अलंकार की परिभाषा, व्युत्पत्ति, तत्व, अवयव, वर्गीकरण, शब्दालंकार, अर्थालंकार तथा प्रमुख अलंकारों के उदाहरणों का विस्तृत अध्ययन।
अलंकार भारतीय काव्यशास्त्र का प्रमुख अंग है जो भाषा के सौंदर्य और प्रभाव को बढ़ाता है। नीचे इसके परिभाषा, प्रमुख भेद, प्रकार और तत्व-अवयव व्यवस्थित रूप से दिए गए हैं।
अलंकार — परिभाषा
✍️ अलंकार की परिभाषा -
मानव समाज सौन्दर्योपासक है। उसकी इसी प्रवृत्ति ने अलंकारों को जन्म दिया। जिस प्रकार शरीर की सुन्दरता को बढ़ाने के लिए मनुष्य आभूषणों का प्रयोग करता है, उसी प्रकार भाषा को सुंदर बनाने के लिए अलंकार का सृजन हुआ। काव्य की शोभा बढ़ाने वाले शब्दों को अलंकार कहते है। जिस प्रकार नारी के सौन्दर्य को बढ़ाने के लिए आभूषण होते है,उसी प्रकार भाषा के सौन्दर्य के उपकरणों को अलंकार कहते है। इसीलिए कहा गया है - ‘भूषण बिन न बिराजई कविता बनिता मित्त।’
🌿 व्युत्पत्ति
अलंकार शब्द की व्युत्पत्ति – अलम् + कृ + घञ् प्रत्यय के योग से हुई है। इसका अर्थ है अलंकृत करना। 👉 अर्थात – “जिसके द्वारा अलंकृत किया जाए वही अलंकार है।”
✨ अलंकार काव्य की आत्मा को और अधिक सुंदर, आकर्षक व प्रभावशाली बनाते हैं। ✨
अलंकार की व्युत्पत्तिमूलक तीन परिभाषाएँ हैं -
- अलंकरोति इति अलंकारः – अलंकृत करता है अतः अलंकार है।
- अलंक्रियते अनेन इति अलंकारः – जिससे यह अलंकृत होता है वही अलंकार है।
- अलंकृतिः अलंकारः – अलंकृति ही अलंकार है।
- भामह : वाचां वक्रार्थ शब्दोक्तिरिष्टा वाचांलंकृतिः – शब्द और अर्थ को विभामय करने वाली वक्रोक्ति ही अलंकार है।
- दण्डी : काव्य शोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते – काव्य के शोभाकारक धर्म ही अलंकार हैं।
- वामन : काव्यशोभायाः कर्तारौ धर्माः गुणाः तदतिशयहेतवस्त्वलंकाराः – शोभा देने वाला धर्म गुण है और उसकी अतिशयता का हेतु अलंकार है।
- वामन : सौन्दर्यम् अलंकारः
- जगन्नाथ : काव्यात्मनो व्यंग्यस्य रमणीयता-प्रयोजका अलंकाराः – व्यंग्य की रमणीयता के प्रयोजक धर्म अलंकार हैं।
- रुद्रट : अभिधानप्रकारविशेषा एव चालंकाराः – कथन की विशेष भंगिमा ही अलंकार है।
- आनन्दवर्धन : तत् (रस) प्रकाशिनो वाच्यविशेषा एव रूपकादयोऽलंकाराः – अलंकार शब्दार्थ के साथ संयुक्त होकर रस को प्रकाशित करते हैं।
- कुन्तक : कविप्रतिभोत्थितो विच्छित्ति-विशेषोऽलंकारः
- महिमभट्ट : चारुत्वं हि वैचित्र्य पर्यायं प्रकाशमानम् अलंकारः
- राजानक तिलक : वैचित्र्यमलंकारः अभिधीयते – कविप्रतिभा से उत्पन्न विचित्रता ही अलंकार है।
- मम्मट : उपकुर्वन्ति तंसन्तं अंगद्वारेण जातुचित्। हारादिवत् अलंकाराः तेनुप्रासोपमादयः
- विश्वनाथ : शब्दार्थयोरस्थिरा ये धर्माः शोभातिशायिनः रसादीनुपकुर्वन्ति ते अलंकाराः
- जगन्नाथ : काव्यात्मनो व्यंग्यस्य रमणीयता-प्रयोजका अलंकाराः
- जयदेव : अङ्गीकरोति यः काव्यं शब्दार्थवनलंकृती। असौ न मन्यते कस्मादनुष्णमलनलंकृति॥
- केशवदास : जदपि सुजात सुलक्षणी सुबरन सरस सुवृत्त। भूषण बिनु न विराजई कविता, वनिता, मित्त।।
- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल : भावों के उत्कर्ष को दिखाने तथा वस्तुओं के गुण और क्रिया का तीव्र अनुभव कराने में सहायक युक्ति अलंकार है।
🌸 अलंकार के तत्व 🌸
अलंकार के मूल में कौन से तत्व रहते हैं – इस पर संस्कृत विद्वानों ने भिन्न-भिन्न मत दिए हैं।
| विद्वान | तत्व |
|---|---|
| आचार्य दण्डी | स्वभावोक्ति |
| भामह | वक्रोक्ति |
| वामन एवं रूय्यक | सादृश्य |
| उद्भट | अतिशयता |
| अभिनवगुप्त | गुणीभूतव्यंग्य |
✍️ स्वभावोक्ति -
आचार्य दण्डी के अनुसार स्वभावोक्ति ही सम्पूर्ण अलंकारों में निहित सारभूत तत्व है और उसके अभाव में अलंकारत्व सम्भव नहीं।
नानावस्थां पदार्थानां रुपं साक्षाद्विवृण्वती।
स्वभावोक्तिश्चजा तिश्चेति आद्यासालंकृतिः यथा।।
प्रत्येक अलंकार मूलतः वस्तु के रूप गुण क्रिया आदि की स्वाभाविक तथा नैसर्गिक स्थिति का वाणी-विधान द्वारा अहसास कराना चाहता है, उसके द्वारा निरन्तर यह चेष्टा की जाती है कि वर्ण विधान वस्तु के नैसर्गिक स्वभाव तथा स्वरूप का अतिक्रमण न कर जाए इस स्थिति में स्वाभावोक्ति अपनी सीमा में सम्पूर्ण अलंकार का नियमन करता है।
✍️ वक्रोक्ति -
आचार्य भामह वक्रोक्ति को अलंकार का प्रमुख तत्व मानते हैं। उनके अनुसार केवल स्वभावोक्ति को अलंकार का मूल तत्व मान लेने पर अलंकार एवं अलंकार्य का प्रश्न समाप्त हो जाएगा क्योकि उस स्थिति में रचना में वस्तु तथा प्रतीयमान का भेद समाप्त हो जाएगा।
✍️ सादृश्य -
आचार्य दण्डी के अनुसार स्वभावोक्ति ही सम्पूर्ण अलंकारों में निहित सारभूत तत्व है और उसके अभाव में अलंकारत्व सम्भव नहीं।
✍️ अतिशयता -
आचार्य दण्डी के अनुसार स्वभावोक्ति ही सम्पूर्ण अलंकारों में निहित सारभूत तत्व है और उसके अभाव में अलंकारत्व सम्भव नहीं।
✍️ गुणभूतव्यंग्य -
आचार्य दण्डी के अनुसार स्वभावोक्ति ही सम्पूर्ण अलंकारों में निहित सारभूत तत्व है और उसके अभाव में अलंकारत्व सम्भव नहीं।
अलंकारों की संख्या
- भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में अलंकारों की संख्या 04 बतायी है। 1. 2. 3. 4.
- अग्निपुराण में अलंकारों की संख्या- 16 है
- आचार्य भामह ने अपने ग्रंथ काव्यालंकार में 48 प्रकार के अलंकारों का उल्लेख किया है
- आचार्य रुद्रट ने अपनी कृति अलंकार सार संग्रह में 78 अलंकारों का उल्लेख किया है
- महाकवि जयदेव ने चन्द्रालोक में अलंकारों की संख्या 100 तक बतायी है
- अप्पय दीक्षित कुबलयानन्द में अलंकारों की संख्या 123 बताया
- पण्डितराज जगन्ननाथ ने रसगङ्गाधर में अलंकारों के 191 भेद बताए हैं
अलंकारों का वर्गीकरण
अलंकार आमतौर पर दो प्रकार के माने जाते हैं — अलंकार के भेद - इसके तीन भेद होते है - १. शब्दालंकार २. अर्थालंकार ३. उभयालंकार। शब्दालंकार और अर्थालंकार। शब्दालंकार में ध्वनि-सौंदर्य प्रमुख होता है; अर्थालंकार में अर्थ-प्रभाव और रूपक प्रधान होते हैं।
अलंकार के भेद

श्री स्वामिने नमः 🙏
जवाब देंहटाएंगुरदेव प्रणाम
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जवाब देंहटाएंAikatana By Pratibha Ray
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