महादेवी वर्मा — मैं नीर भरी दुख की बदली, वसन्त रजनी

चन्द्र देव त्रिपाठी 'अतुल'
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महादेवी वर्मा

महादेवी वर्मा — मैं नीर भरी दुख की बदली, वसन्त-रजनी, मन्दिर के दीप, रे पपीहा पी कहाँ

महादेवी वर्मा की प्रमुख कविताओं का पद-पाठ, शब्दार्थ, सन्दर्भ, प्रसङ्ग, हिन्दी व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य।

1. मैं नीर भरी दुख की बदली

कविता
मैं नीर भरी दुख की बदली! स्पंदन में चिर निस्पंद बसा, क्रंदन में आहत विश्व हँसा, नयनों में दीपक से जलते, पलकों में निर्झणी मचली! मेरा पग पग संगीत भरा, श्वासों में स्वप्न पराग झरा, नभ के नव रंग बुनते दुकूल, छाया में मलय बयार पली! मैं क्षितिज भृकुटि पर घिर धूमिल, चिंता का भार बनी अविरल, रज-कण पर जल-कण हो बरसी, नव जीवन-अंकुर बन निकली! पथ न मलिन करता आना, पद चिह्न न दे जाता जाना, सुधि मेरे आगम की जग में, सुख की सिहरन हो अंत खिली! विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कभी अपना होना, परिचय इतना इतिहास यही, उमड़ी कल थी मिट आज चली!
शब्दार्थ — नीर — जल, बदली — बादल, स्पंदन — धड़कन/कंपन, निस्पंद — स्थिर/गतिहीन, क्रंदन — रोना/विलाप, आहत — पीड़ित, नयन — नेत्र, पलकों — आँखों के ऊपरी-निचले रोमयुक्त आवरण, निर्झणी — झरने के समान धारा, मचली — व्याकुल होकर चंचल हुई, पग-पग — प्रत्येक कदम, स्वप्न — सपना, पराग — पुष्प-रज, दुकूल — महीन वस्त्र, मलय बयार — मलय पर्वत से आने वाली सुगंधित वायु, क्षितिज — जहाँ आकाश और पृथ्वी मिलते हुए दिखाई देते हैं, भृकुटि — भौंह, धूमिल — धुँधला, अविरल — निरन्तर, रज-कण — धूल का कण, जल-कण — पानी की बूँद, अंकुर — बीज से निकलने वाला नया पौधा, आगम — आगमन, सुधि — स्मरण/याद, सिहरन — हल्का कंपन, विस्तृत — फैला हुआ, कोना — स्थान/भाग, परिचय — पहचान, इतिहास — बीते समय का वृत्तान्त, उमड़ी — उठी/घिर आई, मिट — समाप्त हो जाना।
सन्दर्भ — प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘नीर भरी दुख की बदली’ नामक पाठ से लिया गया है। इसकी रचयिता महादेवी वर्मा जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत कविता में कवयित्री ने अपने जीवन को दुःख से भरी हुई बादल की बदली के रूप में चित्रित किया है। वह अपने जीवन की पीड़ा, करुणा, संवेदना, स्वप्न, प्रेम और क्षणभंगुरता को बादल और वर्षा के माध्यम से व्यक्त करती हैं। उनके लिए दुःख केवल व्यक्तिगत अनुभूति नहीं है, बल्कि वह विश्व की पीड़ा से जुड़ा हुआ है। कवयित्री बताती हैं कि उनके आँसू संसार के लिए नवजीवन के अंकुर उत्पन्न करने वाले जल के समान हैं।
हिन्दी व्याख्या — कवयित्री स्वयं को जल से भरी हुई दुःख की बदली अर्थात् बादल के रूप में प्रस्तुत करती हैं। उनके भीतर निरन्तर होने वाली भावनाओं की हलचल में भी एक चिरकालीन शान्ति और स्थिरता विद्यमान है। उनके रोने में संसार की पीड़ा भी जैसे अपनी अभिव्यक्ति पाकर मुस्करा उठती है। उनकी आँखों में दीपक के समान आँसू जलते हैं और पलकों पर झरने की धारा के समान अश्रु उमड़ते रहते हैं। उनका प्रत्येक कदम संगीत से भरा हुआ है और उनकी साँसों से स्वप्नों के पुष्पों का पराग झरता रहता है। आकाश के नवीन रंगों से वे जीवन के सूक्ष्म और सुंदर वस्त्र बुनती हैं तथा उनकी छाया में सुगंधित मलय-पवन का पालन होता है। वे अपने को क्षितिज की भौंह पर घिरी हुई धूमिल बदली के समान मानती हैं, जो निरन्तर चिंता का भार लिए हुए है। जब वह बदली वर्षा बनकर धूल के कणों पर जल की बूँदों के रूप में बरसती है, तब उसी से नए जीवन के अंकुर फूट पड़ते हैं। कवयित्री का जीवन किसी के मार्ग को मलिन नहीं करता। उनका आना-जाना संसार पर कोई स्थायी चिह्न नहीं छोड़ता और उनके आगमन की स्मृति भी तभी होती है, जब अंततः सुख की हल्की सिहरन अनुभव होती है। अन्त में कवयित्री अपने जीवन की क्षणभंगुरता को स्वीकार करती हुई कहती हैं कि इस विस्तृत आकाश में उनका अपना कोई स्थायी स्थान नहीं है। उनके जीवन का पूरा इतिहास केवल इतना है कि वे कल बादल की तरह उमड़ी थीं और आज वर्षा करके मिट गईं।
काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत कविता में महादेवी वर्मा ने बादल और वर्षा के प्रतीक द्वारा अपने दुःखमय जीवन और करुण संवेदनाओं की अत्यन्त मार्मिक अभिव्यक्ति की है। ‘मैं नीर भरी दुख की बदली’ में कवयित्री ने स्वयं को दुःख से भरे बादल के रूप में प्रस्तुत किया है, जो रूपक का सुन्दर उदाहरण है। ‘नयनों में दीपक से जलते’ में आँसुओं की दीपक से तुलना तथा ‘पलकों में निर्झणी मचली’ में अश्रुधारा को झरने के रूप में चित्रित करना अत्यन्त प्रभावशाली है। ‘श्वासों में स्वप्न पराग झरा’ और ‘छाया में मलय बयार पली’ में कोमल एवं सुगंधित बिम्बों का प्रयोग हुआ है। ‘रज-कण पर जल-कण हो बरसी, नव जीवन-अंकुर बन निकली’ में आँसू को जीवनदायी वर्षा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। कविता में प्रकृति और मानवीय भावनाओं का अद्भुत तादात्म्य दिखाई देता है। भाषा कोमल, भावपूर्ण, चित्रात्मक एवं संगीतात्मक है तथा करुण रस की प्रधानता है। अन्तिम पंक्तियों में जीवन की क्षणभंगुरता और नश्वरता का दार्शनिक भाव अत्यन्त मार्मिक ढंग से व्यक्त हुआ है।

2. वसन्त-रजनी

कविता
वसन्त-रजनी! धीरे धीरे उतर क्षितिज से आ वसन्त-रजनी! तारकमय नव वेणीबन्धन शीश-फूल कर शशि का नूतन, रश्मि-वलय सित घन-अवगुण्ठन, मुक्ताहल अभिराम बिछा दे चितवन से अपनी! पुलकती आ वसन्त-रजनी! मर्मर की सुमधुर नूपुर-ध्वनि, अलि-गुंजित पद्मों की किंकिणि, भर पद-गति में अलस तरंगिणि, तरल रजत की धार बहा दे मृदु स्मित से सजनी! विहँसती आ वसन्त-रजनी! पुलकित स्वप्नों की रोमावली, कर में ही स्मृतियों की अंजलि, मलयानिल का चल दुकूल अलि! चिर छाया-सी श्याम, विश्व को आ अभिसार बनी! सकुचती आ वसन्त-रजनी! सिहर सिहर उठता सरिता-उर, खुल खुल पड़ते सुमन सुधा-भर, मचल मचल आते पल फिर फिर, सुन प्रिय की पद-चाप हो गयी पुलकित यह अवनी! सिहरती आ वसन्त-रजनी!
शब्दार्थ — वसन्त-रजनी — वसन्त ऋतु की रात, क्षितिज — जहाँ आकाश और पृथ्वी मिलते हुए दिखाई देते हैं, तारकमय — तारों से भरा हुआ, वेणीबन्धन — बालों को गूँथकर बाँधना, शीश-फूल — सिर पर धारण किया जाने वाला पुष्पाभूषण, शशि — चन्द्रमा, रश्मि-वलय — किरणों का घेरा, घन — बादल, अवगुण्ठन — घूँघट/आवरण, मुक्ताहल — मोतियों की माला, अभिराम — मनोहर, चितवन — दृष्टि/नज़र, पुलकती — रोमांचित होती हुई, मर्मर — धीमी मधुर ध्वनि, नूपुर — पायल, अलि — भौंरा, पद्म — कमल, किंकिणि — छोटी घंटी, पद-गति — चलने की गति, तरंगिणि — लहरों वाली नदी, तरल — चंचल/बहता हुआ, रजत — चाँदी, स्मित — मंद मुस्कान, सजनी — सखी/प्रिय, विहँसती — मुस्कराती हुई, रोमावली — रोमों की पंक्ति, अंजलि — दोनों हथेलियों को जोड़कर बनाया गया पात्र, मलयानिल — मलय पर्वत से आने वाली सुगंधित वायु, दुकूल — महीन वस्त्र, अभिसार — प्रिय से मिलने के लिए जाना, सकुचती — लज्जा से संकोच करती हुई, सरिता — नदी, उर — हृदय, सुधा — अमृत, पद-चाप — पैरों की आहट, अवनी — पृथ्वी, सिहरती — रोमांचित/काँपती हुई।
सन्दर्भ — प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘वसन्त-रजनी’ नामक पाठ से लिया गया है। इसकी रचयिता महादेवी वर्मा जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत कविता में कवयित्री ने वसन्त की सुहावनी रात्रि का मानवीकरण करते हुए उसे एक सुन्दरी अथवा प्रिय सजनी के रूप में चित्रित किया है। कवयित्री वसन्त-रजनी को धीरे-धीरे क्षितिज से उतरकर आने के लिए आमन्त्रित करती हैं। तारों, चन्द्रमा, चाँदनी, बादलों, कमलों, मलय-पवन और नदी आदि के माध्यम से रात्रि के मनोहारी सौन्दर्य तथा उसके आगमन से प्रकृति में उत्पन्न पुलक और उल्लास का सजीव चित्रण किया गया है।
हिन्दी व्याख्या — कवयित्री वसन्त ऋतु की सुन्दर रात्रि को सम्बोधित करते हुए कहती हैं कि हे वसन्त-रजनी! तुम धीरे-धीरे क्षितिज से उतरकर मेरे पास आओ। तुम्हारे सिर पर तारों से बनी हुई नई वेणी और चन्द्रमा का नया फूल सुशोभित हो। चाँदनी की किरणों और सफेद बादलों का घूँघट ओढ़कर तुम अपनी मनोहर दृष्टि से चारों ओर मोतियों के समान सुन्दर आभा बिखेर दो। हे वसन्त-रजनी! तुम प्रकृति को रोमांचित करती हुई आओ। वृक्षों की पत्तियों की मर्मर ध्वनि तुम्हारी पायल की मधुर झंकार जैसी हो, भौरों से गूँजते कमल तुम्हारी छोटी-छोटी घंटियों के समान बजें। तुम्हारी मन्द और अलस चाल से लहराती हुई नदी चाँदी की तरल धारा बहाती हुई प्रतीत हो और तुम्हारी मधुर मुस्कान से सम्पूर्ण प्रकृति सुशोभित हो जाए। कवयित्री आगे वसन्त-रजनी को मुस्कराती हुई आने के लिए कहती हैं। वह पुलकित स्वप्नों की रोमावली और स्मृतियों की अंजलि लिए हुए तथा मलय-पवन के लहराते हुए वस्त्र को धारण किए हुए गहरी श्याम छाया के समान सम्पूर्ण संसार से मिलने के लिए आती हुई प्रतीत होती है। फिर वह संकोच करती हुई आती है। उसके प्रभाव से नदी का हृदय सिहर उठता है, अमृत से भरे फूल खिलने लगते हैं और प्रकृति में बार-बार नई उमंगें उत्पन्न होती हैं। ऐसा लगता है मानो प्रियतम के आने की आहट सुनकर पूरी पृथ्वी रोमांचित हो उठी हो। अन्ततः कवयित्री वसन्त-रजनी को सिहरती हुई आने का आमन्त्रण देती हैं।
काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत कविता में महादेवी वर्मा ने वसन्त की रात्रि का अत्यन्त कोमल, मनोरम और भावपूर्ण चित्र प्रस्तुत किया है। कवयित्री ने वसन्त-रजनी का मानवीकरण करते हुए उसे सजनी, सुन्दरी और प्रिय के रूप में चित्रित किया है। ‘तारकमय नव वेणीबन्धन’ में तारों को वेणी तथा ‘शीश-फूल कर शशि’ में चन्द्रमा को सिर के फूल के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ‘रश्मि-वलय सित घन-अवगुण्ठन’ में चाँदनी की किरणों और सफेद बादलों को आभूषण एवं घूँघट के रूप में चित्रित किया गया है। ‘मर्मर की सुमधुर नूपुर-ध्वनि’ तथा ‘अलि-गुंजित पद्मों की किंकिणि’ में प्रकृति की ध्वनियों को नूपुर और घंटियों से जोड़कर श्रव्य बिम्ब उत्पन्न किए गए हैं। ‘तरल रजत की धार’ में चाँदनी और नदी की चमक का मनोहारी चित्रण है। प्रकृति के विभिन्न उपादानों में मानवीय भावनाओं का आरोप करके कवयित्री ने अद्भुत सौन्दर्य उत्पन्न किया है। भाषा कोमल, मधुर, लयात्मक, चित्रात्मक और संस्कृतनिष्ठ है। कविता में प्रकृति-सौन्दर्य के साथ प्रेम, प्रतीक्षा, पुलक और अभिसार की भावनाओं का सुन्दर समन्वय दिखाई देता है।

3. मन्दिर के दीप

कविता
यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो! रजत शंख-घड़ियाल, स्वर्ण वंशी, वीणा स्वर, गये आरती बेला को शत-शत लय से भर; जब था कल-कंठों का मेला विहँसे उपल-तिमिर था खेला अब मन्दिर में इष्ट अकेला; इसे अजिर का शून्य गलाने को गलने दो! चरणों से चिह्नित अलिन्द की भूमि सुनहली, प्रणत शिरों को अंक लिये चन्दन की दहली, झरे सुमन बिखरे अक्षत सित धूप-अर्घ्य नैवेद्य अपरिमित तम में सब होगे अन्तर्हित; सबकी अर्चित कथा इसी लौ में पलने दो! पल के मनके फेर पुजारी विश्व सो गया, प्रतिध्वनि का इतिहास प्रस्तरों के बीच सो गया; साँसों की समाधि का जीवन मसि-सागर का पंथ गया वन; रुका मुखर कण-कण का स्पन्दन। इस ज्वाला में प्राण-रूप फिर से ढलने दो! झंझा है दिग्भ्रान्त रात की मूर्च्छा गहरी, आज पुजारी बने, ज्योति का यह लघु प्रहरी; जब तक लौटे दिन की हलचल, तब कर यह जागेगा प्रतिपल रेखाओं में भर आभा जल; दूत साँझ का इसे प्रभाती तक चलने दो!
शब्दार्थ — मन्दिर — देवालय, नीरव — शांत/निःशब्द, रजत — चाँदी, शंख — पूजा में बजाया जाने वाला शंख, घड़ियाल — बड़ा घंटा, वंशी — बाँसुरी, आरती — दीप आदि से की जाने वाली पूजा, लय — ताल/गति, कल-कंठ — मधुर कंठ, मेला — समूह/भीड़, उपल — पत्थर, तिमिर — अंधकार, इष्ट — आराध्य देव, अजिर — आँगन, शून्य — रिक्तता, अलिन्द — बरामदा/मन्दिर का प्रवेश-स्थान, प्रणत — झुका हुआ, अक्षत — बिना टूटे चावल, सित — सफेद, धूप — सुगंधित पदार्थ जिसे जलाकर पूजा की जाती है, अर्घ्य — पूजन में अर्पित किया जाने वाला जल, नैवेद्य — देवता को अर्पित किया जाने वाला भोजन, अपरिमित — जिसकी कोई सीमा न हो, अन्तर्हित — छिपा हुआ/लुप्त, अर्चित — पूजित, लौ — ज्योति/ज्वाला, पल — क्षण, मनके — माला के दाने, पुजारी — पूजा करने वाला, प्रतिध्वनि — किसी ध्वनि के लौटकर सुनाई देने की ध्वनि, प्रस्तर — पत्थर, समाधि — गहरी तल्लीनता/ध्यान की अवस्था, मसि — स्याही, सागर — समुद्र, पंथ — मार्ग, मुखर — बोलने वाला/ध्वनिमय, स्पन्दन — कंपन/धड़कन, झंझा — तेज आँधी, दिग्भ्रान्त — दिशाओं का ज्ञान खो बैठा हुआ, मूर्च्छा — बेहोशी/अचेत अवस्था, प्रहरी — पहरेदार, प्रतिपल — प्रत्येक क्षण, आभा — प्रकाश/कांति, दूत — संदेशवाहक, प्रभाती — प्रातःकाल तक।
सन्दर्भ — प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘मन्दिर का दीप’ नामक पाठ से लिया गया है। इसकी रचयिता महादेवी वर्मा जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत कविता में कवयित्री ने मन्दिर में जलते हुए एक छोटे से दीपक के माध्यम से त्याग, सेवा, साधना और निरन्तर कर्तव्यपालन की भावना को व्यक्त किया है। आरती और भक्तों की चहल-पहल समाप्त हो जाने के बाद भी दीपक निःशब्द जलता रहता है। कवयित्री उसे अंधकार को दूर करने तथा जीवन में आशा और प्रकाश बनाए रखने के लिए निरन्तर जलते रहने की प्रेरणा देती हैं।
हिन्दी व्याख्या — कवयित्री मन्दिर के दीपक को सम्बोधित करते हुए कहती हैं कि हे मन्दिर के दीप! तुम इसी प्रकार शांत और बिना किसी प्रदर्शन के जलते रहो। आरती के समय मन्दिर में चाँदी के शंख और घड़ियाल, स्वर्णिम बाँसुरी तथा वीणा के मधुर स्वर चारों ओर गूँजते थे और सैकड़ों मधुर कंठ अपनी-अपनी लय से वातावरण को भर देते थे। उस समय मन्दिर में भक्तों की भीड़ रहती थी और पत्थर भी मानो अंधकार के साथ खेलते हुए प्रसन्न दिखाई देते थे। अब वह सब समाप्त हो गया है और मन्दिर में केवल आराध्य देव अकेले हैं। इसलिए दीपक को मन्दिर के सूने आँगन के अंधकार को समाप्त करने के लिए निरन्तर जलते रहना चाहिए। मन्दिर की भूमि भक्तों के चरण-चिह्नों से पवित्र और सुनहरी हो गई है। चन्दन की दहली पर भक्तों के झुके हुए सिरों की स्मृतियाँ अंकित हैं। फूल, अक्षत, धूप, अर्घ्य और नैवेद्य आदि पूजा की सभी सामग्रियाँ अब अंधकार में छिप जाएँगी, परन्तु भक्तों की पूजा और श्रद्धा की पूरी कथा इसी दीपक की लौ में सुरक्षित रहनी चाहिए। रात में पुजारी अपनी माला के मनके फेरकर चला गया और पूरा संसार सो गया। पत्थरों के बीच गूँजने वाली ध्वनियों का इतिहास भी मानो सो गया। जीवन की साँसें जैसे समाधि में लीन हो गईं और चारों ओर सन्नाटा छा गया। ऐसी स्थिति में कवयित्री चाहती हैं कि इसी दीप-ज्वाला में जीवन और प्राण का नया रूप फिर से ढलता रहे। रात अत्यन्त गहरी है और तेज आँधी दिशाओं को भ्रमित कर रही है। ऐसी परिस्थिति में यह छोटा-सा दीप ही ज्योति का प्रहरी बनकर जागता रहे। जब तक दिन का प्रकाश और संसार की चहल-पहल वापस नहीं आती, तब तक यह दीप प्रत्येक क्षण जागकर अंधकार को प्रकाश में बदलता रहे और उसकी लौ अपनी आभा चारों ओर फैलाती रहे। वह साँझ का दूत बनकर प्रभात होने तक निरन्तर जलता रहे।
काव्य-सौंदर्य — प्रस्तुत कविता में महादेवी वर्मा ने मन्दिर के दीपक को त्याग, सेवा, साधना, कर्तव्य और आशा के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। ‘यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो’ में दीपक का मानवीकरण करते हुए उसे मौन साधना और निरन्तर सेवा के लिए प्रेरित किया गया है। ‘रजत शंख-घड़ियाल, स्वर्ण वंशी, वीणा स्वर’ में मन्दिर के आरती-काल का अत्यन्त मनोहारी श्रव्य चित्र प्रस्तुत हुआ है। ‘इसे अजिर का शून्य गलाने को गलने दो’ में दीपक के स्वयं जलकर अंधकार मिटाने की भावना व्यक्त हुई है। ‘सबकी अर्चित कथा इसी लौ में पलने दो’ में दीप-ज्योति को भक्तों की श्रद्धा और पूजा की स्मृतियों का आधार बनाया गया है। ‘आज पुजारी बने, ज्योति का यह लघु प्रहरी’ में दीपक को प्रहरी के रूप में चित्रित कर उसका मानवीकरण किया गया है। दीपक का जलना त्याग और आत्मसमर्पण का प्रतीक है—वह स्वयं नष्ट होकर भी दूसरों को प्रकाश देता है। कविता में अंधकार और प्रकाश के माध्यम से निराशा तथा आशा का प्रतीकात्मक चित्रण हुआ है। भाषा संस्कृतनिष्ठ, कोमल, भावपूर्ण, चित्रात्मक एवं संगीतात्मक है तथा करुणा, त्याग और आध्यात्मिक चेतना का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।

4. रे पपीहा पी कहाँ

कविता
रे पपीहे पी कहाँ? खोजता तू इस क्षितिज से उस क्षितिज तक शून्य अम्बर, लघु परों से नाप सागर; नाप पाता प्राण मेरे प्रिय समा कर भी कहाँ? हँस डुबा देगा युगों की प्यास का संसार भर तू, कण्ठगत लघु बिन्दु कर तू! प्यास ही जीवन, सकूँगी तृप्ति में मैं जी कहाँ? चपल बन बन कर मिटेगी झूम तेरी मेघवाला! मैं स्वयं जल और ज्वाला! दीप सी जलती न तो यह सजलता रहती कहाँ? साथ गति के भर रही हूँ विरति या आसक्ति के स्वर, मैं बनी प्रिय-चरण-नूपुर! प्रिय बसा उर में सुभग! सुधि खोज की बसती कहाँ?
शब्दार्थ — पपीहा — एक पक्षी, क्षितिज — आकाश और पृथ्वी के मिलने का काल्पनिक स्थान, शून्य अम्बर — रिक्त आकाश, लघु — छोटा, प्राण — जीवन/हृदय, प्रिय — प्रेमी/प्रियतम, कण्ठगत — कण्ठ में स्थित, बिन्दु — बूँद, प्यास — तृष्णा/लालसा, तृप्ति — संतोष/प्यास का शांत होना, चपल — चंचल, मेघवाला — बादलों की पंक्ति/मेघों का समूह, ज्वाला — अग्नि/दाह, सजलता — नमी/आर्द्रता, गति — चलना/प्रवाह, विरति — विराम/विरक्ति, आसक्ति — लगाव/प्रेम, चरण-नूपुर — चरणों में पहना जाने वाला आभूषण, सुभग — सुंदर/मनमोहक, सुधि — स्मरण/खोज, बसती — निवास करती है।
सन्दर्भ — प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आधुनिक काव्य पीयूष के ‘रे पपीहे पी कहाँ’ नामक पाठ से लिया गया है। इसकी रचयिता महादेवी वर्मा जी हैं।
प्रसङ्ग — प्रस्तुत पद्यांश में कवयित्री ने पपीहे की अतृप्त पुकार के माध्यम से अपने हृदय की प्रियतम के प्रति अनन्त प्रेम-पिपासा और विरह-वेदना को व्यक्त किया है। उनके लिए प्यास ही जीवन का आधार है; प्रियतम की प्राप्ति हो जाने पर वह विरहजनित साधना और प्रेम की अनुभूति समाप्त हो जाएगी।
हिन्दी व्याख्या — कवयित्री पपीहे को सम्बोधित करते हुए कहती हैं—हे पपीहे! तू ‘पी कहाँ?’ की पुकार लगाते हुए एक क्षितिज से दूसरे क्षितिज तक फैले हुए विशाल आकाश में अपने छोटे-छोटे पंखों से समुद्र की दूरी नापने का प्रयत्न कर रहा है। क्या तू मेरे प्राणों की उस गहराई को भी नाप सकता है, जिसमें मेरा प्रियतम पूरी तरह समाया हुआ है? यदि तू अपनी चोंच में एक छोटी-सी बूँद लेकर युगों से प्यासी इस दुनिया को तृप्त कर दे, तब भी मेरी प्यास समाप्त नहीं होगी। मेरे लिए प्यास ही जीवन है; यदि तृप्ति मिल गई तो मैं जीवित ही कहाँ रह सकूँगी? पपीहे के ऊपर उमड़ते-घुमड़ते बादल आते हैं और चंचल होकर बरसते हुए समाप्त हो जाते हैं, पर कवयित्री स्वयं जल और ज्वाला दोनों हैं—उनके भीतर प्रेम की नमी भी है और विरह की अग्नि भी। वह कहती हैं कि यदि यह आन्तरिक ज्वाला दीपक की तरह निरन्तर न जलती, तो मेरे हृदय की सजलता भी कहाँ बनी रहती? कवयित्री अपने जीवन की गति के साथ कभी विरक्ति और कभी आसक्ति के स्वर भरती हुई स्वयं को प्रियतम के चरणों का नूपुर मानती हैं। प्रियतम उनके हृदय में पहले से ही निवास करते हैं, इसलिए उन्हें बाहर खोजने पर भी उनकी स्मृति और खोज का कोई अलग स्थान नहीं है। इस प्रकार पपीहे की पुकार कवयित्री की अनन्त प्रेम-पिपासा, विरह-वेदना और प्रियतम के प्रति आत्मसमर्पण की प्रतीक बन जाती है।
काव्य-सौंदर्य — कवयित्री ने पपीहे को विरह और अनन्त प्रेम-पिपासा के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। ‘रे पपीहे पी कहाँ?’ में सम्बोधन तथा प्रश्नात्मक शैली के माध्यम से भावों की तीव्रता व्यक्त हुई है। पपीहे का क्षितिज से क्षितिज तक उड़ना और सागर को अपने लघु पंखों से नापना उसकी अतृप्त खोज का सुंदर बिम्ब है। ‘प्यास ही जीवन’ में प्यास को जीवन का आधार मानकर विरह-वेदना को आध्यात्मिक ऊँचाई दी गई है। जल और ज्वाला का प्रयोग प्रेम की सजलता तथा विरह की दाहकता का प्रतीक है। ‘मैं बनी प्रिय-चरण-नूपुर’ में कवयित्री का प्रियतम के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण व्यक्त हुआ है। कविता में मानवीकरण, रूपक, प्रतीक, अनुप्रास तथा प्रश्नात्मक शैली का सुंदर प्रयोग है। भाषा कोमल, भावपूर्ण, संगीतात्मक एवं चित्रात्मक है और इसमें विरह, प्रेम, आत्मसमर्पण तथा अनन्त तृष्णा के भाव अत्यन्त मार्मिक रूप में व्यक्त हुए हैं।

5. महादेवी वर्मा का जीवन परिचय

जीवन परिचय — यहाँ महादेवी वर्मा का जीवन परिचय रहेगा।
साहित्यिक परिचय — यहाँ साहित्यिक परिचय रहेगा।
प्रमुख रचनाएँ — यहाँ प्रमुख रचनाएँ रहेंगी।
महादेवी वर्मा — पद एवं साहित्यिक परिचय

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