बिहारी — बिहारी के दोहे
बिहारी-सतसई से चयनित 53 दोहों का शब्दार्थ, सन्दर्भ, प्रसङ्ग, हिन्दी व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य।
1. बिहारी के दोहे
दोहा — 1
मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय।
जा तनु की झाँई परे, स्याम हरित दुति होय॥
शब्दार्थ —भव-बाधा — सांसारिक बाधाएँ। नागरि — चतुर। सोइ — वही। झाँई — झलक, परछाई, ध्यान। हरित दुति — हरित आभा, प्रसन्न, प्रभाशून्य।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता गागर में सागर भरने वाले रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —प्रस्तुत दोहे में कविवर बिहारी ने अपनी रचना को निर्विघ्न समाप्त करने के लिए राधा जी की स्तुति की है।
हिन्दी व्याख्या —इस दोहे के तीन अर्थ बताए जाते हैं।
पहला अर्थ — बिहारी कहते हैं कि जिस चतुर राधा के सुन्दर तन की झलक पड़ने मात्र से श्याम वर्ण वाले श्रीकृष्ण हरिताभा से युक्त हो जाते हैं, वही राधा मेरी सांसारिक बाधाओं का हरण करें। राधा गौरवर्ण हैं और उनके गौर अंग की आभा पड़ने से श्याम वर्ण में हरापन आ जाता है।
दूसरा अर्थ — कवि कहते हैं कि जिस चतुर राधा के रूप-लावण्य के दर्शन मात्र से श्रीकृष्ण प्रसन्न हो जाते हैं, उन्हीं राधा से मेरा अनुरोध है कि वे मुझे सांसारिक आपदाओं से मुक्ति प्रदान करें। इस दोहे में राधा और कृष्ण के प्रेम की गूढ़ता प्रदर्शित की गई है।
तीसरा अर्थ — बिहारी जी कहते हैं कि जिस चतुर राधा का ध्यान धरने मात्र से भक्तजनों के दुःख, दारिद्र्य तथा श्याम वर्ण के समस्त कल्मष दूर होकर प्रभाशून्य हो जाते हैं, उन्हीं राधा से मेरी विनती है कि वे मुझे सांसारिक कठिनाइयों से मुक्ति दिलाएँ।
पहला अर्थ — बिहारी कहते हैं कि जिस चतुर राधा के सुन्दर तन की झलक पड़ने मात्र से श्याम वर्ण वाले श्रीकृष्ण हरिताभा से युक्त हो जाते हैं, वही राधा मेरी सांसारिक बाधाओं का हरण करें। राधा गौरवर्ण हैं और उनके गौर अंग की आभा पड़ने से श्याम वर्ण में हरापन आ जाता है।
दूसरा अर्थ — कवि कहते हैं कि जिस चतुर राधा के रूप-लावण्य के दर्शन मात्र से श्रीकृष्ण प्रसन्न हो जाते हैं, उन्हीं राधा से मेरा अनुरोध है कि वे मुझे सांसारिक आपदाओं से मुक्ति प्रदान करें। इस दोहे में राधा और कृष्ण के प्रेम की गूढ़ता प्रदर्शित की गई है।
तीसरा अर्थ — बिहारी जी कहते हैं कि जिस चतुर राधा का ध्यान धरने मात्र से भक्तजनों के दुःख, दारिद्र्य तथा श्याम वर्ण के समस्त कल्मष दूर होकर प्रभाशून्य हो जाते हैं, उन्हीं राधा से मेरी विनती है कि वे मुझे सांसारिक कठिनाइयों से मुक्ति दिलाएँ।
काव्य-सौंदर्य —विशेष — यह दोहा मंगलाचरण है। इसमें वस्तुनिर्देशात्मक मंगलाचरण किया गया है। बिहारी ने राधा की स्तुति की है। अलंकार — श्लेष, काव्यलिंग तथा हेतु अलंकार। प्रस्तुत दोहे में भाषा की समास-शक्ति का सुन्दर प्रयोग किया गया है। थोड़े शब्दों में गहन भाव व्यक्त करना बिहारी की काव्य-कला की प्रमुख विशेषता है।
दोहा — 2
मोहन मूरति श्याम की, अति अद्भुत गति जोय।
बसति सु चित अंतर तऊ प्रतिबिम्बित गति होय॥
शब्दार्थ —मोहन — मन को मोहने वाले श्रीकृष्ण। मूरति — मूर्ति, स्वरूप। श्याम — श्रीकृष्ण। अति — अत्यन्त। अद्भुत — आश्चर्यजनक। गति — दशा, स्थिति। चित अंतर — हृदय के भीतर। प्रतिबिम्बित — प्रतिबिम्ब के रूप में दिखाई देना।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने श्रीकृष्ण के मनोहर स्वरूप और उनके भक्त के हृदय में प्रतिबिम्बित होने की अद्भुत स्थिति का वर्णन किया है।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहते हैं कि श्रीकृष्ण की मनोहर श्याम मूर्ति अत्यन्त अद्भुत है। वह भक्त के हृदय में निवास करती है और हृदय के भीतर रहते हुए भी अपने स्वरूप का प्रतिबिम्ब दिखाती रहती है। श्रीकृष्ण का यह मनोहर रूप भक्त के चित्त को निरन्तर आकर्षित करता रहता है।
काव्य-सौंदर्य —भाव — श्रीकृष्ण के मनोहर स्वरूप का प्रभाव। अलंकार — अनुप्रास एवं रूपक की छटा। भाषा — ब्रजभाषा। कम शब्दों में कृष्ण-स्वरूप की मनोहरता तथा भक्त के हृदय में उसकी उपस्थिति का सुन्दर चित्रण किया गया है।
दोहा — 3
तजि तीरथ हरि राधिका, तन द्युति करि अनुराग।
जिहिं ब्रजकेलि निंकुंज मग पग-पग होत प्रयाग॥
शब्दार्थ —तजि — छोड़कर। तीरथ — तीर्थ। हरि — श्रीकृष्ण। राधिका — राधा जी। तन द्युति — शरीर की आभा। अनुराग — प्रेम। ब्रजकेलि — ब्रज की प्रेम-क्रीड़ा। निंकुंज मग — निकुंज का मार्ग। प्रयाग — पवित्र तीर्थ, जहाँ गंगा-यमुना-सरस्वती का संगम माना जाता है।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने राधा-कृष्ण के प्रेम से ब्रजभूमि के निकुंज मार्गों के तीर्थ के समान पवित्र हो जाने का वर्णन किया है।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहते हैं कि मनुष्य को तीर्थों की यात्रा करने की आवश्यकता नहीं है। जिस ब्रजभूमि में राधा और श्रीकृष्ण ने प्रेम-क्रीड़ा की है, वहाँ के निकुंजों के मार्ग का प्रत्येक चरण तीर्थराज प्रयाग के समान पवित्र है। राधा-कृष्ण के प्रेम से ब्रजभूमि का प्रत्येक स्थान पवित्र हो गया है।
काव्य-सौंदर्य —भाव — राधा-कृष्ण की प्रेम-क्रीड़ा से ब्रजभूमि की पवित्रता। अलंकार — रूपक एवं अतिशयोक्ति। भाषा — ब्रजभाषा। तीर्थराज प्रयाग के माध्यम से ब्रज के निकुंजों की पवित्रता को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया गया है।
दोहा — 4
नित प्रति एकतहीं रहत, बैस बरन मन एक।
चहियत जुगलकिसोर लखि, लोचन-जुगल अनेक॥
शब्दार्थ —नित प्रति — प्रतिदिन। एकतहीं — एक ही स्थान पर। बैस — बैठे हुए। बरन — वर्ण, रंग। मन एक — एकाग्र मन। चहियत — चाहना। जुगलकिसोर — किशोर राधा-कृष्ण का युगल। लोचन-जुगल — दोनों नेत्र।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने राधा-कृष्ण के युगल स्वरूप को देखने के लिए नेत्रों की लालसा का वर्णन किया है।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहते हैं कि दोनों नेत्र एक ही स्थान पर टिके रहते हैं और दोनों का रंग तथा मन भी एक ही हो गया है। राधा-कृष्ण के किशोर युगल स्वरूप को देखने की ऐसी तीव्र इच्छा है कि एक जोड़ी आँखें पर्याप्त नहीं लगतीं। उन्हें देखने के लिए अनेक नेत्रों की आवश्यकता अनुभव होती है।
काव्य-सौंदर्य —भाव — राधा-कृष्ण के युगल स्वरूप के प्रति आकर्षण। अलंकार — अतिशयोक्ति एवं अनुप्रास। भाषा — ब्रजभाषा। कवि ने नेत्रों की उत्कट लालसा को अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है।
दोहा — 5
या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोइ।
ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जलु होइ॥
शब्दार्थ —अनुरागी — प्रेम में अनुरक्त। चित्त — मन। गति — दशा। समुझै — समझता है। बूड़ै — डूबता है। स्याम रंग — श्रीकृष्ण के प्रेम का रंग। उज्जलु — उज्ज्वल, निर्मल।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने प्रेमी के चित्त की अद्भुत दशा का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबने से हृदय के और अधिक निर्मल होने की बात कही है।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहते हैं कि प्रेम में अनुरक्त व्यक्ति के मन की दशा को कोई नहीं समझ सकता। श्रीकृष्ण के प्रेम में वह जितना अधिक डूबता जाता है, उसका हृदय उतना ही अधिक निर्मल और उज्ज्वल होता जाता है। सामान्यतः किसी रंग में डूबने से वस्तु रंगीन हो जाती है, परन्तु श्याम के प्रेम का रंग ऐसा है जिसमें डूबकर मन और अधिक उज्ज्वल हो जाता है।
काव्य-सौंदर्य —भाव — कृष्ण-प्रेम की निर्मलता। अलंकार — विरोधाभास एवं अनुप्रास। भाषा — ब्रजभाषा। ‘श्याम रंग’ में डूबकर उज्ज्वल होने की विरोधी प्रतीत होने वाली बात से प्रेम की गहनता व्यक्त हुई है।
दोहा — 6
कब को टेरत दीन ह्वै, होत न स्याम सहाय।
तुम हूँ लागी जगत गुरु, जगनायक जग बाय॥
शब्दार्थ —टेरत — पुकारते हुए। दीन — असहाय। ह्वै — होकर। स्याम — श्रीकृष्ण। सहाय — सहायता करने वाले। जगत गुरु — संसार के गुरु। जगनायक — संसार के नायक। जग बाय — संसार के स्वामी।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि श्रीकृष्ण को संसार का गुरु और नायक मानते हुए उनसे अपनी सहायता करने की प्रार्थना करता है।
हिन्दी व्याख्या —कवि श्रीकृष्ण से कहते हैं कि मैं कब से दीन और असहाय होकर आपको पुकार रहा हूँ, फिर भी आप मेरी सहायता के लिए नहीं आए। हे जगत के गुरु और जगत के नायक! आप ही संसार के स्वामी हैं, इसलिए मेरी पुकार सुनकर मेरी सहायता कीजिए।
काव्य-सौंदर्य —भाव — भक्त की दीनता और भगवान से सहायता की याचना। भाषा — ब्रजभाषा। शैली — प्रार्थनात्मक। कवि ने श्रीकृष्ण के लिए जगत-गुरु और जगनायक जैसे विशेषणों का प्रयोग कर उनकी महिमा प्रकट की है।
दोहा — 7
करौं कुबत जग कुटिलता, तजौं न दीन दयाल।
दुखी होहुगे सरल हिय बसत त्रिभंगीलाल॥
शब्दार्थ —करौं — करूँ। कुबत — बुरी बात, बुराई। कुटिलता — छल-कपट। तजौं — छोड़ूँ। दीन दयाल — दीनों पर दया करने वाले। सरल हिय — सरल हृदय। त्रिभंगीलाल — तीन स्थानों से टेढ़ी मुद्रा वाले श्रीकृष्ण।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि भगवान श्रीकृष्ण को दीन-दयाल कहकर संबोधित करते हुए उनके सरल हृदय में निवास करने की कामना करता है।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहता है कि संसार चाहे कितना ही कुटिल क्यों न हो जाए और लोग चाहे कितनी ही बुरी बातें क्यों न करें, मैं दीन-दयाल श्रीकृष्ण का त्याग नहीं करूँगा। मेरे हृदय में सरल भाव से निवास करने वाले त्रिभंगी श्रीकृष्ण यदि मेरे दुःख को जानेंगे तो वे स्वयं भी दुःखी हो जाएँगे।
काव्य-सौंदर्य —भाव — भगवान के प्रति अटूट भक्ति। अलंकार — अनुप्रास। भाषा — ब्रजभाषा। ‘दीन दयाल’ तथा ‘त्रिभंगीलाल’ जैसे विशेषणों से श्रीकृष्ण के प्रति कवि की श्रद्धा व्यक्त हुई है।
दोहा — 8
जप माला छापा तिलक, सरै न एको काम।
मन काँचै नाचै वृथा, साँचै राचैं राम॥
शब्दार्थ —जप माला — जप करने की माला। छापा — शरीर पर धारण किया जाने वाला धार्मिक चिह्न। तिलक — माथे पर लगाया जाने वाला धार्मिक चिह्न। सरै — पूरा होता है, सफल होता है। मन काँचै — कच्चा मन, अस्थिर मन। वृथा — व्यर्थ। साँचै — सच्चे। राचैं — अनुरक्त होते हैं।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने बाहरी धार्मिक आडम्बरों की अपेक्षा सच्चे मन से भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति को अधिक महत्त्व दिया है।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहते हैं कि केवल माला जपने, शरीर पर धार्मिक छाप लगाने और माथे पर तिलक लगाने से कोई वास्तविक आध्यात्मिक लाभ नहीं होता। यदि मन कच्चा अर्थात् चंचल और अस्थिर है तो ये सभी बाहरी क्रियाएँ व्यर्थ हैं। भगवान राम उसी व्यक्ति के हृदय में निवास करते हैं जिसका मन सच्चे प्रेम और भक्ति में अनुरक्त है।
काव्य-सौंदर्य —भाव — आडम्बर-विरोध और सच्ची भक्ति का महत्त्व। अलंकार — विरोधाभास एवं अनुप्रास। भाषा — सरल ब्रजभाषा। कवि ने बाह्य आडम्बर और आन्तरिक भक्ति के बीच स्पष्ट अन्तर बताया है।
दोहा — 9
समै समै सुन्दर सबै, रूप कुरूप न कोय।
मन की रूचि जेती जितै, तित तेती रूचि होय॥
शब्दार्थ —समै समै — समय के अनुसार। सुन्दर — अच्छा। रूप — सौंदर्य। कुरूप — बदसूरत। रूचि — पसंद, आकर्षण। जेती — जितनी। तित — उतनी।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने सौंदर्य की वास्तविकता को मनुष्य की दृष्टि और रुचि पर निर्भर बताया है।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहते हैं कि संसार में ऐसा कोई निश्चित रूप नहीं है जिसे सभी लोग सुन्दर मानें और किसी को कुरूप कहें। समय और परिस्थिति के अनुसार सब कुछ सुन्दर दिखाई दे सकता है। मनुष्य की जैसी रुचि होती है, उसे उसी के अनुसार वस्तु में उतना ही सौंदर्य दिखाई देता है।
काव्य-सौंदर्य —भाव — सौंदर्य की सापेक्षता। अलंकार — अनुप्रास। भाषा — ब्रजभाषा। कवि ने मनुष्य की रुचि के आधार पर सौंदर्य-बोध की भिन्नता को सरल एवं सूक्तिपरक ढंग से व्यक्त किया है।
दोहा — 10
अजौं तरौना ही रह्यौं, श्रुति सेवक इक रंग।
नाक बाँस बेसरि रह्यौं, तजि मुकुतन के संग॥
शब्दार्थ —अजौं — आज भी। तरौना — कान में पहनने का आभूषण। श्रुति — कान। सेवक — सेवा करने वाला। इक रंग — एक ही प्रकार से। बेसरि — नाक का आभूषण। तजि — छोड़कर। मुकुतन — मोतियों की माला/आभूषण।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने स्त्री के आभूषणों के माध्यम से उसकी शोभा और अलंकरण की रुचि का मनोरम चित्र प्रस्तुत किया है।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहते हैं कि आज भी कानों में वही पुराने आभूषण सुशोभित हैं और वे कानों की सेवा करने वाले सेवक के समान हैं। नाक में भी वही बेसर सुशोभित है। उसने मोतियों के अन्य आभूषणों को छोड़कर इन्हीं आभूषणों को धारण किया है। इनके द्वारा उसकी शोभा और भी बढ़ गई है।
काव्य-सौंदर्य —भाव — नायिका के आभूषणों का सौंदर्य। अलंकार — रूपक एवं अनुप्रास। भाषा — ब्रजभाषा। आभूषणों को सेवक के रूप में प्रस्तुत करना कवि की कल्पनाशीलता को दर्शाता है।
दोहा — 11
जो चाहैं चटक न घटै, मैलो होय न मित्त।
रज राजस न छुवाइयै, नेह चीकनो चित्त॥
शब्दार्थ —चटक — चमक, रंग की शोभा। घटै — कम हो। मैलो — मलिन। मित्त — मिटे। रज — धूल। राजस — सांसारिक विकार। छुवाइयै — छूने देना। नेह — प्रेम। चीकनो — चिकना, निर्मल। चित्त — मन।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने प्रेम की निर्मलता को बनाए रखने के लिए मन को सांसारिक विकारों से दूर रखने का संदेश दिया है।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति अपने प्रेम की चमक को कम नहीं होने देना चाहता और उसे मलिन नहीं होने देना चाहता, तो उसे अपने मन को सांसारिक धूल और विकारों से बचाकर रखना चाहिए। प्रेम से चिकना और निर्मल मन ही सच्चे प्रेम को सुरक्षित रख सकता है।
काव्य-सौंदर्य —भाव — प्रेम की निर्मलता एवं स्थायित्व। अलंकार — रूपक एवं अनुप्रास। भाषा — ब्रजभाषा। ‘चिकना चित्त’ और ‘रज’ के माध्यम से प्रेम को मलिन करने वाले सांसारिक विकारों का सुन्दर संकेत किया गया है।
दोहा — 12
को छूट्यौ इहि जाल परि, कत कुरंग अकुलात।
ज्यौं-ज्यौं सुरझि भज्यौं चहत, त्यौं-त्यौं उरझत जात॥
शब्दार्थ —छूट्यौ — छूटा है। इहि जाल — इस जाल से। कुरंग — हिरण। अकुलात — व्याकुल होता है। सुरझि — सुलझकर। भज्यौं — भागना। उरझत — उलझता।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने प्रेम के बंधन में फँसे व्यक्ति की व्याकुलता की तुलना जाल में फँसे हिरण से की है।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहते हैं कि इस प्रेमरूपी जाल में पड़कर कौन बच पाया है? जिस प्रकार जाल में फँसा हुआ हिरण जितना अधिक निकलने का प्रयास करता है, उतना ही अधिक उलझता जाता है, उसी प्रकार प्रेमी भी प्रेम के बंधन से निकलने का जितना अधिक प्रयास करता है, उतना ही अधिक उसमें उलझता जाता है।
काव्य-सौंदर्य —भाव — प्रेम के बंधन की अनिवार्यता। अलंकार — उपमा एवं अनुप्रास। भाषा — ब्रजभाषा। प्रेम में फँसे व्यक्ति की दशा को जाल में फँसे हिरण के माध्यम से अत्यन्त प्रभावशाली बनाया गया है।
दोहा — 13
गुनी-गुनी सबके कहें, निगुनी गुनी न होत।
सून्यौं कहूँ तरू अर्क तें अर्क-समान उद्योत॥
शब्दार्थ —गुनी-गुनी — गुणी होकर, गुणों के कारण। निगुनी — गुणहीन। सून्यौं — सुना है। तरू — वृक्ष। अर्क — आक का वृक्ष। उद्योत — प्रकाश, चमक। अर्क-समान — सूर्य के समान।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने गुणों के महत्त्व को बताते हुए कहा है कि गुणहीन व्यक्ति केवल दूसरों की प्रशंसा से गुणी नहीं बन सकता।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहते हैं कि सभी लोग किसी व्यक्ति को गुणी-गुणी कहें, इससे वह वास्तव में गुणी नहीं हो जाता। जैसे आक का वृक्ष सूर्य के प्रकाश के सामने होने पर भी सूर्य के समान प्रकाशवान नहीं हो सकता, उसी प्रकार गुणहीन व्यक्ति केवल प्रशंसा प्राप्त करके गुणी नहीं बन सकता।
काव्य-सौंदर्य —भाव — वास्तविक गुणों का महत्त्व। अलंकार — दृष्टान्त एवं उपमा। भाषा — ब्रजभाषा। आक के वृक्ष और सूर्य का उदाहरण देकर कवि ने गुण और गुणहीनता का अन्तर स्पष्ट किया है।
दोहा — 14
बढ़ति-बढ़ति सम्पति सलिल, मन सरोज बढ़ि जाय।
घटत-घटत सू न फिरै, घटै बरू समूल कुम्हिलाय॥
शब्दार्थ —सम्पति — धन-संपत्ति। सलिल — जल। सरोज — कमल। मन — हृदय। घटत — घटते हुए। सू — से। समूल — जड़ सहित। कुम्हिलाय — मुरझा जाए।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने धन-संपत्ति और मनुष्य के मन के सम्बन्ध को कमल और जल के उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया है।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहते हैं कि जिस प्रकार जल बढ़ता जाता है तो जल में रहने वाला कमल भी बढ़ता जाता है, उसी प्रकार धन-संपत्ति बढ़ने पर मनुष्य का मन भी प्रसन्न और विकसित होता है। लेकिन जब जल घटने लगता है तो कमल पुनः उसी स्थिति में नहीं लौटता, बल्कि जल के अत्यधिक घट जाने पर जड़ सहित मुरझा जाता है। इसी प्रकार धन के घटने पर मनुष्य का सुख और मानसिक प्रसन्नता भी समाप्त हो जाती है।
काव्य-सौंदर्य —भाव — धन-संपत्ति का मन पर प्रभाव। अलंकार — दृष्टान्त एवं रूपक। भाषा — ब्रजभाषा। जल और कमल के माध्यम से संपत्ति तथा मन के सम्बन्ध को अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से समझाया गया है।
दोहा — 15
न ए बिससिये लखि नए, दुर्जन दुसह सुभाय।
आँटै परि प्रानन हरत, काँटै लौं लगि पाय॥
शब्दार्थ —बिससिये — विश्वास करें। लखि — देखकर। नए — नए व्यक्ति। दुर्जन — दुष्ट व्यक्ति। दुसह — असहनीय। सुभाय — स्वभाव। आँटै — पकड़ में आते ही। प्रानन — प्राणों को। काँटै — काँटे। लगि पाय — पैर में लगते ही।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने दुर्जन व्यक्ति के स्वभाव की तुलना काँटे से करते हुए उससे सावधान रहने की शिक्षा दी है।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहते हैं कि नए व्यक्ति को देखकर उसके मधुर व्यवहार पर विश्वास नहीं कर लेना चाहिए, क्योंकि दुर्जन का स्वभाव अत्यन्त कष्टदायक होता है। जिस प्रकार काँटा पैर में लगते ही पीड़ा पहुँचाता है, उसी प्रकार दुर्जन व्यक्ति अपने सम्पर्क में आते ही मनुष्य को कष्ट पहुँचाने लगता है और अवसर पाकर उसके प्राण तक लेने को तैयार हो जाता है।
काव्य-सौंदर्य —भाव — दुर्जनों से सावधान रहने की शिक्षा। अलंकार — उपमा एवं दृष्टान्त। भाषा — ब्रजभाषा। काँटे के उदाहरण द्वारा दुर्जन व्यक्ति की हानिकारक प्रवृत्ति को प्रभावशाली बनाया गया है।
दोहा — 16
स्वारथ सुकृत न श्रम वृथा, देखि विहंग विचारि।
बाजि पराये पानि परि, तूँ पच्छीन न मारि॥
शब्दार्थ —स्वारथ — अपना हित। सुकृत — पुण्य, अच्छा कार्य। श्रम — परिश्रम। वृथा — व्यर्थ। विहंग — पक्षी। विचारि — विचार करके। बाजि — बाज पक्षी। पराये पानि — दूसरे के हाथ। पच्छीन — पक्षी। मारि — मारना।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने किसी दूसरे के हाथों में पड़ चुके पक्षी का शिकार करने से उत्पन्न व्यर्थ परिश्रम और निष्फलता की ओर संकेत किया है।
हिन्दी व्याख्या —कवि एक पक्षी से कहते हैं कि हे पक्षी! विचार करके देखो, यदि बाज किसी दूसरे के हाथ में पड़ चुका है तो उसका पीछा करके उसे मारने में तुम्हारा परिश्रम व्यर्थ जाएगा और तुम्हारा कोई स्वार्थ भी सिद्ध नहीं होगा। इसलिए ऐसी वस्तु के पीछे नहीं पड़ना चाहिए जो पहले ही किसी दूसरे के अधिकार में जा चुकी हो।
काव्य-सौंदर्य —भाव — व्यर्थ परिश्रम से बचने की शिक्षा। अलंकार — दृष्टान्त। भाषा — ब्रजभाषा। पक्षी और बाज के उदाहरण द्वारा व्यवहारिक जीवन की महत्त्वपूर्ण नीति को सरलता से समझाया गया है।
दोहा — 17
तन भूषन अंजन दृगनि, पगनि महावरि रंग।
नहिं सोभा कौं राजियत, कहिबे ही कौं अंग॥
शब्दार्थ —तन — शरीर। भूषन — आभूषण। अंजन — काजल। दृगनि — आँखों में। पगनि — पैरों में। महावरि — पैरों में लगाया जाने वाला लाल रंग। सोभा — शोभा। राजियत — शोभित होना। अंग — शरीर के अंग।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने नायिका के अंगों पर सजे आभूषणों, आँखों के काजल और पैरों की महावर से बढ़ती हुई उसकी शोभा का वर्णन किया है।
हिन्दी व्याख्या —नायिका के शरीर पर विभिन्न प्रकार के आभूषण सुशोभित हैं, आँखों में काजल लगा है और पैरों में महावर की लालिमा है। उसके शरीर का प्रत्येक अंग इन सौंदर्य-सामग्रियों से सुसज्जित होकर इतना सुन्दर दिखाई देता है कि उसकी सम्पूर्ण शोभा का वर्णन शब्दों में करना कठिन है।
काव्य-सौंदर्य —भाव — नायिका के शृंगार और सौंदर्य का चित्रण। अलंकार — अनुप्रास। भाषा — ब्रजभाषा। कवि ने अल्प शब्दों में नायिका के सम्पूर्ण शृंगार का सजीव चित्र उपस्थित किया है।
दोहा — 18
लिखन बैठि जाकी सबिह, गहि-गहि गरह गुरूर।
भए न केते जगत के, चतुर चितेरे कूर॥
शब्दार्थ —लिखन बैठि — चित्र बनाने के लिए बैठकर। जाकी — जिसकी। सबिह — सभी। गहि-गहि — बार-बार पकड़कर। गरह — दोष। गुरूर — अभिमान। चतुर — कुशल। चितेरे — चित्रकार। कूर — असमर्थ।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने किसी सुन्दरी के अद्भुत सौंदर्य का वर्णन करते हुए संसार के कुशल चित्रकारों की असमर्थता का उल्लेख किया है।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहते हैं कि संसार के कितने ही कुशल चित्रकार उस सुन्दरी का चित्र बनाने बैठें, फिर भी उसके सौंदर्य को पूरी तरह चित्रित नहीं कर सकते। वे उसके सौंदर्य का एक-एक अंग देखकर अपनी कला पर गर्व करते हुए भी उसके वास्तविक रूप को चित्र में उतारने में असमर्थ हो जाते हैं।
काव्य-सौंदर्य —भाव — नायिका के अनुपम सौंदर्य का वर्णन। अलंकार — अतिशयोक्ति एवं अनुप्रास। भाषा — ब्रजभाषा। चित्रकारों की असमर्थता के माध्यम से नायिका के अद्वितीय सौंदर्य को प्रभावशाली बनाया गया है।
दोहा — 19
सकत न तुव ताते बचन, मो रस को रस खोय।
खिन-खिन औंटे खीर लौं, खरौं सवादिल होय॥
शब्दार्थ —तुव — तुम्हारे। ताते — तुम्हारे कारण। बचन — वचन। रस — आनंद, प्रेम का भाव। खिन-खिन — क्षण-क्षण। औंटे — उबलती/गाढ़ी होती। खीर — दूध से बना पकवान। सवादिल — स्वादिष्ट।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में प्रेमिका के वचनों से उत्पन्न प्रेम-रस की मधुरता का वर्णन खीर के उदाहरण द्वारा किया गया है।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहते हैं कि तुम्हारे मधुर वचनों के कारण मेरे प्रेम-रस का स्वाद कभी कम नहीं होता। जिस प्रकार खीर को बार-बार उबालने और गाढ़ा करने पर उसका स्वाद और अधिक बढ़ जाता है, उसी प्रकार तुम्हारे वचनों से मेरे प्रेम का रस क्षण-क्षण और अधिक मधुर होता जाता है।
काव्य-सौंदर्य —भाव — प्रेम की निरन्तर बढ़ती मधुरता। अलंकार — उपमा एवं अनुप्रास। भाषा — ब्रजभाषा। खीर को बार-बार उबालने से उसके स्वाद के बढ़ने का उदाहरण देकर प्रेम की मधुरता को स्पष्ट किया गया है।
दोहा — 20
कहति नटति रीझति मिलति, खिलति लजि जात।
भरे भौन में होत है, नैनन ही सों बात॥
शब्दार्थ —कहति — कहती है। नटति — अभिनय करती है, नखरे करती है। रीझति — प्रसन्न होती है। मिलति — मिलती है। खिलति — प्रसन्न होकर मुस्कराती है। लजि — लज्जित होकर। भौन — भवन। नैनन — नेत्रों से। बात — संवाद।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के पद’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी जी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने नायक और नायिका के नेत्रों के माध्यम से होने वाले मौन प्रेम-संवाद का अत्यन्त मनोहर चित्रण किया है।
हिन्दी व्याख्या —नायिका कभी कुछ कहती है, कभी नखरे करती है, कभी प्रसन्न होकर प्रेम प्रकट करती है, कभी प्रिय से मिलती है और कभी मुस्कराकर लज्जित हो जाती है। भरे हुए भवन में भी वह अपने प्रिय से आँखों के संकेतों द्वारा ही प्रेम की बातें करती है। दोनों के बीच बिना बोले ही नेत्रों के माध्यम से प्रेम-संवाद चलता रहता है।
काव्य-सौंदर्य —भाव — नायक-नायिका का मौन प्रेम-संवाद। अलंकार — अनुप्रास एवं क्रियाओं की पुनरावृत्ति से भाव-सौंदर्य। भाषा — ब्रजभाषा। ‘कहति, नटति, रीझति, मिलति, खिलति, लजि’ जैसे क्रियापदों द्वारा नायिका की विभिन्न चेष्टाओं का सजीव चित्रण किया गया है।
दोहा — 21
तंत्री नाद कवित्त रस, सरस राग रति रंग ।
अनबूड़े बूड़े तिरे, जे बूड़े सब अंग ।।
अनबूड़े बूड़े तिरे, जे बूड़े सब अंग ।।
शब्दार्थ —तंत्री—वीणा आदि के तार वाले वाद्य। नाद—ध्वनि। कवित्त—कवित्त छन्द की कविता। रस—काव्य का आनन्द। सरस—रसमय। राग—संगीत का स्वर तथा प्रेम। रति—प्रेम। रंग—आनन्द, प्रेम का प्रभाव। अनबूड़े—जो डूबे नहीं हैं। बूड़े—डूबे हुए। तिरे—पार हो गए। अंग—सर्वांग, सम्पूर्ण शरीर।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता गागर में सागर भरने वाले रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —प्रस्तुत दोहे में कवि ने संगीत, काव्य और प्रेम के आनन्द में पूर्णतः डूब जाने के महत्त्व को बताया है।
हिन्दी व्याख्या —बिहारी कहते हैं कि वीणा आदि वाद्यों का मधुर नाद, कवित्त का रस, मधुर राग और प्रेम का आनन्द—इन सबमें जो व्यक्ति पूरी तरह डूब जाता है, वही वास्तव में जीवन के आनन्द को प्राप्त करता है। जो इन रसों में केवल ऊपर-ऊपर रहते हैं, वे जीवन के वास्तविक आनन्द से वंचित रहते हैं।
काव्य-सौंदर्य —भाव: संगीत, काव्य और प्रेम में पूर्ण तल्लीनता का महत्त्व। अलंकार: विरोधाभास अलंकार का सुन्दर प्रयोग—जो डूबे वही तिरे। भाषा: ब्रजभाषा। दोहे में कम शब्दों में गहन भाव व्यक्त किए गए हैं।
दोहा — 22
जरे दुहन के दृग झमकि रूके न झीने चीर ।
हलकी फौंज हरौंल ज्यौं परत गोल पर भीर ।।
हलकी फौंज हरौंल ज्यौं परत गोल पर भीर ।।
शब्दार्थ —दुहन—दोनों के। दृग—नेत्र। झमकि—चमककर। झीने चीर—पतले वस्त्र। फौंज—सेना। हरौंल—सेना की अग्रिम पंक्ति। गोल—समूह। भीर—भीड़।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने नायक-नायिका के नेत्रों की चंचलता और उनके परस्पर आकर्षण का चित्रण किया है।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहता है कि दोनों के नेत्र झीने वस्त्रों के बीच से चमकते हुए एक-दूसरे पर ऐसे प्रभाव डाल रहे हैं, जैसे किसी युद्ध में हल्की-सी अग्रिम सेना शत्रु की भीड़ पर टूट पड़ती है। दोनों के नेत्रों का यह आकर्षण अत्यन्त तीव्र और प्रभावशाली है।
काव्य-सौंदर्य —भाव: नेत्रों के माध्यम से प्रेम-व्यापार का चित्रण। अलंकार: उपमा अलंकार। प्रेम-दृष्टि की तुलना सेना के आक्रमण से अत्यन्त प्रभावपूर्ण ढंग से की गई है।
दोहा — 23
दृग उरझत टूटत कुटुम, जुरत चतुर चित प्रीति।
परति गाँठि दुरजन हिये, दई नई यह रीति॥
परति गाँठि दुरजन हिये, दई नई यह रीति॥
शब्दार्थ —दृग—नेत्र। उरझत—उलझते हैं। टूटत—टूटते हैं। कुटुम—परिवार। जुरत—जुड़ते हैं। चित—हृदय, मन। प्रीति—प्रेम। गाँठि—गाँठ, सम्बन्ध। दुरजन—दुष्ट व्यक्ति। हिये—हृदय में।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने प्रेम के सामाजिक प्रभाव तथा प्रेमी-प्रेमिका की दृष्टि के कारण उत्पन्न होने वाले आकर्षण का चित्रण किया है।
हिन्दी व्याख्या —बिहारी कहते हैं कि प्रेमी और प्रेमिका के नेत्र आपस में उलझते हैं तो उनके परिवारों के सम्बन्ध टूटने लगते हैं, जबकि चतुर प्रेमियों के हृदयों में प्रेम का सम्बन्ध जुड़ जाता है। दूसरी ओर दुष्ट लोगों के हृदय में इस प्रेम के कारण ईर्ष्या की गाँठ पड़ जाती है। कवि ने प्रेम के प्रभाव की यह नई रीति बताई है।
काव्य-सौंदर्य —भाव: प्रेम के विविध प्रभावों का चित्रण। अलंकार: श्लेष एवं विरोधाभास का सौंदर्य। शैली: अत्यन्त संक्षिप्त एवं व्यंजना-प्रधान।
दोहा — 24
बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।
सौंह करै, भौंहन हँसै, देन कहै नटि जाय॥
सौंह करै, भौंहन हँसै, देन कहै नटि जाय॥
शब्दार्थ —बतरस—बातचीत का आनन्द। लाल—श्रीकृष्ण। लालच—लोभ। मुरली—बाँसुरी। लुकाय—छिपाकर। सौंह—शपथ। भौंहन—भौंहों से। हँसै—मुस्कराती है। नटि—नखरा करके, बहाना करके।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में राधा द्वारा कृष्ण की बाँसुरी छिपाकर उनसे बातचीत करने के बहाने किए गए प्रेमपूर्ण व्यवहार का चित्रण है।
हिन्दी व्याख्या —राधा श्रीकृष्ण से बातचीत करने के आनन्द के लोभ में उनकी मुरली छिपा लेती हैं। कृष्ण मुरली माँगते हैं तो राधा शपथ खाकर कहती हैं कि उन्होंने मुरली नहीं ली। वह भौंहों से मुस्कराती हुई मुरली देने से नखरा करती हुई चली जाती हैं।
काव्य-सौंदर्य —भाव: राधा-कृष्ण के प्रेम का चंचल और मनोरम चित्रण। अलंकार: हाव-भाव एवं स्वाभाविक चेष्टाओं का सुन्दर चित्रण। भाषा: सरस ब्रजभाषा।
दोहा — 25
गिरै कंपि कछु-कछु रहै, कर पसीझि लपटाय ।
लीने मुठ्ठी गुलाल भरि, छुटत झूठि ह्वै जाय ।।
लीने मुठ्ठी गुलाल भरि, छुटत झूठि ह्वै जाय ।।
शब्दार्थ —गिरै—गिरता है। कंपि—काँपकर। कछु-कछु—थोड़ा-थोड़ा। कर—हाथ। पसीझि—पसीजकर, पसीने से भीगकर। लपटाय—लिपट जाता है। मुठ्ठी—हाथ में भरी मात्रा। गुलाल—अबीर का लाल रंग। छुटत—छूटते समय। झूठि—झूठी, खाली।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में होली के अवसर पर नायक-नायिका के प्रेमपूर्ण व्यवहार और गुलाल खेलने का चित्रण किया गया है।
हिन्दी व्याख्या —नायिका गुलाल की मुट्ठी भरकर नायक पर डालने के लिए आगे बढ़ती है। प्रेम और संकोच के कारण उसका हाथ काँपता है तथा हाथ पसीजकर नायक से लिपट जाता है। जब वह हाथ छुड़ाती है तो उसकी मुट्ठी का गुलाल गिरकर समाप्त हो जाता है।
काव्य-सौंदर्य —भाव: होली के बहाने प्रेमी-प्रेमिका के प्रणय-व्यवहार का चित्रण। अलंकार: स्वाभाविक चेष्टाओं का सुन्दर चित्रण। विशेषता: कम शब्दों में संकोच, प्रेम और चंचलता का सजीव चित्र प्रस्तुत किया गया है।
दोहा — 26
भाल लाल बेंदी ललन, आखत रहे बिराजि ।
इंदुकला कुंज में बसी, मनौ राहु भय भाजि ।।
इंदुकला कुंज में बसी, मनौ राहु भय भाजि ।।
शब्दार्थ —भाल—माथा। लाल बेंदी—लाल बिन्दी। ललन—नायिका। आखत—आँखों के आगे, सामने। बिराजि—सुशोभित होकर। इंदुकला—चन्द्रमा की कला। कुंज—लता-गृह। राहु—चन्द्रमा को ग्रसने वाला ग्रह। भय भाजि—भय से भागकर।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने नायिका के माथे पर लगी लाल बिन्दी की शोभा का चन्द्रमा की कला के रूप में चित्रण किया है।
हिन्दी व्याख्या —नायिका के माथे पर लाल बिन्दी अत्यन्त सुन्दर लग रही है। वह ऐसी प्रतीत होती है मानो चन्द्रमा की उज्ज्वल कला किसी कुंज में आकर निवास कर रही हो और राहु के भय से वहाँ छिप गई हो।
काव्य-सौंदर्य —भाव: नायिका के ललाट पर लाल बिन्दी की मनोहर शोभा। अलंकार: उत्प्रेक्षा अलंकार—बिन्दी को चन्द्रमा की कला के रूप में कल्पित किया गया है। उपमा: अप्रत्यक्ष रूप से चन्द्रमा की कला का सौंदर्य।
दोहा — 27
चमचमात चंचल नयन बिच घूँघट पट झीन ।
मानहुँ सुर-सरिता विमल जल उछरत जुग मीन ।।
शब्दार्थ —चमचमात—चमकते हुए। चंचल—चपल। नयन—आँखें। बिच—बीच में। घूँघट पट—घूँघट का वस्त्र। झीन—पतला। मानहुँ—मानो। सुर-सरिता—गंगा नदी। विमल—निर्मल। उछरत—उछलती हुई। जुग मीन—दो मछलियाँ।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने झीने घूँघट से दिखाई पड़ती नायिका की चंचल आँखों की उपमा मछलियों से दी है।
हिन्दी व्याख्या —नायिका की चमकती और चंचल आँखें झीने घूँघट के बीच से दिखाई दे रही हैं। ऐसा लगता है मानो निर्मल गंगा के स्वच्छ जल में दो मछलियाँ चंचलता से उछल रही हों।
काव्य-सौंदर्य —भाव: नायिका की चंचल आँखों का मनोहारी चित्रण। अलंकार: उपमा अलंकार। आँखों की तुलना निर्मल गंगा में उछलती दो मछलियों से की गई है। दृश्य: अत्यन्त सजीव एवं चित्रात्मक।
दोहा — 28
बामा भामा कामिनी, कहि बोले प्रानेस ।
प्यारी कहत लजात नहिं, पावस चलत विदेस ।।
शब्दार्थ —बामा—सुन्दर स्त्री। भामा—सुन्दरी, स्वाभिमानी स्त्री। कामिनी—सुन्दर स्त्री। प्रानेस—प्राणनाथ, प्रियतम। प्यारी—प्रिय। लजात—लज्जित होती। पावस—वर्षा ऋतु। विदेस—परदेश।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में वर्षा ऋतु में प्रियतम के परदेश जाने पर नायिका की व्याकुलता का चित्रण किया गया है।
हिन्दी व्याख्या —प्रियतम अपनी सुन्दरी प्रेयसी को ‘बामा’, ‘भामा’ और ‘कामिनी’ कहकर सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि हे प्यारी! वर्षा ऋतु में मैं परदेश जा रहा हूँ। नायिका प्रियतम के इस प्रकार जाने की बात सुनकर व्याकुल हो उठती है, पर प्रेम और संकोच के कारण अपने भाव स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं कर पाती।
काव्य-सौंदर्य —भाव: प्रिय के वियोग की आशंका से उत्पन्न नायिका की व्याकुलता। रस: विप्रलम्भ शृंगार। भाषा: सरस एवं भावपूर्ण ब्रजभाषा।
दोहा — 29
अनियारे दीरघ दृगनि किती न तरुनि समान ।
वह चितवनी औरै कछू, जिंहि बस होत सुजान ।।
शब्दार्थ —अनियारे—कजरारे, तीखे। दीरघ—लम्बे। दृगनि—आँखों से। किती—कितनी। तरुनि—युवती। चितवनी—दृष्टि, देखने का ढंग। औरै—अलग ही। जिंहि—जिससे। सुजान—बुद्धिमान, चतुर व्यक्ति। बस—वश में।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने युवती की कजरारी, लम्बी और प्रभावशाली आँखों की चितवन का वर्णन किया है।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहते हैं कि संसार में बहुत-सी युवतियों की लम्बी और कजरारी आँखें होती हैं, परन्तु इस युवती की चितवन कुछ और ही प्रकार की है। उसकी एक विशेष दृष्टि ऐसी प्रभावशाली है कि बड़े-बड़े चतुर और बुद्धिमान व्यक्ति भी उसके वश में हो जाते हैं।
काव्य-सौंदर्य —भाव: नायिका की प्रभावशाली चितवन का वर्णन। अलंकार: व्यतिरेक अलंकार की छटा। विशेषता: बिहारी ने नेत्रों के माध्यम से प्रेम के प्रभाव को अत्यन्त संक्षेप में व्यक्त किया है।
दोहा — 30
मकराकृत गोपाल के सोहत कुंडल कान ।
धर् यौ मनो हिय धर समर ड्यौढ़ी लसत निसान ।।
शब्दार्थ —मकराकृत—मगरमच्छ के आकार के। गोपाल—श्रीकृष्ण। सोहत—सुशोभित होते हैं। कुंडल—कान का आभूषण। कान—कर्ण। मनो—मानो। हिय—हृदय। समर—युद्ध। ड्यौढ़ी—द्वार। निसान—नगाड़ा, युद्ध का संकेत देने वाला वाद्य।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने श्रीकृष्ण के कानों में सुशोभित मकराकृति कुण्डलों की शोभा का वर्णन किया है।
हिन्दी व्याख्या —श्रीकृष्ण के कानों में मकर के आकार के कुण्डल अत्यन्त सुन्दर लग रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो उनके हृदय-रूपी युद्ध के द्वार पर विजय का संकेत देने वाले नगाड़े बज रहे हों।
काव्य-सौंदर्य —भाव: श्रीकृष्ण के कुण्डलों की मनोहर शोभा। अलंकार: उत्प्रेक्षा अलंकार। कुण्डलों को युद्ध के नगाड़े के रूप में कल्पित किया गया है। चित्रात्मकता: उपमा और कल्पना से दृश्य सजीव हो उठा है।
दोहा — 31
लसत सेत सारी ढक्यौ, तरल तरौना कान ।
पर् यौ मनौ सुरसर-सलिल रवि प्रतिबिम्ब विहान ।।
शब्दार्थ —लसत—चमकती हुई। सेत—श्वेत, सफेद। सारी—साड़ी। ढक्यौ—ढका हुआ। तरल—चंचल, चमकीला। तरौना—तरुणी का आभूषण। कान—कर्ण। सुरसर—गंगा। सलिल—जल। रवि—सूर्य। प्रतिबिम्ब—परछाई। विहान—प्रातःकाल।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में श्वेत साड़ी से ढकी नायिका के कानों में चमकते आभूषण की शोभा का वर्णन किया गया है।
हिन्दी व्याख्या —श्वेत साड़ी से ढकी हुई नायिका के कानों में चमकता हुआ आभूषण अत्यन्त मनोहर दिखाई देता है। ऐसा लगता है मानो प्रातःकाल निर्मल गंगा के जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब चमक रहा हो।
काव्य-सौंदर्य —भाव: नायिका के कान के आभूषण की मनोहारी चमक। अलंकार: उत्प्रेक्षा अलंकार। उपमा: आभूषण की तुलना गंगा के जल में पड़ने वाले सूर्य के प्रतिबिम्ब से की गई है।
दोहा — 32
सटपटाति सी ससिमुखी, मुख घूँघट पट ढाँकि ।
पावक-झर सी झमकि कै गई झरोखा झाँकि ।।
शब्दार्थ —सटपटाति—घबराती हुई, व्याकुल। ससिमुखी—चन्द्रमा के समान मुख वाली। घूँघट पट—घूँघट का वस्त्र। ढाँकि—ढककर। पावक—अग्नि। झर—धारा। झमकि—चमककर। झरोखा—खिड़की। झाँकि—देखकर।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में नायिका द्वारा घूँघट में अपना मुख छिपाकर झरोखे से प्रिय को देखने की चंचल चेष्टा का चित्रण है।
हिन्दी व्याख्या —चन्द्रमा के समान मुख वाली नायिका घबराते हुए अपने मुख को घूँघट से ढक लेती है। फिर वह झरोखे से प्रिय को देखने के लिए क्षणभर झाँकती है और बिजली अथवा अग्नि की चमक के समान झलक दिखाकर तुरन्त चली जाती है।
काव्य-सौंदर्य —भाव: नायिका की लज्जा, चंचलता और प्रेमपूर्ण चेष्टा। अलंकार: उपमा अलंकार—उसकी झलक की तुलना पावक की चमक से की गई है। रस: शृंगार रस।
दोहा — 33
कागद पर लिखत न बनत, कहत सँदेस लजात ।
कहिहे सब तेरे हिए, मेरे हिय की बात ।।
शब्दार्थ —कागद—कागज। लिखत—लिखना। सँदेस—सन्देश। लजात—लज्जा आती है। कहिहे—कह देना। हिए—हृदय। हिय—हृदय, मन।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में विरहिणी नायिका अपने प्रिय को प्रेम-सन्देश लिखने और कहने में होने वाली लज्जा को व्यक्त करती है।
हिन्दी व्याख्या —नायिका कहती है कि मैं कागज पर अपने हृदय की बात लिख नहीं सकती और किसी के द्वारा सन्देश भी नहीं कहलवा सकती, क्योंकि मुझे लज्जा आती है। इसलिए हे प्रिय! तुम स्वयं मेरे हृदय को समझकर मेरे मन की सारी बातें जान लो।
काव्य-सौंदर्य —भाव: प्रेम की गहनता और लज्जा का मार्मिक चित्रण। अलंकार: व्यंजना का सुन्दर प्रयोग। विशेषता: कवि ने बिना कहे हृदय की बात समझ लेने वाले प्रेम की भावना को अत्यन्त प्रभावी ढंग से व्यक्त किया है।
दोहा — 34
पटु पाँखै भखु काँकरे सपर परेई संग ।
सुखी परेवा जगत में, एकै तुही बिहंग ।।
शब्दार्थ —पटु—पंख। पाँखै—पंखों से। भखु—भोजन कर। काँकरे—कंकड़। सपर—साथ। परेई—परेवा, कबूतर। सुखी—सुखी। बिहंग—पक्षी।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने पक्षियों के माध्यम से उस व्यक्ति के सुखी जीवन का संकेत किया है जो अपनी आवश्यकताओं में संतुष्ट रहता है।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहता है कि हे पक्षी! तुम अपने पंखों से उड़ते हो, कंकड़ आदि खाकर भी अपने साथी कबूतर के साथ सुखपूर्वक रहते हो। संसार में तुम ही ऐसे पक्षी हो जो थोड़े में सन्तुष्ट होकर सुखी जीवन बिताते हो।
काव्य-सौंदर्य —भाव: संतोष और सादगी में सुख की भावना। शैली: प्रतीकात्मक एवं व्यंजना-प्रधान। विशेषता: पक्षी के माध्यम से मनुष्य के लिए संतोषपूर्ण जीवन का संदेश दिया गया है।
दोहा — 35
जब-जब वै सुधि कीजियै, तब तब सब सुधि जाहिं ।
आँखिन आँखि लगी रहैं, आँखौ लागति नाहिं ।।
शब्दार्थ —सुधि—स्मरण, ध्यान। सुधि कीजियै—स्मरण किया जाता है। जाहिं—चली जाती हैं। आँखिन—आँखों में। आँखि लगी—दृष्टि मिली हुई। आँखौ—आँख भी। नाहिं—नहीं।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में प्रेमी-प्रेमिका के परस्पर दृष्टि-संयोग और उस समय की मानसिक अवस्था का अत्यन्त सूक्ष्म चित्रण किया गया है।
हिन्दी व्याख्या —जब-जब प्रेमिका अपने प्रिय का स्मरण करती है, तब-तब उसे संसार की अन्य सभी बातें भूल जाती हैं। उसकी आँखें प्रिय की आँखों में ऐसी लगी रहती हैं कि उसे अपनी आँखों का भी ध्यान नहीं रहता। प्रेम की तन्मयता में वह पूरी तरह स्वयं को भूल जाती है।
काव्य-सौंदर्य —भाव: प्रेम की तन्मयता और आत्म-विस्मृति। अलंकार: पुनरुक्ति-प्रकाश तथा विरोधाभास की छटा। विशेषता: ‘आँख’ और ‘सुधि’ की पुनरावृत्ति से भाव की तीव्रता बढ़ गई है।
दोहा — 36
सोवत सपनें श्यामघन, हिलि मिलि हरत वियोग ।
तबहीं टरि कितहूँ गई, नींदौं नींदन जोग ।।
शब्दार्थ —सोवत—सोते हुए। सपनें—स्वप्न में। श्यामघन—श्यामवर्ण श्रीकृष्ण। हिलि मिलि—मिल-जुलकर। हरत—दूर करते हैं। वियोग—विरह। तबहीं—तभी। टरि—दूर हो गई। कितहूँ—कहीं। नींदौं—नींद से। जोग—सम्बन्ध।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में विरहिणी नायिका के स्वप्न में श्रीकृष्ण के आने और उसके विरह को क्षणभर दूर करने का मार्मिक चित्रण है।
हिन्दी व्याख्या —विरहिणी नायिका सोते समय स्वप्न में श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण को देखती है। स्वप्न में श्रीकृष्ण उसके साथ मिलकर उसके वियोग को दूर कर देते हैं। लेकिन तभी अचानक नींद टूट जाती है और श्रीकृष्ण उससे दूर हो जाते हैं। इस प्रकार स्वप्न में मिला प्रेम-सुख भी क्षणभर का ही रह जाता है और विरह की पीड़ा फिर जाग उठती है।
काव्य-सौंदर्य —भाव: विरहिणी की स्वप्नावस्था और क्षणिक मिलन का मार्मिक चित्रण। रस: विप्रलम्भ शृंगार। विशेषता: स्वप्न के टूटने के साथ पुनः उत्पन्न विरह-वेदना को अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया गया है।
दोहा — 37
आवत जात न जानियत, तेजहिं तजि सियरान।
घरहँ जवाई लौं घट्यौं खरो पूस दिन-मान॥
शब्दार्थ —आवत जात — आना-जाना। तेजहि — धूप के तेज को। सियरान — सर्दी। घरहँ जवाई — घर के जमाई की तरह। पूस — पौष मास। दिन-मान — दिन का समय।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता गागर में सागर भरने वाले रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने पौष मास में दिन के निरन्तर छोटे होते जाने तथा सर्दी के प्रभाव का वर्णन किया है।
हिन्दी व्याख्या —बिहारी कहते हैं कि पौष मास में दिन इतने छोटे हो जाते हैं कि उनके आने-जाने का पता ही नहीं चलता। धूप अपना तेज छोड़ देती है और ठंड बढ़ जाती है। ऐसा लगता है मानो दिन घर के जमाई की तरह थोड़ी देर के लिए ही आता है और शीघ्र ही चला जाता है।
काव्य-सौंदर्य —भाव: पौष मास की सर्दी और छोटे दिनों का मनोरम चित्रण। अलंकार: उत्प्रेक्षा तथा अतिशयोक्ति। भाषा: सरल, सरस एवं चित्रात्मक ब्रजभाषा।
दोहा — 38
छकि रसाल सौरभ सने, मधुर माधवी गंध।
ठौर-ठौर झूमत झँपत भौंर-झौंर मधु-अंध॥
शब्दार्थ —छकि — छककर, भरकर। रसाल — आम के वृक्ष। सौरभ — सुगन्ध। माधवी — माधवी लता। भौंर-झौंर — भौंरों के समूह। मधु-अंध — मधुर रस के कारण मतवाले।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने वसन्त ऋतु में आम्रवृक्षों और माधवी लता की सुगन्ध से आकर्षित होकर झूमते हुए भौंरों का चित्रण किया है।
हिन्दी व्याख्या —आम के वृक्ष सुगन्ध से भर गए हैं और माधवी लता की मधुर सुगन्ध चारों ओर फैल रही है। उस सुगन्ध और मधुर रस से मतवाले होकर भौंरों के समूह स्थान-स्थान पर झूमते और मँडराते फिर रहे हैं।
काव्य-सौंदर्य —भाव: वसन्त की सुगन्धमयी प्राकृतिक शोभा। अलंकार: अनुप्रास एवं मानवीकरण। भाषा: चित्रात्मक एवं संगीतात्मक ब्रजभाषा।
दोहा — 39
अरुन सरोरुह कर चरन दृग खंजन मुख चंद।
समय आय सुंदरि सरद काहि न करति अनंद॥
शब्दार्थ —अरुन — लालिमा युक्त। सरोरुह — कमल। कर — हाथ। चरन — पैर। दृग — आँखें। खंजन — खंजन पक्षी। मुख चंद — चन्द्रमा के समान मुख। सरद — शरद ऋतु। अनंद — आनन्द।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने शरद ऋतु के आगमन पर सुन्दरी के सौन्दर्य का वर्णन किया है।
हिन्दी व्याख्या —शरद ऋतु के आगमन पर सुन्दरी के लाल कमल के समान हाथ-पैर, खंजन पक्षी के समान चंचल नेत्र और चन्द्रमा के समान मुख की शोभा और भी निखर उठती है। ऐसे सुन्दर समय में वह आनन्दित क्यों न हो?
काव्य-सौंदर्य —भाव: शरद ऋतु और नायिका के सौन्दर्य का सामंजस्य। अलंकार: उपमा एवं प्रश्नोक्ति। भाषा: कोमल एवं चित्रात्मक ब्रजभाषा।
दोहा — 40
नाहिंन ये पावक प्रबल, लूऐं चलति चहुँ पास।
मानों बिरह बसंत के, ग्रीषम लेत उसांस॥
शब्दार्थ —पावक — अग्नि। प्रबल — तेज। लूऐं — गर्म हवाएँ। चहुँ पास — चारों ओर। बिरह — वियोग। ग्रीषम — ग्रीष्म ऋतु। उसांस — आह, साँस।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने ग्रीष्म ऋतु की प्रचण्ड गर्मी और लू के प्रभाव का विरह से सम्बन्ध स्थापित किया है।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहता है कि चारों ओर चलने वाली गर्म हवाएँ मानो प्रचण्ड अग्नि नहीं हैं, बल्कि विरह से पीड़ित वसन्त ऋतु की आहें हैं। ऐसा लगता है जैसे ग्रीष्म ऋतु भी विरह के कारण गहरी साँसें भर रही हो।
काव्य-सौंदर्य —भाव: ग्रीष्म की गर्मी का विरह-वेदना से सम्बन्ध। अलंकार: उत्प्रेक्षा एवं रूपक। भाषा: भावपूर्ण और चित्रात्मक।
दोहा — 41
कहलाने एकत बसत, अहि मयूर मृग बाघ।
जगत तपोवन सो कियौ दीरघ दाघ निदाघ॥
शब्दार्थ —कहलाने — कहलाते थे। एकत — एक स्थान पर। अहि — साँप। मयूर — मोर। मृग — हिरण। बाघ — व्याघ्र। तपोवन — तपस्वियों का वन। दीरघ — लम्बे समय का। दाघ — गर्मी। निदाघ — ग्रीष्म ऋतु।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में ग्रीष्म ऋतु की भीषण गर्मी के कारण शत्रु पशु-पक्षियों के स्वभाव में आए परिवर्तन का चित्रण किया गया है।
हिन्दी व्याख्या —ग्रीष्म ऋतु की भयंकर गर्मी ने संसार को ऐसा तपोवन बना दिया है जहाँ साँप और मोर तथा हिरण और बाघ जैसे स्वाभाविक शत्रु भी एक साथ रहते दिखाई देते हैं। भीषण गर्मी ने उनके स्वाभाविक वैर को भी समाप्त कर दिया है।
काव्य-सौंदर्य —भाव: ग्रीष्म की भीषणता का प्रभाव। अलंकार: विरोधाभास एवं अतिशयोक्ति। चित्रण: स्वाभाविक शत्रुओं के साथ रहने का मनोरम दृश्य।
दोहा — 42
कुटिल अलक छुटि परत मुख, बढ़ि गौ इतो उदोत।
बंक बकारी देत ज्यौं दाम रुपैया होत॥
शब्दार्थ —कुटिल — घुँघराले। अलक — बालों की लट। छुटि — खुलकर। उदोत — प्रकाश, शोभा। बंक — टेढ़ा। बकारी — आकार। दाम — सिक्का।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने नायिका के मुख पर बिखरी हुई घुँघराली अलकों से बढ़ती हुई मुख-कान्ति का वर्णन किया है।
हिन्दी व्याख्या —नायिका के घुँघराले बालों की लटें जब उसके मुख पर खुलकर गिरती हैं तो उसके मुख की शोभा और अधिक बढ़ जाती है। कवि को यह दृश्य टेढ़े-मेढ़े आकार वाले सिक्के पर बने हुए चित्र जैसा प्रतीत होता है।
काव्य-सौंदर्य —भाव: नायिका के मुख और अलकों की शोभा। अलंकार: उपमा एवं उत्प्रेक्षा। भाषा: संक्षिप्त, चित्रात्मक और सौन्दर्यपूर्ण।
दोहा — 43
कहत सबै, बेंदी दिये, ऑंक हस गुनो होत।
तिय लिलार बेंदी दिये, अगनित होत उदोत॥
शब्दार्थ —बेंदी — बिन्दी। ऑंक — अंक, संख्या। गुनो — गुना। तिय — स्त्री। लिलार — ललाट। अगनित — अनगिनत। उदोत — शोभा।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने स्त्री के ललाट पर बिन्दी लगाने से बढ़ने वाली शोभा का वर्णन किया है।
हिन्दी व्याख्या —सामान्य रूप से कहा जाता है कि किसी वस्तु पर बिन्दी लगा देने से उसकी शोभा कई गुना बढ़ जाती है। परन्तु स्त्री के ललाट पर बिन्दी लगा देने से उसकी शोभा अनगिनत गुना बढ़ जाती है।
काव्य-सौंदर्य —भाव: बिन्दी से नायिका के सौन्दर्य में होने वाली वृद्धि। अलंकार: अतिशयोक्ति। भाषा: सरल और प्रभावपूर्ण ब्रजभाषा।
दोहा — 44
भाल लाल बेंदी छए छुटे बार छवि देत।
गह्यौं राहु खति आहु कर मनु ससि सूर समेत॥
शब्दार्थ —भाल — ललाट। लाल बेंदी — लाल बिन्दी। छए — लगाकर। बार — बाल। छवि — शोभा। राहु — ग्रहण लगाने वाला ग्रह। ससि — चन्द्रमा। सूर — सूर्य।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने नायिका के ललाट पर लाल बिन्दी और खुले बालों से उत्पन्न सौन्दर्य का वर्णन किया है।
हिन्दी व्याख्या —नायिका के ललाट पर लगी लाल बिन्दी और खुले हुए बाल उसकी शोभा को अत्यन्त बढ़ा देते हैं। ऐसा लगता है मानो उसके मुख रूपी चन्द्रमा और सूर्य को राहु ने एक साथ पकड़ लिया हो।
काव्य-सौंदर्य —भाव: नायिका के मुख की अद्भुत शोभा। अलंकार: उत्प्रेक्षा एवं रूपक। चित्रण: लाल बिन्दी और खुले बालों की प्रभावपूर्ण कल्पना।
दोहा — 45
हरि-छबि-जल जब तें परे तब ते छनि बिछुरैन।
भरत ढरत बूड़त तिरत रहट घरी लौं नैन॥
शब्दार्थ —हरि-छबि — श्रीकृष्ण की छवि। जल — जल के समान। छनि — क्षण। बिछुरैन — बिछुड़ने लगे। भरत — भरते हुए। ढरत — गिरते हुए। बूड़त — डूबते हुए। तिरत — तैरते हुए। नैन — आँखें।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने श्रीकृष्ण की छवि के दर्शन से नायिका की आँखों की चंचलता का वर्णन किया है।
हिन्दी व्याख्या —जब से नायिका की आँखों में श्रीकृष्ण की छवि रूपी जल भरा है, तब से उसकी आँखें एक क्षण भी स्थिर नहीं रहतीं। वे कभी भरती हैं, कभी आँसू बनकर गिरती हैं, कभी डूबती और कभी तैरती हुई प्रतीत होती हैं।
काव्य-सौंदर्य —भाव: प्रेम-विह्वल नायिका की चंचल आँखों का चित्रण। अलंकार: रूपक एवं अनुप्रास। भाषा: अत्यन्त चित्रात्मक और भावपूर्ण।
दोहा — 46
इन दुखिया अँखियान कौं, सुख सिरजोई नाहिं।
देखत बनै न देखते, बिन देखे अकुलाहिं॥
शब्दार्थ —दुखिया — दुःखी। अँखियान — आँखों को। सुख — प्रसन्नता। सिरजोई — सृष्टि, निर्माण। देखत बनै न — देखे बिना रहा नहीं जाता। अकुलाहिं — व्याकुल होती हैं।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने प्रेम में व्याकुल नायिका की आँखों की विरह-दशा का चित्रण किया है।
हिन्दी व्याख्या —नायिका की ये दुःखी आँखें ऐसी हैं जिन्हें कहीं से भी सुख प्राप्त नहीं होता। प्रिय को देखते हुए भी उनकी तृप्ति नहीं होती और प्रिय के दिखाई न देने पर वे अत्यन्त व्याकुल हो जाती हैं।
काव्य-सौंदर्य —भाव: प्रेमिका की अतृप्त प्रेम-वेदना। अलंकार: विरोधाभास। भाषा: सरल, मार्मिक एवं भावपूर्ण।
दोहा — 47
को जाने ह्वैंहै कहाँ, ब्रज उपजी अति आगि।
मन लागै नैननि लगें, चलै न मग लगि लागि॥
शब्दार्थ —को जाने — कौन जाने। ह्वैंहै — होगा। ब्रज — ब्रजभूमि। उपजी — उत्पन्न हुई। आगि — आग। नैननि — आँखों में। मग — मार्ग। लगि लागि — बार-बार लगने पर।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने प्रेम-विरह की तीव्र अग्नि और प्रिय के दर्शन की उत्कट इच्छा का वर्णन किया है।
हिन्दी व्याख्या —कवि कहता है कि ब्रज में न जाने कैसी तीव्र विरहाग्नि उत्पन्न हो गई है। नायिका की आँखें प्रिय के दर्शन के लिए व्याकुल हैं और उसका मन कहीं नहीं लगता। वह प्रिय की ओर जाने के लिए मार्ग पर चल पड़ना चाहती है, परन्तु विरह-वेदना से उसकी स्थिति विचित्र हो गई है।
काव्य-सौंदर्य —भाव: विरह की तीव्रता और प्रिय-दर्शन की आकुलता। अलंकार: रूपक एवं अतिशयोक्ति। भाषा: मार्मिक और प्रभावपूर्ण ब्रजभाषा।
दोहा — 48
कौड़ा आँसू बूँद कसि, साँकर बरुनी सजल।
कीने बदन निमूँद दृग मलंग डारे रहत॥
शब्दार्थ —कौड़ा — गर्म। बूँद — बूँद। साँकर — संकीर्ण, छोटी। बरुनी — बरौनियाँ। सजल — जल से भरी। निमूँद — बन्द करके। दृग — आँखें। मलंग — मस्त, अस्त-व्यस्त।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने विरहिणी नायिका की आँसुओं से भरी आँखों का मार्मिक चित्रण किया है।
हिन्दी व्याख्या —विरहिणी की आँखों से आँसू गर्म बूँदों के समान गिर रहे हैं। उसकी बरौनियाँ आँसुओं से भीगी हुई हैं। वह अपना मुख झुकाकर अथवा आँखें बन्द करके विरह-वेदना में डूबी हुई बैठी रहती है।
काव्य-सौंदर्य —भाव: विरहिणी की करुण दशा। अलंकार: उपमा एवं अनुप्रास। भाषा: मार्मिक, चित्रात्मक एवं भावप्रधान।
दोहा — 49
आड़ै दै आले बसन जाड़ेहूँ की राति।
साहस ककै सनेह बस सखी सबै ढिग जाति॥
शब्दार्थ —आड़ै — आड़ लेकर। आले — आले, दीवार की जगह। बसन — वस्त्र। जाड़ेहूँ — जाड़े में भी। साहस — हिम्मत। सनेह बस — प्रेम के वशीभूत होकर। ढिग — पास।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने प्रेम में साहस करके प्रिय से मिलने के लिए जाने वाली सखियों का चित्रण किया है।
हिन्दी व्याख्या —जाड़े की रात में भी सखियाँ अपने वस्त्रों की आड़ लेकर प्रिय के पास जाने का साहस करती हैं। प्रेम के वशीभूत होकर वे ठंड की परवाह नहीं करतीं और अपने प्रिय के समीप पहुँच जाती हैं।
काव्य-सौंदर्य —भाव: प्रेम की तीव्रता और साहस। अलंकार: अनुप्रास एवं अतिशयोक्ति। भाषा: सहज, सरस एवं चित्रात्मक।
दोहा — 50
कंचन-तन धन बरन बर रह्यौ रंग मिलि रंग।
जानी जाति सुबास ही केसरि लाई अंग॥
शब्दार्थ —कंचन-तन — सोने के समान शरीर। धन बरन — सुन्दर वर्ण। बर — श्रेष्ठ। रंग मिलि रंग — रंग में रंग मिलकर। सुबास — सुगन्ध। केसरि — केसर। अंग — शरीर।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने नायिका के स्वर्ण के समान शरीर तथा उसमें लगे केसर के सौन्दर्य और सुगन्ध का वर्णन किया है।
हिन्दी व्याख्या —नायिका का शरीर स्वर्ण के समान चमकीला और सुन्दर है। उसके शरीर पर केसर का रंग मिल जाने से उसका सौन्दर्य और भी निखर गया है। उसके शरीर से आने वाली सुगन्ध से यह सहज ही पता चल जाता है कि उसने केसर अपने अंगों पर लगाई है।
काव्य-सौंदर्य —भाव: नायिका के रूप, रंग और सुगन्ध का वर्णन। अलंकार: उपमा एवं अनुप्रास। भाषा: सौन्दर्यपूर्ण और चित्रात्मक।
दोहा — 51
पत्रा ही तिथी पाइये, वा घर के चहुँ पास।
नित प्रति पून्यौ ही रहे, आनन-ओप उजास॥
शब्दार्थ —पत्रा — पंचांग। तिथी — तिथि। चहुँ पास — चारों ओर। पून्यौ — पूर्णिमा। आनन — मुख। ओप — शोभा। उजास — प्रकाश।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने नायिका के मुख की चन्द्रमा के समान निरन्तर चमकती हुई शोभा का वर्णन किया है।
हिन्दी व्याख्या —जिस घर के चारों ओर ऐसी सुन्दरी रहती है, वहाँ तिथि जानने के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं है। उसके मुख की ऐसी उज्ज्वल शोभा रहती है मानो वहाँ प्रतिदिन पूर्णिमा का चन्द्रमा चमक रहा हो।
काव्य-सौंदर्य —भाव: नायिका के मुख की चन्द्रमा जैसी उज्ज्वलता। अलंकार: उत्प्रेक्षा एवं अतिशयोक्ति। भाषा: सरल और कल्पनापूर्ण।
दोहा — 52
अधर धरत हरि के परत, ओंठ, दीठ, पट जोति।
हरित बाँस की बाँसुरी, इंद्र धनुष दुति होति॥
शब्दार्थ —अधर — होंठ। हरि — श्रीकृष्ण। दीठ — दृष्टि। पट — वस्त्र। जोति — प्रकाश, आभा। हरित बाँस — हरे बाँस की। इंद्र धनुष — इन्द्रधनुष। दुति — आभा, चमक।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने श्रीकृष्ण के अधरों पर रखी हरी बाँसुरी की मनोहर शोभा का वर्णन किया है।
हिन्दी व्याख्या —जब श्रीकृष्ण हरी बाँस की बनी बाँसुरी को अपने अधरों पर रखते हैं, तब उनके होंठ, दृष्टि और वस्त्रों की आभा के साथ बाँसुरी की शोभा अत्यन्त मनोहर दिखाई देती है। वह ऐसी प्रतीत होती है मानो इन्द्रधनुष की आभा धारण कर रही हो।
काव्य-सौंदर्य —भाव: श्रीकृष्ण और बाँसुरी की मनोहर छवि। अलंकार: उपमा एवं उत्प्रेक्षा। भाषा: चित्रात्मक, मधुर और सौन्दर्यपूर्ण।
दोहा — 53
हुकुम पाय जयसिंह को हरि राधिका प्रसाद।
करी बिहारी सतसई भरी अनेक सवाद॥
शब्दार्थ —हुकुम — आदेश। जयसिंह — राजा जयसिंह। हरि राधिका प्रसाद — श्रीकृष्ण और राधा की कृपा से। सतसई — सात सौ दोहों का संग्रह। सवाद — स्वाद, रस।
सन्दर्भ —प्रस्तुत दोहा ‘मंदाकिनी’ के ‘बिहारी के दोहे’ पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता गागर में सागर भरने वाले रीतिसिद्ध कवि बिहारी हैं।
प्रसङ्ग —इस दोहे में कवि ने राजा जयसिंह के आदेश तथा श्रीराधा-कृष्ण की कृपा से ‘बिहारी सतसई’ की रचना पूर्ण होने का उल्लेख किया है।
हिन्दी व्याख्या —कवि बिहारी कहते हैं कि राजा जयसिंह के आदेश और श्रीराधा-कृष्ण की कृपा प्राप्त होने पर उन्होंने ‘बिहारी सतसई’ की रचना की। इस सतसई में अनेक प्रकार के रस और काव्य-सौन्दर्य भरे हुए हैं।
काव्य-सौंदर्य —भाव: ‘बिहारी सतसई’ की रचना का उद्देश्य और उसकी रसपूर्णता। अलंकार: श्लेष एवं अनुप्रास। विशेषता: अल्प शब्दों में व्यापक भाव व्यक्त करने की बिहारी की अद्भुत क्षमता।
2. बिहारी का जीवन परिचय
जीवन परिचय —
यहाँ बिहारी के जीवन, व्यक्तित्व एवं कृतित्व का परिचय रहेगा।
3. गागर में सागर भर देने वाले कवि बिहारी
विवेचन —
यहाँ बिहारी की संक्षिप्त एवं सारगर्भित काव्य-प्रतिभा का विवेचन रहेगा।
