलाप सरल है, वह भगवान के प्रति प्रेम को बड़ी सरलता से उत्पन्न कर लेता है।

टिप्पणी:

1. अलंकार: अनुप्रास अलंकार — ‘सूधे मन सूधे बचन सूधी’ में ‘सू’ ध्वनि की आवृत्ति है।
2. रस: शांत रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: सरलता और निष्कपटता भगवान के प्रति प्रेम उत्पन्न करने का श्रेष्ठ साधन है।

दोहा संख्या 12

उपल बरसि गरजत तरजि डारत कुलिस कठोर । चितव कि चातक मेघ तजि कबहुँ दूसरी ओर ॥

शब्दार्थ:

उपल = ओले, बरसि = बरसकर, गरजत = गरजता है, तरजि = डराकर, डारत = गिराता है, कुलिस = वज्र, बिजली, कठोर = कठोर, चितव = देखता है, चातक = पपीहा, मेघ = बादल, तजि = छोड़कर, कबहुँ = कभी, दूसरी ओर = अन्य दिशा में।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि चातक के माध्यम से अपने आराध्य के प्रति अटूट प्रेम और निष्ठा का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

हिन्दी अर्थ:

बादल बहुत तेज गर्जना करता है, शीतल जल बरसाता है, ओले भी बरसाता है और बिजली भी गिराता है। इसके बाद भी उससे प्रेम करने वाला पपीहा क्या बादल को छोड़कर कभी किसी दूसरी ओर ताकता है? अर्थात नहीं देखता।

टिप्पणी:

1. अलंकार: प्रश्नोक्ति अलंकार — ‘कबहुँ दूसरी ओर’ प्रश्न के माध्यम से चातक की निष्ठा व्यक्त हुई है।
2. रस: भक्ति रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: सच्चा भक्त विपत्तियों में भी अपने आराध्य का आश्रय नहीं छोड़ता।

दोहा संख्या 13

नहिं जाचत नहिं संग्रही सीस नाइ नहिं लेइ । ऐसे मानी मागनेहि को बारिद बिन देइ ॥

शब्दार्थ:

जाचत = माँगता, संग्रही = संग्रह करने वाला, सीस = सिर, नाइ = झुकाकर, लेइ = लेता है, मानी = स्वाभिमानी, मागनेहि = माँगने वाले को, बारिद = बादल, बिन = बिना, देइ = देता है।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि चातक के स्वाभिमान और बादल की उदारता का वर्णन करते हैं।

हिन्दी अर्थ:

पपीहा न तो मुँह से माँगता है, न ही जल का संग्रह करता है और न ही सिर झुकाकर उसे ग्रहण करता है। ऐसे स्वाभिमानी चातक को बादल बिना माँगे ही सब कुछ दे देता है।

टिप्पणी:

1. अलंकार: अनुप्रास अलंकार — ‘नहिं’ शब्द की आवृत्ति से ध्वनि-सौन्दर्य है।
2. रस: भक्ति रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: सच्चे भक्त का स्वाभिमान और प्रभु की स्वतः कृपा दोनों अनुकरणीय हैं।

दोहा संख्या 14

कहिअ कठिन कृत कोमलहुँ हित हठि होइ सहाइ । पलक पानि पर ओड़िअत समुझि कुघाइ सुघाइ ॥

शब्दार्थ:

कहिअ = कहा जाता है, कठिन = कठिन, कृत = कार्य, कोमलहुँ = कोमल में भी, हित = हित के लिए, हठि = दृढ़तापूर्वक, सहाइ = सहायता करने वाला, पलक = पलक, पानि = पानी, ओड़िअत = ढकती है, कुघाइ = बुरा आघात, सुघाइ = अच्छा आघात।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि सच्चे हितैषी के स्वभाव को आँख और पलक के उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते हैं।

हिन्दी अर्थ:

सच्चा हितैषी उसी को कहना चाहिए जो सभी परिस्थितियों में, चाहे वे सामान्य हों अथवा कठिन, अपने से सहायता करने के लिए तैयार हो जाता है। जैसे आँख की पुतली आँख पर जरा सा भी आघात पड़ने पर उसे छिपा लेती है और सिर अथवा पीठ पर आघात को सहने के लिए हाथ स्वयमेव तैयार हो जाते हैं।

टिप्पणी:

1. अलंकार: दृष्टान्त अलंकार — आँख और पलक के उदाहरण से सच्चे हितैषी का गुण स्पष्ट किया गया है।
2. रस: शांत रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: सच्चा हितैषी कठिन से कठिन परिस्थिति में भी अपने प्रिय की रक्षा करता है।

दोहा संख्या 15

हृदयँ कपट बर बेष धरि बचन कहहिं गढ़ि छोलि । अब के लोग मयूर ज्यों क्यों मिलिए मन खोलि ॥

शब्दार्थ:

हृदयँ = हृदय में, कपट = छल, बर = सुन्दर, बेष = वेश, धरि = धारण करके, बचन = बातें, गढ़ि = बनाकर, छोलि = चिकनी-चुपड़ी, अब के लोग = आजकल के लोग, मयूर = मोर, मन खोलि = हृदय खोलकर, निष्कपट होकर।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि आधुनिक मनुष्यों के बाहरी सौन्दर्य और आन्तरिक कपट की तुलना मोर से करते हैं।

हिन्दी अर्थ:

आजकल के लोग मोर के समान हैं, जो बाहर से देखने में अत्यन्त सुन्दर लगता है, किन्तु अन्दर से वह इतना कठोर है कि बड़े से बड़े जहरीले साँपों को खा जाता है। उसी तरह पुरुष भी बाहर से देखने में बहुत सुन्दर दिखाई पड़ता है और चिकनी-चुपड़ी बातें करता है, किन्तु हृदय में कपट धारण करता है।

टिप्पणी:

1. अलंकार: उपमा अलंकार — आजकल के लोगों की तुलना मोर से की गई है।
2. रस: शान्त रस के साथ हास्य-व्यंग्य का भाव।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: बाहरी रूप और मधुर वाणी देखकर किसी व्यक्ति पर विश्वास नहीं करना चाहिए; हृदय की निष्कपटता ही श्रेष्ठ है।

दोहा संख्या 16

सुजन सुतरु बन ऊख सम खल टंकिका रुखान । परहित अनहित लागि सब साँसति सहर समान ॥

शब्दार्थ:

सुजन = सज्जन, सुतरु = उत्तम वृक्ष, ऊख = गन्ना, खल = दुष्ट, टंकिका = टाँकी, रुखान = रुखानी, औजार, परहित = दूसरों का हित, अनहित = दूसरों का अहित, लागि = लिए, साँसति = कष्ट, सहर = सहन करना।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि सज्जन और दुर्जन दोनों के कष्ट सहने की प्रवृत्ति में अन्तर बताते हैं।

हिन्दी अर्थ:

सज्जन पुरुष कपास और ऊख की तरह होते हैं तथा दुर्जन लोग टाँकी और रुखानी की तरह होते हैं। दोनों समान रूप से कष्ट सहते हैं, किन्तु एक पराए हित के लिए तथा दूसरा दूसरों के अहित के लिए दुःख सहता है।

टिप्पणी:

1. अलंकार: उपमा अलंकार — सज्जनों और दुर्जनों की तुलना विभिन्न वस्तुओं से की गई है।
2. रस: शांत रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: सज्जन दूसरों के हित के लिए कष्ट सहते हैं, जबकि दुर्जन दूसरों का अहित करने में कष्ट सहते हैं।

दोहा संख्या 17

ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग । होहिं कुबस्तु सुबस्तु जल लखहिं सुलच्छन लोग ॥

शब्दार्थ:

ग्रह = ग्रह, भेषज = औषधि, जल = पानी, पवन = वायु, पट = वस्त्र, पाइ = पाकर, कुजोग = बुरा संयोग, सुजोग = अच्छा संयोग, कुबस्तु = बुरी वस्तु, सुबस्तु = अच्छी वस्तु, लखहिं = देखते/समझते हैं, सुलच्छन = गुणवान।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि संगति के प्रभाव को ग्रह, औषधि, जल, वायु और वस्त्र आदि के उदाहरण से समझाते हैं।

हिन्दी अर्थ:

ग्रह, औषधि, पानी, वायु तथा वस्त्र इत्यादि को यदि संगति अच्छी मिल जाती है तो अच्छा हो जाता है और बुरी संगति में वह बुरा हो जाता है। इस रहस्य को कोई गुणवान व्यक्ति भी जानता है।

टिप्पणी:

1. अलंकार: दृष्टान्त अलंकार — विभिन्न वस्तुओं के उदाहरण द्वारा संगति के प्रभाव को स्पष्ट किया गया है।
2. रस: शांत रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: संगति के अनुसार वस्तु और व्यक्ति दोनों के गुण-दोष बदल सकते हैं, इसलिए सत्संगति आवश्यक है।

दोहा संख्या 18

आखर जोरि बिचार करु सुमति अंक लिखि लेखु । जोग कुजोग सुजोग मय जग गति समुझि बिसेषु ॥

शब्दार्थ:

आखर = अक्षर, जोरि = जोड़कर, बिचार = विचार, करु = करो, सुमति = अच्छी बुद्धि, अंक = संख्या, लेखु = लिखो, जोग = संयोग, कुजोग = बुरा संयोग, सुजोग = अच्छा संयोग, जग गति = संसार की स्थिति, बिसेषु = विशेष रूप से।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि अक्षरों और अंकों के उदाहरण से सत्संगति और कुसंगति के प्रभाव को स्पष्ट करते हैं।

हिन्दी अर्थ:

तुलसीदास जी कहते हैं कि सद्संगति से संसार अच्छा हो जाता है और कुसंगति से समस्त संसार बुरा हो जाता है। यह बात अक्षरों को जोड़कर विचार कर लो अथवा अंकों को लिखकर समझ लो। जैसे धर्म के पहले ‘अ’ जोड़ने पर वह अधर्म हो जाएगा और अधर्म के आगे ‘हीन’ जोड़ने पर अधर्महीन बन जाएगा। इसी तरह एक के पहले शून्य लगाने पर उसका कोई मूल्य नहीं है तथा एक के बाद शून्य लगाने पर उसका मूल्य दसगुना हो जाएगा।

टिप्पणी:

1. अलंकार: दृष्टान्त अलंकार — अक्षरों और अंकों के उदाहरण द्वारा संगति के प्रभाव को समझाया गया है।
2. रस: शांत रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: अच्छी संगति व्यक्ति के गुण और मूल्य को बढ़ाती है, जबकि बुरी संगति उसे पतन की ओर ले जाती है।

दोहा संख्या 19

प्रभु समीप गत सुजन जन होत सुखद सुबिचार । लवन जलधि जीवन जलद बरषत सुधा सुबारि ॥

शब्दार्थ:

प्रभु = भगवान श्रीराम, समीप = निकट, गत = पहुँचे हुए, सुजन = सज्जन, सुखद = सुख देने वाले, सुबिचार = अच्छी तरह विचार करो, लवन = नमक, जलधि = समुद्र, जीवन = जीवनदायक, जलद = बादल, बरषत = बरसाता है, सुधा = अमृत, सुबारि = उत्तम जल।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि भगवान के निकट रहने वाले सज्जनों की तुलना समुद्र का जल पीकर मीठा जल बरसाने वाले बादल से करते हैं।

हिन्दी अर्थ:

प्रभु श्रीराम की शरण में रहने वाले सज्जन पुरुष सबको सुख प्रदान करने वाले होते हैं। यह बात अच्छी तरह से विचार लो। बादल भले ही समुद्र का खारा जल पीता है, किन्तु वह सबको खारा जल न देकर सुन्दर अमृत के समान जल बरसाता है।

टिप्पणी:

1. अलंकार: दृष्टान्त अलंकार — समुद्र के खारे जल को ग्रहण करके बादल द्वारा मीठा जल बरसाने का उदाहरण सज्जनों के लिए दिया गया है।
2. रस: शांत रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: सत्पुरुष अपने सम्पर्क में आने वाले लोगों को सद्गुण और सुख प्रदान करते हैं।

दोहा संख्या 20

नीच निरावहिं निरस तरु तुलसी सींचहिं ऊख । पोषत पयद समान सब बिष पियूष के रूख ॥

शब्दार्थ:

नीच = नीच व्यक्ति, निरावहिं = उखाड़ देते हैं, निरस = रसहीन, तरु = वृक्ष, सींचहिं = सींचते हैं, ऊख = गन्ना, पयद = बादल, पोषत = पोषण करता है, समान = समान रूप से, बिष = विष, पियूष = अमृत, रूख = वृक्ष।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि नीच मनुष्य और बादल के व्यवहार की तुलना करते हुए सज्जनता का महत्त्व बताते हैं।

हिन्दी अर्थ:

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि नीच (मूर्ख) पुरुष रसहीन (सूखे) वृक्षों को तो खेत से उखाड़ फेंकते हैं और रस वाले वृक्ष (ऊख) को सींचते हैं, परन्तु बादल सभी प्रकार के वृक्षों (विषयुक्त, रसयुक्त) का समान रूप से पोषण करता है।

टिप्पणी:

1. अलंकार: उपमा अलंकार — नीच व्यक्ति और बादल के व्यवहार का तुलनात्मक चित्रण है।
2. रस: शांत रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: सज्जन व्यक्ति बिना भेदभाव के सबका हित करता है, जबकि नीच व्यक्ति स्वार्थ के अनुसार व्यवहार करता है।

दोहा संख्या 21

देस काल करता करम बचन बिचार बिहीन । ते सुरतरु तर दारिदी सुरसरि तीर मलीन ॥

शब्दार्थ:

देस = देश, स्थान, काल = समय, करता = कर्ता, व्यक्ति, करम = कर्म, बचन = वचन, बिचार बिहीन = विचार से रहित, सुरतरु = कल्पवृक्ष, तर = नीचे, दारिदी = दरिद्र, सुरसरि = गंगा, तीर = किनारा, मलीन = पापी, अपवित्र।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि उचित देश-काल और कर्म के ज्ञान के महत्त्व को कल्पवृक्ष और गंगा के उदाहरण से बताते हैं।

हिन्दी अर्थ:

जिनको अपने देश-काल, समय, कार्य, कर्म और अपने वचन का विचार नहीं रहता, अर्थात जो इस बात का विचार नहीं करते कि उन्हें किस स्थान पर कैसा कर्म करना चाहिए, जिनको अपने का समझ नहीं है, वह व्यक्ति कल्पवृक्ष के नीचे रहने पर भी दरिद्र है तथा गंगा जी के घाट पर बसकर भी पापी है।

टिप्पणी:

1. अलंकार: दृष्टान्त अलंकार — कल्पवृक्ष और गंगा के उदाहरण द्वारा विवेक के महत्त्व को स्पष्ट किया गया है।
2. रस: शांत रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: अनुकूल स्थान और अवसर मिलने पर भी विवेकहीन व्यक्ति उसका लाभ नहीं उठा सकता।

दोहा संख्या 22

जो परि पायँ मनाइए तासों रूठि बिचारि । तुलसी तहाँ न जीतिऐ जहँ जीतेहूँ हारि ॥

शब्दार्थ:

परि पायँ = पैर पड़कर, मनाइए = मनाते हैं, तासों = उससे, रूठि = रूठकर, बिचारि = विचार करके, तहाँ = वहाँ, जीतिऐ = जीतना चाहिए, जहँ = जहाँ, जीतेहूँ = जीतने पर भी, हारि = हार जाना।

सन्दर्भ:

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि माता-पिता, गुरु तथा बड़ों के प्रति विनम्रता और व्यवहार-कौशल का उपदेश देते हैं।

हिन्दी अर्थ:

जिन (माता-पिता, गुरुजन, अपने से बड़े आदि) का प्रतिदिन पैर छूते हो, उनसे बहुत ही सोच-विचार कर रूठना चाहिए, क्योंकि तुलसीदास जी कहते हैं कि जहाँ जीतकर भी आप नहीं जीत सकते, वहाँ आपको जीतना भी नहीं चाहिए, अर्थात हार जाना चाहिए।

टिप्पणी:

1. अलंकार: विरोधाभास अलंकार — ‘जीतेहूँ हारि’ में जीतकर भी हारने का विरोधाभासी कथन है।
2. रस: शांत रस।
3. छन्द: दोहा।
4. भाव: माता-पिता, गुरु और बड़ों के सामने अहंकारपूर्वक विजय प्राप्त करना वास्तविक विजय नहीं है; विनम्रता ही श्रेष्ठ आचरण है।

विनयपत्रिका

पद संख्या 01

एसी मूढता या मन की। परिहरि रामभगति-सुरसरिता, आस करत ओसकन की। धूम समूह निरखि-चातक ज्यौं, तृषित जानि मति धन की। नहिं तहं सीतलता न बारि, पुनि हानि होति लोचन की। ज्यौं गज काँच बिलोकि सेन जड़ छांह आपने तन की। टूटत अति आतुर अहार बस, छति बिसारि आनन की। कहं लौ कहौ कुचाल कृपानिधि, जानत हों गति मन की। तुलसिदास प्रभु हरहु दुसह दुख, करहु लाज निज पन की। 1

शब्दार्थ:

मूढ़ता = अज्ञानता, परिहरि = छोड़कर, रामभगति = राम की भक्ति, सुरसरिता = गंगा, आस = आशा, ओसकन = ओस की बूँदें, धूम = धुआँ, समूह = समूह, निरखि = देखकर, चातक = एक पक्षी, तृषित = प्यासा, मति = बुद्धि, बारि = जल, लोचन = नेत्र, गज = हाथी, काँच = शीशा, छाँह = छाया, आहार = भोजन, छति = क्षति, आनन = मुख, कुचाल = बुरी चाल, कृपानिधि = कृपा के भंडार, दुसह = असह्य, पन = प्रण।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद गोस्वामी तुलसीदास की प्रसिद्ध कृति विनय पत्रिका से उद्धृत है।

प्रसङ्ग:

कवि अपने मन की मूढ़ता और सांसारिक विषयों के प्रति आकर्षण पर पश्चात्ताप करते हुए श्रीराम से अपनी रक्षा की प्रार्थना करता है।

हिन्दी अर्थ:

कवि कहता है कि मेरे मन की कैसी मूर्खता है कि रामभक्ति रूपी गंगा को छोड़कर ओस की बूँदों के समान क्षणभंगुर सांसारिक सुखों की आशा करता है। जैसे चातक धुएँ के समूह को बादल समझकर प्यासा रह जाता है, वैसे ही विषय-सुखों में वास्तविक शान्ति नहीं मिलती। जैसे हाथी शीशे में अपनी छाया देखकर उससे लड़ता है और स्वयं ही अपना मुख घायल कर लेता है, वैसे ही मेरा मन अपनी ही कुचाल से दुख पाता है। अतः तुलसीदास श्रीराम से अपने असह्य दुःख दूर करने और अपने प्रण की लाज रखने की प्रार्थना करते हैं।

टिप्पणी:

1. अलंकार: उपमा, दृष्टान्त एवं रूपक अलंकार। 2. रस: भक्ति रस। 3. छन्द: पद-प्रधान छन्द। 4. भाव: सांसारिक विषय-सुखों की निरर्थकता और रामभक्ति की महत्ता को स्पष्ट करते हुए कवि अपने मन की चंचलता के लिए पश्चात्ताप करता है तथा प्रभु से दुःख दूर करने की प्रार्थना करता है।

पद संख्या 02

जाउँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे। काको नाम पतित-पावन जग, केहि अति दीन पियारे ॥ १ ॥ कौने देव बराइ बिरद-हित, हठि हठि अधम उधारे। खग, मृग, ब्याध, पषान, बिटप जड़, जवन कवन सुर तारे ॥ २ ॥ देव, दनुज, मुनि, नाग, मनुज सब, माया-बिबस बिचारे। तिनके हाथ दासतुलसी प्रभु, कहा अपनपौ हारे ॥ ३ ॥

शब्दार्थ:

तजि = छोड़कर, चरन = चरण, काको = किसका, पतित-पावन = पापियों का उद्धार करने वाला, दीन = असहाय, पियारे = प्यारे, बराइ = बढ़ाकर, बिरद = यश/प्रतिज्ञा, अधम = नीच, उधारे = उद्धार किया, खग = पक्षी, मृग = हिरन, ब्याध = शिकारी, पषान = पत्थर, बिटप = वृक्ष, जड़ = चेतनारहित, जवन = यवन, सुर = देवता, दनुज = दैत्य, मुनि = ऋषि, नाग = सर्प/नाग, मनुज = मनुष्य, माया-बिबस = माया के वश में, दासतुलसी = दास तुलसी, अपनपौ = अपना अधिकार/स्वत्व।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद विनय पत्रिका से उद्धृत है।

प्रसङ्ग:

कवि श्रीराम के चरणों को छोड़कर अन्य किसी आश्रय को स्वीकार नहीं करना चाहता और प्रभु की पतित-पावन महिमा का स्मरण करता है।

हिन्दी अर्थ:

कवि कहता है कि हे प्रभु! आपके चरणों को छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ? संसार में आपके अतिरिक्त पतितों को पवित्र करने वाला कौन है? आपने अनेक अधम प्राणियों का भी उद्धार किया है। पक्षी, पशु, शिकारी, पत्थर, वृक्ष आदि तक को आपने तार दिया। देवता, दैत्य, मुनि, नाग और मनुष्य सभी आपकी माया के वश में हैं। इसलिए तुलसीदास स्वयं को आपका दास मानकर पूछता है कि वह अपनी सत्ता किसके हाथ हार सकता है?

टिप्पणी:

1. अलंकार: उदाहरण एवं प्रश्नोक्ति अलंकार। 2. रस: भक्ति रस। 3. छन्द: पद-प्रधान छन्द। 4. भाव: भगवान राम की पतित-पावन और शरणागतवत्सल महिमा का वर्णन करते हुए कवि उनकी अनन्य शरणागति स्वीकार करता है।

पद संख्या 03

हरि! तुम बहुत अनुग्रह किन्हों। साधन-नाम बिबुध दुरलभ तनु, मोहि कृपा करि दीन्हों॥१॥ कोटिहुँ मुख कहि जात न प्रभुके, एक एक उपकार। तदपि नाथ कछु और माँगिहौं, दीजै परम उदार॥२॥ बिषय-बारि मन-मीन भिन्न नहिं होत कबहुँ पल एक। ताते सहौं बिपति अति दारुन, जनमत जोनि अनेक॥३॥ कृपा डोरि बनसी पद अंकुस, परम प्रेम-मृदु चारो। एहि बिधि बेगि हरहु मेरो दुख कौतुक राम तिहारो॥४॥ हैं स्त्रुति बिदित उपाय सकल सुर, केहि केहि दीन निहोरै। तुलसीदास यहि जीव मोह रजु, जोइ बाँध्यो सोइ छोरै॥५॥ 3

शब्दार्थ:

अनुग्रह = कृपा, साधन = साधना, बिबुध = देवताओं को, दुरलभ = दुर्लभ, तनु = शरीर, उपकार = कृपा/भलाई, तदपि = फिर भी, उदार = दयालु, बिषय-बारि = विषय रूपी जल, मन-मीन = मन रूपी मछली, बिपति = विपत्ति, दारुन = भयंकर, जोनि = योनियाँ, बनसी = मछली पकड़ने की काँटी, अंकुस = अंकुश, मृदु = कोमल, चारो = चारा, बिधि = प्रकार, बेगि = शीघ्र, स्त्रुति = स्तुति, निहोरै = विनती करता है, मोह रजु = मोह की रस्सी, बाँध्यो = बाँधा, छोरै = छुड़ाता है।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद तुलसीदास की विनय पत्रिका से उद्धृत है।

प्रसङ्ग:

कवि दुर्लभ मनुष्य-शरीर प्रदान करने के लिए प्रभु का धन्यवाद करता है और विषय-वासनाओं से मुक्त करने की प्रार्थना करता है।

हिन्दी अर्थ:

हे हरि! आपने मुझ पर बहुत कृपा की और देवताओं के लिए भी दुर्लभ मनुष्य शरीर प्रदान किया। आपके एक-एक उपकार का वर्णन करोड़ों मुखों से भी नहीं हो सकता। फिर भी मैं आपसे एक और वर माँगता हूँ कि मेरे मन रूपी मछली को विषय रूपी जल से निकाल लें। कृपा की डोरी, चरणों के अंकुश और प्रेम रूपी कोमल चारे से मेरे दुःख को शीघ्र दूर करें। जिस प्रभु ने जीव को मोह की रस्सी से बाँधा है, वही उसे इससे मुक्त कर सकता है।

टिप्पणी:

1. अलंकार: रूपक, उपमा एवं दृष्टान्त अलंकार। 2. रस: भक्ति रस। 3. छन्द: पद-प्रधान छन्द। 4. भाव: मनुष्य जन्म को प्रभु की महान कृपा मानकर कवि विषय-वासनाओं से मुक्त होकर भगवान की शरण प्राप्त करने की प्रार्थना करता है।

पद संख्या 04

अब लौं नसानी, अब न नसैहों। रामकृपा भव-निसा सिरानी जागे फिर न डसैहौं॥ पायो नाम चारु चिंतामनि उर करतें न खसैहौं। स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी चित कंचनहिं कसैहौं॥ परबस जानि हँस्यो इन इंद्रिन निज बस ह्वै न हँसैहौं। मन मधुपहिं प्रन करि, तुलसी रघुपति पदकमल बसैहौं॥ 4

शब्दार्थ:

अब लौं = अब तक, नसानी = नष्ट हुई/भटकी, भव-निसा = संसार रूपी रात्रि, सिरानी = समाप्त हुई, चारु = सुंदर, चिंतामणि = मनोकामना पूर्ण करने वाला रत्न, उर = हृदय, स्याम रूप = श्रीराम का श्याम वर्ण रूप, सुचि = पवित्र, रुचिर = सुंदर, कसौटी = सोना जाँचने का पत्थर, कंचन = सोना, परबस = पराधीन, इंद्रिन = इन्द्रियों, निज बस = अपने वश में, मधुप = भौंरा, प्रन = प्रण, पदकमल = चरणकमल।

सन्दर्भ:

यह पद विनय पत्रिका से उद्धृत है।

प्रसङ्ग:

कवि सांसारिक मोह से जागकर रामनाम की महिमा को पहचानता है और अब इन्द्रियों के वश में न रहने का संकल्प करता है।

हिन्दी अर्थ:

कवि कहता है कि अब तक मेरा जीवन व्यर्थ चला गया, पर अब मैं ऐसा नहीं करूँगा। राम की कृपा से संसार रूपी रात्रि समाप्त हो गई है और मैं जाग गया हूँ। मुझे रामनाम रूपी चिंतामणि प्राप्त हो गई है, जिसे मैं हृदय से कभी नहीं गिरने दूँगा। राम के सुंदर श्याम रूप को कसौटी मानकर अपने चित्त रूपी सोने को शुद्ध करूँगा। अब इन्द्रियों के पराधीन होकर नहीं हँसूँगा और अपने मन रूपी भौंरे को रघुनाथ के चरणकमलों में बसाने का प्रण करता हूँ।

टिप्पणी:

1. अलंकार: रूपक एवं उपमा अलंकार। 2. रस: भक्ति एवं शान्त रस। 3. छन्द: पद-प्रधान छन्द। 4. भाव: रामकृपा से मोह और अज्ञान का नाश होने पर कवि रामनाम में दृढ़ विश्वास तथा इन्द्रिय-संयम का संकल्प व्यक्त करता है।

पद संख्या 05

ऐसो को उदार जग माहीं। बिनु सेवा जो द्रवै दीनपर राम सरिस कोउ नाहीं।। जो गति जोग बिराग जतन करि नहिं पावत मुनि ग्यानी। सो गति देत गीध सबरी कहँ प्रभु न बहुत जिय जानी।। जो सम्पति दस सीस अरप करि रावन सिव पहँ लीन्हीं। सो संपदा बिभीषन कहँ अति सकुच-सहित हरि दीन्हीं।। तुलसीदास सब भाँति सकल सुख जो चाहसि मन मेरो। तौ भजु राम, काम सब पूरन करैं कृपानिधि तेरो।। 5

शब्दार्थ:

उदार = दयालु, द्रवै = द्रवित होता है, दीनपर = दीनों पर, गति = अवस्था/मोक्ष, जोग = योग, बिराग = वैराग्य, जतन = प्रयास, मुनि = ऋषि, ग्यानी = ज्ञानी, गीध = गिद्ध, सबरी = शबरी, दस सीस = दस सिर वाला रावण, अरप = अर्पित करके, संपदा = धन/वैभव, बिभीषन = विभीषण, सकुच = संकोच, कृपानिधि = कृपा के भंडार।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद विनय पत्रिका से लिया गया है।

प्रसङ्ग:

कवि भगवान राम की उदारता और दीन-दुखियों पर उनकी कृपा का वर्णन करता है।

हिन्दी अर्थ:

कवि कहता है कि संसार में राम जैसा उदार कोई नहीं है। वे बिना किसी सेवा के भी दीनों पर द्रवित हो जाते हैं। जिस गति को योग और वैराग्य के द्वारा बड़े-बड़े ज्ञानी मुनि भी प्राप्त नहीं कर पाते, वही गति उन्होंने गिद्ध और शबरी को प्रदान की। रावण ने अपने सिर शिव को अर्पित करके जो संपत्ति प्राप्त की थी, वही संपत्ति भगवान ने संकोचपूर्वक विभीषण को दे दी। इसलिए हे मेरे मन! यदि तू सभी प्रकार के सुख चाहता है तो राम का भजन कर; कृपानिधि राम तेरी सभी कामनाएँ पूरी करेंगे।

टिप्पणी:

1. अलंकार: दृष्टान्त एवं अतिशयोक्ति अलंकार। 2. रस: भक्ति रस। 3. छन्द: पद-प्रधान छन्द। 4. भाव: भगवान राम की असीम उदारता, दीनवत्सलता और भक्तों पर समान कृपा का गुणगान करते हुए कवि रामभक्ति को सभी सुखों का साधन बताता है।

पद संख्या 06

कबहुंक हौं यहि रहनि रहौंगो। श्री रघुनाथ-कृपाल-कृपा तैं, संत सुभाव गहौंगो। जथालाभ संतोष सदा, काहू सों कछु न चहौंगो। परहित निरत निरंतर, मन क्रम बचन नेम निबहौंगो। परुष बचन अति दुसह स्रवन, सुनि तेहि पावक न दहौंगो। बिगत मान सम सीतल मन, पर-गुन, नहिं दोष कहौंगो। परिहरि देहजनित चिंता दुख सुख समबुद्धि सहौंगो। तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि अबिचल हरिभक्ति लहौंगो। 6

शब्दार्थ:

कबहुंक = कभी, रहनि = आचरण/जीवन-पद्धति, कृपाल = दयालु, संत सुभाव = संतों का स्वभाव, जथालाभ = जैसा प्राप्त हो, संतोष = तृप्ति, परहित = दूसरों का हित, निरत = लगे हुए, नेम = नियम, परुष बचन = कठोर वचन, दुसह = असह्य, स्रवन = कान, पावक = अग्नि, बिगत मान = अहंकाररहित, पर-गुन = दूसरों के गुण, परिहरि = छोड़कर, देहजनित = शरीर से उत्पन्न, समबुद्धि = समान भाव, अबिचल = अडिग, हरिभक्ति = भगवान की भक्ति।

सन्दर्भ:

यह पद गोस्वामी तुलसीदास की विनय पत्रिका से उद्धृत है।

प्रसङ्ग:

कवि भगवान राम से कृपा माँगता है कि वह संतों के समान जीवन बिताते हुए संतोष, परहित और समभाव का पालन कर सके।

हिन्दी अर्थ:

कवि प्रार्थना करता है कि श्रीरघुनाथ की कृपा से वह संतों के समान आचरण करे। जो कुछ मिले उसमें संतोष रखे, किसी से कुछ न चाहे और मन, कर्म तथा वचन से निरन्तर परोपकार में लगा रहे। दूसरों के कठोर वचन सुनकर भी क्रोधित न हो। अहंकार छोड़कर शीतल मन से दूसरों के गुणों को देखे और दोष न कहे। शरीर से उत्पन्न सुख-दुःख की चिन्ता छोड़कर दोनों को समान भाव से सहन करे तथा इसी मार्ग पर अडिग रहकर हरिभक्ति प्राप्त करे।

टिप्पणी:

1. अलंकार: अनुप्रास एवं विरोधाभास की छटा। 2. रस: शान्त एवं भक्ति रस। 3. छन्द: पद-प्रधान छन्द। 4. भाव: कवि संतों के आदर्श आचरण को अपनाने की कामना करता है और संतोष, परोपकार, क्षमा, विनय तथा समभाव को सच्ची भक्ति का आधार मानता है।

पद संख्या 07

जाके प्रिय न राम-बैदेही। तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही॥ तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषण बंधु, भरत महतारी। बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी॥ नाते नेह राम के मनियत सुहृद सुसेब्य जहाँ लौं। अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं॥ तुलसी सो सब भाँति परम हित पूज्य प्रानते प्यारो। जासो होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो॥ 7

शब्दार्थ:

जाके = जिसे, प्रिय = प्यारा, बैदेही = सीता, तजिये = छोड़ देना चाहिए, बैरी = शत्रु, सनेही = प्रेम करने वाला, तज्यो = छोड़ा, महतारी = माता, बलि = राजा बलि, गुरु = शिक्षक, कंत = पति, ब्रज-बनितन्हि = ब्रज की स्त्रियों ने, मुद-मंगलकारी = आनंद और मंगल करने वाले, नाते = संबंध, सुहृद = मित्र, सुसेब्य = अच्छी तरह सेवा करने योग्य, अंजन = काजल, फूटै = फोड़ दे/नष्ट कर दे, प्रानते = प्राणों से, राम-पद = राम के चरण।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद विनय पत्रिका से उद्धृत है।

प्रसङ्ग:

कवि रामभक्ति की श्रेष्ठता बताते हुए उन लोगों से दूर रहने की शिक्षा देता है जिन्हें राम और सीता प्रिय नहीं हैं।

हिन्दी अर्थ:

जिस व्यक्ति को राम और सीता प्रिय नहीं हैं, उसे चाहे वह कितना ही घनिष्ठ क्यों न हो, करोड़ों शत्रुओं के समान छोड़ देना चाहिए। प्रह्लाद ने पिता, विभीषण ने भाई, भरत ने माता, बलि ने गुरु और ब्रज की स्त्रियों ने पति तक का त्याग किया और वे मंगलमय बने। संसार में वही संबंध और मित्रता उचित है जो राम के प्रति प्रेम में बाधक न हो। जिस प्रकार आँख फोड़ने वाला काजल हितकारी नहीं हो सकता, उसी प्रकार रामभक्ति से विमुख व्यक्ति हितकारी नहीं हो सकता।

टिप्पणी:

1. अलंकार: उपमा, दृष्टान्त एवं उदाहरण अलंकार। 2. रस: भक्ति रस। 3. छन्द: पद-प्रधान छन्द। 4. भाव: कवि के अनुसार रामभक्ति से बढ़कर कोई संबंध नहीं है; जो व्यक्ति भगवान से प्रेम नहीं करता, उससे सांसारिक स्नेह भी त्याग देना चाहिए।

पद संख्या 08

मन पछितैहै अवसर बीते। दुर्लभ देह पाइ हरिपद भजु, करम, बचन अरु हीते॥१॥ सहसबाहु, दसबदन आदि नप बचे न काल बलीते। हम हम करि धन-धाम सँवारे, अंत चले उठि रीते॥२॥ सुत-बनितादि जानि स्वारथरत न करु नेह सबहीते। अंतहु तोहिं तजेंगे पामर! तू न तजै अबहीते॥३॥ अब नाथहिं अनुरागु जागु जड़, त्यागु दुरासा जीते। बुझै न काम-अगिनि तुलसी कहुँ, बिषयभोग बहु घी ते॥४॥ 8

शब्दार्थ:

पछितैहै = पछताएगा, अवसर = अवसर, दुर्लभ देह = दुर्लभ मनुष्य शरीर, हरिपद = भगवान के चरण, भजु = भजन करो, करम = कर्म, बचन = वचन, हीते = हृदय से/हितपूर्वक, सहसबाहु = सहस्रबाहु, दसबदन = दस सिर वाला रावण, नप = राजा, काल बलीते = शक्तिशाली काल से, धन-धाम = धन और घर, रीते = खाली, सुत = पुत्र, बनिता = पत्नी, स्वारथरत = स्वार्थ में लगे हुए, पामर = मूर्ख, अबहीते = अभी, अनुरागु = प्रेम, दुरासा = बुरी आशा, काम-अगिनि = कामना की अग्नि, बिषयभोग = विषयों के भोग।

सन्दर्भ:

यह पद विनय पत्रिका से उद्धृत है।

प्रसङ्ग:

कवि मनुष्य शरीर की दुर्लभता बताते हुए मन को चेतावनी देता है कि जीवन का अवसर निकल जाने पर पछताना पड़ेगा।

हिन्दी अर्थ:

हे मन! यदि यह अवसर निकल गया तो बाद में पछताएगा। दुर्लभ मनुष्य शरीर पाकर कर्म, वचन और हृदय से भगवान का भजन कर। सहस्रबाहु और रावण जैसे शक्तिशाली राजा भी काल से नहीं बच सके। मनुष्य धन और घर को अपना-अपना कहते हुए सँवारता रहता है, पर अंत में सब कुछ छोड़कर खाली हाथ चला जाता है। पुत्र-पत्नी आदि स्वार्थ में लगे रहते हैं, इसलिए उन पर अत्यधिक मोह मत कर। अब अपनी बुद्धि को जगाकर भगवान में प्रेम कर और विषयों की बुरी आशाओं का त्याग कर, क्योंकि विषय-भोगों से कामना की अग्नि कभी नहीं बुझती।

टिप्पणी:

1. अलंकार: दृष्टान्त एवं उपमा अलंकार। 2. रस: शान्त, भक्ति एवं निर्वेद भाव। 3. छन्द: पद-प्रधान छन्द। 4. भाव: मनुष्य जीवन की क्षणभंगुरता और सांसारिक मोह की निरर्थकता समझाकर कवि तत्काल भगवान के भजन में लगने की प्रेरणा देता है।

पद संख्या 09

लाभ कहा मानुष-तनु पाये। काय-बचन-मन सपनेहु कबहुँक घटत न काज पराये॥१॥ जो सुख सुरपुर नरक गेह बन आवत बिनहि बुलाये। तेहि सुख कहँ बहु जतन करत मन समुझत नहिं समुझाये॥२॥ पर-दारा परद्रोह, मोह-बस किये मूढ़ मन भाये। गरभबास दुखरासि जातना तीब्र बिपति बिसराये॥३॥ भय, निद्रा, मैथुन, अहार सबके समान जग जाये। सुर दुरलभ तनु धरि न भजे हरि मद अभिमान गँवाये॥४॥ गई न निज-पर बुद्धि सुद्ध ह्वै रहे राम-लय लाये। तुलसीदास यह अवसर बीते का पुनिके पछिताये॥५॥ 9

शब्दार्थ:

लाभ = लाभ/उपयोग, मानुष-तनु = मनुष्य शरीर, काय = शरीर, बचन = वचन, सपनेहु = स्वप्न में भी, पराये = दूसरों के, सुरपुर = स्वर्ग, नरक = अधोलोक, गेह = घर, बन = वन, बिनहि बुलाये = बिना बुलाए, पर-दारा = दूसरे की स्त्री, परद्रोह = दूसरों से शत्रुता, मोह-बस = मोह के वश में, मूढ़ = अज्ञानी, गरभबास = गर्भ में रहना, दुखरासि = दुःखों की राशि, जातना = यातना, तीब्र = तीव्र, बिपति = विपत्ति, अहार = भोजन, सुर दुरलभ = देवताओं के लिए भी दुर्लभ, मद = अहंकार, अभिमान = गर्व, निज-पर = अपना-पराया, सुद्ध = शुद्ध, राम-लय = राम में लीनता।

सन्दर्भ:

प्रस्तुत पद गोस्वामी तुलसीदास की विनय पत्रिका से उद्धृत है।

प्रसङ्ग:

कवि मनुष्य जीवन के उद्देश्य पर विचार करते हुए सांसारिक विषयों में फँसे मनुष्य की मूर्खता पर दुःख व्यक्त करता है।

हिन्दी अर्थ:

कवि पूछता है कि मनुष्य शरीर प्राप्त करके क्या लाभ हुआ, यदि शरीर, वचन और मन से कभी दूसरों का हित नहीं किया? स्वर्ग, नरक, घर और वन में मिलने वाले सुख तो बिना बुलाए भी प्राप्त हो जाते हैं, फिर उनके लिए इतना प्रयास क्यों? मनुष्य मोह के वश होकर परस्त्री और परद्रोह में लग जाता है तथा गर्भवास के भयंकर दुःखों को भूल जाता है। भय, निद्रा, मैथुन और भोजन तो सभी जीवों में समान हैं। देवताओं के लिए भी दुर्लभ मनुष्य शरीर पाकर यदि भगवान का भजन नहीं किया तो अहंकार में जीवन नष्ट हो गया।

टिप्पणी:

1. अलंकार: प्रश्नोक्ति, अनुप्रास एवं दृष्टान्त अलंकार। 2. रस: शान्त एवं भक्ति रस। 3. छन्द: पद-प्रधान छन्द। 4. भाव: मनुष्य जीवन की सार्थकता पर विचार करते हुए कवि विषय-वासनाओं और अहंकार को छोड़कर भगवान के भजन में लगने की प्रेरणा देता है।

पद संख्या 10

ऐसेहि जनम-समूह सिराने। प्राननाथ रघुनाथ-से प्रभु तजि सेवत चरन बिराने ॥ १ ॥ जे जड जीव कुटिल, कायर, खल, केवल कलिमल-साने। सूखत बदन प्रसंसत तिन्ह कहँ, हरितें अधिक करि माने ॥ २ ॥ सुख हित कोटि उपाय निरंतर करत न पायँ पिराने। सदा मलीन पंथके जल ज्यो, कबहुँ न हृदय थिराने ॥ ३ ॥ यह दीनता दूर करिबेको अमित जतन उर आने। तुलसी चित-चिंता न मिटै बिनु चिंतामनि पहिचाने ॥ ४ ॥ 10

शब्दार्थ:

जनम-समूह = अनेक जन्म, सिराने = समाप्त किए, प्राननाथ = प्राणों के स्वामी, तजि = छोड़कर, चरन = चरण, बिराने = पराए/अन्य, जड़ = अज्ञानी, कुटिल = कपटी, कायर = डरपोक, खल = दुष्ट, कलिमल = कलियुग के पाप, साने = लिप्त, सूखत बदन = मुँह सूखना, प्रसंसत = प्रशंसा करना, हरितें = भगवान से, अधिक = बढ़कर, माने = मानना, पायँ = पैर, पिराने = पीड़ा होना, मलीन = गंदा/अपवित्र, पंथके = मार्ग के, थिराने = स्थिर होना, दीनता = दरिद्रता/हीन दशा, अमित = असीम, चित = मन, चिंतामणि = मनोकामना पूर्ण करने वाला रत्न, पहिचाने = पहचानने पर।

सन्दर्भ:

यह पद गोस्वामी तुलसीदास की विनय पत्रिका से उद्धृत है।

प्रसङ्ग:

कवि अनेक जन्मों से सांसारिक मोह में भटकने और भगवान को छोड़कर अन्य लोगों की सेवा करने पर अपने मन की दीन दशा का वर्णन करता है।

हिन्दी अर्थ:

कवि कहता है कि मैंने ऐसे ही अनेक जन्म समाप्त कर दिए और प्राणों के स्वामी श्रीरघुनाथ जैसे प्रभु को छोड़कर अन्य लोगों की सेवा करता रहा। मैं उन जड़, कुटिल और दुष्ट लोगों की प्रशंसा करता रहा जो कलियुग के पापों में लिप्त हैं और उन्हें भगवान से भी श्रेष्ठ मानता रहा। सांसारिक सुख पाने के लिए करोड़ों उपाय करता रहा, फिर भी मन को शान्ति नहीं मिली। अब इस दीन दशा को दूर करने के लिए हृदय में अनेक प्रयास करता हूँ, पर तुलसीदास कहते हैं कि चिंतामणि स्वरूप भगवान को पहचाने बिना मन की चिंता समाप्त नहीं हो सकती।

टिप्पणी:

1. अलंकार: उपमा, रूपक एवं अनुप्रास अलंकार। 2. रस: भक्ति एवं निर्वेद रस। 3. छन्द: पद-प्रधान छन्द। 4. भाव: कवि अपने सांसारिक मोह और भगवान से विमुखता पर आत्मग्लानि व्यक्त करता है तथा यह स्वीकार करता है कि वास्तविक शान्ति और चिंता-मुक्ति केवल भगवान को पहचानकर उनकी शरण ग्रहण करने से ही संभव है।

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