अलंकार — परिभाषा, भेद, प्रकार, तत्व
विषय सूची
अलंकार भारतीय काव्यशास्त्र का प्रमुख अंग है जो भाषा के सौंदर्य और प्रभाव को बढ़ाता है। नीचे इसके परिभाषा, प्रमुख भेद, प्रकार और तत्व-अवयव व्यवस्थित रूप से दिए गए हैं।
अलंकार — परिभाषा
✍️ अलंकार की परिभाषा -
मानव समाज सौन्दर्योपासक है। उसकी इसी प्रवृत्ति ने अलंकारों को जन्म दिया। जिस प्रकार शरीर की सुन्दरता को बढ़ाने के लिए मनुष्य आभूषणों का प्रयोग करता है, उसी प्रकार भाषा को सुंदर बनाने के लिए अलंकार का सृजन हुआ। काव्य की शोभा बढ़ाने वाले शब्दों को अलंकार कहते है । जिस प्रकार नारी के सौन्दर्य को बढ़ाने के लिए आभूषण होते है,उसी प्रकार भाषा के सौन्दर्य के उपकरणों को अलंकार कहते है। इसीलिए कहा गया है - 'भूषण बिन न बिराजई कविता बनिता मित्त ।'
🌿 व्युत्पत्तिअलंकार शब्द की व्युत्पत्ति – अलम् + कृ + घञ् प्रत्यय के योग से हुई है। इसका अर्थ है अलंकृत करना। 👉 अर्थात – “जिसके द्वारा अलंकृत किया जाए वही अलंकार है।” ✨ अलंकार काव्य की आत्मा को और अधिक सुंदर, आकर्षक व प्रभावशाली बनाते हैं। ✨
अलंकार की व्युत्पत्तिमूलक तीन परिभाषाएँ हैं
- अलंकरोति इति अलंकारः– अलंकृत करता है अतः अलंकार है।
- अलंक्रियते अनेन इति अलंकार-ःजिससे यह अलंकृत होता है वही अलंकार है।
- अलंकृतिः अलंकारः - अलंकृति ही अलंकार है।
- भामह : वाचां वक्रार्थ शब्दोक्तिरिष्टा वाचांलंकृतिः – शब्द और अर्थ को विभामय करने वाली वक्रोक्ति ही अलंकार है।
- दण्डी : काव्य शोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते – काव्य के शोभाकारक धर्म ही अलंकार हैं।
- वामन : काव्यशोभायाः कर्तारौ धर्माः गुणाः तदतिशयहेतवस्त्वलंकाराः – शोभा देने वाला धर्म गुण है और उसकी अतिशयता का हेतु अलंकार है।
- वामन : सौन्दर्यम् अलंकारः
- जगन्नाथ : काव्यात्मनो व्यंग्यस्य रमणीयता-प्रयोजका अलंकाराः – व्यंग्य की रमणीयता के प्रयोजक धर्म अलंकार हैं।
- रुद्रट : अभिधानप्रकारविशेषा एव चालंकाराः – कथन की विशेष भंगिमा ही अलंकार है।
- आनन्दवर्धन : तत् (रस) प्रकाशिनो वाच्यविशेषा एव रूपकादयोऽलंकाराः – अलंकार शब्दार्थ के साथ संयुक्त होकर रस को प्रकाशित करते हैं।
- कुन्तक : कविप्रतिभोत्थितो विच्छित्ति-विशेषोऽलंकारः
- महिमभट्ट : चारुत्वं हि वैचित्र्य पर्यायं प्रकाशमानम् अलंकारः
- राजानक तिलक : वैचित्र्यमलंकारः अभिधीयते – कविप्रतिभा से उत्पन्न विचित्रता ही अलंकार है।
- मम्मट : उपकुर्वन्ति तंसन्तं अंगद्वारेण जातुचित्। हारादिवत् अलंकाराः तेनुप्रासोपमादयः
- विश्वनाथ : शब्दार्थयोरस्थिरा ये धर्माः शोभातिशायिनः रसादीनुपकुर्वन्ति ते अलंकाराः
- जगन्नाथ : काव्यात्मनो व्यंग्यस्य रमणीयता-प्रयोजका अलंकाराः
- जयदेव : अङ्गीकरोति यः काव्यं शब्दार्थवनलंकृती। असौ न मन्यते कस्मादनुष्णमलनलंकृति॥
- केशवदास : जदपि सुजात सुलक्षणी सुबरन सरस सुवृत्त। भूषण बिनु न विराजई कविता, वनिता, मित्त।।
- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल : भावों के उत्कर्ष को दिखाने तथा वस्तुओं के गुण और क्रिया का तीव्र अनुभव कराने में सहायक युक्ति अलंकार है।
“धर्मराज! जो कुछ भी हुआ, उसके मूल में स्वयं को दोषी मत समझो। हम लोग विधाता द्वारा अभिनीत रंगमंच के पात्र हैं। उसके अभिनय में सहायक की भूमिका निर्वहन कर रहे हैं। हमारा तो मूल्यांकन आने वाला युग करेगा। परवर्ती युग में ही हम सभी लोगों का चरित्रांकन होगा। निरपेक्ष भाव से ही किसी तटस्थ व्यक्ति द्वारा वर्तमान सन्दर्भों में हम लोगों की समीक्षा सम्भव है।”
🌸 अलंकार के तत्व 🌸
अलंकार के मूल में कौन से तत्व रहते हैं – इस पर संस्कृत विद्वानों ने भिन्न-भिन्न मत दिए हैं।| विद्वान | तत्व |
| आचार्य दण्डी | स्वभावोक्ति |
| भामह | वक्रोक्ति |
| वामन एवं रूय्यक | सादृश्य |
| उद्भट | अतिशयता |
| अभिनवगुप्त | गुणीभूतव्यंग्य |
✍️ स्वभावोक्ति -
आचार्य दण्डी के अनुसार स्वभावोक्ति ही सम्पूर्ण अलंकारों में निहित सारभूत तत्व है और उसके अभाव में अलंकारत्व सम्भव नहीं।
नानावस्थां पदार्थानां रुपं साक्षाद्विवृण्वती।
स्वभावोक्तिश्चजा तिश्चेति आद्यासालंकृतिः यथा।।
✍️ वक्रोक्ति -
आचार्य दण्डी के अनुसार स्वभावोक्ति ही सम्पूर्ण अलंकारों में निहित सारभूत तत्व है और उसके अभाव में अलंकारत्व सम्भव नहीं।
✍️ सादृश्य -
आचार्य दण्डी के अनुसार स्वभावोक्ति ही सम्पूर्ण अलंकारों में निहित सारभूत तत्व है और उसके अभाव में अलंकारत्व सम्भव नहीं।
✍️ अतिशयता -
आचार्य दण्डी के अनुसार स्वभावोक्ति ही सम्पूर्ण अलंकारों में निहित सारभूत तत्व है और उसके अभाव में अलंकारत्व सम्भव नहीं।
✍️ गुणभूतव्यंग्य -
आचार्य दण्डी के अनुसार स्वभावोक्ति ही सम्पूर्ण अलंकारों में निहित सारभूत तत्व है और उसके अभाव में अलंकारत्व सम्भव नहीं।
अलंकारों का वर्गीकरण
अलंकार आमतौर पर दो प्रकार के माने जाते हैं — अलंकार के भेद - इसके तीन भेद होते है - १.शब्दालंकार २.अर्थालंकार ३.उभयालंकार शब्दालंकार और अर्थालंकार। शब्दालंकार में ध्वनि-सौंदर्य प्रमुख होता है; अर्थालंकार में अर्थ-प्रभाव और रूपक प्रधान होते हैं।
अलंकारों की संख्या
- भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में अलंकारों की संख्या 04 बतायी है। 1. 2. 3. 4.
- अग्निपुराण में अलंकारों की संख्या- 16 है
- आचार्य भामह ने अपने ग्रंथ काव्यालंकार में 48 प्रकार के अलंकारों का उल्लेख किया है
- आचार्य रुद्रट ने अपनी कृति अलंकार सार संग्रह में 78 अलंकारों का उल्लेख किया है
- महाकवि जयदेव ने चन्द्रालोक में अलंकारों की संख्या 100 तक बतायी है
- अप्पय दीक्षित कुबलयानन्द में अलंकारों की संख्या 123 बताया
- पण्डितराज जगन्ननाथ ने रसगङ्गाधर में अलंकारों के 191 भेद बताए हैं
शब्दालंकार
जिस अलंकार में शब्दों के प्रयोग के कारण कोई चमत्कार उपस्थित हो जाता है और उन शब्दों के स्थान पर समानार्थी दूसरे शब्दों के रख देने से वह चमत्कार समाप्त हो जाता है,वहाँ पर शब्दालंकार माना जाता है।
शब्दालंकार के प्रमुख भेद है - १.अनुप्रास २.यमक ३.श्लेष, ४.वक्रोक्ति
1.अनुप्रास अलंकार
परिभाषा: अनु + प्र + आस् = 'बार-बार', 'प्रकर्ष (के साथ) रखना'।
अर्थात् रस के अनुकूल वर्णों की पास-पास रचना (प्रास)। जिस वाक्य काव्य अथवा काव्यांश में वर्णों की आवृत्ति हो, उसे अनुप्रास अलंकार कहते हैं।
जहाँ स्वर की समानता के बिना भी वर्णों की बार-बार आवृत्ति होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। अर्थालंकार जहाँ अर्थ के माध्यम से काव्य में चमत्कार उत्पन्न होता है ,वहाँ अर्थालंकार होता है । अर्थालंकार में किसी शब्द विशेष के कारण चमत्कार नहीं रहता, वरन उसके स्थान पर यदि समानार्थी दूसरा शब्द रख दिया जाए तो भी अलंकार बना रहेगा इसके प्रमुख भेद है - १.उपमा २.रूपक ३.उत्प्रेक्षा ४.दृष्टान्त ५.संदेह ६.अतिशयोक्ति इत्यादि १.उपमा अलंकार :- जहाँ पर उपमेय से उपमान की तुलना की जाती है वहाँ उपमा अलंकार होता है । उपमा के चार अंग हैं- उपमेय, उपमान, वाचक और साधारण धर्म । उपमा के अंग - १- उपमेय (प्रस्तुत ) - जिसके लिए उपमा दी जाती है , या जिसकी तुलना की जाती है . २- उपमान (अप्रस्तुत )- जिससे उपमा दी जाती है , या जिससे तुलना की जाती है . ३- वाचक शब्द - वह शब्द , जिसके द्वारा समानता प्रदर्शित की जाती है . जैसे - ज्यों , जैसे , सम , सरिस , सामान आदि ४- समान धर्म - वह गुण अथवा क्रिया , जो उपमेय और उपमान , दोनों में पाया जाता है . अर्थात जिसके कारन इन दोनों को समान बताया जाता है . जैसे - राधा चन्द्र सी सुन्दर | | | | उपमेय उपमान वाचक शब्द समान धर्म उदाहरण- पीपर पात सरिस मन डोला । उपमा के दो भेद होते है - १- पूर्णोपमा - जब उपमा में इसके चारो अंग प्रत्यक्ष हो । जैसे - मुख मयंक सम मंजु मनोहर । मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर है . २- लुप्तोपमा - जब उपमा के चारो अंगो में से कोई एक या अधिक अंग लुप्त हो । जैसे- कुन्द इन्दु सम देह । यहाँ पर साधारण धर्म लुप्त है । २.रूपक अलंकार :- “रूपकं रूपितारोपोविषयेनिरपह्नवे।” जहाँ उपमेय पर उपमान का आरोप किया जाय ,वहाँ रूपक अलंकार होता है , यानी उपमेय और उपमान में कोई अन्तर न दिखाई पड़े । उदाहरण - बीती विभावरी जाग री। अम्बर -पनघट में डुबों रही ,तारा -घट उषा नागरी ।' यहाँ अम्बर में पनघट ,तारा में घट तथा उषा में नागरी का अभेद कथन है। यह तीन प्रकार का होता है- सांग रूपक- जहाँ पर उपमान का उपमेय में अंगों सहित आरोप होता है, वहाँ सांगरूपक अलंकार होता है । उदित उदयगिरि मंच पर रघुवर बाल पतंग। बिकसे संत सरोज सब, हरषे लोचन भृग ।। निरंग रूपक- जहाँ सम्पूर्ण अंगों का साम्य न होकर केवल एक अंग का ही आरोप किया जाता है वहाँ निरंग रूपक होता है- मुख-कमल समीप सजे थे, दो किसलय दल पुरइन के । परम्परित रूपक – जहाँ पर मुख्य रूपक एक अन्य रूपक पर आश्रित रहता है और वह बिना दूसरे रूपक के स्पष्ट नहीं होता है वहाँ परम्परित रूपक होता है । सुनिय तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खल बधिक । ३.उत्प्रेक्षा अलंकार :- जहाँ उपमेय को ही उपमान मान लिया जाता है यानी अप्रस्तुत को प्रस्तुत मानकर वर्णन किया जाता है। वहा उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। यहाँ भिन्नता में अभिन्नता दिखाई जाती है। उत्प्रेक्षा अलंकार में मनु,मानो, जनु, जानों इत्यादि वाचक शब्द का प्रयोग होता है । उदाहरण - सोहत ओढ़े पीत पट श्याम सलोने गात । मनो नीलमनि शैल पर आतप पर् यो प्रभात । । यह तीन प्रकार का होता है- फलोत्प्रेक्षा, हेतुत्प्रेक्षा, गम्योत्प्रेक्षा । ४.अतिशयोक्ति अलंकार :- जहाँ पर लोक -सीमा का अतिक्रमण करके किसी विषय का वर्णन होता है । वहाँ पर अतिशयोक्ति अलंकार होता है। उदाहरण - हनुमान की पूंछ में लगन न पायी आगि । सगरी लंका जल गई ,गये निसाचर भागि। । यहाँ हनुमान की पूंछ में आग लगते ही सम्पूर्ण लंका का जल जाना तथा राक्षसों का भाग जाना आदि बातें अतिशयोक्ति रूप में कहीं गई है। यह सात प्रकार का होता है । रूपकातिशयोक्ति, भेदकातिशयोक्ति, सम्बन्धातिशयोक्ति, सापह्नुवातिशयोक्ति, चपलातिशयोक्ति, अक्रमातिशयोक्ति, अत्यन्तातिशयोक्ति 5.संदेह अलंकार :- जहाँ प्रस्तुत में अप्रस्तुत का संशयपूर्ण वर्णन हो ,वहाँ संदेह अलंकार होता है। जैसे - 'सारी बिच नारी है कि नारी बिच सारी है । कि सारी हीकी नारी है कि नारी हीकी सारी है । ' इस अलंकार में नारी और सारी के विषय में संशय है अतः यहाँ संदेह अलंकार है । 6.दृष्टान्त अलंकार :- जहाँ दो सामान्य या दोनों विशेष वाक्य में बिम्ब -प्रतिबिम्ब भाव होता है ,वहाँ पर दृष्टान्त अलंकार होता है। इस अलंकार में उपमेय रूप में कहीं गई बात से मिलती -जुलती बात उपमान रूप में दूसरे वाक्य में होती है। उदाहरण :- 'एक म्यान में दो तलवारें , कभी नही रह सकती है । किसी और पर प्रेम नारियाँ, पति का क्या सह सकती है । । ' इस अलंकार में एक म्यान दो तलवारों का रहना वैसे ही असंभव है जैसा कि एक पति का दो नारियों पर अनुरक्त रहना । अतः यहाँ बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव दृष्टिगत हो रहा है। 7.भ्रांतिमान अलंकार - जहाँ भ्रमवश उपमेय को उपमान समझ लिया जाता है , वहाँ भ्रांतिमान अलंकार होता है ।जैसे – पाँय महावर देन को नाईन बैठी आय । फिरि-फिरि जानि महावरी, एड़ी मीड़त जाय ।। 8. विभावना अलंकार – जहाँ कारण के उपस्थित न होने पर भी कार्य हो रहा हो वहाँ विभावना अलंकार होता है ।जैसे – बिनु पद चले , सुने बिनु काना कर विनु कर्म करै विधि नाना । आनन रहित सकल रस भोगी । बिनु वाणी वक्ता बड़ जोगी ।। 9. व्यतिरेक अलंकार - जहाँ उपमेय से उपमान की अधिकता अथवा न्यूनता बताया जाये वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है । जैसे – साधू ऊँचे शैल सम , किन्तु प्रकृति सुकुमार । सन्त हृदय नवनीत समाना । कहा कविन्ह परि कहै न जाना ।। 10.अनन्वय अलंकार -जब उपमेय का कोई उपमान न होने के कारन उपमेय को ही उपमान बना दिया जाता है , तब उसे अनन्वय अलंकार होता है । जैसे - मुख मुख ही के सामान सुन्दर है । ताते मुख मुखै सखि कमलौ न चन्द री । 11.अपह्नुति अलंकार:- जहाँ प्रस्तुत को छिपाकर अप्रस्तुत का आरोपण हो अर्थात जहाँ उपमान को ही सत्य की भाँति प्रतिष्ठित किया जाए वहाँ अपह्नुति अलंकार होता है। जैसे किंसुक गुलाब कचनार और अनारन की डारन पर डोलत अंगारन को पुंज है । 12. प्रतीप अलंकार - यह उपमा का उल्टा होता है । अर्थात जब उपमेय को उपमान और उपमान को उपमेय बना दिया जाता है , तो वहां प्रतीप अलंकार होता है । जैसे - चन्द्रमा मुख के सामान सुन्दर है । 13. उल्लेख अलंकार - जहाँ एक वस्तु का वर्णन अनेक प्रकार से किया जाए, वहाँ उल्लेख अलंकार होता है । उदाहरण तू रूप है किरण में, सौंदर्य है सुमन में, तू प्राण है पवन में, विस्तार है गगन में। यहाँ रूप का किरण, सुमन, में और प्राण का पवन, गगन कई रूपों में उल्लेख है। 14. अर्थान्तरन्यास अलंकार - जहाँ सामान्य कथन का विशेष से या विशेष कथन का सामान्य से समर्थन किया जाए, वहाँ अर्थान्तरन्यास अलंकार होता है । जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग । चन्दन विष व्यापत नहीं लपटे रहत भुजंग ।। 15. विशेषोक्ति अलंकार- जहाँ पर कारण के उपस्थित होते हुए भी कार्य पूर्ण न हो रहा हो वहाँ विशेषोक्ति अलंकार होता है । यह विभावना का उल्टा होता है । जैसे- फूलई फलहिं न बेत, जदपि सुधा बरसहिं जलद । मूरख हृदय न चेत, जौ गुरु मिलइ बिरंचि सम ।। 16. विरोधाभास अलंकार- जहाँ पर किसी पदार्थ, गुण या क्रिया में बिरोध दिखलाई पड़े वहाँ पर विरोधाभास अलंकार होता है । जैसे- जाकी सहज स्वासि श्रुति चारी। सो हरि पढ़ि कौतुक भारी । 17.व्याजस्तुति अलंकार- जहाँ निन्दा के बहाने स्तुति तथा स्तुति के बहाने निन्दा का वर्णन किया जाता है वहाँ पर व्याजस्तुति अलंकार होता है । बाउ कृपा मूरति अनूकूला । बोलत बचन झरत जनू फूला। 18. असंगति अलंकार- कार्य तथा कारण का अलग-अलग स्थानों पर वर्णन ही असंगति अलंकार कहलाता है ।जैसे- पलनि पीक अंजन अधर, धरे महावर भाल । आजु मिले सु भली करी भले बने हो लाल । यहाँ अधरों पर पीक है तथा गालों पर महावर है । अर्थात कार्य एवं कारण में भिन्नता है इसलिये यहाँ पर असंगति अलंकार है । 19.समासोक्ति अलंकार- जहाँ पर अप्रस्तुत को लक्ष्य करके उसके सादृश्य अन्य वस्तु के प्रति कथन किया जाता है वहाँ पर समासोक्ति अलंकार होता है । जैसे- नहिं पराग नहिं मधुर मधु नहिं विकास इह काल । अली कली हीं सौ बध्यौं आगे कवन हवाल ।। 20. स्मरण अलंकार- जहाँ पर किसी सादृश्य उपमान के कारण उपमेय का स्मरण हो वहाँ पर स्मरण अलंकार होता है । जैसे स्याम सुरति करि राधिका, तकति तरनजा तीर । अँसुवनि करति तरौंस कौ, छिनकु खरौंहे नीर ।। अर्थालंकारों पर एक नजर- आपका मुख चंद्रमा के समान है- उपमा चंद्रमा आपके मुख के समान है- प्रतीप आपका चंद्रमुख- रूपक यह आपका मुख है कि चन्द्र- संदेह यह चन्द्र है आपका मुख नहीं है- अपह्नुति चन्द्र आपके मुख के समान है, आपका मुख चन्द्र के समान है- उपमेयोपमा आपका मुख आपके मुख के समान ही है- अनन्वय चन्द्र को देखकर आपके मुख का स्मरण हुआ- स्मरण आपके मुख को चन्द्र जानकर चकोर आपके मुख की ओर उडा- भ्रान्तिमान यह चन्द्रकमल है ऐसा समझकर चकोर तथा भ्रमर आपके मुख की ओर उड़ रहे हैं – उल्लेख आपका मुख मानों चन्द्र है- उत्प्रेक्षा यह द्वितीय चन्द्र है- अतिशयोक्ति रात्रि में चन्द्रमा और आपका मुख दोनों आनन्दित होते हैं- दीपक चन्द्र रात्रि में उल्लसित होता है किन्तु आपका मुख सदैव उल्लसित रहता है- व्यतिरेक जिस प्रकार आकाश में चन्द्र है उसी प्रकार पृथ्वी पर आपका मुख है- दृष्टान्त आकाश में चन्द्र विराजमान है पृथ्वी पर आपका मुख विराजमान है- प्रतिवस्तूपमा आपका मुख चन्द्रमा की शोभा को धारण करता है- निदर्शना आपके मुख के सम्मुख चन्द्रमा फीका है- अप्रस्तुत प्रशंसा आपके चन्द्रमुख के कारण कामाग्नि शान्त हो जाती है- परिणाम चंद्रमा तुम्हारे मुख के साथ रात के समय प्रसन्न रहता है- सहोक्ति
अलंकार के तत्व व अवयव
- भाषा-सौंदर्य: शब्दों का चयन और ध्वनि-समेकन।
- भाव-रुचि: पाठक/श्रोता पर प्रभाव उत्पन्न करने की क्षमता।
- रूपकता: तुलना व संकेत द्वारा अर्थ-विस्तार।
- संदर्भ: प्रसंग और भाव के अनुसार अलंकार का अर्थ स्थिर होता है।
उदाहरण
उपमा — “तुम चाँद के समान हो”; अनुप्रास — “सहसा सागर सन्नाटे से सन्न हुआ”।
अलंकार से जुड़े सामान्य प्रश्न
अलंकार और अलंकरण में अंतर क्या है?
अलंकार भाषा में सौंदर्य जोड़ने का साधन है; अलंकरण उस सिद्धांत या प्रणाली को कहते हैं जो अलंकारों का वर्गीकरण करती है।
अलंकार का उपयोग किसे कहा जाता है?
अलंकार का उपयोग कविता, गद्य और भाषण में भाषा-शैली और प्रभाव बढ़ाने के लिए किया जाता है।
क्या अलंकार केवल कविता में ही उपयोगी है?
नहीं, अलंकार कविता के साथ-साथ गद्य, नाटक और वार्तालाप में भी प्रभावी होते हैं।
अलंकार — परिभाषा, भेद, प्रकार, तत्व
अलंकार शब्द का सामान्य अर्थ है 'शोभा' या 'सजावट'। काव्यशास्त्र में अलंकार का आशय वह विशेषता है जो शब्द-या-अर्थ में वैभव या सौन्दर्य उत्पन्न कर के काव्य को आकर्षक बनाती है।
परिभाषा स्वरूप — आचार्य भामह ने कहा है कि अलंकार वह है जिससे शब्दार्थ की शोभा बढ़े; मम्मट और अन्य आचार्यों ने इसे काव्य की शोभा का प्रधान घटक माना है।
अलंकार और अन्य सैद्धान्तों से भेद
अलंकार सिद्धान्त का अन्य सिद्धान्तों (जैसे रस सिद्धान्त, गुण सिद्धान्त, रीति सिद्धान्त) से भेद सकारात्मक है —
- रस सिद्धान्त जहाँ भाव के अनुभव (रसा) पर जोर देता है, वहाँ अलंकार सिद्धान्त शब्द-भाव की शोभा पर केन्द्रित रहता है।
- गुण सिद्धान्त काव्य के नैसर्गिक गुणों (जैसे भाषा-शुद्धता, औचित्य) पर बल देता है; अलंकार इन गुणों को सजाने के साधन भी हैं।
- रीति सिद्धान्त शैली और छंद-रचना पर ध्यान देता है; अलंकार रीति का सुसज्जित रूप भी बनते हैं।
अलंकारों के प्रकार
परम्परागत रूप से अलंकार दो प्रमुख प्रकार में विभक्त किए जाते हैं —
- शब्दालंकार (Alankara of words): जिनमें शब्दों की ध्वनि, क्रम या मात्रा से सौन्दर्य उत्पन्न होता है — उदाहरण: अनुप्रास (alliteration), यमक (pun), वर्णोक्ति आदि।
- अर्थालंकार (Alankara of sense): जिनमें अर्थ या विचार के विलक्षण प्रयोग से शोभा आती है — उदाहरण: उपमा (simile), रूपक (metaphor), श्लेष (paronomasia), अतिशयोक्ति आदि।
कुछ प्रमुख अलंकार (संक्षेप में)
- उपमा: तुलना द्वारा सौन्दर्य प्रकट करना (जैसे — 'वह चाँद समान')।
- रूपक: प्रत्यक्षत: किसी वस्तु का किसी अन्य रूप में चित्रण (अप्रत्यक्ष तुलना)।
- श्लेष: एक शब्द के द्वैतार्थ से सुंदरता उत्पन्न करना।
- अनुप्रास: अक्षर-ध्वनि का आवर्तन जिससे अभिनय व लय में सुंदरता आए।
- उपमेय-व्यर्थ: भाव-तुलना के अन्य सूक्ष्म रूप (विस्तार के लिए आचार्यों के ग्रन्थ देखें)।
अलंकारों के तत्व
अलंकारों के मूल तत्वों में निम्न घटक आते हैं —
- शब्द-रचनात्मकता: ध्वनि, तुक, मात्रा एवं शब्द विन्यास।
- अर्थ-चातुर्य: विचार का नवीन प्रयोग, अर्थ-परतों का सघन उपयोग।
- औचित्य (योग्यता): अलंकार का सन्दर्भयुक्त और प्रसंगानुकूल होना।
- रस-सहयोग: अलंकार का वह गुण जिससे वह प्रधान रस को पुष्ट करे।
अलंकार तब तक प्रभावी है जब तक वह काव्य के अन्य तत्त्वों (छंद, रीति, रस) के साथ समन्वित रहता है; विच्छिन्न अलंकार काव्य को भारी या कृत्रिम बना सकता है।
उदाहरण एवं संक्षिप्त विवेचना
- उपमा (Example): "वह सिंह तुल्य वीर" — स्पष्ट तुलना से भाव का सशक्त अनुभव।
- रूपक (Example): "जीवन एक युद्ध-भूमि है" — संपूर्ण वस्तु को रूपक के रूप में प्रस्तुत कर गहनार्थ उत्पन्न करना।
- अनुप्रास (Example): "निकल कर नदिया ने" — ध्वनि-सौंदर्य के कारण वाक्य का प्रभाव बढ़ना।

श्री स्वामिने नमः 🙏
जवाब देंहटाएंगुरदेव प्रणाम
Wow good website, thank you.
जवाब देंहटाएंAikatana By Pratibha Ray
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