घनानन्द
घनानन्द कवित्त के पदों का शब्दार्थ, सन्दर्भ, प्रसङ्ग, हिन्दी व्याख्या एवं विशेष/काव्यसौंदर्य।
घनानन्द कवित्त
झलकै अति सुन्दर आनन गौर, छके दृग राजत काननि छ्वै। हँसि बोलनि मैं छबि फूलन की बरषा, उर ऊपर जाति है ह्वै। लट लोल कपोल कलोल करैं, कल कंठ बनी जलजावलि द्वै। अंग अंग तरंग उठै दुति की, परिहे मनौ रूप अबै धर च्वै।।
झलकै = चमकता है, अति सुन्दर = अत्यन्त मनोहर, आनन = मुख, गौर = गौरवर्ण, छके दृग = कुछ मादक एवं चंचल नेत्र, राजत = शोभायमान, काननि छ्वै = कानों को स्पर्श करते हुए, हँसि बोलनि = हँसकर बोलने में, छबि = सौन्दर्य, फूलन की बरषा = फूलों की वर्षा, उर ऊपर = हृदय पर, लट लोल = लटकती हुई केश-लटें, कपोल = गाल, कलोल करैं = चंचलता करती हैं, कल कंठ = सुन्दर गला, जलजावलि द्वै = दो कमलों की पंक्ति के समान, अंग अंग = शरीर के प्रत्येक अंग में, तरंग उठै = लहरें उठती हैं, दुति = कांति, परिहे = प्रतीत होते हैं, मनौ = मानो, रूप अबै धर च्वै = सौन्दर्य ने अभी-अभी शरीर धारण किया हो ॥
रीतिकालीन ब्रजभाषा में घनानन्द की श्रृृंगार-प्रधान वाणियाँ।
प्रिय के रूप-चित्रण का मार्मिक उपस्थापन।
कवि प्रेमिका/प्रेमी के मुख, नेत्र व अंगों की मनोहर छटा को वर्णित करता है; हंसी फूलों की वर्षा-सी है।
विप्रलम्भ व संयोग दोनों के संकेत यहाँ अलंकारपूर्ण रूप से मिलते हैं।
रावरे रूप की रीति अनूप नयो नयो लागत ज्यों ज्यों निहारिये। त्यों इन आँखिन बानि अनोखी अघानि कहू नहिं आनि तिहारिये॥ एक ही जीव हुत्यौं सु तौ वार् यौं सुजान सँकोच औ सोच सहारियै रोकी रहै न, दहै घन आनन्द बावरी रीझ के हाथनि हारियै।।
रावरे = आपके, रूप = सौन्दर्य, रीति = ढंग, अनूप = अनुपम, नयो नयो = नया-नया, ज्यों ज्यों = जैसे-जैसे, निहारिये = देखते हैं, आँखिन = आँखों को, बानि = आदत, अनोखी = विचित्र, अघानि = तृप्त होकर, तिहारिये = आपके रूप से, एक ही जीव हुत्यौं = केवल एक ही प्राण था, वार् यौं = न्योछावर कर दिया, सुजान = हे प्रियतम, सँकोच = संकोच, सोच = चिंता, सहारियै = सहन करते हुए, रोकी रहै न = रोककर नहीं रखा जा सकता, दहै = जलता है, घन आनन्द = कवि घनानन्द, बावरी रीझ = प्रेम में पागल होकर, हाथनि हारियै = अपने हाथों हार गया ॥
घनानन्द की भक्ति-रूपी मनोभूमि पर आधारित श्रृंगार-रस की अभिव्यक्ति।
प्रेम की तीव्रता और दृष्टि के मोह का वर्णन।
कवि बताता है कि हर बार देखने पर प्रिय का रूप नया प्रतीत होता है; नेत्रों की चाल मन को दीवाना कर देती है।
नैसर्गिक सौन्दर्य और मन-भंगिमा का सम्मिलन सहजता से प्रस्तुत है।
अति सूधो सनेह को मारग है जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं। तहाँ साँचे चलैं तजि आपनपौ झिझकैं कपटी जे निसाँक नहीं॥ घनआनंद प्यारे सुजान सुनौ यहाँ एक ते दूसरो आँक नहीं। तुम कौन धौं पाटी पढ़े हौ लला, मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं॥
अति सूधो = अत्यन्त सरल, सनेह = प्रेम, मारग = मार्ग, नेकु = तनिक भी, सयानप = चतुराई, बाँक = टेढ़ापन, साँचे = सच्चे प्रेमी, तजि आपनपौ = अपना अहंकार छोड़कर, झिझकैं = संकोच करते हैं, कपटी = छल-कपट करने वाले, निसाँक = निःसंकोच, आँक = भेद, पाटी पढ़े हौ = कौन-सी शिक्षा प्राप्त की है, मन लेहु = मन तो ले लेते हो, पै = परन्तु, छटाँक नहीं = तनिक भी नहीं देते ॥
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सावन आवन हेरि सखी, मनभावन आवन चोप विसेखी । छाए कहूँ घनआनँद जान, सम्हारि की ठौर लै भूल न लेखी ॥ बूंदैं लगै, सब अंग दगै, उलटी गति आपने पापन पेखी । पौन सों जागत आगि सुनी ही, पै पानी सों लागत आँखिन देखी ॥
आवन हेरि = आगमन देखकर, सखी = हे सखी, मनभावन = प्रियतम, चोप = चुप्पी/शान्ति, विसेखी = विशेष रूप से, घनआनँद जान = हे घनानन्द, सम्हारि = सँभालकर, ठौर = स्थान, लै भूल न लेखी = भूलकर भी ध्यान नहीं दिया, बूंदैं = वर्षा की बूँदें, सब अंग दगै = सारा शरीर जलता है, उलटी गति = विपरीत दशा, पापन पेखी = अपने पापों का फल देखकर, पौन = वायु, जागत आगि = प्रज्वलित अग्नि, पानी सों = जल से, आँखिन देखी = अपनी आँखों से देखा हुआ ॥
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हीन भएँ जल मीन अधीन कहा कछु मो अकुलानि समाने। नीर सनेही कों लाय अलंक निरास ह्वै कायर त्यागत प्रानै। प्रीति की रीति सु क्यों समुझै जड़ मीत के पानि परें कों प्रमानै या मन की जु दसा घनआनँद जीव की जीवनि जान ही जानै।।
हीन भएँ = रहित होकर, जल मीन = जल से वंचित मछली, अधीन = आश्रित, अकुलानि = व्याकुलता, नीर सनेही = जल से प्रेम करने वाली मछली, अलंक = अलग होकर, निरास = निराश, कायर = निर्बल, त्यागत प्रानै = प्राण त्याग देती है, प्रीति की रीति = प्रेम की परम्परा, जड़ मीत = प्रेम से अनजान प्रिय, पानि परें = हाथ में पड़ने पर, प्रमानै = प्रमाण मानना, मन की जु दसा = मन की जो दशा, घनआनँद = कवि घनानन्द, जीव की जीवनि = प्राणों के जीवन का आधार, जान ही जानै = केवल वही जानता है ॥
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मीत सुजान अनीत करौ जिन, हाहा न हूजियै मोहि अमोही। डीठि कौ और कहूँ नहिं ठौर फिरी दृग रावरे रूप की दोही। एक बिसास की टेक गहे लगि आस रहे बसि प्रान-बटोही। हौं घनआनँद जीवनमूल दई कित प्यासनि मारत मोही।।
मीत सुजान = हे बुद्धिमान प्रियतम, अनीत = अन्याय, करौ जिन = मत करो, हाहा = हाय-हाय, अमोही = निर्दयी/जिसे मोह नहीं, डीठि = दृष्टि, ठौर = स्थान, फिरी = घूमकर, दृग = नेत्र, रावरे रूप = आपके रूप पर, दोही = दुहाई/आसक्ति, बिसास = विश्वास, टेक = सहारा, गहे लगि = पकड़कर, आस = आशा, प्रान-बटोही = प्राण रूपी पथिक, जीवनमूल = जीवन का आधार, प्यासनि = प्यासों के कारण, मारत मोही = मुझे तड़पाते हो ॥
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पहिले घन-आनंद सींचि सुजान कहीं बतियाँ अति प्यार पगी अब लाय बियोग की लाय बलाय बढ़ाय, बिसास दगानि दगी अँखियाँ दुखियानि कुबानि परी न कहुँ लगै, कौन घरी सुलगी मति दौरि थकी, न लहै ठिकठौर, अमोही के मोह मिठामठगी ।।
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पहिले अपनाय सुजान सनेह सों क्यों फिरि तेहिकै तोरियै जू. निरधार अधार है झार मंझार दई, गहि बाँह न बोरिये जू . ‘घनआनन्द’ अपने चातक कों गुन बाँधिकै मोह न छोरियै जू . रसप्याय कै ज्याय, बढाए कै प्यास, बिसास मैं यों बिस धोरियै जू
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एरे बीर पौन, तेरो सबै ओर गौन, बारी तो सों और कौन मनौं ढरकौंहीं बानि दै । जगत के प्रान ओछे बड़े को समान ‘घनआनन्द’ निधान सुखधानि दीखयानि दै । जान उजियारे गुनभारे अन्त मोही प्यारे अब ह्वै अमोही बैठे पीठि पहिचानि दै । बिरह विथा की मूरि आँखिन में राखौ पुरि धूरि तिन पायन की हा हा नैकु आनि दै ।।
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अंतर उदेग दाह,आँखिन प्रबाह-आँसू, देखी अटपटी चाह, भीजनि दहन है । सोइबो न जागिबो हो, हँसिबो न रोइबो हूँ, खोय-खोय आप ही में चेटक लहनि है । जान प्यारे प्राननि, बसत पै आनन्दघन, बिरह बिषम दसा मूक लौं कहनि है । जीवन-मरन जीव मीच बिना बन्यौ आय, हाय कौन बिधि रची,नेही की रहनि है ।।
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छवि को सदन मोद मंडित बदन-चंद तृषित चषनि लाल, कबधौ दिखाय हौ। चटकीलौ भेष करें मटकीली भाँति सौही मुरली अधर धरे, लटकत आय हौ । लोचन ढुराय कछु मृदु मुसिक्याय, नेह भीनी बतियानी लड़काय बतराय हौ। बिरह जरत जिय जानि, आनि प्रान प्यारे, कृपानिधि, आनंद को धन बरसाय हौ।
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वहै मुसक्यानि, वहै मृदु बतरानि, वहै लड़कीली बानि आनि उर मैं अरति है। वहै गति लैन औ बजावनि ललित बैन, वहै हँसि दैन, हियरा तें न टरति है। वहै चतुराई सों चिताई चाहिबे की छबि, वहै छैलताई न छिनक बिसरति है। आनँदनिधान प्रानप्रीतम सुजानजू की, सुधि सब भाँतिन सों बेसुधि करति है।।
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प्रीतम सुजान मेरे हित के निधान कहौ कैसे रहै प्रान जौ अनखि अरसायहौ। तुम तौ उदार दीन हीन आनि परयौ द्वार सुनियै पुकार याहि कौ लौं तरसायहौ। चातिक है रावरो अनोखो मोह आवरो सुजान रूप-बावरो, बदन दरसायहौ। बिरह नसाय, दया हिय मैं बसाय, आय हाय ! कब आनँद को घन बरसायहौ।।
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आस ही अकास मधि अवधि गुनै बढ़ाय, चोपनि चढ़ाय दीनौ कीनौ खेल सो यहौं । निपट कठोर ये हो ऐंचत न आप ओर, लड़िले सुजान सों दुहेली दसा को कहै । अचिरजमई मोहि भई घन आँनन्द यों, हाँथ साथ लग्यौ पै समीप न कहूँ लहै । बिरह समीर की झकोरनि अधीर नेह, नीर भीज्यौं जीव तऊ गुड़ी लौं उड्यौ रहै ।।
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आँखै जौ न देखैं तो कहा हैं कछू देखति ये, ऐसी दुखहाइनि की दसा आय देखियै । प्रानन के प्यारे जान रूप उजियारे बिना, मिलन तिहारे इन्हें कौन लेखे लेखियै । नीर-न्यारे मीन औ चकोर चंदहीन हूँ ते, अति ही अधीन दीन गति मति पेखियै । हौ जू घन आनन्द ढरारे रसभरे बारे, चकित बिचारे सों न चूकनि परेखियै ।।
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आसा-गुन बाँधि कै भरोसो-सिल धरि छाती, पूरे पन सिंधु मैं न बूड़त सकायहौं । दुख-दव हिय जारि अंतर उदेग-आँच, रोम-रोम त्रासनि निरंतर तचायहौं । लाख-लाख भाँतिन की दुसह दसानि जानि, साहस सहारि सिर औरे लौं चलायहौं । ऐसें घनआँनन्द गही है टेक मन माँहि, ऐरे निरदई तोहि दई उपजायहौं ।।
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पाती-मधि छाती-छत, लिखि न लिखाये जाहिं, काती लै बिरह घाती, कीने जैसे हाल हैं । आँगुरी बहकि तहीं, पाँगुरी किलकि होति, ताती राती दसनि के, जाल ज्वाल-माल हैं । जान प्यारे जौब कहूँ दीजियै सँदेसो तौब, आँवाँ सम कीजियै, जु कान तिह काल हैं । नेह भीजी बातैं, रसना पै उर-आँच लागैं, जागैं घनआँनन्द ज्यौं, पुंजनि मसाल हैं ।।
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बहुत दिनान के अवधि-आस-पास परे, खरे अरबरनि भरे हैं उठि जान कौ। कहि कहि आवन सँदेसो मनभावन को, गहि गहि राखत हैं दै दै सनमान कौ। झूठी बतियानि की पत्यानि तें उदास ह्वै कै, अब न घिरत घनआनँद निदान कौ। अधर लगै हैं आनि करि कै पयान प्रान, चाहत चलन ये सँदेसौ लै सुजान कौ॥
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