केशवदास — रामचन्द्रिका के पद

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
0
आचार्य केशवदास

आचार्य केशवदास

केशवदास का जीवन परिचय तथा रामचन्द्रिका के पदों का शब्दार्थ, सन्दर्भ, प्रसङ्ग, हिन्दी व्याख्या एवं विशेष/काव्यसौंदर्य।

केशवदास का जीवन परिचय

उत्तर- आचार्य केशवदास का जन्म संवत 1612 (1555 ई.) में ओरछा के प्रसिद्ध सनाढ्य ब्राह्मण कुल में हुआ था। इनके पिता का नाम काशीराम था। पं. कृष्णदत्त इनके पितामह थे, जो संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे। ओरछानरेश मधुकरशाह के पुत्र महाराज इन्द्रजीत सिंह इनके मुख्य आश्रयदाता थे। वे केशव को अपना गुरु मानते थे और इनका बहुत सम्मान करते थे। उनके जन्म के सम्बन्ध में काव्य सरोज में लिखा है—

संवत् द्वादश षट् सुभग, सोदह से मधुमास।
तब कवि केसव को जनम, नगर आरछे वास।।

रामचन्द्रिका के पद

पद संख्या 01

बालक मृणालनि ज्यों तोरि डारै सब काल, कठिन कराल त्यों अकाल दीह दुख को। विपति हरत इठि पद्मिनी के पात सम, पंक ज्यों पताल पेलि पठवै कलुख को। दूरि कै कलंक अंक भवशीश शशि सम, राखत हैं केशौदास दास के वपुख को। साँकरे की साँकरन सममुख होत तोरै, दशमुख मुख जोवै गजमुख मुख को।।1

शब्दार्थ:

बालक= हाथी का बच्चा। मृणालिनि= कमल की नाल। सब काल= हर समय। कराल= भयंकर। दीह= दीर्घ, बड़े-बड़े। हठि= हठ करके। पद्मिनी= पुरइन। पात सम= पत्ते के समान। पंक= कीचड़। पेलि= दबाकर। कलुख= कालुष्य, पाप। कलंक-अंक= कलंक का चिह्न। भव-सीस-ससि-सम= महादेव के मस्तक पर स्थित चंद्रमा के समान। वपुख= शरीर। साँकरे की= संकट में पड़े हुए व्यक्ति की। साँकरन= संकल, बंधन। सनमुख होत= सामने होते ही। दसमुख= दशों दिसाओं में रहने वाले लोग अथवा ब्रह्मा, विष्णु, महेश ये तीनों देव।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

विशेष/काव्यसौंदर्य:

-

पद संख्या 02

पूरण पुराण अरु पुरुष पुराण परिपूरण, बतावैं न बतावैं और उक्ति को। दरसन देत, जिन्हें दरसन समुझैं न, ‘नेति नेति’ कहै वेद छाँड़ि आन युक्ति को। जानि यह केशोदास अनुदिन राम राम रटत रहत न डरत पुनरुक्ति को। रूप देहि अणिमाहि, गुण देहि गरिमाहि, भक्ति देहि महिमाहि, नाम देहि मुक्ति को।।2

शब्दार्थ:

पूरण= संपूर्ण। पुराण= प्राचीन। परिपूर्ण= सब प्रकार से पूर्ण। उक्ति= बात, कथन। दरसन देत= दर्शन देते हैं, षट् शास्त्र, धर्म-दर्शन। नेति-नेति= यह भी नहीं अर्थात अगम्य। युक्ति= युक्ति, उपाय। अनुदिन= प्रतिदिन, नित्य। पुनरुक्ति= किसी एक शब्द अथवा कथन की पुनरावृत्ति। रूप= सौंदर्य। अणिमा= आठ सिद्धियों में से पहली सिद्धि। गरिमा= देह-भार बढ़ाने की सिद्धि। महिमा= देह-विस्तार करने की सिद्धि।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

विशेष/काव्यसौंदर्य:

-

पद संख्या 03

केशव ये मिथिलाधिप हैं, जग में जिनकी कीरति बेलि बई है। दान-कृपान विभानन सों सिगरी वसुधा जिन हाथ लई है। अंग छ सातक आठक सों भव तीनिहु लोक में सिद्धि भई है। वेदत्रयी अरु राजसिरी परिपूरणता शुभ योगमई है।।3

शब्दार्थ:

केशव= राम। मिथिलाधिप= मिथिला के राजा जनक। कीरति बेल बई है= कीर्ति की बेल लगायी है। दान-कृपान= दानरूपी तलवार। विभानन सौं= कार्यों से। हाथ लई है= जीत ली है। अंग छः= षडंग। अंग सातक= राज्य के सात अंग। अंग आठक= योग के आठ अंग। भव= उत्पन्न। वेदत्रयी= तीन वेद।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

विशेष/काव्यसौंदर्य:

-

पद संख्या 04

यह कीरति और नरेशन सोहै। मुनि देव अदेवन के मन मोहैं। है को बपुरा सुनिये ऋषिराई। सब गाँऊ छः सातक की ठकुराई।।4

शब्दार्थ:

अदेवन को= असुरों को। बपुरा= दीन-हीन। ठकुराई= राज्य।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

विशेष/काव्यसौंदर्य:

-

पद संख्या 05

आपने आपने ठौरनि तौ भुवपाल सबै भुव पालै सदाई। केवल नामहि के भुवपाल कहावत हैं भुवि पालि न जाई। भूपति की तुमहीं धरि देह बिदेहन में कल कीरति गाई। केशव भूपन को भवि भूषण भू तन तैं तनया उजपाई।।5

शब्दार्थ:

ठौरनि= स्थान। भुवपाल= पृथ्वी का पालन करने वाला राजा। भुव= पृथ्वी। विदेहन= जीवनमुक्त।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

विशेष/काव्यसौंदर्य:

-

पद संख्या 06

दानि के शील, पर दान के प्रहारी दिन, दानवारि ज्यों निदान देखिए सुभाय के। दीप दीप हूँ के अवनीपन के अवनीप, पृथु सम केशोदास दास द्विज गाय के। आनँद के कंद सुरपालक के बालक ये, परदारप्रिय साधु मन वच काय के। देहधर्मधारी पै विदेहराज जू से राज, राजत कुमार ऐसे दशरथ राय के।।6

शब्दार्थ:

शील= स्वभाव। पर दान के प्रहारी दिन= शत्रुओं से प्रतिदिन दण्ड-रूप में दान लेने वाले। दानवारि= विष्णु। निदान= अन्त में। अवनीपत= राजा। अवनीश= स्वामी। द्विज= ब्राह्मण। कंद= बादल। सुरनायक= इन्द्र। परदार= लक्ष्मी। साधु= शुद्ध।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

विशेष/काव्यसौंदर्य:

-

पद संख्या 07

बज्र तें कठोर है, कैलाश ते विशाल, काल-दंड तें कराल, सब काल काल गावई। केशव त्रिलोक के विलोक हारे देव सब, छोड़ चंद्रचूड़ एक और को चढ़ावई। पन्नग प्रचंड पति प्रभु की पनच पीन, पर्वतारि-पर्वत प्रभा न मान पावई। विनायक एकहूँ पै आवै न पिनाक ताहिं, कोमल कमलपाणि राम कैसे ल्यावई।।7

शब्दार्थ:

कराल= भयंकर। विलोक= विलोक्य, देखकर। चन्द्रचूड़= शिव। पन्नग प्रचंडपति प्रभु= बड़े-बड़े सर्पों के राजा अर्थात वासुकी। पनच= प्रत्यंचा। पीन= पुष्ट, मोटी। पर्वतारि= इन्द्र। पर्वतप्रभा= असुर, दैत्य। मान= अनुमान, अंदाज। बिनायक= गणेश। पिनाक= धनुष। कमलपाणि= कमल जैसे हाथ वाले।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

विशेष/काव्यसौंदर्य:

-

पद संख्या 08

उत्तम गाथ सनाथ जबै धनु श्री रघुनाथ जु हाथ कैं लीनो।
निर्गुण ते गुणवंत कियो सुख केशव संत अनंतन दीनो।
ऐंचो जहीं तबहीं कियो संयुत तिच्छ कटाच्छ नराच नवीनो।
राजकुमार निहारि सनेह सों शंभु को साँचो शरासन कीनो।।8

शब्दार्थ:

उत्तमगाथ= श्रेष्ठ कहानी वाले। निर्गुण= प्रत्यंचारहित। गुणवंत= प्रत्यंचा सहित। अनंतन= अपार। ऐंचो= खींचा। तिच्छ कटाक्ष= तीक्ष्ण कटाक्ष। नाराच= बाण। शरासन= धनुष।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

टिप्पणी:

-

पद संख्या 09

प्रथम टंकोर झुकि झारि संसार मद
चंड कोदड रह्यो मंडी नव खंड को।
चालि अचला अचल घालि दिगपाल बल
पालि ऋषिराज के बचन परचंड को।
सोधु दै ईश को, बोधु जगदीश को,
क्रोधु उपजाइ भृगुनंद बरिवंड को।
बाधि वर स्वर्ग को, साचि अपवर्ग
धनु भंग को शब्द गयो भेदि ब्रह्मांड को।।9

शब्दार्थ:

झुकि= क्रुद्ध होकर। झारि= फाड़कर, नष्ट करके। चंड= प्रबल। कोदंड= शिव धनुष। मंडि= गुंजाकर। नव खंड= पृथ्वी के नौ खण्ड। चालि= चलाकर, कंपायमान करके। अचला= पृथ्वी। अचल= पर्वत। घालि= तोड़कर। ऋषिराज= महर्षि विश्वामित्र। परचंड= प्रचंड, कठोर। सोधु= सूचना, खबर। ईस= शिव। बोध= ज्ञान। जगदीश= ब्रह्मा। भृगुनन्द= परशुराम। बरिवंड= बली। बाधि= बाधा डालकर। अपवर्ग= मुक्ति।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

टिप्पणी:

-

पद संख्या 10

विपिन-मारग राम विराजहीं।
सुखद सुंदरि सोदर भ्राजहीं।।
विविध श्रीफल सिद्धि मनो फल्यो।
सकल साधन सिद्धिहि लै चल्यो।।10

शब्दार्थ:

भ्राजहिं= सुशोभित हैं। श्रीफल= तपस्या के फल। सिद्ध= सिद्धियाँ।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

टिप्पणी:

-

पद संख्या 11

कौन हौ, कित तें चले, कित जात हौ, केहि काम जू
कौन की दुहिता, बहू, कहि कौन की यह बाम जू।।
एक गाँउँ रहौ कि साजन मित्र बंधु बखानिए।
देश के, परदेश के, किधौं पंथ की पहिचानिए।।11

शब्दार्थ:

दुहिता= लड़की। बाम= स्त्री। किधौं= अथवा।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

टिप्पणी:

-

पद संख्या 12

किधौं यह राजपुत्री, वरहीं वरीं है
किधौं,उपदि वरयौं है यहि सोभा अभिरत हौ।
किधौं रति रतिनाथ जस साथ केसौदास
जात तपोवन सिव बैर सुमिरत हौ।
किधौं मुनि शापहत, किधौं ब्रह्मदोषरत,
किधौं सिद्धियुत, सिद्ध परम विरत हौ।
किधौं कोऊ ठग हौ ठगोरी लीन्हें, किधौं तुम
हरि हर श्री हौ शिवा चाहत फिरत हौ।।12

शब्दार्थ:

बरही= बलपूर्वक। उपदि= अपनी इच्छा से। अभिरत= युक्त। रतिनाथ= कामदेव। शाप-हत= शापित। ब्रह्मदोष-रत= ब्राह्मणों के दोष से युक्त। बिरत= बैरागी। हर= महादेव। हरि= विष्णु। श्री= लक्ष्मी। सिवा= शिव-पार्वती।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

टिप्पणी:

-

पद संख्या 13

मेघ मंदाकिनी चारु सौदामिनी
रूप रूरे लसैं देहधारी मनौ।
भूरि भागीरथी भारती हंसजा
अंस के हैं मनौ भाग भारे मनौ।।
देवराजा लिये देवरानी मनौ
पुत्र संयुक्त भूलोक में सोहिए।
पच्छ दू संधि संध्या सधी है मनौ
लच्छि ये स्वच्छ प्रत्यक्ष ही मोहिए।।13

शब्दार्थ:

मंदाकिनी= आकाशगंगा। चारु= सुन्दर। सौदामिनी= बिजली। रूरे= सुन्दर। भारती= सरस्वती। हंसजा= यमुना। भोग-भारे= भारी सौभाग्य। संयुक्त= सहित। दू= दोनों। लक्षिये= लक्षित होते हैं।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

टिप्पणी:

-

पद संख्या 14

तड़ाग नीर-हीन ते सनीर होत केसौदास
पुंडरीक-झुंड भौंर मंडलीन मंडहीं।
तमाल वल्लरी समेत सूखि सूखि के रहे
ते बाग फूलि फूलि कै समूल सूल खंडहीं।।
चितै चकोरनी चकोर, मोर मोरनी समेत
हंस हंसिनी समेत, सारिका सबै पढ़ैं।
जहीं जहीं विराम लेत रामजू तहीं तहीं
अनेक भाँति के अनेक भोग माग सो बढ़ै।।14

शब्दार्थ:

सनीर= पानी सहित। पुण्डरीक= कमल। मंडलीन मंडही= मंडल सुशोभित हो जाते हैं। बल्लरी= लता-बेल। सूल= दुःख। सारिका= मैना।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

टिप्पणी:

-

पद संख्या 15

घाम को राम समीप महाबल। सीतहिं लागत है अति सीतल।।
ज्यों घन संयुत दामिनि के तन। होत हैं पूषन के कर भूषन।।15

शब्दार्थ:

घाम= धूप, गर्मी। महाबल= अत्यन्त तेज। सीतहिं= सीता को। दामिनि= बिजली। पूषन के कर= सूर्य की किरणें।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

टिप्पणी:

-

पद संख्या 16

बासों मृग-अंक कहै, तीसों मृगनैनी सब,
वह सुधाधर, तुहूँ सुधाधर मानिए।
वह द्विजराज, तेरे द्विजराजि राजैं; वह
कलानिधि, तुहूँ कला कलित बखानिए।।
रत्नाकर के हैं दोऊ केसव प्रकास कर,
अंबर विलास कुबलय हित मानिए।
वाके अति सीत कर, तुहूँ सीता सीतकर,
चंद्रमा सी चंद्रमुखी सब जग जानिए।।16

शब्दार्थ:

मृग-अंक= मृगांक। सुधाधर= सुधा को अधर में धारण करने वाली, चन्द्रमा। द्विजराजि= दाँतों की पंक्तियाँ, ब्राह्मण। कलाकलित= कलाओं से युक्त। रत्नाकर= रत्नों का ढेर, समुद्र। अम्बर= आकाश, वस्त्र। कुबलय= कमलिनी, भूमण्डल। सीतकर= आनन्द प्रदान करने वाली।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

टिप्पणी:

-

पद संख्या 17

कलित कलंक केतु, केतु अरि, सेत गात,
भोग योग को अयोग, रोग ही को थल सौं।
पून्यौई को पूरन पै प्रतिदिन दूनो दूनो
छन छन छीन होत छीलर को जल सौं।।
चंद्र सौं जो बरनत रामचंद्र की दुहाई
सोई मतिमंद कवि केसव कुसल सौं।
सुंदर सुवास अरु कोमल अमल अति
सीताजू को मुख सखि केवल कमल सौं।।17

शब्दार्थ:

कलित कलंक हेतु= भारी कलंक। अरि= शत्रु। सेत= श्वेत। पून्योई को= पूर्णमासी को ही। ऊनो-ऊनो= कम-कम। छीलर= उथला तालाब जिसमें पानी कम और कीचड़ अधिक होता है। मतिमंद= बुद्धिहीन। मुसल= मूसल, मूर्ख।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

टिप्पणी:

-

पद संख्या 18

एके कहैं अमल कमल मुख सीताजू कौ
एकै कहैं चंद्र सम आनँद को कंद री।
होइ जौ कमल तौ रयनि में न सकुचै री
चंद जौ तौ बासर न होइ द्युति मंद री।।
बासर ही कमल रजनि ही में चंद्र मुख
बासर हू रजनि बिराजै जगबंद री।
देखे मुख भावै अनदेखेई कमल चंद
तातैं मुख मुखै, सखी, कमलौ न चंद री ।।18

शब्दार्थ:

अमल= निष्कलंक, स्वच्छ। आनन्द को कन्द= आनन्द देने वाला। रयनि= रात। बासर= दिन। दुति= ज्योति, द्युति। जगबंद= जगतवन्द्य।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

टिप्पणी:

-

पद संख्या 19

बहु बाग तड़ाग तरंगनि तीर
तमाल की छाँह बिलोकि भली।
घटिका इक बैठत हैं सुख पाय
बिछाय तहाँ कुस कास थली।।
मग कौ श्रम श्रीपति दूरि करैं
सिय के सुभ बालक अंचल सौं।
श्रम तेऊ हरें तिनकौ कहि केशव
चंचल चारु दृंगचल सौं।।19

शब्दार्थ:

तड़ाग= तालाब। तरंगिनि= नदी। तीर= किनारा। भली= सुन्दर। घटिका यक= एक घड़ी। थैली= आसन। स्रम= थकावट। बाकल= वल्कल। दृगंचल= कटाक्ष रूपी अंचल।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

टिप्पणी:

-

पद संख्या 20

मारग यौं रघुनाथ जू, दुख सुख सबही देत।
चित्रकूट पर्वत गये, सोदर सिया समेत।।20

शब्दार्थ:

सोदर= भाई लक्ष्मण।

सन्दर्भ:

-

प्रसङ्ग:

-

हिन्दी व्याख्या:

-

टिप्पणी:

-

आचार्य केशवदास — रामचन्द्रिका

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)