१. देवनागरी लिपि — परिचय एवं नामकरण
देवनागरी लिपि भारत की सबसे प्रमुख और वैज्ञानिक लिपियों में से एक है। यह हिन्दी, संस्कृत, मराठी, कोंकणी आदि भाषाओं की लेखन-लिपि है। देवनागरी शब्द दो भागों से बना है — ‘देव’ और ‘नागरी’, अर्थात् नगरों में प्रचलित देववाणी की लिपि।
इसका विकास ब्राह्मी लिपि से हुआ है और इसका स्वरूप अत्यन्त व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक माना गया है। देवनागरी लिपि की रचना ध्वन्यात्मक सिद्धान्तों पर आधारित है, अतः इसे ध्वन्यात्मक लिपि भी कहा जाता है।
- नागर ब्राह्मण मत : गुजरात के विद्वान 'नागर ब्राह्मणों' द्वारा विशेष रूप से प्रयुक्त होने के कारण इसे 'नागरी' कहा गया।
- नगर सिद्धांत : प्राचीन काल में विशाल नगरों (विशेषकर पाटलिपुत्र और काशी) में प्रचलित होने के कारण इसे 'नागरी' और देवभाषा संस्कृत की लिपि होने से 'देवनागरी' नाम मिला।
- स्थापत्य शैली मत : दक्षिण भारत में मन्दिर निर्माण की नागर शैली की भाँति चौकोर व सुन्दर बनावट के आधार पर इसे नागरी कहा गया।
देवनागरी वर्णमाला मुख्यतः अक्षरात्मक (Alphasyllabary / Abugida) है, जिसमें प्रत्येक स्वतंत्र व्यंजन में अंतर्निहित रूप से 'अ' स्वर मिला होता है। यदि व्यंजन को स्वर-रहित दिखाना हो, तो उसके नीचे हलन्त (्) लगाया जाता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अंतर्गत देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी को भारतीय संघ की आधिकारिक 'राजभाषा' का गौरव प्राप्त है।
२. देवनागरी लिपि की उत्पत्ति
देवनागरी लिपि का विकास प्राचीन ब्राह्मी लिपि से हुआ है। गुप्तकालीन लिपि के रूपान्तर के रूप में यह 7वीं से 9वीं शताब्दी के बीच विकसित हुई।
ब्राह्मी → गुप्त → सिद्धमात्रिका → नागरी → देवनागरी
8वीं शताब्दी तक इसका प्रयोग व्यापक रूप में होने लगा। 11वीं शताब्दी तक यह पूर्ण विकसित रूप में हिन्दी और संस्कृत की प्रमुख लिपि बन गई।
भारतीय पुरालेखविदों (Epigraphists) के अनुसार ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी की अशोककालीन ब्राह्मी लिपि कालांतर में दो धाराओं में विभाजित हुई— उत्तरी ब्राह्मी और दक्षिणी ब्राह्मी। उत्तरी ब्राह्मी से चौथी-पाँचवीं शताब्दी में 'गुप्त लिपि' का आविर्भाव हुआ। गुप्त लिपि से छठी शताब्दी में 'कुटिल लिपि' (जिसे सिद्धमात्रिका भी कहते हैं) निकली। इसी कुटिल लिपि से नवीं शताब्दी के आसपास पश्चिमी भारत में 'नागरी' और पूर्वी भारत में 'शारदा' तथा 'बांग्ला' लिपियों का निकास हुआ।
३. देवनागरी लिपि का इतिहास
प्राचीन भारत में ब्राह्मी लिपि से आरम्भ होकर देवनागरी लिपि का विकास लगभग 2000 वर्षों में हुआ।
- 3री शताब्दी ई.पू. — ब्राह्मी लिपि (सम्राट अशोक के शिलालेखों की राष्ट्रीय लिपि)
- 4–6 शताब्दी — गुप्त लिपि (गुप्त साम्राज्य के स्वर्णकाल में शिलालेखों व मुद्राओं की लिपि)
- 7–8 शताब्दी — सिद्धमात्रिका लिपि / कुटिल लिपि (हर्षवर्धन के काल और उसके उपरांत प्रचलित)
- 9वीं शताब्दी — प्राचीन नागरी लिपि (प्रतिहार, राष्ट्रकूट और पाल शासकों के दानपत्रों में प्रयुक्त)
- 10वीं–11वीं शताब्दी — आधुनिक देवनागरी लिपि (पूर्ण परिपक्व और सुव्यवस्थित रूप)
ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार नागरी लिपि का प्रथम ज्ञात पुरालेखीय प्रयोग गुजरात के राजा जयभट्ट (700-800 ई.) के एक शिलालेख में मिलता है। इसके पश्चात राष्ट्रकूट नरेश दन्तिदुर्ग के एलोरा अभिलेखों (8वीं सदी), प्रतिहार राजा महेन्द्रपाल के अभिलेखों तथा मालवा के परमार वंशीय राजा भोज के ताम्रपत्रों में देवनागरी के स्पष्ट और पुष्ट प्रमाण मिलते हैं।
मध्यकाल में यह उत्तर भारत के समस्त धार्मिक, शास्त्रीय, साहित्यिक और प्रशासनिक कार्यों की मुख्य लिपि बन गई। आज देवनागरी विश्व की सर्वाधिक प्रयुक्त लिपियों में से एक है। इसे वैज्ञानिक दृष्टि से सुव्यवस्थित लिपियों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
४. देवनागरी लिपि की विशेषताएँ
देवनागरी अपने विशिष्ट गुणों के कारण भारत के अधिकांश भागों में प्रचलित है। इस लिपि की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं—
- देवनागरी लिपि में प्रत्येक वर्ण एक निश्चित ध्वनि का संकेत करता है। इसमें 11 स्वर तथा 35 व्यंजन ध्वनियाँ मानी जाती हैं।
- देवनागरी अक्षरों के नाम ध्वनि के अनुकूल हैं। इसमें मूकवर्ण (Silent Letters) की व्यवस्था नहीं है। इसमें जितना लिखा जाता है, उतना ही पढ़ा जाता है।
- यह लिपि लेखन में कम जगह घेरती है, क्योंकि क्र, प्र, क्ल, क्त, क्ष, त्र, म्न आदि लिखने की समुचित व्यवस्था है।
- देवनागरी लिपि का वर्णमाला-क्रम वैज्ञानिक है। सबसे पहले स्वर — ह्रस्व और दीर्घ क्रम से — तथा बाद में व्यंजन आते हैं। व्यंजनों को उच्चारण-स्थान तथा प्रयत्न के अनुसार कण्ठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दन्त्य और ओष्ठ्य आदि वर्गों में व्यवस्थित किया गया है।
- देवनागरी लिपि में वर्णों के नाम उच्चारण के अनुसार हैं तथा लेखन और मुद्रण के अक्षरों में एकरूपता है।
- इस लिपि का प्रयोग विभिन्न भाषाओं में होता है। संस्कृत, हिन्दी, नेपाली और मराठी के लिए इसका व्यापक प्रयोग होता है। पंजाबी तथा गुजराती के लिए भी देवनागरी का प्रयोग विभिन्न प्रसंगों में किया जाता है।
५. देवनागरी लिपि के गुण
देवनागरी लिपि में अभिव्यक्ति और संरचना की दृष्टि से अनेक अनुपम गुण विद्यमान हैं:
- यह ध्वन्यात्मक (Phonetic) लिपि है — प्रत्येक अक्षर एक निश्चित ध्वनि का प्रतिनिधित्व करता है।
- इसमें स्वरों और व्यंजनों का पृथक और स्पष्ट विन्यास है।
- संयुक्ताक्षरों की रचना के लिए निश्चित नियम हैं।
- मात्रा-प्रणाली अत्यन्त व्यवस्थित है।
- वर्णों का वर्गीकरण उच्चारण-स्थान के आधार पर हुआ है — कण्ठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दन्त्य और ओष्ठ्य।
- यह बाएँ से दाएँ लिखी जाती है।
- शिरोरेखा (Top Horizontal Line) : अक्षरों के ऊपर खिंची जाने वाली शिरोरेखा शब्दों को एक स्वतंत्र दृश्य-इकाई (Visual Unit) और सुंदर सुगठित रूप प्रदान करती है।
- स्थान की बचत : ऊपर-नीचे मात्राओं और संयुक्त व्यंजनों के कारण क्षैतिज रूप से यह लिपि कम स्थान घेरती है।
६. देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता
देवनागरी लिपि में उत्कृष्टता सम्बन्धी वे सभी गुण हैं जो किसी भी उत्कृष्ट लिपि में आवश्यक होते हैं। वैज्ञानिकता की दृष्टि से देवनागरी लिपि अत्यन्त सटीक एवं स्पष्ट है। देवनागरी लिपि का विन्यास विज्ञान-संगत है। प्रत्येक वर्ण का स्थान, क्रम और ध्वनि-संरचना शरीर के उच्चारण-स्थान से मेल खाती है।
- वर्णमाला का क्रम: वर्णमाला का क्रम उच्चारण-स्थान के अनुसार व्यवस्थित है।
- स्वर और व्यंजन का वर्गीकरण: स्वर और व्यंजन का वर्गीकरण ध्वन्यात्मक तथा शारीरिक आधार पर किया गया है।
- संयुक्ताक्षरों की व्यवस्था: संयुक्ताक्षरों में मूल ध्वनि बनी रहती है। यह विशेषता इसे अन्य अनेक लिपियों से श्रेष्ठ बनाती है।
- ध्वनि तथा वर्ण में सामंजस्य: किसी भी भाषा की ध्वनियों तथा उन्हें प्रकट करने वाले लिपि-चिह्नों या वर्णों में जितना अधिक सामंजस्य होगा, वह लिपि उतनी ही अधिक उत्कृष्ट मानी जाएगी। देवनागरी में यह विशेषता पर्याप्त रूप से मिलती है। इसमें उच्चारण के अनुसार ही वर्ण निश्चित किए गए हैं। अतः सामान्यतः जो बोला जाता है, वही लिखा जाता है और जो लिखा जाता है, वही पढ़ा जाता है।
- एक ध्वनि के लिए एक संकेत: एक ध्वनि के लिए एक ही संकेत होना लिपि की वैज्ञानिकता का महत्वपूर्ण गुण है। इसके विपरीत कुछ अन्य लिपियों में एक ही ध्वनि के लिए अनेक संकेत अथवा एक ही संकेत से अनेक ध्वनियों की अभिव्यक्ति की समस्या दिखाई देती है। रोमन तथा अरबी आदि लिपियों में ऐसी समस्याएँ मिलती हैं। (जैसे रोमन में 'C' का उच्चारण Cat में 'क' और City में 'स' होता है)।
- समग्र ध्वनियों की अभिव्यक्ति: उत्कृष्ट लिपि में यह गुण होना चाहिए कि वह किसी भाषा की समग्र ध्वनियों को लिपि-संकेतों द्वारा अभिव्यक्त कर सके। देवनागरी में यह गुण पर्याप्त रूप से विद्यमान है, जबकि रोमन आदि लिपियों में अनेक भारतीय ध्वनियों को व्यक्त करने के लिए अतिरिक्त चिह्नों अथवा संयुक्त संकेतों की आवश्यकता पड़ती है।
- असंदिग्धता: उत्कृष्ट लिपि में एक ध्वनि-संकेत से दूसरी ध्वनि का भ्रम नहीं होना चाहिए। अन्य लिपियों की अपेक्षा देवनागरी इस कसौटी पर भी काफी हद तक खरी उतरती है। रोमन लिपि में उच्चारण सम्बन्धी अनेक भ्रांतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- लिपि-चिह्नों की पर्याप्तता: विश्व की अधिकांश लिपियों में चिह्न पर्याप्त नहीं हैं। अंग्रेजी में ध्वनियाँ 40 से ऊपर हैं, किन्तु केवल 26 लिपि-चिह्नों से काम चलाना पड़ता है। उर्दू में भी ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, ड, थ, ध, फ, भ आदि के लिए स्वतंत्र लिपि-चिह्नों की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है और अतिरिक्त चिह्नों की सहायता ली जाती है। इस दृष्टि से नागरी पर्याप्त सम्पन्न है।
- वर्णमाला का वैज्ञानिक वर्गीकरण: नागरी लिपि में वर्णों को जिस वैज्ञानिक रूप में विभाजित और वर्गीकृत किया गया है, वह विश्व की अनेक लिपियों में दुर्लभ है। उर्दू या रोमन लिपि भी इस कमी का अपवाद नहीं हैं। इनमें स्वर और व्यंजन वैज्ञानिक उच्चारण-स्थान के अनुसार व्यवस्थित नहीं हैं। नागरी लिपि में स्वर अलग हैं और व्यंजन अलग।
- प्राण-तत्व और घोषत्व का वैज्ञानिक आधार: प्रत्येक वर्ग के व्यंजनों को अल्पप्राण (प्रथम, तृतीय, पंचम) और महाप्राण (द्वितीय, चतुर्थ) तथा अघोष और सघोष के प्राकृतिक नियमों में श्रेणीबद्ध किया गया है, जो मानव ध्वनितंत्र के पूर्णतः अनुकूल है।
पूर्ण रूप से विचार करने पर देवनागरी लिपि वस्तुतः एक उत्कृष्ट लिपि है। फिर भी कुछ विद्वानों के अनुसार देवनागरी में ऋ, क्ष, त्र, ज्ञ आदि के सम्बन्ध में सुधार की आवश्यकता हो सकती है। ई की मात्रा की स्थिति भी वैज्ञानिक दृष्टि से चर्चा का विषय रही है, क्योंकि वह लिखने में पहले लगती है (ह्रस्व 'इ'), किन्तु उच्चारण में बाद में आती है। कुछ ध्वनियों के लिए एक से अधिक लिपि-चिह्नों की आवश्यकता भी दिखाई देती है। अतः आवश्यकता के अनुसार सुधार करके देवनागरी लिपि को और भी अधिक वैज्ञानिक तथा उत्कृष्ट बनाया जा सकता है।
७. देवनागरी लिपि के दोष एवं व्यावहारिक सीमाएँ
अत्यधिक वैज्ञानिक होने के उपरांत भी व्यावहारिक, यांत्रिक एवं मुद्रण की दृष्टि से देवनागरी लिपि में निम्नलिखित दोष एवं कठिनाइयाँ परिलक्षित होती हैं—
- संयुक्ताक्षर लिखने में कठिनाई होती है।
- कुछ मात्राएँ, जैसे ऋ और ऌ, सामान्य प्रयोग में कठिन हैं।
- अक्षरों के ऊपर की रेखा अर्थात् शिरोरेखा कभी-कभी मुद्रण में जटिलता उत्पन्न करती है।
- देवनागरी लिपि में स्वर और अर्धस्वर लिखने में बड़ी कठिनाई प्रतीत होती है। जैसे — लिए, लिये, गए, गये इत्यादि।
- देवनागरी की वर्तनी में विविधता आ गयी है, जिससे एक ही शब्द कई तरह से लिखा जा सकता है। उदाहरण — गर्म–गरम, सर्दी–सरदी।
- देवनागरी को तीव्र गति से लिखने में कठिनाई होती है, क्योंकि इसे लिखते समय लेखनी को बार-बार आगे-पीछे तथा ऊपर-नीचे उठाना पड़ता है। जैसे — ऊ की मात्राएँ।
- देवनागरी में मुद्रण कार्य तीव्र गति से नहीं हो पाता, क्योंकि एक वर्ण में अनेक चिह्न जोड़ने पड़ते हैं, जबकि रोमन लिपि में चिह्न आगे लगते चले जाते हैं।
- इस लिपि में लिखे गये वर्णों को पढ़ने में कभी-कभी भ्रमपूर्ण स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। उदाहरण — ख को र-व के रूप में भी पढ़े जाने की सम्भावना।
- देवनागरी में संयुक्त व्यंजनों को लिखने की कई पद्धतियाँ प्रचलित हैं। उदाहरण — क्त, ट्ट आदि।
- ह्रस्व 'इ' की मात्रा (ि) का वर्ण से पूर्व लगाया जाना ध्वन्यात्मक क्रम के विपरीत माना जाता है, क्योंकि उच्चारण वर्ण के उपरांत होता है।
८. देवनागरी लिपि में अपेक्षित सुधार व ऐतिहासिक समितियाँ
देवनागरी लिपि में सुधार के कई प्रयास किये गये। सर्वप्रथम लोकमान्य तिलक ने 1904 में कुछ टाइपों को मिलाकर लिपि-सुधार का कार्य किया (जिसे 'तिलक फॉन्ट' कहा गया और इसमें 190 टाइप निश्चित किए गए)।
सावरकर बन्धुओं ने अ की बारहखड़ी तैयार की (जिसमें सभी मात्राओं को केवल 'अ' के साथ जोड़कर लिखने का प्रस्ताव था, जैसे— अ, आ, अि, अी, अु, अू)।
डॉ० श्यामसुन्दरदास ने सुझाव दिया कि ङ, ञ के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग किया जाए।
सन् 1935 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के इन्दौर अधिवेशन में लिपि-सुधार समिति बनायी गयी। गांधी जी इस सम्मेलन के सभापति थे।
लिपि-सुधार समिति के संयोजक काका कालेलकर थे। 1945 में काशी की नागरी प्रचारिणी सभा ने अपने सुझाव प्रस्तुत किये।
1947 में उत्तर प्रदेश सरकार ने आचार्य नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में एक समिति गठित की, जिसने अब तक गठित समितियों के सुझावों का अध्ययन किया तथा अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कीं। इस समिति की प्रमुख सिफारिशें इस प्रकार थीं—
- अ की बारहखड़ी भ्रमपूर्ण है।
- अल्पप्राण व्यंजन के नीचे ऽ चिह्न लगाकर महाप्राण बनाना उचित नहीं है।
- किसी व्यंजन के नीचे दूसरा व्यंजन न रखा जाए।
- मात्राओं को व्यंजन से हटाकर रखा जाए।
- अनुस्वार और पंचमाक्षरों (ङ्, ञ्, ण्, न्, म्) के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग किया जाए।
- संयुक्त व्यंजनों में पहले व्यंजन की पाई हटा दी जाए और शेष व्यंजन हलन्त करके लिखे जाएँ।
- शिरोरेखा का प्रयोग जारी रहना चाहिए।
- मराठी ळ को वर्णमाला में स्थान दिया जाए।
इन सुझावों पर विचार करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने 1953 में अनेक राज्यों के सरकारी प्रतिनिधियों की एक बैठक बुलायी। इस बैठक में कुछ परिवर्तनों के साथ नरेन्द्र देव कमेटी की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया गया।
इसके पश्चात भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय ने देवनागरी लिपि तथा हिन्दी वर्तनी का अखिल भारतीय स्तर पर मानकीकरण किया, जिससे वर्तमान में कम्प्यूटर, यूनिकोड और डिजिटल माध्यमों पर देवनागरी का प्रयोग अत्यंत सरल एवं त्रुटिरहित हो गया है।
९. परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)
उत्तर : देवनागरी लिपि का उद्भव प्राचीन ब्राह्मी लिपि की उत्तरी शैली से हुआ है। इसका ऐतिहासिक विकास-क्रम इस प्रकार है:
ब्राह्मी लिपि (ई.पू. 3री सदी) → गुप्त लिपि (4थी-5वीं सदी) → सिद्धमात्रिका/कुटिल लिपि (6ठी-7वीं सदी) → प्राचीन नागरी (8वीं-9वीं सदी) → आधुनिक देवनागरी (10वीं-11वीं सदी)।
उत्तर : देवनागरी को वैज्ञानिक लिपि इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें प्रत्येक उच्चरित ध्वनि के लिए एक निश्चित व स्वतंत्र लिपि-चिह्न है। इसमें 'मूक वर्ण' (Silent letters) नहीं होते; जो बोला जाता है, वही लिखा जाता है। वर्णमाला का वर्गीकरण मानव शरीर के उच्चारण-स्थानों (कण्ठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दन्त्य, ओष्ठ्य) के अनुसार पूर्णतः तर्कसंगत है।
उत्तर : (१) शिरोरेखा तथा ऊपर-नीचे मात्राएँ लगने के कारण तीव्र गति से लिखने में लेखनी बार-बार उठानी पड़ती है। (२) ह्रस्व 'इ' की मात्रा का उच्चारण वर्ण के बाद होता है, किन्तु लिपि-चिह्न वर्ण से पहले लगाया जाता है।
उत्तर : डॉ. श्यामसुन्दर दास ने पंचमाक्षरों (ङ्, ञ्, ण्, न्, म्) के स्थान पर सर्वत्र केवल अनुस्वार (ं) के प्रयोग का सुझाव दिया। आचार्य नरेन्द्र देव समिति (1947) ने शिरोरेखा को बनाए रखने, 'अ की बारहखड़ी' को भ्रामक मानकर निरस्त करने तथा खड़ी पाई वाले वर्णों की पाई हटाकर संयुक्ताक्षर बनाने की सिफारिश की।
उत्तर : भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अनुसार देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी को भारतीय संघ की 'राजभाषा' (Official Language) घोषित किया गया है तथा अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप मान्य है।
